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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 29 aug 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपे अवतार बिषय यहां पर अभी मैंने तो अभी एक बार ऐसा अनुभव हो गया उसके बाद से बारिश में समुंदर के किनारे जाना बंद कर दिया है तो अभी कल एक न्यूज पढ़ रहा था यहां का जो समुंदर है वह 100 ना कि 10050 मीटर वह पीछे में चला गया है यानी कि समुंदर का तला है वह पूरा दिख रहा है और यह लोग कहते हैं जब वो जब वापस आएगा तो इतना जोर से वह आएगा वेव्स उसके वापस कि जो लोग भी वहां पर देखने के लिए गए होंगे सब उसमें पता नहीं क्या हो जाएगा यह समुंदर का किनारा बड़ाही डेंजरस है बारिश में और ऐसा सब होने के समय तो अच्छा तो कथामृत के बारे में हम लोग पाठ कर रहे थे चिंतन कर रहे थे ठाकुर ने जिस तरह से और उसकी पृष्ठ भूमिका क्या है कॉन्टेक्स्ट क्या है तो केशव सेन ब्रह्म समाज यों को लेकर के वहां पर दक्षिणेश्वर आया है जहाज में बैठ कर के गंगा में वो भी और ठाकुर को कहते हैं आइए चलिए जहाज पर आइए हम लोग गंगा में विचरण करते हैं और साथ-साथ में ही आपकी दिव्य अमृतम वाणी का हम लोग श्रवण करेंगे तो ठाकुर उनके साथ में गए हैं चारों ओर सुंदर ज गंगा एक ओर देवालय काली मंदिर के ऊपर में नील शुभ्र आकाश और नीचे में पवित्र गंगावा तो इतना सुंदर परिवेश में सभी लोग भ्रमण कर रहे हैं और ठाकुर अपनी बात कह रहे हैं तो अभी जो टॉपिक हमने कवर किए सबसे पहले तो वही काली ही ब्रह्म है ब्रह्म ही काली है काली शक्ति ब्रह्म अभेद यह एक टॉपिक हुआ और उसके बाद में ठाकुर को प्रश्न किया गया केशव सन ने ठाकुर को प्रश्न किया कि काली किस तरह से विभिन्न लीलाएं करती है वह हमको बताइए तो ठाकुर ने कहा रक्षा काली श्यामा काली स्मशान काली स्मशान काली की भयावह मूर्ति है रक्षा काली प्राकृतिक सा डिजास्टर से नेचरल डिजास्टर से हमारी रक्षा करती है और श्यामा काली का कोमल भाव है वर और अभय दयनी वरा भय दयनी और उनको अपने घर में रख कर के उनकी पूजा भी कर सकते हैं तो इसी तरह से वही और साथ में ही ठाकुर ने सृष्टि और प्रलय तत्व भी समझाया कितना सुंदर रूप से ठाकुर क कहते हैं कि गृहिणी के पास में एक छोटी सी यह रहती है हांडी इस हांडी के भीतर में विभिन्न तरह के बीज रहते हैं तो वैसे ही मां काली क्या करती है जब प्रलय होगा तो सृष्टि के बीज व सब कलेक्ट करके अपने पास में एक ंडी होगी उसमें रख देगी और जब फिर से सृष्टि प्रारंभ होगी तो इसी बीज में से नई सृष्टि की रचना करेगी और यह बीज किस टेक्स्ट में ठाकुर ने कहा है इसका टेक्निकल थोड़ा सा डिस्कशन हमने स्वामी जी के जो शरदचंद्र चक्रवर्ती के साथ में वार्तालाप है उसमें देखा स्वामी जी कहते हैं कि यह जगत जो स्थूल जगत जो पूरा है वह सूक्ष्म शब्द उसके बेसिस पर बना है जैसे कि यह एक शब्द है वस्त्र तो वस्त्र शब्द में से ये स्थूल वस्त्र बने हैं मनुष्य तो शब्द है उसमें से यह स्थूल मनुष्य बना है तो जगत में जितनी भी चीजें हैं सभी के एक एक शब्द है सभी का एक एक नाम है यह नाम आखिर में जब वह प्रलय होगा तो ओमकार में विलीन हो जाएगा स्थूल जगत सबसे पहले तो शब्द जगत में विलीन होगा शब्द फिर ओमकार में विलीन होंगे ओमकार फिर अनादि नाद में विलीन होगा अनादि नाद ब्रह्मण में विलीन होगा यह हो गया प्र और फिर सृष्टि जब रचना होगी तो यही साइकल रिवर्स में चलेगी ब्रह्मण में से अनादि नाद प्रकट होगा अनादि नाद में से ओमकार शब्द गर्भ रूप स्वामी जी ने ओमकार को किस तरह से इंट्रोड्यूस किया है शब्द गर्भ सभी शब्दों का यह रूट फॉर्म है वह है ओमकार तो ओमकार में से फिर शब्द प्रकट होंगे और शब्द में से स्थूल जगत प्रकट होगा तो ठाकुर भी इस तरह से समझाते हैं हमको बड़ा ही आराम से आसानी से समझ में आ जाए और स्वामी जी उसकी थोड़ी सी टेक्निकल डेफिनेशन देते हैं साथ में ही देखिए कि शरद चंद्र क्या लिखते हैं कि स्वामी जी इतना सुंदर रूप से इतनी विषद रूप से इस कांसेप्ट की व्याख्या कर रहे हैं जिससे कि लगता है कि स्वामी जी ने स्वयं स्वयं इस सब चीजों का अनुभव किया है बिना अनुभव किए यह लोग स्वामी जी इतना सुंदर बात कैसे कर पाएंगे जैसे कि अभी मैं वर्णन कर रहा हूं तो मैं तो सब पढ़ करके कर रहा हूं नेचुरली मेरे वर्णन में बहुत सारी कमियां रह जाएगी बहुत सारे अन एक्सप्लेंड पार्ट रह जाएंगे किंतु स्वामी जी जिस तरह से वर्णन कर रहे थे कि इस तरह से प्रलय होता है फिर इस तरह से अभी सृष्टि जद इंडिविजुअल के लेवल पर यदि सोचा जाए यह जगत वैसे की दो लेवल पर विभाजित है यदि हमने वेदांत सार के बारे में जो चार्ट था मैंने शेयर किया था वेदांत सार क्या कहता है एक तो है ब्राह्मण वेदांतसार यानी कि वेदांत अद्वैत वेदांत अद्वैत वेदांत की एक बहुत ही बेसिक टेक्स्ट बुक है वेदांत सार तो वेदांत सार के अनुसार अद्वैत वेदांत क्या कहता है कि एक तो है ब्रह्मण जो कि अचल अटल निष्क्रिय है चेतन स्वरूप है किंतु अपने से कोई भी क्रिया नहीं करता इसके ऊपर में जब अज्ञान का आवरण प्रकट होता है तब क्या होता है दो तरह के अज्ञान होते हैं एक तो व्यष्टि अज्ञान समष्टि अज्ञान समष्टि अज्ञान अर्थात की कॉस्मिक इग्नोर इस कॉस्मिक इग्नोर में से सर्वप्रथम तो ईश्वर प्रकट होते हैं फिर ईश्वर के बाद में एक के बाद एक जो पंच महाभूत रूपी यह जगत है वह प्रकट होता है और यह जो व्यष्टि अज्ञान है ट इज इंडिविजुअल लेवल इग्नोर उसमें से अपना जीवात्मा प्रकट होता है और अब जब प्रलय होता है सृष्टि होती है दो लेवल पर होती है एक तो समग्र ब्रह्मांड की प्रलय और सृष्टि यानी कि यह कॉस्मिक इग्नोर है उसमें यह साइकल चलती है और यह इंडिविजुअल लेवल पर सृष्टि और प्रलय यानी कि इंडिविजुअल लेवल प ये किस तरह से तो हम जब नेति नेति करके समाधि की ओर जाते हैं यह स्थूल जगत उस समय सूक्ष्म जगत में मिलीन हो जाता है शब्द में शब्द ओमकार में चले जाते हैं ओमकार अनादि नाद में उस उसके बाद में ब्रह्म में हम अवस्थित हो जाएंगे ब्रह्म साक्षात्कार होगा ब्रह्म ज्ञान होगा इसके बाद में यदि अवतार कल्प पुरुष है स्वामी जी कहते हैं अवतार के लेवल का जितना कैपेसिटी है वो फिर इसी प्रोसेस को रिवर्स करके जगत में वापस आएगा अनादि नाद ओमकार शब्द स्थूल जगत और फिर किंतु जब वो वापस आएगा तो इस जगत में कैसे रहेगा परमहंस की तरह जैसे कि काजल के कमरे में रहते हैं थोड़ा सा भी उसको दाग नहीं लगेगा पानी में रहते हैं कमल की तरह किंतु पानी उसको स्पर्श नहीं कर पाएगा तो इस तरह से यह महापुरुष यह अवतार कल्प परमहंस जगत में वापस तो आते हैं किंतु अभी यह कर्म का बैंक बैलेंस जो है उनका समाप्त हो जाता है उनका सिर्फ अकाउंट ही क्लोज नहीं हुआ उनकी बैंक भी उठ गई है य तक कि उनका सं पूर्ण रूप से कर्म का चक्र समाप्त हो गया है अभी कुछ भी करे वो वो उनको कर्म लिप्त नहीं होंगे जैसे कि अभी भगवान कृष्ण या भगवान राम के बारे में कई-कई लोग कहते हैं कि अन एथिकल कुछ कुछ मींस कुछ कुछ उपाय उन्होंने अवलंबन किए थे युद्ध में जीतने के लिए ऐसी बहुत सारी घटनाएं है उसकी ज्यादा विवरण में नहीं जाकर के किंतु जब प्रश्न होगा कि धर्म और अधर्म एथिक्स और अन एथिक मोरालिटी और इम्मोरलिटी इसमें से किसको पसंद करें हमको तो नेचुरली हमको पता है कि कर्म का बंधन जो है कर्म है वह बड़ा ही क्लियर है कर्म का रोल कि जब भी आप कोई गलत कार्य करेंगे अन एथिकल कार्य करेंगे तो आपको कर्म का बंधन होगा आपका नेगेटिव कर्म बढ़ेगा कोई प्रॉपर धर्म के रास्ते प चलेंगे तो कर्म का बंधन नहीं लगेगा तो और इतना ही नहीं कर्म के बंधन से वह छुटकारा भी मिलेगा तो जब हम किसी को अन एथिकल का खास करके हमारे अवतार कल्प पुरुष को करते हुए देखते हैं तो हमको प्रश्न होता है कि वह अवतार होकर के भी ऐसा क्यों कर रहे हैं तो उस समय यह सॉल्यूशन है कि वह ब्रह्मज्ञान लेकर के इस जगत में रह रहे हैं उनका कर्म का जो पूरा फंदा है पूरा विष चक्र है ऑलरेडी टूट चुका है यह जो संसार चक्र वल ऑफ संसारा वो टूट गया है अभी वह कुछ भी करें उनको किसी भी तरह का वो नेगेटिव कर्मा नहीं लगेगा अभी एक बार ठाकुर ने किसी के बारे में कहा जनरली ठाकुर किसी के बारे में कुछ भी कहते हैं तो वो नाम दे कर के कहते हैं कि अच्छा ये कैप्टन ऐसा कह रहा था कि फिर यह नरेंद्र ऐसा कह रहा था तो या गिरीश ऐसा कह रहा है ऐसा करके ठाकुर नाम देक के उनके बारे में बात करेंगे किंतु यह जो व्यक्ति है उनके बारे में उन्होंने नाम नहीं दिया ठाकुर पहले ही कहते हैं एक जन 100 हज टाक जन कोर्टे मिथ्या जबानी दिए और नाम कामी करबो ना माने एक व्यक्ति है उसने 00 के लिए कोर्ट में जाकर के मिथ्या जुबानी दी है मैं उसका नाम नहीं करूंगा फिर उसने आकर के मुझे कहा कि बाबा आप एक काम कीजिए यह अर्घ्य मां को अर्पण कीजिए जिससे कि यह मुकदमा में जीत जाऊ तो ठाकुर कहता है मैंने भी बड़े सरल हृदय से मां को इस तरह से अर्ग अर्पित कर दिया तो किसी ने कहा अरे यह किस तरह का आदमी है पहले तो वह खुद झूठ बोलता है फिर आपके पास में गलत कार्य करवाता है कि गलत गलत मुकदमा वो लड़ेगा जीतेगा और फिर वह उसमें फिर आपको आपके द्वारा मां के पास में अर्घ्य अर्पण करवाता है जिससे कि वह जीत जाए यहां पर ठाकुर के पिताजी को देखिए कुदीराम को देरे ग्राम में व जहां पर वह पहले रह रहे थे वहां पर जमींदार ने कहा कि आपको मिथ्या जुबानी देनी होगी मिथ्या साक्षी देनी होगी कोर्ट में जाकर के तो मिथ्या कथा नहीं कहने के लिए मिथ्या बात नहीं करेंगे ऐसा करके उन्होंने अपना पूरा गांव छोड़ कर के कामर पुरा गए यहां पर यह व्यक्ति है पहले तो झूठ मुठ का व कोर्ट में जाकर के साक्षी देता है फिर ठाकुर के पास जाकर के मां को अर्घ्य प्रदान करता है अर्घ्य क्या है पता है ना वो बिल्व पत्र होता है बिल्व पत्र के ऊपर में चंदन लगा कर के पुष्प रख करके वह ठाकुर को जो अर्पण करते हैं उसको अर्घ्य कहते हैं तो अर्घ्य बड़ा ही पवित्र होता है तो ठाकुर के पास अर्घ्य भी दे दिया ये किस तरह का आदमी है तो ठाकुर को तो सही उसके साथ में एग्री होना चाहिए कि अरे ये किस तरह का आदमी है उसने मेरे पास में से ऐसा गलत काम करवा दिया तो ऐसा नहीं कह के ठाकर क्या कहते हैं कि किंतु देखो कि उसका विश्वास कैसा है इस आदमी का कि जिसने मेरे उसने ये ठीक करके रखा है कि मैं यदि अर्घ्य दूंगा अर्थात ठाकुर तो वो सही सही उसका काम हो जाएगा देखिए उसका विश्वास कैसा है तो ये पढ़ कर के ही मैं तो आश्चर्य चकित हो गया कि यह सत्य संकल्प ठाकुर स्वयं सत्य स्वरूप ठाकुर ने क्या कहा था कि मैंने मां को सब कुछ दे दिया है कि यह रहा धर्म यह रहा रहा तुम्हारा धर्म सब कुछ जो है तुमको दे दिया किंतु यह तुम्हारा सत्य यह तुम्हारा असत्य ऐसा करके मैं मां को दे नहीं पाया मैं सत्य मां को नहीं दे पाया सत्य ही कली की तपस्या है यह सत्य संकल्प ठाकुर स्वयं यह कैसी बात करते हैं कि एक व्यक्ति ने मिथ्या साक्षी दी ठाकुर के पास में मां मां काली को अर्घ्य दिलवाया यह कह के कि यह मिथ्या जो कोर्ट केस है गलत कोर्ट केस उसमें वो जीत जाए ठाकुर ने सरल रूप से दे भी दिया और फिर उस व्यक्ति की निंदा करने की बजाय क्या कहते हैं कि उसका विश्वास देखो कि मैं यदि अर्घ्य दूंगा तो उसका काम हो जाएगा तो यह तो एक तो बड़ा ही आश्चर्य बात है ठाकुर क्या ऐसा कहना चाहते हैं कि मेरे पर विश्वास रखने से गलत काम करोगे तो उसमें भी तुम लोग सक्सेसफुल हो जाओगे ये तो मैसेज तो ऐसा ही जाता है उप अलग दृष्टि से यदि देख जाए तो इसकी किस तरह से व्याख्या करेंगे वो कहना मुश्किल है क्योंकि जिस तरह से ठाकुर ने पहले तो पहली बात है कि ठाकुर ने कहा कि मैं उसका नाम नहीं दूंगा किंतु जिस तरह से वह ठाकुर अपना सेंटेंस फॉर्म करते हैं ना वह व्यक्ति आकर के ठाकुर को कहता है कि बाबा आप यह अर्घ दे दीजिए अब यह बाबा शब्द ठाकुर के बारे में मथुर बाबू यूज करते थे और मथुर बाबू का ही एक ऐसा एक था ठाकुर के प्रति इतना जो आप किसी को आप हक से कब कह पाएंगे कोई भले ही चाहे आपकी किसी के ऊपर में भले ही चाहे बड़ी श्रद्धा है कोई आपसे बड़ा सीनियर है कि जिनके प्रति आप बड़े ही विनम्र हो कर के रहते हैं किंतु फिर भी उनको आप मने एकदम जोर करके कहेंगे वो कब होगा कि इस व्यक्ति के ऊपर में आपका प्रेम इतना है यह जो प्रेम का संबंध है वो सीनियरिटी और जूनियो यह भक्त और भगवान ये दोनों के बीच की जो जो दूरी है वो मिटा देता है भक्त यदि भगवान के ऊपर में सही सही श्रद्धा है तो भगवान को भी जोर करके कह सकता है कि आपको यह करना ही पड़ेगा नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा तो यहां पे भी ये जयराम बाटी में एक लड़का आया एक दिन तो आकर के मां को कह रहा है कि मां तुमको मुझे दीक्षा देनी पड़ेगी तो माने तो वैसे तो मां किसी के बारे में नात जात ये सब उस समय का जो एक पड़ा था कि ये कौन सी जात का है ये कौन सी नात का है वो जो राधु का था ना कि राधु ने मां ने राधु को कहा कि जाओ इनको एक उनको ट्रीटमेंट करने के लिए मां की ट्रीटमेंट कर लिए डॉक्टर आता था इसको प्रणाम करो तो जब राधु ने उसको प्रणाम किया तो बाकी सब लोग पूछने लगे अरे मां ये तो राधू तो ब्राह्मण की लड़की है वो आदमी कौन है कौन सी जात है उसकी तो मां ने कहा वैद्य तो सब लोग बोलने लगे अरे वैद्य को ब्राह्मण कैसे प्रणाम करेगा तो मां ने कहा अरे वो तो उसकी विध्या देखिए विध्या के आधार पर तो हम उसको श्रद्धा करते हैं उनको हम रिस्पेक्ट देते हैं तो मां को मां के भीतर में खुद में यह सब नात जात वगैरह नहीं था किंतु जो आसपास में जो लोग रहते थे और वो भी यह घटना है जयराम बाटी की तो जयराम बाटी तो अभी कोलकाता में तो फिर भी चलो अभी एनोनिमिटी हो जाता है आप बड़े शहर में जाएंगे किसी फ्लैट में या किसी सोसाइटी में रहते हैं तो आपके बगल में कौन रहता है आपको पता भी नहीं है वो तो एनोनिमिटी बहुत हो जाती है क्योंकि पॉपुलेशन इतनी सारी है कौन किसकी खबर रखेगा किंतु छोटे गांव में सब लोग एक दूसरे की खबर रखते हैं समय भी इतना होता है कि हां अभी थोड़ा सा उसके ऊपर नजर रखी जाए देखते हैं वो क्या करता है तो ये जयराम बाटी की घटना है ये लड़का आया मां के पास में कहता है कि मां दीक्षा देनी ही पड़ेगी तो मां ने उसको लड़के को देख कर के ही पूछा थोड़ा सा कौन सी जात का है तो उसने कहा बागदी बागदी यानी कि उस समय अभी आजकल तो ये सब होता नहीं है वो होना भी नहीं चाहिए किंतु उस समय ऐसा था कि थोड़ा सा छोटी जात का कहलाता था निम्न जात का कहलाता था तो मां ने कहा कि एक काम करो तुम कोलकाता में आओ उद्बोधन में आओ मैं तुमको वहां पर दीक्षा दूंगी तो यह लड़का एकदम जोर करके बोल उठा कि जब आपको जरूरत पड़ी थी तो एक बागदी को बाप बना दिया किंतु अभी आपको आवश्यकता नहीं है तो एक बागदी को बेटा बनाने में आपको संकोच हो रहा है बागदी को बाप बनाना अर्थात की मां वो जो तेलो भेलो के मैदान से जा रही थी उस समय तो ऐसा था ना कि जयराम बाटी से कलकत्ता आना है ठाकुर को मिलने के लिए दक्षिणेश्वर में जयराम बाटी है मां का जन्मस्थान कामर पुकुर है ठाकुर का जन्मस्थान अर्थात कि मां का ससुराल तो सब पासपास में ही है तो जयराम बाटी या कामर पुकुर इन दोनों में से यदि कोलकात्ता आना है तो वैसे तो साधन सुविधा तो इतनी थी ही नहीं पैदल ही आना पड़ता था और पैदल आते-आते रास्ते में तेलो भेलो बोल कर के बड़ा ही विकट मैदान जैसा आता था जंगल जैसा जिसमें कि डके तों का बड़ा भय था तो मां आ रही थी रास्ते में अकेली हो गई बाकी अपने साथी लोग आगे चल गए मां अकेली अकेली चल रही है एक एक बड़ा ही काले कलर का एक मजबूत एक शक्तिमान एक पुरुष उनके सामने आया देख कर के ही डर लगे ऐसा विकट चेहरा और मां को पूछ रहा है कि कौन है रे क्या रे कोथा जा छो कहां पे जा रही हो तो एकदम जोर से पूछा तो मां ने कहा पूब अर्थात कि अभी पूर्व में जो भी होगा पूवे का अर्थ तो जैसे ही अभी किंतु साथ-साथ में ही ऐसे डकेट को देख कर के क्योंकि वो डाकू ही होगा जिस तरह से इस अंधेरे में जा रहा है वह लाठी लेकर के और उसका विकट स्वरूप देकर के तो माने इमीडिएट कहा कि बाबा आमी अपनार में शारदा कि पिताजी मैं आपकी बेटी शारदा हूं तो मां का जो एकाएक बालिका भाव का जो अवतरण हुआ बालिका भाव जो प्रकट हुआ यह पुरुष जो था डके तो जो था वो एकदम नरम हो गया कि उसने कहा कि अच्छा बिटिया तुम डरो मत मेरी बीवी पीछे में आ रही है वो भी आएगी हम दोनों तुमको बिना किसी विघ्न के यह मैदान पार करके हम तुमको अपने घर पर रख देंगे तो ये सही सही यह लोग मां की इतनी जतन करके वहां पे वो मैदान पार करवाया सुबह को एक जगह पे गांव में पहुंचे तो गांव में मां को नाश्ता खाना भी खिलाया वहां पे गांव के मां के बाकी जो संगी थे जो मां को छोड़ कर के चले गए थे वो मां के इकट्ठा हो गए पूछने लगे अरे ये डकेट जैसा आदमी कौन है तो मां ने कहा ये मेरे डाकत बाबा है तो डाकेत बाबा अब ये डकेट जो था वो था बागदी तो अभी यह स्टोरी तो सबको पता है कि अभी इस तरह से जैसे ही उसका भय देखा तो इमीडिएट मां ने ऐसा कह दिया कि मैं तो आपकी बेटी शारदा हूं तो इमीडिएट वो पुज जो डक था उसके मन में भी पितृ भाव का आविर्भाव हुआ प्रादुर्भाव हुआ और मां को एकदम अपनी बिटिया की तरह उसने ट्रीट करना शुरू किया तो यह लड़का देखिए किंतु कैसा चालाक है मां के मुंह पर बोल दिया कि तुमको जब जरूरत पड़ी थी तब एक डकेट को अपना बाप बना लिया किंतु अब तुमको जरूरत नहीं है लोक लज्जा ये सब अभी तुमको लग रही है अभी एक अभी एक बागदी एक बागदी को तुम अपना बेटा नहीं बना सकती तो अभी देखिए कि कोई अभी कहां मां और कहां यह लड़का वो कहां उन दोनों के बीच में कोई तुलना ही नहीं है आध्यात्मिक यदि दृष्टि से देखा जाए तो किंतु मां ने जैसा ही ऐसा कहा ये लड़के ने तो एकदम हंस कर के कह दी अच्छा ठीक है चलो मैं तुमको यहां पर दीक्षा दूंगी तो अभी ये लड़का जब चला गया तो वहां पर मां के तो बाकी सब भक्त भी तो है वो लोग भी तो यह सब घटना चक्र देख रहे हैं तो वहां पे वो ब्राह्मण भक्त वगैरह तो एक ब्राह्मण भक्त था उसने कहा कि देखो यह बेटे ने इस लड़के ने जैसे कि डकती करके ही मां के पास में से ये मंत्र लिया है हम लोग ब्राह्मण के लड़के हैं जन्म जन्मांतर तक मां की आराधना करेंगे स्तव स्तुति करेंगे मां जब कृपा करेगी तब हमको मंत्र मिलेगा और इस लड़के ने डके डाल कर के जोड़ करके मंत्र लेकर गया है मां के पास तो ये जोर आप कब कर सकते हैं जबकि आपकी सही सही श्रद्धा हो कोई ऐसा वैसा आदमी जाकर के मां के साथ में ऐसी बातें करने से तो भक्त लोग उसकी पिटाई कर देंगे किंतु भक्ति है तो भगवान भी भक्ति के वश हो जाते हैं तो यहां पे देखिए कि ये जिसने भी ठाकुर को कहा ठाकुर कहते हैं अ और नामत करोना मैं उसका नाम नहीं दूंगा किंतु जिस तरह से उसने कहा कि बाबा आप ये अर्घ्य दीजिए और जिस हक से कहा तो ये बाबा शब्द और यह हक जताना ठाकुर के ऊपर में जोर चलाना अपना यह मथुर बाबू ही थे जो कि इस तरह से कर सकते थे तो भले ही चाहे ठाकुर ने नाम नहीं दिया मैं पूरा अनुमान करके कह सकता हूं कि मथुर बाबू तो अभी यहां पर प्रश्न होता है एथिकल क्वेश्चन खड़ा होता है कि ठाकुर क्या यह कहना चाहते हैं कि यदि मेरे पर श्रद्धा है तो फिर मेरी श्रद्धा के जोर पर तुम लोग गलत काम करोगे झूठ जबानी भी दोगे तो वो भी आपका उससे भी आपको कोई डर नहीं है उससे भी आपको कोई हानि नहीं होंगी क्या ठाकुर ऐसा कहना चाहते हैं पता नहीं अभी इसके बारे में ये जो अवतार कल्प जो पुरुष होते हैं उनके बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है किंतु आखिर में जो हमारा जो टॉपिक था कि जब आप ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करके आपके जन्म जन्मांतर के कर्मों का यह चक्र है उसको तोड़ कर के जब परमहंस होकर के संसार में वापस आकर के रहते हैं उस समय किंतु यह अच्छा कर्म बुरा कर्म सत कर्म असत कर्म वह सब आपको स्पर्श ही नहीं करेगा कोई भी तरह के कर्म का आपको किसी भी तरह का बंधन नहीं लगेगा इसका अर्थ यह नहीं है कि आप चाहे तो कोई भी गलत काम कर सकते हैं इसका अर्थ यह है कि ठाकुर कहते हैं कि परमहंस की गलती से भी गलती नहीं कर सकता क्योंकि उसको कंट्रोल करने वाली उसको चलाने वाली जगत जननी मां स्वयं है ब्रह्मज्ञान को अपने आंचल में बांध करके ब्रह्मज्ञान को अपने पॉकेट में रख करके आप जो चाहे वह कर सकते हैं इसके बाद में इस जगत में अच्छा बुरा ये सबके आप उर्ध्व उठ जाएंगे जैसे कि स्वामी जी कहते हैं कि इट इज द नेचर ऑफ द ब्रूट टू रिमन वेयर ही इज एक पशु का स्वभाव है कि वह जहां पर है वहां पर ही रहे इट इज द नेचर ऑफ मैन टू अवॉइड इवल एंड सीक गुड एक मनुष्य का स्वभाव है कि वह अच्छे के पीछे में दौड़े और अनिष्ट को तजे इष्ट के पीछे में दौड़े अनिष्ट को तजे एंड इट इज द नेचर ऑफ द गॉड टू गो बियोंड गुड एंड इवल एंड एस्टेब्लिश हिमसेल्फ इन एवरलाइट और अनिष्ट इन दोनों के परे जाकर के अनंत शांति के समुंदर में वो जाए लेट अस बी गॉड आओ हम सब अपने को देवता बनाए तो यह गुड एंड इविल इष्ट एंड अनिष्ट सत्कर्म असत कर्म इन सबके परे जाकर के बाद में आप इस जगत में अवस्था करेंगे तो यह सृष्टि स्थिति प्रलय दो लेवल प एक तो कॉस्मिक लेवल प दूसरा है इंडिविजुअल लेवल प समष्टि लेवल पर और व्यष्टि लेवल पर यह ठाकुर और स्वामी जी हमको समझाते हैं अभी इसके बाद में थोड़ा थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं ठाकुर कहते हैं काली की कालो अर्थात काली क्या काली है काले कलर की है दूरे ताई कालो जानते पारले कालो नय दूर से देखते हैं तो मां काली काले कलर की दिखती है श्याम वर्ण दिखती है किंतु जब आप उनको जान लेते हैं तब वह श्याम वर्ण श्याम नहीं रहता आकाश दूर थे के नील वर्णों काछ देखो कोनो रंग नाई आकाश को आप दूर से देखेंगे तो नील वर्ण का दिखाई देगा पास में जाके देखेंगे आकाश का कोई कलर नहीं है और यह भी ठाकुर जैसे कि मॉडर्न एस्ट्रोनॉमी पढ़ कर के यह बात कह रहे हैं आप जब स्पेस में जाएंगे तो पता चलेगा कि स्पेस में किसी भी तरह का कलर नहीं है उजाला नहीं है तो सब काला दिखता है अंधेरा दिखता है किंतु यदि आप जिस कलर का वो उजाला फेंकें उस कलर का स्पेस आपको दिखाई देगा समुद्र जोल दूर थे के नील काछ गए हाथे तुले देखो कोनो रंग नाई समुंदर का जल आपको दूर से नील वर्ण दिखाई देगा पास में जाकर के आप अपने हाथ में थोड़ा सा पानी उठाकर देखिए पानी का खुद का कोई रंग नहीं है एक कोथा बोलिए प्रेम मत होया श्री राम कृष्ण गान धरी लेन यह बात क करके प्रेम मत होकर के भगवान श्री राम कृष्ण ने गान गाया मां की आमार कालो रे कालो रूप दिगंबरी हित पद दो को रे आलो रे मां क्या हमारी काली है काला रूप धर के यह दिगंबरी मेरे हृदय पद्म को प्रकाशित कर रही है अभी इसके बाद में पंचम परिच्छेद पांचवा अध्याय श्री रामकृष्ण केशवा दीर प्रदी केशव वगैरा के प्रती ठाकुर कहते हैं बंधन आर मुक्ति बंधन और मुक्ति यर कताई तीनी इन दोनों के करता है मां काली स्वयं तार माया ते संसारी जीव कामिनी कांचन बद्धो आभार तार दया होली मुक्तो मां काली की माया से ही हम संसारी लोग कामिनी कांचन में बद्ध है और जैसे ही मां की दया होगी हम इस का कांचन रूपी माया से मुक्त हो जाएंगे विषयों के प्रति प्रलोभन है उससे मुक्त हो जाएंगे तीनी भव बंधने बंधन हारिणी तारिणी वो भव बंधन का बंधन कट करने वाली काटने वाली भव तारिणी स्वयं है ए बोलि गंधर्व निंद तो कुंठे राम प्रसादे गान गाते छन ऐसा करक ही ठाकुर गंधर्व निंद कंठ गंधर्व यानी कि अपने पुराण में देखेंगे जो देवताओं की सभा होती थी उसमें जो गान कीर्तन करते थे भजन करते थे उनको गंधर्व कहते हैं और ठाकुर का कंठ है इतना मधुर है इतना मीठा है कि गंधर्व भी उससे ईर्ष वित हो जाए गंधर्व भी उससे जेलस हो जाए कि मेरे पास में इतना सुल इत कंठ होता तो मैं भी कितना अच्छा गान गाता भी गंधर्व जो कि देवताओं की शोभा में गान गाने का सौभाग्य जिनको प्राप्त है उनका कंठ उनकी वाणी कितनी सुंदर होगी मधुर होंगी किंतु वे लोग भी ईर्ष वित हो जाएंगे इस तरह की गंधर्व निंदी कंठे राम प्रसाद गान गाते छन राम प्रसाद का गान गा रहे हैं श्यामा मा उड़ा छ गुड़ी भो सं भो संसार बाजार माझ अर्थात की श्यामा मां उड़ा रही है यह घोड़ी अर्थात की यह पतंग काइट भव संसार बाजार के मा बीच में ज आशा वायु भ भरे उड़े बांधा तो है माया दड़ीसेठ रही है बांधा ता है माया बांधी हुई है काक गोंडी गोंडी मंडी गाथा पंजरा आदी नाना नाड़ी अभी यह सब पूरा इस तरह से वर्णन है इस इसमें जद हम जाएंगे तो बहुत सारा समय जाएगा और इसके लिए मुझे थोड़ा सा ट्रांसलेशन भी चाहिए क्योंकि यह जो बंगोली है वो पद के रूप में है तो पद बंगाली इतना अच्छे से मैं नहीं समझ पाऊंगा जितना अच्छे से मैं गद्य बंगाली समझता हूं तो अभी इसके लिए जब ट्रांसलेशन मैं साथ में रखूंगा और थोड़ा सा विवरण हम देखेंगे आज मैं इस गान को स्किप करके सीधा ठाकुर जो बताते हैं उसके ऊपर चला आता हूं ठाकुर क्या कहते हैं तीनी लीला मई माहे लीला मई ए संसार तार लीला यह संसार है मां की लीला तीनी इच्छामृत्यु ल एक लख लोगों के भीतर में एक को मुक्ति देती है यहां पर यह गान में है घुड़ी लखे रूटो एकटा काटे हेश दाव मा हाथ चापड़ी यह बड़ा ही फेमस लाइन है जो एक लाख पतंग उड़ रही है उसमें से एक दो का धागा काट देगी और फिर हंसते हंसते हाथ ताली देगी अब यह पतंग रूपी उपमा से जो ठाकुर समझाना चाहते हैं किय मनुष्य का जो हम हम लोग जो है ये पतंग की तरह है हमको यह माया पाश से मां ने बांध करके रखा है माया रूपी यह रस्सी से धागे से हमको बांध करके रखा है बीच-बीच में और इस तरह की लाखों पतंग मां उड़ा रही है हम लोग जितने भी मनुष्य है सब पतंग रूपी हम सब माया के इस आकाश में उड़ रहे हैं और हम सबका धागा जो है मां काली के हाथ में है जब मां काली कहेगी कि हां मैं इसको मुक्ति दे देती हूं तो उसका धागा वो काट देगी और जैसे ही उसका धागा कटा ये जो पतंग है यानी कि जिस मनुष्य को माया पाश से माने मुक्त कर दिया वह मनुष्य हंसता हंसता ये ईश्वर रूपी अनंत शांति रूपी नीला काश में वह आनंद से विचरण करता रहेगा बाकी जितने भी लोग हैं वह सब इस माया पाश से इस जगत में बंधे पड़े रहेंगे तो बेसिकली यह कहना चाहते हैं कि यह जितना भी माया पाश से बांधना और माया पाश को काटना यह दोनों मां के हाथ में है और मां लीलाम है उनकी इच्छा होने से किसी को भी मुक्ति दे देंगे इच्छा होने से नहीं देंगे जैसे कि एक बच्चे की उपमा ठाकुर देते हैं एक बच्चे के पास में उसके पिताजी ने उसको एक नया वस्त्र पहनाया है तो कोई एक मेहमान जाएगा तो नया वस्त्र देकर के बच्चे को कहता है कि अरे ये तो बड़ा सुंदर वस्त्र है एक काम करो मुझे दे दो मुझे भी चाहिए इसको तो बच्चा कहेगा नहीं नहीं नहीं दूंगा क्यों दूंगा मेरे पिताजी ने दिया है ऐसा करके वो बड़ा आनंद से नया वस्त्र पहन के घूमेगा और एकाएक कोई भिखारी वगैरह आएगा कहेगा कि मुझे एक नया वस्त्र दे दो तो उसको निकाल कर के के दे भी दिया बच्चे को कुछ नहीं है वो किसको क्या देगा क्या नहीं देगा कब रोएगा कब नहीं रोएगा कब मां को परेशान करेगा कब शांति से खेलेगा उसको कुछ भी लॉजिक नहीं चलता है बच्चे के ऊपर में तो वैसे ही मां काली के ऊपर में भी कोई भी लॉजिक नहीं चलेगा आप लाखों साल हजारों साल तपस्या करते ही जाइए करते ही जाइए आपको कुछ मिलेगा नहीं ऊपर से अशांति बढ़ेगी ऊपर से माया का बंधन बढ़ेगा और एक व्यक्ति है उसने कुछ नहीं किया और फटाक करके उसको मुक्ति भी मिल गई अभी जैसे कि वो ठाकुर की कहानी है एक व्यक्ति जा रहा था रास्ते से देखा कि स्मशान पास में है उसमें एक व्यक्ति एक दूसरा साधक तांत्रिक साधक व शब साधना कर रहा है शब साधना अर्थात कि पता होगा कि स्मशान में जाकर के जो एक एक शब होता है डेड बॉडी होता है उसके ऊपर में आसित होक के उसके ऊपर में बैठ कर के आपको जप करना है इसके पीछे का भाव क्या है यह वही वो कराल वदनी मां काली कि ये भयावह जो भाव है इस जगत में इस भयावह भाव के ऊपर में आपको जीत प्राप्त करनी है आप अपने कमरे में बैठ कर के एसी चला कर के फैन चला करके बढ़िया मजे से आप जप करेंगे अच्छी बात है उसमें कोई गलत नहीं है किंतु आपका टेस्ट कब होगा कि आपको आप ठीक ठीक आपका मन जप में लगा है कि नहीं भगवान बुद्ध की वार्ता है कि जिस रात को उनको निर्वाण मिलने वाला था मारा अर्थात कि वो जो दैत्य जो कि अविद्या का प्रतीक है ये जो माया का प्रतीक है वो आकर के भगवान बुद्ध को विभिन्न रूप से प्रलोभन देने लगा उसका आशय यह था वो उसकी इच्छा यह थी कि कैसे भी करके भगवान बुद्ध को उसके तपस्या में से विचित करें जिससे कि वह निर्वाण प्राप्ति ना करे इससे क्या होगा कि जगत पूरा इस दैत्य के वश में रहेगा माया के वश में रहेगा किंतु जैसे ही भगवान बुद्ध निर्वाण प्राप्ति करेंगे वो घर-घर जाकर के निर्वाण का संदेश फैलाए और कितने ही लोग निर्माण के रास्ते पर चलना शुरू कर देंगे तो यह माया का राज्य जो है वो कम हो जाएगा उसका जो प्रभाव कम हो जाएगा तो पहले तो भगवान बुद्ध को प्रलोभन देना शुरू करता है प्रलोभन से नहीं मानते तो उनको भय दिखाना शुरू करता है विभिन्न तरह के दैत्य राक्षस भूत पिशाच पलित जितने भी है सब आकर के उनको भय दिखा रहे हैं उनके आसपास में चिल्ला रहे हैं और अभी हमको तो बोलने में तो और कहानी बताने में और सुनने में कुछ फर्क नहीं पड़ता किंतु यदि सही सही में आप जंगल में अकेले बैठे हैं और कोई भूत पिशाच पास में आ जाए तो क्या परिस्थिति होगी सोच कर के देखिए मेरी खुद की एक ऐसा अनुभव है जब उन सबके बारे में चर्चा करते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है किंतु जब वो घटना हमारे साथ में स्वयं हो जाती है तो पता नहीं यह सब कहां पर चला जाता है तो यह जो शब साधना है यह जो जिस तरह से वह जो दैत्य ने मारा ने भगवान बुद्ध को भय दिखाया इन सबके पीछे यही थिरी है कि आप बड़े मजे से अपने घर में साधन भजन कीजिए वो ठीक ठीक है किंतु आपका मन सही सही दृढ़ हुआ है कि नहीं यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का ये जो चक्र है उसके ऊपर में से अपने को ऊपर उठा लिया है कि नहीं यह मृत्यु भय जो है जोक सबसे बड़ा अपना आखिरी बंधन है इस मृत्यु भय से आपने अपने को मुक्त कर दिया है कि नहीं यह टेस्ट करने के लिए यह दैत्य जिस तरह से भगवान बुद्ध को भय दिखाता था वैसे ही ये शब साधना की जाती है और उसमें भी क्या होता है पता है कि शव साधना में ऐसा है कि आपको पास में थोड़ा सा यह कुछ ये कुछ नाश्ता वगैरह कुछ रखना होगा छोला है वगैरह कुछ रखना होगा यदि शव साधना करते करते शब एकाएक जागृत हो जाए और हा करके आपको भय दिखाए तो उसके मुंह में कुछ खाने को डाल देना है तो खाते खाते शब्द ये जो डेडबॉडी है वो शांत हो जाएगा तो ये आदमी जा रहा था रास्ते से और उसने देखा कि स्मशान है स्मशान में एक व्यक्ति शब साधना कर रहा है शव है उसके ऊपर में सब कुछ उसने पूजा करने का सब उपकरण जुगाड़ करके इकट्ठा करके रखा है जैसे ही वो शब पर सवार हुआ जप करने के लिए वैसे ही एक शेर कहां से आ गया इस आदमी को खा कर के पकड़ कर के चला गया अभी यह जो आदमी जो पास में से जा रहा था उसने देखा सब कुछ रेडी है शब साधना करने के लिए सब उपकरण तैयार है तो उसने क्या किया उसके ऊपर जाकर के बैठ कर के न्यास वगैरह करके उसने सीधा जब चालू कर दिया वो कुछ क्षण जप किया उसी में मां प्रकट हुई कही कि बेटा बताओ तुमको क्या वरदान चाहिए अभी जैसे ही मां ने ऐसा कहा जगदंबा ने ऐसा कहा कि क्या वरदान चाहिए तो वरदान तो जो भी मांगेगा मांगेगा साथ में उसने पहले प्रश्न किया है कि मां पहले यह बताओ कि जिस तांत्रिक ने पूरी मेहनत करके यह शब्द साधना की तैयारी की थी उसको उसकी मेहनत का फल नहीं मिला किंतु मैंने कुछ भी नहीं किया है थोड़ा सा रेडीमेड जो बनाया हुआ है उसके ऊपर बैठ कर के थोड़ा सा जप किया तुमने मुझे सिद्धि प्रदान कर दी इसके पीछे रहस्य क्या है तो मां ने कहा कि बेटा तुमको पता नहीं कि तुमने जन्मांतर में क्या किया है अर्थात बाछा तूही जन्मांतर कथा जानीस ना अर्थात कि बेटा तुमको पता नहीं कि जन्मांतर में क्या हुआ था तुम्हारे पिछले जन्म में तुमने इतने पुण्य किए हैं कि इसका फल इस बार तुमको मिल रहा है तो अभी देखिए कि यहां पे दो थिरी है यहां पे ठाकुर कहते हैं कि जो मां काली है वो लीलाम है उसकी जिस जब भी इच्छा होगी वह किसी को भी मुक्ति देगी इच्छा नहीं होगी तो आप कितना ही कुछ करते रहिए मुक्ति नहीं मिलेगी दूसरा है कि अपना कर्म का थिरी कर्म का थिरी कहता है कि आप जितने पुण्य कर्म करेंगे वैसे-वैसे ही आप मुक्ति की ओर आगे जाते जाएंगे जितना पाप कर्म करेंगे उतना ही कर्म के बंधन में फंसते जाएंगे तो प्रश्न है कि कौन सा थिरी सही है कौन सा नहीं है ठाकुर खुद इसके बारे में बीच-बीच में जिस तरह से कहते हैं वो अजामिल की कोई बात करता है कभी-कभी अजामिल के बारे में कहते हैं कि अजामिल भगवान कृष्ण को बड़ा ही धिक्कार होता था बड़ा ही उनसे नाराज रहता था किंतु आखिर में क्या हुआ उसने अपने खुद के बच्चे का नाम रखा था नारायण और मृत्यु शैया प अपने बच्चे को बुलाने के लिए बोल दिया नारायण यहां आओ या तो फिर नारायण तो जैसे ही एक बार भगवान कृष्ण का उसने नाम लिया उसको मुक्ति मिल गई तो कोई कोई कहता है कि अरे तो फिर ये जप ध्यान साधन भजन पुण्य कर्म तपस्या ये सब का क्या अर्थ है तो फिर वो ठाकुर ने कहा कि फिर ऐसी भी बात है कि उसके बाद के जन्म में अजामिल ने बहुत सारी ढेर सारी तपस्या भी की थी तो अभी दोनों ओर से है कि आप कितना पुण्य कर्म करके मुक्ति प्राप्त करेंगे ना कि फिर मां की इच्छा के अनुसार फिर मुक्ति मिल जाएगी आपके पुण्य पाप ये सबका कोई मीनिंग नहीं है तो दोनों बात ठाकुर दोनों ओर से करते हैं कोई डेफिनेटली कुछ बोलते नहीं है तो हमको अपना रास्ता तय करना है कि संपूर्ण श्रद्धा भक्ति रख के जीवन में आगे चले ना कि साथ-साथ में जब ध्यान तपस्या भी करें तो वो चॉइस अपने हाथ में है आज यही तक कल फिर सेक्ष स ठाकुर की कहानी है ना कामर पुकुर जा रहा है डके आ गए तो ठाकुर बोलते सबका नाम लेना शुरू कर दिया काली काली दुर्गा दुर्गा राम राम महावीर महावीर जो काम कर र व एक ऐसा ही एक दूसरा भी एक जोक है वो एक एक हिंदू एक क्रिश्चियन और एक मुसलमान ऐसे सब लोग नौका में जा रहे है तो नौका में बड़ा ही जोर से वो पवन चला और नौका डूबने की नौबत आ गई है तो जो दूसरे धर्म वाले थे अपने अपने भगवान को बुलाया और उनके भगवान ने उनको बचा लिया अब ये हिंदू बोलता है जोर जोर से भगवान भगवान तो भगवान गणेश प्रकट हुए और हसते हसते ताली बजाते बजाते नृत्य करने लगे तो यह बोलता है भक्त बोलता है भगवान मुझे बजाओ मुझे बचाना होना कि मैं डूब रहा हूं तो आप खुश हो रहा है तो भगवान गणेश कहते है कि मैं जब तुम लोग जब मेरा विसर्जन करते हो तो कैसे तुम नाचते नाचते ताली बजाते हो मैं भी वही कर रहा हूं रख सकते हैं क्योंकि एक एक भजन के भीतर में जो तत्व ज्ञान है वो प्रचंड है मुझे थोड़ा सा वो बंगोली माने वैसे तो मैं बंगोली बड़ा पक्का समझता हूं किंतु ये जो ग प ब जो होता है ना पोएटिक फॉर्म में वो थोड़ा इवन पोएटिक गुजराती भी समझना मुश्किल है आज नरसिंह मेहता के भजन है इतने सुंदर है किंतु शब्द शब्द का अर्थ समझना बड़ा मुश्किल है उसके लिए आपको कुछ ट्रांसलेशन वगैरह साथ में चाहिए तो वो वो है वैसे तो गुजराती और हिंदी है मेरे पास में उसको लेकर के किसी दिन बैठेंगे एक्चुअली देखिए तत्व कथा समझना इतना मुश्किल नहीं है क्योंकि जो ठाकुर गाने में गाते हैं उसी बात को फिर वो वही वो दोहराते भी है अभी जैसे ये मां के बारे में कहा कि मुक्ति और बंधन दोनों की चाबी मां के हाथ में है जब चाहे किसी को मुक्ति दे देगी जब चाहे किसी को बंधन में रखेगी उसका कोई ठिकाना नहीं है तो तत्त्वज्ञान तो ठाकुर की बातों में से हम निकाल लेंगे शाब्दिक अर्थ ही थोड़ा सा समझना पड़ेगा ये बहुत अच्छा आपने याद करवाया कि ठाकुर कहता है कि सोच करके देखो जो हत्या करता है वो भी मां है जो जिसकी हत्या होती है वो भी मां है तो किस हत्या की किसकी हत्या हुई यह आप क्या करें समझेंगे किंतु प्रॉब्लम वही है कि वह समझने के लिए भी तो ब्रह्मज्ञान चाहिए व बिना ब्रह्मज्ञान के मेरी हत्या हो रही है तो मुझे तो पेन होने ही वाला है अल्टीमेटली तो बात वही प आ जाती है कि देखिए कि ठाकुर का जो काली का कांसेप्ट है और यह वेदांत का माया का कांसेप्ट है उसमें जो कंट्रक्शन है वो भी कैसा है कि माया को वैसे आप कहेंगे कि हां वो अविद्या से बनी हुई है और उसके परे जाना है यहां पर मां काली को अपने एक एजेंसी दी हुई है कि उसकी एक इच्छा है इच्छा मई तारा तुम तो मैंने उसकी इच्छा से जो चाहे वो करती है तो यहां पर लॉजिक नहीं चलता है ये कितना बड़ा कांट्रडिक्शन है अदर वाइज अद्वैत वेदांत में पूरा मैथमेटिक्स है कि आप यह तपस्या करते जाइए करते जाइए आपके माया का बंधन छूट जाएगा आपने इतनी तपस्या की तो इतनी माया कटी इतना कर्म शुभ कर्म किया तो इतना अशुभ कर्म किया इस ऑलमोस्ट मैथमेटिक मने पक्का वो इक्वेशन चलता है यहां पर कि तो आपका मैथमेटिक्स मैथमेटिक्स सब गुल हो जाता है आप हजार साधना तपस्या कीजिए मां की इच्छा नहीं होगी तो नहीं होगा तो य दिस वेरी इंटरेस्टिंग थिंग ये ठाकुर के वेदांत को लेकर के इतना सारा डिस्कशन अपने ऑर्डर में चला है कोई कहेगा शकता द्वैत है कोई कहेगा कुछ कोई कहेगा कि विशिष्ट द्वैत है बहुत कुछ चलता है तो ठाकुर को पिन डाउन करना मुश्किल है इस सब चीजों में