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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 30 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत 14th दिसंबर 1883 पंचम परिच्छेद हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आए हैं और आज का बड़ा शुभ दिन है। ठाकुर के साथ में ऑलरेडी बैठकर के उन्होंने सुबह को पाठ किया था भक्तमाल में से और परशुराम की स्तुति वगैरह कहानियां उनका पाठ हुआ था। उसके बाद में आहार के बाद में ठाकुर थोड़ा सा विश्राम कर रहे थे और मास्टर महाशय पास में बैठे थे। उस समय श्याम डॉक्टर और भी और उनके साथ में कुछ डिवोटीज आकर के उपस्थित हुए और उनके साथ में फिर ठाकुर का वार्तालाप चलने लगा। ठाकुर ने जो कहा कल हमने पहला जो सेंटेंस था उसका हमने कल एनालिसिस किया था। उसके बारे में थोड़ी सी चर्चा की थी। ठाकुर ने कहा था कर्म जे बराबर ही करते हो

ज्ञान प्राप्ति से कर्म अपने आप चला जाएगा

तान नोए ईश्वर लाभ होले आर कर्म थाके ना फल हले फूल अपनी झरे जाए कर्म जो हमेशा के लिए नियमित रूप से सतत करना पड़ेगा ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है जैसे ही ज्ञान प्राप्ति होगी या तो फिर ईश्वर प्राप्ति होगी तो फिर कर्म रहेगा नहीं जब भी फल प्रकट होगा फल बनेगा तब फूल फूल अपने से गिर जाएगा। तो इसके बारे में हमने कल थोड़ा सा चर्चा किया था। इसके बाद में ठाकुर आर आगे क्या कहते हैं वह थोड़ा सा हम पाठ करते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं? जार लाभ होए तार संध्यादि कर्म थाके ना। जिसका लाभ होता है उसको संध्या आदि कर्म रहते नहीं है। यहां पे क्या लाभ होता है? तो शुभ लाभ जो कि ईश्वर प्राप्ति या ईश्वर दर्शन या तो आत्म साक्षात्कार या तो फिर ज्ञान उसकी प्राप्ति जब होती है तो संध्या आदि जो वैदिक कर्म कहे गए हैं वह सब रहते नहीं है। संध्या गायत्री ते लीन होए तखन गायत्री जप ले होए। संध्या रूपी जो कर्म है जो पूरी विधि है वह गायत्री मंत्र में लीन हो जाती है और यदि आप सिर्फ गायत्री मंत्र का पाठ भी करेंगे तो भी हो जाएगा आर गायत्री ओमकार लय होए और गायत्री का लय होता है ओमकार में तोखन गायत्री बोलते हो ना उस समय गायत्री मंत्र का भी जप करने की आवश्यकता नहीं है तो शुद्ध ओम बोलले होए उस समय सिर्फ ओमकार का उच्चारण करने से ही होगा। संध्या आदि कर्म कोतो दिन संध्या आदि कर्म कितने दिन जतो दिन हरि नामे कि राम नाम में पुलक ना होए और धारा ना पड़े जितने उसी दिन करना है संध्या आदि कर्म कि जितने दिन हरि नाम या तो राम नाम लेने से आंखों में से अश्रुओं की धारा नहीं गिरती है। जिस दिन ईश्वर का नाम लेने से भगवान का गुण चिंतन करने से यह भगवान कृष्ण या भगवान राम या चैतन्य महाप्रभु ना कि श्री रामकृष्ण इनका गुणगान गाने से इनका भजन गान करने से आंखों में से अश्रु की धारा बहनी शुरू हो जाए। उस दिन फिर यह जो वैध कर्म कहे गए हैं हमारे वेद में उसको करने की कोई जरूरत नहीं है। टाका कड़ी जन की मुकदमा जीत हवे बोले पूजा कर्म ओश भलो ना टाका कड़ी अर्थात कि पैसों के लिए या तो फिर जो कोर्ट में केस चल रहा है मुकदमा चल रहा है उसमें जीत हो इसके लिए पूजा करना यह बिल्कुल ठीक नहीं है। देखिए कि यहां पे एक बड़ा ही कांसेप्ट जो है अ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट ठाकुर कहते हैं कि संध्या आदि कर्म जो कि वेद में कहे गए हैं या तो फिर यह पूजा पाठ वगैरह जो हम करते हैं होम हवन जो करते हैं मंदिर में यह जो पूजा सब होती है वह पुजारी या साधक कितने दिन करेगा वो उतने ही दिन करेगा जब तक कि ईश्वर का नाम लेते उसके अंग में पुलक वगैरह नहीं होता, रोमांच नहीं होता। आंखों में से अश्रुधारा नहीं पड़ती। यानी कि जो वैध भक्ति और रागात्मिका भक्ति यह जो हमको बताया गया है वह वैधि भक्ति उतने ही दिन करनी है जब तक कि हम रागात्मिका भक्ति में प्रवेश ना करें। जिस क्षण हमने रागात्मिका भक्ति में प्रवेश किया यह जो ईश्वर के साथ में एक भाव का संबंध बनाया शांत दास्य सख्य मधुर वात्सल्य संतान या तो फिर महाभाव का तब तक ही हमको यह पूजा पाठ कर्म करने की आवश्यकता है। एक बार ईश्वर के साथ में एक भाव का रिश्ता बन गया तो फिर यह कर्म अपने आप चले जाएंगे। इसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं? यह कर्म होंगे गायत्री में लय हो जाएंगे। गायत्री फिर ओमकार में लय हो जाएगी। और फिर वहां पे यहां पर वैसे ठाकुर ने ओमकार के बाद में आगे तो नहीं कहा। किंतु जैसे कि हमने स्वामी जी का जो स्टेटमेंट पढ़ा था मोस्ट प्रोबेबबली स्वामी शिष्य संवाद में ही जो पढ़ा था कि किस तरह से यह अनुलोम और विलोम पहले तो नेति नेति करके जब हम जगत का त्याग करते हैं तो किस तरह से जगत के जितने भी पदार्थ है वह सब ओंकार में वह सब पदार्थ के जो शब्द है उसमें लय हो जाते हैं। जैसे कि गाय तो गाय गाय रूपी शब्द में लय हो जाएगी। जैसे कि आम का पेड़ तो आम का पेड़ उसका जो शब्द है वृक्ष उसमें वह लय हो जाएगा। और फिर जैसे कि जैसे कि यह धरती तो धरती जो है पृथ्वी पृथ्वी रूपी शब्द में लय हो जाएगी। यह गगन चांद तारे बादल यह नक्षत्र ये समुंदर ये झरने, ये नदियां, ये पहाड़, ये हिमालय जो कुछ भी पदार्थ है मनुष्य वे हम सभी लोग हमारे नाम सूचक जो शब्द है उस शब्द में लय हो जाएंगे। उसके बाद में फिर यह जितने भी शब्द है वह ओमकार में लय हो जाएंगे। ओमकार अनाहत ध्वनि में लय हो जाएगा और अनाहत ध्वनि आखिर में ब्रह्मण में लय हो जाएगा। यह हो गया जैसे कि सृष्टि, स्थिति और प्रलय। प्रलय तक की यात्रा और इसके बाद में विलोम या तो हम इति इति करके समाधि के बाद में विश्व में वापस आते हैं या तो फिर कहेंगे कि प्रलय के बाद में फिर से काल चक्र प्रारंभ होता है। और इस सृष्टि के प्रारंभ के साथ में ही ब्राह्मण में से अनाहत ध्वनि अनाहत ध्वनि में से ओमकार ओमकार में से जितने भी शब्द हैं गाय वृक्ष समुंदर चांद सितारे नक्षत्र गगन बादल पहाड़ झरने नदी मनुष्य ये जितने भी शब्द है वह प्रकट होंगे ओंकार में से और फिर आखिर में शब्दों में से पदार्थ अर्थ प्रकट होंगे। यह गगन शब्द है तो उसमें से गगन प्रकट होगा। चांद शब्द है तो उसमें से चांद प्रकट होगा। समुंदर शब्द है तो उसमें से एक्चुअल समुंदर प्रकट होगा। तो यह अनुलोम और विलोम नेति नेति और निर्विकल्प समाधि और इसके बाद में इति इति या तो फिर कहेंगे कि सृष्टि स्थिति प्रलय प्रलय में से फिर से सृष्टि और फिर से स्थिति। यह कल्प की जो ये है पूरी साइकिल कल्प का चक्र है वह इस तरह से घूमता ही रहेगा। तो यहां पे ठाकुर कहते हैं कि यदि हम एक बार हमारे जीवन में ईश्वर के प्रति सही-सही शरणागति आना प्रारंभ हुआ तो यह पूरा आपका देखिए कि नेति नेति मार्ग है। क्यों? क्योंकि एक के बाद एक आपके जीवन की सभी कामना वासनाओं का त्याग होता है। आपका मन संसार की बाकी 10 चीजों से निकल कर के ईश्वर के ही ऊपर में आकर के केंद्रित होता है। जैसे कि ठाकुर ने अपने एक भक्त के बारे में कहा था कि उसका कितना सुंदर भाव है। यह ले तेरा यह दे मेरा। बस और कुछ नाता नहीं हमारा। तो तुम्हारा जो है मेरे पास तुम ले लो। मैं तुम्हारे पास में मेरा जो है वह मुझे दे दो और सब संबंध खत्म कर दो। क्यों? क्योंकि यह लेनदेन की जो साइकिल है कल हमने जैसे कहा था कि धर्म, अर्थ, काम। तो यह अर्थ और काम की जब तक हम आकांक्षा रखेंगे, हमको धर्म का पालन करना पड़ेगा। और इस धर्म में एक संसार धर्म भी है। एक ऑब्लिगेशन होता है। आपके घर में कोई प्रसंग है तो आपके रिलेटिव्स आएंगे। आपके रिलेटिव्स के घर में कोई प्रसंग है तो आपको जाना पड़ेगा। तो यह एक सहज स्वाभाविक संसार में ऐसा चलता है। क्योंकि कब किसको क्या जरूरत पड़ जाए आप कुछ कह नहीं सकते। इसलिए जो जिन लोगों में थोड़ा सा एक दूरदृष्टि होता है, जिन लोगों की एक कॉमन सेंस होती है, वह अपने मित्रों का रिलेटिव्स का अच्छा नेटवर्क बना करके रखते हैं। मैंने कुछ-कुछ रिलेटिव्स मेरे भी देखे हैं। कुछ-कुछ डिवोटीज को भी देखे हैं कि यह आश्रम में किसी के घर में भक्त है आश्रम का और उसके घर में कुछ भी दुखद प्रसंग होता है, कुछ भी होता है तो बाकी सब डिवोटी उसके घर जाएंगे, उसको हेल्प करेंगे। यह बहुत अच्छी बात है। इट्स अ वेरी गुड एक्चुअली। किंतु देखिए कि यदि आप अपने मन को दृढ़ता पूर्वक ईश्वर की ओर ले जाएंगे, ईश्वर की ओर एक मुखी करेंगे। शरद महाराज का शब्द जो कि हमने लीला प्रसंग में पढ़ा था। एक मुखी एकाग्र हमने पढ़ा है मैंने किंतु एक मुखी मैंने वहां पर पहली बार पढ़ा। अपने जितने भी कामना वासनाएं हैं उन सबका मुख हम ईश्वर की ओर कर दें तो फिर जगत के साथ में अपना संपर्क धीरे-धीरे करके कम हो जाता है। उसके बाद में यह संसार के ऑब्लिगेशन है। सहज रूप से चले जाते हैं। मैंने एक डिवोटी के बारे में कहा था पहले शायद। उन डिवोटी वो बड़े लंबे समय से रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़े हुए हैं और जो जिस शहर में वो रहते हैं उस शहर में रामकृष्ण संघ का सेंटर नहीं था। एफिलिएटेड ऑफिशियल आश्रम नहीं था। तो उन्होंने वहां पर प्राइवेट सेंटर का प्रारंभ किया था। प्रारंभ उन्होंने नहीं किया था। किंतु वह बड़े लंबे समय से उसमें सक्रिय थे और उसके सेक्रेटरी भी थे। तो फिर उस प्राइवेट सेंटर में प्रतिदिन वो अपना जैसे ही नौकरी से वापस आ जाते तो वैसे ही सीधा वो सेंटर में चले जाते और वहां पर बंद होने तक वो रात के जो 8 8:30 बजे का टाइम था सेंटर बंद होने का तब तक वह वहां पर बैठे रहते थे। सालों के बाद सालों उन्होंने इस तरह से अपना पूरा समय उस सेंटर को दिया था। तो वह मुझे एक बार कहते थे कि मेरे घर में जितने भी प्रसंग है मैं तो कहीं जाता ही नहीं हूं। मेरी पत्नी जाती है, मेरे बच्चे जाते हैं और वही लोग सब व्यवहार करते हैं। मेरा तो रिलेटिव्स के साथ में ऐसा कोई नाता भी नहीं रहा अभी तक। अभी तो मेरे जितने भी पहचान वाले हैं, जो रिलेटिव्स हैं, वह सब इस सेंटर के ही साथ में जुड़े हुए हैं। फिर वहां पर मिशन का आश्रम हुआ, साधु लोग वगैरह सब गए। किंतु देखिए कि यह संसार की ओर नाता तोड़ देना और ठाकुर की ओर अपना मुंह करना ठाकुर की ओर अपनी सभी आशा आकांक्षाएं उनको मोड़ देना यही तो है कि साधन पथ में हम धीरे-धीरे करके आगे बढ़ रहे हैं। तो इसीलिए जब जैसे ही हम ईश्वर की ओर जितना आगे बढ़ेंगे उतना ही यह धर्म रूपी जितने भी ऑब्लिगेशन है वह चाहे विधि या तो कोई क्रिया हो कर्मकांड हो या पूजापाठ भी हो इवन या तो फिर मित्रों या तो संबंधियों के साथ में अपने जो ऑब्लिगेशंस हो समाज में जो ऑब्लिगेशन हो धीरे-धीरे करके सब एक के बाद एक टूटना शुरू हो जाते हैं। शुरू शुरू में कभी डर लगता है कि हां यदि लोगों के साथ में मेरा रिलेशन नहीं रहेगा तो मुझे मैं जब आपत्ति में आऊंगा तो फिर मैं किसकी सहाय मांगूंगा? देखिए ठाकुर को भी यह डर लगा था। इसलिए ठाकुर ने दो बात मां काली मां काली से मांगी थी। ठाकुर ने क्या कहा था कि मेरे पास में तो मेरी खुद की मैं अपने खुद की कोई रक्षा कर पाऊं। मैं अपनी खुद की कोई केयर कर पाऊं। ऐसा तो कोई संभव ही नहीं है। तो फिर मैं जब साधन भजन में डूब जाऊंगा तो फिर मेरी रक्षा कौन करेगा? मेरी केयर कौन करेगा? एक तो यह बात ठाकुर को थी उनके मन में। दूसरा कि ठाकुर ने कहा कि जितने भी यह मेरे सामने यह साधु है, कंगाल है, यह लोग जब भी मेरे सामने आते हैं, साधक है तो फिर मैं उनको कुछ देना चाहता हूं। दक्षिणा, दान जो भी है कुछ भी मैं उनको देना चाहता हूं। तो अभी मैं खुद मेरा खुद का तो कुछ है नहीं तो मैं उनको कैसे कुछ दे पाऊंगा इसलिए फिर ठाकुर मां को प्रार्थना करते हैं कोई एक बड़े आदमी को मेरे पास में दो जो कि मेरी भी केयर करें और जो मेरे सामने यह सब साधु साधक आते हैं उनको दक्षिणा भी मेरे कहने पर दे तो फिर ठाकुर कहते हैं कि मां ने उनको मथुर बाबू को दिया था और मथुर बाबू के जाने के बाद में यह शंभू मलिक है या तो फिर यह बलराम बाबू है या तो फिर यह सुरेश मित्र है। तो एक के बाद एक ठाकुर के रसददारों का आगमन होता गया था और उन्होंने ठाकुर की केयर की थी। देखिए हमको पता है कि हम रामकृष्ण लीनिएज में है आते हैं। अर्थात कि यदि हम ईश्वर के साथ में नाता जोड़ेंगे बाकी सब चीजों से नाता तोड़ के तो फिर यह घबराने की जरूरत नहीं है। डरने की जरूरत नहीं है कि अरे मैं वैधि पूजा नहीं करता हूं। या तो फिर जो मेरे ऑब्लिगेशंस है सभी का मैं पालन नहीं करता हूं। तो मेरे साथ में भविष्य में क्या होगा? यह चिंता एक्चुअली देखिए कि ठाकुर ने हम सबके हम सबके लिए कर दी है। हम सबके वती कर दी है। ऐसा नहीं है कि ठाकुर ने सिर्फ अपने लिए यह सब मांगा है। मैंने जब यह सब पहली बार पढ़ा था ठाकुर का यह स्टेटमेंट उस समय मुझे थोड़ा सा तो आश्चर्य हुआ था कि ठाकुर में इस तरह की कैलकुलेटिंग बुद्धि कहां से आ गई कि उन्होंने एक्चुअली पार्टिकुलरली यह सब कह के मांग काली से यह सब मांगा। किंतु देखिए कि हमको इसमें थोड़ा सा डीप में जाना होगा। ठाकुर सिर्फ अपनी चिंता नहीं कर रहे हैं। ठाकुर यह भी देख रहे हैं कि उनके पदानुसरण करते-करते उनके उनको फॉलो करतेकरते ये जितने भी डिवोटीज आएंगे जितने साधक साधु आएंगे उन सबके साथ में क्या होगा? यदि हम यह सोचे कि चलो ठाकुर को तो किसी ना किसी तरह से उनका खाने पीने की व्यवस्था हो गई। हम लोगों की चिंता कौन करेगा? पता नहीं बेटर है कि हम यह रास्ते पर आगे ही ना बढ़े। तो यह चिंता को शब्द प्रदान किए हैं। वाणी प्रदान की है ठाकुर ने और हम सबके वती हम सबके होकर के उन्होंने मां काली से यह सब मांग लिया है। तो यह तो एक है। दूसरा जो फेमस इंसिडेंट हमको पता है मां शारदा देवी का कि वह जब बोधगया गई थी तो उन्होंने देखा कि बौद्ध भिक्षुओं का मठ उसमें कितना कंफर्ट तो नहीं कहेंगे मठ में किंतु क्या है कि एक सछलता है। वहां पर खानेपीने रहने की प्रॉपर सुविधाएं उपलब्ध है। जिसकी वजह से जो साधक वहां पर रहते हैं, वह सब निश्चिंत होकर के निर्वाण प्राप्ति के लिए अपना जीवन बिता सकते हैं। तो फिर मां ने ठाकुर को प्रार्थना की कि ठाकुर तुम तो आए लीला करके चले गए। अभी तुम्हारे पीछे में यह जो भक्त संतान गण है उनका क्या होगा? उनके रहने खाने के लिए आप कुछ व्यवस्था कीजिए। तो फिर ठाकुर ने मां ने कहा कि उसके बाद में ही नरेंद्र ने यह वराह नगर मठ वगैरह की स्थापना की। तो देखिए कि यह जो चिंता यदि हमारे मन में है कि यदि ईश्वर चिंतन करतेकरते ईश्वर के प्रति प्रेम मन में प्रकट होते यह संध्या आदि कर्म या तो फिर एक ब्रॉड कैटेगरी में इसको डालेंगे धर्म जिसको कहते हैं धर्म अर्थात कि ऑब्लिगेशंस हमारे यह ऋण है हमारे ऊपर में तो यह ऋण चुकाने की वजह हम अपने हृदय में ईश्वर ईश्वर को स्थापित करके जितनी भी बार ईश्वर का नाम गुणगान करते हैं उतनी बार आंखों में से अश्रुधारा बहने लगती है। अपने काम कांचन वगैरह जो यह जो मोह और तृष्णा है विषयों के प्रति वो संयमित होती जाती है। अपना मन उर्ध्वगति करना शुरू कर देता है। तो फिर हमको संसार के किसी ऑब्लिगेशन की चिंता करने की जरूरत नहीं है। कर्मकांड की चिंता करने की जरूरत नहीं है। धर्म उस इन इट्स ब्रॉडेस्ट सेंस उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। हम मोक्ष मार्ग पे चलने के लिए मोक्ष मार्ग के यात्रालु होने के लिए एलिजिबल हो चुके हैं। और फिर यह जो बाकी की जो सब चिंताएं हैं, वह तो ईश्वर अपने से हमारे लिए कर लेंगे। हमारे पास में इसके इनफ गारंटीज है। इनफ हमारे पास में इसके लिए एक कहेंगे कि संतोष है कि हां ठाकुर ने अपने मुंह से ठाकुर ने अपने से मां काली के पास में इसकी प्रार्थना की थी। तो इसीलिए जब ठाकुर कहते हैं कि जब ईश्वर प्राप्ति होती है तो संध्या आदि कर्म धीरे-धीरे चले जाते हैं। समाज के जितने भी ऑब्लिगेशंस हैं वह सब मिट जाते हैं। लोगों के साथ में जो लेनदेन है वो अकाउंट सब क्लोज हो जाते हैं और फिर संध्या गायत्री में लय होती है। यानी कि यह देखिए कि दिस इज़ ग्रेजुअल सुसाइडिंग ऑफ़ दी ऑब्लिगेशंस। यह धीरे-धीरे करके इवन गायत्री मंत्र का पाठ करना शास्त्रों में ब्राह्मण लोगों के लिए कहा गया है। तो यह गायत्री मंत्र का पाठ करने का जो ऑब्लिगेशन है वह भी चला जाएगा। फिर ओमकार शुद्ध ओमकार रह जाएगा। और हमारे केस में रामकृष्ण साधक पथिकों के लिए रामकृष्ण साधना पथिकों के लिए जो गुरु का जो नाम है श्री गुरु महाराज का नाम तो ओमकार फिर उसमें लय हो जाएगा या तो फिर हम कहेंगे कि मंत्र के तीन पार्ट है प्रणव नाम और बीज मंत्र तो प्रणव के साथ में नाम और बीज मंत्र आकर जुड़ जाएंगे और फिर उसी मंत्र में उसी उसी मंत्र के भीतर में हमारा सब कुछ समाहित हो जाएगा। फिर ठाकुर कहते हैं उस समय सिर्फ ओमकार का जप करने से ही होगा। संध्या आदि कर्म कितने दिन है? जितने दिन की हरि नाम या राम नाम में पुलक नहीं होता है और आंखों में से धारा नहीं गिरती है। यह टाका कड़ीर जनो पैसा पैसा

पैसे या मुनाफ़े के लिए पूजा करना अच्छा नहीं है

फैसों के लिए किया तो फिर यह मुकदमा ये जो हमने शुरू किया है कोर्ट में उसमें जीत हो उसके लिए पूजा कर्म करना यह सब ठीक नहीं है। देखिए कि यह हमारा वह वाला बात आ जाती है कि अर्थ और काम के प्रति हमारी स्प है तो हमको धर्म का अनुष्ठान करना ही पड़ेगा। या तो फिर यदि हम धर्म का अनुष्ठान ना करें और सिर्फ अर्थ और काम के पीछे में दौड़ते रहे। ठाकुर ने जैसे उदाहरण दिया मुझे पैसा चाहिए। इसके लिए मैं अपना सब प्रयास करता हूं। या तो फिर मैं कोर्ट में केस चल रहा है। उसमें जीत जाऊं। उसके लिए मैं सब प्रयास करता हूं। तो वह तो मुझे पशुवत परिस्थिति में ले जाएगा। किंतु मान लीजिए कि मैं पूजा पाठ करता हूं। धर्म का साथ-साथ में पालन करता हूं। और मन में यह आकांक्षा है कि हां अर्थ और काम में मेरी जीत होगी। तो यह तो हमारा सनातन चक्र है कि धर्म, अर्थ, काम अर्थ और काम मुझे चाहिए ही चाहिए। मैं किसी भी तरह से अपनी जो कंपनी है, जॉब है, उसमें मुझे प्रमोशन चाहिए। किसी भी तरह से जो नया प्रोडक्ट हम पुश कर रहे हैं उसको मार्केट में सक्सेस होना है। जो कोई भी सर्विस हम सेल कर रहे हैं जैसे कि हमने एक किसी से सुना था उस दिन कि वो बैंक में आपको जितनी भी पॉलिसी है ये लाइफ इंश्योरेंस या वगैरह-वगैरह जो कुछ भी है वो झूठ-मूठ की बातें करके कस्टमर को सेल करनी है। फिर वह बूढ़ा आदमी भी यदि हो मिथ्या बातें करके झूठ बोल करके उसके पास में से पैसे ले लिया भी जाए प्रीमियम वगैरह हम उसके पास में से ले भी ले तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। तो क्या है कि इस तरह के जीवन के साथ में थोड़ा सा धर्म यदि जुड़ा हो यह तो सनातन कहानी है। ज्यादातर लोगों के मन में यही चलता होगा कि चलो हम यह अर्थ के लिए काम के लिए झूठी बात करके मिथ्या कहानी बता करके यह बूढ़े कस्टमर है उनके पास में से हम यह सब पॉलिसी या तो फिर यह इन्वेस्टमेंट या तो यह प्रीमियम वगैरह जो ले लेते हैं उसका पाप ना लगे तो थोड़ा सा धर्म कर दो। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं वो सब भालो ना वह सब अच्छी बात नहीं है। तो देखिए कि आध्यात्मिक दृष्टि से यह सब बातें बिल्कुल अच्छी नहीं है। किंतु आम आदमी की दृष्टि से देखेंगे तो वे लोग धर्म का तो यही एक अर्थ करते हैं कि अर्थ और काम की प्राप्ति हमको सतत होती रहे और इसके लिए हम धर्म का आचरण करेंगे। तो वो है धर्म का पथ धर्म का रास्ता और यहां पर है मोक्ष मार्ग ईश्वर प्राप्ति का रास्ता तो यह ईश्वर प्राप्ति के रास्ते पर यदि चलते हैं तो धर्म का रास्ता है या तो फिर अर्थ और काम का रास्ता है उस पे से हमको निवृत्ति लेनी होगी एक जन भक्त एक भक्त प्रश्न करते हैं

केशव सेन के बारे में ठाकुर: केशव ठीक ठीक साधक था इसलिए वह संसार में रहकर भी ईश्वर-आराधना कर सकता था

टाका को चेष्टा तो शोकले को छे दे टाका कड़ी यानी कि पैसों की चिंता तो पैसा पैसा प्राप्त करने के लिए प्रयास तो सभी लोग कर रहे हैं। मैं देख रहा हूं केशव सेन केन राजा शंगे मेयर बीए दिलेले केशव सेन ने किस तरह से राजा के साथ में अपनी पुत्री का विवाह करवा दिया। देखिए ये जो बात है इसके पीछे में मामला क्या है? हमको पता है कि ब्राह्म समाज का रिफॉर्म मूवमेंट कि भारत में रिफॉर्म लाना है क्योंकि यह हिंदू सनातन समाज है। उसके भीतर में बहुत सारी अंधश्रद्धाएं प्रवेश कर गई है। जब तक यह अंधश्रद्धाएं नहीं जाएंगे। भारत को यूरोप जैसा नहीं बना देंगे तब तक भारत का प्रगति उत्थान नहीं होने वाला है। यह सोचकर के विधवा का विवाह होना चाहिए। नाती और जाति प्रथा को निर्विशेष कर देना चाहिए। उसको हटा देना चाहिए। बाल विवाह नहीं होना चाहिए। वगैरह अच्छे-अच्छे आदर्श लेकर के यह ब्राह्म समाज है या तो फिर यह आर्य समाज है वगैरह-वगैरह फिर ये थियोसोफिकल सोसाइटी है और भी कुछ-कुछ उस समय के थे। तो उन उनकी स्थापना हुई थी। किंतु उसी स्थापना करते-करते उसी ब्राह्म समाज का इतना बड़ा लीडर केशव सेन उसने देखा कि एक राजा या जमींदार के साथ में अच्छा संबंध बैठ जाता है मेरी पुत्री का वो तो तो डज नॉट मैटर कि वो जो विवाह की मिनिमम एज ठीक की गई है ब्राह्मू समाज में उस उम्र से यह लड़की की उम्र कम थी डज नॉट मैटर क्योंकि राजा के साथ में संबंध बनता है घर का तो तो अच्छा ही है फाइनेंशियल दृष्टि से भी अच्छा है। प्रेस्टीज की दृष्टि से भी अच्छा है। बोल करके ब्राह्मो समाज के ही नियम को तोड़ के ब्राह्म समाज की ही मिनिमम एज ऑफ कंसेंट या तो फिर मिनिमम एज ऑफ मैरिज उसका नियम भंग करके उसके साथ में अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। तो नेचुरली हमको तो पता है कि फिर यह विजय कृष्ण गोस्वामी यह जो शिवनाथ शास्त्री इन लोगों ने यह केशव सेन का जो ब्राह्मण समाज था उसमें से बाहर निकल गए। केशव के साथ में झगड़ा भी करते गए। केशव के शिष्यों को भी लेते गए। तो फिर जब यह केशव ठाकुर के पास आता है। ठाकुर को कंप्लेन करता है कि महाशय वे लोग सिर्फ इतना ही नहीं कि मेरा समाज छोड़कर के चले गए। साथ-साथ में ही मेरे कितने अनुयायियों को भी लेते गए। साथ-साथ में मुझे गाली भी देते गए। साथ-साथ में यह समाचार पत्रों वगैरह में मेरे विरुद्ध में लेख भी लिखते हैं। तब ठाकुर क्या कहते हैं कि तुम्ही देखे चेला करो ना शजन्य सब होए। तुम देख सुन के अपने शिष्यों को नहीं बनाते हो। इसीलिए यह सब होता है। तो देखिए कि ये केशवसेन का जो ब्राह्म समाज था एटलीस्ट अखंड ब्राह्म समाज उसमें हो सकता है कि ठाकुर के पास में जितने लोग आते थे उससे ज्यादा लोग आते हो। किंतु अल्टीमेटली क्या हुआ कि लोग इकट्ठा करने की लालसा में ऐसे लोगों को इकट्ठा कर लिया जिसका कि केशवसेन के साथ में कोई आईडियोलॉजिकल संबंध नहीं बनता था। वे लोग मौका ही खोज रहे थे कि कैसे ही केशव को हम लोग नीचा दिखाए कैसे भी करके उसकी लीडरशिप छीन ले और सामने केशव ने यह मौका दे दिया तो फिर इन लोगों ने मौके का फायदा उठा करके अपना साधारण ब्राह्म समाज सेपरेट कर दिया। हमको पता है कि स्वामी जी उस साधारण ब्राह्म समाज में जाते थे। तो इसीलिए यहां पर देखिए कि एक भक्त ने ठाकुर को कहा। पहले तो ठाकुर कहते हैं कि पैसों के लिए कोर्ट केस में जीतने के लिए ईश्वर प्राप्ति की बातें करना यह सब चीजें अच्छी नहीं है। तो यह तो सबको लगेगा क्योंकि इस कैटेगरी में तो बहुत सारे लोग आते हैं। तो वहां पर एक भक्त बैठा था। उसको भी लगा कि शायद ठाकुर मेरी ओर तो इशारा करके यह सब नहीं कर कह रहे हैं। ठाकुर का ऐसा कभी-कभी होता था कि कुछ बातें करते हैं ना तो

कहानी: ठाकुर लोगों का चरित्र और मन का भाव पकड़ लेते थे

सामने जो बैठा है सबकॉन्शियसली जैसे कि उसका चरित्र या तो फिर उसका कैरेक्टर या तो फिर उस जो सरकमस्टेंस में जो है उसको जैसे कि ठाकुर पकड़ लेते थे और जैसे कि उसी के साथ में बात कर रहे हैं या तो फिर उसी के बारे में बात कर रहे हैं। ऐसा लगता था। एक इंसिडेंट है कि कुछ स्त्री भक्त ठाकुर के पास में आकर के बैठी थी। तो उस समय ऐसा हुआ कि एक जो स्त्री थी उसमें वह पहली बार शायद ठाकुर के पास आई थी या तो नई-नई आ रही थी। तो उनकी जो रिलेटिव है तो रिलेटिव ठाकुर के पास में काफी समय से आती थी। तो शायद उन्होंने ही कहा होगा कि चलिए हम ठाकुर के पास जा रहे हैं। आप भी आइए। तो यह जो सब स्त्री भक्त है वो और जो नई आई हुई जो लेडी है वो वहां पर बैठे थे और ठाकुर ने बोलना शुरू किया। ठाकुर कहते हैं कि देखिए कुछ-कुछ विधवाओं का ऐसा होता है पति का मृत्यु हो गया। फिर अपने भाई के घर में आकर के रहती है। फिर अपने भाई के घर में जो संसार है वो जैसे कि पूरा अपने सर के ऊपर में है। ऐसा दिखावा करती है। ईश्वर प्राप्ति की चिंता नहीं करेगी। झूठ-मूठ का ये संसार का बोझा जैसे कि वो खुद वहन कर रही है। ऐसी बातें करेगी। फिर वो चाबी का झूला होता है ना कीज़ वो तो चाबी का झूला जैसे कि अपनी कमर में बांध के घूमेगी और वो म इस तरह से ठाकुर बातें करते ही जा रहे हैं कि इस तरह की स्त्रियां जैसे कि ऐसा दिखाना प्रयास करती है कि हमारे बलबूते पे ही जैसे कि भाई का घर चल रहा है वगैरह-वगैरह। अभी हुआ ऐसा कि जो नई स्त्री आई हुई थी उसका नेचर इसी प्रकार का था और उस स्त्री को लेकर आने वाली जो पुरानी लेडी डिवोटी थी जो कि नियमित रूप से आती थी तो उसने बाद में किसी को कहा और जिन्होंने यह स्मृति कथा लिपिबद्ध की है तो यह स्त्री कहती है कि अरे हम लोग तो एकदम चिंता में पड़ गए कि पहली बार हम इसको ले आए हैं मेरे रिलेटिव को और ठाकुर जैसे कि उसी के बारे में बात कर रहे हैं तो वह भी बेचारी लज्ज ित हो गई कि अरे वो बेचारी बुरा ना मान ले। ठाकुर सब समय ईश्वर प्राप्ति की बातें करते हैं। भगवान राम भगवान शिव भगवान कृष्ण की बातें करते हैं। आज ये ठाकुर ने यह सब कैसे चालू कर दिया? तो अभी क्या है कि देखिए कि उस जो स्त्री जो कि इस तरह का आचरण करती थी उसके मन में यह आघात हो। इसलिए ठाकुर जैसे कि उसका जो चरित्र कैरेक्टर है समझ करके जैसे कि सबकॉन्शियसली उसको पकड़ करके उसके सामने प्रति आघात कर रहे हैं कि संसार में जो इतना जड़ित हो गई है संसार में वह इतना घुस गई है कि वह सब संसार ही उसके लिए सर्वस्व है तो एक आघात होगा तो वो संसार में से थोड़ी सी बाहर आएगी तो उसके ऊपर में हो सकता है कि आघात करने के लिए ही ठाकुर ने इस तरह की बातें की हो किंतु ठाकुर के साथ में ना ही वो नई आई हुई स्त्री या तो वो पुरानी भक्त किसी ने ठाकुर को ऐसा कहा नहीं था कि उसके घर की यह परिस्थिति है उसके मन की ये ये सब वासनाएं कामनाएं हैं। ठाकुर ने पकड़ कर के ये सब कहा था। तो यहां पर भी हो सकता है कि ठाकुर ने उनके सामने जो भक्त बैठे होंगे उनके मन की बात पकड़ ली होगी। और जब इस तरह का आघात होगा तो सामने वाला बैठा हुआ भक्त वह तो यही सोचेगा कि ठाकुर ने कैसे भी करके मेरे मन की बात समझ ली है तो नेचुरली वह सामने प्रश्न करेगा कि अच्छा हम तो देखते हैं और फिर देखिए कि उसके मन में सही में लगा होगा कि ठाकुर ने मेरे सामने इस तरह की बात की तो फिर जब हम लोग इसका उत्तर भी देते हैं ना तो साथ में एक छोटा सा दंश मार करके उत्तर जो किसी के बात हमको आघात लगता है किसी की बात से तो हम उसके मन में आघात पहुंचाने के लिए उसका जो वीक स्पॉट है उस पे अटैक करते हैं। उसके ऊपर में दंश मारने का प्रयास करते हैं। तो ठाकुर ने जैसे कि इस व्यक्ति का वीक पॉइंट पकड़ करके कह दिया कि यह कोर्ट केस में विजय प्राप्त हो। इसके लिए पूजा वगैरह करना बिल्कुल ठीक नहीं है। हो सकता है यह भक्त यही सब करता होगा। तो उसके मन में जो आघात हुआ तो उसने सोचा कि ठाकुर का वीक स्पॉट पकड़ करके सामने अटैक किया जाए। तो ठाकुर का वीक स्पॉट क्या था? सबको पता है कि केशव सेन ठाकुर के पास में आता था और केशवसेन ने अपने से इतना बड़ा गड़बड़ कर दिया है वो। तो फिर उसने वो केशव का नाम देकर के ठाकुर को कहा कि अच्छा मैं तो देखता हूं कि सभी लोग यह काम कांचन के लिए अर्थ और काम के लिए प्रयास कर रहे हैं। केशवसेन को देखिए। अभी ऐसा बोला नहीं कि जो कि आपका बहुत बड़ा चेला है। किंतु ऐसा उसने कहा कि केशवसेन को देखिए। अपनी पुत्री का राजा के साथ में विवाह कैसे करवा दिया? हालांकि यह ब्रह्म समाज का नियम है कि पुत्री की ऐज लड़की की मिनिमम एज ऑफ मैरिज इतनी होनी चाहिए। तो उससे छोटी है लड़की फिर भी कैसे विवाह करवा दिया? तो आप ही के चेले ये सब करते हैं तो आप दूसरों को क्यों ऐसा कहने को चाहते हैं कि वो आप कोर्ट केस में विजय प्राप्त करने के लिए पूजा वगैरह मत कीजिए। तो फिर देखिए कि सामने ठाकुर क्या कहते हैं। केशवे राहलादा को था। केशव की बात अलग है। ठीक भक्तों से चेष्टा ना कर ले ईश्वर तार सब जुटिए देन जो ठीक भक्त है वह प्रयास नहीं भी करता है। फिर भी ईश्वर जैसे कि उसके लिए सब जुगाड़ कर देते हैं। जे ठीक राजा बेटा से मुसोहारा पाए जो कि ठीक-ठीक राजा का पुत्र है। राजा का बेटा है वह मुशोहारा पाता है। पेंशन या तो फिर यह जो मंथली अलाउंस उसको मिलता है वकील फुकिल कथा बोल छ ना जरा कोष्ट करे लोग दासत्व करे टाका आने वकील टकील की बात नहीं कर रहा हूं जो लोग कष्ट करके लोगों का दासत्व करके पैसा कमाते हैं उनकी बातें नहीं करता हूं आमी बोल छी ठीक राजा बेटा मैं कहता हूं ठीक ठीक जो राजा का पुत्र है राजकुमार है उसकी बात कर रहा हूं जार कोनो कामना नाई से टाका को चाइना टाका अपनी आशे जिसकी कोई कामना नहीं है वो यदि पैसा नहीं भी चाहता है तो भी पैसा उसके पास में आ जाता है गीताएं आ यदुच्छा लाभ गीता में है यदुच्छा लाभ देखिए ठाकुर ने कैसे उसके जो अटैक है उसके सामने प्रति आक्रमण कर दिया जो ठीक ठीक राजा का पुत्र है जो ठीक ठीक राजकुमार है उसको सब कुछ आकर के उसके के पैरों में गिर जाता है। उसको फिर यह चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह भगवान बुद्ध राजकुमार थे। घर बार त्याग करके सब छोड़कर के वन में गए। निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रयास किया। देखा कि आखिर में कष्ट करतेकरते सर के वो चक्कर आकर के गिर गए। क्योंकि वह जो तपस्या शुरू की कर रहे थे वो दैहिक तपस्या कर रहे थे। शारीरिक कष्ट कर रहे थे। तो आहार नहीं करना, लंबे समय तक उपवास करना, वस्त्रों का अवलंबन नहीं लेना, किसी भी तरह का कंफर्ट नहीं रखना। बोलकर के जो प्रचंड दैहिक कष्ट उन्होंने स्वीकार किया था, प्रचंड शारीरिक तपस्या की थी, उसके परिणाम से कमजोर होकर के चक्कर खाकर के बेहोश होकर के गिर गए थे। तो फिर वह गोप बाला आकर के उनको खीर खिलाती है और फिर उनकी जान में जैसे कि जान आती है। फिर भगवान बुद्ध ने ठीक किया कि नहीं दैहिक कष्ट के रास्ते से आप ईश्वर प्राप्ति या तो फिर उनकी भाषा में कहेंगे कि निर्वाण प्राप्ति नहीं कर सकते। तब उन्होंने जाकर के ये मध्यम मार्ग का आश्रय लिया। तो देखिए कि ठाकुर की कहानी यहां पर ठाकुर की ये जो बात है कितनी लिटरली सत्य होती है। जो राजा का पुत्र है जो ठीक-ठीक ईश्वर प्राप्ति के लिए अपना जीवन सर्वस्व दे देता है। उसकी चिंता फिर राजा स्वयं करेगा या तो फिर ईश्वर स्वयं करेंगे। अभी देखिए कि भगवान बुद्ध तो लिटरली राजा के पुत्र थे। लिटरली राजकुमार थे। हम लोगों के केस में क्या? तो हम लोगों के केस में वेद में ही बता दिया है कि अमृतस्य पुत्राह वयं हम लोग अमृत के संतान है। ऋषि मुनियों के पुत्र हैं। हम लोग ठाकुर महा स्वामी जी के संतान है। हम लोग यदि ठीक-ठीक ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयास करेंगे तो योगक्षेम जिसको कि कहा गया है गीता में योग और क्षेम यानी कि यह जीवन निर्वाह करने के लिए और ईश्वर प्राप्ति करने के लिए जो साधन है वह सब अपने से आकर के हमारे सामने खड़े होंगे। उसके लिए हमको चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह जैसे कि वो ठाकुर ने स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के कहा ना इन लोगों को कि तुम लोग ये जो बार-बार कर कह रहे हो कि हम लोग सीनर्स हैं। हम लोग सीनर्स हैं। यू आर द सनंस ऑफ इमोर्टिटीज। यू आर द इनहेरिटर ऑफ दिस ग्रेट स्पिरिचुअल हेरिटेज ऑफ द ह्यूमैनिटी। बात सिर्फ यह नहीं है कि भारत में ही स्पिरिचुअलिटी थी। विश्व के जितने भी देशों में जाइए संत महापुरुष आपको मिल जाएंगे उन सबके आप संतान हो। आपको इतनी चिंता करने की क्या जरूरत है? सब समय दिन रात उठकर के मैं पापी मैं पापी ठाकुर जैसे कहते हैं पापी-पापी बोलले ही साला पापी होए जाए। जो दिन रात कहता रहता है कि मैं पापी हूं। मैं पापी हूं वो साला पापी ही हो जाएगा। ठाकुर कहते विष नहीं बोल ले विष चले जाए। जहर नहीं है। जहर नहीं है। बोलते बोलते जहर चला जाएगा। तो एक प्रचंड आत्मविश्वास ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा ठाकुर या तो फिर जिस देवी देवता को आप फॉलो कर रहे हैं जिस अवतार की आप आराधना कर रहे हैं उनकी यदि आप आराधना ठीक-ठीक करेंगे तो आप तो उनके संतान हुए। नहीं कि वह कोई यहां पे ठाकुर कहते हैं ना वकील फकील की मैं बात नहीं कर रहा हूं। जो कि झूठ बोल करके लोगों का दासत्व करके लोगों की गुलामी करके पैसा कमाते हैं। ऐसे लोगों की बात नहीं कर रहा। जिन लोगों में ठीक-ठीक आत्मविश्वास है ऐसे लोगों की मैं बात कर रहा हूं। देखिए कि वो जो ठाकुर के जन्म का जो साल है 1836 उसी साल में ये जो न्यू एजुकेशन पॉलिसी ये जो वो ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो प्रारंभ की थी क्या था उसने क्या मैं भूल गया वो क्लाइव ना कि क्या उसका नाम था जो भी है तो उसने क्या देखा कि उसकी जो ऑफिस है वहां पर वो एक ब्राह्मण है वो चपरासी है और एक जो दूसरी जाति का है वो ऑफिसर है किंतु फिर भी ये ऑफिसर आकर के ब्राह्मण को प्रणाम करता है। तो उसकी उसको बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्यों इस तरह से करता है वो तो चपरासी है मैकले अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा तो मैकोले अच्छा तो ये देखिए कि उसने देखा कि इस तरह से होता है। फिर उसने इन्वेस्टिगेशन स्टार्ट किया। इन्वेस्टिगेशन करते-करते उसको पता चला कि भारत में इस तरह से जाति प्रथा है। ब्राह्मण जो है भले ही चाहे गरीब हो उसका समाज में सर्वोच्च स्थान है। तो फिर उसने सोचा कि यह जो ब्राह्मण प्रथा है समाज में गरीब होने के बावजूद सिर्फ उसके चरित्र के बल पर इतना रिस्पेक्ट मिल रहा है। इस तरह के समाज को तोड़ना असंभव है। तो समाज का जो सर्वोच्च जो उसका जो कोर था कि चरित्र के बल पर रिस्पेक्ट मिलता है ना ही कि धन के बल पर रिस्पेक्ट मिलता है। नहीं कि पावर और पोजीशन के बल पर रिस्पेक्ट मिलता है। यदि आपके ईश्वर के प्रति अनुराग है तो वह अनुराग ही आपको समाज में सर्वश्रेष्ठ आश्रन धारण करने के लिए वो आपके लिए वह सब प्रयास किए जाएंगे। तो फिर उसने क्या किया कि यह नीची जाति वाले सो कॉल्ड नीची जाति वाले अन्य जाति वाले जितने भी हैं उन सबके भीतर में एक कीड़ा फेंक दिया कि यह जो ब्राह्मण लोग हैं उन्होंने आपका सह युग युग से आपका शोषण किया है। आपका अत्याचार किया है तो उनके विरुद्ध में हो जाइए। तो जो हमारी बुद्धि मति जो उसने घुमा दी तो उसका परिणाम हम आज तक अभी तक भुगत रहे हैं। ठाकुर का ईश्वर की कृपा से ठाकुर का जन्म उसी साल में हुआ था। 1836 में ही हुआ था। अनफॉर्चूनेटली आज के भारत में देखें तो ठाकुर की यह जो बात है कि जो ईश्वर की सही-सही में चिंता करता है ईश्वर प्राप्ति के लिए सही-सही प्रयास करता है वो ठीक-ठीक राजा का पुत्र है। नहीं कि जो ब्रिटिश लोगों की गुलामी करके अपने को राजा का खिताब दे देते थे। यह रानी रास मणि रानी का खिताब कहां से आया? तो वही सब अंग्रेजों की गुलामी करके वो रानी का खिताब आया। वो जितने भी राजा रानी थे वो 18th सेंचुरी 19th सेंचुरी के जमींदार जितने भी थे तो भारत देश को दगा देकर के भारत देश को ब्रिटिशों को हेल्प करके भारत को लूटने में इस तरह से उन्होंने ये सब खिताब वगैरह इस तरह के टाइटल वगैरह अर्जन किए थे। तो देखिए कि ये दगाखोर जितने हैं, देशद्रोही जितने हैं वो राजा थोड़ी ना है। भले ही चाहे उनको राजा का खिताब मिला हो, राजा का टाइटल मिला हो। सही-सही राजा तो वही है जो कि ईश्वर प्राप्ति के लिए जीवन सर्वस्व होमित कर देता है। जीवन सर्वस्व अर्पित कर देता है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि केशव की बात अलग है। केशव के बारे में ठाकुर ने कहा था कि वह जप में सिद्ध है, ध्यान सिद्ध है। और फिर देखा कि और ये फातना नॉलेज है। अर्थात कि यदि वो फातना अर्थात कि मछली पकड़ने का वो जो होता है रस्सियां फेंकेंगे उसमें हुक होगा। हुक में आप कीड़ा लगा देंगे। मछली क्या करेगी? वो कीड़ा खाने के लिए उसमें मुंह डालेगी तो वह फंस जाएगी वो हुक में। तो वो जैसे ही हुक में फंसेगी तो वो रस्सी को खींचेगी। जो रस्सी को खींचेगी तो जो रस्सी के जो लकड़ी है जिस लकड़ी में ये रस्सी फंसी हुई है तो लकड़ी हिलेगी। तो जैसे ही हिलेगी तो वह समझ जाएगा कि मछली फंस गई है। तो यह लकड़ी का हिलना जिस लकड़ी के ऊपर में यह रस्सी है और जिस रस्सी के अंत में यह हुक है और जिस हुक को मछली ने खाया है तो लकड़ी का हिलना उसको यहां पे कहते हैं कि हां फातिना नोडेच है और हां जैसे कि ठाकुर ने कहा एलेजच खोसेज जो टेड पोल है तो टेड पोल जमीन पर भी रहता है पानी में भी रहता है तो इसी वो पानी जमीन पर रह सकता है दोनों में रह सकता है संसार में भी रह सकता है संसार के बाहर में भी रह सकता है। तो ठाकुर ने इस सब बातें केशव के बारे में कही थी। तो इसीलिए यहां पर देखिए कि ठाकुर कहते हैं केशव की बात अलग है। उसका ईश्वर में ठीक-ठीक मन है। यदि ईश्वर के ऊपर में ठीक-ठीक उसकी श्रद्धा नहीं होती तो फिर वो ठाकुर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार नहीं करता। देखिए कि जो लोग अलग हो गए ठाकुर से ये के शिवनाथ शास्त्री और ये विजय कृष्ण गोस्वामी उनका आप चरित्र देखिए कि विजय कृष्ण गोस्वामी ठाकुर के पास में जब आते थे तो फिर ठाकुर से इतने प्रभावित हो गए तो फिर उन्होंने आकर के ठाकुर को कहा था कि यह जो समाज में यानी कि उनके जो ब्राह्म समाज है उसमें यह प्रवचन वगैरह देना तो वह सब यह प्रवचन देना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। यानी कि केशव के ऊपर में क्रोध करके अपना खुद का एक ईगो पोषण करने के लिए केशव के पास में एक समाज है तो मुझे भी एक समाज चाहिए। वो ठाकुर जब वो नौका विहार के लिए जाते हैं वो केशव था साथ में विजय कृष्ण गोस्वामी भी था तो ठाकुर कैसे दोनों को मिला देते हैं और कैसे कहते हैं ए एक्ट समाज आ तो हमारो एक्ट दरकार उसके पास में एक समाज है तो मुझे भी एक चाहिए तो इस तरह से ईगो का पोषण करने के लिए समाज तो बना करके बैठे हैं किंतु फिर उसमें रस नहीं आ रहा है उसका मन साधना की ओर धावित हो रहा है तो यह विजय कृष्ण गोस्वामी किंतु जो शिवनाथ शास्त्री था उसके मन में अहंकार पड़ा हुआ था कि हां मेरा एक समाज होना ही चाहिए। तो फिर उसने धीरे-धीरे करके क्या किया कि ठाकुर के पास आना बंद कर दिया। तो ठाकुर वो शिवनाथ को देखकर के कहते भी है कि हां तुम मेरे पास आना क्यों बंद कर दिए हो? तो देखिए कि जिनके मन में यह कामना वासना थी जिन्होंने समाज को अलग किया तो वे लोग ठाकुर से भी अलग हो गए। और जो ठाकुर के पास में रह गए उनका जीवन धन्य हो गया। तो इन जीवन धन्य होने वालों में यह विजय कृष्ण गोस्वामी और यह केशव सेन। तो यहां पे इसलिए ठाकुर कहते हैं कि देखिए कि जो सही-सही राजा का पुत्र है उसको मेरा एक समाज है। उसका एक समाज तुम मेरे भी मुझे भी एक समाज चाहिए। वगैरह वगैरह चिंता यह लोग कभी नहीं करेंगे।

सद्-ब्राह्मण जाति अभिमान से परे है

आगे ठाकुर कहते हैं शद ब्राह्मण ज कोनो कामना नहीं से हाड़ी हाड़ी बाड़ी सीधे नीते पारे जो सत ब्राह्मण है जिसकी कोई कामना नहीं है वह किसी के भी घर से यह सीधा वो हाड़ी बाड़ी अभी हाड़ी अर्थात कि एक इस तरह की जात जिसके पास में से ब्राह्मण लोग वो भिक्षा ग्रहण नहीं करते तो यहां पर ठाकुर कहते हैं जो कि सद सद ब्राह्मण है जिनके भीतर में कोई कामना नहीं है वो किसी के भी घर से वह भिक्षा प्राप्त कर सकते हैं यदुच्छाला जो मिला है वह मिला है बस उसी से संतोष है से चाय ना किंतु अपनी आश वो किसी भी तरह की कामना वासना नहीं करता किसी भी तरह की इच्छा नहीं करता जो आना है सब अपने से आ जाता है यहां पे देखिए इंटरेस्टिंगली कंट्रास्ट करके देखते हैं ठाकुर के खुद के पिताजी खुद ही राम तो खुद खुदीराम निश्चय सद ब्राह्मण थे। कोई प्रश्न ही नहीं है। देरेग्राम छोड़ा था उन्होंने तो देरेग्राम छोड़कर के क्योंकि सत्य रक्षा करने के लिए देरेग्राम छोड़ा था और कामार पुकुर आकर के रहे थे। श्री रामकृष्ण जैसे संतान जिन्होंने प्रसव किए हैं। उनके चरित्र के बारे में किसी तरह का संदेह होना ही नहीं चाहिए। तो उनको सही-सही में सद ब्राह्मण हम कह सकते हैं। किंतु खुदीराम का था कि सभी घरों से वह भिक्षा नहीं लेंगे। वो जो इन ब्राह्मण लोगों के नियम के अनुसार जिस घरों से भिक्षा लेनी है उन्हीं घरों से लेंगे। भले ही चाहे भूखे मरे किंतु बाकी सबसे नहीं लेंगे। किंतु चंद्रामणि देवी थी कि जो जो भी भिक्षा देने के लिए आएगा तो ऐसे घरों से जिनके घरों की भिक्षा खुदीराम ग्रहण नहीं करते थे। वे लोग भी चुपके-चुपके आकर के चंद्रामणि देवी को दे जाते थे चीजें और चंद्रामणि देवी भी चुपके-चुपके सब स्वीकार कर लेती थी। चंद्रामणि के हृदय में करुणा थी। जबकि यह खुद राम के भीतर में जो ब्राह्मण के नियम है, सनातन धर्म है, उसका पालन करने के लिए जो एक विल पावर चाहिए वो विल पावर था। तो ये जैसे कि चंद्रामणि देवी और खुदीराम ये दोनों का कॉम्बिनेशन करके जैसे कि ठाकुर ने यहां पर कहा है कि जो सद ब्राह्मण है जिसकी कोई कामना नहीं है से हाड़ी बाड़ी सीधे नीते पाड़े जो हाड़ी है उसके घर का उसकी वाड़ी का सीधा ले सकता है भिक्षा ले सकता है से चाइना किंतु अपनी आशे वह चाहता नहीं है किंतु सब अपने से आ जाता है एक जो भक्तों तो आज्ञा संसार की रकम करे थकते होवे। अच्छा अभी यहां से नया टॉपिक चालू होता है जिसको कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

जीवन में उच्च आदर्श स्वतः ही त्याग लेकर आएंगे

किंतु यहां पर देखिए ईश्वर प्राप्ति या तो फिर कोई भी नोबल आईडिया उसके पीछे में अब एक बार लग जाए। अब जैसे कि ईश्वर प्राप्ति को फॉर ए मोमेंट छोड़ देते हैं। एनी लोमल आईडिया एनी हायर थिंकिंग हम लोग जगत के साइंटिस्टों को देखते हैं कि इस तरह से वो जो एक एब्सेंट माइंडेड साइंटिस्ट की वो बात एक फेमस है ना जैसे गरीब ब्राह्मण जो जो कोई भी कहानी होगी तो एक गरीब ब्राह्मण था। ऐसे स्टार्ट होती है। तो वेस्ट में भी बहुत सारी कहानियां देयर वाज़ एन एब्सेंट माइंडेड साइंटिस्ट। तो ये एब्सेंट माइंडेड साइंटिस्ट इज़ अ सॉर्ट ऑफ एन आइकॉन इन द वेस्ट। क्या है कि फिर जगह अभी जैसे न्यूटन है, आइंस्टाइन है एक बार किसी चीज के पीछे में लग गए तो फिर घर बार सब छोड़ दिए उन्होंने। ये जो आइंस्टाइन की जो फर्स्ट वाइफ थी शी वाज़ एक्चुअली अ रिस्चर एंड शी हैड वेरी गुड आइडियाज अबाउट फिजिक्स। तो आइंस्टाइन ने उससे बहुत कुछ सीखा भी सही। किंतु फिर वो उसकी केयर नहीं कर पा रहा है। तो फिर वो नाराज होकर के उससे डिवोर्स ले ली। तो आइंस्टाइन ने कहा था यदि मुझे नोबेल प्राइज मिलेगा तो उसका सारा रुपया मैं तुमको दे दूंगा। चिंता मत करना। तो डिवोर्स लेने के समय नोबेल प्राइज जो मिला पूरा उसको दे दिया उसका रुपया। तो देखिए कि कोई भी एक नोबल आईडिया है कोई भी एक हायर थिंकिंग है उसमें आप लग जाएंगे तो फिर संसार अपने से छूट जाएगा। फिर वो सब आपको प्लान करके छोड़ने की जरूरत नहीं है। तो और ईश्वर प्राप्ति के लिए इस रास्ते पर तो दिस इज इवन मोर ट्रू कि ईश्वर के बारे में यदि सही-सही लगन लग गई वो जो वालियो लुटारो जो था कि उसने कहा नारद मुनि को कि अपने मां पिताजी भूखे हैं उसके लिए मैं यह सब कर रहा हूं। तो फिर उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है पूछ के आओ कि तुम जो पाप कर रहे हो पाप में वह भागीदार होंगे कि नहीं तो वह मां पिताजी ने एकदम सीधा मुंह पे उत्तर दे दिया हमको खिलाना तुम्हारा धर्म है फिर वो तुम सत के रास्ते पर खिलाओ कि असत रास्ते पर खिलाओ वो तुम जानो तो फिर उसके वो फिर ठाकुर की कहानी है ना कि एक शिष्य गुरु के पास में आता है कहता है कि अच्छा गुरु जी मैं तो आपको परिवार को छोड़ नहीं पाऊंगा तो फिर मैं क्या करूं अभी तो वो गुरु कहता है अच्छा ठीक है मैं तुमको एक गोली देता हूं। तुम जड़ हो जाओगे। तो जड़ होकर के अपने घर में पड़ा है। तो उसकी वो पत्नी है, मां है। सब रो रही है। तो अभी हुआ ऐसा कि अभी चीता जलाने के लिए बाहर निकालना है उसको। तो बाहर निकाले वो देखा कि वो दरवाजा छोटा पड़ रहा है। तो कोई वो दरवाजा काट रहा है। तो उसकी बीवी जाकर के दौड़ के कहती है कि अरे अभी तो मैं विधवा हूं। दरवाजा टूटेगा तो फिर वो कोई खिलाने नया बनेगा नहीं। आप एक काम कीजिए। इसी के हाथ पैर काट दीजिए। तब वो उसकी वो होश आया वापस वो झगड़ा करके बोलता है अश मेरे हाथ पैर काटने को गई थी छोड़ देता हूं तुमको तो नॉट नेसेसरी कि वो मतलब दिस इज जस्ट एन एलेगोरी बट बात ऐसी है कि एक नोबल आईडिया जिसके पीछे में हम लगे तो फिर बाकी का सब ऑटोमेटिक छूट जाएगा। बहुत सारे लोगों के देखिए स्वामी जी स्वयं स्वामी जी स्वयं जब वहां पर गए थे वरा नगर मठ में अपने मां की अपने भाई बहनों की कितनी चिंता थी वो त्रिगुणातेानंद जी जब मठ छोड़कर के भाग गए तो उन्होंने चिट्ठी में लिखा था पत्र पत्र में तो नहीं लिखा था किंतु सबको कहते थे कि ये नरेंद्र जो बार-बार अपने घर जा रहा है तो फिर मुझे भी अपने घर की चिंता हो रही है तो इसलिए मैं वरा नगर मठ में या तो फिर कोलकाता नहीं रहना चाहता मैं कहीं पर चला जाना चाहता हूं तो वो घर की तो चिंता होगी स्वामी जी को खुद को और फिर शुरुआत में ही नहीं आखिरी समय में सेकंड टाइम जब अमेरिका गए थे तो उन्होंने पैसा स्पेसिफिकली इसके लिए कलेक्ट किया था कि जिससे कि उनके मां के लिए घर बना सके। वही बात है ना एक्चुअली पैसा इसलिए कलेक्ट किया था कि वो ऋण वो फिरत दे सके क्योंकि मठ के पैसों से वो उन्होंने लोन लेकर के मां के लिए घर बनाया था। तो वो ऋण तो चुका बनाना पड़ेगा। उन्हें रिटर्न करना पड़ेगा। तो उसके लिए वो सब लेक्चर दे रहे थे। तो यहां तक स्वामी जी की चिंता थी। सो दैट चिंता रहेगी बट साथ में वो हायर आइडियाज वो जैसे कि अपने को खा जाएंगे फिर चिंता रहने पर भी हम कुछ नहीं कर

गृहस्थ जीवन में त्याग कैसे करें?

पाएंगे। ना ठाकुर ने कहा ना कि देखिए मैं मैदान में युद्ध करके पूरा जल गया हूं। तुम लोग किले में से युद्ध कर रहे हो। तुम लोग बड़े अच्छे हो। तो वो तो एक बात है। फिर क्या है कि देखिए कि इवेंचुअली ठाकुर कहते हैं ना कि वो कोकोनट होता है। उसमें से वो कोपरा होता है। अब जोर करके सेपरेट करने को जाएंगे तो वो ठीक से सेपरेट होगा नहीं। इवेंचुअली जब टाइम आएगा स्पिरिचुअल मैच्योरिटी होगी। अपने से सेपरेट होना शुरू हो जाएगा। अपने वेद में जिस तरह से कहा गया है कि पहले ब्रह्मचर्य आश्रम 25 साल फिर 25 साल गृहस्थ आश्रम फिर 25 साल वानप्रस्थ आश्रम तो वानप्रस्थ आश्रम में क्या है धीरे-धीरे करके रिस्पांसिबिलिटीज को छोड़ना है और फिर आखिरी 25 साल सन्यास आश्रम दैट मींस के आप फिर फुल जोश से आप ईश्वर चिंतन कीजिए तो ग्रेजुएटली ये सब होता है अपने वेद भी समझते थे और ठाकुर भी समझते हैं सो ना हार्ष होइए। सी मुमुक्षत्व जागृत रखिए। बट एट द सेम टाइम कल जैसे हमने डिस्कस किया था ना कि अधैर्य इतने भी ना हो जाइए कि वो जो भक्त मां के पास आता था उसका माथा खराब हो गया। और बिल्कुल कॉम्प्लेसेंसी में ना डूब जाइए कि वो तमस ही आकर के घेर ले। वो अधैर्य भी रखना है, मुमुक्षत्व भी रखना है। एज वेल एज कॉमन सेंस रखना है। सो बैलेंस इन होना चाहिए लाइफ में।

आध्यात्मिक जीवन में कैसे प्रगति करें? समाधि प्राप्त करने के लिए हमें कब तक प्रतीक्षा करनी होगी?

देखिए जप और पाठ जप और स्वाध्याय यह दो हमारे लिए बेस्ट है। एक हाथ में जप की माला हो, एक हाथ में कथामृत हो। जप करते-करते यदि मन में विक्षेप आए तो कथामृत पाठ चालू कर दीजिए और कथामृत का पाठ करते-करते मन शांत हो तो फिर से जप प्रारंभ कर दीजिए। तो जप माला और कथामृत दो हाथ में दो ले बैठ जाइए। देखिए कि 4-प घंटा बैठना कोई असंभव आपको नहीं लगेगा। यदि बीच-बीच में बैठे-बैठे यदि शरीर में फिर जो पेन होने लगता है तो खड़े होकर के वॉकिंग कर सकते हैं। किंतु वो हाथ में जप चलते रहना चाहिए। जप में व्यवधान ना हो। जप यज्ञ जिसको कहते हैं। तो वो सतत जप तो यदि आप चारप घंटा कर पाए तो आप देखिए कि आप इस प्रोसेस को एक्सलरेट कर पाएंगे। स्वामी जी ने ज्ञान योग में कहा है कि इवोल्यूशन तो पूरे संसार का हो रहा है। डायनासोर में से मनुष्य हुए। मनुष्य में से आइंस्टाइन और विवेकानंद भी होंगे। और विवेकानंद में से श्री रामकृष्ण तक की भी यात्रा हमारी निश्चित है। पूरी ह्यूमैनिटी को उस श्री रामकृष्ण देव की ओर श्री कृष्ण श्री राम की ओर जाना ही जाना है। किंतु क्या है कि लाखों लाखों जनरेशन चली जाएगी। किंतु वी कैन एक्सलरेट दिस प्रोसेस ऑफ इवोल्यूशन। यदि हम राजयोग ठीक-ठीक से साधना करें तो यहां पे भी अभी राजयोग एस सच थोड़ा मुश्किल है। किंतु यह जो मैंने कहा जप और कथामृत यह आप 4 घंटे आराम से कर सकते हैं। उसको ट्राई कीजिए आप। देखिए साधु सानिध्य और आश्रम में जाना इट्स वेरी गुड। किंतु ईश्वर के पास में जाने के लिए यदि आपको थोड़ी जल्दबाजी करनी है, थोड़ा एक्सलरेट करना है, तो तीन-चार घंटे जप आपको करने पड़ेंगे। देयर इज नो अल्टरनेट टू दैट। देखिए हमारा जो यह डेली सत्संग है ना, दिस इज सॉर्ट ऑफ ए स्मरण मनन इटसेल्फ। यदि आप इसी से भी यदि आप प्रतिदिन करते रहे तो दैट इटसेल्फ शुड बी इनफ। बट यदि आपको एक्सलरेट करना है तो थ्री टू फोर आवर जप इसका कोई अल्टरनेट नहीं है। आप अपने समय के अनुसार एडजस्ट कर सकते हैं। कंटीन्यूअस ना हो तो सुबह आधा घंटा, दोपहर को आधा घंटा ऐसा भी आप स्टेगरिंग करके भी उसको माने फेजेस में भी कर सकते हैं। किंतु देखिए लेस देन थ्री आवर्स देयर इज नो सच अ थिंग कि आप आप जैसे आपने सविकल्प समाधि के बारे में कहा था। सो वो सब जो आयाम है आध्यात्मिक जीवन के वो लेस देन थ्री आवर फोर आवर जप के वो वहां पर जाना मुश्किल है। बाकी सब जितने भी बाकी जो है ना जैसे ये क्लास अटेंड करना ठाकुर मां स्वामी जी का साहित्य पढ़ना आश्रम में जाना पूजा पाठ में पार्टिसिपेट करना तीर्थ यात्रा करना रिट्रीट में जाना उससे मन को शांति मिलेगी। मन में आनंद आएगा। किंतु फिर उसके बाद में आपको नेक्स्ट जन्म में वहां से फिर से प्रारंभ करना पड़ेगा। समाधि या तो फिर कोई आध्यात्मिक अनुभूति उस लेवल पर यदि जाना है तो थ्री टू फोर आवर साधना नथिंग लेस देन दैट इट इज नॉट पॉसिबल।

जब मन जप से भटक जाए तो कथामृत पढ़ें। इससे हमारा मन शांत होगा और हम जप जारी रख सकेंगे।

देखिए मैं इसलिए साथ में कथामृत रखने को कहता हूं क्योंकि जब कभी-कभी क्या है नीरस हो जाता है तो इसीलिए उसको सरस बनाने के लिए ये म उल्टा एक एग्जांपल देता हूं रिवर्स एग्जांपल ठाकुर कहता है ना वो एक समाध्याय बोल के एक पंडित था वो कहता है कि ईश्वर नीरस है उसमें अपना रस डाल के सरस बना दो तो ठाकुर कहता है जिसको वेद में रसोव कहा गया है उसको वो पगला नीरस कहता है तो एक्चुअली ये रिवर्स एग्जांपल यहां पे लगा है तो जप करते कभी कभी-कभी नीरस हो जाएंगे। ठाकुर तो रसमय है किंतु फिर भी यह अपना साइकोलॉजी ऐसा है विचित्र तो निरस लगने लगता है। तो फिर ठाकुर की ही वाणी से ठाकुर के नाम को सरस कर लेना चाहिए। वि इज इज़ियर वे आउट और साथ में ही यदि मां की बातें पढ़ेंगे मायर कथा आप यदि बांग्ला में पढ़ती है और हिंदी मुझे यार मां की बातें ऐसा ही कुछ उसका नाम है तो इस तरह की मां की कुछ किताबें साथ में लेकर पढ़े तो बहुत अच्छा रहेगा। एक बात याद रखना है पढ़ना है ना तो सिर्फ वह रस प्राप्त करने के लिए पढ़ना है। फिर उसको फिर इंटेलेक्चुअल एनालिसिस नहीं करना है। सो दैट वन थिंग आपको ख्याल में रखनी है कि यहां पे ठाकुर ब्रह्म और शक्ति के बारे में बोल रहे हैं। तो फिर इसका अर्थ क्या है? वो अर्थ खोजने का प्रयास नहीं करना है। और रस पाने के लिए पढ़ना है। जैसे हम मूवी देखते हैं ना मूवी में हम कोई लॉजिक नहीं देखते हैं कि अभी हीरो के सामने 50 विलेन खड़े हैं। 50ों को एक साथ में कैसे मार देता है? वो हम लॉजिक खोजने के लिए नहीं जाते। सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए जाते हैं। तो यहां पे भी ब्रह्म का शक्ति शक्ति का ब्रह्म कैसे हुआ वो चिंता तो उस समय नहीं [हंसी]

क्या जप करने के कोई नियम हैं? क्या जप से पहले मानस पूजा करना अनिवार्य है?

करनी। देखो जप का ऐसा कोई नियम नहीं है। जैसे अपने संघ में कहा जाता है आप चलते फिरते भी जप कर सकते हैं। खाना भी पकाते हैं तो जप कर सकते हैं। ड्राइविंग करते हैं। कुछ भी करते हैं आप जप कर सकते हैं। सो देयर इज नो सच रूल अबाउट इट। तो आप यदि मानस पूजा करके जप करते हैं दैट इज वेरी गुड। मानस पूजा नहीं करके भी जप करते हैं तो कोई चिंता नहीं है। जैसे मैंने एक बार कहा था एक लेडी डिवोटी के साथ में मेरी बात हो रही है तो मैंने उसको उनको पूछा उनका पॉसिबल था कि यह मंगल आरती वगैरह में जाना। मैंने कहा क्यों नहीं आते? तो बोला कि उत्तर मिला कि स्नान करना स्नान करके जाना चाहिए। नियम तो ऐसा है तो सुबह-सुबह स्नान होता नहीं इसलिए मंगल आरती में नहीं जाती। तो मैंने कहा कि देखिए नियम है बहुत अच्छी बात है। किंतु यह नियम आपके आध्यात्मिक रास्ते में बाधा ना हो जाए। ऐसा ना हो कि स्नान करना सब धर्म हो गया और स्नान नहीं हुआ तो फिर मैं ठाकुर के पास में ही ना जाऊं। होगा तो बहुत अच्छा है। नहीं होगा तो डज नॉट मैटर। यह नियमों को अपने आध्यात्मिक पथ में बाधा ना होने दें। ठाकुर के पास आना वो बात है। जप करना वो असली बात है। यदि आप मानस पूजा कर पाए वेरी गुड। यदि नहीं होती है तो फिर मानस पूजा नहीं की तो मैं जप नहीं कर पाऊं। ऐसा ऐसा उल्टा थिंकिंग ना हो जाए। ये सब चीजों में थोड़ा सा प्रैक्टिकल होना है। बी प्रैक्टिकल यदि होता है तो अच्छा है। नहीं होता है तो उसकी उसका टेंशन मत लीजिए। ठाकुर का नाम जैसे यहां पर ठाकुर ने कहा ना कि वो जो देखिए संध्या गायत्री में लय होती है। गायत्री ओमकार में लय होता है और हमारे लिए ओमकार मंत्र में लय होता है। तो वो गायत्री मानस पूजा संध्या पूजा वो सब ठाकुर के नाम में लय हो जाता है। तो उसकी चिंता हमको इतनी नहीं करनी। ठाकुर ही बोले छटा मैं सन्यास के लिए गया था बेलून मठ तो

बेहतर जप करने के लिए कथामृत पढ़ना सहायक होता है reading kathamrita is helpful to do better japa

उस समय मेरे पास में कथामृत नहीं था किंतु मैंने अपने मोबाइल में सब कुछ रख लिया था क्योंकि अभी पूरी किताब लेकर जाना अभी लाइट ट्रैवल करना है कथामृत हैवी किताब है तो मैं अपने मोबाइल में सब अपलोड करके गया था तो एक हाथ में मैं मोबाइल लेकर बैठा था एक हाथ से मैं माला घुमा रहा था तो एक मेरा बैचमेट वो देख रहा है बोला कि तुमको शर्म नहीं आती मोबाइल देखते देखते माला घुमाते पहली बात तो कि जप के साथ में कथामृत पढ़ना ऐसा नहीं। जप कर रहे हैं तो जप ही कीजिए। जप करते करते यदि मन विक्षिप्त होता है तो कथामृत पढ़िए। सो ये बात है। दूसरा है कि आप माला से करें कि कर से करें कि मन से करें वो फर्क नहीं पड़ता। मैं बहुत बार अपने मन में ही जप करता हूं। कर और माला का इस्तेमाल नहीं करता। तो किंतु वो डज नॉट मैटर। जप करना है वो इंस्ट्रूमेंट कौन सा भी हो मन में कर्म की माला में उससे कोई फर्क नहीं

क्या जप करने के लिए आसन पर बैठना आवश्यक है?

पड़ता। आसन पर बैठ के जप करना कोई मतलब नियम देखिए आसन पे बैठ के जप करना चाहिए। वेरी गुड। किंतु फिर वहां तक अपना जप सीमित ना रह जाए। हम देखिए दो तरह के कार्य होते हैं ना। एक तरह का कार्य हमारा माइंड खा जाता है। इस तरह का कार्य होता है। दूसरा तरह का कार्य हम शारीरिक तो करते हैं किंतु मन फ्री रहता है। उस समय सतत जब चलते रहना चाहिए। सो जप को ना अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आप प्रवेश करवाइए। कहीं पे भी नो एंट्री ऐसा मत रखे रहिए। और इवन इस तरह का कोई कार्य करते हैं कि जो कि आपका मन का इतना इस्तेमाल हो जाता है कि जब के लिए आपके मन में स्थान ना रहे तो वहां पे छोटा-छोटा ब्रेक ले लीजिए। 2 मिनट का, 3 मिनट का और फटाफट करके 108 जप कर लीजिए। सो लाइक दिस जप अपने जीवन में सतत रहना चाहिए। कथामृत कब पढ़ना है? कथामृत कब पढ़ना है? कि जप करते-करते विक्षेप हो। मन इधर-उधर भटकने लगे तब कथामृत पढ़ना है। बार-बार मन को खींच के ईश्वर में लाना है। यही है साधना। यदि एक बार ईश्वर का नाम लिया उसी से यदि हो जाता तो फिर साधना किस काम की रहती? मां ठाकुर कहते हैं ना घोड़ी लखे एकटा लटो केटे हशेदा मा हाथ चापड़ी या तो फिर

लम्बे समय तक जप करने से हमारे कर्म कम हो जायेंगे

कहेंगे कि काम जो है ना वो ईश्वरमय हो जाएगा मैंने बहुत सारे लोगों को देखा है मैं हम लोगों का एक दवा का दुकान था तो हमारे दादाजी थे तो आकर के पहले तो वो वहां पर वो फोटो वगैरह जो होता था भगवान का वो वहां पर वो धूप अगरबत्ती लगाएंगे माला पहनाएंगे ऐसा दो हाथ जोड़कर के सिंसियरली खड़े रहेंगे तो दवाई की दुकान भी चलाते थे लगता है जैसे मंदिर में बैठे उनको मैं जब भी देखता था ऐसा लगता था तो नॉट नेसेसरी कि काम कम हो जाए संसार का काम तो है ही है अब ठाकुर ने कहा ना कि केरानी यदि जेल गए फिरत से वो जो कर्मचारी है जेल में गया वापस आएगा तो क्या धई करे नाच बे वो तो सब समय नाचता फिरता घूमेगा नहीं वो फिर से वही काम करेगा अपना कारनी का तो यहां पे भी सब कुछ ईश्वरमय हो जाएगा रेदर देन कि वी विल गो बैक टू फॉरेस्ट हम लोग संसार को ही ईश्वर बना देंगे। जो लोग हमारे संपर्क में आएंगे वे लोग समझ पाएंगे कि हां इनके भीतर में देवी प्रवाह बह रहा है। यह जो ठाकुर कहते हैं ना ब्रह्म शक्ति

जब हम साधना में आगे बढ़ते हैं, तो संसार ब्रह्ममय बन जाता है

अभेद ये दिस इज एग्जजेक्टली हम इसको फील कर पाएंगे कि जो ब्राह्मण है वही इस मेरा बिजनेस हो, मेरा जॉब हो, मेरा क्लासरूम हो, मेरा किचन हो, मेरा संसार हो। ये ब्राह्मण उसी सब में बने हुए हैं। उसी ढांचे में जैसे ब्राह्मण ही ठाकुर कहते हैं मैंने ढांचा बना वो खोल बना दिया है। सांचा बना दिया है। उसके भीतर में अपने मन को ढाल दो तो वैसे ही है। सांचा जैसे बाहर से दिखता है सब कुछ किंतु भीतर में तो जैसे ब्रह्म ही पड़ा हुआ

माँ सारदा का तोता गंगाराम

है। ना वो मुझे भी याद नहीं आ रहा है। मां मां के पास में गंगाराम करके तोता था। तोाराम को भूख लगती ना तो मां मां करके पुकारता। तो मां कहती है अच्छा बेटा आती हूं आती हूं। फिर कहती है उसको भूख लगी है इसलिए मां मां करके पुकार रहा है। ठाकुर ने जो एग्जांपल दिया है वो इस मतलब आपका एग्जांपल कौन सा पता नहीं किंतु जो ठाकुर ने जो एग्जांपल दिया है तोता है वो सब समय जैसे कि वो भगवान का नाम लेता रहता है। उसको सिखाया गया है। किंतु यदि बिल्ली आकर के उसका गला पकड़ेगी तो वो के के करेगा। भाई