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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 31 july 2024

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स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार षय कृष्णाय कल केमरा देखला कल हमने देखा कि किस अच्छा कल हमारा जो डिस्कशन हो रहा था इसके बारे में एक कल आखिर में जो एक प्रश्न हुआ कि ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में थे उस समय एक साधु ने आकर के ठाकुर की सेवा की थी तो उस समय प्रश्न हुआ कि उस समय यह हृदय कहां पर था तो इसके बारे में मैंने बाद में भी सोचा था थोड़ा सा कि हृदय तो वहीं पर ही कालीबाड़ी में ही होना चाहिए और एक तरह से हमने देखा भी कि सभी तरह की सेवा के कुछ कुछ अधिकारी होते हैं सभी लोग सभी तरह की सेवा के अधिकारी शायद नहीं भी होते हैं और इसमें मने अधिकार या तो फिर कहेंगे कि गुड फॉर्च्यून किसको किस चीज का गुड फॉर्च्यून होता है किस चीज की सेवा का अधिकार मिलता है यह भी एक देखने की बात है जैसे कि कल हमने देखा कि मां वहीं पर दक्षिणेश्वर में ही थी और ठाकुर को वहां पर ठाकुर की ऐसी हालत देख कर के फिर मां को भी उसने कहा कि मां आप चलिए आप ठाकुर की सेवा कीजिए आप ठाकुर को छोड़ कर के इस तरह से अलग एक घर में रहती है वह तो शोभा दयत नहीं है तो यह सुनकर के फिर मां भी वहां पर दक्षिणेश्वर वापस आई किंतु देखिए कि सर्वप्रथम तो सेवा इसी महिला ने की थी तो इसी तरह से देखिए कि इसके बारे में और भी कुछ-कुछ उदाहरण है जैसे कि मां मां उद्बोधन में रहती थी तो उस समय मां की सेवा करने के लिए वहां पर योगन महाराज थे फिर ये थे उस समय ये थे अपने केस्टो लाल महाराज मां उस समय उद्बोधन में थी और फिर शरद महाराज शरद महाराज मां की सेवा करते थे और साथ में कृष्णलाल महाराज भी थे जिनको की मां केस्टो लाल महाराज करके पुकारा करती थी तो एक एक दिन ऐसा आया कि शरद महाराज कहते हैं कि मुझे किसी काम की वजह से किसी सेंटर में जाना पड़ेगा और किसी अपने ऑर्डर के किसी सेंटर में तो जैसे ही शरद महाराज ने मां को यह बात कही तो माने पहले माने कहा इमीडिएट कि ठहरो पहले मैं यहां से उद्बोधन से जयराम पाटी में चली जाती हूं बाद में तुम जाना यहां से क्यों क्योंकि तुम जद नहीं होगे तो फिर यहां मेरी देखभाल कौन करेगा मां बंगाली में कहते हैं शरती आज जे हमार झुकी पहाते पारे अर्थात की मां को लेकर के जो जमेला है जो मां के साथ में ये जो सब पागल लोग रहते थे वो मां के परिवार जन वो फिर इन सब को लेकर के यह भक्त जनों का पागलपन इस सबके बारे में तो हमने देखा ही भूतकाल में तो यह सब जो एक सर पे लेकर के रहने वाली जो बात है यह सब शरत महाराज ही कर पाएंगे और कोई नहीं कर पाएगा ऐसा मां ने कहा तो उस समय मां की एक और डिवोटा वहां पर थी तो उसने कहा कि मां आप ऐसा क्यों कहती है कि सिर्फ शरद महाराज होंगे तभी आपको ठीक से यहां पर यत्न पूर्वक रख पाएंगे उद्बोधन में दूसरे भी तो साधु है जैसे कि बाबूराम महाराज है बेलूर मठ में राजा महाराज है राजा महाराज उस समय बलराम मंदिर में ही रहते थे तो पास में ही रहते थे तो राजा महाराज भी तो संभाल रख सकते हैं तो मां ने कहा कि नहीं देखो राजा जो है वो या तो दूर से सेवा करवा सकता है या तो फिर और किसी को देख कर के सेवा करवा सकता है या तो फिर दूर से सेवा कर सकता है वो जिस तरह से शरत महाराज पास में रह के सभी चीजों के ऊपर में एक एक बातों के ऊपर में नजर रख के जिस तरह से संभाल लेते थे इस तरह से राजा नहीं कर पाएगा ऐसा मानेक कहा था तो अभी प्रश्न होगा कि अरे राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं है उन्होंने ठाकुर के साथ में मां के साथ में इतने दिन बहुत सबसे पहले तो वही आए थे बाकी सब डायरेक्ट डि साइबल में योगन महाराज वहां पर रहते थे तो ठाकुर के साथ में सबसे पहली शायद मुलाकात उन्हीं की हुई थी उससे भी पहले हो सकता है शायद गंगाधर महाराज की हुई हो क्योंकि गंगाधर महाराज अर्थात की अखंडानंद जी महाराज तो अखंडानंद जी को ठाकुर ने एक बार पूछा पूछा था क्या रे तुमने मुझे पहले कभी देखा था तो अखंडानंद जी ने गंगाधर महाराज ने उत्तर दिया था कि हां मैं जब छोटा था तब आपको एक बार देखा था तो अी ठाकुर हसते हंसते रामलाल को बुला कर के कहने लगे कि देखो यह मतलब गंगाधर महाराज ऑलरेडी छोटी उम्र के थे 1617 के शायद होंगे उस समय तो बोलते है कि इसके छोटे मने ये बोलता है कि रावर छोट होआ माने यह जब छोटा था तो उसने मुझे देखा था ऑलरेडी छोटा है फिर बोल रहा है कि मैं छोटा था तब आपको देखा था तो सकता है कि लोगों ने पहले ठाकुर के साथ में ठाकुर के दर्शन किए हो स्वामी जी पहले आए थे 81 के आसपास में किंतु यह जो राजा महाराज है वो सबसे पहले आलो वालों में वही एक थे तो बाकी सब तो बाद बाद में आए हैं शरद महाराज शशि महाराज सुबोध महाराज विज्ञान महाराज बाकी सब लोग तो तो राजा महाराज इतने लंबे समय से मां के साथ में है ठाकुर के साथ में रह रहे हैं दक्षिणेश्वर में तो फिर वो क्यों नहीं मां की सेवा कर पाएंगे ये प्रश्न हो सकता है तो जो भी है माने इस तरह से उस समय कहा था कि राजा हो सकता है कि दूर से सेवा करेगा या तो फिर और किसी को देकर के सेवा करवाएगा वो खुद सेवा का इतना बार नहीं ले पाएगा तो देखिए कि सेवा किसके पास में आप करवाते हैं कौन सी सेवा यह भी तो एक बहुत बड़ा प्रश्न है राजा महाराज काशी की बात है कि काशी में उस समय काशी सेवाश्रम में दो दल बन गए थे दो ग्रुप बन गए थे और दोनों ग्रुपों में उस समय थोड़ा सा डिफरेंस ऑफ ओपिनियन जैसा लग रहा था तो उस समय ऐसा हुआ कि किसी ने कहा कि शरत महाराज को बुलाया जाए क्योंकि काशी सेवाश्रम तो स्वामी जी के जो शिष्य थे चारू बाबू उन्होंने एस्टेब्लिश करने वालों में उनका एक बड़ा नाम था तो फिर इतने पुराना सेवा श्रम है इतनी सेवा करता है साधु में जदी दल बन जाते हैं व सेवा नहीं होती लोगों की यह तो ठीक नहीं है यह तो अच्छा नहीं हो तो चलो शरद महाराज को बुलाया जाए तो शरद महाराज को बुलाया गया शरद महाराज ने वहां जाकर के काफी दिन रहे भी सही किंतु दो दलों में जो अनबन है जो डिफरेंस ऑफ ओपिनियन है वो तो वैसे का वैसा ही बना रहा तो अभी किया क्या जाए तो उस समय फिर आखिर में राजा महाराज को वहां पर जाना पड़ा और राजा महाराज जाकर के ऐसा नहीं है कि दोनों दलों के सभी सदस्य सभी साधुओं भक्तों को इकट्ठा बिठा करके आपस में क्या झगड़ा है तुम्हारा क्या प्रॉब्लम है इसको सॉल्व करो ये ऐसा कुछ नहीं वहां पर जाकर के सिर्फ रह रहे हैं और रह रहे हैं और सिर्फ ठाकुर की बातें कर रहे हैं और साधन भजन कर रहे हैं वो उनका जैसा है कि वो कल हमारी बात हुई थी ना उनका राजा महाराज का फोटो है कि वो कुर्सी प बैठे थे यी चेयर पे और वो जो हुको पीते पीते हुक्का पीते पीते वो कहीं ईश्वरीय ध्यान में मग्न हो जाते थे और उनके साथ में सब बाकी सब साधु ब्रह्मचारी रहते थे जैसे कि अंबिका नंद जी महाराज वगैरह तो कि गाने बजाने में बहुत ही एक्सपर्ट हुआ करते थे तो वहां भजन के बाद भजन चलते रहेंगे राजा महाराज बस भजन सुनते सुनते ईश्वरीय ध्यान में मग्न होते रहेंगे तो एक ऐसा एक सुंदर एटमॉस्फियर बन जाता था तो राजा महाराज के वहां जाते ही बिना किसी डिस्कशन के बिना किसी व की कि इसका क्या प्रॉब्लम है ऐसा कुछ नहीं बस वहां पे जाके रहे और सब झगड़ा सब विवाद सब मन भेद मन दुख एक साथ में खत्म हो गया और सभी के भीतर में वहां के जितने भी साधू थे कर्मचारी थे उनके भीतर में फिर से एक भाईचारे की भावना जागृत हो गई तो देखिए कि राजा महाराज की वो कैपेसिटी है कि अपने संघ की उन्होंने कितनी सेवा की है जहां-जहां प भी गए हैं वहां वहां पर साधन भजन का एक ऐसा प्रवाह उन्होंने बहाया है कि उसको देख कर के उसको सुन कर के सभी लोग मंत्र मुक्त हो जाए और सभी का मन ईश्वर की ओर धावित होना शुरू हो जाए तो ये राजा महाराज के बारे में मां कहती है कि नहीं राजा शरत जितनी सेवा करता है उतनी मेरी सेवा नहीं कर पाएगा दूर से करेगा या तो फिर और किसी को दे कर के करवाएगा खुद नहीं कर पाएगा तो यह तो एक एग्जांपल है दूसरा एक है कि ठाकुर जब काशीपुर में थे तो काशीपुर में उस समय धीरे-धीरे करके मतलब ठाकुर को कैंसर हो गया था और उनको फिर ज्यादा अच्छे से ट्रीटमेंट करने के लिए चिकित्सा और सेवा करने के लिए कलकाता बुलाया गया दक्षिणेश्वर कलकाता से दूर है डॉक्टर को आने जाने का भक्तों को बार-बार आने जाने की असुविधा होती थी काशीपुर में बुलाया गया काशीपुर कलकाता में ही है पास में ही है तो वहां पर एक उद्यान गृह उसको भाड़े प लेकर के ठाकुर को रखा गया अभी ठाकुर वहां पर रह तो रहे हैं किंतु देखिए कि धीरे-धीरे करके ठाकुर की अवस्था और ज्यादा से ज्यादा खराब होती गई और ज्यादा से ज्यादा बिगड़ती गई तो अभी जैसे ठाकुर की अवस्था बिगड़ती गई वैसे ही सभी भक्तों को और ज्यादा चिंता होने लगी कि अभी ठाकुर तो लग रहा है कि लीला संवरण करने के उन्होंने ठीक कर लिया है पृथ्वी पर रहने वाले नहीं है ऐसा हमको लग रहा था आखिरी एक दिन ऐसा आया कि ठाकुर अपने बिस्तर के ऊपर में से वो खड़े होकर के शौच भी नहीं जा पाएंगे शरीर इतना दुर्बल हो गया उससे पहले तो वो शोच जाते थे अपने से जाते थे जैसे हमेशा सभी लोग करते हैं किंतु धीरे-धीरे करके शरीर की परिस्थिति ऐसी आ गई कि सोच भी नहीं जा पाएंगे वो अपने से तो अभी वो क्या करेंगे तो जैसे ही ठाकुर ने सभी भक्त बैठे थे ठाकुर के ये जो त्यागी लड़के हैं ठाकुर के भक्तों में दो गुरुप उस समय को गए थे एक थे कि जो कि मास्टर महाशय है रामचंद्र दत्त है सुरेश मित्र है वगैरह कि जो लोग अपने घर पे रह कर के प्रतिदिन वहां काशीपुर में आते थे वहां पे चिकित्सा अर्थात कि जिस डॉक्टर को दिखाना है उस डॉक्टर के साथ में जाकर के डॉक्टर को होम विजिट के लिए ले आना उसके उसके पैसों का जो खर्च होता है वह सब बंदोबस्त करना खाने पीने के लिए जो सब चीजें चाहिए मां भी तो उस समय वहीं पर रहती थी तो किचन भी वहां पर चलता था तो किचन में कोई कोई जिस चीज की जरूरत हो उसको खरीद करके ले आना वैसा सब बाहर का जितना भी काम है यह सब गुरुही भक्त करते थे और यह जो बाकी सब लड़के थे यंग लड़के जो कि ठाक की प्रेरणा से प्रेरित होकर के उन्होंने घर छोड़ कर के वहीं पर आकर के रहना शुरू किया और साधन भजन के रूप में ठाकुर की साक्षात सेवा करने का उन्होंने एक प्रयास यज्ञ प्रारंभ किया उस समय ठाकुर ने सभी भक्तों को कहा कि अभी ऐसी परिस्थिति आ गई है कि मैं खड़े होकर के शोच के लिए भी नहीं जा पाऊंगा तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा वैसे ही लाटू महाराज कहते हैं अरे महाशय उसमें आपको चिंता की क्या बात है आमी तो अी अपना मेथर मैं तो हूं आपका मेथर मेथर अर्थात की ये जो टॉयलेट लेटन क्लीन करते हैं ऐसे लोग ऐसे लोगों को मेथर कहा जाता है वो एक ना जात भी है शायद तो जो भी है यह पुराने जमाने की सब बात है तो लाटू महाराज ने इमीडिएट कहा कि ठाकुर शोच चाहते हैं बिस्तर के ऊपर में बैठ कर के ही तो वो क्लीन करने की जवाबदारी तो मेरी है मैं तो हूं आपका मेथर ऐसा लाटू महाराज ने इमीडिएट कह दिया तो देखिए कि बात-बात में भी मैंने देखा कि वैश ठाकुर के सर्वश्रेष्ठ शिष्य कौन है एक तो है उनके मानस पुत्र राजा महाराज दूसरे कि उनके जो आध्यात्मिक वारसे के अधिकारी आध्यात्मिक वारसे के जो संपद जिनको उ जिसके भीतर में ठाकुर ने समग्र शक्ति अपनी संचारित कर दी वो है स्वामी जी स्वयं नरेंद्र स्वामी विवेकानंद तो इन दोनों को यह काम नहीं दे करर के कि राजा महाराज या स्वामी जी ठाकुर शो च चाते हैं बिस्तर पर बैठ के तो उसको साफ करने का काम इनको नहीं देक के लाटू महाराज ने ही वैसे तो लाटू महाराज ने सामने से उसको स्वीकार किया है किंतु यदि ठाकुर की इच्छा नहीं होती तो वो तो सामने से बोलने पर भी तो वो नहीं कर पाते तो इस तरह से अभी जैसे कि ठाकुर का खाना ब्राह्मण ही बनाएगा शशि महाराज ब्राह्मण थे तो शशि महाराज ठाकुर के खाने की सब व्यवस्था करते थे ठाकुर को खिला वठ मा वैसे तो मां ठाकुर का खाना लेकर के आती थी तो मां जद नहीं रहेगी या तो मां को सहाय करने के लिए है तो फिर शशि महाराज है ब्राह्मण शरीर है इनका तो देखिए कि किस तरह से किसको क्या सेवा अधिकार मिलता है और ये एक बहुत बड़ी बात है समझने की दूसरा है कि चलो अभी हमको ऐसा लगेगा कि अरे शौच साफ करना और ठाकुर का खाना बनाना इन दोनों में तो आसमान जमीन का अंतर है एक हीन कार्य है एक उच्च कार्य है क्या हमको ऐसा नहीं लगता तो हम एक बाह्य एक व्यवहारिक दृष्टि से यह सब सोचते हैं कि जब हम ईश्वर की सेवा करते हैं तो किसी-किसी को निम्न तरह का कार्य मिलता है किसी-किसी को उच्च तरह का कार्य मिलता है जैसे कि अब मैं मेरा ही उदाहरण दूं तो बेलूर मठ में दुर्गा पूजा होती है तो दुर्गा पूजा अर्थात कि एक ऐसा आनंद और आध्यात्मिकता का प्रवाह बहेगा कि जिन लोगों ने इस पूजा को अपनी नजरों से देखा है वही लोग इसको समझ पाएंगे तो उस समय जितने भी साधु ब्रह्मचारी है बेलूरमठ में सभी को कुछ ना कुछ सेवा का मौका मिलेगा कि आपको कहीं पे जहां पे भक्तों के प्रसाद की व्यवस्था है वहां पर खड़े रहना है यह लाइन वगैरह मैनेज करना है किसी को ठाकुर भंडार है उसमें सेवा मिलती है कि चंदन घिसना है मां को वस्त्र पहनाने हैं मां को श्रृंगार करना है किसी-किसी को मंडप में डिसिप्लिन मेंटेन करने की सेवा का मौका मिलता है किसी-किसी को यह टेलीविजन अभी तो बांगला टेलीविजन पे वो लाइव टेलीकास्ट होता है तो वो टेलीविजन और यह जर्नलिस्ट वगैरह सब आते हैं तो उनको मैनेज करने की सेवा मिलती है तो कोई होता है कि वहां पर मेडिकल कैंप लगता है हजारों हजारों लोग तो मुलाकात दर्शन के लिए आएंगे किसी को कुछ भी हो सकता है तो वहां पर एक मेडिकल कैंप रहेगा वहां पर वो सन्यासी महाराज जी रहेंगे दो तीन डॉक्टर सन्यासी और फिर बाकी पूरा डॉक्टरों का टीम रहता है वो तो वो लोग वो सेवा करते हैं तो सबको कुछ ना कुछ सेवा मिलती है तो वहां पर पूरा एक लिस्ट बना कर के सबको सुनाया जाता है सभी लोग बैठे हैं और एक बैठे में फिर वो एक सीनियर स्वामी जी होते हैं वो सुनाते हैं कि इसको यह सेवा इसको यह सेवा इसको ये ऐसा करके तो हम लोग सब बैठे थे पूरे और वहां पर सेवा में सबका नाम एक के बाद एक तो आखिर में मेरा नाम आया तो अभी सबकी एक ऐसी इच्छा होती है कि ठाकुर भंडार में सेवा का कार्य मिले तो सबसे अच्छा है कि मां के लिए पुष्प चयन करना है चंदन गि सना है माला बनानी है ना ठाकुर भंडार में बहुत कार्य होते हैं और ऑलमोस्ट 202 साधुओं का वहां पे नियुक्ति होती है अपॉइंटमेंट होती है उस सेवा करने के लिए तो मैंने सोचा कि ठाकुर भंडार में यदि मिले तो कितना अच्छा होगा वहां पे सतत एक सतत बाहर में भजन भी चल रहा है भीतर में भी पुजारी महाराज वहां पर बैठे हुए हैं जब वो पूजा नहीं करेंगे तंत्र धारक महाराज वहां प बैठे रहते हैं जब वो पूजा नहीं चलती है उस समय तो कितना सुंदर होगा किंतु जब मेरा नाम आया लिस्ट में तो मुझे पता है क्या सेवा दी गई थी वहां पे जूता घर है वहां पर खड़े रहना है तो मैंने कहा कि ये तो लिटरली चंडी पाठ से जूता सिलाई तक का हो गया कि सोचा था कि चड्डी मंडप में ठाकुर भंडार में सेवा मिलेगी उसकी बजाय जूता घर में सेवा मिली है तो ठीक है अभी मिली है तो मिली है क्या करेंगे वहा तो कुछ बोलना नहीं है सीधा जूता घर में वो जो चार पांच दिन जो पूजा चलती है वहां पर वैसे तो बेलर मट में एक जूता घर है जनरली व किंतु ऐसे जब बड़े उत्सव होते हैं ठाकुर की पूजा ठाकुर उत्सव हो होता है या तो फिर ठाकुर की जन्मतिथि पूजा होती है या तो फिर यह दुर्गा पूजा होती है तो एक अलग से बड़ी साइज का एक टेंट उसमें जूता घर अलग से बनाया जाता है क्योंकि बहुत सारे लोग आते हैं तो वहां पर मैं खड़ा रहा तीन चार दिन और अपने हाथों से मैंने वो भक्तों के जूते लेकर के यदि जरूरत पड़ जाए तो उसको वो जिस वो जो पता है ना छोटे-छोटे वो शेल्फ होते हैं उसमें रखना अपने हाथों से यह कार्य मैंने किया क्योंकि थिरी तो हम सबको पता है कि जद चंडी मंडप में भी मने दुर्गा मंडप में भी जद सेवा का हमको मौका मिले तो वो उसी भाव से करना है जितना कि हमको मतलब जूते घर में जद हमको सेवा का मौका मिले सेवा का कार्य मिले तो उसको उसी भाव से करना है जिस भाव से हम दुर्गा मंडप में कार्य करते हैं दुर्गा पूजा में कार्य करते हैं तो थिरी तो पता है किंतु देखिए कि मन कभी-कभी नहीं मानता मन में कभी-कभी ऐसा होता है कि अरे जो बाकी जो मेरे जितने भी मित्र थे तो को मैंने देखा कि वहां ठाकुर भंडार में दुर्गा मंडप में उनको ड्यूटी मिला है तो ठीक है अच्छी बात है उसमें कुछ बोलना नहीं है तो देखिए कि हमको थिरी तो पता होती है कि जो भी कार्य हमको दिया जाए जो भी सेवा का मौका दिया जाए उसको हमको एक ही तरह की निष्ठा से करना है किंतु मन कभी-कभी नहीं मानता कि अरे मुझे इस इस तरह की नहीं और उस तरह की सेवा करनी है ये वो तो उस समय अपने संघ की यह जो नीति है जो पहले से ही रीति चली आई है कि जिसको किस तरह की सेवा का अधिकार है वो भी तो एक देखना है कि यदि मान लीजिए कि ठाकुर भंडार में मुझे सेवा का कार्य मिलता है तो एक्चुअली वहां पर होना क्या चाहिए पता है कि यदि आप ठाकुर भंडार में सेवा करते हैं जैसे कि चंदन खींचते हैं तो आपका मन सतत ईश्वरीय भाव से मग्न रहना चाहिए हम लोग जब मंदिर में पूजा करते हैं मंदिर में जो कोई भी कार्य होता है जैसे कि माला बनानी है तो जो सीनियर साधु हम लोगों को बताया करते थे जब हम ट्रेनिंग सेंटर में थे और उससे भी पहले कि जैसे माला में एक पुष्प यदि ग्रत करते हो तो प्रत्येक पुष्प के साथ में एक एक मंत्र जप करना है जैसे मान लीजिए मेरा मंत्र है जय श्री राम तो गुरु ने मुझे दिया है फॉर एग्जांपल तो यदि माला में मैंने एक पुष्प डाला तो जय श्री राम फिर दूसरा पुष्प डाला तो जय श्री राम तीसरा पुष्प डाला जय श्री चंदन किस्ते हैं तो प्रत्येक जो कार्य है अपना प्रत्येक एक्शन है मन में सतत मंत्र जप होना चाहिए तभी अपना यह जो मंदिर में किया हुआ कार्य वो ठीक-ठीक चलेगा वहां पर मन जद 10 चीजों में बटा हुआ है या तो फिर बगल में अपना मित्र खड़ा है उसके साथ में दुनिया भर के गप लगा रहे हैं तो मुंह में से जो थूंक गिरेगा वो चंदन के पात्र के ऊपर में पुष्प के पात्र के ऊपर में या पूजा के पात्र के ऊपर में वो तो बड़ा ही अशुभ कहा जाएगा मुंह बंद रख के मौन व्रत अवलंबन करके मन में ईश्वरीय प्रवाह सतत बहते बहते यह पूजा का कार्य करना है अभी यह हालांकि ऐसा सभी लोग करते नहीं सब समय होता भी नहीं किंतु मुझे मुझे नहीं लगता कि मुझे यदि ठाकुर भंडार में यदि ड्यूटी मिला होता तो मैं उस इतना अच्छे से मैं यदि सेवा का कार्य कर पाता तो क्या है कि मुझे लगा कि मेरा मन वैसे ही 10 चीजों में 10 जगह पर घूमता है तो बेटर है कि ऐसे मन को लेकर के जूते घर में ही काम करें बिना मतलब ठाकुर घर में काम करेंगे कहीं उल्टा पुल्टा कुछ हो जाएगा मन में 10 विचार दूसरे चलते होंगे यहां पर मैं कुछ कर रहा हूं पूजा का पात्र सजा रहा हूं वो बिना मतलब का पाप लग जाएगा बेटर है कि जूते घर में रहते हैं तो क्या है कि जिसको जिस तरह की सेवा का अधिकार प्राप्य है उसको उस तरह की सेवा मिलती है ऐसे अपने संघ में हमेशा से होता रहा है तो आज थोड़ा सा आगे देखते हैं अच्छा कल हमने जो ठाकुर ने भक्ति के बारे में जो कहा इसके बारे में हमने थोड़ा सा चर्चा विचार किया था भक्ति दो तरह की होती है एक तो है वैध भक्ति दूसरी है रा रागा क्म भक्ति अभी वैध भक्ति अर्थात की यह जो हमने देखा ना कि जनरली स्पिरिचुअल जर्नी क्या है तो नेति नेति करके आपको सबसे पहले त्याग करते करते ईश्वर को कैसे भी करके प्राप्त कर करना है और एक बार ईश्वर प्राप्ति हो जाए या तो आत्मदर्शन शब्द वापर यूज करो ना कि ये ईश्वर दर्शन शब्द का व्यवहार करो आप भक्ति मार्ग पर चल रहे हैं कि ज्ञान मार्ग पर चल रहे हैं आप ज्ञानी है ना कि भक्त है जो भी है द्वैत आप विश्वास करते हैं द्वैत द्वैत के सिद्धांत में ना कि अद्वैत सिद्धांत आपको त्याग करके ही ईश्वर को प्राप्त करना है बिना त्याग के और कोई उपाय नहीं है कर्म और ज्ञान शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म और ज्ञान एक ऐसे चीज है जो दो साथ में नहीं चल सकते कर्म का त्याग करके ही आपको ज्ञान होगा तो यह कर्म त्याग अर्थात कि यह कामना वासनाओं का त्याग ये सब साथ साथ में मिले हुए हैं कामना वासना है षड रिपु है पंच क्लेश है काम कांचन के प्रति प्रलोभन है तो उसके उसमें से ये बीच में से कर्म प्रकट होगा ही होगा तो यह कामना वासनाओं रूपी जो बीज है उसको दगद बीज करके योग शास्त्र का शब्द है उस बीज को जड़ समेत इस वृक्ष की जड़ समेत उसका निकंदन लाकर के उसका सफाया करके तब कहीं जाकर के ईश्वर प्राप्ति होगी और जब ईश्वर प्राप्ति होगी तब हृदय खुल जाएगा उसके बाद में ईश्वर के प्रति संपूर्ण निर्भरता आती है परमहंस जैसा हो जाता है बालक जैसा हमारा स्वभाव इसको कहते हैं रागा आदम का भक्ति फिर आपको मेहनत करके प्रयास करके चेष्टा करके किसी पर भक्ति नहीं लानी वो भक्ति अपने से ही आ जाती है वो भक्ति के बिना आप रह ही नहीं पाएंगे तो भक्ति भी या तो फिर यह अवस्थाएं दो तरह की है एक साधक की एक सिद्ध की ये मैं जब कथामृत आप पढ़ते हैं तो आपको बार-बार ठाकुर भक्ति की महिमा गाते हुए सुनाई देंगे बार-बार ठाकुर कहेंगे कि अरे जो भक्त है वो नहीं चाहता कि मैं ईश्वर का मैं ईश्वर के साथ में सब समय रहूं ईश्वर का दर्शन करूं मतलब ईश्वर साक्षात हो जाऊं वो हमेशा एक अंगुल तफावत रखना चाहता है थोड़ा सा एक सेपरेशन रखना चाहता है अपने और ईश्वर के बीच में जिससे कि वो लीला संभोग कर सके जिससे कि वो ईश्वरीय आनंद का व अधिकारी हो सके ईश्वर के साथ में एक कोई ना कोई संबंध बना कर के ईश्वर के साथ में लीला कर सके किंतु ये जो डिस्क्रिप्शन है वो तो सिद्ध होने के बाद में है इ करके आप जगत में वापस आते हैं यह मन बुद्धि चित्त अहंकार यह पंच महाभूत यह जो पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रीय ये जितना भी पंच तन मात्राए जो कुछ भी आप 24 तत्व देख रहे हैं सब कुछ ईश्वर के ही बने हुए ईश्वर के अलावा और कुछ है ही नहीं यह ज्ञान जब हो जाएगा तब का वर्णन ठाकुर यहां पर कर र है इसलिए बहुत बार ऐसा लगेगा कथामृत पढ़ करर के कि ठाकुर भक्ति का ही प्राधान्य क्यों सब समय भक्ति को ही प्राधान्य क्यों दे रहे हैं सब समय तो बात ऐसी नहीं है कि भक्ति एसे साधना के बारे में वो बात कर रहे है कांटेक्ट के ऊपर में है भक्ति अर्थात की मने जो रागा आत्मिका भक्ति अर्थात की इती इती करके वापस आने के बाद की ठाकुर बात कर र है अभी आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं पहले तो भक्त के बारे में ठाकुर ने बात कर दी कि भक्त कहता है कि हे भगवान तुम प्रभु हो मैं तुम्हारा दास हूं तुम्ही ही मां तुम मैं तुम्हारा संतान हूं और तुम पूर्ण हो मैं तुम्हारा अंश हूं भक्त ऐसी बात कभी नहीं करेगा कि मैं ब्रह्म हूं उसके बाद में ठाकुर फिर से कहते हैं कि योगी भी परमात्मा को साक्षात्कार करने की चेष्टा करता है जीवात्मा और परमात्मा का योग करने की चेष्टा करता है विषय जितने भी है जितने भी मन के प्रलोभन के जो जो जो कुछ भी हमारे मन को प्रलोभन करती है कभी-कभी हमको क्या है कि खास करके मैं पब्लिकेशन में था तो मुझे बहुत सारी चीजें परचेस करनी पड़ती थी अपने डिपार्टमेंट के लिए जो स्टेशनरी है पेन है बहुत कुछ जो कुछ भी छोटा मोटा है तो उसके लिए फिर में हमने एक क्या किया कि बाजार में जाकर के खरीदने की बजाय बहुत सारा कुछ हम लोग ये ऑनलाइन ऑर्डर दे देते थे तो अभी आप ऑनलाइन ऑर्डर दे रहे हैं तो अभी ये जो वहां पे जो लड़का काम करता है वो लड़के ने आकर के कहा कि ये पोंछा लगाने के लिए जो पछा है वो टूट गया है नया चाहिए या तो फिर यह जो टेबल है वहां पर काच के काच की दीवारें बनी हुई है तो काच के पार्टीशन बने हुए हैं तो उसको क्लीन करने के लिए वो जो एक केमिकल आता है ना स्प्रे करें फिर उसके ऊपर में कपड़े से साफ करें तो काज क्लीन हो जाएगा तो ये चाहिए वो चाहिए आ करर के कुछ ना कुछ डिमांड करेगा तो फिर मैं ऑनलाइन उसको परचेस करने के लिए वो जो ऑनलाइन सब साइट होती है amazonaws.com क्या आपको ये चाहिए क्या आपको ये चाहिए और अपना मन भी ऐसा प्रलोभन भर के लिए कि हमको ये पूछा चाहिए मोप चाहिए उसको छोड़ कर के बाकी सब हम लोग देखना शुरू कर देते हैं एक बार मैं कॉफी पीता था वहां पे तो वैसे एक दो बार ऑनलाइन कॉफी परचेस किया भी था तो एक एक दिन ऐसा हुआ कि कुछ परचेस कुछ करना है कुछ किसी दूसरे पर्पस के लिए गए हैं और ये बिकॉज की अपनी पास्ट हिस्ट्री तो रहती है ना ये सब साइट में तो अपनी पुराने जो जो खरीद किया है उसके बेस प आपको रिकमेंडेशन देना शुरू कर देता है तो यह रिकमेंडेशन एक के बाद एक बढ़िया कॉफी के वो प्रोडक्ट वो रिकमेंड करना शुरू कर दिया यह यहां की कॉफी है यह यहां की कॉफी है मैंने कहा अरे इस तरह की विभिन्न तरह की कॉफी मिलती भी है वो भी तो मुझे नहीं पता कॉफी पाउडर तो मैं देख रहा हूं देख रहा हूं ऐसे ऐसे करते करते आधा घंटा चला गया पता ही नहीं चला फिर वो लड़ता करके पूछता है कि क्या आपने ऑर्डर दे दिया मैंने कहा अरे बाप रे मुझे कॉफी खरीदनी नहीं है एक बार खरीद ली सो खरीद ली दूसरी बार क्या है दूसरा है कि महंगी कॉफी तो खरीद नहीं सकते जो कि सामान्य जो मिलता है वो वो अपना बजट भी तो लिमिटेड रहता है तो ये ये लिमिटेड बजट में जो कुछ खरीदना है खरीदना है तो वो कहां 000 2000 00 ऐसा सब देख कर के हमको लाभ क्या है जो खरीदना ही नहीं है किंतु जो ह्यूमन क्यूरियोसिटी होती है ये ह्यूमन प्रलोभन जो होता है हम चाहे मुंह से कितनी ही बातें करें प्रलोभन की चीजें नजर के सामने आ जाती है तो इसको बिना देखे मन को खींच लेना वापस लगभग असंभव हो जाता है वहां पे हम लोग जैसे कि ये स्टेशनरी है तो स्टेशनरी या इलेक्ट्रॉनिक्स कोई भी आइटम खरीदेंगे तो अभी ये जैसे ही वो amazon2 देना शुरू कर देगा रिकमेंडेशन देना शुरू कर देगा ये नया मोबाइल आया है ये नया ईयरफोन आया है नया ये आया आप देखते ही रहेंगे देखते ही रहेंगे देख अच्छा इसका इतना रुपया है इसमें ये फीचर है इसमें ये सब नया इंप्रूवमेंट है ये इसका नया वर्जन है लेना कुछ नहीं है किंतु देखने का ही एक प्रलोभन ऐसा होता है कि आधा घंटा एक घंटा कहां चला गया पता नहीं चलेगा तो यह प्रलोभन के विषय बड़े अपने हृदय के भीतर में जड़ बना कर के बैठे हुए हैं इसको सबसे पहले तो समझना कि भाई यह प्रलोभन है इसका त्याग करें जद मैं पछा खरीद करने के लिए अजन पर जाता हूं या जीत लिया किंतु ऐसा नहीं है प्रलोभन एक ऐसी सूक्ष्म चीज है कि एक के बाद एक एक के बाद एक आप इसका त्याग करेंगे तो दूसरे रूप में आ जाएगा उसको छोड़ेंगे तो तीसरे रूप में आ जाएगा तीसरे को छोड़ेंगे तो चौथे रूप में आ जाएगा कैसे ना कैसे आकर के हमारा गला पकड़ेगा ही पकड़ेगा ये जन्म जन्मांतर की प्रक्रिया है सब समय अलर्ट रहना है सब समय अवेयर रहना है कि मुझे कौन सी चीज ऐसी है जो कि मुझे पकड़ कर के ये संसार की ओर घसीट लेना चाहती है ये प्रलोभन से अवेयर रह कर के सब समय अपना एक सेल्फ रिफ्लेक्शन एक सेल्फ असेसमेंट एक विवेक ये विवेक ही इसी चीज को विवेक कहते हैं स्वामी जी ने क्यों इतना सुंदर नाम पसंद किया विवेक अर्थात कि परमहंस परमहंस के सामने आप हीरे रख दे और पत्थर रख दे तो पत्थर छोड़ कर के हीरो को ही खाएगा तो ये है परमहंस तो परमहंस होना है हमको और कुछ नहीं होना ठाकुर ने खुद ने कहा कहा था कि एक बार कविराज ने एक ऐसा औषध दे दिया जिसमें पानी बिल्कुल भी नहीं चलेगा यहां तक कि यह जो खाना भी जो कुछ खाना है वगैरह कुछ भी है तो इसके ऊ इसमें से भी आपको पानी जो है वो साफ करके देना है तो ठाकुर ने मां को कहा कि तुमको जो है बिना पानी के बिल्कुल एकदम ड्राई करके देना है तो माने पूछा कि क्या आप इस तरह से खा पाएंगे तो ठाकुर ने इमीडिएट कहा मैं परमहंस हूं पाति हंस थोड़ी ना हूं सामान्य हंस थोड़ी ना हूं सिर्फ में मोती ही खाऊंगा और कुछ नहीं खाऊंगा तो ऐसा ठाकुर ने इस तरह से कहा था ये विवेक ऐसा जागृत होना चाहिए कि प्रलोभन की कोई भी चीज आ जाए सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रलोभन विभिन्न विभिन्न रूप धारण करके हमको यह समझ में आना चाहिए कि यह प्रलोभन है कभी-कभी एक बार मैं किसी के साथ में बात कर रहा था तो एक साधु के साथ में ही तो व ये गिफ्ट टिकट मिलता है गिफ्ट वाउचर वगैरह मिलते हैं यदि आप कुछ परचेस करते हैं तो ये गिफ्ट वाउचर को उसको आप के बेस पे आप दूसरा कुछ खरीद सकते हैं तो मैं उसके साथ में बात कर रहा था मैंने देखा कि वो कोई ना कोई गिफ्ट वाउचर खोल कर के बैठे हैं उसी के लेक के वो सब चिंता कर रहे हैं कि इसमें से क्या लूंगा क्या नहीं लूंगा पूरा मैं एक एक आध घंटे तक उनके पास में बैठा रहा हूं वो उनका उसी में चिं उसी में मन है कि मैं इससे क्या करूंगा तो मैंने सोचा कि ये भी एक कैसी एक माया है आपने सब कुछ छोड़ कर के आए हैं यहां पे और यहां पे आकर के ना कि साधु संग करेंगे ना कि कोई अच्छी दो बातें करेंगे वो नहीं ये गिफ्ट व से मैं क्या खरीदूंगा वही चिंतन चल रहा है तो यह देखिए कि प्रलोभन कैसे रूप से स्वरूप बदल कर के आता है और अपने अपने को कैसे मूर्ख बनाता है मैं प्रलोभन नहीं हूं मैं कोई एसेंशियल चीज हूं ऐसा करके आकर के मूर्ख बनाता है तो योगी सभी विषय के ऊपर में से अपने मन को वापस लेकर के परमात्मा में स्थिर होने की चेष्टा करता है किंतु यह कब की बात है प्रारंभिक अवस्था की बात है ठाकुर भक्ति के बारे में जो कहा वह रा रागा मिका भक्ति के बारे में कहा इति इति करके जब आप सिद्ध होकर के संसार में वापस आते हैं आपका मन सोने का हो गया है इसको कुछ भी स्पर्श नहीं करेगा उस समय की और योगी के बारे में जो बात की साधन अवस्था की आखिर में ठाकुर कहते हैं यह पूरा जो सेक्शन है यह पूरा जो पैराग्राफ है इसके अंत में यह टॉपिक के अंत में ठाकुर कहते हैं किंतु एकही वस्तु परंतु एक ही सत्ता है नाम भेद मात्र नाम सिर्फ अलग अलग है जिनी ब्रह्म तीनी आत्मा तीनी भगवान जो ब्रह्म है वही आत्मा है वही भगवान है ब्रह्म ज्ञानी का ब्रह्म योगी के परमात्मा और भक्त के भगवान एक तीन तीन एक इसके बाद में ठाकुर आगे कहते हैं अभी एक नया टॉपिक चालू हो रहा है मास्टर महाशय इसको टाइटल देते हैं इसको यह देते हैं वेद और तंत्र समन्वय वेद और तंत्र का समन्वय आध्या शक्ति श्वर जो आध्या शक्ति का ऐश्वर्य मास महाशय लिखते हैं एक अने पोत कोलकातार अभि मुखे चोली दे यहां पर यह जो जहाज है कलकाता की ओर जा रहा है घरेर मध्य श्री रामकृष्ण के जहारा दर्शन और तहर अमृतम कथा श्रवण करते छन तरा जहाज चते छ कि ना एक कथा जानी हो पारी लेना यहां पर जहाज कलकाता की ओर जा रहा है किंतु जो लोग जिस केबिन में बैठ कर के ठाकुर की अमृतम वाणी सुन रहे हैं उनको यह समझ में भी नहीं आ रहा है कि जहाज चल रहा है ना कि स्थिर खड़ा है इतने ठाकुर की बातों में वो तल्लीन हो गए हैं भ्रमर पुष्पे बोसले आर की भन भन कोरे भ्रमर क्या पुष्प पे बैठ कर के मधुपाल करता है तब क्या वह गीत गाएगा ठाकुर ने पहले एक बार एक सुंदर उदाहरण दिया है जब जमवार चलता है भोजन समारोह तो पहले पहले तो बहुत हल्लागुल्ला होता है यह दही लाओ मिठाई लाओ पूरी लाओ लची लाओ वगैरह वगैरह किंतु एक बार जब उनके पात्र में खाना सब आ जाता है और सब लोग आहार प्रारंभ कर देते हैं तब कोई भी तरह का शब्द नहीं सुना जाएगा तब सिर्फ सुख सुख अर्थात कि खाने की आवाज सिर्फ सुनाई देगी और यह भ्रमण भ्रमण के बारे में भी यह मधुमक्खी के बारे में भी ठाकुर एक सुंदर उदाहरण देकर के कहते हैं कि जब मधुमक्खी जब पुष्प को खोज रही है तभी वह उसकी आवाज सुनाई देगी तभी उसका वो जो कुछ ना कुछ शब्द सुनाई देगा उसकी पंख पंखों की आवाज या जो कुछ भी है किंतु एक पुष्प के ऊपर में बैठ कर के मधुपाल करना प्रारंभ कर दे तब उसकी आवाज बिल्कुल शांत हो जाएगी किंतु हां कभी-कभी पुष्प पान करते करते गुनगुना करके कोई गाना गा लेगी ऐसा कुछ होगा किंतु जनरली उस समय साइलेंस होगा तो देखिए कि जब आप सत्संग प्रारंभ होता है खास करके ठाकुर जब ईश्वरीय कथा वार्ता करते हैं तो अपना शरीर मन आसपास में कौन बैठा है हम कहां जा रहे हैं सब कुछ भूल करके ठाकुर के ही वाणी में सभी लोग त तली और तन्मय हो गए हैं तो इसलिए मास्टर महाशय कितना सुंदर लिखते हैं भ्रमर पुष्पे ले आर की बोन भन कोरे भ्रमर क्या पुष्प में विराजित होकर के मधु पान करेगा कि तब क्या फन फन करके आवाज करेगा नहीं करेगा क्रम पोत दक्षिणेश्वर छाड़ धीरे धीरे पत अर्थात की जहाज दक्षिणेश्वर छोड़ कर के आगे बढ़ने लगा सुंदर देवालय छवि दृश्य पटे बहिर भूत होलो सुंदर देवालय की छवि दृश्य पट से अंतर निहित हो गई दृश्य पट से अर्थात की आंखों के सामने से विलीन हो गई पोत चक्र विक्षुब्ध लाभ गंगा बारी तरंगा फेनिल कलोल पूर्ण होई ते लागी लो पूरी पोएट्री है पोत चक्र विक्षुब्ध अर्थात की जहाज का जो चक्र होता है उससे जो तरंगे जिसमें फैलती है नीलाभ जो कि नील आकाश का कनर रंग धारण किए हुए हैं वो गंगा वारी वो गंगा का जल वो गंगा नदी तरंगा फेनिल कलोल पूर्ण होते लागी लो तरंग पूर्ण यह जो फीन यह जो सर्फ उसके ऊपर में खड़ होता है उसके कलोल से पूर्ण होने लगी भक्तो देर ने से कलोल आर पछ लोना किंतु यह जो तरंगों का कलोल है सुमधुर संगीत है भक्तों के कानों में भक्तों के कण में प्रवेश किया ही नहीं तरा मुक्त होया देखीते छन वे लोग मुग्ध होकर के देख रहे हैं दर्शन कर रहे हैं सहावन आनंदमय प्रेमानुरागम होकर के सहस्य वदन आनंदमय प्रेम से रंजित नयन वाले प्रिय दर्शन एक अद्भुत योगी इस अद्भुत योगी का वे लोग दर्शन कर रहे हैं तरा मुक्त होया देखीते छन भक्त लोग सब श्रोता वृंद मु हो कर के देख रहे हैं सर्व त्यागी एक जन प्रेमिक वैरागी सर्व त्यागी एक प्रेमिक वैरागी ईश्वर ई आर किछु जाने ना ईश्वर के अलावा इनको और कुछ पता नहीं है ईश्वर के अलावा यह और कुछ नहीं जानते ठाकुर एकद के कोथा चते और यह लोग दर्शन भी कर रहे हैं साथ साथ में ठाकुर की वाणी पूरे प्रवाह से बह रही है ठाकुर की बातें यहां पर चल रही है श्री राम कृष्ण ठाकुर क्या कहते हैं वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी रा बोले सृष्टि स्थिति प्रलय जीव जगत ऐव शक्ति खेला वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी कहते हैं कि सृष्टि स्थिति प्रलय जीव जगत यह सब शक्ति के इलाके में है शक्ति के खेल है विचार करते गले शश स्नव जद आप विचार प्रारंभ करेंगे वस्तु विचार विवेक विचार कि क्या यह जीव जगत यह प्रलय सृष्टि स्थिति यह सब सही है इसका सही स्वरूप क्या है इसके पीछे असली सत्ता क्या है तो यह जैसा आप विवेक विचार प्रारंभ करेंगे देखेंगे शो सनव यह सब स्वप्न वत है ब्रह्म वस्तु आर श अस्तु ब्रह्म ही वस्तु है आर सब अवस्तर है शक्तियो स्वप्नत अस्तु शक्ति भी स्वप्नवउम हम ध्यान करछ हम चिंता करछ सब शक्ति लाक म मैं ध्यान कर रहा हूं मैं विचार कर रहा हूं मैं चिंतन विवेक विचार कर रहा हूं यह सब कुछ शक्ति के इलाके के शक्ति के राज्य के भीतर में है शक्ति ऐश्वर्य मध्य शक्ति के ऐश्वर्य के भीतर में है ताई ब्रह्म आर शक्ति अभेद इसीलिए ब्रह्म और शक्ति अभेद है एक के मान ले आर एकटी के मानते होए एक को यदि आप स्वीकार करेंगे बोलेंगे मैं ब्रह्मण को स्वीकार कर रहा हूं तो साथ-साथ में आपको शक्ति को भी स्वीकार करना पड़ेगा जेमोन अग्नि आरता दाही का शक्ति जैसे कि अग्नि और उसकी दहि का शक्ति यथा निर दहि का शक्ति जैसे मां के स्तोत्र में है अग्नि मान ले दहि का शक्ति मानते होए अग्नि मानक मानने के साथ-साथ में ही दाही का शक्ति को मानना पड़ेगा दाही का शक्ति छड़ा अग्नि भाबा जाए ना दाही का शक्ति छोड़ कर के अग्नि को आप सोच ही नहीं सकते जैसे कि अग्नि है उसके पास में जैसे ही आप हाथ को लेकर आएंगे आपको जलन होगा आपको गर्मी लगेगी क्योंकि अग्नि और उसकी गर्मी यह दोनों एक ही फिनोमिना के दो डिफरेंट डिफरेंट एस्पेक्ट है कभी ठंडा नहीं हो सकता अग्नि के साथ में उसका जो कैरेक्टरिस्टिक है उसका जो गुणधर्म है दहि का शक्ति उसकी ज्वलन उसकी ऊर्जा यह ऊर्जा अग्नि के साथ में हमेशा जुड़ी हुई रहेगी एनर्जी जिसको मॉडर्न लैंग्वेज में कहेंगे एनर्जी सूरज के बाद दिए सूरज रश्मी भाबा जायना सूर्य रश्मी के छेड़े सूर्य के बाबा जायना सूर्य को छोड़ कर के सूर्य के किरण की चिंता नहीं कर सकते सूर्य के किरण को छोड़ कर के सूर्य की कल्पना नहीं कर सकते सूर्य और सूर्य की रश्मी या तो फिर सूर्य सूर्य के किरण एक ही चीज है दोनों एक ही माने जो सूरज के भीतर में जो फ्यूजन रिएक्टर चलता है उसी में से यह सूरज बना है और उसी में से यह सूर्य की शक्ति सूर्य की ऊर्जा सूर्य की सूर्य काता सूर्य की गर्मी प्रकट होती है अच्छा अभी यह जो पूरा ठाकुर ने कहा कि अग्नि और दहि का शक्ति सूर्य और उसकी रश्मी या उसके किरण इसके बारे में विशेष विचार हम कल करेंगे आ प श अ त श यह भी अच्छी बात है कि सब समय सजग रहना होगा सजग रहने से ही माया भाग जाएगी किंतु जैसे प्रश्न भी बड़ा अच्छा है कि मैराथन में मतलब यह तो लंबी जर्नी है तो कथामृत में बड़ा ही सुंदर दृश्य है कि ठाकुर एक नर्तकी की एक ये करके मने एक नर्तकी का अभिनय करके अपने संतानों को सुनाते हैं सबकी वो कैसे नर्तकी जब वो इस तरह से नृत्य करती नृत्य तो नहीं कि किस तरह से उसके जो ये होते हैं बात करने का तरीका फिर वो उसके उसका बिहेवियर किस तरह का होता है किस तरह से वो जो नथ पेनी है लंबी तो नथ उठा कर के वो थूक द है या तो फिर वो जो नर्तन करते करते नृत्य करते करते कोई भी एक कोई एक आदमी आता है उसके भीतर में तो किस तरह से उसको आवकारो नर्तकी किस तरह से बिहेव करती है यह पूरा ठाकुर अभिनय करके दिखाते हैं और ये जितने लड़के लोग हैं हंसते हंसते जमीन पे वो पूरे आलोट पालोट हो जाते हैं वो इतना हंसी मजाक का य चलता है तो देखिए कि उसके बाद में ठाकुर कहते है कि देखिए कि मैं सब समय उनको यह बीच-बीच में जो है आचार वगैरह भी खिला देता हूं सब समय सात्विक आहार नहीं बीच-बीच में आचार भी खिलाता हूं हंसी मजाक भी थोड़ा सा करवा देता हूं वरना यह लोग यहां पर आएंगे क्यों तो यह ठाकुर खुद इस तरह से अभिनय करते थे हंसी मजाक करते थे गप लगाते थे किंतु यही ठाकुर जब मास्टर म शय और नरेंद यह दोनों बात कर रहे हैं कि स्कूल के लड़के आजकल बहुत बिगड़ गए हैं और यह जो बच्चों के जो वाली है उनको देखना चाहिए कि ये बच्चे लोग किसके साथ में बात करते हैं कहां जाते हैं तो ठाकुर ने जैसे यह सुन लिया वैसे ही वह नाराज हो गए हालांकि बात करने वाला था नरेंद किंतु डांट पड़ गई मास्टर महाशय को ये क कि नरेंद्र तो भी बच्चा है उसको तो पता नहीं तुम बड़े हो तुमको तो यह सब बातें को बीच में ही रोक लेना चाहिए था क्यों सब फालतू की बातें कर रहे हो तो दोनों है कि देखिए कि जिसको कहेंगे कि सात्विक एंटरटेनमेंट वो ना हो ऐसी तो कोई बात ही नहीं है हमारे आश्रम की ही बात करूं कि जब भी प्रेसिडेंट महाराज है वाइस प्रेसिडेंट महाराज है वोह आश्रम में आते हैं दीक्षा देने के लिए जो एक सप्ताह न कि ऐसा कुछ रुकते हैं तो ऐसा आनंद की बोचार उड़ती है सब रात को सब साधु ब्रह्मचारी महाराज के साथ में बैठते हैं महाराज जो होते हैं अभी जैसे रिसेंटली जैसे राजकोट में मैं था तो अ अपने सुहितानंद जी आए थे गौतमानंद जी आते थे यह दोनों को तो तीन चार बार आते हुए मैंने राजकोट में देखा है तो स सब साधु भक्तों के साथ में रात को बैठ कर के ऐसी हंसी मजक मजाक चलेगी कि बड़ा ही आनंद आ जाएगा तो ये जो सात्विक एंटरटेनमेंट है वो किसी साधु की मजाक करेंगे कोई पुराने दिनों की बात करेंगे गल्प करेंगे तो देखिए जो सात्विक एंटरटेनमेंट या तो फिर जिसको कहेंगे कि सत्संग का ही दूसरा स्वरूप ये तो होना ही चाहिए जीवन में साधक जीवन कोई गंभीर जी वन तो नहीं है स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो सभी लोग बोलते थे आप इतने जोली क्यों है आपका नेचर आप इतने हंसते क्यों रहते हैं जनरली ये जो क्रिश्चियन प्रचारकों को देखा था पादरी है ना कि फादर है वहां के जो भी है बड़े गंभीर होकर के रहते थे तो स्वामी जी कहते हैं कि मुझे पेट में दर्द नहीं हो रहा है कि मैं मुंह बिगाड़ करके बैठा रहा हूं मैं तो अमृत का संतान हूं तो अमृत का संतान होने के नाते हंसी मजाक करना तो यह तो सहज है हमारे लिए तो यह जो है सात्विक एंटर नमेंट या तो फिर कहेंगे कि सत्संग सत्संग का ही एक दूसरा स्वरूप है वो तो होना ही चाहिए जीवन में किंतु एक बात है कि ये जो एंटरटेनमेंट के भी प्रकार होते हैं सात्विक भी होता है राजसिक भी होता है तामसिक भी होता है तो यह थोड़ा सा एक विवेक रख कर के अपने जितने भी इस तरह के विचार वाले लोग हैं उनके साथ में हंसी मजाक गप लगाना वो सब बीच-बीच में होना चाहिए जिससे कि क्या होता है कि जो सतत साधना होती है उसमें थोड़ी सी ब्रेक आ जाती है