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ओ स्थापक धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर जयराम बाटी गए हैं मा के साथ में मां को मिलने के लिए और मां तो छोटी बालिका थी सात साल की तो एक बार तो लज्जा की मारी शर्म की मारी छुप तो गई थी किंतु बाद में मां ने क्या किया था अपने छोटे-छोटे हाथों से ठाकुर के पैर धोए थे और ठाकुर को हवा भी डाली थी अपने हाथों से वो हाथ वाला पंखा जो आता है पहले तो इलेक्ट्रिसिटी वगैरह नहीं था तो यह मां और ठाकुर का जीवन भर का जो दिव्य सं है उसका सूत्रपात उनके विवाह के द्वारा हो चुका है अभी इसके बाद में गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या लिखते हैं इ हार परे तेरो और च बर बय से श्रीमा दई बार कामर पुकुरे जान इस घटना के बाद में 13 साल की उम्र में और 14 साल की उम्र में मां दो बार कामर पुकुर गई थी श्री श्री ठाकुर तखन दक्षिण साधना निमग्न ठाकुर उस समय दक्षिणेश्वर में साधना में निमग्न थे शसुराल श्री मायर भासुर जा आयो बर्ग लेन ससुरी खन दक्षिणेश्वर गंगा तीरे बास करते उस समय कामर पुकुर में ठाकुर के भाई और उनकी पत्नी वगैरा तो थे किंतु मां चंद्रा मणि देवी अर्थात की मां शारदा की सासू वह दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में निवास कर रही थी प्रथम बारे चंद्रमण देवी दक्षिणेश्वर में रहती थी तो हमने ऑलरेडी देखा कि ठाकुर जब संन्यास लेने की बारी आई तोतापुरी के साथ में तब कहते हैं कि यदि मैंने छुपके छुपके संन्यास दे सको तो ठीक है क्योंकि मां यहां पर है जद मां को पता चला कि मैंने सन्यास लिया है तो बेचारी को बड़ा ही कष्ट होगा तो चंद्रमणि देवी इतनी उनका मैंने ऐसा सरल सहज स्वभाव था कि वह कभी-कभी ऐसा मान लेती थी कि वहां पर वो एक मिल थी पास में तो मिल की तो वो यह बचती है ना वो सीटी बचती है वो जब वोह मिल चालू होती है और फिर वोह लोगों छुट्टी होती है बीच-बीच में वो फिर बीच में कोई भी काम के लिए मिल में जब सिटी बजेगी तो चंद्रा मणि देवी ने ऐसा सोच लिया था कि ये वैकुंठ की सिटी है तो और जब वैकुंठ में जब यह सिटी बजेगी तब वह भगवान अपना भोग ग्रहण करेंगे इससे पहले वो भोग नहीं खाएंगे तो माने भी चंद्रमणि देवी ने ठीक कर लिया जब तक यह मिल का मिल की सीटी नहीं बचती वो भी वह अपना आहार ग्रहण नहीं करेगी क्योंकि वैकुंठ में तो भगवान विष्णु ने तो अभी तक आहार नहीं किया है तो कैसे वह आहार ग्रहण करेगी तो यह बात को लेकर के ठाकुर बेचारे बड़े परेशान हो जाते थे क्योंकि मिल्की सिटी कब बजेगी कब नहीं इनके ऊपर तो इन लोगों का कोई कंट्रोल नहीं है और कभी देरी हो जाती तो फिर चंद्रा मणि देवी तो वृद्धा है व उनकी उम्र तो ज्यादा हो गई है भूखा रहना पड़ता यदि वो मिल्की सिटी यदि देरी से बचती है या नहीं बचती है तो तो फिर यह ठाकुर बेचारे खूब परेशान हो जाते बार-बार जाकर के मां को अपनी मां को रिक्वेस्ट करते कि मां अभी तुम आहार कर लो वहां पर वैकुंठ में वो भगवान ने आहार कर लिया है सीटी नहीं बजी होगी शायद वे लोग भूल गए होंगे जो भी है ऐसा कुछ भी बहाना बना के चंद्रावली देवी को पटाने का प्रयास करते किंतु चंद्रावली देवी कहती कि नहीं वो मतलब जब तक सिटी नहीं बजेगी मैं खाना नहीं खाऊंगी तो एक दिन क्या हुआ अभी संडे है तो संडे को तो मिल में छुट्टी रहती है तो अभी तो सिटी बजेगी नहीं मां खाएगी नहीं तो ठाकुर बेचारे बिल्कुल परेशान होकर बैठे है तो हृदय ने क्या किया वो हृदय ने वो जहां पे नबत में जिसके जिसमें ये चंद्रमणि देवी रहती थी वहां पीछे में जाकर के उसने अपने से सिटी बजा दी और फिर आकर के मां को कहता है कि मां तो सिटी बज गई है अभी तुम खा लो चंद्रमणि देवी वृद्धा थी किंतु उने इतना इतनी तो बुद्धि थी कि वो हंसते हंसते कहने लगी अरे नहीं रे तुम किसको मूर्ख बना रहे हो मुझे पता है कि सिटी तुमने बजाई है वो तो वैकुंठ की सिटी नहीं थी तो मैंने ऐसा चंद्रमणि देवी सरल स्वभावा और इतना उनका सुमधुर नेचर तो वो उस समय दक्षिणेश्वर में थी और मां उस समय 13 साल की उम्र में और 14 साल की उम्र में दो बार श्री मां शारदा देवी कामर पुकुर गई थी प्रथम बारे कामर पुकुरे अबो स्थाने परर श्रीमा जयराम बाटी ते फिरिया पाच छ मास लेन पहली बार जब मां कामर पुकुर गई थी उसके बाद में जब जयराम बाटी वापस आई तो पाच छ महीने थी जयराम बाटी अर्थात की अपने पिता का घर कामर पुकुर अर्थात की ठाकुर का घर तार पर आबार ससुर गृह जाया डेढ़ मास थाके उसके बाद में फिर से ससुर गृह अर्थात की कमरपुर जाकर के डेढ़ मास रही थी ही बारे पिलयसेंटर महीने थी इ हार परे 1274 साले श्री श्री ठाकुर भैरवी ब्राह्मणी और हृदय के लैया स्वग्राम पद र्पण करेन एवं श्री मां के तथा लया सेन इसके बाद में लगभग 1200 74 यानी कि यह 18680 मास छिले उस समय उस समय मां प्राय सात मास कमर पुकुर थी दीर्घ सात मास पल्ली ग्रामे अबो स्थाने पर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर फिरिया आबार कामर पुकुरे कोथा भुलिया साधने डुबी लेन प्राय सात महीने गांव में रह कर के ठाकुर फिर से दक्षिणेश्वर गए और फिर गांव वगैरह सब कुछ भूल गए और फिर से साधन राज्य में साधना में निमग्न हो किंतु ही साधन पर्वे शेषे तहर स्वास्थ विशेष अनती होई चिकित्सक परामर्श ताहा के 1287 साल पजन तो कोई एक बसर बरसर समय देश जाया चतुर्मास्य जापन करते होतो किंतु जब ठाकुर ने दूसरी बार साधना करने की शुरुआत की तो उनका स्वास्थ्य धीरे धीरे करके की अवनति होने लगी इसीलिए डॉक्टर ने कहा था वैधराज ने कहा था कि जब बारिश का समय होता है तो आप कामर पुकुर जाकर के रहिए यह इसलिए शायद होगा क्योंकि बारिश के समय में गंगा के किनारे ह्यूमिडिटी बहुत बढ़ जाती होगी तो ह्यूमिडिटी जिनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है उनके लिए अच्छा नहीं है इसलिए शायद ऐसा कहा होगा श्री माव तख कामर पुकुरे उपस्थित होतन मां भी उस समय कामर पुकुर में आती ही सु दीर्घ काल म श्रीमा ठीक कतो बार ससुर बाड़ी ते गया लेन एवं शेखाने की की व्यापार घटिया छलो ताहा जानी बार आर उपाय नहीं यह लंबे समय के दौरान देखिए 1888 58 59 के आसपास में उनका विवाह हुआ और यह 10 साल में 18680 यहां तक ठाकुर बहुत बार बीच-बीच में कामर पुकुर आए थे मां भी बीच-बीच में कामर पुकुर गई थी किंतु वह कब गई थी कितना समय रही थी इसका ठीक ठीक अंदाज अभी अपने पास में नहीं है और उस समय क्या-क्या घटनाएं हुई थी यह जानने का हमारे पास में कोई उपाय भी नहीं है आबार श्रीमा प्रवृति स्मृति होते लब्ध जे द्वि चाटी घटना संरक्षित होया उहा देर अनेक गुली रोई समय निर्देश ओ संभव कौन से समय में क्या घटना हुई थी वह पता नहीं पहली बात दूसरी बात की मां अपने कामर पुकुर के दिनों की बातें कभी पिछले जीवन में कहा करती थी किंतु कौन से समय एगजैक्टली कौन सी घटना है वो मां की बातों से जानना मुश्किल था क्योंकि तिथि वार नक्षत्र जैसे महावीर हनुमान ने कहा था ना कि मुझे तिथि वार नक्षत्र कौन सा है माने आज कौन सा तिथि है आज कौन सा वार है आज कौन सा नक्षत्र है पता नहीं मैं तो बस राम नाम में मग्न रहता हूं तो वैसे ही उस समय यह सिर्फ हनुमान की ही बात नहीं थी हमारी तरह आज इतना इजली अवेलेबल यह कैलेंडर यह घड़ी यह सब इतना इजली अवेलेबल नहीं था और था तो लोग क्या है कि सीजन के अनुसार अपने दिनों की गणना करते थे कि जैसे मां ने कहा था ना कि खिजर कलेक्ट करने के समय में मेरा विवाह हुआ था क्योंकि मुझे याद है कि मैं जब कमरपुकुर गई थी तो मैंने खजूर यानी कि डेट्स कलेक्ट किए थे तो इस तरह से वे लोग सीजन के अनुसार अपने दिनों की गणना करते थे फिर साल कौन सा नक्षत्र कौन सा तो मां तो खुद शायद इतना ध्यान नहीं दी होगी तो मां जब बाद बाद में जो घटनाएं वर्णन की कामर पुकुर में क्याक हुआ तो उसका ठीक ठीक समय निर्देश करना अभी हमारे लिए संभव नहीं सतन आमरा संभव स्थलो तीतो अनन खेत्रे सेही चेष्टा ना करिया को एकटी घटना लिपिबद्ध करिया भैरवी ब्राह्मणी प्रसंगे फिरिया जा तो माने कब कौन सी घटना कब हुई थी मां की बातो से जानना संभव नहीं है इसीलिए हम लोग भी कोई घटना का प्रसंग क्रम कोई घटना की तिथि साल यह सब सोचने की बजाय कोई कोई घटना जो कि हमको पता है वह कमार पुकुर में हुई थी उसको हम लिपिबद्ध करेंगे अर्थात कि उसका वर्णन करेंगे और फिर आखिर में भैरवी ब्राह्मणी वाली घटना पर हम वापस जाएंगे भैरवी ब्राह्मणी जब कामर पुकुर आई थी और मां जब थी तब एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना हुई थी कि वो भैरवी ब्राह्मणी का संबंध ठाकुर के साथ में जिस तरह से था भैरवी ब्राह्मणी उनकी गुरु थी तो गुरु के रूप में थोड़ा सा अहंकार उनके मन में आ गया था और बार-बार ऐसा कहती थी कि ठाकुर को तो मैंने बनाया है अर्थात कि ठाकुर की आज की जो आध्यात्मिक उपलब्धियां देखते हो तो मैं उनकी गुरु हूं उसकी वजह से उनको यह प्राप्त हुई है यह थोड़ा सा अहंकार हो गया था और मां जब वहां पर थी तो मां के प्रति ईर्षा भी होने लगी थी तो वह सब घटनाएं भैरवी ब्राह्मणी कामर पुकुर आती है तब की है तो उस घटना के पहले ठाकुर भैरवी ब्राह्मणी को लेकर के कामर पुकुर आए उस घटना के पहले की जितनी घटनाएं हैं उसका कुछ कुछ वर्णन यहां पर गंभीरानंद जी महाराज करते हैं महाराज लिखते हैं 13 बर यो से श्रीमा जखन कामर पुकुरे छिले अर्थात की 13 साल की उम्र में मां जब कामर पुकुर में थी तो खन का एकटी अलौकिक व्यापार भक्तगण तहर श्रीमुख रूप सुनिया छले उस समय की एक अलौकिक घटना का वर्णन भक्तगण उनके श्री मुख से मां के म मु से इस तरह से सुने थे पार्श्व ग्राम पथ और गृह गुली अतिक्रम्य सुब्रत हलदर पुकुरे स्नान करते जाते तहर भय होतो वो जद आप कमार पुकुर गए होंगे तो आपको पता होगा कि वहां पर एक हालदार पुकुर है अभी हालदार नाम है पुकुर का अर्थ जनरली होता है तालाब तो हालदार नाम का तालाब वहां पर है और वहां पर स्नान करने के लिए कपड़े धोने के लिए वगैरह जाते थे आज की तरह हमारा वो रनिंग वाटर प्लंबिंग वगैरह घर में नहीं होता था तो वहां पर वो मां को भी जाना पड़ता था किंतु जब अभी इतना दूर नहीं है आप जद कामर पुकुर जाकर के आपने देखा होगा तो हालदार पुकुर ठाकुर के घर से वैसे बहुत ज्यादा दूर नहीं है किंतु क्या है कि मां तो स्त्री थी वो वैसे ही एक नई जब वधु एक नई पत्नी जब घर में आती है तो क्या है एक लज्जा शीला तो लज्जा तो व होती ही है और मां तो और भी थोड़ा सा ज्यादा लज्जा शिला थी तो वहां पर जाने में मां को थोड़ा सा सं कुछ होता था और थोड़ा सा उनको भय भी होता था डर भी लगता था अच्छा यह वही हालदार पुकुर है जिसके बारे में ठाकुर ने कहा था कि हलदर पुकुर के किनारे पे लोग वहां पे शोच किया करते थे तो जिससे कि जब लोग कपड़े धोने के लिए स्नान करने के लिए आते तो वह देख कर के उनको बड़ा ही गुस्सा आता और बार-बार अपने आपस में कहा करते कि भाई वहां पे किनारे पे तालाब के किनारे कोई सोच ना करें वरना तो फिर क्या है सबको असुविधा होती है किंतु ऐसी बात कोई सुनता नहीं था फिर कहीं किसी ने जाकर के वहां पर वो जो डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट होगा लोकल कोई ऑफिसर होगा वहां पर जाकर के कंप्लेन किया तो वहां से क्लर्क आकर के एक साइन बोर्ड लगा करके चला गया कि यहां पे किसी को सोच नहीं करना है तो जैसे ही वो साइन बोर्ड लगाया सबने बंद कर दिया वहां पे सोच करना तो ठाकुर कहते हैं कि देखिए कि लिखे हुए शब्दों के प्रति अपना इतना यह होता है रिस्पेक्ट होता है एक ठाकुर एक दूसरा भी एक उदाहरण देते थे इसके बारे में कि एक आदमी कहीं रास्ते से जा रहा था देखा कि वोह एक मकान गिरा हुआ है तो फिर ना एक एक आदमी हां तो उसने देखा फिर दूसरे आदमी को जाकर के कहा कि देखो मैं रास्ते में जाकर के देखा वो मकान गिरा तो दूसरा आदमी कहता है कहां मैंने तो न्यूजपेपर में पढ़ा नहीं मल उसका अर्थ ये कि जब तक वो न्यूजपेपर में नहीं पढ़ेगा वोह घटना हुई है उसके ऊपर में उसका विश्वास ही नहीं होगा तो लिखे हुए शब्द के ऊपर में लोगों का इतना यह रहता है य शास्त्र इसीलिए लिखे गए हैं लिखे हुए शास्त्र को जब हम पढ़ेंगे तो हमको लगेगा कि हां अब जैसे यहां पर भी हम टमा की बात लिखी हुई पढ़ रहे हैं उसको पढ़ने से ही हमको उसके ऊपर में विश्वास होता है तो वही हालदार पुकुर तो वहां पर जाने को मां को डर लगता था खिड़की दोरजा दिया बाहर आशिया भाबी ते छन नूतन बहु एकला की कोरे नाते जावो तो पीछे के दरवाजे से बाहर आकर के रास्ते पे आकर के सोचती हुई मां बोल सोच रही है कि मैं अभी तो नई आई हुई वधु हूं यहां पे बहू हूं मैं किस तरह से अकेले स्नान करने के लिए जाऊं भाभी ते भाभी ते देखे आटी में आशील यह सोच रही थी देखा कि आठ लड़कियां वहां पे आई श्री माओ अमनी रास्ता नामिया पड़ी लेन जैसे देखा कि आठ लड़की या स्नान करने के लिए जा रहे हैं तो फिर मां भी नि संकोच होकर के उन लड़कियों के साथ में स्नान करने के लिए चली रास्ते पर निकल पड़ी मे देर चारी जन तहर आगे चारी जन तहर पीछ होने होया ताहा के लैया हालदार पुकुरर घाटे चली लो आठ लड़कियां थी उसमें से चार मां के आगे चल रही है चार मां के पीछे चल रही है और इस तरह से वे लोग हलदर पुकुर के घाट पर आए मां स्नान करीले तराव करीलो मां ने स्नान किया उन्होंने भी स्नान किया पोरे आबार सेही भावे बाड़ी प जंतो आश लो फिर इसी तरह से यह लोग अपने घर वापस आए मां ज तो दिन सेखाने लेन प्रतिदिन ए रूप होई तो मां जितने दिन हलदर कामर पुकुर में थी इतने दिन ऐसा होता कि जब भी मां स्नान करने के लिए जाती ये आठ लड़की आती और मां को एस्कोर्ट करके तालाब के किनारे ले जाती स्नान करने के लिए नेक दिन तहर मने होया छलो मे बली कारा स्नानेर समय रोज आ से मां को बहुत दिन तक ऐसा मन में प्रश्न होता था कि यह लड़कियां कौन है और हमेशा स्नान करने के समय ही दिखती है किंतु तीनी किछुई बुझीते पारे नाही ताहा दिग के जिज्ञासा करेना किंतु मां को इस बात के बारे में कुछ समझ में नहीं आया और मां उनको कभी पूछी भी नहीं कि हां आप लोग कौन है तो यह कौन है अष्ट सखी जिनके बारे में हमारे शास्त्रों में विवरण है कि जब देवी के साथ में अष्ट सखियां होती है तो मैंने सुंदर एक जैसे गंभीरानंद जी महाराज कहते थे कि दिव्यता और मनुष्यवकाशा प्रकाश होता है तो यहां पर एक दिव्यता का प्रकाश की दिव्यता के प्रकाश की एक छोटी सी किरण मां जब दक्षिणेश्वर में थी तो बहुत ही सुबह को क्या है कि ये य बाहर में स्नान करने के लिए जाना शोच करने के लिए जाना स्त्रियों को इससे तो लज्जा होती ही है असुविधा होती ही है मां दक्षिणेश्वर में थी तो इस तरह क्या करती थी बेचारी कि बहुत ही अर्ली मॉर्निंग जाकर के जब कोई उठ नहीं है वह गंगा के किनारे जाकर के गंगा में वह स्नान वगैरह कर दिया करती थी तो एक दिन क्या हुआ कि अंधेरे में जाते-जाते वहां पर एक मगरमच्छ होगा तो उसके ऊपर में पैर पड़ गया अभी तो ठाकुर की कृपा की देखिए कि मगरमच्छ ने सामने काटा नहीं किंतु जब ठाकुर को यह बात पता चली तो मां को बोला कि एक लैंटर्न लेकर के जाओ और मां खुद कहती है कि इस तरह से अर्ली मॉर्निंग सुबह को शौच करने को जाना है फिर दिन भर मौका नहीं मिलता दिन भर तो सब पुरुष लोग होते हैं चारों ओर तो फिर अभी वो शौच करने के लिए जाएंगे वहां पर कोई होगा तो कैसा मने तो मां कहती है कि उसका वेग धारण करते करते मुझे पेट का असु हो गया मने पेट की बीमारी हो गई तो मैंने उन दिनों की बातें वैसे हमको बड़ी ही लगती है कि सुमधुर लगती है कि हां चलो हम भी कामर पुकुर चले जाए जयराम बटी दक्षिणेश्वर किंतु आज हम जो बेसिक फैसिलिटी के साथ में हैबिटेड है वो बेसिक फैसिलिटी भी उनको नहीं मिलती थी यह पानी उबाल करके पीना जिस तालाब में किनारे शोच कर रहे हैं जिस तालाब में कपड़े धो रहे हैं वहीं से फिर यह पानी लाकर के पीना तो निश्चय हर बार जब भी बारिश होगा कुछ भी होगा बीमारी ऐसे फैले गी कि सबका शरीर बिल्कुल उसका स्वास्थ्य जितने भी लोग होंगे वो स्वास्थ्य को तोड़ देगा मां भी जितनी बार जयराम बाटी आती थी उसके बाद में कलकाता वापस आएगी तो यह गोला मा योगी मां वगैरे बड़े ही दुखित हो जाते बड़े चौक जाते कि फिर वह जो सन्यासी लड़के मां के साथ में रहते जयराम बाटी में उनको कहते कि अरे यह कैसी मां को लेकर के आए हो देखो तो शरीर के ऊपर में दो हड्डियां सिवाय और कुछ नहीं है मां को बार-बार यह काला ज्वर होता था अब यह काला बुखार नाम दिया है पता नहीं इसका मने डेंग्यू है ना कि क्या था उस समय का किंतु बार-बार मां को इस तरह की बीमारियां होती थी तो उन दिनों की वो सब बातें हैं जितनी यह दिव्यता इन सबके भीतर में कैसे पनपती है जैसे कहते हैं ना कीचड़ के भीतर में यह कमल इसके जैसा है इतनी असुविधा इतना कष्ट इन सबके बीच में भी मां और ठाकुर के जीवन को देखिए वने सिर्फ कोलकात्ता में दक्षिणेश्वर में नहीं वहां पर तो फिर भी थोड़ी बहुत फैसिलिटी तो गांव से तो ज्यादा थी किंतु य जयराम बाटी में और कमार पुकुर में उनके बचपन के दिनों की घटनाएं जितना पढ़ेंगे उत हमको लगेगा कि देखिए कि इन इसके भीतर में रहकर के भी उनको इतनी आध्यात्मिक उपलब्धि हुई थी ऑफकोर्स अवतार थे बोलकर के आध्यात्मिकता तो उनकी मुट्ठी के भीतर में थी किंतु मनुष्यवकाशा इस तरह से एक्जिस्टेंशल चैलेंज बहुत कम हो गई है तो चैलेंज नहीं है तो एक सरेंडर एक शरणागति भी इतनी थोड़ी सी कम हो जाती है बोलकर के जितना जब ध्यान हमको करना चाहिए नहीं कर पाते डिस्ट्रेक्शन में रहता है कि हां यह एक चीज है जिसके ऊपर में मैं पहले ध्यान दूं बाद में इसको जाकर के बैठ कर के कुछ पढ़ूंगा या तो फिर कुछ लिखूंगा या तो फिर कुछ सोचूंगा या जब करूंगा मैंने दूसरी चीजें इतनी सारी आ जाती है उस समय डिस्ट्रक्शन नहीं थे असुविधा ज्यादा थी आज जब सुविधाएं बढ़ गई है तो साथ में डिस्ट्रक्शन भी इतने सारे बढ़ गए हैं तो मैंने जैसे स्वामी जी कहते हैं कि गुड एंड इविल इनका प्रमाण जो है जगत में हमेशा इक्वल रहता है ऐसा नहीं था रामराज्य में बहुत अच्छा था और आज बहुत बुरा है ऐसा नहीं 5050 ये गुड एंड इविल य राम राज्य में भी इतना ही था आज भी इतना है माने उस समय जैसे ठाकुर ने ही कहा था कि उस समय इतने सारे साधु महा संत रहते थे तो वह एक बात है किंतु आज के कलयुग में ठाकुर कहते हैं कि थोड़ा सा ही जब ध्यान करके भी आपको अनुभूति होना शुरू हो जाएगा पहले लोगों को कितनी सालों साल तक तपस्या करनी पड़ती थी ध्रुव ने एक पेर पर खड़े रहकर हजार साल तपस्या की थी तो उस समय आध्यात्मिक जीवन जैसे बहुत सारे लोगों के जीवन में था आध्यात्मिकता किंतु आध्यात्मिकता प्राप्त करना कठिन था आज देखेंगे कि यह मटेरियल जम बहुत बढ़ गया है ऑन वन तो ऑन द अदर हैंड आप थोड़ा सा ही कुछ करेंगे ठाकुर कहते हैं ना थोड़ा सा करोगे तो गुरु आकर के बता देगा कि अभी इसके बाद में यह यह करना है तो आध्यात्मिक जीवन पहले की बजाय काफी सरल हो गया है यह कथामृत और यह वगैरा किताबें ठाकुर मा स्वामी जी यह आज के अवतार है उनका जीवन पढ़ कर के ही हम बहुत सारा अपने कर्म का संस्कार काट सकते हैं जयराम बाटी जीवन दारिद्र्य और सतो कोमर मध्य श्री मा विद्या शार आग्रह अमरा लख करिया जयराम बाटी में दारिद्र्य और सत कर्म दरिद्रता तो है ही है फिर घर का सब कर्म है इसके भीतर में भी इतना काम करते करते भी घर का सब कुछ मां के जीवन में हमने विद्या के प्रति आग्रह हमने लक्ष्य किया है हमने नोट किया है मने रखते हुई बेजे मन में रखना होगा याद रखना होगा कि पन्न उच्च ण परिवार तखन पुंथी गत विद्या प्रति अधिक आग्रह जन्मे नहीं याद रखना होगा कि संगति पन्न अर्थात की जो समृद्ध परिवार है और उच्च वर्ण परिवार है अर्थात की जो उ उच्च वर्ण के परिवार है उच्च वर्ण के परिवार अर्थात की ब्राह्मण तो मां तो ब्राह्मण परिवार में ही जन्म हुआ था किंतु संगति पन्न नहीं थे अर्थात की समृद्ध नहीं थे तो संगति पन्न और समृद्ध इस तरह के पर वार में भी उस समय में पुंथी गत विद्या के प्रति इतना आग्रह नहीं था पुंथी गत विद्या अर्थात कि आज का हम एकेडमिक एजुकेशन कहेंगे कि स्कूल में नियमित जाना ग्रेजुएशन की बात तो छोड़ी देते हैं किंतु पाठशाला प्राय सभी गांव में होती थी व पाठशाला में जाएंगे तो थोड़ा सा अंक थोड़ा सा लैंग्वेज मैथमेटिक्स लैंग्वेज थोड़ा सा आपको यह शास्त्र पुराण वगैरह तो सीखने को मिल ही जाता खास कर के ब्राह्मण के लड़के को क्योंकि यह पूजा विधि वगैरह करनी होती है तो विधि के मंत्र पूजा के मंत्र यह शतपथ ब्राह्मण वगैरह जो अपने ट्रेडिशनल ग्रंथ है उसके बारे में तो अभ्यास करने को मिल ही जाता और फिर यदि और यदि इच्छा है तो जैसे नदिया है या तो फिर काशी है वहां पर जाकर के गुरु के पास से आप बहुत ही अच्छे से शास्त्र विद्या ग्रहण कर सकते थे किंतु उस समय ये प्रचलन ज्यादा नहीं था कुछ कुछ परिवार जो लोग यह सब विधि विधान किया करते थे उनको छोड़ करर के विद्या के प्रति एकेडमिक स्कूल में जाना पाठशाला में जाना इसके बारे में ज्यादा आग्रह नहीं था सुतं श्री मायर एच एस्टर मध्य अदम ज्ञान लाभ स्पृहा दर्शने सतही चमत्कृत होते होए इसीलिए मां की यह ज्ञान लाभ स्पृहा दर्शन ज्ञान लाभ स्पृहा अर्थात की ज्ञान लाभ करने की उत्कंठा स्पृहा अर्थात की इच्छा ज्ञान लाभ करने की यह इच्छा है यह उत्कंठा है उसको दर्शन करके उसको देख कर के हमको चमत्कृत होना पड़ेगा हमको चौक उठना पड़ेगा हमको सही सही में आश्चर्य चकित होना होगा आमरा आरो मुग्ध होई जोखन देखीते पाई ज शशर गृह प्रतिकूल अवस्था मध्य शहा उन्मत ना होया बरम वर्धी तो होईया छन हम और भी मुग्ध होना होगा कि शसुर गृह के प्रतिकूल वातावरण के भीतर में रह कर के भी यह स्पृहा ज्ञान लाभ की यह समाप्त नहीं होकर के और भी ज्यादा बड़ी थी माने शसुर गृह जाएगी तो कन्या को तो कह दिया जाएगा कि अभी घर का सब काम करो सफाई वगैरा है करो खाना बनाओ फिर ये खेत में काम करो बच्चे होंगे तो बच्चे की संभाल लो यह सब करो अभी पढ़ाई लिखाई अपने पति के घर जाकर के कहां करनी है वो आज भी इतना ही डिफिकल्ट है कि जब लड़की का विवाह होगा शादी करके अपने पति के घर जाएगी तो वह किस तरह से पढ़ाई लिखाई कर पाएगी इमीडिएट सांसारिक की सभी जवाबदारी उसके सर पर आ जाती है हालांकि आज ये इंडिपेंडेंस यह सब नया एक चला है वो भी होना चाहिए मां खुद यह सब चीजों को इनकरेज करती थी किंतु मां खुद जिस समय रह रही थी उस समय रूढ़ चुस्त ऑर्थोडॉक्सी इतनी ज्यादा थी कि सोच ही नहीं सकते कि पति के घर जाकर के पढ़ाई लिखाई होगी तो इसीलिए यहां पर महाराज कहते हैं कि हमको और भी ज्यादा चमत्कृत मने आश्चर्य चकित होना होगा मुग्ध होना होगा कि पति के घर जाकर के भी मां कीय ज्ञान लाभ करने की उत्कंठा है वह कम नहीं होकर के उसमें बढ़ोतरी ही हुई है श्री मां बोलिया छिले माने कहा था कामर पुकुरे लोखी और आमी र्ण परिचय एकट एकट पढ़त माने कहा था कि कामर पुकुर में मैं और लक्ष्मी लक्ष्मी अर्थात की ठाकुर की भतीजी हम दोनों वर्ण परिचय अर्थात की वर्ण अर्थात की कैरेक्टर अ ब क ख ग अल्फाबेट जिसको कहते हैं तो अल्फाबेट का परिचय वर्ण परिचय थोड़ा-थोड़ा पढ़ा था भाग भाने बोई केडे नीले भागने अर्थात की हृदय ठाकुर का भांजा उसने किताब छीन कर छीन ली मां के पास से बोलले कहा मैं मानु शेर लेखा पढा सीखते नहीं कहा कि लड़कियों को लिखना पढ़ना सीखना उचित नहीं है शेश की नाटक नोबल पढ़े आखिर में की नाटक या नोबल पढ़ोगे माने उन दिनों की यह जो सब रूढ़ी चुस्त मान्यता है कि स्त्रियों को बिल्कुल उनके हक छीन करके अभी ऐसा नहीं कहेंगे आजकल की यह लैंग्वेज है उनके अधिकार छिन करर की आज की लैंग्वेज है उस समय का वो एक आज के हमेशा एक हिस्ट्री पढ़ कर के इन जनरल सब हिस्टोरियन कहते हैं कि जिस युग में आप जी रहे हैं उस युग की मोरालिटी आप जब इतिहास के ऊपर में आरोपित ना करें क्योंकि इस युग में जो हो रहा है उसका जो पूरा कॉन्टेक्स्ट बैकग्राउंड है और जिस युग को हम पढ़ रहे हैं इतिहास में उसका कॉन्टेक्स्ट बैकग्राउंड पूरा अलग ही होता है तो आज हम कहेंगे स्त्रियों को फ्रीडम होना चाहिए उनको ग्रेजुएट होना चाहिए आजकल तो न्यूज़पेपर में मैं तो पढ़ता हूं बीच-बीच में कि यह जो जितनी कॉम्प्लिकेटेड एग्जाम्स होती है 12थ की एग्जाम बोर्ड की एग्जाम वगैरह तो लड़कियां ही सबसे ज्यादा नंबर लेकर के आती है मने टॉप अब हमेशा टॉपर्स देखिए तो लड़कियां ही होती है तो आजकल की तो बात ही अलग है इसरो में वो जो चंद्रयान सक्सेस हुआ था तो जब वीडियो देख रहा था देख रहा था कि ज्यादातर तो लेडीज साइंटिस्ट है तो इन देख कर के हमको ग व होता है तो यह आज के युग की मोरालिटी है आज के युग का यह है सब कुछ तो इसको उस युग पर आरोपित नहीं करके उस युग के अनुसार वह देखना है कि यह हृदय कहता है मां के पास में सेय वर्ण परिचय अर्थात कि अल्फाबेट सीखने की किताब छीन ली और कहा कि ये नाटक नोवल पढ़ो गी क्या माने यह सबन पढ़ कर के लक्ष्मी तार बई छाड़ लेना मने लक्ष्मी मां के पास से तो किताब छीन ली किंतु लक्ष्मी ने अपनी किताब नहीं चन्ने दी हृदय को बर री मानुष की ना जोर कोरे रखले माने मन में बड़ा ही दम था जोर था इसके लिए जोर करके किताब रख ली अब यह री मानुष इसका मुझे देखना पड़ेगा कि क्या अर्थ है तो किंतु लक्ष्मी दीदी का था मैंने बाद में भी देखेंगे कि बोल्ड थी उनका नेचर लक्ष्मी दीदी का नेचर बड़ा ही बोल्ड था वो क्या करती थी यह घुंघरू वगैरह पहन कर के ये कोई पात्र की भजना करने जैसे कि यह वृंदावन का कोई सीन है तो सीन मने एक्टिंग वगैरह किया करती थी नृत्य करती थी फिर य इस तरह से कथा करती थी एक्टिंग करती थी यह लक्ष्मी दीदी थोड़ी सी बोल्ड थी और फिर वह अपने साथियों के साथ में यह तीर्थ यात्रा भी किया करती थी तो और पुरुषों के सामने जाकर के बात करने में उनको इस तरह से बहुत ज्यादा लज्जा और शर्म नहीं था तो ठाकुर ने मां को कहा था कि तुम लक्ष्मी के पल्ले में पड़ कर के उसको देख कर के इस तरह से अपनी लज्जा को भांग मत देना अपनी लज्जा को तोड़ मत देना लज्जा रखना तो ये क्या है कि ये लक्ष्मी दीदी का नेचर बोल्ड था ही और वैसे भी वो अपने घर में रहती है ना अपने पति के जब घर जाती है श्वसुर के घर में तो लड़की होती है स्त्री होती है थोड़ी सी हमेशा लज्जा शिला होती है किंतु अपने पिताजी के घर जब रहती है तो थोड़ा सा वो जोर करके बोल सकती है तो वैसे ही अपने पिताजी के घर में रह रही थी लक्ष्मी और वैसे ही उनका नेचर बोल्ड था थोड़ा सा तो जब यह हृदय ने किताब छीन ली मां के पास से किंतु लक्ष्मी दीदी के पास में से हृदय किताब छीन नहीं पाया आमी आबार गोपने आरे खानी एक आना दिए किनेन लान मैंने फिर से मां कहती है कि मैंने क्या किया गोपने सीक्रेट एक आना देकर के एक पैसा देकर के उस समय का आना अभी पता नहीं आज का कितना होगा तो एक आना देकर के एक दूसरी किताब में सीक्रेट परचेस करके ले आई मा भी देखिए शारदा सरस्वती स्वयं अभी आप कहेंगे कि सरस्वती को मैं विद्या अर्जन नहीं करने दूंगा यह तो कोई संभव नहीं हालांकि यह भी प्रश्न है कि सरस्वती को इस तरह से वर्ण परिचय अल्फाबेट में परिचय यह सब पढ़ने की क्या जरूरत है तो वह भी एक बात है माने किस तरह से दोनों स्वभाव मनुष्य स्वभाव और देवी का स्वभाव सरस्वती का स्वभाव एक साथ में देखने को मिलता है इच्छा है पढ़ाई लिखाई करने की तो देखिए कि यहां पर महाराज कहते हैं आगे में सब कुछ कह दिया है मां के बारे में अवतरण का में कि हां देवी किस तरह से पृथ्वी पर आती है असुर संहार करने के लिए वगैरह वगैरह किंतु फिर यहां पर महाराज जी क्या लिखते हैं कि मां कीय ज्ञान स्पृहा है मां का यह जो ज्ञान प्राप्त करने की उत्कंठा है उसको देख कर के हमको चमत्कृत होना होगा उसको देख कर के हमको आश्चर्य चकित होना होगा जैसे कि महाराज इस तरह से लिखते हैं जैसे कि आगे उन्होंने और कुछ लिखा ही नहीं मां के देवत्व के बारे में तो अवतार का चरित्र जब हम पाठ करते हैं अवतार के चरित्र की जब हम चिंतन करते हैं तो इस तरह से हमेशा अपने मन में दो विरोधाभासी करंट एक साथ में भाव एक साथ में चलते रहेंगे एक और हम उनको देवी या तो ईश्वर या तो भगवती जगदंबा मान कर के उनकी स्तुति करेंगे दूसरी ही और एक छोटे से गांव में रह कर के जैसे कि एक जैसे लाखों स्त्रियां अपने गांव में रहती है जिनका कि अ जीवन इतना कठिन कष्टदायक होता है तो वैसे ही यह एक मां भी थी उनके साथ में रहती थी और उनका ही कष्ट स्वीकार करती थी किंतु यह कष्ट स्वीकार के भीतर में भी जब इस तरह से छोटी-छोटी घटनाओं में कोई एक आश्चर्यजनक चीज देखने को मिलती कि हां अपने पति के घर आकर के भी पढ़ाई लिखाई करने की उनकी इच्छा है उनकी उत्कंठा है तो फिर यह देख कर के हमको आश्चर्य चकित होते हैं हम लोग तो दोनों भाव मां के जीवन में किस तरह से सुमधुर रूप से बुने हुए हैं वोवन टुगेदर इंग्लिश में कहेंगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्त