Transcript
श्री रामकृष्ण कथामृत कल हमने देखा की किस तरह से प्रवचन देने के बड़े में ठाकुर बता रहे हैं यदि हमको कोई उपलब्धि एन हुई हो और बिना उपलब्धि के हमसे धन और प्रतिष्ठा बटोरने के लिए दूसरों को जाकर के उपदेश देते हैं तो वो किस तरह का है वो एक कहानी के मध्य से ठाकुर ने बताया की पद्मलोचन नाम करके एक लड़का था एक गांव में वहां पर पुराना मंदिर था तो मंदिर में जाकर के शाम को उसने शंकर बजाना शुरू कर दिया तो गांव वाले सब दौड़े-दौड़े आए सोच करके की मंदिर में जाएंगे संध्या आरती का दर्शन करेंगे ठाकुर को भगवान को प्रणाम करेंगे किंतु जाकर के देखा तो मंदिर में वही धूल मिट्टी और मिस्ट गिरी हुई है और कोई नहीं कोई भगवान की प्रतिष्ठा हुई बस सिर्फ यह पगला लड़का पौधों एक कोनी में खड़ा खड़ा शंकर बजा रहा है तब किसी ने जाकर के उसको क्या कहा मंदिर तोड़ना हक माधव पौधों के टी कर ली गोल तुम्हारे मंदिर में माधव अर्थात की भगवान तो है नहीं पौधों तुमने शंकर बजा करके ये क्या गोलमाल रात दी है जब दीवानी सी दीक्षित आना उसमें भी यह 11 चमगादड़ है और दिन भर दिन रात रिश्ता देते रहते हैं अभी ठाकुर इस कहानी का हमको एक डिपर एक गहन अर्थ समझते हैं जैसे की हमको पता है की ठाकुर जो कोई भी कहानी बताते हैं वो सब एलिगिरी के रूप में होती है एक क्या कहेंगे एक इस तरह सिंबॉलिक रिप्रेजेंटेशन होता है सिंबॉलिक रिप्रेजेंटेशन तात्विक चिंतन का एक रिप्रेजेंटेटिव के रूप में ठाकुर यह सब कहानी बताते हैं कहानियां के मध्य से क्यों धार्मिक शिक्षा दी जाति है जिससे की इसको समझना आसन हो वरना तो हमारे पास में विवेक चूड़ामणि 56 ऐसे कितने ही धार्मिक ग्रंथ है ब्रह्मा सूत्र है योग सूत्र है यह सब ग्रंथ समझना में तो एवं हमको भी दिक्कत होती है हमको भी तकलीफ होती है कितने सालों तक स्टडी किया फिर भी आज मैं यदि ब्रह्मास्त्र को खोल के देखूंगा उसका अर्थ समझना का प्रयास करूंगा तो आधा तो सर के ऊपर से ही चला जाएगा उसके ऊपर में दूसरा प्रॉब्लम क्या है की लैंग्वेज संस्कृत भाषा भारतीय होने के नाइट हिंदू होने के हिसाब से हम सबको सीखनी चाहिए ये आइडियल है किंतु आइडियल आदर्श और वास्तव इन दोनों में क्या फर्क है हम सबको पता है स्कूल में था तो मैंने संस्कृत लैंग्वेज लिया था हमारे यहां पर ऐसा माना जाता था गुजरात में किस संस्कृत में इजीली मार्ग ए जाते हैं आप इजीली अच्छे नंबर ला सकते हैं इसलिए और कोई डिफिकल्ट नहीं लेकर किस संस्कृति ले लो उसमें क्या कौन सी बड़ी बात है किंतु वह जो संस्कृत हम सीखने थे वह सब रत्न वाली बात थी टीचर हमारे बता देते थे इतना इतना रात लो और बस इतने मार्क्स ए जाएंगे तो अब स्कूल छोड़ी उसके साथ में वो रत हुआ संस्कृति चला गया तो संस्कृत समझ में नहीं आता है पहले बात दूसरी बात की जो पुरानी टर्मिनोलॉजी है वो टर्मिनोलॉजी नहीं अर्थात की वो टेक्निकल शब्द जिसके आधार पर यह फिलासफी की रचना की गई है वो भी नहीं समझते हैं और फिर एक्चुअल फिलासफी समझना और भी कठिन है तो आज हमारे लिए हिंदू धर्म के जो मूलभूत ग्रंथ है उपनिषद और ब्रह्म सूत्र गीता थोड़ा सा सहज है समझना किंतु उपनिषद और ब्रह्म सूत्र प्रस्थान तीन हमारे मूलभूत ग्रंथ है ब्रह्मास्त्र उपनिषद ब्रह्मास्त्र और गीता इन तीनों में से गीता थोड़ा बहुत शायद हम समझ लेंगे उपनिषद और ब्रह्म सूत्र समझना बड़ा ही मुश्किल राहत है तो इतने कठिन ग में रही हुई बड़ी ही कठिन सी दिखने वाली फिलासफी या तो फिर दर्शनशास्त्र ठाकुर हमको कहानियां के मध्य से कहते हैं और यह कहानी भी इतनी आसन है इतनी कहानी किस तरह की कहानी से हमको ये अच्छे से याद रहेगा थोड़ी सी ह्यूमर्स हो थोड़ा सा हमको बढ़कर के आनंद आए और फैट करके याद र जाए तो पदमालोचन की कहानी कितनी सहज है वो एक पगला लड़का हमने सभी ने देखा है अपने गांव में यदि रहते होंगे सभी गांव में इस तरह से एक ऐसा लड़का राहत है जो की एक सामान्य जिसको हम आम सेंस कहते हैं यह आम सेंस उससे अलग तरह से जाकर के सोचता है हालांकि उसके भीतर में कोई दिव्या आंतरिक दृष्टि होगी जो की हमको नहीं दिखाई देती तो इसलिए कभी-कभी हम पागल कहते हैं हालांकि ठाकुर ने भी कहा है की मां ऐसे ही लोगों के मुंह से बुलवाते हैं जो पागल है जो बालक है जो मूर्ख है इस तरह के लोगों से मौलवती है तो यह पागल जो होते हैं उनको हमको दृष्टि से दृष्टि से नहीं मानना चाहिए की हां उनके भीतर में भी एक इस तरह की इनसाइड है जो की हमको नहीं समझ में ए रहे तो इस तरह का एक लड़का पौधों वो महामंदिर में जाकर के शंकर बजा रहा है अभी उसके भीतर में भी कोई अंतर प्रेरणा हुई होगी तभी तो कहानी जाकर के वो मंदिर में शंकर बजा रहा है और कहानी जाकर के तोड़-फोड़ तो नहीं कर रहा वरना स्वामी जी कहते थे की भारत के गरीब लोगों को देखो वह देवता जैसे होते हैं और धर्म की बहुत ही गहन सहज गहन समझ उनको होती है वह कभी नहीं करेंगे किंतु अमेरिका या तो यूरोप के गरीब लोगों को देखो जैसा उनका स्वभाव राहत है छोटी-छोटी बटन में वो शराब पीकर के तोड़-फोड़ करना वह विचार करना यह सब उनके लिए सहज होता था उसे समय की बात है स्वामी जी का ऑब्जरवेशन है तो यह भारत के गरीब या तो भारत के पागल इन लोगों के भीतर में एक इस तरह की दृष्टि रहती है जो की हमको उपलब्ध दृष्टि से उपलब्ध सप्ताह शायद ना दिखती हो तो हो सकता है की इस तरह की कहानी बनाने के लिए ही इस तरह से पौधों को प्रेरणा दीदी की जो उसे खंडहर जैसा मंदिर है वहां जाकर के शंकर बजाओ तो हमको एक एलिगिरी मिल गई हमको एक उपमा मिल गई अभी ठाकुर इसकी व्याख्या कैसे करते हैं ठाकुर कहते हैं यदि हृदय मंदिर है माधव प्रतिष्ठा करते जो अर्थात अपने हृदय के मंदिर में हृदय रूपी मंदिर में माधव अर्थात ईश्वर की प्रतिष्ठा करना चाहते हो यदि भगवान लाभ करते जो जो हम भगवान लाभ करना चाहते हैं शुद्ध भून करें शंकु फूंक ले की हो गए सिर्फ घूम-घूम कर के शंकर सुखना से क्या होगा आगे भगवान पवित्र आशा ने आशा भोसले मांचड़ी शुद्ध होगा तो भगवान अपने हृदय के भीतर में लगाएं हुए पवित्र आसन पर आकर के विराजमान होंगे विराजमान हो यहां पर तो वह थोड़ी ना आने वाले हैं एकादश इंद्रिय अच्छा भी तो श्रवण मास चल रहा है तो हमको यह पता है की भगवान विष्णु और भगवान शिवा में किंतु डिफरेंस क्या है यह भगवान विष्णु को बुलाने के लिए किंतु आपको यह मंदिर की साफ सफाई वगैरा सब नियम के अनुसार उपभोग लगा चाहिए नियम के अनुसार मंगल आरती संध्या आरती हनी चाहिए यह सब किंतु भगवान विष्णु के लिए है या तो फिर विष्णु के अवतारों के लिए भगवान शिवा वो तो वैसे ही इस्मशान में विराज है उनका स्थान है विराजमान है और दैत्य दानव भूत पिशाच उनके संगी है और यह सांप यह नाग यह सब उनके शरीर पर गनो की तरह शोभा बड़ा रहे हैं तो यदि भगवान शिवा को ले आते हैं तो बात अलग है किंतु वो कम कंचन रूपी विष्ठा नहीं यदि सही सही होगी तो भगवान शिवा को शायद ऐसा कोई तकलीफ नहीं होगा जैसे मैंने कहा था कल की इस पुराने मंदिरों में जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है वहां पर एक इस तरह की एक दिव्यता की एक झांकी होती है जो की जो पॉपुलर मंदिर है वहां पे तो होती है नो डाउट प्रश्न ही नहीं है वरना तो इतने फेमस इतने पॉपुलर नहीं होते हैं किंतु वहां पर भीड़ की वजह से ना वो पवित्रता का जैसे वो आप जैसे वो 4g का सिग्नल है बहुत ज्यादा ट्रैफिक बाढ़ जान से फिर वो आपका वो टावर मिलन वो थोड़ा कम हो जाता है वो टावर होता है ना वन तू थ्री फोर करके वो दिखता है किंतु आप एकांत वाले मंदिर में कहानी जाएंगे जहां पर खंडहर जैसा मंदिर है ना ही कोई वहां पुजारी है ना ही वहां पर साफ सफाई होती है ना ही वहां पर नित्य पूजा आरती भोग राज होता है ऐसे किसी मंदिर में जाकर किंतु बैठेंगे तो देखेंगे की सही सही आनंद से मां भर जाएगा फूल टावर वहां पर मिलने लगेगा मां शुद्ध होने भगवान पवित्र आशा ने ऐसे बसवाइन यदि मां शुद्ध होगा तो पवित्र आसन पर आकर के भगवान विराजमान होंगे चाम चिकर बिष्ट थकले माधव के आना जाएं चमगादड़ की विष्ठा गिरी होने से आप भगवान को माधव को आमंत्रण नहीं दे सकते वो आकर के विराजमान नहीं होंगे एकादश इंद्रिय पांच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रीय अरमान यहां पर 11 चमगादड़ क्यों कहा गए हैं वह 11 चमगादड़ है 11 इंद्रिय पांच कर्म इंद्रिय पांच ज्ञानेंद्रिय और एक मां आगे माधव प्रतिष्ठा तार पर इच्छा हो वकृत लेक्चर देव सर्वप्रथम माधव की प्रतिष्ठा करो बाद में जितना वकृत लेक्चर देना है आगे डब जो डब डिले रतन तो लो तार पर अन्याकाज सर्वप्रथम गहन रत्नाकर ठाकुर ने क्या शब्द उसे किया था रत्नाकर समुद्र के लिए रत्नाकर जो रतन को धरण करता है रतन को जन्म देता है रतन की जननी है जो वो रत्नाकर उसे समुद्र में डब देने के लिए सर्वप्रथम अपनी इंद्रियों की शुद्ध करो भगवान की प्रतिष्ठा करो वैसे ही लेक्चर देना शुरू कर दिया लोक शिखा लोक लोगों को शिक्षा देना बड़ा ही कठिन है भगवान के दर्शन भगवान के दर्शन प्राप्त करने के बाद में यदि कोई आदेश प्राप्त करता है तब लोग शिक्षा दी जाति है है इसके बड़े में सूर्यनंद जी का एक अच्छा सा उदाहरण हमारे सामने है यह जो ठाकुर बार-बार कहते हैं की पहले ईश्वर लाभ करो पहले निर्विकल्प समाधि या तो सभी कप समाधि जो कुछ भी है वो कोई समाधि या तो फिर कोई गहन आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करो फिर जाकर के कहानी लोगों को लेक्चर दो तो ठाकुर ऐसा बार-बार जब बोल रहे हैं और स्वामी जी अमेरिका से आकर के सुद्दनली एक नया कुछ चालू कर दिया आत्मनानुक्षार्थम जगत हितायत ठाकुर ने तो कहा की पहले आत्मा का मोक्ष करो फिर भगवान का ईश्वर का मां का आदेश होगा तब कहानी जाके लोग को कल्याण करना यह ठाकुर तो कहते हैं काली मंदिर गए तो आपका सर्वप्रथम कर्तव्य क्या है पहले वहां कोलकाता के काली घाट का दर्शन किया होगा मुलाकात होगी तो पता होगा की कितनी भीड़ कितनी भीड़ उसे समय भी रहती थी तो पहले कैसे करके धक्का मुख करके मां काली के दर्शन कर ले एन की फिर वो बाहर में जो भिखारी वगैरा बैठे हुए हैं उनको भिक्षा दे ले वो भिक्षा देते ही समय समाप्त हो गया फिर काली मंदिर का दरवाजा बैंड हो गया ऐसा करेंगे ना की फिर पहले कैसे भी करके मां काली का दर्शन प्राप्त करें फिर बाहर आकर के इच्छा हो तो भिखारी को भिक्षा दी तो भी ठीक है नहीं दी तो भी ठीक है मां काली सबकी रक्षा करेगी मां का तो हम कभी-कभी सोचते हैं ये गरीबी है दुख है दर्द है इस जगत में क्यों है तो जो काली मां मंदिर में बैठी है वही मां काली तो भिक्षुक का स्वरूप धरण करके बाहर में भिक्षा मांग रही है और उसे भिखारी को जो दान जो जो धनवान व्यक्ति देता है वो धनी व्यक्ति भी मां काली ही उसे धनी का स्वरूप धरण करके उसको भिक्षा दे रही है और इस गरीबों पर अप के ऊपर में जो अत्याचार सकता है वह पापी करूर निष्ठुर व्यक्ति वह भी मां काली ही इस का स्वरूप धरण करके वो निष्ठा व्रत रही है ठाकुर का जो दर्शन था की एक मां काली एक बहुत ही सुंदर युवती एक मां गंगा गंगा नदी के उसमें से बाहर आई फिर उसने एक संतान को प्रसव किया एक बच्चे को जन्म दिया फिर इस बच्चे को वो का गई उसको पहले तो दूध पिलाया उसको अच्छे से प्रेम किया फिर इस को का गए तो यह सृष्टि स्थिति संघार यह अच्छा और बड़ा दोनों एक ही मां काली ही हुए हैं एक ही ईश्वर सब कुछ हुए हैं जैसे की एक नाटक है नाटक में मां लीजिए जैसे एक मूवी है आजकल तो मूवी का उदाहरण भीतर रहेगा जैसे हीरो होता है हीरोइन होती है जैसे कोई विलन होता है कोई कॉमेडियन होता है ऐसे वो स्टैंडर्ड पत्र सभी नाटक में रहते हैं अभी कोई भी मूवी में रहते हैं तो हमको तो पता है की एक एक्टर जो है वो हीरो हुआ है एक एक्ट्रेस है वो हीरोइन हुई है एक दूसरा एक्टर है वो विलन हुआ है एक तीसरा एक्टर है जो की कॉमेडियन हुआ है किंतु ऐसा यदि हो की एक ही एक्टर वो विभिन्न वेशभूषा पहन करके कभी हीरो होता है कभी हीरोइन होता है कभी विलन होता है तो कभी कॉमेडियन होता है तो क्या होगा तो यदि इस हीरो और विलन में यदि फाइट होती है तो कौन जीतेगा कौन हारेगा एक ही व्यक्ति है जो की दोनों का स्वरूप धरण करके वो लाड रहा है एक ही व्यक्ति है जो की दूसरों के ऊपर में अपने ही ऊपर में जैसे की अत्याचार कर रहा है तो यह है जगत को समझना का सही सही तरीका की यदि हम गरीब लोगों को भी देखते हैं तो मां काली ही इस के स्वरूप में बैठी हुई है यदि हम उसको भिक्षा भी देते हैं शिक्षा भी देते हैं तो मां काली ही हमारे धर्म से र करके जैसे कठपुतली को जैसे चलती है ऐसे हाथ पर चलती है एन चाहती है किंतु उसको नाचना वाला तो ऊपर में बैठा होता है तो वैसे ही हमारे हाथ पर पकड़ करके वह मां काली ही कठपुतली की तरफ हमारे हादसे उसको भिक्षा दिलवाती है और कभी-कभी हमारे ही हद से उनके ऊपर में अत्याचार करवाती है ये पूरा जो जगत संसार है वो वही ब्राह्मण का ही एक स्वरूप है वही मां काली या तो भगवान शिवा ही विभिन्न स्वरूप धरण करके इस पृथ्वी पर बस रहे हैं तो हमारा सबसे पहले कर्तव्य है यह कम क्रोध मैड लाभ मो इन सबसे मुक्ति प्रकार के साधन भजन ये जो कर लोगों की हमको शिक्षा दी गई कर्मो ज्ञान भक्ति और ध्यान इन चारों युगों का अनुष्ठान करके पहले तो यह कम कंचन रूपी यह माया का जो पर्दा है उसको तोड़कर के यह जो सही स्वरूप है हम सबका मैं भी मां काली ही हूं आप भी मां काली ही है जो भिक्षुक वहां पे बैठा है वो भी मां काली है जो रोगी वहां पर तड़प रहा है वो भी मां काली है जो डॉक्टर उसको ट्वीट कर रहा है वही वो भी मां काली है सब कुछ मां काली के ही प्रकाशक से प्रकाशमान है ये ज्ञान जी दिन होता है उसे दिन हम मुक्त हो जाते हैं फिर हम उसे जैसे अद्वैत भूमि से या तो उच्च स्पिरिचुअल प्लेन से थोड़ा सा नीचे आकर के सात्विक कर्म लेकर के इस जगत संसार में रहते हैं मुंह से स्वत ही वेद वेदांत उपनिषद भागवत रामायण उसकी कहानी स्वत ही सरित होना शुरू हो जाति है और अपने हाथ से हम चाहे ना चाहे दान ही निकलता है हम अपने हाथों से दान ही करते हैं इस हाथों से चाहे शकर के भी हम किसी का बड़ा नहीं कर सकते से यह हाथ अपने आप 100% मां काली के कंट्रोल में ए गए हैं इस हद से लोक कल्याण का ही कम होगा इस मुंह से लोक कल्याण की ही वाणी प्रकट होगी ये ऑटोमेटिक हो जाएगा फिर हमको कुछ करने की बोलने की जरूर नहीं पड़ेगी हम 100% महाकाली के कंट्रोल में ए गए हैं तो अभी ये ठाकुर की शिक्षा थी अब किंतु जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए सबको बोलना शुरू कर दिया शशि महाराज को बोला तुमको चेन्नई जाकर के भाषण वगैरा देने होंगे क्लासेस करने होंगे अभी चलो शशि महाराष्ट्र ठाकुर के शिष्य थे संतान थे उनको तो ब्रह्मदर्शन वगैरा हो चुका होगा किंतु यह जो नए-नए लड़के आए थे विश्वविद्यालय में लगा दिया उनको भी निखिल आनंद जी आर्टिकल लिख रहे हैं ठाकुर की बायोग्राफी लिख रहे हैं यह सब क्या एक नया एक नौटंकी लगा रखा है स्वामी जी ने ऐसा स्वामी जी के गुरु भाई तक खास करके बाबूराम महाराज को मानते थे उसको स्वामी जी की प्रतिभा के सामने सभी लोग तो नतमस तक किंतु एक प्रश्न तो सभी के मां में होता ही है स्वामी जी की आध्यात्मिक उपलब्धि के बड़े में कोई प्रशंसा ही नहीं है स्वामी जी की ठाकुर के प्रति शरणागति के बड़े में कोई संशय नहीं है जो ठाकुर ने ही स्वामी जी को सभी ग्रुप भाइयों का नेता बनाया है वो नेतृत्व स्वीकार करने में कोई दुविधा नहीं है किंतु स्वामी जी ने ये जो साधन कर्म प्रणाली की शुरुआत की है आरंभ किया है उसके बड़े में कुछ ना कुछ संशय किसी किसी के मां में था किंतु समय जाते हुए वह संशय नष्ट हो चुका है हमको यह समझना है की स्वामी जी जब यह कहते हैं की जैसे मैं हूं ना ही मुझे कोई दर्शन आध्यात्मिक अनुभूति हुई ना ही कोई मैन ठाकुर ने स्वामी जी ने आकर के ये कहा चलो तुम आज से धर्म चक्र प्रवर्तन आरंभ कर दो लोगों को परीक्षा देना शुरू कर दो मुझे तो किसी ने नहीं कहा फिर भी मैं क्यों क्लास ले रहा हूं मैं क्यों यहां पे आश्रम में छोटा-मोटा कार्यक्रम होता है तो कहानी जाकर के दो शब्द बोल देता हूं ऐसा क्यों करता हूं क्योंकि हमारे लिए ठाकुर की वाणी अपने मुंह से निर्गत हो ठाकुर के शब्द हमारी प्रकट हो जखवा पे स्थान ग्रहण करें वो हमारे लिए साधना है जैसे की मैं आज आरती के बाद में सुबह को और शाम को आंख बैंड करके ठाकुर का नाम लेट हूं वो मां में मां में ठाकुर का नाम लेट हूं यहां पर मैं प्रकाश रूप से शाब्दिक रूप से मैं ठाकुर का नाम लेट हूं मेरा एटीट्यूड दोनों के पीछे वही है वहां पर भी ठाकुर के नाम लेने का पीछे मेरा हेतु है ठाकुर के प्रति मेरी शरण गति हो तो यहां पर भी शब्द का उच्चारण करके ठाकुर का नाम लेने के पीछे मेरा हेतु है की ठाकुर के प्रति मेरी शरण गति और दृढ़ से दृढ़तार हो हां फिर इससे और किसी को थोड़ा बहुत आनंद मिलता है सत्संग से तो वो तो ठाकुर की कृपा है उससे तो मुझे कोई लेना देना नहीं है ठाकुर ने ही सबको इकट्ठा किया है ठाकुर ही श्रोता को लेकर आते हैं ठाकुर ही फिर वक्त को लेकर के आते हैं तो ठाकुर ही सब करते हैं हमारा एकमात्र यहां पे मकसद है की कर्म करके जैसे कपड़ों को हम वाशिंग मशीन में आजकल वाशिंग मशीन में धोते हैं पहले दो भी कार्ड पे धोया जाता था और ठाकुर की कहानी है ना एक आदमी जा रहा था धोबी घाट से वस्त्र वस्त्र को सूखने के लिए रखें थे पर ग गया उसको तो वो धोबी लोग उसको करने को गए तो भगवान में बैठे थे देखा क्या रे मेरे भक्तों मार रहा है मैं जा करके उसके रक्षा करता हूं किंतु फिर देखा की वो भक्ति ने ही अपने से ही अपने हाथ में पत्थर उठा लिया देख कर के शिवा वापस ए गए उसे समय धोबी घाट था आज का वाशिंग मशीन है आज के लॉन्ड्री यह सब वह प्रोफेशनल लॉन्ड्री वाले होते हैं तो यह सिर्फ देकर के है या तो फिर ये साबुन देकर के वेस्टन को हम दो करके कैसे स्वच्छ करते हैं निर्मल करते हैं वैसे ही अपने मालिन मां को इस तरह के सत्संग से हम स्वच्छ निर्मल करते हैं तो यह ठाकुर जो का रहे हैं और स्वामी जी जो का रहे हैं उसे दोनों में कंट्रास्ट है थोड़ा सा डिफरेंस हमको लगता है बाकी ये उपलब्ध दृष्टि से किंतु जैसे-जैसे हम उसकी गहराई में जाते हैं उसके बड़े में चिंतन करते हैं उसके बड़े में सोचते हैं तो पता चलेगा की ठाकुर और स्वामी जी एक ही बात करते हैं जैसे की कोल्लमिर्द ठाकुर लक्ष्मी दीदी एक बार कहती है की बस मैं आपके साथ में दूसरी बार नहीं आऊंगी आपका यदि पुनर्जन्म होगा तो मैं आपके साथ में फिर से नहीं आओगे तो ठाकुर क्या कहते हैं की अरे कैल्मीर दाल एकता के तंगल सभी टेनिस में अर्थात कलाम एन कमल जो होता है जब वह किसी दलदल में वह यह होता है उगता है तालाब में कमल उगते हैं किंतु क्या होता है ऊपर ऊपर से कमल सब अलग-अलग दिखते हैं किंतु उसके भीतर में उसकी जो रूट है उसकी जो जड़ है वो सब एक दूसरे के साथ में मिली हुई है यदि आप एक कमल को खींचोगे तो जड़ तो सबकी एक ही है बाकी सब कमल खींच करके आपके हाथ में ए जाएंगे तो वैसे ही ये सब चीजों की जड़ एक है एक को खींचना से बाकी सब ए गए है इसलिए ठाकुर कहते हैं हां किंतु मैं क्या का रहा था ठाकुर और स्वामी जी दोनों के उद्देश्य बाहर से जैसे विभिन्न कमल की तरह अलग दिखते हो किंतु यदि एक उपदेश को पकड़ करके उसके भीतर में जान का समझना का प्रयास करेंगे तो देखेंगे की एक के उपदेश से हम दूसरों के उपदेश में चले ही जाएंगे आपात दृष्टि से लगेगा की मां एक चीज का रही है ठाकुर एक चीज का रहे हैं स्वामी जी दूसरी चीज का रहा है किंतु स्वामी जी के उपदेश को पकड़ के गहराई में जाएंगे तो ठाकुर के उपदेश तक पहुंच जाएंगे ठाकुर के उपदेश को प्रकरण करके और समझना का प्रयास करेंगे तो मां के उपदेश तक चले जाएंगे दूसरी चीज कहते हो उसका अर्थ गठन हम एक ही तरह के नियम से लगा सकते हैं अभी मास्टर मा से लिखने हैं कथा कहते कहीं ते ठाकुर उत्तर बरअंदर पश्चिम एशिया देने लेने बात करते करते ठाकुर उत्तर की तरफ का वरांडा है उसके पश्चिम अंश की और आकर के खड़े र गए मनी का छेड़ा मनी पास में खड़े हैं अभी यह मानिकोंड तो वही मास्टर महाशय ठाकुर बार-बार बोलते छन ठाकुर जो बार-बार का रहे थे विवेक वैराग्य महले भगवान के पाव जाए ना विवेक और वैराग्य एन होने से भगवान प्राप्त नहीं हो सकते तो यह मनी सोच रहे हैं अर्थात मास्टर महाशय सोच रहे हैं की उन्होंने तो विवाह किया है तो अभी व्याकुल होकर के सोच रहे हैं की हुई बी क्या होगा इस साल की 28 इयर्स की उम्र है कॉलेज में पढ़ाई लिखी कर करके थोड़ा बहुत अंग्रेजी सीखें हैं भाभी टीचिंग विवेक वैराग्य मैन की कामिनी कंचन त्याग सोच रहे हैं विवेक वैराग्य का अर्थ क्या कामिनी कंचन त्याग है मनी श्री राम कृष्णा प्रति मनी ने ठाकुर को पूछा स्त्री यदि बोले यदि उनकी पत्नी यह कहती है की आप मेरी संभल नहीं रख रहे तो मैं आत्महत्या करूंगी तो ऐसा होने से क्या करेंगे श्री राम कृष्णा गंभीर स्वर से अमन श्री त्याग कर बी श्री रामकृष्ण ने गंभीर स्वर से कहा की ऐसी स्त्री का त्याग करो जो ईश्वर के रास्ते में वाइन प्रकट करती है ऐसी स्त्री का त्याग करो आत्महत्या करूं आत्महत्या ही करें या जो कुछ भी करें जय ऐश्वर्या प्रताप के रास्ते में बड़ा उत्पन्न करती है वह अविद्या स्त्री है अब हमको पता है अपने सुना ही होगा की राजा महाराज की शादी हुई थी और और उनकी बीबी थी उनकी पत्नी का नाम था विश्वेश्वरी तो अभी राजा महाराजा तो ठाकुर की उपदेशों के मध्य से वो त्याग तपस्या के वह सब साधना करते-करते तो फिर दक्षिणी शहर में ही रुक गए थे और आखिर में ठाकुर की महासमाधि के बाद में वो भारत पहले तो वराह नगर मठ में रहे और फिर बाद में पूरे भारत का भ्रमण करते-करते आखिर में वृंदावन में रहकर के कुसुम सरोवर के किनारे तपस्या कर रहे थे जब ध्यान कर रहे थे पूरा साधन भजन में डब गए थे राजा महाराजा की स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट ठाकुर ने उनको कहा था मेरा मां अपना मानस पुत्र के रूप में उनको चयनित किया था स्वामी विवेकानंद स्वयं कहते हैं आध्यात्मिकताएं राजा अमर जिओ बड़ो अर्थात की आध्यात्मिकता में राजा महाराज मेरे से भी ज्यादा आगे निकाल गए हैं अभी तो बीजी है वह स्वामी राजा महाराज इसी कठिन तपश्चार्य करते थे की जैसे की मैन युग प्रवर्तनकारी तपस्या हमने ठाकुर की तपस्या अच्छी है हमने स्वामी जी की तपस्या अच्छी है किंतु राजा महाराज की तपस्या के बड़े में बहुत कम लोग शायद जानते होंगे और प्रधानमंत्री महाराज ने ब्रह्मांड चरित बोलकर के पुस्तक उनकी बायोग्राफी लिखी है वह सही में पढ़ने लायक है इतना सुंदर वर्णन है वह वृंदावन में वह तपस्या कर रहे थे उसे पीरियड का उनके साथ में सुबोध आनंद जी महाराज थे तो वह भिक्षा करके वह ले आते थे और राजा महाराज एकदम ध्यान में दुबे रहते थे और कभी-कभी ध्यान में से निकाल करके उसका ग्रहण कर लेंगे या तो फिर भिक्षा वैसी ही पड़ी रहेगी एक दिन तो क्या हुआ था की राजा हमारा जो उसे दिन थोड़ा सा तक गए थे शायद बीमा भी तो आदि रात को सो गए थे उसे दिन तो आदि रात को एक वैष्णव बाबा जी वृंदावन तो वैष्णव वैष्णव लोगों का गढ़ है वहां पर बहुत सारे वैष्णव लोगों ने तपस्या की है तो एक वैष्णव बाबा जी एक जैसे प्रकाशमान उनका शरीर ऐसे बाबा जी आकर के उनको उठाने लगे अरे भाई उठो मध्य रात्रि हो गई है मध्य रात्रि जब ध्यान करने के लिए नहीं सोनी के लिए तो इकाई फिर फैट करके राजा महाराजा के देखा की वो बाबा जी का शरीर जैसे पूरा प्रकाशित है अर्थात वो वहीं पे ही वो पूर्व जन्म में मतलब वो पुराने कोई बाबा जी होंगे शरीर त्याग हो गया किंतु फिर भी सूक्ष्म शरीर से वहां पर अभी भी साधन भजन कर रहे हैं और साधकों को इस तरह से मदद कर रहे हैं तो फिर राजा हमारा बैठ गए और फिर से जब करना शुरू कर दिया तो यहां पर राजा महाराज ऐसी कठोर तपस्या कर रहे हैं यहां पर विश्वेश्वरी क्या कर रही है अभी विश्वेश्वरी को देखिए राजा महाराज ने तो हमको पता है केंद्रीय दृष्टि से यदि कोई सन्यास ग्रहण करता है तो उसकी तो शास्त्रीय दृष्टि से मृत्यु हो गई तो उसकी यदि बीबी है वह भी तो विधवा हो गई तो विश्वेश्वरी जैसे विधवाओं की तरह वस्त्र धरण करती थी जमीन पे सोई थी बहुत ही सदा बहुत ही सामान्य अन्य ग्रहण करती थी और दिन रात जाप करती थी एकाएक उसको एक दिन रात को सपनों में ऐसा दिखा की राजा महाराज की मृत्यु हो गई है अभी देखिए की यह स्वप्न का भी एक अर्थ है की राजा महाराज का भले ही चाहे उन्होंने सन्यास धरण किया हो ठाकुर के उपदेशों से और बहुत ही गहन आध्यात्मिक अनुभूतियां से उनका मां भर गया हो किंतु फिर भी पृथ्वी के साथ में थोड़ा बहुत जल्दी एक रहा होगा रिश्ता तो उसे दिन रात को वो रिश्ता टूट गया होगा तो इसीलिए सही सही यदि कहा जाए की मानवीय दृष्टि से सांसारिक दृष्टि से उनका मां संपूर्ण रूप से उसे दिन रात को निर्लिप्त हो गया होगा और साधना की जो सर्वोच्च भूमि है उसे पे वो आरूढ़ हो गए होंगे सही-सही ब्रह्मानंद नाम उनका उसे दिन रात को सार्थक हुआ होगा यह मेरा खुद का एनालिसिस है तो जो भी है यहां पे विश्वेश्वरी को दर्शन हुआ रात को सपना आया की राजा महाराज का मृत्यु हो गया है तो अभी वो क्या करेगी दूसरे दिन वो बड़ी ही व्याकुल हो गई यदि उनका शरीर चला गया है तो फिर उसको शरीर धरण करने से क्या लाभ है तो फिर उसने उसे दिन दूसरे या तीसरी दिन उसने आत्मा हत्या कर ली तो देखिए की ये विद्याश्री है की पति यदि धार्मिक साधना करता है आध्यात्मिक रास्ते पे आगे बढ़ाना चाहता है तो उसके भीतर में वो संपूर्ण रूप से सहायक करेगी नहीं उसमें बड़ा डालेगी तो वो हो गई विद्याश्री और यहां पर है एक विद्यार्थी वो कहती है मास्टर महाशय को बार-बार झगड़ा करके कहती है की आप घर में ही रहे इधर-उधर मत जाए और 1900 क्या धर्म कर्म लगा रखा है इस छोटी सी उम्र में बुढ़ापे में यदि यह सब करना हो तो करो वरना अभी मेरा ध्यान रखो और नहीं रखोगे तो मैं आत्महत्या करूंगी तब ठाकुर क्या कहते हैं यह ऐसी स्त्री होती है अविद्या रूपेण स्त्री और उसका त्याग करना चाहिए वो आत्महत्या करें जो की जो कुछ भी करें आज ये बात सुनकर के हमको थोड़ा सा ऐसा लगता है की ठाकुर ने ऐसी करूर बात क्यों कर दी किंतु देखिए की धर्म धर्म है संसार संसार है संसार की दृष्टि से हमारे सभी ऑब्लिगेशन होते हैं धर्म ऑर्थक कम और मोक्ष ये कर पुरुषार्थ है तो धर्म अर्थ कम ये संसार के पुरुषार्थ है और मोक्ष जो है वो एक दूसरा ही एक पुरुष अर्थ है है जो की सन्यासी के लिए एक बार मोक्ष के रास्ते पे चलने की शुरुआत की एक बार आध्यात्मिकता साधन भजन सन्यास के रास्ते पे चलने की शुरुआत की तब संसार का रास्ता या तो फिर संसार के नियम हमको लागू नहीं होते हां वे शुड बी साइंस यदि ऐसा मुंह से बोलना की मुझे संसार में तकलीफ हो रही है मुझे ये कम करने की इच्छा नहीं है लोग ठाकुर कहते हैं ना लोग साधु सॉन्ग करते हैं कोई कोई साधु संत कहता है गंज पीने के लिए गंज फुकने के लिए तो ऐसा वो फकीर देकर के आलस की वजह से वेदर कारी की वजह से संसार के ऊपर ध्यान नहीं दे करके साधु लोगों के पास जाकर के मिलते हैं तो वह ठीक नहीं है वह तो फिर दोनों और से हमको मार पड़ेगी यहां पर मंत्र वो हम फॉलो नहीं कर रहे हैं तो फिर हम उससे पाप में पढ़ेंगे यह जो मास्टर वहां से नए-नए आए थे तब ठाकुर ने क्या कहा था प्रताप का भाई आया था यहां पर र दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में ठाकुर के साथ तो ठाकुर ने नाराज होकर के कहा की अरे जो तुम घर जो अपने बीबी बच्चों के संभल रखो उनको तुम यहां पर रहोगे तो कौन संभालेगा तो यहां पर राजा महाराज को ठाकुर का रहे हैं भाई तू घर छोड़ कर के यहां पे आकर के रहे तो मुझे थोड़ा सुविधा रहेगा अभी राजा महाराज की भी तो बीबी थी राजा महाराज का भी तो बच्चा होने वाला था और था बाद में तो उन दोनों को छुड़ा करके ठाकुर उसको दक्षिणेश्वर में लाकर के उनको दक्षिणेश्वर में लाकर के रहने को बोलते थे और वो जो प्रताप का भाई जो था उसको बोला बार-बार की तुम घर चले जो अर्थात की यदि इस रास्ते पर आकर के हम सिंसियर हैं तभी वह सांसारिक जवाबदारी से हम विमुख हो सकते हैं वरना इस रास्ते पर सन्यास धर्म साधना इस रास्ते पर चलकर के हम यदि फैंसी देते हैं हम लोग सिंसियर नहीं है तो तो फिर संसार के धर्म को छोड़ना बड़ा ही भयानक है बड़ा ही ज्यादा पाप लगेगा तो आज यही तक कल संडे है कल छुट्टी मंडे को फिर से मिलेंगे ओम शांति ओम जय मां