प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः इस सप्ताह मां का जीवन वो जो एक कहानी
दुर्योधन ने पाया माखन, अर्जुन ने पाया माखन-चोर
अह गीता की श्रीमद्भगवत गीता की कहानी अह काफी फेमस है कि युद्ध प्रारंभ होना है और दुर्योधन और अर्जुन दोनों गए भगवान कृष्ण के पास में मदद मांगने के लिए हेल्प मांगने के लिए। अभी जाकर देखा तो भगवान कृष्ण थे सोए हुए। तो अभी क्या है कि दोनों को अर्जुन और दुर्योधन भगवान को किस तरह से देखते हैं। अर्जुन सोचता है कि मैं उनका शिष्य हूं या तो उनसे छोटा हूं। बुद्धि, शक्ति, दिव्यता सभी चीजों में तो वह भगवान के श्री चरण के पास में खड़ा रहता है। वेट करता है कि भगवान कब नींद से जगेंगे और दुर्योधन अपने को क्या कुछ समथिंग मानता है घमंडी अहंकारी तो वह भगवान के सर के पास में खड़ा रहता है। तो अभी जब भगवान की नींद खुली तो देखा कि कृष्ण अर्जुन भी है और दुर्योधन भी है। दोनों आए हैं हेल्प मांगने के लिए। तो भगवान ने कहा कि देखो मेरे पास में दो चीजें हैं। एक तो है कि मेरा आर्मी मेरा सैन्य जो कि सबसे पावरफुल आर्मी है। सबसे पावरफुल सैन्य है इस जगत में। और दूसरा है मैं। किंतु एक बात याद रखना कि मुझे यदि आप सिलेलेक्ट करोगे तो मैं शस्त्र धारण नहीं करूंगा। तो अभी आप सेलेक्ट कीजिए कि क्या चाहिए। मेरी आर्मी चाहिए कि मुझे चाहिए और फिर अर्जुन पर पहले नजर पड़ी है तो अर्जुन को पहला चॉइस दिया तो अर्जुन अभी दुर्योधन सोच रहा है कि यह अर्जुन तो मूर्ख नहीं है कि भगवान कृष्ण को लेगा उनको ले क्या करना है वैसे अकेले हैं और वैसे माने शस्त्र धारण नहीं करेंगे शत्रु का वध नहीं करेंगे तो उनको लेके क्या लाभ है तो दुर्योधन सोच रहा था यहां पर आना पूरा पूरा विफल हुआ कुछ लाभ नहीं हुआ ऐसा करके तो मीनवाइल अर्जुन ने मांग लिया कि मुझे तो आप ही चाहिए भगवान कृष्ण ही चाहिए तो दुर्योधन खुशख हो गया कि अरे वाह ऐसा मूर्ख है इतनी पावरफुल सैन्य छोड़कर के भगवान को मांग लिया अच्छा ठीक है चलो मैं लकी हूं बोल के वो खुशी होता वहां से चला गया तो अभी जो पंच लाइन है यहां पे कहानी तो काफी फेमस है इसके बाद की जो पंच लाइन टाइम किसी ने अर्जुन को पूछा कि यह तुमने कौन सा मूर्खामी किया कि दुर्योधन माखन ले चला गया। तुमने उसको माखन दे दिया। यानी कि कोई भी चीज होती है, कोई भी पदार्थ होता है। उसका सार भाग क्या है? उस दिन हम देख रहे थे कि यह गाय है तो गाय का तो वैसे सर भी है, पुंछ भी है, सिंह भी है, पैर भी है, पेट भी है। किंतु गाय का सार भाग है आंचल। जहां से गाय का दूध मिलता है। तो देखिए कि कोई भी चीज का जो सार भाग होता है, आप यदि दूध में से मक्खन बनाएंगे तो क्या होगा? दूध का जो पूरा सार भाग है वह मक्खन में आ जाएगा और फिर वह जो वाटर जो है ना जो छास के रूप में जो रह जाता है वो उसमें इतना सार इसमें इतना पोषक तत्व नहीं होता जितना कि माखन में होता है तो दूध के दो पार्ट हो गए मक्खन बनाने के समय में एक तो उसका दूध का पूरा सार भाग आ गया और फिर वह जो वाटर बचता है वह सिर्फ उसमें पौष्टिक तो होता है किंतु माखन जितना पौष्टिक नहीं होता। तो किसी ने अर्जुन को पूछा कि यह तुमने कौन सा मूर्खामी कर दिया कि यह दुर्योधन है वह सार भाग ले चला गया। दुर्योधन माखन ले चला गया। तो अर्जुन उत्तर देता है दुर्योधन माखन ले गया है। मैं माखन चोर को ले जा रहा हूं। तो देखिए कि ये एक जो भौतिक मटेरियलिस्टिक व्यू पॉइंट होता है उससे हम लोग सोचते हैं कि हां यह जो पावर है पोजीशन है यह स्ट्रेंथ है इस इह जगत में इह लोक में भव संसार में तो वही सबसे ज्यादा पावरफुल जिसके पास में वह है वही आदमी श्रेष्ठ कहलाता है किंतु जो लोग आध्यात्मिकता को पर्स्यू करते हैं जो लोग एक बार आध्यात्मिक जगत में पदार्पण करते हैं। उन लोगों को पता है कि यदि इस जगत का सार भाग देखें तो वह हमारे हृदय में विराजमान ईश्वर ही है। तो अभी आज गीता जयंती है और यहां पर 9:00 बजे से गीता चटिंग होगा। 9 से 12 पूरा गीता के 18 अध्याय जितने भी है सब एक साथ में चेंट किए जाएंगे। तो हम चार साधु हैं। अभी यहां पर हम चारों को चार डिवीजन दे दिए गए हैं। मुझे दिया है ये चैप्टर सिक्स टू 10 ये पांच चैप्टर मुझे करने हैं जैन। तो मेरे से पहले एक महाराज, मेरे बाद में दो महाराज। ऐसा करके हम लोग चार डिवीजन किए हैं। तो यह माखन चोर का दिन है। तो बोल के यह कहानी अच्छा तो अभी मां का जीवन गंभीरानंद जी द्वारा लिखित मां के जीवन का यह भार समर्पण चैप्टर हम देख रहे थे। ऑलरेडी हमने देखा कि इस चैप्टर का जो सार है वही जो
माँ का मातृत्व
माखन क्या है इस चैप्टर का सार क्या है तो ठाकुर मां को भविष्य के रामकृष्ण संघ और रामकृष्ण संघ के जो संतान गण है श्री रामकृष्ण के उनका जिम्मा लेने के लिए मां को तैयार कर रहे हैं। तो इसी सिलसिले में जो सब कुछ घटनावली का जो एक के बाद एक गंभीरानंद जी उल्लेख कर रहे थे और फिर उसको हम देख रहे थे। तो इसी सिलसिले में हमने देखा कि किस तरह से मां ठाकुर का मन समझ करके ठाकुर के कहने के पहले ही वो सब व्यवस्था करके रख देती थी। जैसे कि मां का मन पड़ा हुआ है ठाकुर के श्री चरणों में। इतना सा छोटा सा तो नहबत है दक्षिणेश्वर काली मंदिर में जहां पे ठाकुर और मां रहते थे। ठाकुर का कमरा है यहां पे। इससे कुछ दूरी पर है मां का कमरा जो कि एक्चुअली था नबत जहां पे शहनाई वगैरह बजाया जाता था। तो उसके ग्राउंड फ्लोर पर मां रहती है और फिर वहां पर छोटे से नौबत में ही रहने की खाने की सब व्यवस्था है। और वहीं पर देखिए कि मां जो है वो खाना भी पकाती है। सब काम भी करती है। किंतु मां का मन पड़ा रहता है। ठाकुर अपने कमरे में बैठकर के क्या बोल रहे हैं। तो वहीं पे तो फिर अब जब जैसे ही कोई अब नरेंद्र जैसा ही आएगा तो ठाकुर पूछेंगे क्या खाना खाओगे तो तो नरेंद्र कहेगा हां तो माने पूरा वो संजय की तरह ही वो जो संजय वो महल राजमल में बैठकर के वो ध्रुतराष्ट्र को जैसे पूरा वो दिखाता था बताता था सुनाता था कि कुरुक्षेत्र में क्या हो रहा है वो दूर दृष्टि थी संजय की तो यहां पे भी मां का जो दूर श्रवण की कैपेसिटी बेटी थी तो ठाकुर के कमरे में क्या चल रहा है सब मां सुन पाती थी और जैसे ही ठाकुर ने कहा नरेंद्र को कि आज यहां पर खाना तो साथ में ही मां जो है वह जो दाल और रोटी इसका वो जो है मोटा-मोटा रोटी और छोले का दाल यह नरेंद्र खाना पसंद करता था तो उसकी व्यवस्था करने में मां लग जाती और फिर जब ठाकुर है वह झाऊला जाने के समय झाऊला अर्थात की ओपन एयर टॉयलेट उस समय तो इंडोर प्लंबिंग था नहीं तो यह सब ओपन एयर की तरह ही सब चलता था तो वह झाऊला की ओर जाने के समय जैसे ही वह रास्ते में नहबत आता है वहां पे ठहर करके मां को बताने के लिए कि हां नरेंद्र खाएगा आज तो बताने से पहले ही देखा कि मां ने सब व्यवस्था प्रारंभ कर दी है और फिर दूसरी एक बात हमने देखी कि नहबत तो छोटा सा था वहां पर वैसे चीजें ही सब इतनी सारी थी। मां रहती थी, लक्ष्मी दीदी रहती थी। ऊपर से यह जब कोलकाता की सब स्त्री भक्त जब आएगी तो उनको रहने के लिए कैसे होगी व्यवस्था? और फिर क्या है ना कि मां तो थी दुबली पतली थोड़ी सी उस समय। जबकि कोलकाता की जो स्त्रियां थी वो थोड़ी सी हेल्दी थी। माने थोड़ी मोटी-सोटी थी। वो मां कहती भी है कि कोलकाता से जब ये मोटी-छोटी लेडी लेडी डिवोटीज आएगी ठाकुर की तो फिर वो क्या करेगी कि नौबत का जो दरवाजा है वह तो छोटा सा ही है हाइट भी कम है विड्थ भी कम है उसकी तो वहां पर खड़ी रहकर के छोटा सा दरवाजा ऐसा करके इशारा करके बताती और कहती कि आहा हमारी सती लक्ष्मी किस तरह से तपस्या कर रही है जैसे कि वनवास कर रही है सती सती लक्ष्मी अर्थात कि मां शारदा तो मां शारदा के ऊपर में सहानुभूति है तो तो वे लोग खड़ी रहकर के कहती थी इतना छोटा सा दरवाजा प्रवेश करना वह भी मुश्किल है उसका हाइट भी कम है ये जैसे कि मां नहबत में रहती है तपस्या कर रही है जैसे कि वनवास भुगत रही है मां सीता को जिस तरह से भगवान राम का अनुसरण करतेकरते वनवास जैसे कि भुगतना पड़ा था तो वैसे ही और यहां पे और एक स्टोरी भी हमने देखी थी कि किस तरह से वो चंद्रामणि देवी ठाकुर की मां जब मां पहली बार दक्षिणेश्वर आई थी तो चंद्रामणि देवी उस समय जीवित थी और किंतु बहुत वृद्धा हो गई थी और बीच-बीच में कोई भी काम करना है तो फिर वह मां शारदा को अपनी बहू को पुकारती थी और जैसे ही वह चंद्रामणि देवी मां को पुकारेगी मां दौड़ के जाएगी माने धीरे से जाना, शांति से जाना वह जैसे एक नॉर्मल स्पीड है ऐसा नहीं। जैसे ही अपनी सास ने पुकारा वैसे ही दौड़ करके गई। किंतु ऐसे होता क्या था कि बिकॉज़ के दरवाजा छोटा था। उसका हाइट कम था। उसमें प्रवेश करने के समय मां का जो सर है वो दरवाजे पर टकराता। तो नेचुरली हम लोग इमेजिन कर सकते हैं कि इससे कितना पेन होगा। तो बाकी सब लोग मां को कहते हैं कि मां वो आपकी सास जब पुकारती है तो आप इतना दौड़ के क्यों जाती है? आपका सर टकराता है थोड़ा धीरे से भी तो आप जा सकती है। तो मां ने क्या कहा कि देखो वह तो अभी वृद्धा हो गई है और उनकी तो संभाल रखने वाला मेरे अलावा और कोई है नहीं। इसलिए वृद्धा को एक सेकंड से भी ज्यादा कोई कष्ट ना सहन करना पड़े। इसके लिए वह जैसे ही पुकारती है वैसे मैं दौड़ करके जाती हूं। तो देखिए कि यहां पर मां का जो मातृत्व का दरवाजा जो है मातृत्व रूपी उनका जो यह आशीर्वाद है वह तो धीरे-धीरे करके सबके लिए वह खुलना शुरू हो ही चुका था। वह चाहे वह अपनी सास के प्रति उनकी करुणा हो। उनको उनके प्रति उनका मातृत्व हो या तो फिर यह जो त्यागी संतान है उनके प्रति उनका जो ममत्व हो मातृभावना हो वो धीरे-धीरे करके उनका मां के हृदय में यह सब ब्लोसोम होना शुरू हो ही चुका था। तो ठाकुर है सिर्फ मां को एक मां के मातृत्व को एक डायरेक्शन दे रहे हैं कि हां इस तरह से यह त्यागी भक्त संतान आते हैं। यह कोलकाता की स्त्री भक्त आती है। या तो फिर ठाकुर की खुद की मां है। इनकी सेवा कैसे करनी है? इनका जतन कैसे करना है? इनका केयर कैसे करना है? उनके प्रति स्नेह और सहानुभूति कैसे प्रकट करनी है? यह सब ठाकुर धीरे-धीरे करके मां को समझा रहे हैं, सिखा रहे हैं। इंटरेस्टिंग
कहानी: स्वामी विशुद्धानंद की जयरामबाटी यात्रा और माँ सारदा के आशीर्वाद की प्राप्ति
स्टोरी विशुद्धानंद जी महाराज जो कि बाद में अपने संघ के प्रेसिडेंट हुए थे। तो विशुद्धानंद जी पहली पहली बार जब मां का दर्शन किए थे जयराम भाटी जाकर के। तो अभी क्या है देखिए शहर के लड़के हैं तो उस समय तो साधु नहीं हुए थे। वैसे ही वो घर में ही थे उस समय यंग लड़के थे। तो अभी क्या है कि जैसे ही पता चला कि यहां पर मां है जयराम बाटी में तो उनका अब जैसे मां का सिर्फ छवि ही देखा था उन्होंने और वो छवि देखकर के ही उनके हृदय में ऐसा हुआ कि नहीं मां का तो दर्शन करना ही चाहिए। कोलकाता में वो बीच-बीच में क्या था कि कभी-कभी दक्षिणेश्वर जाया करते थे। तो दक्षिणेश्वर में रामलाल दादा है तो रामलाल दादा के साथ में अच्छा परिचय हो गया था। तो रामलाल दादा उनको ठाकुर के कमरे में रहने देते थे, सोने देते थे और मां काली का जो प्रसाद आता था तो वह उनको खिलाते भी थे। तो बोलकर के रामलाल दादा के साथ काफी अच्छा परिचय हो चुका था। अभी एक दिन ऐसा हुआ रामलाल दादा ने विशुद्धानंद जी को जिततेन उस समय का लड़का यंग मैन तो उनको कहा कि जाओ एक काम है एक डॉक्टर है उसको जाकर के कुछ मेरा काम है करके आना तो ये विशुद्धानंद जी जितन महाराज उनको गए मिलने के लिए देखा कि यह डॉक्टर जो है वह तो पुराना डिवोटी था ठाकुर का और उसके घर में ठाकुर का फोटो था ठाकुर के फोटो फोटो के साथ में और एक स्त्री का भी फोटो था। साथ में ही रखा था। तो जितन महाराज पूछते हैं कि अरे यह कौन है? यह स्त्री कौन है? इनका ठाकुर के साथ में ही उनका फोटो क्यों रखा है? तो इस डिवोटी ने कहा कि वह तो है हम सबकी श्री मां। और वह ठाकुर की सहधर्मिणी है। ठाकुर के रहते-रहते वहीं दक्षिणेश्वर काली मंदिर में ही रहकर के ठाकुर की सेवा किया करती थी और वह अभी जीवित भी है। तो विशुद्धानंद जी जैसे सिर्फ फोटो ही देखा। इतना जैसे कि भीतर में से श्रद्धा और भक्ति प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि मुझे तो मां का दर्शन करना ही करना है। किंतु मैं कैसे करूं? आप मुझे बताइए कहां पे वो रहती है? तो एक डिवोटी ने कहा कि जयराम बाटी में रहती है। वहां पर आपको जाना होगा। किंतु रास्ता जो है बड़ा ही दुर्गम है। वहां बीच-बीच में यह जो लुटेरे हैं वह अटैक भी करते हैं। यात्राओं को पैसा तो लूट ही लेंगे किंतु मर्डर भी कर देंगे। यह सब डर है वहां पर जर्नी का। तो विश्वनांद जी कहते हैं कि वह कुछ भी हो मैं तो जय राम भाटी जाऊंगा दर्शन करूंगा। तो ऐसे संकल्प किया वो रास्ते में अभी वह यात्रा पर निकल भी गए मन में है आजकल क्या है वो अभी हाईवे ट्रेन और गाड़ी का युग आ गया है ना हमको लगता नहीं है अभी कोलकाता से जयराम भाटी की यात्रा फटाक करके वह हो जाएगी दो ढाई घंटे ना कि इतना लगता है तो किंतु उस समय थी बड़ी ही कठिन थी वो तीन सा 3 दिन के आसपास लग जाएंगे वह वर्धमान तकनीकी कहां तक आपको ट्रेन में जाना जाना होगा। फिर वहां से 30 कि.मी. ना कि रास्ता आपको यह बैलगाड़ी में काटना है। वह फिर जब जयराम भाटी आ जाएंगे तो तो पैदल ही चलना है। वह सब है काफी कुछ वहां पे तो ऐसा कठिन रास्ता पार करके करके जा रहे हैं। और मन के भीतर में एक ही अभी शहर के लड़के हैं तो वो सोच रहे हैं कि मेरे साथ में कोई ऐसा होता व्यक्ति जो कि मां को मेरे जो कि मुझे मां को इंट्रोड्यूस करवा दे। ये ऐसा होता है ना सिटी में कि हम किसी को मिलने को जाते हैं। अब जैसे वो जो अभी ये जो वेस्टर्न सब कल्चर अपने में प्रवेश करने लगा है। तो कुछ-कुछ चीजें अच्छी भी है। आप किसी कमरे में प्रवेश करते हैं तो कमरा खुला भी है ना पहले नोक किया कीजिए। नोक करने के बाद में प्रवेश कीजिए। दरवाजा खटखटाने के बाद में। क्योंकि क्या ये सब जेंटलमैनलीनेस है। फटाक करके दरवाजा खोल के भीतर में चले गए तो किसी का प्राइवेसी भंग होता है। एक इंटरेस्टिंग घटना तो स्वामी जी ने एक लेटर लिखा तो लेटर लिख के किसी विदेशी डिसाइपल को और फिर एनवेलोकप में बंद किया। फिर ये हरि महाराज को दिया तुरानंद जी को कि जाओ इसको पोस्ट करके आओ। तो हरि महाराज ने लेटर लेकर के जा रहे हैं और उन एड्रेस देख रहे हैं कि कौन सा एड्रेस है। तो जैसे ही वह एड्रेस पढ़ रहे हैं स्वामी जी ने उनको वापस बुलाया। स्वामी जी ने कहा देखो मैंने तो तुमको लेटर पोस्ट करने को कहा था। एड्रेस पढ़ने को तो नहीं कहा था। तुम अननेसेसरी एड्रेस क्यों पढ़ रहे हो? यानी कि क्या है? यह सब कुछ-कुछ वेस्टर्न वैल्यू्यूज है कि एक प्राइवेसी है। किसी का मेंटेन करना है वगैरह-वगैरह। एक तो कुछ कुछ चीजें जरूरी भी है। स्वामी जी ने यह सब चीजें बेलूर मठ में काफी इंट्रोड्यूस करवाई है। ऐसी सब सिंपल चीजें कि तो क्या है कि यह भी एक वेस्टर्न वैल्यू है कि किसी के घर जाते हैं। अब पहली बार किसी को मिलते हैं तो बीच में कोई एक इंट्रोड्यूस करने वाला चाहिए आपको कि हां कोई कहे कि मां यह लड़का है। कोलकाता से आया है। इसका नाम यह जितन है वगैरह-वगैरह आपका डिवोटी है। बोल करके मां को इंट्रोड्यूस करवा दे। तभी तो मां उनको एंटरटेन करेगी ना। बिना एक अनजाने लड़के को अपने घर में हटा एकाएक वो आ गया है देख के थोड़ी ना कोई उनके साथ में बात करेगा। पहले ही पूछेगा भाई कौन हो तुम? कहां से आए हो? और फिर दूसरा उस समय का प्रॉब्लम क्या था कि बहुत सारे यंग लड़के जो है यह बंग भंग के बाद में यह जो रेवोल्यूशनरी जो सब मूवमेंट प्रारंभ हुआ था बंगाल में उसमें काफी लोग इनवॉल्व थे। तो बोलकर के अभी पुलिस लोगों की भी काफी नजर रहती थी उस समय उस समय ऐसा हुआ था मां उस समय काशी में है और यह जो देवव्रत महाराज ना वही उनका नाम है मोस्ट प्रोबेबबली वो भी वहां पर थे तो वो पहले रेवोल्यूशनरी थे किंतु अभी तो वो सब छोड़कर के मां के साथ में रह रहे हैं। तो एकाएक न्यूज़ आया कि वह जो दिल्ली में जो अह वायसरॉय जो है इंडिया का उसके ऊपर में किसी ने बम फेंका है और उसकी हत्या करने के लिए तो मां कहती है कि अरे वो तो अच्छा आदमी है। उसके ऊपर में बम क्यों फेंका? उसकी हत्या क्यों कर रहे हैं? इस आशा है वह ऐसा नहीं है कि वह ब्रिटिश वायसराॉय भारत के लिए अच्छा है। किंतु क्या है कि किसी की हत्या करके भारत को ये जो है स्वतंत्रता कभी नहीं मिलने वाली। इस तरह की रक्तपात से मिली हुई स्वतंत्रता किसी काम की नहीं है। फ्रीडम है वही अच्छा है जो कि उसका रूट रीजन क्या है? भारत बटा हुआ है नात जात यह सब वगैरह में। तो भारत को एकजुट करना है। जैसे ही भारत की जनता एकजुट होगी ब्रिटिश साम्राज्य का ऑटोमेटिक भारत में से गायब हो जाएगा। तो दैट इज अ बेटर वे। भारत में स्पिरिचुअलिटी फैलाओ। भारत की प्रजा में जो डिवीजन है यह जो लैंग्वेज को लेकर के, रिलीजियन को लेकर के, रिलीजन को लेकर के, कास्ट को लेकर के ये सब को लैंग्व डिवीजन को दूर करो। भारत को यूनाइट करो। तो इंडिपेंडेंस ऑटोमेटिकली मिलेगा और सब कुछ आध्यात्मिकता के ऊपर में होना चाहिए। रक्तपात के ऊपर में जो फ्रीडम हमको मिलेगा वो भारत की परिस्थिति ये अफगानिस्तान पाकिस्तान जैसी ही होती पाकिस्तान को फ्रीडम मिला है रक्तपात के ऊपर में तो अभी अब वो पूरा हिस्ट्री में उसका वही चलता रहेगा। टेररिज्म टेररिज्म तो क्या है भारत को तो एक फ्रंटियर सिविलाइजेशन होना है। हम लोगों को इस तरह से चीप फ्रीडम से किसी काम का नहीं है। तो फिर मां ने कहा कि इस तरह से उसके ऊपर में बम फेंक करके हत्या करने का क्या प्रयोजन था? तो जो भी है अभी यह तो समाचार आया। इसके बाद में किंतु दूसरा समाचार आया कि अभी पुलिस तो सीआईडी जो था उस समय का वह तो पकड़ेगी ना सबको। जिसने भी बम फेंका इसके पीछे क्या किसका यह है नेटवर्क है कौन काम कर रहा है वगैरह-वगैरह तो ऐसा समाचार आया कि पहले पहले जितने भी क्रांतिकारी थे उन सबको पकड़ करके अभी ये पुलिस वाले ले जाएंगे और उनको इंटेरोगेट करेंगे तो अभी ये जो देवव्रत महाराज थे वह तो रेवोल्यूशनरी थे और काशी में मां के ही साथ में माने वह जो काशी आश्रम है वहीं पर रह रहे थे तो बाकी सब साधुओं को यह डर लग कि यह महाराज यदि यहां पर रहते हैं और पुलिस वाले आकर के सब यह करेंगे इन्वेस्टिगेशन हो सकता है कि मां को भी इससे तकलीफ का सामना करना पड़े। मां को भी हो ये ब्रिटिश पुलिस का तो कोई ठिकाना नहीं है ना और यह वायसरॉय के ऊपर में अटैक हुआ है। तो वे लोग तो वैसे ही ज्यादा गुस्से में होंगे। जो सामने में आएगा उसको ये कर लेंगे। उसको अरेस्ट कर लेंगे। क्या पता तो सब बाकी सब साधु लोग डर गए। तो किसी ने कहा मां को कि मां यह जो है लड़का यह तो साधु होने को आया तो है किंतु पहले रेवोल्यूशनरी था इसको यहां से निकाल देते हैं। तो मां ने कहा अरे वह तो सब उसने छोड़ दिया है अभी तो। अभी तो वो साधु का जीवन जी रहा है। उसको डर किस बात का है? तो मां की इच्छा नहीं थी उसको वहां से निकालने की। किंतु फिर ये महाराज ने अपने से सोचा कि अरे अननेसेसरी मैं यहां पर रहूंगा तो मां को कष्ट होगा। बोलकर के वो काशी से शिमला चले गए। उनके भाई शिमला में रहते थे। तो वहां पर तो देखिए कि यह जो ऑलरेडी ब्रिटिश राज में यह यंग लड़के थे थोड़ा सा जिनके भीतर में यह आत्मसम्मान था। थोड़ा सा यह पेट्रियोटिज्म था। थोड़ा सा यह सेल्फ कॉन्फिडेंस, आत्मश्रद्धा थी और थोड़ा सा यह एक भीतर में तेज उत्साह और यह ओजस था। ऐसे लोग वैसे ही यह पुलिस वालों की नजर में रहते हैं। तो यहां पर कोलकाता का ऐसा ही एक लड़का तेज उत्साह ओजस से भरा हुआ यह लड़का एकाएक जय राम बाटी में आ जाएगा मां के घर पर तो नेचुरली 10 लोग पूछेंगे कि भाई कौन हो कहां से आए हो क्या तुम्हारा यह रेवोल्यूशनरियों के साथ में कोई संपर्क है कि नहीं तुम यहां पर मत रहो मां को थोड़ा सा कष्ट होगा ऐसा वो बहुत कुछ चीजें होने की संभावनाएं है तो जितन महाराज सोच रहे हैं कि यदि कोई मुझे इंट्रोड्यूस करवा दे मां के साथ में तो अच्छा रहेगा तो ऐसा सोचते-सचते वह जयराम भाटी गए तो सही और वह पूरी अपेक्षा रख रहे हैं कि मां उनको जाने से पहला ही प्रश्न करेगी कौन हो तुम कहां से आए हो क्यों आए हो क्या नाम है तुम्हारा तो ऐसी पूरी अपेक्षा लेकर के जैसे ही मां को प्रणाम किया जयराम भाटी जाकर के तो वैसे ही मां ने प्रश्न किया बेटा तुम अच्छे हो तो यात्रा में कोई तुमको दिक्कत नहीं हुई तो तो जितन महाराज अपने हाथों से यह बात लिखते हैं कहते हैं कि मेरा हृदय अभिभूत हो गया कि जाना बिल्कुल अनजाना बिल्कुल पहचान बिना का एक लड़का जब आता है तो कोई भी स्त्री तो ऐसा तो पूछेगी कहां से आए हो क्यों आए हो यह कुछ नहीं जैसे कि बहुत दिनों का बिछड़ा हुआ अपना संतान जैसे कि फिर से घर आता है तो मां कितना स्नेह से उसके साथ में वार्तालाप करती है। उसकी केयर करती है। उसको खाने-पीने को देती है। रहने की व्यवस्था कर देती है। आध्यात्मिक चर्चाएं करती है। कभी यह पूछती नहीं कि क्यों आए हो? कहां से आए हो? क्या काम है? वो सब पूछने की आवश्यकता ही नहीं है। मां बेटा मां के पास में क्यों आता है? आता है प्रेम प्राप्त करने के लिए, स्नेह प्राप्त करने के लिए। तो मां को हृदय से पूरा पता है कि कौन आया है उनके पास में। तो देखिए कि यह जो मातृत्व का यह एक विराट एक महासमुंदर मां के हृदय में बह रहा था। उसको चैनलाइज ही ठाकुर को सिर्फ करना था। तो यह पूरा जो आयोजन है जो कि ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में रहते-रहते किया था। यह सब कहानियां यह सब प्रारंभ के दिन कि मां के मातृत्व को जिस समय ब्लोसोम हो रहा था। उस समय की कहानियां यहां पे है। तो यह नहबत में अब जैसे यह हमारी बात चल रही थी कि जैसे सब स्त्री भक्त आती है कोलकाता से तो छोटा सा तो नहबत है तो ठाकुर उनको कहेंगे कि आप एक काम करो आप यहां पर मेरे ही कमरे के वरांदे में सो जाओ। आप नहबत में तो सोने की जगह नहीं है। तो मां जैसे ही यह सब वार्तालाप सुनती उनकी वह दूर श्रवण की वह जो सुपर पावर था मां का तो वैसे ही मां किसी को भेज के यह सब लेडी डिवोटीज को नहबत में बुलवा लेती और कहती कि यहीं पे सोना यहीं पर सब व्यवस्था हो जाएगी। वहां पर खुले में वरांडे में मत सोना। तो ऐसा करके मां इतना लोगों का जतन करती थी। तो यहां पर हमारा जो डिस्कशन चल रहा था उसका एक आखिरी पैराग्राफ मैं पढ़ लेता हूं। माने अभी तक जो हुआ था उसका कि एक और तो
दक्षिणेश्वर गुरुकुल में श्री रामकृष्ण और माँ सारदा गुरु
है ठाकुर का युग धर्म प्रचार उपयोगी परिवेशन गठन करने की आकांक्षा पूरा संस्कृत युग धर्म प्रचार उपयोगी परिवेशन गठन इसका अर्थ क्या है? एक ऐसा इंस्टिट्यूशन खड़ा करना है। एक इस तरह का फ्रेमवर्क खड़ा करना है। परिवेश परिवेश अर्थात कि इको सिस्टम कहो कि एक तरह का फ्रेमवर्क कहो स्कैफोल्डिंग कहो ना कि एक इंस्टीट्यूशन या ऑर्गेनाइजेशन कहो। तो एक ऐसा स्कैफोल्डिंग खड़ा करना है जिसका पपस होगा युग धर्म प्रचार। जहां पर भी यह यंग लड़के हैं और इवेंचुअली यह यंग लड़कियां हैं। मां शारदा का मठ है। तो यह यंग जनरेशन जो है भारत की जो कि उनके हृदय में मुमुक्षुत्व और ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति और आत्मज्ञान की एक आकांक्षा जागृत हुई है। उन लोगों को एक सही-सही डायरेक्शन मिले। इसके लिए एक इंस्टीट्यूशन खड़ा करना है। जहां पे यह यंग जनरेशन को ट्रेन किया जाए। उनकी बुद्धि है, उनकी आध्यात्मिकता है। उसको रिशेप किया जाए और फिर इनकी जो एनर्जीज है उसको चैनलाइज किया जाए युग धर्म प्रचार के लिए। तो यहां पे देखिए कि एक और तो था ठाकुर का युग धर्म प्रचार के लिए एक परिवेशन गठन करना। एक परिवेश गठन करना, एक इंस्टट्यूट खड़ा करना, उसकी आकांक्षा और दूसरा है मां का संतान वात्सल्य। यह दोनों मिलकर के मां को धीरे-धीरे करके उनके भावी कर्मक्षत्र की ओर खींच के ले जा रहा है। यह ठाकुर को यह एक स्कैफोल्डिंग खड़ा करना है। एक फ्रेमवर्क खड़ी करनी है कि जहां पे यह यंग गुरुकुल दक्षिणेश्वर गुरुकुल। दक्षिणेश्वर क्या था? जैसे स्वामी जी कहते हैं ना कि बेलूर मठ को मैं एक यूनिवर्सिटी के रूप में देखना चाहता हूं भविष्य में। तो यह दक्षिणेश्वर था अपना ओरिजिनल गुरु गुरुकुल जहां पर यह सब यंग लड़के आते थे ठाकुर उनके गुरु थे और जिस तरह से हमारे वैदिक युग में जो ब्रह्मवेत्ता गुरु थे वो मुमुक्षु शिष्यों को जिस तरह से शिक्षा दिया करते थे उनके जीवन का गठन किया करते थे वैसे ही यह जो त्यागी संतानों का जीवन गठन ठाकुर ने यह दक्षिणेश्वर गुरुकुल में किया था। यानी दक्षिणेश्वर सिर्फ एक काली मंदिर ही नहीं है। वह एक गुरुकुल है। तो यह एक एक और है ठाकुर की यह जो एक सिंगल लोकेशन में जो गुरुकुल खड़ा किया है उसको कॉपी पेस्ट करके इस मॉडल को पूरे विश्व में फैला देना। तो यह ठाकुर की एक आकांक्षा थी कि जितने भी यंग लड़के हैं, लड़कियां हैं, वह इस इंस्टिट्यूशन में आए और यहां से चरित्र गठन और आध्यात्मिकता के पाठ सीखे। तो वो एक ठाकुर की इच्छा कि यंग जनरेशन को अपने इंस्टीट्यूशन में पुकारे और सामने ही मां की इच्छा संतान वात्सल्य। तो जैसे ही यह दोनों इच्छाएं हैं, दोनों आकांक्षाएं हैं, एक जगह पर मिलित होती है। और जैसे ही मां का संतान वात्सल्य ये नए आते आए हुए त्यागी संतान की ओर धावित होना प्रारंभ हुआ। साथ-साथ में ही मां ने जो यह भावी कर्म क्षेत्र था उसमें उन्होंने पैर रखना उसके ऊपर में चलना उन्होंने प्रारंभ कर दिया। क्योंकि क्या था मां का तो एक आंतरिक एक जगत भी तो था वो साधिका सिद्ध नारायणी भी तो वह थी यह ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाला पाठ यह भारतीयों को खास करके भारतीय साधकों को ऐसा सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि भारतीय साधना का मूल मंत्र ही जैसे कि एक है नेति नेति जगत को त्याग करके जगत के परे जो अध्वय वस्तु है अध्वय ब्रह्म वस्तु वस्तु है उसका अनुसंधान करना है। तो यह हम हिंदुओं को तो यह सब सिखाने की जरूरत है नहीं। जैसे ही आध्यात्मिकता का बीज पनपा प्रथम ही बीज पनपा साथ-साथ में हमको पता है कि जगत के साथ में अभी हमको डिसोसिएशन प्रारंभ कर देना है। तो यह नेति नेति मार्ग कोई मां को सिखाने की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं थी। किंतु इति इति मार्ग सिखाने की अवश्य आवश्यकता थी। सिखाने की भी नहीं कह करके कहेंगे चैनलाइज करने की वह मातृ हृदय मातृत्व के महासागर से स्नेह के महासागर से भरा तो है ही है बस वही है कि उसमें से यह चैनलाइज हो मां की यह मातृत्व शक्ति संतानों के प्रति तो वो जो घटक ठाकुर वो जो बंगाली में कहते हैं ना जो लड़के और लड़की ये दोनों का मिलन करवा देते हैं विवाह के लिए तो उसको घटक ठाकुर तो ठाकुर ठाकुर को इस तरह से ही एक क्या कहेंगे कि एक एजेंट का काम करना था। नारद मुनि का काम करना था कि यहां पर मां का मातृत्व है। यहां पर संतानों की आध्यात्मिक आकांक्षा है। दोनों को मिलवा देना है। तो साथ में ऑटोमेटिक ही भविष्य का रामकृष्ण संघ उसका जो फ्रेमवर्क है वह रेडी हो जाएगा। भविष्य के रामकृष्ण संघ का फ्रेमवर्क क्या है? मां बैठी है सर्वोच्च पद पर आसीन सिंहासन पर आसीन गुरु होकर के इष्ट होकर के नारायणी होकर के और यह मां के संतान गण है मां की आराधना करते हैं उनके प्रति बालक भाव का वो धीरे-धीरे करके विकास करते हैं अपने हृदय में और जैसे ही यह संतान भाव का विकास होना प्रारंभ हुआ वैसे ही यह जो सब कर्म के जो मायाजाल है वह सब कटती ती जाएगी और वे लोग ईश्वर प्राप्ति के रास्ते पे और झड़प से म स्पीडीली आगे बढ़ना प्रारंभ कर देंगे। तो यही तो था भविष्य का रामकृष्ण संघ तो उसका गठन ठाकुर इस तरह से किया करते थे। तो यहां तक हमने पढ़ा था। इसके बाद में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं गोलापमा।
माँ सारदा की सेविका गोलाप माँ की कहानी
अभी हमने देखा ऑलरेडी योगिन मां की कहानी तो साथ में ही यह गोलाप मां की कहानी। यह गोलाप मां का स्वभाव थोड़ा सा विचित्र तो था ही था। हमको पता है मां की केयर भी बहुत करती थी। तो फिर कभी-कभी इस तरह से बिहेव करती थी कि मां को कष्ट भी बहुत हो। यह लाटू महाराज की महासमाधि 1918 के आसपास की यह घटना है। मां ऑलरेडी बहुत ही बीमार थी। उद्बोधन में वो लेटी हुई थी। यह काला ज्वर ये ब्लैक फीवर तो वो बार-बार उससे पीड़ित होकर के बड़ी ही मां की यह जो वीक परिस्थिति थी वो उनका हेल्थ था बड़ा ही डेलिकेट हो चुका था वो ट्रीटमेंट चल रही है। मां अभी काम भी नहीं कर पा रही है। लेटी हुई है। उस समय लाटू महाराज की महासमाधि हुई काशी में। तो शरद महाराज ने सबको बोल दिया कि मां को बताना मत कि लाटू महाराज चल बसे हैं। लाटू महाराज तो मां की बहुत सेवा करते थे। अद्भुतानंद जी दक्षिणेश्वर में तो उनके प्रति मां का एक विशेष स्नेह था। तो अपने संतान की तरह उनको देखती थी। अभी एकाएक उनकी महासमाधि का यह जो समाचार मां को मिलेगा तो वैसे ही मां की हेल्थ बड़ी डेलिकेट है। और बेचारी और रोना शुरू कर देगी। रोते-रोते हेल्थ और भी बिगड़ जाएगी। तो शरद महाराज ने स्पष्ट लोगों को नोटिस दे दिया कि लाटू महाराज की महासमाधि का जो समाचार है मां को कभी भी मत देना बोल के यह भी चल रहा है पूरा कास्परेसी और यहां पे तो मातृ हृदय है ना यह तो मां को तो जिस क्षण लाटू महाराज की महासमाधि हुई उसी क्षण अंदाजा आ गया कि कुछ ना कुछ गड़बड़ हुई है तो वो दूसरे ही दिन सबको पूछ रही है लाटू कैसा है लाटू कहां है क्या है उसका खबर कैसा है वो तो अभी शरद महाराज ने बोला है बोलकर के मां के जितने भी सेवक सेविकाएं हैं सब लोग मां को झूठ बोल रहे हैं। मिथ्या खबर दे रहे हैं कि लाटू महाराज का हेल्थ ठीक है। वह अभी रिकवर हो रहे हैं वगैरह-वगैरह। किंतु मां को तो समझ में आ गया था कि ना कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। लाटू महाराज की महासमाधि के समय हो सकता है कि लाटू महाराज ने मां का आशीर्वाद मांगा होगा और मां ने वह सूक्ष्म रूप में जाकर दिया भी होगा। तो वो जो दिव्य लीला जो होनी थी उस समय तो हुई होगी। यहां पे जो प्राकट्य लीला है, प्राकट्य लीला है जो वहां पे मां किंतु इस तरह से बार-बार पूछ रही है लाटू का क्या खबर है? लाटू का क्या खबर है? और अभी देखिए कि ये संतानग भी जो थे मां के सेवक सेविकाएं वे लोग भी तो थोड़े चिंतित हो गए कि मां तो इतना व्यस्त होकर के इतना त्रस्त होकर के लाटू महाराज का खबर पूछ रही है। तो अभी झूठ बोलना भी बार-बार अच्छा नहीं लगता। तो वे लोग भी थोड़ा चिंता में है। मां भी एकदम बड़ी ही दुखित होकर के त्रस्त होकर के पूछ रही है। तो यह सब गुलाब मा देख रही है। तो आखिर में उनके रहा नहीं गया। वो चिल्ला के बोल उठी। अरे वो लाटू तो चला गया। वो तो अभी उसका जो होना था हो गया। अभी उसकी खबर लेने से क्या लाभ है? तो जैसे ही मां ने यह सुना चित्कार करके रोना शुरू कर दिया और इतना रोई इतना रोई उनका हेल्थ फिर से डिडरेट हो गया। अभी यह बात शरद महाराज को मिली कि गोलाप मां ने बता दिया है मां को कि लाटू महाराज की महा समाधि हो गई है। तो अभी शरद महाराज भी बेचारे क्या कहेंगे? गुलाब मां तो ठाकुर के समय की डिवोटी है। उनको कुछ बोलने से कोई लाभ नहीं है। किंतु देखिए कि एक गुलाब मां ने मां की सेवा भी बहुत की है। तो मां के साथ में इस तरह से कभी-कभी चित्र विचित्र व्यवहार भी किया है कि मां को इससे कष्ट भी हो। तो इसी तरह की एक घटना है गंभीरानंद जी लिखते हैं ठाकुर जखन चिकित्सा जन दक्षिणेश्वर होते श्याम पुकुर गया छे तो सेवाय वंचिता श्रीमान दुश्चिंताय दीन काटा छेन ठाकुर जब चिकित्सा के लिए दक्षिणेश्वर से श्याम पुकुर गए थे उस समय सेवाय वंचिता अर्थात कि सेवा से वंचित ठाकुर की सेवा से वंचित श्री मां दुचिंता में दिन निकालती थी मन में ही मन में सोचती थी कि ठाकुर की परिस्थिति कैसी होगी? उनको खाना ठीक से मिलता होगा कि भी नहीं। समय पर उनकी सेवा होती भी होगी कि नहीं? दक्षिणेश्वर में थे तो सभी चीजों के लिए मेरे पर डिपेंडेंट थे। अभी तो बीमार है ऊपर से और अकेले रह रहे हैं। यह त्यागी संतान उनकी सेवा ठीक से कर पाते होंगे कि नहीं। वो सब दुष्टिंता में मां दिन निकालती थी। समय उस समय गोलाप मां एक दिन कोथाई कोथाई जोगिन मां के बोली लेन गोलाप मां ने एक दिन बात बातबात में योगिन मां को कहा देखो जोगन देखो योगेन ठाकुर बोध हो मार ऊपर राग कोरे कोलकाता चले गए छ कि देखो योगेन मुझे ऐसा लग रहा है ठाकुर मां के ऊपर में नाराज होकर के कोलकाता चले गए हैं। अब कहां से उन्होंने यह बात निकाली, कहां से यह सोची, वह तो अभी भगवान ही जाने। ठाकुर मां के ऊपर में नाराज हो, गुस्सा हो, यह बात तो हमको स्वप्न में भी हम सोच नहीं सकते हैं। तो का जो भी है अभी गोलाप मां की बुद्धि ना कि उनकी इमेजिनेशन किस डायरेक्शन में जा रही थी। देखिए ये जो सब रूमर मगरिंग जिसको कहते हैं ना अफवाएं फैलाना। कोई कोई लोग करते हैं। इवन टुडे आज भी आश्रम में आएंगे वो ठाकुर मां स्वामी जी की बातें सुनना या तो उनकी किताबें पढ़ना या मंदिर में बैठकर के शांति से जप करना वो नहीं करके उस साधु को मिलेंगे। उसके पास में कुछ गप लगाएंगे। दूसरे साधु को मिलेंगे। उनके पास में से कहीं वो रूमर सुनकर के तीसरे साधु को बताएंगे। चौथे डिवोटी को बताएंगे। ऐसे लोगों की आज भी कमी नहीं है। तो देखिए कि यह कहां से यह कौन सी बात कहां से यह गोलाप मां ने योगिन मां को कह दी कि ठाकुर मां के ऊपर में नाराज होकर के कोलकाता चले गए हैं। जोगिन मार मुखे वही कथा सुन्या श्री मां गाड़ी कोरिया ठाकुर काछे गिया कादिया बोली। अभी योगिन मां भी अभी कम नहीं है। उन्होंने जाकर के मां को बोल दिया कि देखो मां यह मां इस तरह की बात करती है। तो मां शारदा बेचारी यह जो बात सुनकर के गाड़ी करके ठाकुर के पास में श्याम पुखुर में गई और रोती-रोती उनको पूछ रही है। तुम ही ना कि हमारे ऊपर राग को करे छोले ऐसे छो तुम ना कि मेरे ऊपर में नाराज होकर के यहां पे आ गए हो। ठाकुर बोली ले ना के तो मां यह कथा बोले छ ठाकुर ने कहा नहीं तो तुमको किसने यह बात कही मां बोली ले गोलाब बोले छे मां ने कहा गुलाब ने कहा है ठाकुर रागियागिया बोली ले ठाकुर ठाकुर नाराज हो गए नाराज होकर के गुस्सा करके क्रोधित होकर के बोले हां से ऐमन कथा बोले तो के का दिए छ हां वो इस तरह की बात करके उसने तुमको रुलाया है से जाने ना तुम्ही के उसको पता नहीं है तुम कौन हो? गुलाब को था। आशुक ना कहां है गुलाब? आए तो सही एक बार यहां पे ठाकुर जब नाराज हो जाते हैं तो अच्छे-अच्छों का वो तो हार्ट बीट जो है वो म स्टॉप हो जाएगा। अच्छे-अच्छे लोगों का हितकंप हो जाएगा। म हृदय में अर्थक्वेक आ जाएगा। तो यहां पे भी ठाकुर नाराज होकर के कहा कि गुलाब ने इस तरह की बात करके तुमको रुलाया है। गुलाब को पता नहीं है तुम कौन हो। मैं यदि नारायण हूं तो तुम तो नारायण हो। मैं यदि विष्णु हूं तो तुम तो मेरी लक्ष्मी हो। सती लक्ष्मी हो। उसको पता नहीं तुम्हारा सही स्वरूप क्या है। इस तरह की बेकार की बातें करके बेतुकी बातें करके तुमको रुलाया है। वो कहां है आने दो उसको। फिर मैं उसको देखता हूं। [हंसी] मां तो खून शांत होया दक्षिणेश्वर चली आशिले। तब मां शांत होकर के दक्षिणेश्वर चली आई। कोरे गोलाप मा ठाकुर निकट जले ठाकुर तहां के खूब भरना कोिया बोली बाद में जब गोलाप मा ठाकुर के पास में गई तो ठाकुर ने उनको अच्छे से डांट करके कहा तुम की कथा बोले हो के का दिए छो तुमने कौन सी बात करके उसको रुलाया है जानो ना ओके तुमको पता नहीं है उनका सही स्वरूप क्या है एक खूनी गए तार काचे क्षमा चाहोगे अभी जाओ मां के पास में और अभी का अभी तुम उनके पास में क्षमा प्रार्थना ना करो गोलाप माखन हाटिया दक्षिणेश्वरे श्री माय काछे उपस्थित होइया कादीते कादीते बोली लेन मां ठाकुर हमार ऊपर भयानक राग को करे छे उस समय गोलाप जैसे ही ठाकुर ने डांटा गोलाप मां बेचारी पैदल चलकर के दक्षिणेश्वर आई मां के पास में उपस्थित हुई और रोती-रोती बोली कि मां ठाकुर ने मेरे पे भयानक क्रोध किया है आमी ना बुझते पेरे ओमोन को कथा बोले फैले छ मैं बिना समझे सोचे समझे मैंने इस तरह की बात कर दी है मां कोनो कथा ना बोलिया खाली हसिया ओ गुलाब बोलीते बोलीते पीठे तीनटी चापड़ दीते ही गोलाप मा सब दुख जेो कोथाई चलिया गया मौन शांत होइया गो माने जब गुलाब मां की यह बात सुनी तो सामने और कुछ ना कह के और कोई बात ना करके सिर्फ हंसते-हंसते ओ गोलाप ऐसा करके पीठ के ऊपर में तीन बार अपने हाथ पसारे वैसे ही साथ-साथ में ही गोलाप मां का सब दुख जा जैसे कि कहां पर अदृश्य हो गया और उनका मन शांत हो गया। देखिए मां की क्षमा करने की यह क्षमता भी अद्भुत है। और यह गोलाप मां को भी देखिए कि इस तरह की उटपटांग हरकतें वो किया करती थी किंतु साथ में ही मां के ऊपर में जो उनकी अविचल श्रद्धा भक्ति थी जीवन के आखिरी पल तक उन्होंने मां को समर्पित जो जीवन दिया था जिया था उसकी भी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। तो देखिए कि ठाकुर और मां के साथ में कैसे-कैसे सब लोग आए थे। ऐसे लोगों के साथ में भी उन्होंने काम किया है और ऐसे लोगों का भी उन्होंने उनको मनुष्य से देवता बना दिया है। जब तक मां का नाम रहेगा तब तक उनकी ये जया विजया है गोलाप मां और योगेन मां इन दोनों का भी नाम रहेगा। तो देखिए कि सेवा करके यह लोग अमर हो गए हैं। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास में आगे पढ़ेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: माँ और स्वामीजी ठाकुर के ही जीवनी और वाणी के विभिन्न आयाम है.
देखिए एक एक एनालॉजी बताऊं जो कि मैं खुद जिसमें मानता हूं कि उपनिषद का प्रतिपादित विषय क्या है? जीव ब्रह्मक्य अहम ब्रह्मास्म वही जो महावाक्य है तो उसके तीन एक्सप्रेशन है ठाकुर रिप्रेजेंट्स अब अब तीनों कंप्लीट सॉल्यूशन है नो डाउट माने आध्यात्मिकता कहो सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग कहो कम्युनिटी कहो तीनों लोग तीनों को रिप्रेजेंट करते ही है तीनों में तीनों है किंतु एट द सेम टाइम ठाकुर माने ही एग्ेंंपलीफाई दैट इनर जर्नी टुवर्ड्स दिस एटेनिंग ऑफ ब्रह्मज्ञान मदर रिप्रेजेंट्स दैट सेम महावाक्य जीव ब्रह्म ऐक्य जो है उसको एक कम्युनिटी लेवल पर कैसे उसको अप्लाई किया जाए और स्वामी जी रिप्रेजेंट्स दैट सेम महावाक्य उसको सिविलाइजेशनल लेवल पे कैसे उसको अप्लाई किया जाए भारत के साथ में बहुत लंबा समय जो कि बुद्धिज्म के बाद में जो हुआ था प्रॉब्लम कि उसका जो इनर एक्सप्रेशन है उसको तो हम डेवलप करते गए करते गए किंतु कम्युनिटी लेवल पे ये महावाक्य किस तरह से प्रैक्टिकल होता है सिविलाइजेशनल लेवल पे उसको कैसे प्रैक्टिकल किया जाए। वह बात ही हम भूल गए। तो उसका परिणाम यह है कि आज भी हम लोग वही पोस्ट बुद्धिस्टिक माइंडसेट में जी रहे हैं कि उपनिषद दैट मींस इनर जर्नी। इट हैज़ नथिंग टू डू विथ आइदर कम्युनिटी लाइफ और सिविलाइजेशनल लाइफ। सो दैट वो जो मिथ है वो जो बुद्धिज्म का जो हिप्नोटिज्म माने देखिए हमको तो तीन हिप्नोटिज्म से मुक्त होना है ना। ये जो वेस्टर्न हिप्नोटिज्म जो कि वेस्टर्न कल्चर को हम पर बिठा दिया है। एक इस्लामिक हिप्नोटिज्म और यह तीसरा बुद्धिस्टिक हिप्नोटिज्म तीनों हिप्नोटिज्म से हमको मुक्त होना है। किंतु देखिए आप हम अब यदि बहुत ज्यादा फिलॉसोफिकल रिकंसिलिएशन में यदि ना भी जाए और ठाकुर मास्वामी जी को और उपनिषद को ये चार जो स्ट्रीम है व्हिच आर द मेजर स्ट्रीम्स इन आवर ऑर्डर उसको हम साथ में पढ़ेंगे ना तो ऑटोमेटिक एट वन पॉइंट रिकंसिलिएशन हो ही जाएगा इन दैट सेंस अब स्वामी जी ठाकुर ही कहते हैं ना शुद्ध ज्ञान शुद्ध भक्ति एक शुद्ध ज्ञान को आप फॉलो करेंगे तो आपको शुद्ध भक्ति तक ले ही जाएगा माने इफ यू फॉलो दैट सिंसियरली सो आप और कुछ ठाकुर मां स्वामी जी को नहीं पढ़कर करके प्योर वेदांत को भी फॉलो करेंगे देन इवेंचुअली इट विल टेक यू टू ठाकुर मां स्वामी जी सिर्फ स्वामी जी को पढ़ेंगे इट विल टेक यू टू वेदांत मां ठाकुर सिर्फ मां को फॉलो करेंगे तो अगेन दैट द पाथ विल टेक यू टू स्वामी जी एंड ठाकुर एंड वेदांत सो एट द टॉप लेवल तीनों कनेक्टेड है। किंतु जैसे ही हम थोड़ा सा बिकॉज़ कि अपनी बुद्धि तो लिमिटेड है ना कि वो लिमिटेड बुद्धि से लिमिटेड वो जो पूरा चीनी का पहाड़ है। ठाकुर कहते हैं एक चींटी आती है। कहती है आज मैं चीनी का एक टुकड़ा लेके जाती हूं। फिर नेक्स्ट टाइम आओगे पूरा पहाड़ लेके जाओगे। तो हमारी तो वह परिस्थिति है ना। [हंसी] ठाकुर स्वामी जी और यह वेदांत चारों को हम समझने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु बुद्धि है इतनी सी। सो हमको करना क्या है? चारों को एक साथ में पढ़ना है। तो इवेंचुअली दे विल गेट रिकंसाइल्ड एट वन पॉइंट ऑटोमेटिकली। [हंसी]
प्रश्न: माँ है रामकृष्णगतप्राणा -- ठाकुर के कमरे में जो हो रहा है, सब सुन पा रही है, ठाकुर की पूर्ण शरणागत है.
एट द सेम टाइम एट द सेम टाइम देखिए। भगवान का आगमन होता है भक्त के लिए। हम बहुत बार सोचते हैं कि जैसे ठाकुर ने कहा ना ठाकुर स्पष्ट कहते हैं और जन नहीं एकानकार सबकी छु अर्थात नरेंद्र को दिखा के कहते हैं उसी के लिए यहां का सब कुछ है। नरेंद्र ने पुकारा तो भगवान आए। माने भक्त जब पुकारता है तो भगवान आते हैं। तो अब नरेंद्र के बारे में हम ऐसा सोचते हैं कि नरेंद्र की ठाकुर पे श्रद्धा ठाकुर का नरेंद्र के लिए आगमन बट जस्ट इमेजिन यू रिप्लेस नरेंद्र विद मां। मां की ठाकुर पे श्रद्धा और फिर ठाकुर का देखिए ये इक्विवेलेंट है। मां का मन जैसे ठाकुर के कमरे में पड़ा रहता था। ठाकुर का मन जो है नब में पड़ा रहता था। एक बार ऐसा हुआ मां ध्यान कर रही है तो ध्यान जब जम जाता है तो कहता है जगत जैसे कि शून्य हो जाता है। अभी वो वृंदा बोलकर के वहां पर वो जो एक लेडी थी वो रहती थी चाकर नौकर तो वो भी एक पागल थी। तो कथामृत के पहले ही चैप्टर में वृंदा का उल्लेख आता है। मास्टर वहां से जाते हैं। ठाकुर का कमरा बंद है। वृंदा वहां पर खड़ी है। तो वही वृंदा तो उसका नेचर भी थोड़ा सा अटपटा गुस्सा वाला था। तो वो अभी वो क्या करती थी जब मां काली का प्रसाद आता है तो उसको तो थोड़ा मिलना चाहिए। ठाकुर मां की सेवा करती है। कभी-कभी किंतु ठाकुर का ऐसा है ना सब सब मैंने मिला दो। म सब कुछ दे दो। सब कुछ दे दो। मां का भी ऐसा। एक इनफैक्ट मां इतना खर्चा करती थी भक्तों के लिए कि ठाकुर मां को बोलते हैं कि देखो इतना खर्चा कर रही हो तुम भक्तों के लिए तो मां नाराज होके वहां से चली जाती है कुछ बोलती नहीं है तो वो ठाकुर वो रामलाल को बुला के कहते हैं देखो देखो जाकर के तुम्हारी चाची को शांत करो वो नाराज होगी तो यहां का भक्ति मुक्ति सब चला जाएगा [हंसी] तो वही वृंदा उसके लिए अभी मां तो सबको मुक्त हंसते सब प्रसाद बांट देती है तो वृंदा के लिए कुछ बचेगा नहीं तो मां कहती है अपने से कहती है कि वृंदा जब आएगी तो मां डरते-डरते कहेगी कि देखो अभी तो आज प्रसाद बचाने ही है। तुम एक काम करो मैं तुमको ये काली मंदिर में से या कहां से कुछ लाकर के तुमको देती हूं प्रसाद वगैरह। तो फिर वो वृंदा उसको लगा कि हां मां उनके सामने नम्र हो रही है। तो फिर वृंदा का गुस्सा फिर वो पिघल जाएगा और वो कहेगी अच्छा कोई जरूरत नहीं है। आप मुझे आटा दे दीजिए। मैं अपने से रोटी बना लूंगी। तो ये थी वृंदा। तो एक दिन मां ध्यान कर रही है। एक वृंदा ने एक बर्तन पटका। अब नेचुरली है कि हमको तो शौक लगेगा ना ध्यान में। अब हमारा जो छोटा-मोटा ध्यान होता है उसी में ऐसा आवाज होगा तो हमको शौक लगेगा। मां को ऐसा शौक लगा मां एकदम चिल्ला करके रोना शुरू कर दी। तो अब जैसे ही मां ने ये चित्कार किया रोना शुरू किया साथ में ही ठाकुर वो अपने कमरे में से दौड़ के आए नबत में। क्या हुआ मां को? क्या हुआ? तो और फिर देखा कि मां इस तरह से रो रहे तो म ऐसा कोई सीरियस घटना नहीं है। वो शांत हो जाएगी। बोल कर के वो फिर मां को थोड़ा सा देकर चले गए। तो इट इज बोथ वे मां का जैसे मन वहां पर पड़ा रहता था। ठाकुर का मन यहां पर पड़ा रहता था।
प्रश्न: अभेदानन्दजी का स्तोत्र "प्रकृतिम् परमाम्" माँ के जीवन की घटनाओ को कितना खूबसूरती से संक्षिप्त वर्णन करता है. इस स्तोत्र पे क्लास कर सकते है.
जैसे हमने वो आगमनी के गीतों का किया था ना ऐसा वो हम करेंगे ठाकुर देखिए स्वामी जी का खंडना है। दैट्स वन ऑफ द मोस्ट पावरफुल कि पूरा ठाकुर का लाइफ और यह फिर यह सब जो है कि अभेदानंद जी का प्रकृति परमामम वगैरह तो वी विल डू वंस अपना थोड़ा सा फाउंडेशन हो जाए फिर वो हायर आइडियाज को लेंगे। ये सब स्तोत्र वगैरह क्या है? डिस्टिल्ड ठाकुर मां का लाइफ कि आप एक एक और है आप लीला प्रसंग कथामृत पूरा पढ़ लीजिए और साथ में ये खंडना है ओम रीम रीतम है वो गा लीजिए किंतु वो कब बनता है पता है उसका मीनिंग समझना ठीक ठीक जब हमने यह कवर किया है अब जैसे ये कनखल में है ना वो साधना सदन है वहां पे 40 दिन का ज्ञान सत्र होता है तो उसमें पूरा वो सभी उपनिषद ब्रह्मसूत्र गीता उसका शंकर भाष्य प्रस्थानत्रय पूरा कवर करवाते हैं किंतु अब जो डायरेक्ट वो 40 दिन में प्रस्थानाय कवर करने को जाएंगे ना तो सीधा ऊपर से जाएगा। किंतु आपने एक बार फाउंडेशन डाल दिया है दो-ती चारप साल का स्टडी करके बाद में वो 40 साल 40 दिन का वो रिफ्रेशर कोर्स करने को जाएंगे तो बहुत मजा आएगा। माने आपका कवर भी हो जाएगा और फटाफट फटाफट करके कनेक्शन बैठते जाएंगे। तो ये स्तोत्र वगैरह का मीनिंग में कब जाएंगे? हमारा एक फाउंडेशन रेडी हो गया है। फिर हम जैसे-जैसे एक-एक आइडियाज लेते जाएंगे वैसे-वैसे सब कहानियों के साथ में कनेक्शन बैठता जाएगा। हां इसको भी तो हमने पढ़ा है। इसको भी तो हमने सुना है। ऐसा [हंसी] नहीं एक्चुअली आप अभी भी कर सकते हैं। अभी तो एलएलएम आ गया है। तो आप डाल सकते हैं कि ये जो स्तोत्र मैंने डाला है उसके इक्विवेलेंट घटनाएं खोज के निकाल दो। वो मैंने आपको वो शेयर किया है ना लिंक नोटबुक एलएम का उसमें सब मैंने किताबें डाली हुई है। तो एक-एक आईडियाज पेस्ट करते जाइए।