Transcript
ओ स्थापक चस स् अवतार षय कणा ठाकुर का कथामृत हम पाठ कर रहे थे उसमें कुछ दिनों तक हमारी वेदांत की चर्चा चली काफी हेवी डिस्कशन हुआ किंतु बीच-बीच में यह सब चीजों की भी जरूरत है नित्य और लीला जैसे कि अपने शास्त्र में कहा जाता है कि दो वास्तविकता एं हैं दो फेजस है ब्रह्मण के जब वो कार्य नहीं करते हैं जब वह चेतन स्वरूप होकर के स्थित रहते हैं तब वह नित्य में होते हैं और जब हम जैसे आम आदमी के साथ में पृथ्वी पर आकर के लीला करते हैं तो वो अवतार होते हैं तो कभी-कभी हम अवतार तत्व चिंतन करते हैं और कभी-कभी हम नित्य तत्व चिंतन करते हैं यह दोनों अल्टरनेटली करने से क्या है कि अपना आध्यात्मिक जीवन परिपट्स अंडरस्टैंडिंग आध्यात्मिक जीवन के बारे में वह शायद थोड़ा सा अधूरा रह जाएगा और सिर्फ नित्य चिंतन करेंगे तो फिर वो बहुत ही ज्यादा रुखा सुखा हो जाएगा बहुत ही ज्यादा बोरिंग हो जाएगा तो दोनों का बैलेंस रख के हम लोग चलते हैं तो कल कुछ दिनों तक हमने यह सब चिंतन किया अभी ठाकुर की बात आगे बढ़ाते हैं कल हमने देखा कि किस तरह से केशव सेन ठाकुर को पूछते हैं कि काली किस तरह से विभिन्न रूपों से लीला करती है वह बताइए तो ठाकुर ने कहा कि श्यामा काली उसका थोड़ा बहुत सौम्य स्वरूप है उनको की घर में रख कर के उनकी पूजा की जाती है फिर स्मशान काली है स्मशान काली भयावह स्वरूप है मां का और शव और शिवा के साथ में वो स्मशान में रहती है और तांत्रिक लोग उनकी आराधना करते हैं और रक्षा काली है कि जो कि अतिवृष्टि होती है अनाहा होता है एनी नेचुरल डिजास्टर जो कि सब हमारे सामने आ जाते हैं तो उसमें से वो मां रक्षा करती है और उसमें भी स्मशान काली के बारे में वैसे यह जो भयावह मूर्ति जो है अभी कुछ दिनों से बिकॉज कि यह सब हमारा चर्चा हुआ एक एक फनी इंसिडेंट इंसिडेंट तो नहीं एक समथिंग फनी के मैं थोड़ा सा स्टडी कर रहा था कि ये भयावह रुद्र स्वरूप जो है इसके बारे में अन्य धर्म क्या कहते हैं तो जैसे कि अभी अमेरिका में तो आप देखिए वेस्टर्न कंट्रीज में कि वहां पर तो यह जो डाकोटार ही स्पष्ट है कि भगवान जो होते हैं ईश्वर या तो फिर गॉड उनका एक सौम्य स्वरूप होता है और यह जो एंटाई क्राइस्ट यह लोग जिनको कहते हैं वन इज क्राइस्ट जिनका कि सौम्य स्वरूप ईश्वर दूसरे हैं एंटाई क्राइस्ट यानी कि इवल या तो फिर शैतान या तो फिर शैतान तो यह लोग सोचते हैं कि यह जो गुड एंड बैड यह दोनों एब्सलूट डिफरेंट है इन दोनों के बीच में कोई भी रिलेशन नहीं है और जब हमको चाहिए कि अच्छा प्राप्त करें और बुरे से दूर जाए जैसे कि स्वामी जी का एक सुंदर कोटेशन है स्वामी जी कहते हैं कि इट इज द नेचर ऑफ ए ब्रूट टू रिमन वेयर ही इज एक पशु होता है उसका स्वभाव है व जहां पे है वहीं पर वह पड़ा रहे इट इज द नेचर ऑफ अ मैन टू सीक गुड एंड अवॉइड इवल मनुष्य का स्वभाव है कि वह अच्छा चाहता है और बुरे से दूर जाना चाहता है बुरे को अवॉइड करना चाहता है एंड इट इज द नेचर ऑफ गॉड टू गो बियोंड बोथ गुड एंड इवल एंड बी इन एवर लास्टिंग ब्लेस लेट अस बी गड ईश्वर का स्वभाव है देवता का स्वभाव है कि वह अच्छा और बुरा गुड एंड इवल दोनों के परे जाए और अनंत शांति में मग्न हो जाए अनंत शांति में समुद्र में वो डुबकी ल गाए तो आओ हम लोग सब ईश्वर बने तो यह जो गुड एंड इवल बोथ एस्पेक्ट आर डिफरेंट पॉइंट्स ऑफ द सेम रियलिटी जिस तरह से ठाकुर ने यह कहा कि ब्रह्मण और शक्ति नित्य और लीला एक ही वास्तविकता के दो पहलू है जब वह स्थिर रहते हैं तो वह नित्य है तब वह ब्राह्मण है जब कार्य करते हैं तब वो साकार है तब में को शक्ति कहता हूं है एक ही वास्तविकता उनके दो एस्पेक्ट है तो वैसे ही हम लोग कह सकते हैं कि गुड और इवल गॉड एंड सेटन अच्छा और बुरा यह दोनों एक ही जगत के एक ही माया के दो पहलू है एक बार इस जगत में हम आ गए तो अच्छा और बुरा इन दोनों के बीच में हम ज्यादा ये डिस्क्रिमिनेशन नहीं कर पाएंगे इस अर्थ में कि यदि हम यह चाहे कि मेरे साथ में सब कुछ अच्छा हो कुछ भी बुरा ना हो ऐसा होने ही नहीं वाला है सबसे दुनिया का सबसे बड़ा बिलियरटी सबसे पावरफुल क्यों ना हो ना कि ये भूतकाल के जो सब किंग एंड एंपरर वगैरह जो थे कोई भी पोजीशन पर आप चले जाए दुर्घटना है यह जिसको कि यह जगत का एक ऐसा स्वरूप कहते हैं भयावह कराल स्वरूप ये प्रक ति का कराल स्वरूप हमको न स्पर्श करें ऐसा होने ही नहीं वाला है इसीलिए तो भगवान बुद्ध को देखिए कि राजकुमार थे उनका जब जन्म हुआ था उसी समय उनके पिताजी को पता चल गया था या तो यह बहुत बड़ा राजा बनेगा या तो ये बहुत बड़ा सन्यासी बनेगा तो उनको सब तरह के सुख भोग विलास में बांध कर के रख दिए थे और जैसे ही क्योंकि पता था कि जैसे ही ये सब चीजों में से उनका मन थोड़ा सा भी विचलित होगा इमीडिएट सीधा जंगल की ओर दौड़ लगाएंगे तो इतना सुख भोग में इतना कंफर्ट में उनको रखा था वह भी एक बार जब शहर नगर यात्रा करते हैं तो क्या-क्या देखते हैं एक तो वृद्ध व्यक्ति को देखते हैं फिर एक बीमार व्यक्ति को देखते हैं फिर एक शब देह को देखते हैं तब उनको लगता है कि क्या यह जरा मृत्यु और यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि ये जो चक्र है क्या हम लोग इसी चक्र के भीतर में ही चलते रहेंगे क्या इससे परे और कोई वास्तविकता नहीं है जब उन्होंने यह सोचा तब आखिर में उन्होंने एक समान को देखा एक श्रमण श्रमण अर्थात की वो श्रमण ट्रेडीशन के साधु वह साधु जिसके चेहरे पर इतना अनंत शांति और आनंद व्यापत था कि भगवान गौतम उनका नाम था तब गौतम गौतम को लगा राजकुमार गौतम को कि जदी देखिए कि इतने भयावह संसार में भी मैं इतना कंफर्ट में रह रहा हूं फिर भी मुझे इस तरह के दृश्य आज देखने को मिले हैं जिसको देख कर के मेरा दिल दहल गया है मेरा हृदय कंपित हो गया है इस तरह के कराल मुखी संसार में रह कर के भी यह व्यक्ति इतना शांत क्यों है इसके चेहरे पर इस तरह की ट्रैक्ट है इस तरह की स्थिरता है इस तरह की सौम्यता है जैसे कि जगत उसको स्पर्श ही नहीं करता कमल की तरह जगत में रहता है जगत उसको बिल्कुल भगा नहीं पाता स्पर्श नहीं कर पाता कौन है यह व्यक्ति और कौन सी यह परिस्थिति है तब उन्होंने अपना राज्य त्याग करके वन में गए तपस्या की निर्वाण प्राप्त किया तो यह जो भयावह स्वरूप है कई बार हम लोग सोचते हैं कि इससे मुक्ति पाए इससे छुटकारा पाए ईश्वर की ओर जाए सौम्यता चाहिए शांति चाहिए आशीर्वाद चाहिए प्रोस्पेरिटी चाहिए हैप्पीनेस चाहिए सब कुछ हमको जगत में चाहिए जन्म मृत्यु व्याधि यह सब हमको नहीं चाहिए किंतु इसके बिना तो हम रहने वाले नहीं है इसलिए हिंदू धर्म बड़ा ही प्रैक्टिकल है हिंदू धर्म में देखिए कि दोनों एस्पेक्ट की इक्वली पूजा की जाती है कालिका सौम्य स्वरूप भी और काली का रुद्र स्वरूप भी तो यह जो मैं थोड़ा सा रिसर्च कर रहा था यह सब चीजों के बारे में तो मैंने देखा कि अमेरिका में देर इज अ चर्च ऑफ सेटन य जैसे कि चर्च ऑफ क्राइस्ट है अमेरिका में में तो बड़ा फ्रीडम है ना वो कोई भी जाकर के कुछ भी प्रीच कर सकता है इसी फ्रीडम का लाभ लेकर के स्वामी जी वेदांत फैला के आए वहां पे तो इस तरह के फ्रीडम का दुरुपयोग करने वाले लोग भी हैं तो शैतान का चर्च एक व्यक्ति ने चालू किया फिर ये जिस तरह से ये जो हमारा ये जो 108 नामावली जो होती है तो वहां पे भी इस तरह का एक है या अपने जैसे है ना ललिता सहस्त्र नाम वगैरह तो वहां प विष्णु सहस्त्र नाम तो वहां पे भी है शैतान के 108 नाम ना कि ऐसा कुछ है उनका हम लोग चैटिंग करेंगे तो मैंने सोचा कि देखता हूं कौन-कौन से नाम है तो उसने क्या किया है यह जो शैतानी चर्च का जो फाउंडर है उसने यह जो वर्ल्ड के जितने भी ट्रेडिशनल चर से रिलीजन से सब जगह से भयावह कराल व्यक्ति मूर्ति या राक्षस या इस तरह का दैत्य यह कौन-कौन से प्रत्येक कल्चर में होते हैं तो प्रत्येक कल्चर में से कुछ-कुछ नाम उसने सिलेक्ट किए और जैसे कि ये चर्च है जो शैतान का वो सभी पूरे पृथ्वी को रिप्रेजेंट कर पाए इस तरह से तो उसने सभी कल्चर से उसने नाम लिए तो उसने भारत से क्या नाम लिया पता है काली और शिवा और फिर ब्रैकेट में लिखा है काली इज द गॉडेस ऑफ डेथ एंड शिवा इज द गॉड ऑफ डिस्ट्रक्शन सो दैट इज व्हाई दे आर रिप्रेजेंटेटिव ऑफ शैतान इन हिंदुइज्म तो ये पढ़ कर के मुझे बड़ा ही हंसी आया देखिए दो बात है सर्वप्रथम तो हम लोग मां काली और भगवान शिव की पूजा आराधना किस भाव से करते हैं वोह तो उसको पता ही नहीं है दूसरा कि जद ये यूनिवर्सल इवल यह जो कांसेप्ट आप हिंदुइज्म में खोजने को जाएंगे तो आपको मिलेगा ही नहीं हां राक्षस है रावण राक्षस था कंस राक्षस था शुंभ निशुंभ थे रक्त बीज था वो कितने ही और फिर चालाक लोग शकुनी जैसे कितने ही लोग है माने दुष्ट कैरेक्टर से हमारे पुराण है हमारी कहानियां है भरी पड़ी है किंतु एक यूनिवर्सल इवल जो कि मनुष्य के हृदय में जाकर के जैसे कि यह वेस्टर्न कांसेप्ट ऑफ सेटन है वो लोग किस तरह से इमेजिन करेंगे कि एक व्यक्ति है जैसे कि भारत में है ना कि मनुष्य के सामने प्रेय और श्रेय दो चॉइस आती है श्रेय प्रेय मनुष्य मेत मनुष्य के सामने प्रेय और श्रेय दो चॉइस दो ऑप्शन हमेशा आते हैं हम लोगों को सिलेक्ट करना है कि मुझे क्या चाहिए प्रेय चाहिए ना कि श्रेय चाहिए प्रेय क्या है जो चीज मुझे पसंद है जो कि मैं करना चाहता हूं श्रेय क्या है जो कि मेरे लिए श्रेष्ठ है जैसे कि मैं विद्यार्थी हूं और आज मुझे स्टडी करना चाहिए क्योंकि कल परीक्षा है तो आज स्टडी करना मेरे लिए श्रेय है किंतु मेरा कोई एक मित्र आ कर के कहता है चलो मूवी देख के आते हैं थोड़ा सा बाजार में घूम के आते हैं तुम रात को प्रिपरेशन कर लेना क्या है परीक्षा तो कल सुबह को है तो एक एकाएक मेरा मन प्रलोभन हो जाता है कि अरे चलो थोड़ा सा घूम के थोड़ा सा रिलैक्स हो करके आ जाते हैं जब यह मनुष्य कुछ गड़बड़ करना चाहता है तो उसका ब्रेन बड़ा ही शार्प हो जाता है एक्सक्यूज देने के लिए तो वो दुनिया भर के एक्सक्यूज देना शुरू कर देगा हां अभी बहुत थक गया हूं चलो थोड़ा सा मैं टहल लेता हूं तो रिफ्रेश हो करके फिर से स्टडी करूंगा यह वो करके बहाने करके तो यह है प्रेयर जो कि मुझे पसंद है करना क्योंकि वोह मेरी इंद्रियों को संतोष प्रदान करता है और श्रेय है जो कि मेरी इंद्रियों को कष्ट देगा किंतु तो इन द लॉन्ग टर्म इन द लॉन्ग रन वो मेरे लिए बहुत ही अच्छा है यहां राम कृष्ण मिशन में मैंने ऐसे कितने सन्यासियों को देखा है ये तो वृद्ध हो गए हैं शरीर भी नहीं चल रहा है दिन भर वो किसी ना किसी तरह के पेन से किसी ना किसी पीड़ा से वो भुगते रहेंगे किंतु फिर भी सुबह को जो 4:00 बजे ना 5:00 बजे विभिन्न सेंटर में विभिन्न टाइम होते हैं सूर्योदय के अनुसार तो जिस समय जो मंगलारती होती है मंदिर में उस समय शैया त्याग करके कैसा भी कितना भी कष्ट हो वो मंदिर में ना आए बिना छोड़ेंगे नहीं आएंगे ही आएंगे बारिश हो ना कि ठंड हो ना कि गर्मी हो ना कि कुछ भी हो मंदिर में तो जाना ही जाना है सुबह को एक मंगल आरती अटेंड करने के लिए संध्या को इवनिंग आरती अटेंड करने के लिए आरात क्रम अटेंड करने के लिए ये दोनों अटेंड करने के लिए वे लोग मंदिर में आएंगे ही आएंगे और उसके बाद में एक घंटा सीधा बैठ कर के जप करेंगे ही करेंगे चाहे कुछ भी हो जाए शरीर में चाहे कितना ही कष्ट हो जप करने के समय जप के मंत्र के ऊपर में मन नहीं जाकर के अपने शरीर में जो पेन हो रहा है बैक पेन है ना कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है दुनिया भर के डिसीज आते जाते हैं तो उसके ऊपर भले ही चाहे मन चला जाए किंतु जो नियम है इसको फॉलो करना है वो करना ही करना है मैं जब बेलूरमठ में जॉइन करने के लिए गया था प टीसी में प्री प्रोबेशन ट्रेनिंग सेंटर तो हम लोगों का नियम था कि इवनिंग आरती और मॉर्निंग आरती मंगल आरती यह दोनों जब समाप्त होता है तो सुबह को मंदिर में ही क्योंकि मंदिर तो बड़ा ही सुंदर है और सुबह को और कोई भक्त नहीं रहता सिर्फ साधु ब्रह्मचारी ही रहते हैं तो सुबह को मंगल आरती समाप्त होने के बाद में वही मुख्य मंदिर में मेन टेंपल में यदि आप बेलून मड गए होंगे तो मेन टेंपल देखा होगा उसी में बैठ कर के एक घंटा जप करना है ध्यान करना है और इवनिंग आरती संध्या आरती उस समय तो क्या है बहुत सारे भक्त रहते हैं तो आरती के बाद में मंदिर में बैठना मुश्किल होता है तो उस समय वहां पर गंगा के किनारे स्वामी विवेकानंद का महासमाधि जो मंदिर है उसके प्रथम वो फर्स्ट फ्लोर पर जाकर के गंगा के सामने मह करके गंगा के सामने एक वरांडा है वहां पर बैठ कर के और एक घंटा बैठना ही बैठना है और हमारे पीछे में और यदि कोई फ मारे मने कोई इस तरह से चालाकी करे कि 1015 मिनट के बाद में उठ कर के खड़ा होकर चला जाए अपनी डोरमेट्री में तो हमारे पीछे में वो मॉनिटर एक बैठता था एक एक जो लड़का जो कि सबसे ज्यादा नियमित है उसको वहां पे हमारे जो इंचार्ज स्वामी जी थे वो हमारा मॉनिटर बनाते थे अब यह मॉनिटर ब्रह्मचारी देखेगा कि एक घंटा हुआ कि नहीं जब मॉनिटर देखेगा कि एक घंटा हुआ है जब वोह खड़ा होगा तभी हमको खड़ा होना है उससे पहले नहीं और इससे पहले यदि कोई खड़ा होकर चला गया तो वो सीधा मॉनिटर ब्रह्मचारी जाकर के हमारे इंचार्ज स्वामी जी को कंप्लेन करेगा कि यह लड़का जो है वो इस बार इस तरह से एक दो बार जदी होने से पहली बार एक बार तो छोड़ देंगे तो दूसरी बार यदि हुआ तो सीधा हमारे वो जो ट्रस्टी महाराज के पास में खबर जाएगा कंप्लेन जाएगी और फिर मेरे साथ में ऐसा हुआ मैं जब आया ही था जिस दिन आया था बड़ा लंबा जर्नी करके तीन चार दिनों का ट्रेन जर्नी करके मैं आया था बड़ा ही थक गया था तो पहले दिन तो अभी कैसे भी करके उन्होंने पहले ही बता दिया था यदि रहना है तो फ्रॉम द डे वन पूरा रूटीन करना पड़ेगा ऐसा नहीं चलेगा कि थक गया हो यह वो सब एक्सक्यूज यहां पे नहीं चलते फ्रॉम द डे वन पूरा रूटीन फॉलो करना है तो मैंने कहा ठीक है चलो अभी साधु होने को आए हैं तो डिसिप्लिन में तो रहना ही पड़ेगा तो दूसरे तीसरे ना कि एक सप्ताह के बाद में ऑलमोस्ट ऐसा हुआ कि मैं सुबह को बैठा हूं इतना मतलब कमर पेन कर रहा है और बैठने का हैबिट नहीं है और वैसे एक आसन दिया है पतला आसन दिया है मार्बल का फ्लोर है पतला आसन से क्या होने वाला है पेन तो बहुत कर रहा है कमर में क्या करे तो थोड़ी देर के बाद में मैं खड़ा होकर चला गया मैंने कहा एक दिन तो दो दिन तो चलेगा मॉनिटर ने देख लिया मॉनिटर ने जाकर के हमारे इंचार्ज महाराज को बोल दिया वो महाराज ने दूसरे दिन सुबह को मुझे बुलाया मुझे बुला कर के सीधा कहते एक काम करो तुम घर चले जाओ तुम यहां पर रहने के लिए योग्य नहीं हो मैं तो इतना डर गया मैंने कहा महाराज क्या हुआ क्या हुआ बोला कि तुम एक घंटा बैठ नहीं पाओगे यदि जब ध्यान नहीं कर पाओगे तो क्या करना है तुमको यहां पर रह कर के तो फिर मैंने कहा अच्छा महाराज जी मुझे क्षमा कर दीजिए इस तरह से गलती फिर से नहीं होगी तो ये है जो एक प्रचंड डिसिप्लिन जिसके भीतर में रहना है यह है श्रेय उस समय हमको कितना ही बुरा लगता हो आज उस घटना को 20 साल हो गए हैं ऑलमोस्ट 20 साल हो गए हैं और आई एम सो ग्रेटफुल कि मुझे शुरू में ही ये डिसिप्लिन में रहने की हैबिट हो गई अभी ये सब चीजें सहज हो जाती है धीरे-धीरे करके 203 साल होते हैं तो तो ये है दो चीजें हमारे सामने आती है दो ऑप्शंस हमारे सामने आते हैं प्रेय और श्रेय प्रेय है कि मैं कहूंगा कि अरे बहुत हो गया अभी जब ध्यान पाच मिनट बैठ के रूम में चला जाता हूं बाद में कल देखा जाएगा और श्रेय है कि कितना ही पेन हो कितना ही सफरिंग क्यों ना हो वहां पर एक घंटा बैठना ही बैठना है तो यह प्रेय और श्रेय दो चॉइस अपने सामने आती है किस चॉइस को हम सिलेक्ट करते हैं उसके ऊपर में हमारा भविष्य का गणतर होता है अब ये जो वेस्टर्न थियोलॉजी है वे लोग क्या कहते हैं कि देयर इज अ गॉड एंड देयर इज अ सेटन अभी गॉड या तो फिर ईश्वर क्या करते हैं हमको सद्बुद्धि देते हैं कि तुम अच्छा कार्य करो अच्छे कर्म करो और यह जो सेटन है वो सेटन क्या करता है कि हमको दुर्बुद्धि देता है हमारे मन में सब तरह की द्विधा संशय प्रलोभन यह सब खड़ा करता है और कहता है कि तुम दुष्का करो दुष्कर्म करो इससे तुमको बड़ा ही आनंद मिलेगा अभी हम किसकी बात ज्यादा सुनते हैं किसकी कम सुनते हैं उसके बेसिस पर अपना भविष्य घटता है तो ये देखिए कि डिफरेंस कितना बड़ा है डिफरेंस अपने यहां पर है कि हम लोग वॉलंटरी सिलेक्ट करते हैं उस समय कोई अपना हाथ पकड़ कर के कहने को नहीं जाता भाई तुम प्रेय को ही सिलेक्ट करो श्रेय को मत करना आज जितना आनंद पाते हो पा लो कल फिर भविष्य में जो होना सो होगा तो ऐसा ये अपना सिलेक्शन है अपनी चॉइस है जबकि वहां पे है कि दोनों इन्फ्लुएंस है गुड एंड इवल एक्सटर्नल इन्फ्लुएंस है बाहर से कोई आक के हमको प्रलोभन देते हैं यह तो ऐसा हो गया कि मेरे दो मित्र है एक अच्छा मित्र है एक बुरा मित्र है अच्छा मित्र मुझे कहेगा परीक्षा के दिन चलो भाई बैठ कर के थोड़ा सा साथ में स्टडी कर लेते हैं और जो बुरा मित्र है वो कहेगा अरे भाई छोड़ दो आप थोड़ा सा घूम के आते हैं अभी किस मित्र का प्रभाव मेरे पर ज्यादा है उस मित्र की बात सुनूंगा ऐसा नहीं है कि मेरा खुद का एक चॉइस है मेरा चॉइस है किंतु उससे भी ज्यादा फैक्टर है कि यह दोनों मित्र में से मेरे पर किसका इन्फ्लुएंस ज्यादा है किस मित्र की शक्ति ज्यादा है यदि वडी वल डेविल या तो इवल या तो शैतान उसकी शक्ति ज्यादा हो गई तो मैं दुष्का करूंगा उसके प्रभाव में आकर के और जो ईश्वर है गॉड है एंजल है उसकी शक्ति ज्यादा हो गई किसी देवता की तो मैं उसके प्रभाव में आकर के अच्छा कार्य करूंगा जैसे कि बाहर से कोई मुझे खींच कर के कार्य करवाता है यह उनका एक्सटर्नल माइंड सेट है अपने यहां पे है कि वो इंटरनल अपना खुद का चॉइस है जो कि हमारे भविष्य को बनाती है तो यह जो मैं पढ़ रहा था जो जिस बात से यह पूरी बात निकली कि ये चर्च ऑफ शैतान यह चर्च ऑफ शैतान में प्रत्येक कल्चर से किसी ना किसी यूनिवर्सल इवल को सिलेक्ट किया गया है तो जब भारत से ये काली और शिव को सिलेक्ट किया है उसका दो एक बात इसमें से आती है पहले तो उनको पता ही नहीं है कि मां काली और भगवान शिव की हम किस भाव से किस अर्थ से पूजा करते हैं एक चीज दूसरा कि हिंदू धर्म में सही कहे तो इस तरह का कोई एक्सटर्नल इवल है ही नहीं ये जो इवन जो रावण था वो भी शास्त्रज्ञ पंडित था उसने भी वेद वेदांत सब स्टडी करके बैठा था किंतु अपने इंद्रियों के प्रलोभन के वश हो कर के उसने मां सीता का अपहरण किया था बात यह नहीं है कि वो उसका नेचर ही करप्टेड है बात है कि उसकी जो भोग वासना एं हैं वो उसके सर के ऊपर में सवार हो गई है जब ये उसका वध होगा तो वो अरे वो तो भगवान शिव का भक्त था वो उसने शिव तांडव स्त्र की रचना की है बड़ा भक्त था वो रावण तो कोई भी अच्छा आदमी के सर के ऊपर में भी कभी-कभी यह भोग वासना सवार होकर के उसको करप्ट कर देती है उसके डिजायर्स गुड हैबिट्स बैड हैबिट्स ये उसको करप्ट कर देते हैं मनुष्य हिमसेल्फ कोई अच्छा या बुरा नहीं है और बाहर से कोई अच्छी शक्ति या बुरी शक्ति उसको इन्फ्लुएंस नहीं करती तो यह जो कांसेप्ट कि गुड एंड इवल ये दोनों एक ही प्रकृति के दो एस्पेक्ट है और यदि हमको इवर लास्टिंग पीस चाहिए यदि अनंत शांति चाहिए तो गुड एंड इवल इन दोनों के परे जाना होगा अच्छा और बुरा ईश्वर ना कि शैतान अच्छा देवता हो ना कि राक्षस हो राक्षसी शक्ति असुरी शक्ति जिसको कि गीता में कहा जाता है देवासुर संपद विभाग योग इस तरह से वो जो अध्याय का नाम है देवी संपत्ति और आसुरी संपत्ति क्या अ डिफरेंस है देवी संपत्ति जिसके भीतर में है वो धीरे-धीरे करके संस्कार के द्वारा खड़ी होती है जीवन भर मैंने यह श्रेय को एक के बाद एक प्रत्येक डग पे प्रत्येक फुट स्टेप पे प्रत्येक कदम पे मैंने अपने जीवन के श्रेय को सिलेक्ट करता गया हूं तो श्रेय को सिलेक्ट करते-करते मेरे शुभ संस्कारों का गठन होता जाएगा मेरे मेरे भीतर में देवी संपत्ति का आविर्भाव होगा प्राधान्य होगा और यदि मैं जीवन भर प्रेय को ही सिलेक्ट करता गया मेरी इंद्रियों को जो पसंद है मेरे मन को जो अच्छा लगता है उसी को मैं सिलेक्ट करता गया तो धीरे-धीरे करके आसुरी शक्तियां फिर आसुरी संस्कार मेरे ऊपर में हावी हो जाएंगे तो ये दैव और आसुरी संस्कार कोई मुझे इन्हेरिटेंस में नहीं मिले वो तो मेरे ही पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है या तो फिर मैंने जो इस जन्म में जो सब चॉइस की है जो मैंने ऑप्शन सिलेक्ट किए हैं उसी ऑप्शन का यह परिणाम है देवी संपत्ति या तो फिर आसुरी संपत्ति दोनों में से किस कौन सा मेरे पास में ज्यादा है तो ये हो गया य इसीलिए देखिए कि हम लोग भयावह की पूजा क्यों करते हैं क्योंकि हमको पता है जैसे कि कहा ना कि माया और शक्ति दोनों में डिफरेंस क्या है वेदांत ओरिजिनल ट्रेडिशनल मायावादी कि अज्ञान में से अविद्या में से यह माया का जन्म हुआ है या तो फिर माया का नेचर ही है अज्ञान और अविधवा भय वरा भय दयनी शक्ति अर्थात कि हमको वर और अभय देंगी आशीर्वाद और सुरक्षा देंगी यह है शक्ति का सही स्वरूप और यह शक्ति का सही स्वरूप को पहचान करके शक्ति का जो ये देवी शक्ति और ये आसुरी शक्ति यह दोनों एक ही देवी के भीतर में है ठाकुर का वोह फेमस दर्शन कि जब वह एक सौम्य रूप में सुंदर स्त्री ने बच्चे को जन्म दिया और कराल स्वरूप धारण करके भयावह स्वरूप धारण करके उसी ने यह अपने संतान का भक्षण कर दिया अपने संतान को खा गई तो ये एक ही देवी के दो स्वरूप है और ठाकुर कहते हैं कि देवी के सामने हाथ जोड़ कर के प्रार्थना करके उनको कहना है आप हमारा रास्ता छोड़ दीजिए हमको ईश्वर ज्ञान ब्रह्म ज्ञान प्राप्त प्राप्त हो इसके लिए आप हमको आशीर्वाद करें तो जब हम प्रार्थना करेंगे तो दोनों स्वरूप की प्रार्थना करेंगे ये सौम्य स्वरूप की भी जो कि हमको वरा भय देती है और ये कराल मुखी जिस जो कि ये प्रलय लाती है इस तरह के भयावह स्वरूप की भी हम प्रार्थना करेंगे हम उनके सामने भी हाथ जोड़ कर के कहेंगे कि ये प्रलय रूपी जो आपका स्वरूप है जो आपका यह जो प्रकट जो मेनिफेस्टेशन है इसको आप समाप्त करके इसके पीछे का जो अनंत शांति मय स्वरूप है वहां तक हमको आप ले जाइए तो ये अपने हिंदू धर्म का जो प्रैक्टिकल एक डिफरेंस है और ये कहां से आया बेसिकली फ्रॉम अवर अंडरस्टैंडिंग ऑफ अद्वैत वेदांत यदि अद्वैत वेदांत नहीं है तब तक यह जगत ध्व में ही पड़ा रहेगा तब तक ये जगत देवी शक्ति और आसुरी शक्ति रूपी दो विभागों में बटा ही रहेगा और हम हमेशा एक्सक्यूज देते रहेंगे कि जैसे कि अमेरिका में एक बड़ा ही फेमस एक कोट है कि जब भी कोई आदमी बुरा करता है तो उसको पूछा जाता है कि अरे तुमने इस तरह का भयावह कार्य क्यों किया तो व उत्तर देगा कि डेविल मेड मी डू इट डेविल अर्थात की दैत्य इस एक तरह का कोई राक्षस शैतान तो ही ड मी डू इट अर्थात कि यह शैतान ने मेरे पास में ऐसा कराया अरे भाई बाहर से कोई आकर के तुमको इन्फ्लुएंस करे तो तुम्हारा खुद का विल पावर कहां पे है ऐसा थोड़ी ना चलेगा कि मैंने उसने मेरे पास में ऐसा कराया इसलिए मैंने ऐसा किया बुरा कार्य किया कोई आकर के वो जितने भी आप कहानियां वगैरह पॉपुलर कहानियां वेस्टर्न कल्चर की देखेंगे तो हमेशा देर इज एन एक इविल इन्फ्लुएंस होता है जो इविल इन्फ्लुएंस आ करके उनको सब समय कहता रहता है कि आप यह बुरा कार्य करो यह बुरा कार्य करो किसी का मर्डर करो कहीं पर डके डालो ये ये सब बाहर से इन्फ्लुएंस होकर के अच्छे लोग हैं किंतु बाहर से इन्फ्लुएंस हो कर के यह करते हैं अपने यहां पे भी शकुनी का इन्फ्लुएंस देखिए कि कौरवों के ऊपर में था यह धुत राष्ट्र के ऊपर में या तो फिर ये दुर्योधन के ऊपर में था किंतु फिर इन लोगों के मन में पहले से ही देखेंगे कि आसुरी संपत्ति ऑलरेडी बैठी हुई है फिर वो शकुनी की बात सुनते हैं विदुर की बात क्यों नहीं सुनी भाई वो भी तो वहां पे था भीष्म पितामह की बात क्यों नहीं सुनी उन्होंने भी उपदेश दिया था कि पांडवों के साथ में युद्ध मत करो द्रोणाचार्य ने जितने भी वडील थे सबने कहा कि भाई युद्ध मत करो पांडवों के साथ में अन्याय मत करो किंतु भीतर में ही जो एक आसूर्य वृत्ति जम कर के बैठ गई है पूरा जीवन इस जीवन में पहले के जीवन में जितने भी वो प्रेय सब समय सिलेक्ट करते गए हैं कि मेरी इंद्रियों को मेरे विषयों को ये वैश चीजें चाहिए इससे कि मुझे आनंद मिलता है तो संस्कार धीरे-धीरे करके दृढ़ से दृढ़ तर होते गए तो अच्छी बातें करने वाले लोगों की बात नहीं सुनी वह सकोनी की पगली की बात सुन ली वह कई कई की बात सुन ली तो यह अच्छा अभी वह कई कई का उदाहरण थोड़ा सा डिफरेंट हो जाता है उसको छोड़ कर के किंतु चलो यह शकुनी तक ही सीमित रखते हैं यह शकुनी की बात ही सुनी ये अच्छे इन्फ्लुएंस को नहीं सुना तो ऐसा क्यों क्योंकि ऑलरेडी भीतर में आशूर प्रवृत्तियां प्रबल होक के बैठी हुई है अभी वह सब एक्सक्यूज सोचती है कि हां उसने मुझे कहा तो मैं उसकी बात सुन लेता हूं तो दिस इज अ वेरी प्रैक्टिकल डिफ बिटवीन हिंदुइज्म एंड नॉन हिंदू फिलोसोफी वेस्टर्न फिलोसोफी जो कि जिसके बारे में हम सबको ज्यादा पता है बाकी बहुत सारे फिलोसोफी कल्चर है किंतु इसके बारे में हम इतना वो पढ़ने का ये टाइम नहीं देते हैं या तो फिर इसके बारे में सहज इंफॉर्मेशन इतनी उपलब्ध नहीं है तो जो भी है हमने हिंदुइज्म और यह वेस्टर्न कल्चर का बेसिक स्टडी सबने किया है यह पॉपुलर कल्चर के माध्यम से हो ना कि कोई भी किताबों के माध्यम से इन दोनों के बीच में किंतु हमको यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस दिखता है तो यह हो गया ठाकुर का ये जो भयावह स्मशान काली की उपासना के बारे में अभी देखिए कि अच्छा आप स्मशान काली पहो न किय कराल वदनी काली इनकी उपासना तो भले हम चाहे करें एक सामान्य अर्थ से इनको भी भोग देना चाहिए उनको भी उनका एक प्राप्य देना चाहिए वो तो एक हो गया किंतु उसके बाद में पूरे सेक्ट के सेक्ट अर्थात कि पूरे पंथ और संप्रदाय ही ऐसे खड़े हो गए कि जो कि स्मशान काली की भयावह मूर्ति की ही उपासना के ऊपर में उन्होंने अपने को लगा दिया जैसे कि खास करके यह तंत्र संप्रदाय है तंत्र में भी एक अघोरी संप्रदाय है अघोरी संप्रदाय के बारे में एक समय था कि मैंने थोड़ा बहुत रिसर्च किया था तो अभी उसमें क्या है कि जिस तरह की बातें जिस तरह की साधनाएं करने की होती है उसके बारे में अभी यहां पर डिस्कशन करने से कोई लाभ नहीं एक बार नरेंद्र ने कहा था कि पंच मकार साधना वगैरह यह सब क्या है तो ठाकुर ने कहा कि यह सब जान कर के तुमको कोई लाभ नहीं है तुम इसके भीतर में मत जाना तो हमको भी जाने की जरूरत नहीं है ठाकुर ने सब तरह की साधनाएं की थी किन तो फिर ठाकुर अपने से वो सब साधनाएं किसी को रिकमेंड नहीं करते यहां पे एक एक इंटरेस्टिंग फैक्ट है कि शरद महाराज ने अपने से पूर्णाभ्यस्त जैसे कि भगवान राम कृष्ण देव की साधना करनी है उनके नाम का जप करना है तो कैसे हम हमारे प्रेसिडेंट महाराज से उनके नाम का मंत्र धारण करते हैं मंत्र प्राप्त करते हैं तो वैसे ही तांत्रिक साधना यदि करनी होती है तो पूर्णाभ्यस्त साधना की थी किंतु इसके बारे में इससे ज्यादा कोई फैक्ट हमको नहीं मिलते शरत ने ऐसा क्यों किया मेरा ऐसा अनुमान है कि मां को वो मां के द्वारी थे मां की रक्षा कर म मां की सेवा करने के लिए उन्होंने अपने को नियुक्त किया था तो मां शक्ति है तो शक्ति साधना के लिए पूर्णा अभिषेक करना चाहिए ऐसा सोच कर के शायद होगा इस इसके बारे में बहुत ज्यादा डिटेल अपने पास में नहीं है किंतु ठाकुर की तांत्रिक साधना हों के बारे में शरद महाराज ने स्वयं काफी कुछ विवरण लिपिबद्ध किया है किस तरह से कि एक नरमुंड लेकर के व भैरवी ब्राह्मणी जो ठाकुर की ं तंत्र गुरु थी शक्ति साधना गुरु थी भैरवी ब्राह्मणी वो भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर के पास में किस तरह से एक के बाद एक आज हमको यह सब सुन कर के घुणा हो ना कि लगे कि अरे इस तरह की साधनाएं भी करनी होती है क्या किंतु वो सब तरह की साधना की थी और ठाकुर सब तरह की साधना हों में सिद्धि भी प्राप्त किए थे पंच मुंडी आसन बनाया था यानी कि पांच तरह के प्राणियों के नरमुंड भी एक होता है उनके वो जो कल होते हैं मुंड उसको जमीन में गाड़ करके उसके ऊपर में आसन बना कर के वहां पर बैठ कर के जब ध्यान करना होता है तो इस तरह से काफी कुछ तंत्र में जो लिखी हुई साधनाएं है ठाकुर ने की थी ठाकुर ने उसमें सिद्धि भी प्राप्त की थी और आखिर में ठाकुर ने कहा था कि मां ने मुझे बालक भाव में रखा है अर्थात कि तंत्र साधना में जो वीर भाव की साधना है वो अचलानंद बोलकर के एक तांत्रिक वहां पर आता था वो जाकर के ठाकुर के साथ में झगड़ा करता था कि तुम वीर भाव से साधना को क्यों नहीं स्वीकार करोगे भगवान शिव स्वयं इस साधना के बारे में लिख करके गए हैं ये आगम निगम जो शास्त्र है तंत्र के प्रमाण भूत शास्त्र कहे जाते हैं कहा जाता है कि भगवान शिव की कलम से वो लिखे गए हैं भगवान शिव ने स्वयं उनको लिपिबद्ध किया है तो ये अचलानंद जाकर के ठाकुर को कहता था भगवान शिव की कलम है तुम क्यों नहीं स्वीकार करोगे वीर भाव से साधन वीर भाव से साधन अर्थात कि शक्ति को या तो फिर स्त्री को एक भोग्य वस्तु के रूप में देखना और उसके साथ में रमण करके समाधि प्राप्त करना तो यह सब है तंत्र का एक भाग तो ठाकुर कहते थे की जाने बापू अर व सब भलो लागे ना इतना सरल रूप से उत्तर दिया है कि किसको पता भाई मुझे वो सब अच्छा नहीं लगता मेरा तो बालक भाव है मा ने मुझे संतान भाव में ही रखा है तो वो सब साधना अपने हिंदू शास्त्र में है ईश्वर का कराल स्वरूप और उसको उस भाव में किस तरह से सिद्धि प्राप्त की जाए किंतु प्रॉब्लम यहां पर एक ही है वो जो शास्त्र है उस शास्त्रों में जो वीर भाव की जो सब गणय साधनाएं जो लिखी गई है उसका आचरण करने से पतन के बहुत सारी संभावनाएं है और इसीलिए इवन भले ही चाहे स्वामी जी ने काली धम मधर करके जो पोयम लिखी है मां का भयावह स्वरूप उसमें उन्होंने बड़ा ही स्पष्ट रूप से चित्रित किया है वहां पर एक बहुत बड़ा बंगाल का एक फेमस पेंटर था मैं भूल गया उसका नाम तो वह एक बार स्वामी जी के पास में आया था स्वामी शिष्य संवाद में यह बात है रणता बाबू ना हां हा अच्छा अच्छा अच्छा हा ठीक बोले हा तो वो स्वामी शिष्य संवाद में यह है वहां पर शरद चंद्र चक्रवर्ती इस घटना को लिपिबद्ध करते हैं वो पेंटर या तो फिर यह जो ये है आर्टिस्ट स्वामी जी के पास में आया तो स्वामी जी ने कहा कि इस तरह से महाकाली का चित्र दोरी फिर वो स्वामी जी ने कहा कि तुम जाओ तो मैंने वह जो कविता लिखी है वह लेकर आओ तो तो वह लिखित रूप में स्वामी जी के पास में उनके कमरे में थी शरद चंद्र जाकर के कविता को लेकर आए स्वामी जी ने उसका पाठ किया तो रादा बाबू एकदम ये आश्चर्य चकित हो गए अरे ये किस तरह की कविता है किस तरह की कल्पना है कितना भयावह स्वरूप इतना स्पष्ट नजर के सामने आता है तो स्वामी जी ने कहा कि इस तरह की मां काली की मूर्ति आप चित्रित कीजिए तो लगे कि आप में सही सही वो गुण है पेंटिंग के तो उन्होंने कहा कि हां मैं प्रयास करता हूं उसके बाद में प्रयास उन्होंने किया कि नहीं पता नहीं किंतु यह जो स्वामी जी का इतना विविड इमेजिनेशन इस पोयम में जो प्रकट होता है इवन स्वामी जी ने भी इस तरह से तंत्र साधना करने का प्रयास नहीं किया शिव के अवतार स्वयं है जो कि संपूर्ण शुद्ध है उन्होंने भी इस साधन के बारे में कभी भी कोई भी बात नहीं की क्योंकि यह जो साधन पद्धति है उसमें े तो एक जिसका मने वो जो मनुष्य नहीं वो जो अति मानव होस है वही उसमें सिद्धि प्राप्त कर सकता है और वो सिद्धि ठाकुर ने प्राप्त की थी देखिए हम लोग सन्यासी है प्रलोभन की चीजों से अभी बात ऐसा है किसी भी साधना हो कोई भी साधना हो तो साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए आपको त्याग के रास्ते पर चलना ही पड़ेगा बिना त्याग के कोई उपाय नहीं है त्यागे नहीं के अमृत मानस अपने वेद में जिस तरह से कहा गया है तो त्याग ही एकमात्र रास्ता है पहले बाह्य ता कीजिए और उसके बाद में अपनी मन की वृत्तियों को शांत कीजिए बेसिकली टेक्निकल यदि लैंग्वेज में यदि कहा जाए योगश चित्तवृत्ति निरोध योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध तो चित्त की वृत्तियों को समाप्त करना है शांत करना है किंतु चित्त की वृत्तियां शांत हो उसके पहले आपको शारीरिक वृत्तियों को शांत करना होगा यह वैशक वृत्तियों को शांत करना होगा पहले स्थूल वृत्तियों को शांत कीजिए स्थूल प्रलोभन को शांत कीजिए उसके बाद में मन के सूक्ष्म वृत्तियां सूक्ष्म प्रलोभन शांत होंगे तो यह एक यात्रा है पूरी स्थूल से सूक्ष्म तक जाने की तो हम लोग जिस तरह की सन्यास ट्रेडिशनल हम लोगों ने त्याग करने के लिए सबसे पहला कदम क्या लिया है कि प्रलोभन की चीजों से दूर जाकर के एक आश्रम बना कर के इंक्लूडेड प्लेस बना कर के हम लोग यहां पर रहते हैं तो सबसे पहला तो हमने सब तरह के प्रलोभन के सामने एक स्टोन वॉल खड़ी कर दी जिससे कि प्रलोभन ही नजर के सामने ना आए बाद में तो बात है कि प्रलोभन यदि आते हैं मन से प्रकट होते हैं तो मन को किस तरह से संयम करें किंतु पहले तो वो बाहर के जो प्रलोभन आते हैं उसी को दूर कर दो बाद में फिर मन के साथ में हम निपट लेंगे जबक तंत्र साधना है वो बिल्कुल विरुद्ध दिशा में चलती है कि जितने भी प्रलोभन है उसको सामने से आमंत्रित करो देखो कि आपके मन में वह शक्ति है कि नहीं है कि उसके सामने विदस्टैंड कर पाए जिस तरह से भैरवी ब्राह्मणी ने एक बार ठाकुर को क्या कहा एक दिन रात को साधना कर रहे हैं एक सुंदरी स्त्री को लेकर के भैरवी ब्राह्मणी आई स्त्री को निव स्त्र किया और फिर ठाकुर को कहा कि आप उनकी गोद में बैठ कर के जप कीजिए तो ठाकुर कहते हैं कि मां मेरी किस तरह की परीक्षा ले रही है किंतु फिर भी मां का नाम लेकर के अपने मन को दृढ़ कर कर के इस तरह से उसकी गोद में जाकर बैठे और जब जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही समाधि में चले गए तो ये थी ठाकुर की महत्ता और ये है तंत्र साधना और अपनी सामान्य साधना है इन दोनों के बीच में डिफरेंस हम लोग जितना भी हो सके प्रलोभन की चीजों को पहले दूर कर देते हैं बाद में फिर मन के साथ में लिपट हैं वहां पर उल्टा है प्रलोभन की चीजों को लाओ देखो कि अपना मन कितना दृढ़ होता है यह तोतापुरी ने ठाकुर को जिस तरह से कहा था ठाकुर ने कहा कि मैंने तो विवाह किया है तो क्या यह विवाह मेरे सन्यास के रास्ते में बंधक होगा तो उस समय तोतापुरी ने कहा कि देखो तुम जद अपनी धर्म पत्नी के साथ में भाई बहन की तरह पवित्र शुद्ध संबंध बना कर के रह सकते हो तो देखना कि तुम्हारी साधना सन्यास साधना बहुत ही आसानी से सिद्ध होगी तो इवन तोतापुरी स्वीकार करते हैं यह बात किंतु तोतापुरी खुद इस तरह का साहस नहीं करते हैं कि कहीं विवाह करके किसी के घर पर रहे और फिर वो टेस्ट करे अपने मन को वो खुद एक मने एकदम पक्के सन्यासी थे तो ये सन्यास ट्रेडिशनल जनरल ट्रेडिशनल धर्म में कहा जाता है गृहस्थ और सन्यास ये दो है गृहस्थाश्रम में आप धार्मिक रूप से भोगों को ग्रहण कीजिए ये धर्म जो है धर्म हमेशा आपके भोगों के ऊपर में ऑटोमेटिक एक विराम लगाएगा ऐसा नहीं होगा कि जिस व्यक्ति के साथ में आपको संबंध बनाने हैं बना देंगे नहीं एक बार आपने विवाह किया तो एक पति व्रत या तो फिर एक पत्नी व्रत लेकर के ही रहना है और फिर आप यदि गृहस्थ है तो आपके दुनिया भर के धर्म है पितृ धर्म है मातृ धर्म है जो मां है उसका अपना एक धर्म है राजा है तो उसका राज्य धर्म है विद्यार्थी है तो विद्यार्थी धर्म है मैं जिस अवस्था में हूं उस अवस्था के धर्मों का मुझे पालन करना है जो संतान है तो संतान को माता-पिता का पालन लालन पालन करना है माता-पिता है तो संतान को अच्छे रखना है परिवार को ठीक रखना है गुरु देवताओं को दक्षिणा देनी है सब कुछ करना है राजा है तो राजा ऐसा नहीं कि अपने राज महल में जाकर के सब समय वो नृत्य गीत कीर्तन वगैरह में मग्न रहे उसको पूरा राज्य चलाने का जिम्मा सुशासन राज्य चलाने का जिम्मा उसके सर पर है तो सभी के अपने-अपने धर्म है धर्म का पालन करके फिर जो धार्मिक रूप से भोग प्राप्ति हो पाए वो आपको करना है तो ये सन्यास धर्म और गृहस्थ धर्म ये दो एक मान्य रास्ते हैं अपने हिंदू धर्म में जबकि ये जो शक्ति साधना का ये तंत्र साधना का रास्ता है वो पूरे धर्म वगैरह दोनों तरह से डेंजरस है जिस तरह से गृहस्थ भोग ग्रहण करता है किंतु धर्म का एक अंकुश है यहां पर आपको भोग भी ग्रहण करने हैं धर्म का अंकुश भी नहीं है सन्यास में जिस तरह से त्याग करना है किंतु सामने एक प्रोटेक्टिव वॉल आपके सामने ने है सन्यास का यह जो वस्त्र धारण करने की जो ठाकुर ने कहा ना कि चैतन्य देव ने एक गधे को भेक पहना करके उसको प्रणाम किया था भेक अर्थात की यह जो वैष्णव साधक होते हैं उनका यूनिफॉर्म उनका ड्रेस तो जो यह वैष्णव साधक का यूनिफॉर्म धारण करेगा समाज भी उनको सम्मान देगा और फिर कोई भी साहस नहीं करेगा कि उनके सामने जाकर के कोई उल्टी पल्टी बात करने का पाप में पड़ जाएंगे सब आपका जन्म का सब खत्म हो जाएगा तो यह सन्यासी को सम्मान इसलिए दिया जाता है कि उनके सामने पुत्तों सब तरह के प्रलोभन से दूर रहे कोई उनके सामने जाकर के प्रलोभन ना खड़ा करे तो यह दोनों तरह से गृहस्थ की तरह भोग करना है किंतु माने भोग्य वस्तु के सामने रहना है किंतु धर्म का अंकुश नहीं है सन्यासी की तरह त्याग करना है किंतु यह जो संयम की दीवार है वो भी नहीं है तो यह है तंत्र साधना दोनों ओर से बड़ी ही भयानक है भोग्य वस्तु सामने रहेगी और उसका आपको त्याग करना है विल पावर से यदि कर पाए तो आप ईश्वर हो गए और नहीं कर पाए तो पशु हो गए और यह साधना का जो इतिहास है ज्यादातर लोग पाश गिरी ही ज्यादा किए हैं वो पशुता ही उन्होंने ज्यादा की है कम इतने कुछ कुछ लोग होंगे जो कि इस साधना में सिद्ध हुए हैं ठाकुर कहते हैं ना कि अचलानंद के बारे में ये अचलानंद एक तांत्रिक था वो दक्षिणेश्वर में जाकर के बीच-बीच में रहता था तो ठाकुर कहते हैं कि वो वो देखता हूं कि उसके जितने भी यह लोग है उसके दल के सब पहले तो कारण वारी करेंगे कारण अर्थात कि शराब पहले तो शराब पिएंगे उसके बाद में मैं सोचू सोचता हूं कि ये लोग अभी क्या अभी शराब पिए हैं कारण पान किए हैं तो अभी बैठ कर के जप करेंगे नहीं वो नृत्य कीर्तन वगैरह सब नृत्य गीत करना चालू कर दिया क्याक सब किंतु देखा कि अचलानंद एक है जो कि एक कारण वारी करके स्थिर बैठ कर के जप करता है तो ऐसे अचलानंद जैसे कोई कोई होंगे जो कि इवन ठाकुर ने जिनकी प्रशंसा की है बाकी ज्यादातर लोग तो इस रास्ते में जाकर के अधोगति को ही प्राप्त होते हैं इसलिए इस रास्ते के बारे में ज्यादा चिंतन ज्यादा चर्चा हम लोग जाहिर में ओपनली नहीं करते जो भी कुछ है हम भयावह मूर्ति को अवश्य उसका सम्मान देते हैं किंतु उसके रिलेटेड जो साधन पद्धति है उससे हमेशा दूर ही रहते हैं और इसलिए स्वामी जी जैसे स्वामी जी स्वयं प्रचंड विल पावर के अधिक ार थे इच्छा संकल्प शक्ति इतनी दृढ़ थी कि जो चाहे वो अपने मन के पास में करवा सकते थे वो जो एक सुंदर उदाहरण है वो राजस्थान नहीं कि गुजरात कहीं पे एक संस्कृत के पंडित के पास में पाणिनी व्याकरण पढ़ने को बैठे अभी अपना जो क्लासिकल संस्कृत है उसमें यदि आपको डीप में जाना है अपने शास्त्रों का अच्छे से ज्ञान प्राप्त करना है तो पाणिनी व्याकरण में प्रवेश किए बिना पाणिनी व्याकरण में सिद्धि प्राप्त किए बिना वो होने वाला नहीं है और पाणिनी व्याकरण ऐसा है कि वह ब्राह्मण के घर में जन्म हुआ है बचपन से ही वह सब सूत्र मुख स्त करते आ रहे हैं तब कहीं जाकर के बड़े होकर के आपके पास में थोड़ी आशा बनती है कि हम पाणिनी व्याकरण में मास्टरी प्राप्त करेंगे यहां पे तो स्वामी जी ऑलरेडी कुक्त वय के हो चुके हैं और ऑलरेडी वो 253 उनकी एज है और इस समय उनको यह सब करना है व्याकरण तो किस तरह से होगा तो पंडित के पास में गए स्वामी जी पंडित एक के बाद एक सूत्रों का पाठ करता जाता है जिस तरह से यह क्लासिकल व्याकरण सिखाया जाता है वो गुरु सबसे पहले अपने शिष्य को कह देगा आचार्य कह देगा कि यह सब सूत्र मुख कर दो मैं फटाफट फटाफट करके एक एक सूत्र की व्याख्या करता जाऊंगा तुम उसको अपने माइंड में बिठा देना ये नोट लिखना वगैरह वो सब रिकॉर्ड करना वो सब कांसेप्ट ही नहीं है जो आचार्य बोलेगा आपको मुख कर लेना है तो ट्रेडिशनल तरीका हो गया अभी वो ट्रेडिशनल तरीके से उन्होंने पानी की तरफ फटाफट फटाफट व्याख्या करना शुरू कर दिया दो तीन दिन तो स्वामी जी ऐसे परेशान हो गए तो ये पंडित ने वो आचार्य जी ने उनको धुत का करके कहा अरे स्वामी जी आप इतना भी नहीं कर पाते हैं तो आप क्या व्याकरण सीखेंगे तो स्वामी जी को आ गया गुस्सा बोला कि मेरे से ऐसा नहीं होगा कैसे चलेगा ऐसा फिर स्वामी जी स्वयं कहते हैं कि मैंने बैठ कर के एक के बाद एक सूत्र मुख करना शुरू किए और कुछ ही दिनों में पानी की तरह फटाफट फटाफट मैं सूत्र मुख स्त करता गया व्याकरण के और फिर मैं आचार्य जी के पास में गया कहा कि चलिए अभी फिर से सिखाइए और उन्होंने सिखाना शुरू किया और मैंने फटाफट फटाफट करके मेमोराइज करना शुरू किया वो आश्चर्य चकित हो गया कि स्वामी जी इतने दिनों में आपने सब कुछ कैसे मुख स्त कर दिया तो वो है ब्रह्मचर्य की शक्ति का प्रभाव इस तरह के स्वामी जी ये स्वामी जी ने स्वयं शक्ति साधना में प्रवेश करने का साहस नहीं किया है ठाकुर ने उनको अनुमति नहीं दी है क्योंकि ठाकुर की अनुमति के अनुसार ही तो सब करना है हठयोग की साधना करने की इच्छा थी तो ठाकुर ने बार-बार प्रकट होकर के इतने करुण मुंह से चेहरे से उनके सामने देखना शुरू किया कि स्वामी जी समझ गए कि ठाकुर की इच्छा नहीं कि मैं हठयोग की साधना करूं तो फिर वो री बाबा को छोड़ कर के फिर वो रा नगर मठ वापस चले आए तो यह देखिए कि स्वामी जी ने स्वयं भले ही स्वामी जी ने वो कराल मूर्ति भयावह काली की आराधना की हो उनके बारे में पोयम लिखी हो किंतु उस साधन पद्धति के भीतर में प्रवेश नहीं किया तो यह स्मशान काली या तो भयावह मूर्ति के बारे में कुछ बात इसके बारे में अभी हम फिर से आगे थोड़ा चर्चा करेंगे तो शा श श किसी किसी के साथ में आर्गुमेंट करने से कोई लाभ नहीं है छोटा बच्चा है वो कहेगा कि ये आप आपकी कोई भी चीज उठा लेगा बोलेगा ये मेरा है अब क्या आर्गुमेंट करेंगे उसके सामने वो रोना शुरू कर देगा झगड़ा करना शुरू करेगा तो वैसे किसी के अभी ठाकुर देखिए कि सब तरह की साधना करके बैठे सिद्ध हो कर के किंतु फिर भी वह बात नहीं करते बात की है किसके सामने जो कि व सब बातें सुनने के अधिकारी थे भले ही शरद महाराज स्वामी जी इन सबको उन्होंने इस रास्ते में जाने को मना किया हो किंतु उनको बताया पूरा है अपनी जो अनुभव है सब उन्होने वर्णन किए है उसी अनुभव के आधार पर यह लीला प्रसंग और फिर यह सब लिखा गया है और इसी अनुभव के आधार पर स्वामी जी का अंडरस्टैंडिंग बना है कि काली का भयावह स्वरूप क्या है तो अनुभव पूरे वर्णन कर दिया किंतु उसी के सामने जो कि इसका अधिकारी था इसके दो आंसर है एक तो सुपरफिशियल है एक थोड़ा डीपर है सुपरफिशियली कहा जाएगा कि यह जो मृत्यु है चरा है व्याधि है इस सब से उस उनके पिताजी ने इतना उनको सिक्योर रखा था कि जब पहली बार जद सडन देखा वो शौक इतना था कि वह फिर शौक में से बाहर नहीं आ पाए सो दैट इज वन आंसर क्योंकि ऑलरेडी उनके पिताजी को पता था यह सब टेंडेंसी है दूसरा है ऑफकोर्स संस्कार ये जन्म जन्मांतर के संस्कार अभी यह शंकराचार्य या स्वामी विवेकानंद है कोई एक जन्म में तो बनते नहीं है जो ईश्वर के जो पार्षद होते अभी दो तरह से इसको व्याख्या कर सकते हैं यदि हम इसको ईश्वर या ईश्वर के पार्षद के रूप में गिने तो भी है कि वो जन्म जन्मांतर से बार-बार पृथ्वी पर आते हैं साध्य साधना करने के लिए साध्य वस्तु को प्राप्त करने के लिए और यदि हम तरह हमारी तरह सामान्य मनुष्य के रूप में भी देखें तो भी है कि जन्म जन्मांतर से श्रेय को सिलेक्ट करते आए हैं तो देवी संपत्ति का वो जो भंडार जो बना है वही ऑटोमेटिक उस तर लेकर जाता है जैसे लोहा है ऑटोमेटिक मैगनेट की ओर खींचेगा पत्थर नहीं खींचेगा यह जो य अच्छा बात आपने कहा कपटी मन यह अच्छा शब्द प्रयोग मन कपटी है और सब समय थकता रहता है यह जो मैं गुजरात में कभी कभी य जाता था ना ये द्वारका सोमनाथ तो बड़े बड़े वो जो दारूबंदी की वो एडवर्टाइज का व होल्डिंग बड़े रहते हैं उसम गवर्नमेंट वाले ये सब देते है ना एडवर्टाइज अच्छा एक लिखा होता है पहले आदमी बोतल को पीता है बाद में बोतल आदमी को पीती है ये एकदम परफेक्ट उदाहरण है परफेक्ट सूत्र है जिसने लिखा होगा उसने वेदांत पढ़ा है क्योंकि एक बार एक बार आपने बोतल पीने की शुरुआत कर दी बाद में संस्कार बन गए अभी संस्कार के सामने लड़ना बड़ा मुश्किल है पहली बार जब आपके सामने यह आया होगा कि पिए ना पिए क्या करें अब कुछ मित्र है कहेंगे अरे चलो भाई तुमको अभी ये कुल ये जो शब्द है आजकल का डू यू वांट टू बिकम कुल पर्सन और ये अनकूल पर्सन आई वांट टू बिकम कुल पर्सन ये कॉलेज में जाएगा फिर ये सब लोग सब तरह के लोग उसको मित्र मिल जाएंगे कोई बोलता है अरे चलो स्मोकिंग करते हैं कोई बोलता है अरे चलो यह सब वाइन पीते हैं यह तो आजकल का ये ट्रेंड है फैशन है तुम क्या पुराने जमाने के हो तो एक बार उसने ये प्रारंभ किया इन सब लोगों की बातें सुन कर के उसके बाद में जो हैबिट बन गई तो फिर वह अपना विवेक यूज करके भी नहीं छूट पाएगा सर्वप्रथम उसके पास में यह चॉइस था कि वह विवेक यूज करें उसने नहीं किया उसने उन लोगों की बात मान ली वीकनेस की वजह से उसका जो विल पावर था उसने उसका इस्तेमाल नहीं करके किंतु एक बार हैबिट पड़ गई फिर छूटना बड़ा ही मुश्किल है तो यहां पे जैसे वह स्वामी जी ने वह बेल का उदाहरण मैंने कहानी बताई थी ना कि वह बेल आ गया दौड़ता दौड़ता और मिस मुलर लंडन मेंस मिस मलर स्टर्डी और स्वामी जी तीन लोग खड़े हैं बेल आ गया दौड़ता दौड़ता अभी वो स्टर्डी तो दौड़ के भाग गया मिस मलर नहीं भाग पाएंगी वो तो लेडी है क्या करेंगे वस्त्र इस तरह के पहने है तो स्वामी जी ने स्प्लिट सेकंड में सोचा यदि मैं इनकी रक्षा नहीं करूंगा तो उनका मृत्यु है तो सीधे जाकर के बुल के सामने डट कर के खड़े हो गए तो स्प्लिट सेकंड का जो डिसीजन है वो अपने डीएनए में चला जाता है एक बार जो आपने प्रैक्टिस करके करके विवेक का यूज किया तो वो आपके डीएनए में चला गया अविवेक किया तो वो भी डीएनए में चला गया फिर उसको रिवर्स करना बड़ा मुश्किल है सर्वप्रथम जो टेंप्टेशन आते हैं उसको आप मेहनत करके करके कैसे भी करके उससे आप बच सकते हैं बड़ा ही आपको स्ट्रगल करना पड़ेगा किंतु पॉसिबिलिटी इज देयर उसके बाद में यह मैंने कुछ कुछ वीडियोस देखे हैं जो लोग को यह सबब ड्रग्स वगैरह की हैबिट हो जाती है उनको यह जो सब वो सेनेटोरियम वगैरह में भेजा जाता है पेडे सेल यानी कि इस तरह का जेल का कमरा है जिसमें वोह गद्दिया बिछाई हुई है दवा दवार के ऊपर में जमीन के ऊपर में क्योंकि जब ये विथड्रावल हिट करता है उसको वो पागल हो जाएगा जोर-जोर से दीवाल प जमीन पर अपना सर पटके वो सुसाइडल हो जाएगा यदि उस समय उसको वो ड्रग ना मिली कितना करके फिर धीरे-धीरे करके ये उसका जो हैबिट है वो एडिक्शन जो है वो जाता है तो ये एडिक्शन जब एडिक्शन के लेवल प पहुंच गए तब छूटना बड़ा मुश्किल हो जाता है फिर तो आपको ठीक-ठीक मेहनत करनी पड़ेगी किंतु जब तक आप नए-नए हैं उस तो तब तक आपके पास में है कि कैसे भी करके स्ट्रगल करके चलो इससे छूट ले तो दिस इज द थिंग देखिए जब भी प्रलोभन सामने आता है एक नेचुरल टेंडेंसी है कि प्रलोभन को ग्रहण करें क्योंकि यह सब तो इवोल्यूशन से आई है ना अपने सर्वाइवल के लिए चाहिए रिप्रोडक्शन क्या है सर्वाइवल के लिए चाहिए यह आहार है अच्छा आहार है इससे अच्छी हेल्थ हो जिससे कि हम अच्छा शिकार कर पाए हमने जो ट्राइबल वरफेन जो होता है उसमें जीत पाए यदि बच्चे होंगे वगैरह होगा तो यह सब चीजें तो इवोल्यूशन ने हमको दी है ए सच तो वो ऐसा तो नहीं है नहीं कि यह गलत है बेसिकली साधना करनी है तो इससे आपको दूर जाना है अदर वाइज इवोल्यूशन की दृष्टि से तो वो ठीक ही है तो आपने ठीक ही कहा कि जद जैसे ही कुछ भी मेरे सामने आया अभी जैसे कि मान लीजिए कि एडिक्शन की ही बात ले लेते हैं फॉर एग्जांपल में एक एक सामान्य उदाहरण दूं मिठाई का तो अभी बहुत सारे लोगों को शुगर हो जाती है तो जब भी मिठाई सामने आई तो पहला तो इंस्टिंक्ट है कि मिठाई को खा ले बाद में देखा जाएगा इंसुलिन फि इंसुलिन वगैरह के बारे में पहला इंस्टिंक्ट है कि मिठाई को खा ले तो उस समय ये अवेयरनेस जद आप साधन करते हैं तो ये अवेयरनेस को आपको डेवलप करना है ये अपने सबकॉन्शियस के सामने तलवार लेकर के गार्ड की तरह खड़ी रहे और कहे कि जैसे ही यह सबकॉन्शियस चाहता है कि मैं इसको ग्रहण करूं वैसे ही ये अवेयरनेस इट बिकम एक्टिवेटेड और सबको को रोकता है फिर प्रैक्टिस करते करते करते देखेंगे कि यह अवेयरनेस से वो इंस्टिंक्ट हो जाएगी और वो जो पुरानी इंस्टिंक्ट है वह चली जाएगी यही है साधना ये ईश्वर की और मन क्यों नहीं जाना सहज रूप से मनुष्य का मन तमस की ओर जाता है रजस और तमस की ओर यदि सत्व की ओर ले जाना है तो आपको अवेयरनेस माइंडफुल डेवलप करनी होगी यह सतत निरीक्षण आत्म निरीक्षण करना होगा कि मेरे मन के भीतर में क्या च रहा है क्या मेरा मन प्रलोभन की ओर जा रहा है मेरा मन आलस्य की ओर जा रहा है मेरा मन क्या कंफर्ट की ओर जा रहा है तो रे डिटेक्ट करना है उसको फिर उसको डिटर करना है डिटेक्शन एंड डिटर ये दोनों कार्य यह विवेक करेगा यह माइंडफुल करेगा ये कंटीन्यूअस सेल्फ ऑब्जर्वेशन एंड कंटीन्यूअस सेल्फ करेक्शन यही है साधना जैसे पहले बहुत ही कष्ट होगा मैं 10 जद इंस्टेंस होते हैं मिठाई खाने के एक बार में अपने को रोक पाऊंगा तो चलो एक बार तो मैंने रोका इसके बाद में ऐसा हुआ कि दूसरे महीने में 10 बार मेरे सामने मिठाई रखी गई तो मैं दो बार अपने को रोक पाऊंगा तीसरे महीने ऐसा हुआ चौथे महीने कि अभी 10 बार मेरे सामने मिठाई रखी गई तो तीन बार में अपने को रोक पाया तो धीरे-धीरे करके ये डिटेक्शन एंड डिटेंस आत्म निरीक्षण और आत्म संयम ये बढ़ता जाएगा बढ़ता जाएगा आपके विल पावर आपकी संकल्प शक्ति को बढ़ाता जाएगा विवेक को जागृत करता जाएगा आखिर में एक ऐसा दिन आएगा कि 10 बार आपके सामने मिठाई रखी गई है आपने एक बार भी इसको ग्रहण नहीं किया अभी यह इंस्टिंक्टिव हो गया है कि जैसे ही मिठाई सामने आती है उसकी खुशबू आती है वैसे ही अपने मन में से पहला ही शब्द निकलता है नहीं चाहिए ले जा तो वो इंस्टिंक्टिव डीएनए लेवल प आ गया है तब कहीं जाकर के आप साधना में सिद्धि प्राप्त किए हैं तो दिस इज अ वेरी डिफिकल्ट पाथ किंतु इसके पर में चल चले बिना यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि की साइकिल कभी समाप्त ही नहीं होगी हम सबको इसको प्राप्त करना ही होगा तो अभी हजार जन्म भुगतने के बाद में लात खाने के बाद में मार खाने के बाद में इस रास्ते प चले उससे बेटर है कि थोड़ा सा जागृत होकर के आज ही से चलना शुरू हो जाए हो सकता है कि इस महीने 10 बार मिठाई आई तो दसों बार मैंने खा ली अगले महीने भी ऐसा हुआ किंतु एक तो दिन आएगा जबकि मैं पहली बार ना कहूंगा एक तो दिन दिन आएगा जबकि मैं दूसरी बार ना कहूंगा तो वो तो दिन तो जैसे जैसे मैं करूंगा इफ आई एम सिंसियर तो वो दिन तो आने ही आने हैं तो निष्फल से डरे बिना स्टार्ट फ्रॉम द बिगिनिंग स्टार्ट फ्रॉम टुडे आज ही सर्वप्रथम कदम लगा दो इस रास्ते के ऊपर में कभी ना कभी सिद्धि अवश्य प्राप्त होगी यह जो अमेरिका में योग इतना फेमस जो हुआ है ना आजकल अभी रिसेंट की बात कर रहा हूं व स्वामी जी के युग की तो बात एक अलग थी आजकल फेमस इसलिए हुआ है कि योगा स्टूडियो जो लोग कहते हैं जहां पर योगा प्रैक्टिस करते हैं उनको कहते हैं योगा स्टूडियो तो वहां पर य लोग कम्युनिटी का एक कांसेप्ट है कि जो लोग योगा करेंगे वहां पर उनका एक कम्युनिटी होता है सब लोग एक दूसरे के साथ में कंपेयर करेंगे कि भाई वो मैंने आज इतना घंटा प्रैक्टिस किया आज मैंने डायट इस तरह से किया आज मैंने इस तरह से स्टडी किया आज इस तरह से चैटिंग किया आज इतना प्राणायाम किया वो एक योगा कम्युनिटी तो बहुत सारे मैंने इस तरह से आर्टिकल योगा के पढ़े हैं तो मैं सोच रहा हूं कि योगा फिलोसोफी के बारे में आर्टिकल होगा नहीं वो कम्युनिटी के बारे में आर्टिकल है कि हाउ द कम्युनिटी सपोर्टेड मी मेंटली इमोशनली कि मेरे घर में स्ट्रेस था अभी वहां तो डाइवोर्स तो बड़ा ही कॉमन है तो सिंगल पेरेंट हाउसहोल्ड होते हैं मां है और बच्चा है दोनों दो ही लोग एक घर में है तो अभी वो मां अपने बच्चे के साथ में रह रही है वो कहती है कि मैं योगा स्टूडियो में आती हूं तो मेरे मन को एक सध्या पहुंचता है अ ये ट्रेडिशनल चर्च जो थे वो भी एक तरह से कम्युनिटी थे कि वहां पे आपको मानसिक सध्या मिले मेंटल सपोर्ट मिले उसके लिए जाते थे किंतु ऑर्थोडॉक्स उनकी इतनी बढ़ती गई कि आजकल के जो लिबरल जनरेशन है वो एकदम फेड अप हो गए अरे वहां पर जाकर के वो उल्टा हमको उपदेश देंगे क्यों डाइवोर्स लिया ये वो सब अभी मैं तो मैं वही करूंगा जो मुझे चाहिए तो एक एक फ्रीडम भी चाहिए एट द सेम टाइम इमोशनल सपोर्ट भी चाहिए तो योगा कम्युनिटीज आर कंसीडर्ड टू बी वेरी लिबरल वेरी ओपन माइंडेड वेरी एक्सेप्टिंग वेरी सपोर्टिव तो दिस इज वन ऑफ द मेजर फैक्टर इन सक्सेस ऑफ योगा तो आपने जैसे कहा वो ठीक ही है कि वो ऐसे कुछ लोगों के संगत में पड़ गए अभी ज से खास करके हम लोग बहुत बार सुनते हैं मेरा खुद का एक एग्जांपल बताता हूं कि स्कूल में बड़े अच्छे स्टूडेंट है जैसे ही कॉलेज में गए कुछ लोगों की ऐसी संगत आ गई कि पूरा उल्टे रास्ते प जाना शुरू कर दिया तो वो स्कूल का वातावरण ही ऐसा था कि टीचर जो थे बड़े अलर्ट रहते थे कि बच्चे कुछ गड़बड़ ना करे अभी कॉलेज में कौन किसको कहने वाला है वो प्रोफेसर जदी लड़के को कुछ बोलेगा तो सामने से झगड़ा करने को जाएगा वो कोई कुछ बोलने वाला नहीं है तो संगत एवी रंगत अप जम गुजराती मा कहिए तो जैसा संग है वैसा रंग है व्हाट यू शुड डू रिचार्ज योर बैटरी ड्यूरिंग दिस मॉर्निंग क्लासेस एंड ड्यूरिंग द डे फाइट विथ एवरीवन विथ दिस चार्ज पावर ट इज द ओनली सोल्यूशन एक बहुत काफी बार मैंने सुना है यह सब पढ़ते हैं ना कि एक वैसे तो एक सामान्य चोर था वो जेल में जाकर के बहुत बड़ा गुनहगार हो कर के बाहर आया क्यों जेल में सब बड़े-बड़े चोरों की मुलाकात होगी तो छोटी मोटी चोरी करने की बजाय बड़ी बड़ी चोरी करेगा ये अपने आश्रम में भी देखेंगे मैं खास करके राजकोट में देखता था कि जितने भी भक्त आते हैं सब आपस में इतना सुंदर उनका एक रिलेशन होता है सब लोग एक दूसरे के बारे में पूछते हैं एक दूसरे के घर जाते हैं फिर वो वहां पर ये व कुछ ना कुछ आयोजन करेंगे अपने घर पर ये पूजा का कीर्तन का और साधु लोग भी जाएंगे और बाकी भक्तों को भी इनवाइट करेंगे तो इससे बड़ा एक सुंदर वातावरण होता है ये कोई भी आप सभी अपने जैन धर्म में देखे कहीं पर भी देखेंगे अपने एक समाज होते हैं समाज का एक यह होता है कुछ ना कुछ मीटिंग होता है कुछ ना कुछ कार्यक्रम होता है सभी लोग जाते हैं अभी बात तो दुनिया भर की वही करते हैं किंतु देखेंगे कि आप अपने घर में इकट्ठा हो वही तीन चार आदमी और जिस तरह की बात करेंगे और मंदिर में वही तीन चार आदमी गए हैं और किस तरह की बात करेंगे जगह का प्रभाव एक बिल्कुल अलग है तो यह जो कम्युनिटी जो होती है वेरी पावरफुल फैक्टर टू सपोर्ट अस इन अवर स्पिरिचुअल जर्नी