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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 6 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार [गाना गाने की आवाज़] वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् कथित 16th दिसंबर 1883 दोपहर को 4 बजे है जनाई के एक मुख बाबू ठाकुर के साथ में वार्ता वार्तालाप कर रहे थे। अभी उन्होंने विदाई ग्रहण की। विदाई विदाई लेने के लिए खड़े हुए तो ठाकुर भी उनके सम्मान के लिए सम्मानार्थ थे। खड़े हुए तो मुख ने हंसते-हंसते पूछा आपको फिर उठने और बैठने की क्या जरूरत है? तो ठाकुर ने सहस्य उत्तर दिया कि उठने और बैठने में क्षति भी क्या है? नुकसान भी क्या है? जल स्थिर स्थिर रहने पर भी जल है। हलन चलन करता है तब भी वही जल है। जड़ में तूफान में एक झूठा पत्ता जहां पर भी उसको तूफान या पवन ले जाए वहां पर वह जाएगा। और फिर आखिर में कहते हैं मैं यंत्र वो यंत्री। हमने देखा था कि किस तरह से ठाकुर के यह जो दो-तीन सेंटेंस है ठाकुर की पूरी फिलॉसोफी और योग साधना को एनकैप्सुलेट करते हैं। किंतु बिफोर कि हम ठाकुर की साधना साधन पद्धति हमको जो उन्होंने निर्देश की है और ठाकुर का यह जो दर्शन अभी हम ठाकुर को ऐसा कोई सिस्टमेटिक फिलोसोफर नहीं कहेंगे। ठाकुर ने तो सब कुछ अनुभव करके अपनी आंखों से देखकर के जो कुछ है उन्होंने हमको कहा है। माने ठाकुर का हमारी तरह जैसे अभी हम बाद में ही देखेंगे थोड़ा सा कि किस तरह से मास्टर महाशय कहते हैं कि ठाकुर दुर्बल मनुष्यों की तरह विचार नहीं करते। उनको तो जगन माता सब कुछ साक्षात दर्शन करवा देती है। तो यह ठाकुर का जो दर्शन है उसके बेस पे उन्होंने यह दो-तीन सेंटेंस कहे हैं और इसका तात्पर्य या तो इसका अर्थ समझने से पहले हम लोग

अजातिवाद का दार्शनिक सौंदर्य

हिंदू धर्म की यह जो तीन मुख्य फिलॉसोफीस है रामानुजाचार्य का विशिष्ट अद्वैतवाद, गौडपादाचार्य का अजातिवाद और शंकराचार्य का यह विवर्तवाद या तो फिर यह मायावाद या तो फिर कहेंगे अद्वैत वेदांत। उसका थोड़ा सा चर्चा कर रहे थे। वैसे तो देखा जाए तो गपादाचार्य का जो यह अजातिवाद है उसको भी आप अद्वैत शब्द दे सकते हैं। किंतु देने में प्रॉब्लम यही है कि अद्वैत जहां पर दो नहीं है वहां पर एक है। किंतु गडपादाचार्य तो जो दूसरा जो है जीव और जगत और ईश्वर उसको इस तरह से उड़ा देते हैं कि दो नहीं एक ऐसा कहना ही मुश्किल है। एक ही है और कुछ नहीं है। तो एनीवे इसका हम एक फ्रेमिंग देख रहे थे कि बिफोर कि हम ठाकुर की ओर चले। ठाकुर ने क्या कहा है उसका तात्पर्य समझे। यह जो तीन मुख्य फिलॉसोफीस है उसका एक कंपैरेटिव एनालिसिस और एक फ्रेमिंग देख रहे थे जिससे कि हमको पता चले कि एक्चुअली फिर ठाकुर जो कहते हैं उसका तात्पर्य क्या है? तो कल हमने क्या देखा? देखिए मैंने यहां पे एक बड़ा ही सिंपल एक इक्वेशन बनाया है। मैं आपके साथ में शेयर करता हूं। है बहुत ही सिंपल है वैसे देखिए यहां पर गपादाचार्य का है निर्गुण ब्राह्मण अर्थात कि ब्राह्मण ही है और कुछ नहीं है जगत है मात्र स्वप्न जिस तरह से हम नींद में स्वप्न देखते हैं वैसे ही जागृत अवस्था में भी यह जगत रूपी स्वप्न देखते हैं और जो निर्गुण निराकार ब्राह्मण है वही है अल्टीमेट रियलिटी तो ये एक्चुअली सुनने में बहुत अच्छा लगता है। एक जो जिन लोगों का फ़िलॉसोफिकल इंटेलेक्चुअल बेंट ऑफ़ माइंड है, उनको यह प्योरिस्ट टाइप ऑफ़ फ़िलॉसोफी बहुत अच्छी लगती है कि हां यह मेसी जगत जगत और जगत की यह सब मतलब जंजाल माने जगत में तो सब जंजाल ही है ना। जगत तो पूरा मेसी जगत है। आज इसके साथ में युद्ध हुआ, कल यह हुआ, कल वो हुआ। हम लोग ये इकोनॉमी पढ़ते हैं, हिस्ट्री पढ़ते हैं। ये क्वांटम डायनेमिक्स पढ़ते हैं। जगत का कुछ सेंस निकालने का प्रयास करते हैं। जितना पढ़ते जाएंगे अल्टीमेटली पता चला कि जगत की कॉम्प्लेक्सिटी और भी ज्यादा है। और भी ज्यादा है। तो हमको लगेगा कि अरे भाई क्या है यह सब? किंतु जैसे ही गौडपादाचार्य ने यह कहा कि जगत स्वप्न ही है और कुछ नहीं। जैसे नींद से जग जाएंगे, वैसे ही स्वप्न अदृश्य हो जाएगा। हमको तृप्ति होती है कि हां चलो यह झूठ-मूठ का हम यह इंटेलेक्चुअल कैपिटल वेस्ट कर रहे हैं। यह सब समझने के लिए, सोचने के लिए टू ट्राई टू मेक ए सेंस ऑफ वेरी मैसी रियलिटी। तो देखिए कि वह सब चीजों की जरूरत नहीं है फ्रॉम द जिसको कि

अजातिवाद का नैतिक संकट : जब कुछ उत्पन्न ही नहीं हुआ, तब पाप और पुण्य क्या हैं?

फर्स्ट प्रिंसिपल कहते हैं यूजुअली थिंकिंग सिस्टम में कि निर्गुण निराकार ब्रह्मण इज द फर्स्ट प्रिंसिपल एंड ओनली एंड ओनली सोलली बेस्ड ऑन दिस फर्स्ट प्रिंसिपल यू कैन अंडरस्टैंड एवरीथिंग एल्स इन दिस यूनिवर्स। तो वह एक हमको बड़ा अच्छा लगता है। किंतु हमने साथ में यह भी देखा था कि यदि यह इसका प्लस पॉइंट है कि निर्गुण निराकार ब्राह्मण आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है। सर्वोच्च सत्ता है तो उसका एक व्यवहारू पार्ट जो है वहां पर कुछ ना कुछ हमको गड़बड़ दिखाई देती है। अभी देखिए कल हमने देखा था यूजुअली जो जिसको हम ब्राह्मण कहते हैं और उसके बाद का ये जो रियलिटी है रियलिटी को हम तीन मेजर पार्ट में डिवाइड कर सकते हैं या तो रियलिटी के तीन कंपोनेंट है। एक तो है ईश्वर है फिर जगत है। तीसरा जीव है। तो आप यदि कहेंगे कि निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही है। ना ही ईश्वर है ना ही जगत है ना ही जीव है। तो अभी देखिए यदि ईश्वर नहीं है तो मैं आराधना किसकी करूंगा? मैं शरणागत किसको होऊंगा? और यदि मैं शरणागत नहीं हो पाऊंगा तो फिर मेरा घमंड जो है मेरा अहंकार जो है मुझे आध्यात्मिक जीवन में आगे नहीं बढ़ने देगा। तो यह एक प्रॉब्लम आता है ईश्वर के साथ में। ईश्वर के नहीं रहने से। दूसरा है कि जगत देखिए जगत अर्थात कि जगत पेड़पधे पशुपंखी को तो चलो हम फिर भी डिलीट कर सकते हैं। नहीं है तो नहीं है। बहुत ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं। हालांकि पेड़ पौधों में से और पशुपंखियों में से ही अन्न बनता है और वही अन्न हम ग्रहण करते हैं। किंतु फॉर फिर भी फॉर द सेक ऑफ आर्गुमेंट चलो कि और कुछ नहीं है। सिर्फ मनुष्य ही है जगत में। तो अभी देखिए कि आप दूसरे मनुष्य के प्रति सदव्यवहार करेंगे ही क्यों? यदि यह मनुष्य यह असत है। अब स्वप्न का आप देखिए स्वप्न में यदि कोई मैं रास्ते से जा रहा हूं। यहां पर कोई दरिद्र व्यक्ति बैठा है तो मैं थोड़ी ना उसको सहाय करने को जाऊंगा। स्वप्न में यह सब सहाय करने की लोगों को क्या जरूरत है? क्योंकि क्या है कि यदि मैं उनको सहाय करने को जाऊंगा और जब स्वप्न भंग हो गया तो जिसको मैंने सहाय की थी जो सहाय करने का कर्म है वह सब अपना तात्पर्य गवा बैठेगा तो उस सहाय करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। तो एथिक्स और मोरालिटी का एक क्वेश्चन खड़ा होता है। तीसरा है देखिए जीव। जीव अर्थात कि मैं अभी मैं सिर्फ अपना मन बुद्धि चित्त अहंकार ही नहीं अपना यह पंचमहाभूत का देह जो बना है उसको भी ले लेता हूं यहां पे तो अभी देखिए स्वप्न में यदि मेरे पैर में कांटा लगा या तो फिर मैं गिर गया और मेरा पैर टूट गया तो मैं कोई डॉक्टर के पास में नहीं जाने वाला। क्यों? क्योंकि मुझे पता है कि डॉक्टर के पास जाकर के पैर ठीक करवाने से वह सब प्रयोजन हीन है। जैसे ही नींद खुली वह सब चीजों का कोई तात्पर्य नहीं रहेगा। जब तक मैं स्वप्न में हूं, स्वप्न की एक सत्ता है अवश्य। किंतु इस सत्ता का कोई लॉजिकल यह नहीं है। जितना लॉजिकली हम यह जो जागृत अवस्था में सोचते हैं, पैर टूटा है, बीमार हुए हैं तो डॉक्टर के पास जाना है, उतना सिमिलर लॉजिक हम स्वप्न में कभी नहीं लगाते। स्वप्न कैसे चित्र विचित्र आते हैं। कैसे इलॉजिकल होते हैं। कैसे कंप्लीटली इररेशनल होते हैं? इस बात का हम सबको पता है। तो देखिए कि अपना शरीर जो है सबसे प्रिय है। या तो फिर उस शरीर का हमारे अपने ऊपर में इतना बड़ा गहन असर है। उसकी भी केयर करना स्वप्न में आवश्यक नहीं है। किंतु देखिए वास्तविकता में क्या होता है। जागृत अवस्था में जागृत अवस्था में यदि हम यह कहें कि ईश्वर नहीं है तो फिर प्रॉब्लम यह होगा कि हम किसके सामने अपने ईगो को सरेंडर करेंगे। दूसरा है कि यदि जीव नहीं है अर्थात कि अभी चलो मैं मान लेता हूं जगत नहीं है। ठीक है चलो किंतु जब मैं यह कहता हूं जीव नहीं है तो यह बात मैं कह ही नहीं सकता। चलो बिना ईश्वर के फिर भी रह लेंगे। बिना जगत के फिर भी ले रह लेंगे। किंतु बिना जीव के अर्थात कि मेरे देह की संभाल रखे बिना मैं कैसे रह सकता हूं। यदि मुझे जीवन टकाना है, मुझे आराधना करनी है तो मुझे अन्न तो ग्रहण करना होगा। अभी मैं यदि अपने लिए अन्न ग्रहण करता हूं और बगल में कोई भूखा आदमी बैठा है और फिर मैं यदि उसके साथ में शेयर नहीं करूंगा। यह कह के कि वह जो दरिद्र व्यक्ति है, वह जो भूखा व्यक्ति है, वह तो स्वप्न मात्र है। स्वप्न में क्या हम किसी को भिक्षा देने को जाते हैं? स्वप्न में क्या किसी को सहाय करने को जाते हैं? नहीं जाते। तो जागृत अवस्था वह भी तो स्वप्न है। तुरीय अवस्था ही तो अल्टीमेट रियलिटी है। तुरीय अवस्था की लेवल से देखें तो जागृत अवस्था स्वप्न मात्र है। तो फिर मैं क्यों जागृत अवस्था में किसी को सहाय करूं। देखिए यह जो अपने से खाना खाना और उसको गरीब लोगों के साथ में भूखे लोगों के साथ में ना बांटना अर्थात कि यह अन्न शुद्धि ना करना। अपने से अकेले-अकेले खाना इससे बड़ा और बुरा और कुछ नहीं है। यह अन्न शुद्धि है, धन शुद्धि है। करना ही चाहिए। खाना बांट के ही खाना चाहिए। धन बांट के ही उसका उपभोग करना चाहिए। तो क्या है कि जो प्योर अजातवाद फॉलो करते हैं उन लोगों के लिए कोई रैशनल नहीं रह जाता है। धन शुद्धि करने का या अन्न शुद्धि करने का। देह की संभाल लेंगे। देखिए पैराडॉक्स कहां पर आ जाता है? देह की संभाल लेंगे क्योंकि बिना देह के तो चलेगा नहीं। तोतापुरी जैसे तोतापुरी को पेट में दर्द हुआ तो गंगा में देह त्याग करने को गए थे। तो क्या है कि देह की तो संभाल लेनी ही पड़ेगी। आप कितना ही बड़े वेदांती हो बिना खाए, बिना विश्राम किए, बिना कुछ ना कुछ शारीरिक कंफर्ट के आप कैसे जीवन बिता सकते हैं? जब तक देह है तब तक यह जीव, जगत और ईश्वर दो तीनों है। बिना यदि देह नहीं है हमारा कॉन्शियसनेस यदि आप क्लाउड पर अपलोड कर देते हैं। आजकल जिस तरह से चल रहा है यह तो क्लाउड पर अपना कॉन्शियसनेस अपलोड करके वह कंप्यूटर के भीतर में यदि रह रहे हैं और फिर यदि कहते हैं जीव, जगत, ईश्वर तीनों मिथ्या है तो परहेप्स वो शायद वो वर्कआउट हो सकता है। और किसको पता यह अजातिवाद उस लेवल पर जब हम पहुंच जाएंगे कि देह के साथ में भी हमारा संबंध चला जाएगा। अपनी कॉन्शियसनेस को कंप्यूटर एक माइक्रो प्रोसेसर में फिट करके उसको एक रोबोट की बॉडी में बिठा देंगे। तो जो भी काम करना है रोबोटिक बॉडी के थ्रू करवाएंगे। अदरवाइज अपना कॉन्शियसनेस इज फ्री विद इन दिस माइक्रोपर। यदि उस लेवल पर पहुंच जाते हैं तो फिर भी अजातिवाद थोड़ा बहुत वर्कउ हो सकता है। किंतु जब तक हम देह के साथ जुड़े हैं तब तक यह ईश्वर और जगत यह दोनों को नकारना संभव नहीं है। ईश्वर के सामने शरणागति होनी ही चाहिए। तभी घमंड कम होगा और फिर लोगों को सहाय तो करनी ही चाहिए। तभी स्वार्थ परता कम होगी। वरना तो फिर लोगों को सहाय नहीं करेंगे। भयानक स्वार्थी हो जाएंगे। ईश्वर की प्रति शरणागत नहीं होंगे। भयानक घमंडी हो जाएंगे। यानी कि एक तो देह की चिंता करेंगे यानी मटेरियलिस्ट हो जाएंगे। दूसरा लोगों को सहाय नहीं करेंगे। भयानक स्वार्थी हो जाएंगे। ईश्वर की आराधना नहीं करेंगे। भयानक घमंडी हो जाएंगे। यानी इसका जो व्यवहारू एस्पेक्ट है अजातिवाद का वह थोड़ा सा प्रॉब्लमेटिक है। अभी मेरी दृष्टि से एथिक्स और मोरालिटी यदि मैं प्योर अजातिवाद को फॉलो करता हूं यह जगत यदि स्वप्न ही है तो मैं स्वप्न में क्यों एथिक्स एंड मोरालिटी फॉलो करूं मेरी दृष्टि से उत्तर यह होना चाहिए यदि अजतिवाद सही है और इन अ वे आई मायसेल्फ लीन टुवर्ड्स दैट तो मैं यह कहूंगा कि एथिक्स और मोरालिटी का पालन करके हम इस स्वप्न को तोड़ सकते हैं और स्वप्न में से जागृत हो सकते हैं। यदि मैं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करता हूं, संपूर्ण रूप से निस्वार्थता का पालन करता हूं, संपूर्ण रूप से शरणागति या ईगोलेसनेस का पालन करता हूं, तो फिर मैं यह जागृत अवस्था में तुरीय अवस्था में पहुंच पाऊंगा। यानी कि पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए एथिक्स एंड मोरालिटी एकमात्र साधन पद्धति है। तो एथिक्स एंड मोरालिटी का इन अ वे इस क्रूशियल इन अजातिवाद किंतु प्रॉब्लम यही है कि इतना अंडरस्टैंडिंग या तो फिर इतना विडम शायद सभी लोगों में नहीं होगा। तो फिर क्या है

परमार्थ और व्यवहार: अजातिवाद की नैतिक समस्या पर शंकराचार्य का समाधान

शंकराचार्य ने इसको थोड़ा सा माइल्ड करने का प्रयास किया है। जगत को दो रियलिटी में बांट दिया है। कहा है कि निर्गुण ब्रह्म तो है ही है। साथ में एक एक्स्ट्रा प्रिंसिपल ऐड होता है। वह है माया। और यह माया के माध्यम से जीव जगत और ईश्वर बनते हैं। यहां पर एक परमार्थिक सत्ता है और यह व्यावहारिक सत्ता है। व्यावहारिक सत्ता में जीव जगत ईश्वर तीनों है। यानी कि आपका देह भी इतना ही सत्य है। व्यावहारिक लेवल पर यह जो दरिद्र नारायण है, रोगी नारायण है, वह भी इतने ही सत्य है। और यह जो मां काली कहो ना मां जगदंबा कहो वह भी इतने ही सत्य है फ्रॉम दी व्यावहारिक पॉइंट ऑफ व्यू यहां पे क्या है कि अद्वैत जो आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च सिद्धि है निर्विकल्प समाधि से प्राप्त होने वाले निर्गुण निराकार ब्राह्मण उसको भी मेंटेन किया है और फिर यह जो व्यावहारिक आवश्यकताएं हैं डे साधन पद्धति जो है साधना के लिए जिसकी की आवश्यकता है वह है जीव जगत ईश्वर इन तीनों को भी स्वीकार किया है। जीव जगत और ईश्वर तीनों का यदि आप ये कर दें माइनस कर दें तो आप साधन करेंगे किस तरह से है ना बाकी सब तो आप छोड़ ही दीजिए एथिक्स मोरालिटी वगैरह कि मैं जगत में कैसे रहूंगा मैं स्वार्थी हो जाऊंगा चलो वो सब कंसीडरेशन छोड़ भी दीजिए किंतु ये निर्गुण निराकार ब्राह्मण को प्राप्त करने के लिए जो उपासना करनी है वह जीव जगत और ईश्वर ये तीनों की एक तरह से फ्रेमवर्क नहीं रहे बिना आप उपासना भी कैसे कर सकते हैं। यह जो शुद्ध महावाक्य विचार या तो स्मरण मनन निध्यासन यह रास्ता सबके लिए नहीं है। दूसरा कि शास्त्र में ही उपनिषद में ही बार-बार सृष्टि की रचना के बारे में वर्णन आता है। मैं एक हूं। मैं बहुत होना चाहता हूं। आई एम वन। आई वांट टू बी मल्टीप्लाई। इस तरह से जो सेंटेंस है शास्त्र के भीतर में उपनिषद के भीतर में तो इसकी व्याख्या आप कैसे करेंगे? यह जो गडपादाचार्य ने कारिका लिखने के लिए मांडूक्य उपनिषद को ही सिलेलेक्ट क्यों किया? क्योंकि मांडूक्य उपनिषद एकमात्र एक ऐसा उपनिषद है मेजर उपनिषदों में से कि जहां पे सृष्टि की रचना या तो फिर यह मल्टीप्लीसिटी या तो वैविध्य वो सब वहां पे किसी भी तरह का डिस्कशन ही नहीं है। सीधा-सीधी यह जो चार स्टेट्स ऑफ एग्जिस्टेंस है स्वप्न, जागृत, सुशुप्त और तुरय यह कॉन्शियसनेस क्या है? किस तरह से ये चार लेवल पर कॉन्शियसनेस को समझ सकते हैं। किस तरह से यह वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ और तुरीय यह अवस्थाएं क्या है? और फिर ओमकार इसका इसके साथ में ओमकार साधना का इसके साथ में क्या कनेक्शन है? बस वहीं तक यह उपनिषद लिमिटेड है। बोलकर के गडपादाचार्य ने मांडूक्य उपनिषद के ऊपर में ही अपनी कारिका तैयार की है। और कोई भी उपनिषद पे यदि वह लिखने को जाते तो उनको यह जगत की उत्पत्ति या तो फिर मैं एक हूं, मैं बहु होना चाहता हूं, बहुत होना चाहता हूं। वह सब समझाना पड़ेगा। तो फिर जिस तरह से 108 उपनिषद है उसमें से शंकराचार्य ने प्रिंसिपल 11 या 10 या 11 उपनिषद को सिलेलेक्ट किया है। गडपादाचार्य ने सिर्फ एक ही उपनिषद को प्रिंसिपल उपनिषद के रूप में सिलेलेक्ट किया है और वह है मांडुक्य। तो अभी देखिए जब तक आप सिर्फ मांडुक्य को फॉलो करते हैं तब तक सृष्टि की उत्पत्ति आपको समझाने की आवश्यकता नहीं। वो क्वेश्चन को ही आप ड्रॉप कर सकते हैं। किंतु यदि शंकराचार्य ने सोचा कि सिर्फ अब यह मेरा थिंकिंग है। शंकराचार्य ने शायद ऐसा सोचा होगा कि मैं यदि सिर्फ एक ही उपनिषद पर व्याख्या लिखता हूं तो शायद ऐसा हो सकता है कि मेरा जो एक अपील है वह ब्रॉड बेस ना होकर के बहुत ही नैरो हो जाए। जिस तरह से शायद गडपादाचार्य का था। तो हमको तो पता है गडपादाचार्य उनके शिष्य भगवत गोविंद पाद और गोविंद पाद के शिष्य है शंकराचार्य। तो शंकराचार्य ने अपने परम गुरु की जो फिलॉसोफी है या उनका जो थिंकिंग है सोचा होगा बहुत ही लिमिटेड है तो क्यों नहीं इसको और ब्रॉड बेस किया जाए और इसके लिए अन्य उपनिषदों को भी यहां पे इंक्लूड किया जाए और फिर जो अन्य उपनिषद बृहदारण्यक छांदोग्य ऐतरेय तैतरेय ई केन कट प्रश्न यह सब जो उपनिषद है उसमें सृष्टि के बारे में जो कुछ भी विवरण है उसको व्यावहारिक लेवल पर ले आया जाए। ऐसा कहा जाए कि गपादाचार्य का जो अजातिवाद है सृष्टि की उत्पत्ति हुई ही नहीं है। वह एक पारमार्थिक लेवल हो गया। वहां पर आप पहुंच जाएंगे तो पता चलेगा। तुरय अवस्था में पता चलेगा कि जागृत अवस्था स्वप्न मात्र थी। किंतु जब तक जागृत अवस्था में है तब तक यह जगत का एक तो अस्तित्व है। स्वप्न अवस्था से जागृत अवस्था इज अ हायर उच्च अवस्था है। स्वप्न अवस्था में हम देखेंगे देखिए दिस इज अ क्रूशियल डिफरेंस कि गौडपादाचार्य जागृत अवस्था और स्वप्न अवस्था दोनों को इक्वल फुटिंग पे रखते हैं। जबकि शंकराचार्य जागृत अवस्था को वन स्टेप हायर रखते हैं। क्योंकि देखिए कि स्वप्न अवस्था में प्रारब्ध तो है नहीं। कर्म का प्रवाह तो है नहीं। कर्म का फल नहीं है। स्वप्न में मैंने किसी की हत्या कर दी तो उस हत्या का फल जो है मुझे लगने नहीं वाला है। किंतु जागृत अवस्था में तो कर्म और कर्म का फल है। कर्म का सिद्धांत है। तो फिर यह स्वप्न अवस्था और जागृत अवस्था आप वन एंड सेम है। ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? उसकी तो एक व्यावहारिक सत्ता है। तो फिर यह कर्म का सिद्धांत यह सृष्टि की उत्पत्ति के रिलेटेड जो कोई भी स्टेटमेंट्स उपनिषद में पाए जाते हैं और फिर उपासना करनी है। तो उपासना के हेतु हमको एक रियल फ्रेमवर्क तो चाहिए ही चाहिए। एक फ्रेमवर्क तो चाहिए ही चाहिए जो कि इस जगत को अप टू एन एक्सटेंट रियल गिनती हो। तो फिर इसके लिए व्यावहारिक लेवल पर यह जगत का अस्तित्व है। तो यह निर्गुण निराकार में से यह सगुण साकार ईश्वर और फिर ईश्वर के माध्यम से यह जगत की उत्पत्ति कैसे हुई? तो एक माया रूपी एक सिद्धांत उन्होंने इंट्रोड्यूस किया है कि निर्गुण ब्रह्मण है प्लस माया है। उसमें से जीव जगत और ईश्वर प्रकट होते हैं। किंतु हमेशा के लिए देखिए जीव जगत और ईश्वर यह व्यावहारिक सत्य है। पारमार्थिक सत्य तो निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही है। तो यह तो हो गया शंकराचार्य का। किंतु

सगुण ब्रह्म: अद्वैत के माया-जनित ईश्वर की समस्या पर रामानुजाचार्य का समाधान

यहां पर देखिए प्रॉब्लम फिर वही गोल घूम करके आ जाता है कि व्यावहारिक सत्य यदि वन स्टेप नीचे है तो फिर मुझे साधना और उपासना करने के लिए जो एथिक्स और मोरालिटी एकदम परफेक्ट फॉलो करना है। यह मेरे कर्म के प्रवाह है। कुकर्म का बुरा फल है। सुकर्म का अच्छा फल है। ईश्वर के सामने शरणागत होने से मेरा घमंड जो है ईगो जो है वह चकनाचूर हो जाएगा। यह 100% कन्विंस होने के लिए मैं जीव जगत और ईश्वर को सेकंड रंग पर रखता हूं। सेकंड स्टेप पर रखता हूं। तो मेरा मन शायद इस बात को स्वीकार ना करे। तो फिर रामानुजाचार्य ने जीव जगत और ईश्वर ब्रह्मण का ही एक तरह का रूपांतरण परिणाम है। इस तरह से दिखाया। किंतु इस तरह का परिणाम दिखाने के लिए उनको एक बहुत ही मेजर कंप्रोमाइज यह करना पड़ा। निर्गुण और निराकार ब्राह्मण का कभी भी परिणाम या रूपांतर नहीं होता है। ट्रांसफॉर्मेशन नहीं होता है। उसके लिए सगुण ब्राह्मण चाहिए। नारायण रूपी ये सगुण ब्राह्मण उनमें से कुछ अब ये चीत और अचीत ऐसा कुछ है। किस तरह से विशिष्ट अद्वैत में सृष्टि की रचना होती है। मैं पढ़ रहा था किंतु वो थोड़ा सा मैंने देखा कि थोड़ा और टाइम देना पड़ेगा। बट एनीवे इतना बहुत चित और अचित में बहुत ज्यादा डीप में ना भी जाए और यदि इतना भी समझ ले कि सगुण ब्राह्मण का ही एक तरह से कुछ अब जैसे देह जो है वह जगत है और देही जो है वह सगुण ब्रह्मण है। इस तरह से कहते हैं जो म यह स्पाइडर है। स्पाइडर का भीतर में से यह जाल निकलती है। तो स्पाइडर है सगुण ब्रह्मण और यह जो जो वेव जो निकलती है स्पाइडर में से वह है यह जीव जगत और ईश्वर। तो एनीवे एक तरह से देखें तो सगुण ब्रह्मण का ही ट्रांसफॉर्मेशन या तो फिर सगुण ब्रह्मण का ही परिणाम जो है वो जीव जगत ईश्वर है। यहां पे उन्होंने यह जो प्रॉब्लम था कि जीव जगत और ईश्वर ब्रह्मण के एक स्टेप नीचे थे। वह प्रॉब्लम सॉल्व करके दोनों को सेम पेडेस्टल पर लाकर के खड़ा तो कर दिया। किंतु इसमें कंप्रोमाइज क्या करना पड़ा कि निर्गुण निराकार ब्राह्मण जो है जो कि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है। सर्वोच्च रियलिटी है। उसमें से ब्राह्मण का एक स्टेप नीचे ले आ के सगुण ब्राह्मण करना पड़ा। तो यहां पर श रामानुजाचार्य ने ब्रह्मण और जीव जगत और ईश्वर दोनों को सेम पेडेस्टल पर लाने के लिए यह एक कंप्रोमाइज किया है। सो वेयर डस श्री रामकृष्ण फॉल इन

श्रीरामकृष्ण का समाधान : ब्रह्म और शक्ति एक हैं : इसलिए भक्ति, सेवा और मातृस्नेह भी सत्य हैं

हियर? ठाकुर कहते हैं कि देखिए ब्रह्म तो है निर्गुण निराकार ही है। किंतु साथ में अभी जैसे कि यहां पर शंकराचार्य ने माया का कांसेप्ट सोचा है। यहां पर ठाकुर के पास में शक्ति का कांसेप्ट है। अभी देखिए शक्ति साधना जिसके बारे में अभी तक तो हमने कोई बात की ही नहीं है। हम लोग यह वेदांतिक यह जो फिलॉसोफी के भीतर में ही अभी तक खेल रहे थे। किंतु यह शक्ति साधना उतनी ही पुरानी है भारत में जितने कि यह वेद उपनिषद है। और किस तरह से ठाकुर वेद और उपनिषद के यह सगुण ब्रह्म वाला ट्रेडिशन यह निर्गुण ब्रह्म वाला ट्रेडिशन को सिंथेसाइज करते हैं। तो साथ में ही यह शक्ति साधना को भी विदिन वन स्ट्रोक एक साथ में सिंथेसाइज कर लेते हैं। किंतु किस तरह से शक्ति साधना का इवोल्यूशन हुआ। किस तरह से ठाकुर उसको वेदांत के साथ में मैच करवाते हैं। दैट इज अ टॉपिक फॉर अनदर डे। जिस तरह से हमने यह वेदांतिक फ्रेमवर्क बना करके सिस्टमेटिक करने का प्रयास किया है। वन डे वी विल टेक दी शक्ति साधना आल्सो और किस तरह से ठाकुर का यह जो ओवरऑल फ्रेमवर्क है उसमें फिट होता है। दैट वी विल सी सम अदर डे। आज सिर्फ इतना हम स्वीकार कर लेते हैं कि माया की जगह शक्ति ठाकुर का जो है कांसेप्ट ब्रह्म शक्ति अभेद जल स्थिर है तब भी वही जल है। हलता चलता है तब भी वही जल है। सर्प जो है कुंडली बनाकर के बैठा है तब भी वही सर्प है और सर्पाकार गति से गति करता है तब भी वही सर्प है। निर्गुण निराकार भगवान शिव कैलाश में ध्यान कर रहे हैं तब भी वही शिव है और फिर ये तांडव नृत्य करते हैं तब भी वही शिव है। ध्यान करते हुए महादेव और तांडव नृत्य करते हुए महादेव वही एक ही है। सृष्टि स्थिति प्रलय भी निर्गुण निराकार ब्रह्मण कुछ कार्य नहीं करता है तब भी वही अल्टीमेट रियलिटी है। और यही निर्गुण निराकार ब्रह्मन के साथ में यह शक्ति जो है ब्रह्म शक्ति अभेद उनकी यह जो शक्ति है सृष्टि स्थिति प्रलय भी करती है। और इसको हमने किस तरह से देखा था कि कार एक ही है। बस उसके गियर चेंज होते हैं। टॉप गियर में गाड़ी आगे जाएगी। न्यूट्रल गियर में गाड़ी खड़ी रहेगी। तो यह जो ब्रह्म शक्ति अभेद निर्गुण निराकार ब्रह्मन ऑन वन हैंड और जीव जगत ईश्वर ऑन द अदर हैंड एज रिप्रेजेंटेड बाय शक्ति यह दोनों इक्वल फुटिंग पे है। इक्वल पेडेशनल पे है। तो अभी तक के जितने भी तीन फिलॉसोफी के अपने-अपने ये जो कुछ ना कुछ प्लस माइनस थे सभी के सभी इस फार्मूलेशन के भीतर में सब सॉल्यूशन आ जाता है। ऑन वन हैंड हमको निर्गुण निराकार ब्राह्मण भी मिलते हैं जो कि हाईएस्ट उपलब्धि है आध्यात्मिक जगत की ऑन द अदर हैंड उपासना करने के लिए साधना करने के लिए जगत की जो वास्तविकता है वह भी एज इट इज मेंटेन की गई है। तभी तो मैं कर्म योग कर पाऊंगा। तभी तो मैं भक्ति योग कर पाऊंगा। कर्म और भक्ति यदि नहीं रहेगा तो मेरी उपासना कैसे होगी? यह रामानुजाचार्य का जो सगुण ब्राह्मण वाला कांसेप्ट है उसमें कर्म और भक्ति सहज फिट हो सकते हैं। ज्ञान फिट नहीं होता। शंकर और गडपादाचार्य का जो है अजातिवाद या तो फिर यह मायावाद उसमें यह ज्ञान तो फिट हो सकता है किंतु कर्म और भक्ति सेकंड स्टेज पर आते हैं। चित्त शुद्धि के लिए कर्म करना है। भक्ति करनी है। जैसे ही चित्त शुद्ध हो जाता है। ज्ञान योग में आ जाना है। बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं है। यह जो एकदम फर्मली फिट बैठा हुआ है। यह अद्वैत वेदांत के भीतर में तो यहां पे देखिए कि ठाकुर का थ्यरी यदि फॉलो करते हैं तो निर्गुण निराकार ब्राह्मण और यह सृष्टि स्थिति करती यह शक्ति एक ही है अभेद है दे टू एस्पेक्ट्स ऑफ द सेम रियलिटी तो यहां पे फिर स्वामी जी का यह जो स्टेटमेंट है सिर्फ और सिर्फ कर्म योग करके भी हमको निर्विकल्प समाधि या निर्गुण निराकार ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है। व्हिच इज़ पॉसिबल ओनली हियर कि जबकि यह शक्ति जो है जिनकी आप सेवा करते हैं वह सही-सही निर्गुण निराकार ब्राह्मण ही है। तो फिर देखिए कि ये मां का मातृ हृदय जितनी भी कहानियां हमने मां के जीवन में पढ़ी यदि आप यह कहे कि रियलिटी स्वप्न मात्र है या तो फिर यह व्यावहारिक सत्य मात्र है। यह अल्टीमेट सत्य नहीं है। तो फिर यह जो मां का जो मातृ हृदय है वह जो एक लेबरर लेडी वह मजदूर एक महिला मां के घर गई बुखार हो रहा है उसको तो मां ने कहा तुम यहीं पर सो जाओ आज रात को कल सुबह को जाना वह बेचारी वही मां के वरांडे में वह चटाई बिछा के सो गई वह तो बुखार था और फिर ऊपर से वृद्धा थी और थक गई थी रात को ही उसने बेचारी ने चटाई पर शौच कर लिया। तो सुबह मां अर्ली मॉर्निंग उठकर देखती है कि उसने चटाई बिगाड़ दी है। तो मां ने सोचा कि सभी लोग बाकी लोग यदि उठ जाते हैं तो फिर इस वृद्ध महिला का बड़ा ही अपमान करेंगे। एक ब्राह्मण के घर में वरांडे में सोकर के तुमने चटाई इस तरह से बिगाड़ी। फिर आना मत यहां पे। वह जो नलिनी और माकू तो थे ही थे पागलपन करने वाले। तो मां ने उसको कहा ठीक है तुम एक काम करो अभी सुबह सुबह है ठंडा में तुम चली जाओ यहां से अपने घर वापस मैं यह सब ठीक कर लूंगी अपने से तो वृद्धा बेचारी खुशी-खुशी चली गई और यहां पर मां ने अपने हाथों से चटाई धोई उसको वो जो तालाब के किनारे उसको सुखाने को रखा और वरांडे में वह गोबर लिप दिया किसी को पता नहीं चला फिर शाम के समय ना कि ऐसा कोई मां की कोई सेविका थी। उसने देखा कि सुबह-सुबह फ्रेश गोबर लिपा गया है। यहां पे क्या माजरा क्या है? तो इन्वेस्टिगेशन करके पता चला कि मां ने ऐसा किया। तो देखिए यह जो कहानी है यदि हम यह कहें कि यह स्वप्न ही था पूरा या तो फिर कहेंगे कि इन अ वे रियलिटी है। व्यवहारिक सत्ता है। किंतु पारमार्थिक कुछ नहीं है इसमें। तो फिर यह मां का जीवन है। स्वामी जी ने यह जो पूरा भारत भ्रमण करके यह गरीब गुरबों की जो अवस्था देखी उसके लिए उनका यह जो हृदय रोया और फिर वहां से आकर कहते हैं भक्ति मुक्ति सब छोड़ दो फिलहाल सिर्फ और सिर्फ भारतवासियों का गरीब गुरबों का कल्याण करने में लग जाओ। यह बात फिर यह उस हाईएस्ट जो फिलॉसोफी में फिट ही नहीं होगी। अजातवाद में यह बात फिट ही नहीं होगी। आपको समहाऊ जगत का अस्तित्व है वह रियलिस्टिक करना है। सिर्फ पार व्यावहारिक नहीं पारमार्थिक उसका सत्य स्थापित करना है। कहना है कि बस यह जो मोड़ फिरिए देवा ठाकुर कहते हैं ना काम कांचन से मोड़ घुमा करके अपना चेहरा घुमा करके ईश्वर की ओर ले जाओ। माने काम माने क्रोध जो है क्रोध का स्वरूप चेंज कर दो। क्रोध करना ही है तो यह क्रोध करो कि मैं 10,000 जप क्यों नहीं कर सकता। ईर्ष्या करनी है तो यह ईर्ष्या करो कि यह मेरा बंधु है 10,000 जप करता है। डेली मेरे से नहीं होता। माने काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर उसका मोड़ फिर ये दा। माने उसका जो जो डायरेक्शन है वो चेंज कर दो। तो यहां पे देखिए, माने टू टेक दैट एनालॉजी हियर कि ये एक और आप देखेंगे तो जीव जगत ईश्वर दिखाई देंगे। फिर ऐसा करके वह चेहरा घुमाएंगे तो ब्राह्मण दिखाई देंगे। सो द वन एंड द सेम रियलिटी देयर इज नो डिफरेंस बिटवीन देम। इक्वेशन की वन साइड है ब्रह्मण और इक्वेशन की अदर साइड है शक्ति जीव जगत ईश्वर। दोनों ही पारमार्थिक लेवल पर सत्य है। यदि नहीं होते तो मां का पूरा जीवन स्वामी जी का जीवन यह एक सेकंड लेवल पर रह जाता। जब तक स्वप्न देख रहे हैं तब तक मां और स्वामी जी को स्वीकार करना है। जैसे ही स्वप्न में से हम जागृत हो गए मां और स्वामी जी को डिस्कार्ड कर देना है। इस तरह का वो एक कंट्राडिक्टरी कांसेप्ट खड़ा होता है। तो इसीलिए यहां पर देखिए कि जीव जगत ईश्वर या तो फिर शक्ति उसको सेम पेडेस्टल पर रखना है जो कि निर्गुण निराकार ब्राह्मण है। और यहां पे फिर दूसरा एक क्वेश्चन आता है। बहुत ही इंपॉर्टेंट मां ने कहा कि तुम सब लोग अद्वैत हो। तुम्हारे गुरु भी अद्वैत थे। तुम्हारे गुरु अद्वैत थे। तुम सभी अद्वैती हो। तो देखिए कि यहां पे अद्वैत वेदांत ही हम फॉलो कर रहे हैं। रामानुजाचार्य का विशिष्ट अद्वैत नहीं फॉलो कर रहा है। बस वही है कि अद्वैत वेदांत का तीन आप डिस्क्रिप्शन है। एक तो गडपादाचार्य का अजातिवाद है। अ शंकराचार्य का मायावाद है और यहां पे श्री रामकृष्ण का ब्रह्मशक्ति अभेदवाद है। तो तीनों ही अद्वैत वेदांत बस अद्वैत वेदांत की जो एक्सप्लेनेशन है कि किस तरह से यह जीव जगत और ईश्वर के साथ में आपको डीएल करना है। वह एक्सप्लेनेशन चेंज होती जाती है। बस इतना ही है। अदरवाइज एक निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही अल्टीमेट सत्ता है। दैट इज ओनली वन नो टू दैट इज ट्रू इन ऑल ऑफ थ्री। तो यहां तक हमने फिर भी देख लिया था। अभी एक आखिरी क्वेश्चन जो हमको यह टाई अप करने में लगता है कि सब कुछ हो गया। जितना भी सामान था बैग के भीतर में रख दिया है। ट्रैवल करना है कल। तो अभी बस बैग बंद ही करना है। करना है। दैट वन लास्ट क्वेश्चन कि यह जो

Superposition in Quantum dynamics

ब्रह्म शक्ति अभेद है तो हाउ दैट बोथ कैन बी ट्रू एट द सेम टाइम। अभी जब तक जब ठाकुर ऐसा कहते हैं कि सांप कुंडली मार्ग के बैठा है तब भी वही सांप है और सर्पाकार गति से चलता है तब भी वही सांप है। तो वह तो हमको अच्छा लगता है सुनने में। चलो किंतु प्रॉब्लम यहां पे क्या है? सांप एक साथ में दोनों चीजें कर रहा है। वो कुंडली मार के बैठा है और साथ में ही वह सर्पाकार गति से चल रहा है। दोनों कार्य एक साथ में कर रहा है। हाउ इज दैट पॉसिबल? गाड़ी एक साथ में न्यूट्रल गियर में भी है और टॉप गियर में भी है। हाउ इज दैट पॉसिबल? बाबू अपने घर में बैठकर विश्राम भी कर रहे हैं। ऑफिस में जाकर काम भी कर रहे हैं। अभी एक ही बाबू है। घर में है तो ब्रह्मन है। ऑफिस में है तो शक्ति है। वहां तक तो मान लिया किंतु दोनों एक साथ में कर रहे हैं। हाउ इज दैट इवन पॉसिबल? तो यहां पर देखिए मेरा जो सॉल्यूशन है यह 19th सेंचुरी का जब प्रारंभ हुआ अ उस समय हमको पता चला था कि इलेक्ट्रॉन है वो एक पार्टिकल है। तो यहां तक हमारा साइंस आ गया था कि एटम है यह यह पूरा जो जगत है उसके कंस्टीट एलिमेंट है एटम और एटम के कंस्टीटुएंट एलिमेंट है इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। तो यह इले इलेक्ट्रॉन है वह एक पार्टिकल है और यह सोलर सिस्टम वाली कल्पना हमारे मन के भीतर में है कि जैसे सूरज सेंटर में है उसकी चारों ओर ग्रह जो है वह सर्कल कर रहे हैं। तो इसी तरह से न्यूट्रॉन है सेंटर में और चारों ओर जो न्यूट्रॉन और प्रोटॉन है सेंटर में सूरज की जगह और ग्रहों की तरह इलेक्ट्रॉन ऑर्बिट कर रहे हैं। तो एक बड़ा ही क्लियर अंडरस्टैंडिंग है। अभी हुआ ऐसा कि कुछ साइंटिस्ट ने ट्राई किया एक डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट इसको कहते हैं। डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट क्या है? एक दीवार है। दीवार के भीतर में दो दरवाजे हैं। अभी आप देखिए एक बॉल आप लीजिए क्रिकेट का बॉल। इसको आप कलर कीजिए। उसको यह जो होली के दिन कलर खेलते हैं ना तो ऐसा कोई कलर का जो एक यह है बाल्टी उसमें उसको डूबाइए। और फिर इस बॉल को फेंकिए। तो होगा क्या कि यह जो दीवार है उसके बीच इसके भीतर में दो दरवाजे हैं और इन दोनों दरवाजों के परे एक दूसरी दीवार है। ठीक है? तो आप यदि बॉल फेंकेंगे यह बाल्टी में कलर किया हुआ बॉल तो क्या होगा? यह दोनों दरवाजों में से एक दरवाजा क्रॉस करके इसके बाद की जो दीवाल है सेकंड वॉल है उसके साथ में टकराएगा तो एक स्प्लश होगा दीवाल के ऊपर में। ठीक है? अब दूसरा बॉल फेंकिए। तो दूसरा बॉल भी क्या करेगा? दो दरवाजे हैं। उसमें से कोई भी एक दरवाजा पार करके वह पीछे वाली दीवार के साथ में फिर से टकराएगा। आप एक के बाद बॉल फेंकते ही जाइए, फेंकते ही जाइए तो क्या होगा? जो इस दरवाजे से बॉल निकला है राइट हैंड वाले उसके बाद वाली दीवार जो है उसके ऊपर में यह दरवाजे के पीछे वाला जो हिस्सा है उस दीवार पे एक बेंड जैसा हो जाएगा। वहां पर बॉल का जो कलर है वो स्प्लश वो होगा और जो यहां पर राइट हैंड वाला जो दरवाजा है उसके पीछे में दीवाल के साथ में जब टकराता है माने वो राइट हैंड वाले दरवाजे में से निकल कर के जो टकराएगा तो वो एक हो जाएगा। यानी कि क्या होगा? लेफ्ट हैंड वाले दरवाजे से पास हुआ बॉल उसका एक दीवार पे वो स्प्लश हुए हैं पीछे वाली दीवार पे और राइट हैंड वाला जो दरवाजा है उसमें से जब बॉल निकला है तो वहां पे एक स्प्लेश दिखता है। यानी कि जब पीछे वाली दीवार का आप स्टडी करेंगे 100 200 बॉल फेंकने के बाद में तो आपको दो स्प्लेश दिखाई देंगे। एक तो जो राइट लेफ्ट हैंड वाले दरवाजे से जो निकला है वह और दूसरा है कि राइट हैंड वाले दरवाजे से निकला है। सिंपल थिंकिंग है। राइट? अच्छा अभी किंतु मान लीजिए आपने पानी में पत्थर फेंका होगा। सभी ने पानी में पत्थर वो जो जलाशय है, नदी है, तालाब है उसके किनारे बैठे ही होंगे। किनारे बैठकर के पत्थर तो फेंके ही होंगे और पत्थर जब फेंकते हैं शांत पानी में तो फिर क्या होता है? वह रिपल्स होती है। सर्कल में रिपल फैलती है। चारों ओर सर्कल होती रिपल फैलती है। हम सभी का यह अनुभव होगा ही होगा। शांत जलाशय के सामने, नदी के सामने बैठकर के पत्थर फेंके ही होंगे। जिसको यह मौका नहीं मिला होगा वो अनफॉर्चूनेट। क्या कहे? प्रकृति के सानिध्य में जितना हो सके उतना समय बिताना है। तो आई एम वेरी फॉर्चूनेट दैट वे कि साधु होने के बाद में काफी मेरे पास में ओपोरर्चुनिटीज आई है कि इस तरह से प्रकृति के सानिध्य में रह के दोपहर बिताऊं एक पूरा दिन बिताऊं। तो इस तरह से पानी में मैंने काफी पत्थर फेंके हैं। तो वो जो जलाशय की रिपल्स है वो आपने देखी होगी। दो पत्थर फेंके हैं। पहला पत्थर फेंका तो उसमें से रिपल्स निकलती है। दूसरा पत्थर फेंका तो उसकी भी रिपल्स निकलती है। अभी ये दोनों जो रिपल है वो टकराएगी। वो टकराती हुई ये जो वेव्स आपने देखे होंगे। क्या होता है? जहां पे वेव्स टकराते हैं वहां पर क्रॉस क्रॉस हो जाता है। यानी कि क्रॉस पैटर्न्स हो जाती है। रिपल पैटर्न हो जाती है। वो आपने देखी ही होगी। शब्दों में व्यक्त करना थोड़ा मुश्किल है। किंतु दो पत्थर फेंके जलाशय में वो जो वेव्स है टकराएंगे तो टकराने के समय में जो रिपल होती है वो आपने देखा ही होगा। अभी आप देख लीजिए कि जब रिपल्स टकराती है तो क्या होता है? बेंड हो जाते हैं। जहां पे रिल है मल्टीप्लाई होती है वहां पे बड़ा वेव होता है। वहां पे रिल जो एक दूसरे को सबट्रैक्ट कर देती है तो वो माइनस हो जाता है। वहां पे वेव जीरो हो जाता है। यानी कि रिल के टकराने की जो पैटर्न होती है, इट इज यूनिक। जहां पे पानी जैसा उसका सब्सटेंस है, वेव नेचर इसको कहते हैं। वेव्स के भीतर में ही वेव्स के टकराने से रिपल इफेक्ट होती है। तो, अभी देखिए इस जगत में कोई भी चीज है या तो पार्टिकल है या तो वेव है। पार्टिकल यानी कि बॉल और वेव अर्थात कि पानी में पत्थर फेंकने से जो वेव खड़े होते हैं वो। अभी मान लीजिए आप बॉल को फेंक रहे हैं। तो एक दरवाजे से निकला फिर बॉल को फेंका। दूसरे बल को तो दूसरे दरवाजे से निकला। अभी आप पानी का एक पूरा बाल्टी जो है उसको ही आप ढाल दीजिए। क्या होगा? पानी का बाल्टी आप ढलेंगे जोर से फेंकेंगे तो दोनों दरवाजे से निकलेगा। अब जैसे दूसरी ओर जाकर देखिए कि दोनों दरवाजे में से वेव्स निकलते हैं और वेव्स जो है टकराते हैं आपस में और यह इंटरफेरेंस पैटर्न बनती है। अभी आपने बॉल फेंका दीवाल के साथ में टकराया वह स्प्लश होता है और पानी फेंकते हैं तो फिर यह वेव्स निकलते हैं और दोनों दरवाजे पार करके फिर से जहां पे मिलते हैं वहां पे वेव्स टकराने से इंटरफेरेंस पैटर्न बनती है। अभी यह तो स्पष्ट है। कोई भी इवन बच्चा भी होगा वह समझ जाएगा कि पानी फेंकने से जो वेव्स निकलते हैं और वेव्स टकराते हैं तो इंटरफेरेंस पैटर्न होती है और बॉल फेंकेंगे तो स्प्लश होगा। बस इतना ही तो अभी साइंटिस्ट लोग जब इलेक्ट्रॉन के साथ में यह एक्सपेरिमेंट कर रहे थे तो उनको एक अद्भुत बात देखने को मिली। इलेक्ट्रॉन को फेंकने से दूसरी साइड में जो दीवार है वहां पर टकराते हैं तो स्प्लेश नहीं होता है। इंटरफेरेंस पैटर्न बनती है। व्हिच इज सो सरप्राइजिंग कि इलेक्ट्रॉन तो पार्टिकल है। पार्टिकल जब फेंकेंगे आप तो यह वेव्स की तरह इंटरफेरेंस पैटर्न कैसे पॉसिबल है? पानी का वेव और बॉल इन दोनों में क्या समानता है? कुछ समानता नहीं है। बॉल बॉल है, वेव वेव है। किंतु फिर भी इलेक्ट्रॉन के लेवल पे सब पार्टिकल सब एटॉमिक पार्टिकल के लेवल पे वेव और पार्टिकल दोनों एक साथ में इलेक्ट्रॉन के भीतर में है। इसको कहते हैं वेव पार्टिकल ड्यूलिटी। वि इज सो सरप्राइजिंग कि पार्टिकल वेव की तरह भी बिहेव करता है और पार्टिकल की तरह भी बिहेव करता है। जो कि हम वास्तव जगत में एक माइक्रोस्कोपिक माइक्रोस्कोपिक जगत में कभी नहीं देखते। विशाल जगत में कभी नहीं देखते। जो कि हमको इलेक्ट्रॉन के लेवल पर देखने को मिलता है वेव पार्टिकल डलिटी। और इसी वेव पार्टिकल डलिटी को समझाने के लिए वह जो गेट है उसका एग्जांपल दिया गया है कि एक बॉक्स है। बॉक्स के भीतर में एक एटॉमिक डिवाइस रखी है। उसमें से यह गेमा रेडिएशन की ऐसा निकलता है विच इज कंप्लीटली रेंडम। यह रेडिएशन निकलता है तो जहर की एक बोतल टूटती है और जहर की बोतल टूटेगी। उसमें से जो गैस निकलेगा तो बिल्ली जो है वो गैस की वजह से मर जाएगी। अब जब तक आप बॉक्स खोल के देखेंगे नहीं तब तक आपको यह पता नहीं चलेगा कि यह बिल्ली जिंदा है या मुर्दा है। क्योंकि ऑब्जरवेशन करने के समय ही यह जो वेव फंक्शन कोलैप्स होता है। अर्थात कि नेचर तो एक ही है। आइदर वेव और पार्टिकल। किंतु जब तक आप ऑब्जर्व नहीं करेंगे तब तक पता नहीं चलेगा। तो जब तक ऑब्जर्व नहीं करते हैं वेव पार्टिकल डलिटी बनती रहती है। जब तक आप जैसे ही आप ऑब्जर्व करते हैं वेव फंक्शन कोलैप्स हो जाता है देन इट बिकम्स आइदर वेव और पार्टिकल। तो यहां पे जब तक आप बॉक्स खोल के ऑब्जर्व नहीं करेंगे कि बिल्ली जिंदा है या मुर्दा है तब तक बिल्ली इज इन अ सुपरपजीशन। दोनों स्टेट एक साथ में है। जिंदा भी है, मुर्दा भी है। व्हिच इज़ कोई भी तरह का फिलॉसोफी, किसी भी तरह की कॉमन सेंस से यह बात सही नहीं लगती। और इन प्रैक्टिस भी सही नहीं। बिल्ली के लेवल पे क्वांटम इफेक्ट देखने को नहीं मिलता है। क्वांटम इफेक्ट सब एटॉमिक पार्टिकल लेवल पे ही देखने को मिलता है। बट दिस इज़ अ स्ट्रेंजनेस ऑफ क्वांटम रियाम। कि जब तक आप ऑब्जर्व नहीं करेंगे इलेक्ट्रॉन को वेव पार्टिकल ड्यूलिटी बना रहेगा। जैसे ही इलेक्ट्रॉन को ऑब्जर्व करेंगे साथ में ही यह वेव फंक्शन कोलैप्स होगा। इट विल टर्न आइदर वेव और पार्टिकल डिपेंड कि हाउ यू ऑब्जर्व इट। तो दिस इज वेरी स्ट्रेंज। और इसको कहते हैं सुपरपज़िशन। यहां पे यही कॉन्सप्ट

Superposition of Brahma and Shakti : duality in the nature of ultimate reality

सुपरपज़िशन को मैं अह आई वांट टू अप्लाई हियर कि ब्रह्म और शक्ति बोथ आर इन सुपरपज़िशन। इलेक्ट्रॉन एक ही है किंतु इलेक्ट्रॉन का वेव नेचर एंड पार्टिकल नेचर आर इन सुपरपोज़शन। जब तक ऑब्जर्व नहीं करेंगे इलेक्ट्रॉन विल बिहेव एज इफ इट इज़ वेव एज़ वेल ऐज़ पार्टिकल। जैसे ही आपने ऑब्ज़र्व कर लिया तो वैसे ही वो आइदर वेव की तरह बिहेव करेगा। वेव फंक्शन कोलैप्स हो जाएगा। इट विल बिहेव आइदर एज अ वेव और एज ए पार्टिकल। तो यहां पर भी ब्रह्म और शक्ति आर इन सुपरपजीशन। एक ही अल्टीमेट रियलिटी है। उसके दो स्टेट है। निर्गुण निराकार ब्राह्मण और सृष्टि स्थिति करती यह शक्ति बोथ आर इन सुपरपजीशन। शंकराचार्य का जो सुपरइंपोजशन है अध्यास अध्यारोप कि रस्सी के ऊपर में यह सर्प का अध्यारोप होता है। सुपरइंपोज होता है। तो यहां पे मैं वर्ड नॉट क्वांटम डायनेमिक्स का जो वर्ड है सुपरपजीशन कि दोनों पोजीशन एक साथ में है। ब्राह्मण और शक्ति दो तरह की जो फंक्शनैलिटीज या दो तरह के एस्पेक्ट है। सेम अल्टीमेट रियलिटी के वेव एस्पेक्ट एज वेल एज पार्टिकल एस्पेक्ट बोथ आर इन सुपरपजीशन दोनों एक साथ में है। जब तक आपको निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं होती तब तक आप शक्ति वाले एस्पेक्ट में है। जैसे ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है वेव फंक्शन कोलैप्स होकर के शक्ति अदृश्य हो जाती है और फिर यह ब्राह्मण ही रहता है। फिर जैसे ही आप इति इति करके जगत में वापस आएंगे तब देखेंगे यह वेव पार्टिकल ड्यूलिटी जो है फिर से आ जाती है सुपरपिशन फिर से लग जाता है बट ना वापस आने के समय आपके पास में नॉलेज है कि यस यह जो मैं देख रहा हूं यह जीव जगत ईश्वर दे आर नथिंग बट ब्रह्मण नाम रूप रूपी मुखौटा मात्र पहना है। सो दिस इज हाउ विद दिस सुपर पोजीशन फटम डायनेमिक्स का कांसेप्ट है वो दैट इज हाउ आई सॉल्व दिस प्रॉब्लम शंकराचार सुपर इंपोजीशन शंकराचार्य का अध्यास अध्यारोप यहां पे सुपरपजीशन कि दोनों रियलिटीज जो है वो एक साथ में एग्जिस्ट कर सकती है जब तक आप उसको ऑब्जर्व ना करें। जैसे ही ऑब्जर्व करते हैं, यह वेव फंक्शन कोलैप्स होता है। आइदर वेव और पार्टिकल एक ही रह जाता है। और फिर जैसे ही यह ऑब्जरवेशन हटा लेते हैं, साथ में ही यह सुपरपजीशन फिर से आ जाता है। यानी कि निर्विकल्प समाधि में ओनली वन रियलिटी विल रिमेन। बट जब तक नेति नेति करके साधना करते हैं या तो फिर इति इति करके वापस आते हैं। बोथ रियलिटी विल को एकिस्ट इन सुपरपिशन ऑफ ईच अदर। सो दिस इज हाउ आई सोल के ठाकुर का यह जो ब्रह्म शक्ति अभेद इसके बाद में हम देखेंगे कि हमने तो एक ही एस्पेक्ट आज डिस्कस किया फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट किंतु इसके बाद वाला जो एस्पेक्ट है कि किस तरह से यह साधन पद्धति में कन्वर्ट होता है। उपासना में कन्वर्ट होता है। ठाकुर ने कह ही दिया है वह जड़ के भीतर में यह झूठा पत्ता हवा जहां पर ले जाती है वहां पर जाना है। मैं यंत्र हूं वो यंत्री है। सो हाउ दिस एग्लीिफाई ह साधन पद्धति इन नट शेल। वो अभी हम कथामृत का जब नेक्स्ट क्लास होंगे तब देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: यदि ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं, तो उन्हें दो अलग नाम क्यों दिए गए? हमें भ्रमित क्यों किया गया?

क्योंकि फंक्शन अलग है ना शक्ति का फंक्शन है सृष्टि स्थिति प्रलय। ब्रह्मन का फंक्शन नहीं कहेंगे। ब्रह्मन का स्वरूप ब्रह्मण है सच्चित आनंद। तो एक ओर है सच्चित आनंद दूसरी ओर है सृष्टि स्थिति प्रलय। तो वो डिफरेंशिएट करने के लिए दो शब्द।

प्रश्न: जैसे ठाकुर की कहानी है, कुछ अंधे लोग हाथी के विभिन्न अंग स्पर्श करके कहते है की हाथी सर्पाकार है, है सूपड़े की तरह है, वैसे ही लगता है की हमारे भीतर का अज्ञान हमें समझने नहीं देता की ब्रह्म-शक्ति अभेद है.

यह जो अद्वैत वेदांत के भीतर में ना यह डिबेट बहुत लंबा चला है कि यह अज्ञान कहां पर रहता है? अज्ञान जीव के भीतर में है कि ब्रह्म के भीतर में है। यह एक डिबेट है और डिफरेंट-डिफरेंट कमेंटेटर्स आपको डिफरेंट-डिफरेंट उत्तर देंगे। देखिए, गौपादाचार्य इज अ फाउंडर ऑफ अद्वैत वेदांत। राइट? अ उन्होंने एब्सोल्यूट जो निर्विकार जो निर्गुण ब्रह्म है उसको डिफाइन कर दिया। अभी उनके बाद में जितने भी कमेंटेटर आए वह चाहे शंकराचार्य हो कि फिर पद्मपादाचार्य हो ना कि फिर मधुसूदन सरस्वती हो प्रकाशात्म यति हो यू नेम इट उन सबका एक ही प्रॉब्लम था हाउ टू एक्सप्लेन द वर्ल्ड राइट ब्राह्मण वाला इक्वेशन तो म दैट पार्ट ऑफ इक्वेशन इज सोल्वड बट देन हाउ विल यू एक्सप्लेन आवर डे टू डे एक्सपीरियंसेस तो अब शंकराचार्य मायावाद ले आए हैं रामानुजाचार्य अभी रामानुजाचार्य को छोड़ दे अद्वैत ट्रेडिशन में से तो शंकराचार्य के जितने भी जो फॉलोअर्स या तो फिर विदिन अद्वैत वेदांत ट्रेडिशन आचार्य हुए हैं उन्होंने यह समझाने को प्रयास किया है कि हाउ डस दिस निर्गुण निराकार ब्राह्मण कन्वर्ट्स इनू रियलिटी आवर एक्सपीरियंस्ड रियलिटी लिव्ड रियलिटी और उसके रिलेटेड माया अविद्या अज्ञान संस्कार बहुत सारे कांसेप्ट खड़े करते हैं और फिर यह क्वेश्चन क्वेश्चन होता है कि वेयर डस दिस माया रिजाइड? वेयर डस दिस अज्ञान रिजाइड? हमारे भीतर में है। अब जैसे एक्लिप्स का उदाहरण राइट एक्लिप्स क्या है? अ कि अच्छा बादल का उदाहरण बादल सूरज को ढक लेता है। अभी बादल पृथ्वी पे है। सूरज अदरवाइज इतना बड़ा है। बादल इतना छोटा है। हाउ कैन बादल सूरज को ढक सकता है? किंतु बात यह है कि बादल पृथ्वी पे है यानी कि हमारे पास में हमारे भीतर में है तो हमको इतना बड़ा सूरज छोटा सा बादल ढक देता है या तो फिर कहेंगे कि सूरज के ऊपर में ही एक तरह का लेयर पड़ जाता है जो कि जिसकी वजह से सूरज एक्लिप्स है जैसे कि एक्लिप्स इन स्पेस वो पृथ्वी पे नहीं है। सो एक्लिप्स है सूरज के फॉर एग्जांपल मान लेते हैं सूरज के आसपास कहीं नहीं है चांद बट स्टिल फॉर एग्जांपल मान लेते हैं कि एक्लिप्स इज इन स्पेस जो सूरज के पास में है बादल है दैट इज ऑन अर्थ कि हमारे पास में है तो व्हाट इज माया इज़ लाइक अ एक्लिप्स और मेघ जो कि सूरज को ढकते हैं। दैट डिबेट इज देयर दैट इज़ एंडलेस डिबेट और अह ठाकुर का यदि हम मान लें अह तो हम कहेंगे कि अह शक्ति इज एज रियल एस ब्रह्मण। तो फिर कहेंगे कि यहां पे अविद्या का कांसेप्ट ही नहीं आता। यहां पे सिर्फ आपके संस्कार ही है। या तो फिर आप जैसे एक साल का बच्चा है। आपको यह कहेंगे कि उसको कैलकुलस नहीं आता बोल के वो अज्ञानी है। नहीं ही इज़ इमैच्योर। उसको मैच्योर होना है। ही हैज़ टू ग्रो अप। सो सिमिलरली वी सिंपली हैव टू ग्रो अप। हम ऐसा क्यों कहें कि मेरे भीतर में अज्ञान है बोल के मुझे ब्रह्म नहीं दिखता। आई एम अनट्रेंड। आई एम ए चाइल्ड वंस आई ग्रो अप वंस आई ट्रेन मसेल्फ आई विल बी एबल टू सी द ब्राह्मण व्हाई वुड आई एट ऑल इनवोक द कांसेप्ट ऑफ माया बच्चे के रिलेटेड हम माया का कांसेप्ट अविद्या का कांसेप्ट नहीं इनवोक करते उसको मेडिकल साइंस नहीं आता तो उसके भीतर में अज्ञान है क्या उसको कंप्यूटर साइंस नहीं आता वो उसके संस्कार का रास्ते में आ रहे हैं क्या नहीं सिंपली अनट्रेंड ही सिंपली अ चाइल्ड सो व्हाई एट ऑल शैल वी इनवोक दिस कासेप्ट ऑफ अविद्या अज्ञान माया

प्रश्न: दुनिया के बारे में हमारी समझ बहुत सीमित है। उदाहरण के लिए, मुझे यह नहीं पता कि मेरा मोबाइल कैसे काम करता है, या मेरी कार कैसे काम करती है।

ना किंतु आप जो कहते हैं ना फिर वहां वही है कि एप्लीकेशन तो हमको पता है ना अब जैसे ये लैपटॉप जिस समय मैं काम कर रहा हूं मुझे यह नहीं पता उसका माइक्रोपर कैसे काम करता है किंतु इसी लैपटॉप के सहारे ये Google मीट तो हम चला ही रहे हैं हम डेली क्लास तो ले ही रहे हैं काम तो निकाल रहा है राइट तो वेदांतिक थ्यरी यदि ना समझ में आए साधन पद्धति जो है वह तो कोई समझना कठिन नहीं है मां का लाइफ इतना सहज सरल है स्वामी जी का शिव ज्ञान है जीव सेवा इतना सहज सरल है। स्टार्ट प्रैक्टिसिंग फिर थ्यरी विल ऑटोमेटिकली फॉल इन प्लेस।

प्रश्न: अंत में तो हमें माँ के पास ही आना है। क्योकि यह समझना बहुत कठिन है कि बिल्ली एक ही समय में मृत भी है और जीवित भी।

देखिए क्वांटम डायनेमिक्स के जो फाउंडर्स थे ना सम ऑफ द बिगेस्ट फाउंडर जैसे कि हजनबर्ग वगैरह उन्होंने क्या कहा पता है? वंस यू क्लेम दैट आई अंडरस्टैंड क्वांटम डायनेमिक्स दैट मींस यू डू नॉट अंडरस्टैंड क्वांटम डायनेमिक्स। बिकॉज़ उसके इंप्लिकेशंस आर सो स्ट्रेंज। बट एट द सेम टाइम सेम क्वांटम डायनामिक्स के ऊपर में आज का पूरा इलेक्ट्रिकल इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री खड़ा है। माइक्रोपर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यू नेम इट मॉडर्न पूरा इकोनमी इंडस्ट्री टेक्नोलॉजी स्टैंड्स ऑन दी फाउंडेशन ऑफ क्वांटम डायनेमिक्स। यानी कि भले ही चाहे हमको उसके फिलॉसोफिकल इंप्लिकेशन ना समझ में आए बट इट इज हमने उसका प्रैक्टिकल एप्लीकेशन तो समझ लिया है और वो ठाकुर कहते हैं ना बागान में जाकर के कितने पेड़ कितनी ब्रांच कितने पत्ते वो गिनने की जो आम तोड़ो खाओ तो क्वांटम डायनेमिक्स के साथ में हमने एग्जैक्टली वही किया है। बड़े रेयर कोई साइंटिस्ट होगा कि फिलॉसोफिकल इंप्लिकेशन में जाए सुपरपजीशन वेव पार्टिकल डलिटी व्हाट इज दिस तो उस समय फिलॉसोफिकल एप्लीकेशन में नहीं जाकर के सीधा उसका डायरेक्ट एप्लीकेशन क्या उसमें चले जाते हैं व्हिच इज़ व्हाई आज का मॉडर्न साइंस जो है देखिए आजकल जो एआई को लेकर के जिन लोगों को आश्चर्य होता है मैं कहता हूं कि ये एआई इज नथिंग फंडामेंटल डिस्कवरीज जो थी व्हिच मेड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पॉसिबल दैट वाज़ डन इन 1930 1920 1930 वो क्वांटम डायनेमिक्स का फाउंडेशन उस समय डाला गया था। आइंस्टाइन जैसा आइंस्टाइन उस समय का चकरा गया था। गॉड डज़ नॉट प्ले डाइस। ईश्वर वो ये थोड़ी ना जुआ थोड़ी ना खेलते हैं जगत के साथ में। सो इवन ही हैज़ टू क्लेम दिस। सो दैट फाउंडेशंस व मेड एस्टैब्लिश्ड इन 1930 देमसेल्व्स। 1920 1930 आज का आज का जो मॉडर्न टेक्नोलॉजी नथिंग बट एन आउटकम ऑफ दैट

प्रश्न: आइंस्टीन क्यों कहता है god does not play dice?

[हंसी] अब अब जैसे क्वांटम डायनामिक्स का जो फंडामेंटल कांसेप्ट है उसमें ये वेव पार्टिकल डलिटी है। फिर एक है ये अनसर्टेनिटी प्रिंसिपल है। अर्थात कि यदि आपको उसका स्पीड पता है अ किसी भी पार्टिकल का किस स्पीड से जा रहा है मोमेंटम जिसको कहते हैं तो आपको उसका पोजीशन नहीं पता रहेगा और पोजीशन को मेजर करते हैं तो मोमेंटम आपका हेजी हो जाएगा। आप परफेक्टली लोकेट नहीं कर पाएंगे। फंडामेंटल लेवल पर यह अनसर्टेनिटी है। अदरवाइज अब एक कार जाती है। कार कितनी स्पीड से जाती है और जीपीएस है तो उसका परफेक्ट लोकेशन दोनों आपको पता होना चाहिए। सरप्राइजिंगली इलेक्ट्रॉन के साथ में ऐसा नहीं। कितना स्पीड से जा रहा है परफेक्टली एक्यूरेट मेजर करेंगे तो उसका लोकेशन आपका गड़बड़ हो जाएगा। थोड़ा सा हेजी हो जाएगा। लोकेशन परफेक्टली मेजर करेंगे तो उसका जो स्पीड है मोमेंटम है वो हैज़ हो जाएगा। सो दैट इज अनसर्टेनिटी इज इनबिल्ट विद इन दिस अ क्वांटम रियल। वो एक है। दूसरा है कि आइंस्टाइन का कहना है कि नथिंग कैन ट्रैवल फास्टर देन स्पीड ऑफ लाइट। व्हिच इज़ अ फंडामेंटल लिमिट ऑन द नेचर। जबकि यहां पे है अप इलेक्ट्रॉन और डाउन इलेक्ट्रॉन बोथ आर इन सिंक्रोनिटी विथ ईच अदर। सिंक्रोनाइज्ड होते हैं। डाउन इलेक्ट्रॉन अभी दो इलेक्ट्रॉन पेयर जिसको कहते हैं। किंतु जब तक मेजर नहीं करेंगे तो अप और डाउन दोनों एक साथ में रहेंगे। सुपरपजीशन। अभी ये पेयर में से एक इलेक्ट्रॉन को यहां पे रखिए। एक इलेक्ट्रॉन को एंड्रोमीडा गैलेक्सी में ले जाइए। द डिस्टेंस इज़ 50 मिलियन लाइट इयर्स। तो यहां से लाइट वहां जाने में हाईएस्ट स्पीड के साथ में जाए तो 50 मिलियन इयर्स लगेंगे। पृथ्वी पर के इलेक्ट्रॉन को मेजर कीजिए। इफ इट इज डाउन उसका जो प्रॉपर्टी है इट इज डाउन इलेक्ट्रॉन तो दैट इन एंड्रोमीडा इंस्टेंटली विल बिकम अप। सो इंफॉर्मेशन ट्रेवल्स इंस्टेंटेनियसली व्हिच ब्रेक्स दिस क्वांटम रिलेटिविटी फंडामेंटल स्पीड लिमिट। दैट इज व्हाई आइंस्टाइन सेस गॉड डस नॉट प्ले डाइस। आप लोग जो कर रहे हैं नेचर के सभी नियमों को तोड़ के कर रहा है। [हंसी] इसलिए मैं कहता हूं कि एनीवन हु क्लेम्स ही अंडरस्टैंड्स शी डजंट अंडरस्टैंड। [हंसी] ये फाउंडर ने कहा है

प्रश्न: उपनिषद् में यही बात है

ना वहां पे कहने का अर्थ दूसरा है। वहां पे प्रॉब्लम यह है कि ब्राह्मण का जो स्वरूप है मनसा वाचा कर्मणा तीनों के परे है। सो दैट इज व्हाई आप यह कहेंगे कि मैं उसको समझ लिया है। दैट इज अ कंट्राडिक्शन इन टर्म। यह दैट इज़ अ डिफरेंट कांसेप्ट। दैट इज़ अ डिफरेंट कांसेप्ट। यहां पर आप इंटेलेक्चुअली समझ सकते हैं। थिंग इज दैट यू नीड दैट टाइप ऑफ इंटेलिजेंस। सो दैट इज दैट एक्सट्रीमली कॉम्प्लिकेटेड। इस अर्थ में कहा है। यहां पे है कि इंटेलिजेंस के द्वारा समझा ही नहीं जा सकता। मन मनसा वा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के जो परे हैं उनको आप मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से कैसे समझ सकते हैं? सो हियर इज़ अ प्रॉब्लम ऑफ कॉम्प्लिकेशन। हियर इज़ अ प्रॉब्लम ऑफ इंपॉसिबिलिटी। [हंसी]

प्रश्न: मैंने पढ़ा है कि जब हम इलेक्ट्रॉन को देखने के लिए उस पर प्रकाश डालते हैं, तो वह उसे ऊर्जा प्रदान करता है और उसकी कक्षा बदल जाती है। इसलिए निरीक्षण की क्रिया स्वयं ही इलेक्ट्रॉन की स्थिति में हस्तक्षेप करती है। इसी कारण हम कभी भी इलेक्ट्रॉन की वास्तविक स्थिति को ठीक-ठीक नहीं जान सकते।

यहां पर प्रॉब्लम क्या है? यह जो है ना कि एक्ट ऑफ ऑब्जरवेशन समहाऊ इंटरफेयर विद द एक्सपेरिमेंट। इन लोगों का कहना है दिस लिमिटेशन इज़ विद इन द थ्यरी और विद इन द रियलिटी इटसेल्फ। दिस इज़ नॉट ए प्रॉब्लम वि लिमिटेशन ऑफ ऑब्जर्विंग इंस्ट्रूमेंट। मान लीजिए एक एलियन सिविलाइजेशन है हमारे से मिलियन इयर्स एडवांस। वह भी इस तरह के इंस्ट्रूमेंट को डेवलप करती है कि आपको लाइट फेंकने की जरूरत ही नहीं है। या तो फिर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप वहां पर फोटन भी नहीं इलेक्ट्रॉन के थ्रू आप मेजर करते हैं। तो एनी टाइप ऑफ मेजरिंग इंस्ट्रूमेंट यू टेक इट द एक्ट ऑफ ऑब्जरवेशन इटसेल्फ दैट एक्ट ऑफ कॉन्शियसनेस द मोमेंट यू इंट्रोड्यूस अ कॉन्शियसनेस इट डिस्टर्ब्स द एक्सपेरिमेंट। दिस इज़ अ फंडामेंटल एस्पेक्ट ऑफ़ रियलिटी इटसेल्फ। नॉट अ प्रॉब्लम विथ एक्सपेरिमेंटल लिमिटेशन या या दैट दैट इज इनबिल्ट विद इन द स्ट्रक्चर ऑफ रियलिटी

इसीलिए ठाकुर कहते हैं— पत्ते गिनने में मत लगे रहो, आम खाओ। यह ठीक quantum physics जैसा है।

माने ठाकुर जो कहते हैं दैट इज अ एकजेक्टली परफेक्टली सुपरपजीशनिंग कि हिलता चलता भी है स्थिर भी है इट इज बोथ टुगेदर क्योंकि लिव्ड रियलिटी तो वही है जिस दिन ठाकुर को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी क्या यह पूरा विश्व एक साथ में अदृश्य हो गया था सबके लिए नहीं आई एम श्योर के जिस दिन का निर्विकल्प समाधि ठाकुर को हुआ उस दिन के न्यूज़पेपर खोल के देखेंगे जगत में जैसा चल रहा है सब कुछ वैसा ही चलता है निर्विकल्प समाधि वास ट्रू ओनली फॉर ठाकुर सो हाउ इज इट पॉसिबल दैट वन पर्सन एक्सपीरियंसेस निर्विकल्प समाधि अदर पर्सनंस एक्सपीरियंसेस दिस डे टू डे लाइफ

प्रश्न: हम बड़े शौक से कहते हैं कि जगत मिथ्या है, लेकिन जब काँटा चुभता है तो दर्द बिल्कुल वास्तविक महसूस होता है।

गो देखिए अजतिवाद इसका उत्तर देता है। वह कहता है सपन में कांटा लगा तो स्वप्न में भी दर्द होगा। बट दैट रियलिटी इज लिमिटेड टू योर ड्रीम ओनली। ड्रीम जैसे भंग हो जाता है सपना भी चला जाएगा, स्वप्न में लगा हुआ कांटा भी चला जाएगा। सो दे विल एक्सप्लेन यू एवरीथिंग। किंतु हमने यह एक्सप्लेनेशन को रिजेक्ट करके ब्रह्म शक्ति वाला एक्सप्लेनेशन जो लिया है उसके पीछे का कारण क्या है? पता है? एक्चुअली नेक्स्ट पार्ट में ही आएगा। ठाकुर ने कहा कि मां ने मुझे स्वयं दिखा दिया है कि वही मां वही बिल्ली हुई है। वही प्रतिमा हुई है, यही मंदिर हुई है। और इसीलिए मैंने बिल्ली को मां की भोग की पूरी खिलाई थी। और यह खजान जी ने उनको कंप्लेन करने के लिए लेटर लिखा था मथुर बाबू को। मथुरमार अवस्था बुझतो मथुर मेरी अवस्था समझता था और उसने लेटर लिखकर के कहा छोटू भट्टाचार्य महाशय जो करते हैं करने दो। सो हम इसको यहां पर इसलिए लाते हैं ब्रह्मशक्ति अभेद को क्योंकि ठाकुर ओन विजन इज देयर। अदरवाइज लॉजिकली आप अजातिवाद से सब कुछ समझा सकते हैं। यदि ब्रह्म मुझे यह अनुभूति हो रही है, दर्द हो रहा है। दैट इज अ पार्ट ऑफ द ड्रीम। मैं साधना कर रहा हूं। दैट इज अ पार्ट ऑफ द ड्रीम। साधना में से सिद्धि प्राप्त हो गई। मैं नींद में से जग गया। सो थ्योरेटिकली आप सब कुछ समझा सकते हैं। किंतु यहां पर ठाकुर का एक्सपीरियंस विज़ जो आता है दैट वी हैव टू टेक इनू अकाउंट। हमको तो इसको अकाउंट में लेना है ना। दिस इज आवर अल्टीमेट क्राइटेरिया। हाउ आर यू गोइंग टू एक्सप्लेन दैट कि जब मां ने ही मुझे दिखा दिया कि मां ही सब कुछ हुई है। दैट मींस व्यावहारिक जगत भी इतना ही सत्य है जितना कि पारमार्थिक जगत। दैट इज ठाकुर ओन एक्सपीरियंस। सो बेस्ड ऑन दैट अभी हमको तो रिवर्स जाना है ना। अदरवाइज थ्योरेटिकली यू कैन एक्सप्लेन एवरीथिंग विद इन अजातिवाद।

प्रश्न: हम अभी तक ठाकुर के ब्रह्म-शक्ति-अभेद का माहात्म्य नहीं समझे है. अभी तक हम अद्वैत-वेदान्त की मायाजाल में फंसे है.

आप यह छोड़ दीजिए कि ठाकुर को नहीं समझे हैं। अजातिवाद माने गडपादाचार्य और शंकराचार्य में जो डिफरेंस है वो भी हम नहीं समझ पाए हैं। आप स्टडी करके देखेंगे ना शंकराचार्य इस ट्राइंग इस पसीना निकल जाता है शंकराचार्य को कि अजातिवाद को किस तरह से व्यवहार में ले आया जाए। किस तरह से इसके ऊपर में साधन पद्धति बिठाई जाए। दिस एंटायर डेवलपमेंट ऑफ़ अद्वैत वेदांत इज़ नथिंग बट ट्राइंग टू एक्सप्लेन हाउ निर्गुण निराकार ब्रह्म कैन कन्वर्ट इटसेल्फ इनू और वी कैन सी जीव जगत ईश्वर। दैट इज नथिंग बट दैट। मैंने गौडपादाचार्य से प्रारंभ करके या तो फिर आफ्टर गौपादाचार्य शंकराचार्य से प्रारंभ करके जितनी भी अद्वैत परंपरा है वह इसी चीज को एक्सप्लेन करने के लिए बनी है। नथिंग एल्स। इसीलिए वो महाराज हमेशा कहते हैं आप अद्वैत वेदांत पढ़ेंगे तो आपको एक्चुअली माया के बारे में ही सबसे ज्यादा पढ़ना है कि किस तरह से सृष्टि की रचना हुई दैट इज अ 70% ऑफ इट। अदरवाइज निर्गुण निराकार ब्रह्मण व्हिच इज द अल्टीमेट रियलिटी वो तो गणपादाचार्य ने खोज दिया। स्वप्न जागृत सुशुप्ति तुरी उसके माध्यम से सब कुछ समझा दिया। नाउ यू हैव टू एक्सप्लेन आवर लव रियलिटी। अगेन अगेन सेम थिंग आप गडपादाचार्य से स्टार्ट करके शंकराचार्य से लेकर के जो मॉडर्न डेवलपमेंट है अद्वैत वेदांत में लेटर ट्रेडिशन वो थ्रेड नहीं समझेंगे ना ठाकुर का कंट्रीब्यूशन काेंस नहीं समझ में आएगा अदरवाइज अब अच्छा है ब्रह्म शक्ति अवैध क्या है उसमें पानी स्थिर है भी पानी है हिलताजुलता है तो भी पानी है और समझ लिया बट नो इसकाेंस इसका जो डेप्थ जो है तभी समझ में आएगा जब गड पादाचार्य से स्टार्ट करके जितनी भी अद्वैत ट्रेडिशन है उसको ओवरऑल आप एक एक ना 10000 फीट व्यू होता है ना 20000 फीट व्यू बर्ड्स आई व्यू वो बर्ड्स आई व्यू जब तक नहीं आएगा पूरी ट्रेडिशन का तब तक यू विल नॉट बी एबल टू अंडरस्टैंड द डेप्थ एंडेंस [गला साफ़ करने की आवाज़] ऑफ ठाकुर

प्रश्न: क्या ठाकुर जानते थे कि वे ऐसे महान दार्शनिकों और विद्वानों को चुनौती दे रहे हैं?

ना ठाकुर की दो ठाकुर की जो अवस्थाएं होती थी ना कि बाह्य अवस्था अर्धबाह्य अवस्था और अंतरर्दशा तो वो ठाकुर कहते हैं कि जब वो बहुत सारा उदाहरण है जब पहली बार मिलने को जाते डरते डरते बात करते हैं उन्हें शर्मा के बात करते हैं किंतु जैसे ही वो अवस्था ठाकुर कहते हैं तो हम वही अवस्था हो तब मेरी वही अवस्था हुई राजमणि को चांटा मार दिया [हंसी] पंडित गुलो खड़कुटो बोध हो तो पंडित गुलो ये तण की तरह समझ में आते

प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द अजातिवाद के बारे में क्या कहते है?

सरप्राइजिंगली सरप्राइजिंगली स्वामी जी रेयरली टॉक्स अबाउट गडपादाचार्य यह मैंने तो कंप्लीट वक्स बार-बार पढ़ा है। यह गणपादाचार्य और अजातिवाद मैंने इंडिपेंडेंट स्टडी करके इतना समझा है। नॉट एज अ पार्ट ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि जो भी हमारा गुस्सा है, जो भी हमारा प्रेम है, सब शंकराचार्य को लेकर है। बट शंकराचार्य इज ए डिसाइपल ऑफ गडपादाचार्य और गडपादाचार्य को और प्रैक्टिकल करवा रहे थे। माने ही इज़ नॉट एन प्रोपाउंडर ऑफ एन एक्सट्रीमिस्ट फिलॉसोफी ही इज़ ट्राइंग टू मेक एन एक्सट्रीमिस्ट फिलॉसोफी मोर पेलेटेबल टू जनरल पब्लिक बट यू अंडरस्टैंड आयरननी वो बेचारे करने को गए और ज्यादा प्रैक्ट गाली ही देनी है तो वो वो जो है ऊपर में मेरे भी ऊपर में बैठे हैं उनको दो गाली वो लोकल ब्रांच ऑफिस होता है ना उसके मैनेजर के साथ में झगड़ा करने को जाएंगे वो ला जाओ हेड क्वार्टर में जाओ और उन्होंने जो मूर्ख जैसे डिसीजन लिए मैं तो और ज्यादा प्रैक्टिकल कर रहा हूं। उसका तो मुझे क्रेडिट दो। [हंसी]

प्रश्न: अब आगे हम इसके व्यावहारिक प्रयोगों को समझेंगे, है न?

ठाकुर अपनी जो अनुभूति बताते हैं दैट मींस अभी तक जो हमने डिस्कस किया ठाकुर का वी विल गो टुवर्ड्स अनुभूति। यानी कि हमने यह कंक्लूजन क्यों लिया? क्योंकि ठाकुर की अनुभूति है बोल के यह कंक्लूजन लिया है। अदरवाइज अजातिवाद इन इट्स ओन सेल्फ इज इनफ टू एक्सप्लेन एवरीथिंग थ्योरिटिकली नॉट एन इंटेलेक्चुअल रिकंसिलिएशन। अगेन ठाकुर का तो इंटेलेक्चुअल नहीं है ना। डायरेक्ट दर्शन दिख करवा दिया है। मास्टर महाशय बोलेंगे ठाकुर दुर्बल मनुष्यों की तरह विचार नहीं करते। मां उनको साक्षात दर्शन करवा दे। राइट? अभी ये जितना भी अद्वैत वेदांत की बाद की परंपरा है सब विचार मार्ग के ऊपर में है कि आप किस तरह से अविद्या को समझाएंगे। किस तरह से जीव के संस्कार समझाएंगे। किस तरह से उपासना पद्धति को समझाएंगे। यहां पर ठाकुर को साक्षात दर्शन हुए हैं। बेस्ड ऑन दैट वी हैव टू कंस्ट्रक्ट दिस फिलॉसोफी। हां वो ठाकुर बोलते हैं कि मुझे मां ने सब दिखा दिया है। इसके बाद का जो पैसेज है ना दैट इज एक्सट्रीमली रिलेवेंट कि क्यों हम इस तरह से एक ठाकुर का एक अंडरस्टैंडिंग प्रोजेक्ट कर रहे हैं। वि इज देखिए जो बिगिनिंग फ्रॉम गडपादाचार्य टू कंक्लूजन विद श्री रामकृष्ण। यह पूरा ट्रेडिशन है। गडपादाचार्य ने जो एक पत्थर फेंका है शांत जलाशय में उसको शांत करने के लिए अल्टीमेटली ठाकुर को आना पड़ा है। [हंसी] निर्गुण निराकार ब्रह्मन इफ दैट इज द अल्टीमेट रियलिटी हाउ कैन यू एक्सप्लेन एवरीथिंग एल्स राइट वो पत्थर जो फेंक दिया गडपादाचार्य से अल्टीमेटली ठाकुर सोस दैट इशू प्रॉब्लम एवरीवन एल्स हैव टेकन स्टेप बाय स्टेप बाय स्टेप व्हिच हैज़ कलमिनेटेड विद इन श्री रामकृष्ण यस यस और और वो भी फिर जो बाद का पैसेज हम देखेंगे कि ठाकुर का कंक्लूजन दैट इज नॉट बेस्ड ऑन मीर थिंकिंग दैट्स बेस्ड ऑन विज़ सो दैट हैज़ टू बी हाईलाइटेड। सो

भारतीय दार्शनिक परम्परा : असत से सत तक : नागार्जुन से लेकर गौडपाद - गोविन्दपाद - शंकराचार्य - से श्री रामकृष्ण तक.

ना बाकी सबको भी विज़ हुआ होगा नॉट नेसेसरी। क्योंकि फिर तो मने वने कौन है वो सब है ना कि विज़न को आपको दिखाना नहीं है। एटलीस्ट गडपादाचार्य शंकराचार्य का जहां तक प्रश्न है उनको विज़न तो हुआ ही होगा। अदरवाइज इतना बड़ा स्टेटमेंट दे देना कि निर्गुण निराकार ही एकमात्र सत्य है। देखिए उपनिषद तो बहुत पुराने हैं। हजारों सालों की हमारी परंपरा है। राइट? किंतु जो बीच में जो एक अंधकार युग चला था और फिर यह बुद्धिस्टिक निहिलिज्म जो आ गया था जिस तरह से देखिए बुद्धिज्म में और गपादाचार्य में क्या है? बहुत बार लोग कहते हैं कि गौपादाचार्य इन अ वे फॉलोस नागार्जुन। किंतु नागार्जुन का क्या है? जिस तरह से सृष्टि की रचना ही नहीं हुई। साथ में देयर इज नो चेतन तत्व आल्सो। माने प्रकृति नहीं है तो पुरुष भी नहीं है। अब गपादाचार्य टेक्स वन एस्पेक्ट ऑफ दैट कि प्रकृति की रचना नहीं हुई। सृष्टि की रचना नहीं हुई किंतु एक अल्टीमेट सत्ता इज अ पॉजिटिव अल्टीमेट सत्ता तो है। म उसका अस्तित्व है सत। राइट? सत और असत। असत है कि अस्तित्व ही नहीं है। नागार्जुन इज निहिलिष्ट इन बोथ वे। जगत का जगत भी असत है और जिसको हम एक चेतन तत्व कहते हैं वह भी असत है। निर्वाण इज बिय्ड बोथ वि इज कंप्लीटली निहिलिस्टिक ऑोजिशन। जबकि गडपादाचार्य इवन यदि इस दृष्टि से कहा जाए गौपादाचार्य इज लेस एक्सट्रीमिस्ट देन नागार्जुन कि जगत इज असत बट ब्रह्मन इज सत। म आरोनिकली यदि आयरनी इफ एट ऑल इज देयर शंकराचार्य को हम एक्सट्रीमिस्ट कहते हैं ही इस ट्राइंग टू मॉडरेट ग पादाचार्य और गणपादाचार्य को एक्सट्रीमिस्ट कहेंगे ही ट्राइंग टू मॉडरेट नागार्जुन असत ऑन बोथ साइड ऑफ इक्वेशन शून्य में से शून्य की उत्पत्ति [हंसी] ना ही शून्य है ना ही शून्य में से शून्य की उत्पत्ति है देयर इज़ नथिंग कंप्लीट नहीं [हंसी] दैट इज़ नागार्जुन असत इक्वल्स असत वहां से स्टार्ट करके ठाकुर का सत इक्वल सत कंप्लीट स्पेक्ट्रम माने यदि ठाकुर का कंप्लीट ऑोजिट जिसको कहना है दैट इज नागार्जुन 100% ऑोजिट गडपादाचार्य तो बेचारे एटलीस्ट चलो कि ब्राह्मण इज सत यहां तक तो वो आए हैं ही इस ट्राइंग टू मॉडरेट समथिंग व्हिच इज सो कंप्लीटली एक्सट्रीम दैट इज व्हाई बुद्धिज्म को अवैदिक कहा जाता है ना बुद्धिज्म कैन नेवर बी रिकंसाइल्ड विद इन वैदिक सिस्टम क्योंकि क्योंकि वैदिक सिस्टम का हार्ट ही है कि देयर इज वन चेतन तत्व सत सत इज दी वेदा असत इज बुद्धिज्म कि देयर इज नथिंग अल्टीमेटली व्हाट इज देयर इज निर्वाण। सो बाहर हां बिल्कुल बुद्धिज्म इज़ कंप्लीटली आउटसाइड ऑफ़ नागार्जुन इज़ अ बुद्धिस्ट ही इज़ अ बुद्धिस्ट फिलोस। ही इज़ अ बुद्धिस्ट फिलॉसोफर। दैट इज़ व्हाई ही कैन नेवर बी अ पार्ट ऑफ़ वैदिक सिस्टम। बाद में बाद में। बहुत बाद में। हां हां हां बट नागार्जुन इज़ द वन पर्सन हु हैज़ कॉडिफाइड बुद्धिस्ट फिलॉसोफी एंड नागार्जुन इज़ द वन पर्सन व्हाई बुद्धिज्म हैज़ गॉन आउटसाइड ऑफ़ हिंदूइज़्म। क्योंकि वैदिक परंपरा का हार्ट है सत्य कि देयर इज़ एक अल्टीमेट रियलिटी है। हाउ यू एक्सप्लेन दैट अल्टीमेट रियलिटी? हाउ द जीव जगत ईश्वर आर बोर्न आउट ऑफ दैट अल्टीमेट रियलिटी? दीज़ आर डिटेल्स। बट अल्टीमेट रियलिटी इज़ देयर दैट इज़ सत्य। नागार्जुन कहता है असत नाइदर देयर इज जीव जगत ईश्वर नर देयर इज एनी अल्टीमेट रियलिटी व्हाट इज इज बिय्ड ऑल दैट इज निर्वाण इसीलिए उसका शून्यवाद और इसीलिए यह शून्यवाद और बुद्धिज्म फेल आउटसाइड ऑफ वैदिक ट्रेडिशन। अदरवाइज देखिए इतने सारे अवतार आए सभी तो हिंदूइज़्म के भीतर में समाहित हो गए हैं। वह किसी ने ऐसा क्लेम भी नहीं किया कि हम सेपरेट है ना ही हिंदूइज़्म की ओर से ऐसा कोई क्लेम हुआ है उनको सेपरेट करने का। किंतु जब आप हिंदूइज़्म के फंडामेंटल पे आघात करते हैं कि देयर इज नो सत देयर इज असत एज अल्टीमेट रियलिटी। देन तो फिर आपको तो बाहर जाना ही पड़ेगा। सो दैट इज व्हाई कि वो अवैदिक परंपरा है। इन ऑर्डर टू मेक नागार्जुनास जो एक्सट्रीमिस्ट फिलॉसोफी है असत इक्वल्स असत उसको वैदिक बनाने के लिए एक एक पार्ट उसका सत्य है माने जगत की उत्पत्ति नहीं हुई दैट इज टेकन फ्रॉम नागार्जुन किंतु जगत की उत्पत्ति नहीं हुई देन व्हाट इज देयर दैट इज अल्टीमेट रियलिटी निर्गुण निराकार ब्रह्मण दैट इज सत्य दैट इज अ पार्ट ऑफ [गला साफ़ करने की आवाज़] वैदिक सिस्टम में गणपादाचार्य लेके आए हैं माने दैट इज व्हाई कहते हैं कि मांडुक्य उपनिषद एकमात्र उपनिषद है जो कि जिसके ऊपर में गडपादाचार्य अपना कारिका लिख सकते हैं। देयर इज नो अदर उपनिषद कि जिसके ऊपर में वह कारिका लिखी जा सकती है। क्योंकि सभी उपनिषद में सृष्टि का जो निर्माण है उसकी बात आती है। जबकि मुंड मांडूक्य उपनिषद मांडूक्य उपनिषद एकमात्र उपनिषद है जहां पर सृष्टि का प्रारंभ वगैरह कांसेप्ट ही नहीं आता। सीधा फोर लेवल्स ऑफ कॉन्शियसनेस आ जाता है।

प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द को कठोपनिषद् से इतना प्रेम क्यों था?

देखिए हमारा जो ये डिस्कशन हुआ ना उसमें हमने जीव और साधन पद्धति इसके बारे में थोड़ा सा भी डिस्कशन नहीं किया व्हिच इज अनदर ग्रेट डिबेट विद इन दिस गडपादाचार्यस ट्रेडिशन जिसको कि अभी हमने छुआ ही नहीं है। सो बेस्ड ऑन दैट कि जीव यानी कि इंडिविजुअल हमने जो कुछ भी देखा है ब्रह्मन में कॉस्मिक लेवल पर देखा है। समष्टि के लेवल पर हमारा डिस्कशन है। व्यष्टि लेवल पर हमने कोई डिस्कस किया ही नहीं है। कठोपनिषद का ग्रेटनेस है ये व्यष्टि लेवल पे। कि एक बच्चा किस तरह से उसके भीतर में आत्मश्रद्धा आती है कि वो मृत्यु के दरवाजे पर जाकर मृत्यु के पास में उत्तर मांग सकता है। बट दैट इज़ ऑन अ व्यष्टी लेवल। दैट इज़ व्हाई स्वामी जी के सामने प्रॉब्लम यही था ना समष्टि लेवल पे जो बार-बार कहते हैं वी हैव द हाईएस्ट ऑफ़ द फिलॉसफी बट द वर्स्ट ऑफ इंप्लीमेंटेशन। इफ यू वांट टू अप्लाई इट देन यू हैव टू ब्रिंग इट टू व्यष्टि लेवल ना मनुष्य के लेवल पर लाना पड़ेगा तभी तो यह सब अब जगत है ही नहीं जगत स्वप्नावत है माने उस तरह का आप कहेंगे हाउ कैन इंडिया राइज मैं तो जग भारत के लिए काम करने का कोई प्रयोजन ही नहीं रहता म समष्टि कॉस्मिक फिलॉसोफी को व्यष्टि इंडिविजुअल लेवल पर लाना दैट वास स्वामी जीसस मिशन तो ऑलरेडी कठोपनिषद इज देयर तो यू कैन जस्ट फॉलो दैट नहीं दैट इज मांडूक्य दैट इज मांडूक्या अल्टीमेटली मांडूक्या माने यदि आपको फिलॉसोफी ही देखनी है हाईएस्ट इज मांडूक्य

उपनिषद् को प्रैक्टिकल करने ही होंगे वरना बौद्ध धर्म की तरह अधःपतन आएगा

देखिए बुद्धिज्म के साथ में जो प्रॉब्लम हुए ना स्वामी जी ने कहा ना कि बिकॉज़ ऑफ़ बुद्धिज्म ये भारत का ही जो अवनति हुई है दैट इज द असतवाद माने सृष्टि तीनों काल में नहीं है और सृष्टि का माने परे जो चेतन तत्व है वह भी नहीं है। इज़ निहिलिजज़्म ऑन सच अ स्केल दैट व्हाट इज़ द पर्पस ऑफ़ लाइफ़ देन राइट यहां पे जो शंकराचार्य से स्टार्ट होकर के पर्पस ऑफ लाइफ डे टू डे व्यवहार वो जो प्रैक्टिकिटी साधन उपासना एथिक्स मोरालिटी रिस्पांसिबिलिटी संस्कार संस्कार का प्रवाह वो जो सब क्वेश्चन जो कि शंकराचार्य को निर्गुण निराकार ब्राह्मण के साथ में एसोसिएट करवाने थे दैट एंटायर जर्नी बुद्धिज्म में नागार्जुन के बाद में यह जो पूरा जर्नी है ना टूट गया है क्योंकि देखिए ऑलरेडी यहां पे हमको क्या प्रॉब्लम हो रहा है आपको वन पार्ट ऑफ इक्वेशन सत्य है माने 50% तो सत्य है 50% असत है कि सृष्टि है ही नहीं तब भी हमको इतना पसीना आ जा रहा है अपने व्यवहार में एक एथिक्स और मोरालिटी को बिाने में व्हेन बोथ पार्ट ऑफ इक्वेशन आर असत ना ही चेतन सत है ना ही सृष्टि सत्य है। बोथ असत देन हाउ कैन यू मेक द डे टू डे लाइफ प्रैक्टिकल और फिर बुद्धिज्म वहां से जो टूटता है तो फिर सीधा वो तंत्र और दुनिया भर के वामाचार व्याभचार में जाकर पड़ता है। स्वामी जी ने कहा कि आप बुद्धिज्म का परिणाम देखिए वो कुछ-कुछ नॉर्थ साउथ ईस्ट कंट्रीज में जाकर के कितना व्याभचार वहां पे मंदिरों के ऊपर में आप देखेंगे। अह यह आपने खजुराहो वग़ैरह में भी देखिए ना जहां-जहां पे बुद्धिस्ट इन्फ़्लुएंस है कितना मतलब आपको एक तरह का म काम को लेकर के माने जिसको कहते हैं ना व्गरिटी जिसको कहते हैं कितना व्गरिटी इसमें घुस गया है क्योंकि बोथ साइड ऑफ इक्वेशन आर असत तो व्हाट व्हाट विल यू बेस योर एथिक्स एंड मोरालिटी अपॉन यहां पे 50% असत है उसी में एथिक्स मोरालिटी बिाने में पसीना निकल रहा है इस तरह से कहे ना मैं कहूंगा कि नागार्जुन इज वन ऑफ द ग्रेटेस्ट फिलॉसोफर ऑफ ऑल टाइम कि माने दोनों साइड ऑफ इक्वेशन जगत भी असत है चेतन तत्व भी असत है दैट मींस निर्वाण इज वििन योर हैंड एक्चुअली जैन बुद्धिज्म जो है ना व्हिच इज बेस्ड ऑन दिस अंडरस्टैंडिंग ओनली ये इंस्टेंट एनलाइटनमेंट आप संस्कार का प्रवाह नहीं है आपके कुकर्म नहीं है आपके अविद्या नहीं है देन व्हाट स्टॉप्स यू फ्रॉम अटेनिंग निर्वाण दैट इज योर सिंपल इग्नोरेंस द मोमेंट यू आपके गुरु कह देते हैं कि निर्वाण इज विदिन यू इटसेल्फ द मोमेंट यू अटेन निर्वाण। राइट? सो दैट इज अ फंडामेंटल एस्पेक्ट ऑफ जैन बुद्धिज्म। जैन बुद्धिज्म आज जो इंटेलेक्चुअल लोगों के भीतर में इतना पॉपुलर क्यों है? अमेरिका जाएंगे जो जैन बुद्धिज्म इज़ वेरी पॉपुलर जो कि एक मॉडर्न थिंकिंग लोगों का है। क्योंकि यह जितना भी रिगार्मा रोल है रिलीजन के भीतर में मैं पापी हूं। फिर पाप से मुक्ति पाने के लिए मुझे पुण्य कर्म करना है। वह जितना भी रिगारोल जितना भी नौटंकी है सब एक साथ में उड़ा देता है। इंस्टेंट एनलाइटनमेंट इफ यू हैव दैट कैपेसिटी टू अंडरस्टैंड। दैट वे आई विल कंसीडर नागार्जुन इज द ग्रेटेस्ट ऑफ द ग्रेटेस्ट। गॉड पादाचार्य हिमसेल्फ इज ट्राइंग टू मॉडरेट हिम। पछ वो दूसरा एक्सट्रीम में आ जाता है। दोनों इक्वेशन आर सत। ठाकुर के पास में आएंगे। नागार्जुन टू ठाकुर बोथ पार्ट ऑफ इक्वेशन असत। यहां पे बोथ पार्ट ऑफ इक्वेशन सत्य ना सही में नागार्जुन और ठाकुर का मुलाकात होगा तो पता नहीं क्या [हंसी] ओम