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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 27 Oct 1882 - केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार || 23 Dec 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण देव का कथामृत हम देख रहे थे कि किस तरह से ठाकुर ब्रह्म समाज का जो दल है वह जहाज लेकर के वहां पर आया दक्षिणेश्वर में और उन्होंने ठाकुर को विनती की कि चलिए महाशय हम लोग गंगा के गंगा नदी के ऊपर में थोड़ा सा टहल करके आते हैं तो इस तरह से उनके साथ में ठाकुर भी गए और गंगा नदी के ऊपर में जहाज में यात्रा करते-करते जिस तरह से ठाकुर ने ब्राह्मण भक्तों को उपदेश दिया उस उपदेश का जो चैप्टर मास्टर महाशय ने जो लिपिबद्ध किया है श्री श्री रामकृष्ण कथामृत में व हमारा चल रहा था हमने देखा आखिरी जो षष्ठ परिच्छेद है अभी यह जो डेट है 27 अक्टूबर

Keshav sen and brahmo devotees

18826 परिच्छेद सिक्स्थ चैप्टर और कहेंगे कि सिक्स्थ पॉइंट हमारा चल रहा था हमने देखा कि ठाकुर किस तरह से ब्रह्मा भक्तों को उपदेश देते हैं आत्म

Dakshineshwar Kali temple

श्रद्धा के बारे में और कहते हैं कि यदि हम जोर करके यह कहे कि विष नहीं है यदि साप ने भी हमको काटा है तो विष वह बिल्कुल ही अपने शरीर से निकल जाएगा और हमने देखा इस ठाकुर के इस उपदेश को स्वामी जी के उपदेश के साथ में कंपेयर करके कि स्वामी जी का जो आत्म श्रद्धा सेल्फ कॉन्फिडेंस अपने चरित्र को मजबूत बनाना स्वामी जी कहते हैं कि यदि तुम लोगों को 33 कोटि देवताओं पर विश्वास है किंतु अपने पर विश्वास नहीं है तो वह 33 कोटि देवताओं पर विश्वास करके कोई लाभ नहीं होने वाला है तो वो जो स्वामी जी का आत्म श्रद्धा सेल्फ कॉन्फिडेंस सेल्फ जो स्ट्रेंथ एंड बिलीफ इन अवर ओन डेस्टिनी यह जो उपदेश था और है उसको ठाकुर के साथ में हम कंपेयर करके देखते हैं कि स्वामी जी का यह उपदेश बिल्कुल नया नहीं है ऐसा नहीं है कि ठाकुर ने इसके बारे में कभी कुछ नहीं कहा और स्वामी जी ने अपने हिसाब से यह उपदेश चलाया हो ठाकुर सिर्फ यहां पर ही नहीं बहुत बार इस तरह से कहते हैं कि आमी आनंद महीर छेल अर्थात की मां आनंदमय जगदंबा का संतान हो मुझे फिर यह संसार का दुख कष्ट यह सब कैसा है और इसके बाद में भी यह जो चैप्टर का पाठ करेंगे हम लोग आगे में भी इस तरह की बातें आएगी तो यह उपदेश आत्म श्रद्धा का जिसको कि स्वामी जी ने पूरे जगत में प्रचलित किया उसका सीड फॉर्म में उसका एक स्वरूप हम लोग श्री राम कृष्ण देव के उपदेशों में ही पाते हैं तो यह हो गई पूर्व भूमिका मैं थोड़ा सा फिर से पाठ कर लेता हूं अभी तक जो हुआ है उसके बाद में हम आगे जाएंगे श्री राम कृष्ण देव कहते हैं मने तेही बद्धो मने तेही मुक्तो मन से ही बद्ध है मन से ही मुक्त है आमी मुक्त पुरुष संसारे थाकी बा अरण थाकी आमार बंधन की मैं मुक्त पुरुष हूं वे चाहे संसार में रह न कि चाहे वन में रह मुझे बंधन किस चीज का है आमी ईश्वर संतान राजाधिराज छले मैं ईश्वर का संतान हूं राजाधिराज का पुत्र हूं राजकुमार हूं अमाए आबार बांधे के मुझे बंधन में डालने वाला है कौन आमी बधोन आमी मुक्तो थाटी रोक करे बोलते बोलते ताई होए जाए मुक्त होए जाए मैं बद्ध नहीं हूं मैं मुक्त हूं ऐसा जोर से भार देकर के कहने से एमफसिस देकर के कहने से बिल्कुल आत्मविश्वास के साथ में कहने से हम मुक्त ही हो जाएंगे बद्ध नहीं रहेंगे और हमने यह भी देखा था कि इस ठाकुर के इस उपदेश के साथ में अजात वाद का किस तरह से एक मिलन हमको दिख रहा है बहुत बार यहां पर श्री राम कृष्ण देव का जो ओवरऑल फिलोसोफी है इसके बारे में यहां तक कि मास्टर महाशय स्वयं कथामृत में इस तरह से लिखते हैं कि श्री रामकृष्ण देव का विशिष्ट अद्वैतवाद अर्थात कि श्री राम कृष्ण देव ऑन वन हैंड निराकार ईश्वर या तो फिर आत्मन में भी विश्वास करते हैं ऑन द अदर हैंड उनको

Daskhineshwar

साकार ईश्वर के ऊपर में भी इनको विश्वास है तो फिर मास्टर महाशय ने अपनी बुद्धि चला कर के लिखा है कि श्री राम कृष्ण देव का विशिष्ट अद्वैतवाद किंतु यहां पर देखिए यह जो पैराग्राफ है उसको आप ठीक-ठीक स्टडी करेंगे तो आपको लगेगा कि यह उन्हें हित या विशिष्ट अद्वैत तो छोड़ ही दीजिए इससे भी परे जो रेडिकल फिलोसोफी से अद्वैत के भी परे अजात वाद जो है उसके साथ में ठाकुर की इस बात का बिल्कुल मैचिंग हो जाता है अर्थात कि क्या है पता है ना ठाकुर ने जैसे कहा था कि वहां पे उनके कमरे के पास में ही नबत थी अभी नबत में वैसे तो हम तो

Thakur's room and nahabat

पहचानते हैं मां शारदा का निवास स्थान के रूप में किंतु उसका ओरिजिनल जो तात्पर्य प्रयोजन था वह शहनाई बजाने का अर्थात कि जब भी उत्सव होता है सुबह से लेकर के ही शहनाई बजना प्रारंभ हो जाता था और वैसे वहां पर प्रतिदिन होता होगा बाद बाद में पता नहीं उस प्रथा में कभी कुछ क्योंकि मथुर बाबू गए थे उसके बाद में त्रैलोक्य बाबू का तो इतना यह नहीं था नहीं ठाकुर के ऊपर इतना भक्ति था और ठाकुर के ऊपर में भक्ति नहीं रहने से मां काली के ऊपर में कहां से आएगी तो जो भी है मां जब रहती थी उस समय प्रति दिन वहां पर नबत सुबह को बजता था कि नहीं शहनाई वह तो मुझे पता नहीं उसको देखना पड़ेगा किंतु उसका ओरिजिनल पर्पस यह था कि वहां पर वह लोग शहनाई बजना वाले जो है बजाने वाले वह वहां से शहनाई बजाएंगे और वहां पर दक्षिणेश्वर में दो नबत है सिर्फ एक नहीं एक जहां पर मां रहती थी वर्ल्ड फेमस नबत उसके अलावा भी दूसरे कोने प जहां यानी कि जद आप गंगा में जद आप नौका में जाएंगे दक्षिणेश्वर कलकाता की ओर से तो सबसे पहले नबत आएगा उसके बाद में फिर यह द्वादश 12 शिव मंदिर है वह आएंगे फिर ठाकुर का कमरा आएगा और फिर से दूसरी नबत आएगी तो दो नबत से वह शहनाई की यह सूर और यह राग प्रतिदिन सुबह को बचते थे एक समय था तो ठाकुर उदाहरण देकर के कहते हैं कोई कोई जो गाय ये जो होते हैं शहना ई बजाने वाले वे लोग क्या करेंगे कि अभी यदि आपने शहनाई देखी होगी तो उसके ऊपर में सात सुरों के वह सात ये होल होते हैं अभी जिस होल को दबाए उसके अनुसार वह राग निकलेंगे अभी मुझे तो शहनाई किस तरह से बचती है पता नहीं किंतु ये जनरल थिरी है कि आपने शहनाई बजना देखा भी होगा वो किस तरह से अपनी उंगलियों से वोह एक के बाद एक होल को बंद करते हैं खोलते हैं जिससे कि विभिन्न तरह के राग बचते रहे तो ठाकुर कहते थे कि कोई कोई जो शहनाई बजाने वाला है सिर्फ एक ही जो राग बजाता रहेगा और कोई कोई शहनाई बजाने वाले हैं सब तरह के रागों का एक के बाद एक में सुंदर मिश्रण किया करेंगे तो ठाकुर कहते हैं कि मैं सिर्फ एक ही तरह की फिलोसोफी या एक ही तरह की ईश्वर उपासना या एक ही रूप की आराधना क्यों करू वो सभी फिलोसोफी सभी रूप सभी तरह की साधनाएं सभी तरह के योग ठाकुर ने अपने जीवन में करके देखे हैं तो यहां पर भी ठाकुर को जद आप पिन पॉइंट करना चाहेंगे तो कभी अपने हाथ में नहीं आएंगे अभी यहां पर बिल्कुल भक्ति भाव और प्रेम की बात कर रहे हैं रागा का भक्ति की बात कर रहे हैं गोपी प्रेम की बात कर रहे हैं और यहां पर दूसरे ही क्षण यह पूण अजात वाद मोस्ट रेडिकल ऑफ ऑल फिलोसोफी जगत है ही नहीं आपने जिस क्षण यह मान लिया जिस क्षण आप इस वहम में फस गए इस एक तरह की अंधश्रद्धा में पड़ गए कि हां जगत है तभी जगत दिख रहा है जिस क्षण इस अंधश्रद्धा से जिस क्षण इस भ्रम में से आप बाहर निकल जाएंगे कि जगत है ही नहीं तो जगत भी फट करके अदृश्य हो जाएगा बस अपनी बिलीफ और डिसबिलीफ के ऊपर में है हम लोग कैरियर बना अभी आजकल हम लोगों की मिनि किस में है तो हमको एक क बनानी है करियर के लिए हमको सब कुछ करना है करियर इज वेरी इंपोर्टेंट पार्ट ऑफ आवर लाइफ इस बारे में अपनी बिलीफ है फिर ये एक फ्यूचर का कुछ संधान करना है तो इन्वेस्टमेंट चाहिए तो इन्वेस्टमेंट प अपनी बिलीफ है जिस चीज में अपनी बिलीफ है जिस चीज पर हम विश्वास करते हैं उसमें कैसा जी जान हम लगा देते हैं किंतु जिस चीज के ऊपर मैं विश्वास नहीं होता उसको हम ऊपर ऊपर से हां हां करके उड़ा देंगे तो यहां पर भी यदि मुझे यह दृढ़ विश्वास हो जाए कि नहीं यह जगत मुझे जो दिख रहा है एक वहम मात्र है एक भ्रम मात्र है एक दुस्वप्न मात्र है और अभी मैं चाहूं तो इस दुस्वप्न में से जग जाऊंगा तो फट करके मैं इस दुस्वप्न में से जग जा सकता हूं जगत अदृश्य हो जाएगा यदि सांप ने मुझे काटा भी है तो वोह जो विष है वो विष जो है वो बिल्कुल विफल हो जाएगा ये मोस्ट रेडिकल ऑफ थिरी व कहां गोपी प्रेम एक क्षण तो कहां यह अजात वाद दूसरे ही क्षण तो यह थे अपने ठाकुर उनको कभी भी आप पिन पॉइंट करके यह नहीं कह पाएंगे कि यह उनकी फिलोसोफी थी या यह उनकी थिरी थी तो अभी आगे कहते हैं कि क्रिन देर एक खाना बई एक जन दले अमी पढ़े सुनाते बोलू क्रिश्चन लोगों की एक किताब किसी ने दी मैंने कहा कि पढ़ के सुनाओ ताते केवल पाप आर पाप उसमें सिर्फ पाप और पाप तो मादे ब्राह्मण समाज केवल पाप और केशव को कहते हैं ठाकुर तुम लोगों के ब्राह्मण समाज में भी देखो कि सिर्फ पाप की बातें जे व्यक्ति आमी बध आमी बध बार-बार बोले श शाला बवी होए जाए जो कहता रहेगा दिन रात कि मैं बंधन में हूं कर्मों के इस बंधन में फंसा हुआ हूं तो वह साला बंधन में ही पड़ा रहेगा बंधन में ही रहेगा जे रात दिन आमी पापी आमी पापी ही कोरे से ताई होए जाए और जो दिन रात यह कहता रहेगा कि मैं पापी हूं मैं पापी हूं वह साला पापी ही रहेगा अच्छा अभी एक चीज देखिए कि जिसको यह कहते हैं ना ह्यूमिडिटी अभी ये क्रिश्चियन कहो ना कि इवन हिंदू धर्म का ये जो वैष्णव शास्त्र है भक्ति शास्त्र है उसमें यह बार-बार कहना कि हां मैं पापी हूं मैं अधम हूं मैं हीन हूं अभी रानी वह अपने नाम के सामने दासी शब्द यूज करती थी दासी तो अभी क्या है कि यह हमेशा हम लोगों के खास करके इंडियन लोगों के माइंड में कि अपना जो सब समय यह कहते रहना कि मैं दीन हूं मैं हीन हूं मुझे कुछ नहीं आता तो हम लोग ऐसा क्यों कहते हैं इस तरह का जो भाव है वह भक्ति शास्त्र में क्यों प्रवेश किया है क्योंकि हमने एनालिसिस करके यह देखा है कि अहंकार जो है वह मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा में सबसे बड़ा अंतराय है और यह अहंकार को जब तक आप नहीं काटेंगे तब तक आप जितना ही जब ध्यान करते रहिए जितना ही आराधना योग करते रहिए आपके जीवन में अध्यात्मिक उन्नति कभी नहीं आएगी तो यह जो अहंकार है अहंकार को काटने के लिए दीन हीन भाव का यह एक डेवलपमेंट हुआ बहुत सारे वैष्णव ग्रंथों में पढ़ेंगे वैष्णव संतों की बायोग्राफीज पढ़ेंगे जैसे कि यह नरसिंह मेहता है या तो फिर यह मीराबाई है सब समय देखेंगे कि ईश्वर के दास या ईश्वर की दासी और एकदम दीन हीन भाव इस तरह का सब समय देखने को मिलेगा और इवन यह हमारे हिंदुइज्म में ही नहीं यह क्रिश्चियन रिलीजन में भी जिन लोगों को वो संत कहते हैं सेंट कहते हैं उन लोगों के जीवन में भी ये ह्यूमिडिटी है या तो फिर ये अंबल नेस है है उसका एक बहुत बड़ा प्राधान्य है इस साधना का और इवन रामकृष्ण संघ के यह जिस तरह से संघ का स्ट्रक्चर है उसमें देखिए कि यह जो डिसिप्लिन है आपके सीनियर की बात सुननी भले ही चाहे आपको कितना ही बुरा लगे वह आपको सुनना ही पड़ेगा यह जो डिसिप्लिन स्ट्रक्चर जो है उसको डेवलप भी इसीलिए किया है कि जिससे कि हमारे अहंकार के ऊपर में सतत आघात होता रहे सतत एक तरह के जो हथोड़ा जो होता है ना हथोड़े से कैसे पत्थर तोड़ते हैं तो हमारा अहंकार भी इस पत्थर की तरह है हथोड़े से अब उसको तोड़ते ही रहिए तोड़ते ही रहिए तो यह एक वे एक मेथड ऑ साधना है कि मैं अपने को दीन हीन बना ल तो किंतु जिस तरह से अपने को दीन हीन बनाने की साधना है वैसे ही साधना है अपने को परिशुद्ध बनाने की यह मत सोचिए कि दीन भीन भाव निरह काता इसी से ही अहंकार चला जाएगा यदि आप अपने मन को डिसिप्लिन करते हैं अपने मन को फोकस करते हैं यह वासनाओं के विषयों से अपने को मुक्त करते हैं तो भी आप इस अहंकार से मुक्ति पा जाएंगे यानी कि अहंकार से मुक्त होने के दो उपाय हैं एक तो है कि अहंकार के सामने ही प्रति अहंकार अर्थात कि ये दीन हीन भाव को खड़ा करना और यह फिर यह दोनों पॉजिटिव नेगेटिव एक दूसरे को काट देंगे बैलेंस को जीरो बना देंगे यह एक भाव है दूसरा है कि अहंकार को प्रति परिशुद्ध करना इस तरह क्योंकि अहंकार का जो यह है कहां से उद्भव होता है तो वो उद्भव है कामिनी और कांचन के प्रति अपनी जो वासना है उसमें से तो यदि मन को जोर देकर के यह अपने मन का जो वासनाओं के प्रति भौतिक सुख और विलास के प्रति आकर्षण है उसको यदि हम काटना शुरू कर दें तो उसको काटने के साथ-साथ में अहंकार भी चला जाएगा किंतु यहां पर आपको विल पावर डेवलप करना होगा जब तक अपने में विल पावर नहीं है तब तक यह वासना या कामनाओं का जो आक्रमण है उसके सामने हम लड़ नहीं पाएंगे उसके सामने हम टिक नहीं पाएंगे इतना स्ट्रांग विल पावर होना चाहिए जैसे कि बहुत सारे कोई कोई वर्णन है ठाकुर का कि ठाकुर मां जगन माता के साथ में मां जगन माता तो नहीं जैसे कि वासना रूपी कोई किसी के साथ में पाप पुरुष के साथ में वो झगड़ा कर रहे हैं कि तुम क्या मुझे अभी यह प्रलोभन दिखाने के लिए आए हो वगैरा तो ठाकुर ऐसा जोर से झगड़ा करते थे ऐसा जोर से हम गुस्सा करके क्रोध से कहते थे कि यह जो पाप उनके मन के ऊपर में जद अपना यह जो प्रभाव फैलाने के लिए भी आएगा तो ठाकुर उसको भगा दें तो दो तरीके है अपने को अहंकार के सामने प्रति अहंकार खड़ा करना अर्थात कि बीन हीन भाव को जन्म देना जो कि अहंकार को अहंकार और प्रति अहंकार यह दोनों एक दूसरे को काट के बैलेंस जीरो बना दे और दूसरा कि प्रचंड विल पावर खड़ा करना जो कि वासनाओं जैसे ही मन के सामने आकर के खड़ी हो वासनाओं को काटते तो यह जो दोनों भाव है इस दोनों भाव को गिरीश घोष ने बड़े ही सुंदर रूप से एक वाक्य में वर्णन किया है गिरीश भोश क्या कहते हैं महामाया दो लोगों को अपनी जाल में फंसाने के लिए आई एक तो थे नाग महाशय दूसरे हैं स्वामी जी नरेण स्वामी विवेकानंद तो देखिए कि इन दोनों ने महामाया की जाल से बचे किस तरह से नाग महाशय ने अपने को इतना छोटा कर दिया कि जो जाल के ये जो होल होते हैं ना उसमें से वह निकल गए जाल तो कैसी होती है ना जाली वाली होती है फिल्टर की तरह उसमें अपने को इतना छोटा कर दे कि जाल के भीतर में से वो होल में से आप निकल जाए और स्वामी जी ने अपने को इतना बड़ा कर दिया कि महामाया की जाल छोटी पड़ गई उनको बंधन में डालने के लिए तो यह दोनों तरीके हैं और ठाकुर के जीवन में यह दोनों तरीके हमको बहुत ही सुंदर रूप से देखने को मिलते हैं किंतु देखिए कि यह चाहे अहंकार के सामने प्रति अहंकार खड़ा करना हो कि फिर ये अहंकार को काटने के लिए विल पावर डेवलप करना हो अहंकार को काटने के लिए नहीं मेनली यह कामना वासनाओं को काटने के लिए तो यह दोनों रास्ते हैं एक जो सबसे इंपॉर्टेंट चीज ठाकुर के जीवन में हमको देखने को मिलती है यह दोनों रास्ते म्यूचुअल एक्सक्लूसिव नहीं है वरना तो यह ज्ञान और भक्ति या तो फिर भक्ति य ज्ञान और कर्म यह जो द्वंद चलता आ रहा है भारतीय परंपरा में एक के सामने दूसरी फिलोसोफी एक के सामने दूसरा दर्शन शास्त्र यह कहेगा कि मैं सही हूं दूसरा कहेगा कि मैं फिर यह खंडन मंडन होता रहेगा आर्गुमेंट चलती रहेगी जो हार जाएगा उसका मस्तक मुंडन करके फिर उसको फिर य जिसको कि अपमानित किया जाता है यह सब अपने भारत में बहुत देर तक चला था बहुत समय तक चला था किंतु अभी यह जो समन्वय है समन्वय वैसे तो गीता में ही प्रारंभ हो गया था किंतु यह गीता का जो समन्वय है उसके बाद में बहुत सारे लोग गीता को भी भूल गए श्रीमद् भगवत गीता को और श्री राम कृष्ण देव को फिर से इस युग में जन्म लेकर के उसी समन्वय वाद का फिर से प्रचार करना पड़ा और इस बार का जो समन्वय वाद है वह सिर्फ यह नहीं है कि आपको भारतीय जितनी साधन पद्धति है उनके भीतर में समन्वय किंतु विश्व की जितनी साधन पद्धतियां है क्रिश्चियनिटी है इस्लाम है उनका भी समन्वय एक ही सूत्र में आप कर सकते हैं और वह सूत्र है कि आधर अहंकार का त्याग और दूसरा है उसी का जो एक कोइन जो होता है सिक्का उसकी जो दो साइड्स होती है तो एक साइड पर देखेंगे कि अहंकार त्याग लिखा है दूसरे साइड लिखा है वासना कामनाओं का त्याग तो यह दोनों का त्याग और दोनों के जो सेंट्रल थीम है वह है त्याग तो त्याग के माध्यम से ही आप यह जो जितने भी साधन प्रणालियां है जितने धर्म है जितने योग है जितने दर्शन शास्त्र है जितने संत के जीवन है उस सभी को आप एक ही मानदंड से उनको मेजर कर सकते हैं उनको समझ सकते हैं उनको अंडरस्टैंड कर सकते हैं तो यहां पर ठाकुर यह कहते हैं केवल पाप आर नरक य सब कथा केनो सिर्फ यह पाप और नरक यह सब बातें क्यों भगवान नाम करले मानुष देहो मोन शोब शुद्ध होए जाए भगवान का नाम करने से मनुष्य का देह मन सब शुद्ध हो जाएगा एक बार बोलो जे अन्याय कर्म जा करे छी आर कर्मो ना एक बार ढ विश्वास से कह दो कि जो मैंने अन्याय काम किया था जो मैंने कुकर्म किया था वह मैं फिर से अभी नहीं करूंगा आर तार नाम विश्वास करो और उनके नाम पर विश्वास कीजिए ठाकुर प्रेम उन्मत होया नाम महात्म गाते छ ठाकुर प्रेम उन्मत होकर के नाम महात्म गा रहे हैं अमी दुर्गा दुर्गा बोले मा जनी मुरी आखिर बने ना तारो के मुने जाना जावे गो शंकरी मैं जद दुर्गा का नाम लेकर के जद मैं मरू दुर्गा दुर्गा बोल कर के मरू तो फिर इस दिन को किस तरह से तुम नहीं तारती हो भवसागर यह मैं देख लूंगा शंकरी देखिए यहां पर जैसे हमने कहा ना कि एक ही पैराग्राफ में या एक ही पैसेज में ठाकुर अजात वाद का भी परिचय देंगे और यह उत्तम भक्ति का भी तो यहां पर ऊपर में कह रहे हैं मैं पापी मैं यह हूं अज्ञानी ऐसा बोलते बोलते ही पाप लग जाएगा मैं ज्ञानी हूं या तो फिर मैं शुद्ध हूं पवित्र हूं जोर से बोलो तो शुद्ध पवित्र हो जाओगे एक पैराग्राफ में वो बात करते हैं सेकंड पैराग्राफ में ही देखिए क्या बोलते हैं आरे ने ना तारो केमने इस दन को इस हीन को कैसे नहीं तारो गी शंकरी वह देख लूंगा मैं ऊपर के पैराग्राफ और नीचे के पैराग्राफ में क्या मतलब आप कंट्रास्ट करते हैं एक ही सेंटेंस में कंट्रास्ट हो जाता है पहले तो कहते है कि इस दिन को कैसे नहीं तारो गी वो मैं देख लूंगा दूसरे ही सेंटेंस में धमकी भी दे देते हैं वो शंकरी को जगदंबा को जगन माता को कैसे नहीं तारो गी देख लूंगा क्यों क्यों ऐसा तरह से धमकी देकर के बात बा करते हैं बात कर सकते हैं क्योंकि जगन माता तो अपनी माता है बच्चा जद मां के ऊपर में अधिकार नहीं वो प्रदर्शित करेगा बच्चा जद मां के सामने नाराज होकर के बात नहीं करेगा तो वह किसके साथ इस तरह से बात करेगा तो एक ही सेंटेंस में एक ही पदावली के एक ही पद में देखिए कि दोनों भाव किस तरह से मैच हो जा रहे हैं कंट्रास्ट भी है और हारमनी भी है आखिर ई दीने ना तारो केमने इस दिन को कैसे भवसागर नहीं पार कराओ गी कैसे नहीं तारो गी जाना जावे वो शंकरी देख लूंगा मैं तुमको शंकरी यह है अपने ठाकुर आमी मार का से केवल भक्ति च छला मैं मां के पास में सिर्फ मैंने मां के पास में सिर्फ तीन मावे के फूल हाथे कोरे मार पाद पद दे दिए लाम बोले लाम फूल दोनों मैंने अपने हाथों से लेकर के मां के श्री चरण में पाद पद में अर्पित किए थे और कहा था मां नाव तुम्हार पाप नाव तुम्हार पुण्य मां ये लो तुम्हारा पाप ये लो तुम्हारा पुण्य अय शुद्ध भक्ति दाओ मुझे शुद्ध भक्ति दो नाव तुम्हार ज्ञान नाव तुम्हार अज्ञान अमाए शुद्ध भक्ति दाओ यह लो तुम्हारा ज्ञान यह लो तुम्हारा अज्ञान मुझे शुद्ध भक्ति दो नाव तुम्हार शची नाव तुम्हार अशु आ शुद्ध भक्ति दाओ ये लो तुम्हारी सूची ये लो तुम्हारी असच मुझे शुद्ध भक्ति दो नाव तुम्हार धर्म नाव तुम्हार अधर्म ए नाव तुम्हार अधर्म अवाय शुद्ध भक्ति दाव ये लो तुम्हारा धर्म ये लो तुम्हारा अधर्म मुझे शुद्ध भक्ति दो तो देखिए यहां पर जितने भी जो ठाकुर ने अर्पण किया पाप और पुण्य दोनों अर्पण कर दिया इस शुद्ध भक्ति सामने मांगी क्यों क्योंकि अभी कैलकुलेशन करके पाप और पुण्य नहीं करना है वह काशीपुर की घटना कि उनके लिए एक बागान में से फल लाए जा रहे थे बागान मालिक के साथ में ऑलरेडी प्री अरेंजमेंट हो गया था डिस्कशन हो गया था प्रतिदिन फल आते थे ठाकुर खाते थे एक दिन नहीं खा पाए क्यों नहीं खा पाए इन्वेस्टिगेशन करके पता चला कि उसके अगले दिन बागान जो है बगीचा और किसी को विक्रय हो गया है सेल कर दिया गया है अर्थात कि अभी बगीचे का जो नया मालिक है उसके साथ में तो ऐसा कुछ डिस्कशन हुआ नहीं अर्थात कि फल तोले गए वो चोरी के तुले गए चोरी के फल ठाकुर को खिलाने का प्रयास किया गया अी ठाकुर पता नहीं है कुछ भी किंतु फिर भी उसको खा नहीं पा रहे क्यों ठाकुर धर्म और अधर्म से ऊपर हो गए हैं आज हमको 10 बार सोचना होगा कि मैं जो कार्य कर रहा हूं मैं जो कर्म कर रहा हूं मैं जो बात कर रहा हूं मैं जो सोच रहा हूं वह क्या धर्म के दायरे में आएगा कि अधर्म के ठाकुर की मां के ऊपर में इतनी संपूर्ण रूप से शरणागति थी कि अभी यह कैलकुलेशन ठाकुर को नहीं करना है कि धर्म में हूं कि अधर्म में मां वैसे ही अपने से उनका हाथ पकड़ कर के उनको धर्म के रास्ते पर ले जाएगी ए नाव तुम्हार ज्ञान नाव तुम्हारा ज्ञान ये लो तुम्हारा ज्ञान ये लो तुम्हारा अज्ञान शुद्ध भक्ति दो ज्ञान और अज्ञान के परे हैं ये केशव सेन है ना कि यह बंकिम है ना कि यह विद्यासागर देवेंद्रनाथ टैगोर ऐसे सब महा जिलों का एक बड़ी प्रतिष्ठा है कलकाता के समाज में ऐसे लोगों को ठाकुर मिलने के लिए जाते हैं और किंतु फिर जैसे कि इक्वल के साथ एज इक्वल उनके साथ में बात करते हैं ऐसा नहीं कि एक अनपढ ताली के पुजारी है और यह लोग सब धनी प्रतिष्ठित व्यक्ति है ये रानी रास मणी को गाल प चाटा मार दिया ये देवेंद्रनाथ पेगर को मिलने को गए थे कहा कि निकालो तुम्हारा यह कुर्ता देखता हूं तो देवेंद्रनाथ ने उनकी बात सुन कर के कुर्ता निकाला और देखा कि उनका जो सीना है बड़ा ही मने व गोरे हैं और उसके ऊपर में यह केसर चंदन वगैरह उसके वोह जो ये छींटे उसके ऊपर में लगाए गए माने क्या है धनी व्यक्ति है अपने को धर्म धार्मिक समझता है तो धर्म का दिखावा भी करता है तो ठाकुर कहते हैं कुछ समय के बाद में अचानक मेरी वह अवस्था हुई भीतर में से हसी जैसे कि प्रकट हुई जो पंडित के भीतर में वैराग्य नहीं है वो पंडित खड़क बोध होए अर्थात कि वो पंडित बिल्कुल निम्न तरह का नीच तरह का वो उनको सम उनको दिखता है तो ये जो राजा एक राजा को मिलने के लिए गए तो ठाकुर एक भक्त के घर गए थे वहां का एक लोकल अभी राजा अर्थात क्या भारत में राजा अर्थात की उन्होंने तो आत्म सम्मान सब गवा दिया था ब्रिटिश लोगों की वो चापलूसी करते थे और ब्रिटिश लोग भी इनको खुश रखने के लिए डिवाइड एंड रूल वाला सिस्टम अपनाया था इन लोगों किसी को राजा का खिताब दिया था किसी को रानी का और यह राजा रानी दो नंबर के सभी अपने को बड़ा ही मने गुमान में आकर के घूमते थे ब्रिटिश के सामने सर उठा कर के देखने की ताकत नहीं है और अपने को राजा कहलाते थे आम प्रजा को तो फिर आखिर में यह मूवमेंट चलाना पड़ा फ्रीडम मूवमेंट तब कहीं जाकर के हमको फ्रीडम मूवमेंट मिला है और ठाकुर अभी ठाकुर को देखिए कि इस तरह से हिस्ट्री नहीं पता जिस तरह से हम जैसे लोगों को किताब पढ़ कर के पढ़ने को मिलता है या किताब पढ़ कर के समझते हैं जैसे मास्टर महाशय अच्छा पहले यह प्रसंग किंतु पूरा कर दो ये ठाकुर इस राजा को कहते हैं कि तुमा के राजा टाा बोलते पना केनो सेटा मिथ्या शटा मिथ्या कथा हो है मैं तुमको राजा टाा नहीं बोल पाऊंगा क्यों क्योंकि मैं जद तुमको राजा कहूंगा वो गलत बात होगी क्योंकि वो किसी राजा का एक भी लक्षण उस आदमी के भीतर में नहीं है तो देखिए कि मास्टर महाशय का भी अभी ठाकुर को तो यह सब चीजें किताब पढ़ कर के समझने की जरूरत नहीं है न्यूज़पेपर पढ़ के किताब पढ़ के भीतर में से ही यह ज्ञान आ जाता है मास्टर महाशय जब पहली बार ठाकुर को मिलने के लिए गए दरवाजा बंद था वो वृंदा बोल कर के वो काम वाली बाई वहां पर बाहर में खड़ी थी तो मास्टर ने उनको पूछा क्या वो तो बहुत पढ़ाई लिखाई करते होंगे ना इतनी सुंदर बातें करते हैं तो वृंदा ने क्या उत्तर दिया अरे वो सब और मुखिया है अर्थात कि सब उनकी खवा पे सरस्वती जैसे स्वयं विराजमान है वह सरस्वती जैता कहती है वैसा वह कहते हैं तो मास्टर महाशय बाद में लिखते भी है कि ठाकुर को हम जैसे दुर्बल मनुष्यों की तरह किताब पढ़ कर के ज्ञान अर्जन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती उनको जगन माता ही सब कुछ सिखा देती है बता देती है तो हम जैसे दुर्बल लोग किताब पढ़ के हिस्ट्री पढ़ेंगे किताब पढ़कर के दर्शन शास्त्र पढ़ेंगे किंतु मां को ठाकुर को मां स्वयं सब कुछ दिखा देगी इसीलिए ठाकुर ने कहा यह लो तुम्हारा ज्ञान ये लो तुम्हारा अज्ञान मुझे शुद्ध भक्ति दो ना तुमार सूचना तुम्हार असच ये तुम्हारी सूची लो असू च लो सूची असू च का क्या अर्थ है एक तरह की एक क्या कहेंगे कि पवित्रता सूची अर्थात शारीरिक पवित्रता अर्थात की वो जो हाथ धोना स्नान करना ये मने इसमें फिर ये नाथ और जात का भी बहुत कुछ आ जाता है अभी ब्राह्मण है तो अब ब्राह्मण के जो स्पर्श किया हुआ खाना वह नहीं खाएगा और फिर मना वो सब जो उस समय चलता था आचार्य जिसको कहते हैं इसने स्पर्श कर लिया इसने यह कर लिया इसकी नजर उसके ऊपर में आ गई तो यह सब चीजों से ठाकुर मुक्त होना चाहिए ठाकुर बड़ा ही सुंदर उदाहरण देते हैं जैसे छोटा बच्चा होता है ना उसको यह सूची असू च का ज्ञान नहीं होता वह क्या करता है शौच जाने के बाद में अर्थात कि टॉयलेट जाने के बाद में वो जितने भी लोग होते हैं ना उनको वो उल्टा करके दिखा करके कहता है देखो तो मैंने ठीक से धोया है कि नहीं क्योंकि क्या है छोटे बच्चे को यह सब सूची असू च लज्जा शर्म लज्जा घृणा भय यह सब नहीं होता है तो परमहंस जैसी उसकी अवस्था होती है तो किंतु देखिए यहां पर उसका काउंटर पॉइंट भी है ठाकुर खुद यह सब चीजों में अभी मां की जीवनी तो हमने पढ़ी ही है वो एक महिला जिसका मित्र अच्छा नहीं था खाने का थाली लेकर ठाकुर के पास गई ठाकुर मां के ऊपर में नाराज हो गए कहा कि तुमने उसको यह थाली उसके हाथ में क्यों दी पता नहीं उसका चरित्र कैसा है तो मां ने हाथ जोड़ करर के कहा ठाकुर जो मां बोल कर के आ कर के मेरे सामने खड़ा रहेगा मैं तब रह नहीं पाऊंगी उसकी इच्छा पूर्ण करूंगी तो ऑन वन हैंड प्रश्न हो सकता है कि इस तरह का पैराडॉक्स क्यों एक और ठाकुर कहते हैं मां जगदंबा को यह लो तुम्हारी शची ये लो तुम्हारी असच दूस दूसरा ही खाने के मामले में ये स्पर्श के मामले में ठाकुर बड़े ही चौक चौकन थे बड़े ही सावधान थे वह पानी हाटी की वह घटना हमने देखी एक ढोंगी बाबा जी ने उनके मुंह पर ठाकुर जब भावा अवस्था में थे उनके मुंह में प्रसाद डाल दिया और फिर ठाकुर एकदम भाव भंग हो कर के थू थू करके सब फेंक दिया जैसे कि बड़े ही अशुद्ध व्यक्ति ने बड़ी ही अशुद्ध चीज उनके मुंह में डाल दी हो इस तरह से तो दोनों है ठाकुर के जीवन में सूची और अशु च के परे भी गए हैं सामने किसके स्पर्श किया हुआ खाना ठाकुर खाएंगे कि कौन उसको स्पर्श करेगा ठाकुर को यह भी एक भगवती दासी बोलकर के एक भी एजेक्ट वही नाम है शायद तो वह एक बार ठाकुर को ठाकुर का दर्शन करने के लिए आई तो अभी क्या है कि वह कालीबाड़ी में वह तो काम कर रही थी और कुछ उसका चरित्र भी इतना कोई अच्छा नहीं था और यह झूठ बोलना यह सब करके उस ने पैसा भी काफी इकट्ठा किया था चमचागिरी करके हो कि जो भी हो तो वह एक बार ठाकुर का दर्शन करने के लिए आई ठाकुर पूछ रहे हैं कि अच्छा बताओ तुमने क्या किया पैसों के साथ में तो उसने कहा कि मैं अपने मुंह से कैसे बोलूं फिर जब ठाकुर ने जब आग्रह किया तो कहा कि वृंदावन में एक घाट बना दिया है उसके ऊपर में मैंने मेरा नाम लिखा है तो ठाकुर बोलते हैं अच्छा अच्छा बहुत अच्छा तो अभी ठाकुर इतना सहृदय साथ उसके साथ बात कर रहे हैं तो उसके मन में थोड़ा सा साहस आया और उसने ठाकुर के चरण को स्पर्श करके प्रणाम कर लिया तो वैसे ही ठाकुर को जैसे कि मछी ने काट लिया हो जैसे इलेक्ट्रिक शॉक लगा हो वैसे ही वो उछल कर के खड़े हो गए और वहां पर गंगाजल का एक पात्र था गड़ा था उसमें से बार-बार गंगाजल अपने पैरों पर डाल रहे हैं यहां पर वोह दासी बेचारी जीवन मृता होया बोशिया छ कथामृत में वर्णन है जीवन मृता अर्थात की जब अपना बड़ा ही भयानक अपमान होता है तो हम जैसे जिंदा भी है और मर भी रहे हैं भीतर से इस तरह से जीवन मृता ओया यह दासी बेचारी वहां पर बैठी है उसको लगा कि मैंने इतना तो कौन सा पाप कर दिया ठाकुर को स्पर्श करके कि उनको इस तरह से गंगाजल से अपने पेर धोने पड़ रहा है तो जो भी है ठाकुर फिर वहां पर फिर वापस आके बैठे दासी के सामने और फिर उनको लगा समझ गए कि उसको मन में बड़ा ही दुख पहुंचा है ठेस पहुंची है तो ठाकुर ने फिर कहा पहले तो ऐसा कहा कि तुम लोग दूर से ही प्रणाम करो पैर को स्पर्श करने की जरूरत नहीं है फिर दासी का मन भुलाने के लिए एक के बाद एक भजन गाना शुरू किया और ठाकुर का भजन वो भजनानंद ठाकुर जब उसके ठाकुर के चारों ओर बेता था तो कोई भी व्यक्ति है वह अपना दुख है मन को जो ठेस पहुंची वह सब भूल जाएगा तो ये दासी भी हो सकता है हम अनुमान कर लेते हैं कि यह सब भूल गई होगी किंतु यहां पर जब ठाकुर यह कहते हैं कि यह लो तुम्हारी सूची और ये लो तुम्हारी असू च इस बात के साथ में इस बात का किस तरह से तात्पर्य होगा कि किस के हाथ का छुआ खाना खाना कोई कौन आकर के उनको स्पर्श करके प्रणाम करता है वगैरह तो अभी इसके बारे में मेरा जो एक एनालिसिस है वह ऐसा है कि ठाकुर को अशुद्ध व्यक्ति स्पर्श करते थे या तो कामना करके किसी तरह की मन्नत मान करके ठाकुर को कोई चीज देते थे और ठाकुर यदि उनको ग्रहण करते थे तो फिर उनका पाप जो है ठाकुर के अापद शुद्ध पवित्र देह में प्रवेश हो जाता था था कि मैंने जैसे ऐसी कोई कामना करके ठाकुर को कुछ खाना दिया कि अच्छा मेरे घर में यह दुख है वो दूर हो जाए इसके लिए मैं ठाकुर को यह खिला रहा हूं यदि ठाकुर उसको खाएंगे तो वो सही सही दुख दूर हो जाएगा किंतु ठाकुर पर क्या असर होगा बेचारे को आखिर उस उस समय तो दर्द होगा ही कष्ट होगा ही किंतु आखिर में समस्त जो समष्टि का पाप ग्रहण करके बेचारे को कैंसर हो गया था तो वह अपने देह पर दूसरों के पाप जो है उनका वह जो भोग ठाकुर के देह पर जाकर के होगा अभी ऐसा भी नहीं है कि ठाकुर यह नहीं चाहते थे कि दूसरों के पाप वो ले ले किंतु बात ऐसी थी कि जब तक उनके अंतरंग डिसाइल यह जो मोनिस्टिक डिसाइल आकर के उनके सा साथ में मिलित ना हो और उनका जब तक चरित्र गठन ना हो तब तक तो ठाकुर को अपने स्वास्थ्य को बचा करके रखना था एक बार जैसे कि सभी डायरेक्ट डिसाइल का आगमन संपूर्ण हो गया ठाकुर ने कहा पूर्ण के बारे में कि इसके आने से ही यह जो त्यागी संतानों के आने की यह जो धारा है वह यहीं पर समाप्त हुई तो अभी उसके बाद में वही ठाकुर ने अभी सोचा कि ठीक है चलो अभी सभी के पाप ग्रहण करके लोगों को मुक्ति दे देते हैं तो वो जो है सूची असू च व सब सही सही में ठाकुर ने किस दिन छोड़ दिया तो व पहली जनवरी को कल्पतरु दीन को जो भी सामने आया सबको स्पर्श करके ठाकुर ने कहा चैतन्य हो अरे वहां एक वो रसोइया था रसोई बनाने वाला तो राम बाबू उसको कहां-कहां से खोज करके उसको लाकर के ठाकुर के सामने फेंका कि जाओ उनको तुम प्रार्थना करो उनसे तो उसको भी ठाकुर ने स्पर्श करके चैतन्य करवा दिया यानी कि उस दिन से ठाकुर ने सोचना बंद कर दिया कि अभी मैं किसको स्पर्श करता हूं किसको नहीं करता हूं कुछ-कुछ चीजें है कि ठाकुर के जीवन में आखिरी तक थी अभी जैसे कि अद्वैतानंद जी महाराज ने उन्होंने एक बात कही है हमको कि व ठाकुर का खाने का थाला लेकर के ठाकुर के सामने रखा और उनकी निश्वास जो है वो थाल पर गिर गया तो फिर ठाकुर ने कहा इसको रहने दो अभी मैं नहीं खाऊंगा तो ऐसा नहीं है कि अभी यह सब बातों का क्या तात्पर्य है किस तरह से ठाकुर के ठाकुर किस लॉजिक प यह सब करते थे वो तो अभी कहना बड़ा ही मुश्किल है किंतु हमको कल्पतरु वाले दिन की घटना को पकड़ करके रखना है कि उस दिन ठाकुर ने सबको स्पर्श करके चैतन्य को कि आशीर्वाद दिया था यानी कि ये लो तुम्हार असू च ये लो तुम्हार सूची अवाई शुद्ध भक्ति दाव ए नाव तुम्हार धर्म ए नाव तुम्हार अधर्म ये लो तुम्हारा धर्म यह लो तुम्हारा अधर्म मुझे शुद्ध भक्ति दो ठाकुर को कभी भी यह सोच करके ऐसा प्लान करके कि मैं क्या कर रहा हूं किस वो धर्म है या अधर्म है वह सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी दो चीजें एक तो जगन माता खुद उनका दौरी संचार करती थी वोह ठाकुर क्या करेंगे क्या कहेंगे वगैरह दूसरा कि ठाकुर को चरित्र पहचानने की बड़ी ही अद्भुत कैपेसिटी ठाकुर में थी एक बार कैलिफोर्निया में वह सेकंड टाइम जब स्वामी जी अमेरिका गए थे उस टाइम स्वामी जी ने कहा था कि देखो मैंने जिसके ऊपर में जिन लोगों के ऊपर में विश्वास किया उनमें से बहुत सारे लोगों ने मुझे धोखा दे दिया है उस समय यह टी स्टर्डी और फिर यह मिस मुलर फिर यह कृपानंद अर्थात की लियोन लैंडसबर्ग ऐसे तीन चार लोगों ने स्वामी जी का स्वामी जी के बड़े शिष्य थे फिर उसमें से उतने ही बड़े क्रिटिक भी हो गए उतने बड़े निंदक भी हो गए स्वामी जी के तो स्वामी जी इस उपलक्ष में कह रहे हैं कि बहुत सारे लोगों पर मैंने विश्वास किया किंतु इन्होंने मुझे धोखा दिया किंतु वो बुढ़ा की ठाकुर मने ठाकुर जिनका चरित्र के बारे में जो आकलन करेंगे वह 100% सही होगा अर्थात कि अब जिसके चरित्र के बारे में जब बात आती है तो ठाकुर ने उन लोगों के बारे में जो कहा है वो मैं आंख बंद करके स्वीकार कर लेता हूं और इसीलिए शुरू शुरू में जब रामकृष्ण मिशन एसोसिएशन की स्थापना हुई और उनके जो गवर्निंग बॉडी या ट्रस्टी उनमें से मिसेस ओली बुल भी एक थी किंतु जब ये फाइनलाइज हुआ था लिस्ट उसमें सिर्फ ठाकुर के त्यागी संतान ही उसमें थे स्वामी जी के गुरु भाई ही थे स्वामी जी ने अपने एक भी शिष्य को इनिशियल ट्रस्टी बॉडी में सदस्य नहीं बनाया था क्यों अभी बहुत सारे स्वामी जी के गुरु भाई उन्होंने स्वामी जी की निंदा भी इतनी ही की थी ये बाबूराम महाराज है या वैसे कि नरेंद्र जो वहां पर विदेश में जाकर के कर रहा है वह क्या सही श्री रामकृष्ण देव की उपदेशों के अनुसार है कि नहीं क्या वह अपना कुछ नया चालू कर रहा है ऐसा संदेह स्वामी जी के गुरु भाइयों में था किसी-किसी के मन में इसके बावजूद और स्वामी जी के जो कुछ-कुछ शिष्य थे मिसेस लीबु या फिर ये आला सिंगा या गुप्त महाराज ये लोग स्वामी जी को 100% डेडिकेटेड थे इसके बावजूद स्वामी जी को पता था कि उन्होंने इन लोगों का जो चरित्र आकलन किया है इससे कहीं बेटर ठाकुर ने उनके शिष्यों के चरित्र का आकलन किया है और इसीलिए फाइनल ट्रस्टी बॉडी जो गठित हुई उसमें से स्वामी जी के गुरु भाई ही उसमें थे स्वामी जी का खुद का एक भी डिसाइल उसमें नहीं था तो यह धर्म ये अधर्म सब कुछ ईश्वर को देकर के शुद्ध भक्ति ठाकुर ने मांग ली ब्रह्म भक्त देर प्रथी आगे ठाकुर ब्राह्मण भक्तों को कहते हैं एकटी राम प्रसाद गान सोनो एक राम प्रसाद का गान सुनो आय मन बेड़ा ते जाब काली कल्पतरु मुले रे चारी फल कुड़ाए पावी अरे मन चलो हम घूमने को टहलने को जाते हैं काली रूपी ये जो कल्पतरु है वहां पर और वहां पर जो चार फल पड़े हुए हैं उसको खाते हैं प्रवृत्ति निवृत्ति जाया निवृत्ति रे संगे लवी प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों पत्नियां है उसमें से निवृत्ति को साथ में रख ओके रे विवेक नाम तार बेटा तत्व कथा ताय शुदा भी तुम्हारा विवेक नाम का जो पुत्र है उसको तत्व कथा सुना भी देखिए यहां पर ठाकुर खुद कहते हैं विवेक नाम का उनका पुत्र यानी कि स्वामी जी का विवेकानंद नाम जैसे कि ठाकुर ने पहले से ही ठीक करके रखा है व कोई कहे कहते थे ना कि किसने स्वामी जी को यह विवेकानंद नाम दिया वो खेतड़ी के राजा ने दिया ना कि स्वामी जी ने अपने से लेख किया था वो जो वराह नगर मठ में विरजा होम करके सर्वप्रथम जब स्वामी जी सबको नाम दे रहे थे उस समय उनके मन की एक इच्छा थी कि वह खुद अपने लिए राम कृष्णानंद नाम रख किंतु उन्होंने फिर चिंतन करके देखा कि नहीं शशि की जो शशि महाराज की ठाकुर के ऊपर में जो भक्ति थी जो प्रचंड निष्ठा थी उसकी वजह से राम कृष्णानंद नाम तो उन्हीं के लिए ज्यादा उचित लग रहा है तो स्वामी जी ने ने बाकी सब गुरु भाइयों को सुंदर नाम दिए ब्रह्मानंद अद्वैतानंद निरंजनानंद अखंडानंद अभेदानंद सब वेदांती नाम है फिर शारदानंद राम कृष्णानंद ये जो अपने इष्ट है व नाम इन दोनों भाइयों को दे दिए वो दोनों कजीन थे शशि महाराज और शरद महाराज तो एक है शारदानंद एक है राम कृष्णानंद य स्वामी जी भी जैसे कि अपने मन में यह सब सोच करके करते हैं किंतु खुद का नाम क्या रखा विवि दिशा नंद विवि दिशा अ अ की वो जो अभी प्रवर्तक है वह साधक है सिद्ध नहीं है वह संन्यास मार्ग में अभी भी वह सीख रहा है स्टूडेंट है उसको कहते उस दो तरह के संन्यास होते हैं एक है विविध दिशा संन्यास एक है विद्वत संन्यास विद्वत संन्यास अर्थात की संन्यास के आदर्श में पूर्ण होने के बाद में सिद्धि प्राप्त कर लेने के बाद में जो संन्यास लिया जाता है वह विद्वत संन्यास और संन्यास का आदर्श पूर्ण करने के लिए साधना करने के लिए जब आप सन्यास लेंगे उसको कह विवि दिशा सन्यास तो स्वामी जी ने अपना सर्वप्रथम नाम सिलेक्ट किया था विवि दिशा नंद और फिर वोह फिर वोह पूरा कंट्रोवर्सी डिबेट चलता है कि स्वामी जी ने सबसे पहले विवेकानंद नाम कहां पर इस्तेमाल किया था किसने दिया था तो फिर कहा जाता है कि खेतड़ी के जो राजा थे अजीत सिंह उन्होंने कहा स्वामी जी को कि स्वामी जी आपके लिए विवि दिशा नंद नाम उचित नहीं लग रहा है आप तो कोई अभी साधक नहीं आप सिद्ध हो चुके हैं आप नया नाम लीजिए विवेकानंद नाम लीजिए तो भी प्रश्न होगा कि कि एक राजा का दिया हुआ नाम स्वामी जी लेंगे कि नहीं या तो फिर स्वामी जी ने अपने से ही विवेकानंद नाम दिया था वी डू नॉट नो किंतु यहां पर देखिए ठाकुर ने खुद ने इस पूरे कंट्रोवर्सी का ऐसे उत्तर दे दिया है विवेक नाम तार बेटा ततो कथा ताय शुदा भी विवेक नाम का जिसका पुत्र है उसको फिर तत्व कथा सुनानी है तो यहां पर ठाकुर ने ही जैसे कि एक तरह से इंगित कर दिया था कि उनका जो पुत्र मानस पुत्र वो असली पुत्र तो नहीं मानस पुत्र उनका नाम विवेक होगा या तो फिर विवेक उनका बहुत बड़ा गुण होगा अभी यह कहानी य गीत जो है बड़ा लंबा चलता है उसको हम स्किप कर देते हैं और सीधा यहां पर अभी ठाकुर आगे क्या कहते हैं वहां तक चले जाते हैं संसारे ईश्वर लाभ होबे ना केन संसार में ईश्वर लाभ होगा क्यों नहीं जनकर होए लो राजा जनक का हुआ था य संसार धोक टाटी प्रसाद बोले छीलो यह संसार जो है यहां पर धो का खेला है यहां पर सब समय बिट्रेड बाजी चलती रहती है किंतु तार पादो पद्य भक्ति लाभ को ले परंतु श्री राम मां शारदा या तो फिर यह जगन माता के पाद पद्म में भक्ति लाभ करके य संसारे मजार कुटी अम खाई दई मजा लूटी यही संसार हो जाएगी मजे की कुटिया आनंद का बाजार और मैं खाऊंगा पिऊंगा और मजा लूटू जनक राजा महा तेजा तार छलो कि शर त्रुटी जनक राजा थे महाते महा तेजी महा प्रचंड शौर्य वान उनको किस बात की त्रुटि थी सेजे दद उदिक दुदक रेखे हे छलो धर बाटी उन्होंने यहां पर भी रखा था वहां पर भी रखा था अर्थात की राज्य भी करते थे राजा भी थे साथ में उच्च कक्षा के साधन भी थे सिद्धि भी प्राप्त की थी आर खे छलो दुध बा दोनों और अपना बना करके रख के उन्होंने दूध की बाटी पी थी तो ठाकुर ने जब यह कहा सभी का हास्य श कोलेर हस अच्छा तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं अच्छा ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्ण परण मस्तु यह जो आप प्रसन्न कह रहे हैं ना

स्वामीजी अपने प्रति इतने लापरवाह थे!

अमेरिका में एक दिन क्या हुआ किसी के घर में डिवटी के घर स्वामी जी रुके हुए थे तो अभी वहां पे फुल साइज मिरर था जनरली इंडियन मिरर तो छोटे-छोटे होते हैं अभी वो अमेरिका में वो फुल साइज मिरर तो आप पहली बार अपने को देख रहा है तो स्वामी जी बार-बार मिरर के सामने देख र है तो वो जो लेडी होस्टेस थी तो उसने सोचा कि नाउ द शू इज गोइंग टू ड्रॉप अर्थात कि अभी वो उनके भीतर की वो एक होती है ना वो मने सेल्फ ग्लोरिफिकेशन कि मैं कितना सुंदर दिखता हूं तो यह अभी अभी वो निकलेगा स्वामी जी के भीतर में से कि हां मैं इतना सुंदर दिखता हूं तो वो सोच रही है कि स्वामी जी अभी ऐसा कुछ बोलेंगे मैं कितना हैंडसम हूं वगैरह कुछ तो कुछ समय के बाद में स्वामी जी क्या कहते पता है इट इज वेरी स्ट्रेंज आई कैन नॉट रिमेंबर हाउ आई लुक लाइक मैं कैसा दिखता हूं मुझे याद नहीं आरहा याद ही नहीं रहता मैं जितनी बार आईने में देखता हूं लगता है मैं पहली बार अपने को देख रहा हूं सो शी राइट स्वामी जी वा सो सो अनवेयर ऑफ हिज ओन अपीयरेंस सो अन माइंडफुल ऑफ हिज ओन अपीयरेंस ए नाव तुम्हार भक्ति य नाओ तुम्हार सूची अ सूची जैसे सब कुछ जैसे कि दे दिया मास्टर महाशय स्वयं जो मास्टर महाशय

ठाकुर में अनेक विरोधाभासी भावों का सामंजस्य है

को अगले दिन कहते हैं मास्टर महाशय को पूछते हैं तुम्हारा शादी हो गया तो मास्टर महाशय हां शादी हो गया तो ठाकुर अरे तुम्हारा शादी हो गया अब दूसरे दिन है बच्चों के साथ में गप लगा रहा है हंसी मजाक कर रहे हैं तो मास्टर महाशय लिखते हैं क्या यही महापुरुष है जिन्होंने मुझे कल फटकार लगाई थी कि तुम्हारी शादी हो गई तुम्हारे बच्चे हो गए और आज छोटे बच्चों के साथ बच्चों की तरह खिलवा दूसरा एक एक्सप्लेनेशन है जैसे अभी स्वामी जी कह 1500 साल मिशन चलेगा मैंने अर्थात यह नहीं कि 1500 साल तक हमारा सेवा कार्य चलेगा 1500 साल तक जितने साधक आएंगे एक एक भाव को लेकर के साधना करेंगे व 1500 साल लगेगा ठाकुर के जितने भाव है सभी की साधना संपूर्ण करने में हमको मैंने लाखों लाखों साधक लाखों लाखों भाव से साधना करेंगे 1500 साल तब कहीं जाकर के ठाकुर का भाव की समस्ती होगी इसका

जब हमें किसी चीज़ पे भरोसा होता हैं, तो हम उसे प्राप्त करने के लिए अपना जी-जान लगा देते है। लोगों को ईश्वर पे भरोसा कैसे कराए जिससे की लोग नियमित साधना करने के लिए तैयार हो.

एक इी फराता है रोल मॉडल देखिए जिस सोसाइटी में जिस तरह के रोल मॉडल होते हैं ना अभी अमेरिका में ये जैसे ये एआई एंटरप्रेन्योर्स है ये वो सेम ओल्ड मैन है ना इलोन मस्क है एवरीवन वांट्स टू बी लाइक देम इंडिया में जैसे सचिन तेंडुलकर है विराट कोहली है वी वांट टू बी लाइक देम सो वी कीप रोल मॉडल इन फ्रंट ऑफ अस फिर वो रोल मॉडल को देख के अपना लाइफ ये बनाते हैं फिर पेरेंट्स भी जदी कहे अरे क्रिकेट क्यों खेलते हो क्रिकेट में क्या है तो उनके साथ में झगड़ लेगा क्रिकेट खेलना नहीं छोड़ेगा वो भीतर में एक है विराट कोहली जैसा बनेगा सो मूवी स्टार है एंटरप्रेन्योर्स है साइंटिस्ट है पॉलिटिशियन है सो वी कीप ए रोल मॉडल बिफोर अस एंड वी जो देखते हैं कि ये देखिए सचिन तेंडुलकर भी है ये सेम ऑल्टमैन भी है व्हाट डू आई वांट टू बी लाइक वी नेवर से कि मेरे बगल में एक आदमी रह रहा है रिक्शा चला रहा है उसके जैसा मुझे होना है ऐसे करोड़ों लोग है किंतु वी ऑलवेज कीप वन और टू दोज आर द टॉप प्लेयर एज अ रोल मॉडल अहेड ऑफ अस सो इंडिया शुड ने जिसको कहते हैं ना कि ये रोल मॉडल को श्री राम कृष्ण मां शारदा स्वामी विवेकानंद वी विल हैव टू प्रमोट देम एस रोल मॉडल्स वायबल रोल मॉडल्स ऐसा नहीं लगना स्वामी जी कहते हैं ना कि ऐसा उद्देश्य कभी नहीं होना चाहिए जो कि कभी भी वो अटन ना हो ठाकुर का मानव भाव हम क्यों एमफसा इज करते हैं ठाकुर अवतार है ईश्वर है बोलने से ही बात खत्म हो गई फिर कौन साधना करेगा और साधना करने से ठाकुर जैसा तो कुछ मिलने वाला नहीं है ठाकुर तो अवतार थे उनकी कंपेयर में कैसे आ सकते हैं आई कैन बी समवन लाइक विराट कोहली बट नॉट पॉसिबल टू बिकम समवन लाइक विवेकानंद और मा शारदा और श्री राम कृष्णा सो हमको उनको एक मानव भाव देकर के ए वायबल रोल मॉडल के रूप में हमको प्रोजेक्ट करना होगा देन पीपल विल वांट टू मॉडिफाई देयर लाइफ अकॉर्डिंग टू देम व एक टेनेबल आइडियल होना चाहिए आइडियल शुड बी टू मने इ शुड बी ग्लोरियस इनफ टू इंस्पायर मी एंड टेनेबल इनफ फॉर मी टू वर्क हार्ड बोथ एस्पेक्ट हैज टू बी देर किंतु व वो नहीं करेगा इट

हम ठाकुर के अन्य सन्यासी शिष्यों को रोल मॉडल के रूप में प्रमोट करना सहज हैं.

विल नेवर इंस्पायर अस टू बिकम समवन लाइक देम हम लोग यहां पर आ गए हैं तो मैं भूतेशानंद जी को बड़ा ही रिस्पेक्ट करता हूं मैं घर में था भूतेशानंद जी का ना ही नाम सुना था ना ही मैं सपने में सोचूंगा कि आई वांट टू बी समवन लाइक भूतेशानंद मैं आया हूं यह सोच कर के स्वामी जी जैसा होंगा और यदि एस्पिरेशन बड़ी है तो राम कृष्ण जैसा होऊंगा ट एस्पिरेशनल फैक्टर व विल हैव टू टेक इनटू अकाउंट ट इ व व विल हैव टू मेक देम ह्यूमन रदर देन गड्स यहां पर आने के बाद में हम इंटरमीडिएट टारगेट्स रख सकते हैं चलो राट महाराज जैसे होते हैं अखंडानंद जी जैसे होते हैं किस तरह का रिलीफ वर्क किया लेट मी डू रिलीफ वर्क भूतेशानंद जी जैसे होते हैं कैसा बैलेंस लाइफ था राजकोट की बहुत सारी उनकी घटनाएं हैं शांति से बैठा बैठा करते थे वहां पे कर्म भी इतना किया साधन भजन भी इतना किया ओशो एक बार वहां पे आया था तो ओशो स्टेज पे वो अपने उपनिषदों के बारे में कुछ उलट पुलट बक रहा था तो अभी एग्जैक्ट डिटेल तो मुझे नहीं पता है किंतु भूतेशानंद जी को भी बुलाया गया था उसी सभा में तो उन्होंने ओशो को ऐसा काटा एक के बाद एक पॉइंट लेकर के ओशो बेचारे को भागना पड़ा वहां से आई हैव ग्रेट रेस्पेक्ट फॉर भूतेशानंद जी किंतु जिस दिन मैंने घर छोड़ा था या तो फिर यह प्रोसेस जब शुरू हुआ था आई वांट समथिंग हायर भूतेशानंद जी कुड नेवर हैव बिकम माय आइडियल सेंटर चलाने के लिए आपको बेशर्म होना पड़ता है ये भास्कर स्वरानंद जी थे नागपुर के प्रथम साधु तो क्या करते थे अभी अभी अकेले हैं किंतु दिखाना है वेल एस्टेब्लिश इंस्टिट्यूशन राइट तो साइकल लेकर घूमते थे अनाउंस करते करते गली गली कल इस समय को भास्कर स्वरानंद जी का प्रवचन होगा उ दिखना चाहिए ना भाई प्रचार करने वाला एक है बोलने वाला दूसरा है जो बोलेगा वही कहेगा जाकर के मेरा होगा प्रवचन तो लोग सोच कि अरे यह साइकिल लेकर घूम रहा है आज क्या प्रवचन दे

भक्ति और ज्ञान दोनों में समान है “त्याग”

सूत्रे मणि गणा वव भगवान कृष्ण जो गीता में कहते हैं ना जो जितने भी मणि है मुक्ता है वह सब एकही सूत्र में बंधे हुए हैं तो वह कहते हैं मलब ईश्वर रूपी सूत्र में यहां पर की त्याग रूपी जो सूत्र है जितनी भी फिलोसोफी उसी में बोली बनी हुई है फर्स्ट प्रिंसिपल में से जो बाकी सब इमर्ज होता है जो बाय प्रोडक्ट होती है तो धर्म समन्वय यह सब जो है वो बाय प्रोडक्ट है थिंग त्याग मेन है त्याग बट इस तरह से

बाय-प्रोडक्ट का मार्केट ज्यादा है

तो यहां पर आया एटलीस्ट इस तरह से तो आए