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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 23 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः

हमें आध्यात्मिक होने के साथ-साथ सशक्त भी होना है

आज सुबह को ही मैं कथामृत पढ़ रहा था तो ठाकुर कहते हैं कि काम के हाथ से अपने को बचाना है कामना से बचाना है और काम के साथ में ही क्रोध आकर खड़ा होता है। तो क्रोध से भी अपने को बचाना है। तो ठाकुर की यह बात सुनकर के मास्टर महाशय कहते हैं कि मैं जब खाने को बैठता हूं और मेरे थाले में मछली पड़ी हुई है और यदि कोई बिल्ली आकर के अपना हाथ बढ़ा करके मछली को लेने को जाती है तो मैं उसको भगा भी नहीं पाता। यह जो बात है मास्टर महाशय ठाकुर को जो कह रहे हैं वह जो क्लासिक भारतीय हिंदू आध्यात्मिकता कि काम और कांचन आध्यात्मिक जीवन के सबसे बड़े शत्रु हैं और साथ में ही काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर जिस तरह से कहा गया है डरिपु यदि काम के हाथ से अपने को मुक्त करना है तो फिर साथ में यह क्रोध है, घमंड है, द्वेष है, घृणा है, ईर्ष्या है, इन सब से भी अपने को मुक्त करना होगा। किंतु यह जो करतेकरते कभी-कभी हमारी परिस्थिति ऐसी आन खड़ी हुई कि जब शत्रुओं का आक्रमण प्रारंभ हुआ, हम अपनी आत्मरक्षा भी ना कर पाए। एक तरह की असमंजस में हम पड़ गए। एक तरह के कंफ्यूजन में पड़ गए। एक और है आध्यात्मिक पुकार एक हृदय की अंतरात्मा की और दूसरी ओर है अपने ही परिवारजन अपना देश अपना समाज उसकी रक्षा तो कौन सा रास्ता अपनाएं यदि देश की रक्षा करनी है परिवारजनों की रक्षा करनी है अपने खुद की रक्षा करनी है तो हाथ में शस्त्र उठाना पड़ेगा शस्त्र उठाएंगे तो क्रोध भी आएगा घमंड भी आएगा, अहंकार भी आएगा और फिर यह क्रोध, अहंकार, द्वेष वगैरह काम को ले आएगा, धन के प्रति स्प्रूहा को ले आएगा। मैं आध्यात्मिक जीवन से दूर हो जाऊंगा। तो यह एक हो जाता है। और यदि मैं कहता हूं कि मैं प्योर आध्यात्मिकता फॉलो करूंगा तो उसका परिणाम यह आ पड़ा कि 1000 साल की गुलामी। तो यहां पर जब ठाकुर कहते हैं कि काम के साथ में ही क्रोध आकर खड़ा होता है। क्रोध है चंडाल क्रोध से अपने को मुक्त करना है। तब मास्टर महाशय यह बात कहते हैं कि मैं जब खाने को बैठता हूं और मेरी थाली में मछली पड़ी हुई है। अभी बंगाली लोग तो मछली खाते हैं। तो थाली में यदि फ्राइड फिश ना कि ऐसा कुछ पड़ा है और बिल्ली आकर के उसको लेने का प्रयास करेगी तो मैं उसको भगा भी नहीं पाता। तो हमको लगेगा कि ठाकुर का रिस्पांस क्या होना चाहिए? क्या ठाकुर प्रशंसा करेंगे? मास्टर महाशय ने क्या सोच के ऐसी बात कही होगी कि क्या ठाकुर प्रशंसा करेंगे कि हां तुम मछली को भी तुम भगा नहीं सकते। मछली को तुम क्रोध नहीं कर सकते और अपना जो खाना है वह खुद अपने से मछली को खिला देते हो तो फिर यह तो बहुत अच्छी बात हुई। बहुत बड़ी आध्यात्मिक सिद्धि हो गई। क्या ऐसा कुछ उन्होंने एक्सपेक्ट किया था? पता नहीं। किंतु ठाकुर जो रिप्लाई देते हैं इट इज वेरी सरप्राइजिंग कि उस समय की जो मानसिकता थी उन लोगों के लिए जिन लोगों ने स्वामी जी को पढ़ा है बाद में उन लोगों के लिए यह रिप्लाई आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। आश्चर्यजनक यह होना चाहिए कि स्वामी जी का जो कांसेप्ट है बिल्कुल ठाकुर के इस रिप्लाई में आन खड़ा होता है। ठाकुर क्या कहते हैं? जब मास्टर महाशय ने कहा कि बिल्ली आती है मछली चुराने के लिए मैं उसको भगा भी नहीं पाता। ठाकुर इमीडिएटली कहते हैं क्यों? उसको मार उसको मार के भगा देने ही सो भगा देने से ही तो होता। ऐसा क्यों नहीं किया तुमने? संसारी लोगों को फस तो करनी चाहिए। भले ही चाहे विष ना ढाले लोगों के ऊपर में विष जो है उसका प्रहार ना करें। लोगों के ऊपर में विष ना डाले किंतु आत्मरक्षा तो करनी ही पड़ेगी। यदि आत्मरक्षा नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा? ठाकुर यह जो रिप्लाई देते हैं इट इज सो सरप्राइजिंग कि लोगों के ऊपर में विष नहीं ढालना है। लोगों को दसना नहीं है किंतु आत्मरक्षा तो करनी ही है। और साथ में ही ठाकुर वह भी कहते हैं कि त्यागी किंतु फसो करे ना। त्यागी जो है वह फस भी नहीं करेगा। वह अपनी आत्मरक्षा भी नहीं करेगा। किंतु जो संसारी है वह फस करेगा। वह लोगों को दसेगा नहीं। जहरीला सांप यदि उसको मारने को जाएंगे तो सामने दस भी लेगा। किंतु यदि नहीं दसता है तो एटलीस्ट फोर्स करता है अपने को बचाने के लिए जिससे कि हम लोग डर करके भाग जाए। तो देखिए कि ठाकुर का यह जो रिप्लाई है इट इज सो क्लियर। एक ही सेंटेंस में दो-तीन ही सेंटेंस में ठाकुर ने कह दिया है। क्यों मछली को मार के भगाओगे नहीं? जो संसारी है उसको तो अपनी आत्मरक्षा करनी ही होगी। यदि तुम आत्मरक्षा नहीं करोगे तो कैसे चलेगा? तुम विष डालो दूसरों के ऊपर में किंतु फस तो तुमको करनी ही होगी। और साथ में जो आखिरी स्टेटमेंट त्यागी जो है त्यागी किंतु फस भी नहीं करेगा। आत्मरक्षा भी नहीं करेगा। तो देखिए कि यह जो बहुत सारे क्फ्लिक्ट हमारी मिडीवल इंडिया में मध्य युगीन भारत में जो खड़े हुए थे 17th सेंचुरी 16th सेंचुरी में कि एक ओर तो आध्यात्मिकता की पुकार है। दूसरी ओर है यह विदेशी हमलावर। यह ईस्ट इंडिया कंपनी का शोषण। तो हम लोगों इस तरह से कुछ-कुछ लोग कंफ्यूज हो गए थे। आध्यात्मिक भी होना है और साथ में अपने देश का विकास भी करना है। हाउ इज दिस पॉसिबल? दोनों चीज पॉसिबल कैसे है? किंतु देखिए कि स्वामी जी ने बाद में हमको कहा त्याग और आत्मश्रद्धा यह जो भारत के ट्विन आइडियल्स है उसको फॉलो करना है। त्याग आत्मश्रद्धा के सहारे शिव ज्ञान जीव सेवा करनी है। तो यह जो स्वामी जी कहते हैं उसका बहुत सारा कुछ हमको ठाकुर के ही उपदेश में दिखता है। यदि हमको बिल्ली को मार के भगाना है। वही बिल्ली जो कि हम चोरी करने को आती है, यदि उसको मार के भगाना है, यदि फस करनी है, तो हम में आत्मश्रद्धा चाहिए ही चाहिए। यदि आत्मश्रद्धा नहीं है, तो हम अपनी रक्षा भी नहीं कर पाएंगे। यदि आत्मश्रद्धा नहीं है तो फिर हम इस संसार में जीने के लिए उपयुक्त ही नहीं हो पाएंगे। ऑफ कोर्स पिछले 1000 साल की जो भारत की हिस्ट्री है इसके बारे में मेरा जो असेसमेंट है वह मैंने और एक तरीके से किया है। हमने काफी डिस्कस भी किया कि भारत ने अपनी पूरी प्राण शक्ति लगा के एक आध्यात्मिक इवोल्यूशनरी स्टेप लिया है। जो इवोल्यूशनरी स्टेप हमको श्री रामकृष्ण देव में देखने को मिलता है। अभी हमारा ड्यूटी है अपना माइंड, अपनी कॉन्शियसनेस, अपनी साइकोलॉजी ठाकुर के कहे अनुसार, ठाकुर के जीवन और उपदेश के अनुसार डालें। तो वो एक असेसमेंट है। दूसरी एक बात कि हम जब यह

माँ शारदा के जीवन में ज्ञान, भक्ति, ध्यान और कर्म का समन्वय

क्फ्लिक्टिंग आइडियाज को सुनते हैं, देखते हैं, तब हमको लगता है कि क्या इन सब का रिकंसिलिएशन हमने फिलॉसोफिकली तो किया। चलो। किंतु प्रैक्टिकली क्या यह रिकंसिलिएशन हो सकता है कि नहीं? तो प्रैक्टिकली देखिए कि जो अपेरेंटली बहुत ही ज्यादा कंट्राडिक्टरी आइडियाज दिखते हैं सबका परफेक्ट कॉम्बिनेशन परफेक्ट हार्मोनी डे टू डे लाइफ में। देखिए ठाकुर और स्वामी जी दोनों का लाइफ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लाइफ था। कुटीचक और बहुदक ठाकुर कहते हैं ना तो ठाकुर वाज एन एक्सट्रीम कुटीचक इस अर्थ में कि एक ही जगह पर बैठकर के उन्होंने सालों सालों तक तपस्या की और उसके अंत में उन्होंने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। बाद में भले ही चाहे वह कोलकाता में घर-घर गए हो उसको बांटने के लिए किंतु वह जो कुटीचक अर्थात कि एक जगह पर बैठकर तपस्या करने का ठाकुर ज्वलंत उदाहरण है। तो दूसरा है बहुदक। इस अर्थ में अह ठाकुर ने जो कहा उस अर्थ में नहीं किंतु इस अर्थ में कि यही आध्यात्मिकता को बहुदक क्या होता है पता है? बहुत सारी जगह का पानी पीता है। स्वामी जी के मामले में कह सकते हैं बहुत सारी जगह पर जाकर के उन्होंने ठाकुर का यह जो अमृतमई वाणी है उसका पान लोगों को करवाया। सो स्वामी जी इज एक्सट्रीम बहुदक। ठाकुर इज एक्सट्रीम कुटीचर। इस अर्थ में कि ठाकुर ने इंटेंस तपस्या की और स्वामी जी ने इंटेंस शिव्ञाने जीव सेवा की यह जो प्रोपेगेंडा है प्रचार है एक्सट्रीम लेवल पर जाकर किया है पूरे विश्व में भ्रमण करके उन्होंने किया है किंतु आज जो हमारे पास में चॉइस है हम लोग ना ही कुटीचक है ना ही बहुदक है इस अर्थ में कि नहीं हमसे ठाकुर की तरह एक्सट्रीम तपस्या होने वाले ना ही हमारे से स्वामी जी की तरह संपूर्ण अपना सर्वस्व त्याग करके शिव ज्ञान जीव सेवा होने वाली है। हम लोग आते हैं समवोट इन मिडिल कि एक डे टू डे लाइफ है। इस डे टू डे लाइफ के साथ में थोड़ा सा संसार भी जुड़ा हुआ है। थोड़ी सी आध्यात्मिकता भी जुड़ी हुई है। थोड़ा सा स्वार्थ भी जुड़ा हुआ है। थोड़ा बहुत अह निस्वार्थ होने का भी प्रयास करते हैं। तो, हमारा जो एक मिडओकर लेवल का डे टू डे लाइफ़ है, उसमें क्या यह जो अपेरेंटली कंट्राडिक्टरी आइडियाज क्या रिकंसाइल हो सकते हैं कि नहीं? यहां पे है कर्म योग, यहां पे है ज्ञान योग, यहां पे है भक्ति योग, यहां पे है ध्यान योग। वो उसी दिन हमारी बात हो रही थी कि यह जो भक्ति है उसका जो हार्ट है वह है शरणागति और यहां पर जो ज्ञान है उसका हार्ट है कि यह फ्री इंक्वायरी तो यह जो फ्री इंक्वायरी अर्थात कि नेति नेति मैं एक भी बात को स्वीकार नहीं करूंगा जो कि मेरी एक लॉजिकल अंडरस्टैंडिंग के ऊपर में वह आकर के स्थिर नहीं होती है। इसको मैं लॉजिकली एक्सेप्ट नहीं कर पाता हूं। जो कोई भी चीज मुझे संसार में बांधने को आएगी उसका मैं त्याग करूंगा। तो अपेरेंटली कंट्राडिक्टरी ये जो नेति नेति पाथ इति इति पाथ ये जो फ्री इंक्वायरी फ्रीडम ऑफ स्पिरिट यह जो फ्रीडम ऑफ आत्मन और यहां पे शरणागति है दास्य भाव है आर देयर एनी रिकंसिलिएशन ऑफ ऑल दिस अपेरेंटली कंट्राडिक्टरी आइडियाज इन आवर डे टू डे लाइफ तो यह प्रश्न होता है और देखिए कि आज से लेकर के जो हम पांच दिन मां शारदा श्रद्धा देवी का जीवन चरित्र जो स्टडी करेंगे तो उसमें मां का जीवन है इज अ परफेक्ट आइडियल फॉर अस। परफेक्ट एक गाइडिंग लाइट फॉर अस। मां का भी डे टू डे लाइफ था। हालांकि मां के भीतर में संसार नहीं था। किंतु मां संसार के भीतर में थी। इस अर्थ में कि मां की सांसारिक कोई भी वस्तु या व्यक्ति के प्रति माया नहीं थी। इसके बावजूद मां ने जैसे कि वो जो उनकी वह जो भाई की पुत्री है राधु उसके प्रति एक ममत्व का रिश्ता बांधा था। और यह जितने भी त्यागी संतान मां के पास में जाते थे, सबको मां अपने ही बच्चों के रूप में स्वीकार करती थी। तो यह जो संसार के साथ में यह मां और बच्चे का संबंध तो मां का था। संसारियों के साथ में रहती थी। यह पागली मामी यह पागली राधु यह जो मां के भाई और यह उद्बोधन में यदि आती है तो वह भी कम संसार नहीं था। दुनिया भर के पागल भक्त आकर के किस तरह का सब पागलापन करते थे। तो इन सबके बीच में रहकर के मां ने किस तरह से एक नॉर्मल डे टू डे लाइफ में हाई स्पिरिचुअल एक आइडियल बना के रखा है। वो मां का जीवन है हमारे लिए परफेक्ट एक उदाहरण कि किस तरह से डे टू डे लाइफ में ज्ञान कर्म भक्ति और ध्यान इन चारों का समन्वय हो। कर्म योग की भक्ति योग की बात हो भक्ति योग तो मां मां के भीतर में सहज है। ठाकुर के भीतर में ठाकुर के प्रति भक्ति और जितने भी देवी देवताएं हैं उनके प्रति भी भक्ति हमको मां में स्पष्ट देखने को आती है। तो भक्ति योग मां के भीतर में है। वो तो एक सहज रूप से अनुमान कर सकते हैं। सहज रूप से समझ सकते हैं। किंतु कर्म योग देखिए, मां एक क्षण बिना काम के नहीं रहती थी। सतत सुबह से लेकर के रात तक वह घर का जो भी काम होता है, जनरली मां सब करती थी। यहां तक कि शरद महाराज और कुछ साधु अह कोलकाता से जयराम बाटी गए। तो यह जो साधु होते हैं ना नए-नए आए हुए तो सेवा की भावना भक्ति का एक भाव बड़ा स्ट्रांग होता है। तो उन्होंने देखा कि मां वहां पर उनका घर है घर का यह जो चौगान है वहां पर झाड़ू लगा रही है। तो वह तो बेचारा आश्चर्यचकित हो गया। जगत जननी मां स्वयं यहां पर झाड़ू लगा रही है। वो सोच रहा है कि दौड़ के जाएगा। मां के हाथ से झाड़ू ले लेगा। कहेगा मां मुझे झाड़ू लगाने दीजिए। मुझे यह सेवा करने का मौका दीजिए। तो शरद महाराज किंतु साधु को कहते हैं कि देखो जय राम बाटी में मां के हाथ से काम छीन नहीं लेना चाहिए। क्यों? क्योंकि मां अपने हाथों से इस तरह से घर का पूरा काम करना पसंद करती है। उनको वही बहुत अच्छा लगता है। जिस तरह से वह अपने बच्चों की सेवा कर पाए। अपने बच्चों के लिए मां खाना पकाती है। अपने बच्चों के सामने बैठकर के उनको परोसती है और सामने बैठकर के वो खाए वो तृप्ति भर से खाए तृप्ति सहकार वो खाए भोजन करें। वह मां बैठती है और देखती है। तो क्या है कि यह जो मां का मातृभाव है तो मां किस तरह से बच्चे के लिए पूरा कार्य करती है वह सब कार्य मां अपने हाथों से करती है। तो यह हो गया कर्म योग। यहां पर हो गया भक्ति योग। यह हो गया कर्म योग। ध्यान योग के बारे में, राज योग के बारे में तो हमको पता है कि मां दिन के एक-ए लाख जप किया करती थी। मां के पास में वैसे तो यदि कोई आकर भक्त मां को कहता है कि मां मन एकाग्र नहीं हो रहा है क्या करूं तो मां कहेगी अच्छा बेटा तुम ठाकुर पर विश्वास रखो मैं तो हूं वगैरह-वगैरह किंतु कभी-कभी नाराज भी हो जाती थी और फिर कहती भी थी 10,000 जप करके देखो देखो कैसे नहीं मन स्थिर होता है काम जप कुछ करना नहीं है और बस बैठे-बैठे कंप्लेन करना है तो यहां पे भी देखिए कि स्पष्ट रूप से मां कहती है कि यदि मन एकाग्र करके जप करते हैं तो फिर देखिए कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता कैसे सहज नहीं होता है। तो यह ध्यान योग के बारे में और फिर देखिए कि अल्टीमेटली आता है ज्ञान योग। हमको लगेगा कि अच्छा यह तो समझ लिया चलो मां दिन भर कर्म करती थी। जग जाहिर है। मां के भीतर में ठाकुर अन्य देवी देवताओं के प्रति जगत धात्री देवी के प्रति भक्ति थी। वह भी तो जग जाहिर है। मां दिन में 10,000 1 लाख जप किया करती थी। यह भी जग जाहिर है। किंतु ज्ञान योग ज्ञान योग का मां के जीवन के साथ में किस तरह से रिकंसिलिएशन है। तो यहां पर देखिए सर्वप्रथम तो ज्ञान योग का जो फंडामेंटल है वह है त्याग। त्याग और आत्मश्रद्धा। यह त्याग और आत्मश्रद्धा ही मनुष्य को ज्ञानी बनाता है। मुंह से आप 1000 सोहम सोहम करते रहिए। अहम ब्रह्मास्मि महावाक्य विचार करते रहिए। किंतु किंतु यदि इंद्रियों पर संयम नहीं है तो वह सब विचार किसी काम के नहीं है। वह हलधारी मोस्ट प्रोबेबबली उसने ठाकुर को कहा था यह ठाकुर यह जो सब अपना गले का जनेऊ वगैरह फेंक करके वो जो साधन भजन करते थे तथाकथित ब्राह्मणों के द्वारा न किए जाने वाले जो कर्म करते थे अनुचित ब्राह्मणों के अनुचित कर्म करते थे इस अर्थ में कि अपने बालों से वह जो रसिक मेहतर है जो टॉयलेट क्लीन करने वाला उसका टॉयलेट ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन किया था। अपना घमंड निकालने के लिए मन में से ठाकुर कहते हैं ना लज्जा, घृणा भय तीन थकते नहीं। जब यह यह जो हृदय है हृदय ने जाकर के देखा कि ठाकुर ने जनेऊ निकाल कर के जप कर रहे हैं तो हृदय ठाकुर को डांट के कहता है कि अरे ये कितने जन्मों के बाद में ब्राह्मण जन देह धारण होता है और तुम जो हो कि यह ब्राह्मण देह का अपमान करते हो। जनेऊ फेंक देते हो। ठाकुर क्या कहते हैं कि यह अष्टपाश से मुक्त होकर के साधना करनी है। तो यह जो है कि त्याग त्याग जो है वह साधन का सर्वस्व है। हमारी हलधारी की बात जो चल रही थी। हलधारी ठाकुर का देखा कि इस तरह से ब्राह्मणों के अनुचित कार्य करता है। कर्म करते हैं। तो वह हलधारी ठाकुर को कहते हैं कि देखता हूं तुम्हारे बच्चों की शादी कैसे होगी। अर्थात कि इस अर्थ में कि यह ब्राह्मण समाज जो है नाथ बाहर कर देगा और फिर यदि बच्चे हुए और उनकी शादी करने की बात हुई तो सब लोग कहेंगे अरे यह तो नाथ बहार हो गए हैं। इनका तो हुक्का पानी बंद हो गया है। यह तो ब्राह्मणों के अनुचित सबकर्म करते हैं। उनके घर में शादी हम अपने बच्चे या अपनी बच्ची को शादी नहीं करवा सकते। तो जब ये हलदारी ऐसी बात करता है ठाकुर नाराज होकर कहते हैं तुम ही तो यह सब गीता और भागवत की बात करते हो और फिर तुम ही कहते हो कि मेरे बच्चे होंगे कैसे यह संभव है तो देखिए कि गीता और भागवत या तो फिर उपनिषद या तो आध्यात्मिकता आप यदि बात करते हैं इसके बारे में और साथ में ही इंद्रियों पर संयम नहीं है तो फिर ज्ञान योग में आपने पहला कदम भी नहीं रखा। ज्ञान योग का हार्ट ही है त्याग। बिना त्याग के ज्ञान योग में कुछ भी संभव नहीं। और यही कारण है। कुछ दिनों पहले मैं सोच रहा था कि यह जो रामकृष्ण संघ हालांकि ठाकुर के प्रति हमारी इतनी भक्ति है। हमारे इतने सारे मंदिर है ठाकुर के। इसके बावजूद यह जो हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में जो स्टडी करते हैं वेदांत को ही प्राधान्य दिया जाता है। और ठाकुर मां स्वामी जी का लाइफ एंड टीचिंग्स ये जो अपने ये जो भक्ति परंपरा है ये चैतन्य परंपरा ये श्रीनाथ जी परंपरा ये कितनी सारी सब भक्ति परंपराएं हैं उसके बारे में बहुत ही अल्प हमको ट्रेनिंग सेंटर में जानने को मिलता है। आप थोड़ा मेहनत करेंगे तो किताबें सब है पढ़ पाएंगे किंतु सिस्टमेटिक क्लासेस नहीं होते हैं। तो देखिए किंतु इसके पीछे का कारण क्या है? रामकृष्ण संघ में सब समय शंकराचार्य प्रवर्तित यह जो वेदांत अद्वैत वेदांत है उसी को क्यों प्राधान्य दिया जाता है? क्योंकि यह सन्यासी संघ है। सन्यासी संघ में त्याग का प्राधान्य है। यदि त्याग नहीं होगा तो यह सन्यासी संघ को टिकाना मुश्किल हो जाएगा। भक्ति मार्ग में आप जैसे ही जाते हैं आपके सामने बहुत सारी ओपॉर्चुनिटीज खुल जाती है। आप कहेंगे कि अच्छा मैं ईश्वर के प्रति शरणागति कर सकता हूं। मैं बहुत सुंदर भजन गा सकता हूं। मैं बहुत सुंदर कीर्तन कर सकता हूं। मैं बहुत सुंदर तरीके से यह जो स्वाध्याय है वह सब कर सकता हूं। ईश्वर के प्रति मेरा संपूर्ण शरणागति है तो सब बहुत अच्छी बात है। किंतु यह सब चीजों के लेकर के आने से जो त्याग का प्रायोरिटी है वह कम हो जाता है। जबकि यह अद्वैत वेदांत है। यहां पर त्याग का सर्वोच्च प्रायोरिटी है। आपको भजन गाना आता है कि नहीं आता है। आपका यह जो इवन बौद्धिक क्षमता बहुत ज्यादा डेवलप हुई है कि नहीं है। आपका बाकी सब चीजों के प्रति कितना टैलेंट है नहीं है इवन जप ध्यान भी आप कितना कर सकते हैं नहीं कर सकते हैं डज नॉट मैटर भक्ति योग में आप यह भी कह सकते हैं कि मैं दिन में 10,000 जप करता हूं आप कुछ भी क्लेम कर सकते हैं क्योंकि वहां पर आध्यात्मिकता जिसको कहते हैं उसके बहुत सारे एवन्यूस है। ज्ञान योग में किंतु एक और एक ही मात्र एवन्यू है। और वह है त्याग। त्याग है तो सब है। भले ही चाहे आप जप ध्यान नहीं कर सकते। फेमसली शंकराचार्य का जो ये जो है वर्क भाष्य टीका वगैरह ध्यान या तो योग के बारे में बहुत ही अल्प उसके बात की गई है। ध्यान अद्वैत वेदांत की साधना का एक हिस्सा हो सकता है। यह थोड़ा सा बाद में डेवलप हुआ है। शंकराचार्य के ओरिजिनल जो भाष्य या टीकाएं हैं उसमें इसका प्राधान्य बहुत कम है। शंकराचार्य ने और जो ओरिजिनल अद्वैत आचार्य थे उन सब ने त्याग ही सर्वस्व है। इसके ऊपर में भार दिया है और यह जो ज्ञान और कर्म दोनों साथ में नहीं चल सकते। इसका अर्थ यही है ज्ञान अर्थात कि यदि ईश्वरीय ज्ञान आपके भीतर ब्रह्म ज्ञान आपके भीतर में है तो किसी भी तरह का कर्म इवन ध्यान भी जो है वह एक तरह का कर्म है। पूजा जप आराधना शरणागति सब किसी ना किसी तरह के कर्म में परिणत होगा। सबका त्याग करके प्योर ब्रह्म ज्ञान वही एक है कि महावाक्य विचार या तो फिर यह ब्रह्म ज्ञान ये जो स्मरण मनन निधिद्यासन वही है अद्वैत मार्ग का एकमात्र सेतु अद्वैत पथ का अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाने वाला एकमात्र मार्ग या तो एकमात्र सेतु तो देखिए कि ज्ञान योग का हार्ट यदि कहे तो वह है त्याग और यह त्याग त्याग जो है मां के भीतर में संपूर्ण रूप से त्याग। तो यह कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान या तो कहेंगे राजयोग। चारों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन विदाउट एनी कॉन्फ्लिक्ट, विदाउट एनी ड्रामा, विदाउट एनी फिलॉसोफिकल स्पार्क्स हमको मां के जीवन में डे टू डे जीवन में देखने को मिलता है। सो देखिए कि जो हमारे संघ का जो आदर्श है किस तरह से एक नॉर्मल क्वाइट एंड एट द सेम टाइम आप कहेंगे कि फ्रूटफुल स्पिरिचुअल लाइफ लीड की जाए तो उसका सर्वोच्च आपको मार्गदर्शन मिलेगा मां के जीवन से। तो यह तो हुआ एक प्रीलिमिनरी हम लोग मां के जीवन का पाठ कर रहे थे। गंभीरानंद जी की किताब श्री मां शारदा देवी उसमें यह चीर सधवा चीर सिमंततीनी यह चैप्टर तक हम आ गए हैं। ठाकुर की महासमाधि

श्री रामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन — स्वामी अभेदानंद कथित

हो चुकी है और फिर महासमाधि के बाद में हमारा जो पाठ चल रहा था विभिन्न जो ठाकुर के शिष्य थे उन्होंने किस तरह से महासमाधि का वर्णन किया है तो उसमें हम अभी काली महाराज का वर्णन पढ़ रहे थे तो काली महाराज ने इस तरह से और देखिए जितने भी वर्णन हमने पढ़े हैं सभी वर्णन में एक तरह से देखिए तो रिपीटेशन भी है और एक तरह से देखें तो कुछ ना कुछ नए पॉइंट हमको देखने को मिल ही जाते हैं। कभी-कभी थोड़ा बहुत कंट्राडिक्शन भी दिखेगा किंतु क्या है देखिए यह सब रेमिनेशंस है। वह बहुत ही लंबे समय के बाद में लिखे गए थे या तो कहे गए थे। और हम लोग जो याद रखते हैं वह बेसिकली वह चीजें याद रखते हैं जिस चीज ने हमारे पर सबसे ज्यादा इंपैक्ट किया है या तो फिर जो चीज ने हमने अपनी आंखों से विटनेस की है। तो इसलिए प्रत्येक जो आई विटनेस अकाउंट है हमारे पास में सभी में हमको कुछ ना कुछ एक्स्ट्रा पढ़ने को एक्स्ट्रा पॉइंट देखने को मिलता है। एट द सेम टाइम हमको यह भी समझ में आता है कि यह वर्णन करने वाला ठाकुर को किस दृष्टि से देखता है? तो यहां पर काली महाराज का वर्णन हम पढ़ रहे थे। काली महाराज ने प्रारंभ से ही कहा कि जिस दिन ठाकुर के गले से रक्त क्षरण हुआ उस दिन में नरेंद्रनाथ वगैरह उनके सामने ही बैठे थे। अर्थात कि यह एक नया पॉइंट है। ठाकुर की महासमाधि से कुछ दिन पहले उनके गले में से बहुत सारा रक्त बाहर हुआ था। खून बहा था और इसी से ठाकुर बहुत ही ज्यादा दुर्बल हो चुके थे। नो वंडर कि मास्टर महाशय है ना कि शारदानंद जी है। ठाकुर के जो दो ग्रेटेस्ट जीवन और उपदेश के लिपिकार है उन्होंने ठाकुर के अंतिम दिनों का वर्णन स्किप कर दिया है। क्योंकि समझ ही सकते हैं कि ठाकुर के प्रति जिनके प्रति हमारी इतनी श्रद्धा हो, जिनके प्रति हमारा इतना स्नेह हो। आध्यात्मिक इतना डीप हमारा जिनके साथ में नाता हो अभी उनके गले से इस तरह से खून बहना शुरू हो और वह जो संपूर्ण रूप से असहाय हो जाए तो किससे यह सब देखा जाएगा सालों सालों के बाद यह उपदेश लिखने के समय या तो उनके जीवन की घटनाओं का वर्णन लिखने के समय भी जब आप आंख बंद करके देखेंगे काशीपुर अध्याय को तो नो डाउट मास्टर महा महाशय ने जिस तरह से डॉक्टर सरकार के साथ में जो वार्तालाप हुए वह नोट किए हैं या तो फिर शरद महाराज वो एक फनी इंसिडेंट नोट करते हैं कि वो और स्वामी जी उस समय के नरन वो एक महिमा चरण ना कि मोस्ट प्रोबेबबली उसी के घर गए ठाकुर का भक्त दिखावा तो बड़ा पंडिताई का करता है कि और जाकर के देखा तो उसकी लाइब्रेरी में बहुत सारी किताबें पड़ी है तो स्वामी जी थोड़े थोड़े से इंप्रेस हो गए। पूछा कि क्या यह सब किताबें पढ़ी है? तो वह बड़ा ही गर्व पूर्वक कहता है हां ये तो सब मैंने पढ़ लिया है। तो स्वामी जी आउट ऑफ क्यूरियोसिटी एक किताब को खोलते हैं। अभी उस समय की किताबों का किस तरह से प्रिंटिंग होता होगा पता नहीं। पेज काटने पड़ते हैं। तो अभी पेज को काटना क्या वह भी नहीं पता। किंतु शरद महाराज वर्णन में लिखते हैं कि वह पेज काटे हुए नहीं थे। अर्थात कि यदि आपको पढ़ना है तो फिर उसको काटे बिना चलेगा नहीं। तो फिर स्वामी जी देखकर के ही समझ गए कि वो झूठ-मूठ की बातें कर रहा है। किताबें लाकर के खरीद करके डेकोरेशन के लिए रख दिए। जैसे कि लोग अपने घर में ये जो पेंटिंग लगाते हैं वो जो सब करते हैं ना डेकोरेशन के लिए तो इसने डेकोरेशन के लिए किताब ला के खरीद के रखी है। सो इस तरह के कुछ ह्यूमरस इंसिडेंट शरद महाराज लिखते हैं। बट अदर देन दैट ठाकुर के साथ में एक्चुअली आखिरी आखिरी दिनों में क्या हुआ उसका सिस्टमेटिक वर्णन ना ही मास्टर महाशय करते हैं ना ही शरद महाराज करते हैं। बाद बात बाद में सब नोट्स कलेक्ट करके प्रभंद जी ने उनकी जो अंत्य लीला है उसमें यह सब कुछ कलेक्ट करने का कंपाइल करने का प्रयास किया है। हम जब यह सब स्मृति कथाएं कंप्लीट हो जाएगी उसके बाद में प्रभानंद जी का जो रिकंसिलिएशन है वो भी पढ़ेंगे। हमको एक प्रॉपर आईडिया आएगा कि आखिरी दिनों में क्या हुआ है। तो यह एक बात है। दूसरा देखिए वैसे तो हम पढ़ रहे हैं मां का जीवन। गंभीरानंद जी ने शायद इसीलिए ठाकुर की महासमाधि का वर्णन एक ही पैराग्राफ में संपूर्ण कर दिया। जिससे कि मां जो है मां के जीवन और उनके उपदेश पे ही उनकी किताब चलती रहे। अदरवाइज देखिए लिटरेचर और साहित्य इतना सारा है अपने संघ में कि सभी घटनाओं का आप विस्तृत वर्णन करने को जाएंगे तो उसका कभी अंत नहीं आएगा और लिमिटेड पेजेस में किताब कंप्लीट करनी है बोलकर के गंभीरानंद जी ने समाप्त कर दिया किंतु हम इसका विस्तृत वर्णन इसलिए कर रहे हैं एक चीज कि हमारे लिए एक मौका है यह घटना को डिटेल में पढ़ने का म एक नेचुरल वे में यह मौका का आ गया है। ओपॉर्चुनिटी आ गया है तो हम लोग स्टडी कर ले रहे हैं। दूसरा है कि देखिए ठाकुर और मां इन दोनों का जीवन इतना गहराई से एक दूसरे के साथ में जुड़ा हुआ है कि ठाकुर की महासमाधि एक ऐसी घटना है कि जिसके बारे में विस्तृत आलोचना आवश्यक है। आश्चर्य मुझे पहली बार हुआ था जब मैं गंभीरानंद जी का मां का यही जीवन पढ़ रहा था। ठाकुर की महासमाधि का वर्णन तो चलो फिर भी उन्होंने एक पैराग्राफ दिया है। स्वामी जी की महासमाधि के बारे में और मां के रिएक्शन के बारे में उन्होंने कुछ नहीं लिखा। तो वि इज वेरी सरप्राइजिंग क्योंकि स्वामी जी और ठाकुर और मां इन तीनों का तो कितना आप कहेंगे कि स्पिरिचुअल जो उनका डेप्थ और यूनिटी जो था व्हिच इज सो डीप। तो ठाकुर के जाने से मां पर गंभीर जो आघात हुआ था या तो एक इफेक्ट हुई थी उतना ही इफेक्ट मां के जीवन में स्वामी जी के जाने से भी होना चाहिए। वो जो योगानंद जी महाराज का देह गया उद्बोधन में तो उसका तो वर्णन है हमारे सामने मां कितना रोती है कहती है कि अभी दीवार की एक ईंट गिरी है मकान की धीरे-धीरे करके पूरा मकान ढह जाएगा यहां पे संघ के बारे में नहीं कह रही मां किंतु उन्हीं लोगों के बारे में कह रही है जो कि ठाकुर के अंतरंग थे माने पहला देहांत हुआ ठाकुर के अंतरंगों में से किसी का और धीरे धीरे-धीरे एक के बाद एक सबका होगा। हालांकि अंतरंग में कहे तो सुरेश बाबू है, बलराम बाबू है। इन सबका भी तो देहांत हो चुका था। किंतु त्यागी संतानों में सबसे पहली महासमाधि हुई योगेंद्र महाराज की। तो अब देखिए कि वो जो घटना का सुंदर वर्णन अपने पास में है। तो मां को यदि योगेंद्र महाराज की महासमाधि से इतना कष्ट होगा, इतना आघात पहुंचेगा, तो स्वामी जी की महा समाधि से तो क्या से क्या नहीं होगा। सो दैट इज अनदर सरप्राइजिंग थिंग कि इसके बारे में गंभीरानंद जी ने कुछ भी नहीं लिखा। एनीवे उनके पास में पेजों पेजेस की लिमिटेशन है और समय की भी लिमिटेशन है। हमारे पास में इस तरह का कोई लिमिटेशन नहीं। बोल करके हम लोग इसको थोड़ा सा डिटेल में देखते हैं ठाकुर की महासमाधि के बारे में। तो ऑलरेडी हमने देखा काली महाराज का कुछ-कुछ वर्णन तो हमने पढ़ ही लिया है। फिर उसके बाद में काली महाराज यह भी कहते हैं कि जिस दिन जिस क्षण ठाकुर की महासमाधि हुई और जैसे ही मां को पता चला तो साथ में ही मां आकर के ठाकुर के कमरे में मां कोथाई गलीगो अर्थात कि मां तो ठाकुर को मां काली के रूप में ही देखती थी। तो मेरी मां काली मुझे छोड़कर के क्यों चली गई? इस तरह से मां रोने लगी। तो काली महाराज कहते हैं कि यह दृश्य जितना हृदय विदारक है किंतु साथ में ही अपरूप भी है और कहते हैं कि हम लोग एक साइड में खड़े रहकर के आश्चर्यचकित होकर के पति और पत्नी का यह मधुर संबंध प्रत्यक्ष करने लगे और सोचने लगे कि यह दृश्य और भाव हमने ना ही पहले कभी देखा है ना ही इसको हम कभी भूल पाएंगे। तो देखिए कि यह एक हो गया और इसके बाद में जैसे-जैसे समय सुबह होती गई हमको तो पता है ठाकुर के दो भक्तों ने हुटको गोपाल मोस्ट प्रोबेबबली वन ऑफ देम कि कोलकाता में घर-घर जाकर के भक्तों को समाचार दे दिया था कि मध्य रात्रि को ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है। तो सभी भक्त जैसे-जैसे दिन उठा सूर्योदय हुआ भक्तों का आगमन होने लगा। डॉक्टर सरकार ने क्या किया? ठाकुर की मृत्यु देह का फोटो लेने के लिए ₹10 देकर के वह वहां से चले गए। और फिर हमने यह भी देखा कि बंगाल फोटोग्राफर कंपनी को बुलाया गया और उन्होंने ठाकुर की यह जो मृत्युशैया है उसको भी सजाया गया था और ठाकुर के जितने भी भक्त हैं वह सब वहां पर मृत्युशैया के चारों ओर खड़े रहे और इसकी इस दो फोटो लिए गए थे। तो यह फोटो के बारे में भी हमारा थोड़ा डिस्कशन हुआ था। यूजुअली यह फोटो कहीं नहीं छापे जाते हैं। और यदि छापे भी जाते हैं तो ठाकुर को जो है हम लोग ब्लैक आउट कर देते हैं। क्योंकि उनका जो मृत्यु के समय का जो अवस्था थी देखकर के किसी को भी कष्ट होगा। देह जो है कंकाल सार हो गया था। हालांकि यह भी तो वर्णन बड़ा सुंदर है कि मृत्यु के समय जैसे शशि महाराज कहते हैं आनंद की लहर उनके पूरे देह में से बह गई और शशि महाराज क्या कहते हैं रामकृष्णानंद जी मुझे ऐसा लगा कि मृत्यु की क्षण उनके जीवन की सबसे आनंद की क्षण थी। तो यह वर्णन है ठाकुर का जो श्री अंग है ठाकुर का जो चेहरा है आध्यात्मिकता से प्रकाशित हो रहा था। इसके बावजूद एक जो डिसेंसी है उसको फॉलो करते-करते यह फोटो हम यदि पब्लिश भी करते हैं तो जितने भक्त चारों ओर खड़े हैं एक हिस्टोरिकलेंस है इस फोटोग्राफ का कि उसी समय से यह लीडरशिप जो है वह ठीक होना शुरू हो गई थी। यह जो रामचंद्र दत्त वो गृहस्थ भक्तों में उनकी आगेवानी थी और त्यागी भक्तों में नरेंद्रनाथ की आगेवानी थी। तो गृहस्थ भक्त सब मैनेज कर रहे थे। तो बोलकर के रामचंद्र दत्त स्वयं वो जो वहां पर सेंटर में खड़े रहे सबसे पहले लाइन में और नरेंद्र को कहा कि तुम आओ मेरे साथ में खड़े रहो। तो सेंटर में हमको रामचंद्र दत्त और नरेंद्रनाथ देखने को मिलते हैं। एक गहियों के गृही भक्तों के लीडर है और एक है त्यागी भक्तों के लीडर और फिर बाकी जितने भी भक्त त्यागी संतान है वह सब चारों ओर खड़े रह जाते हैं। सो वो भी एक दृश्य हमने देखा। ठाकुर ने तो कहा ही है कि बलराम का अन्न शुद्ध है और जब भी ठाकुर जब कोलकाता जाते थे तो बलराम के घर पे ही आहार करते थे और बलराम के घर में ही शयन करते थे। बलराम मंदिर कहा जाता था। कहा जाता है उनके घर को। सर्वप्रथम जब ठाकुर को कैंसर ट्रीटमेंट के लिए कोलकाता लाया गया। उस समय जो घर ठाकुर के लिए पसंद किया गया था। ठाकुर को वह घर पसंद नहीं आया। चारों ओर से बंद था। खुली जगह नहीं थी बोल के ठाकुर इमीडिएटली वहां से निकल कर के बलराम बाबू के घर आ गए थे। वहां पर कुछ दिन रहे और फिर यह जो श्याम पुकुर जो है वहां की व्यवस्था की गई। मास्टर महाशय स्वयं अपने वर्णन में लिखते हैं कथामृत में कि पहली बार बलराम मंदिर में गए थे। देखा कि बलराम एक चाकर की तरह एक नौकर की तरह हाथ जोड़कर के खड़ा है ठाकुर के सामने। ऐसे ही ऐसा उनको देखकर के लगेगा नहीं कि एक घर का मालिक है। ऐसा ही लगेगा कि एक नौकर ही है। तो वह जो बलराम बाबू का जो दीनहीन भाव था या तो शरणागति थी ठाकुर के प्रति और मास्टर महाशय स्वयं देखेंगे दाढ़ी-बाड़ी है उनकी और लाइन में काफी पीछे खड़े हैं। सो अगेन मास्टर महाशय का अपने को छुपा करके रहने का जो एक भाव था वही जो हमने स्टार्टिंग में डिस्कस किया कि मछली जब चोरी करने को भी बिल्ली जो है मछली चोरी करने को भी आती है तो उसको भी नहीं भगा सकते तो वो एक मास्टर महाशय का एक भाव था तो वह भी लाइन में पीछे में खड़े हैं। सो दैट इज द एक फोटो हिस्टोरिकल उसकाेंस है कि किस तरह से भविष्य में हायरर्की बनना शुरू हो गया था। कुछ लोगों का है जो कि वो अपना इंपोर्टेंस छुपा के रखना चाहते हैं। और जिन लोगों का इंपोर्टेंस कंपेरेटिवली इतना नहीं है। आज रामचंद्र दत्त और मास्टर महाशय और बलरामबाबू तीनों को देखिए। जो भी भक्त हैं अपने संघ के गृहस्थ में मेरी दृष्टि से तो सर्वश्रेष्ठ होने चाहिए। मास्टर महाशय क्योंकि उनके द्वारा रचित कथामृत सभी साधु भक्त प्रतिदिन उसका पाठ करते हैं। एक अमर एक वारसा छोड़कर के गए हैं। इनफैक्ट अपने संघ की ऐसी और कोई किताब नहीं है। इंक्लूडिंग स्वामी जीसस कंप्लीट वक्स जिसका कि प्रतिदिन पाठ होता हो। तो मास्टर महाशय का एक अमर वारसा है। एक अमर कंट्रीब्यूशन है। सो उनको प्रथम लाइन में सर्वप्रथम खड़े होना चाहिए था। किंतु खैर सो एक पता चलता है कि दिस इज अ हिस्टोरिकल एक अंडरस्टैंडिंग हमको मिलता है। सो वो एक हो गया। फिर काली महाराज ये भी कहते हैं पुष्प वगैरह से जो खाट है चारों ओर से सजाया गया था और फिर फोटो भी लिया गया और उसके बाद में यहां तक हमारा वर्णन आया था। इसके बाद में काली महाराज आगे क्या कहते हैं? ए के भीड़ क्रमश बाड़ी ते लागीो धीरे-धीरे सुबह का समय हो चुका है। ठाकुर की मृत्यु शैया को सजा दिया गया है। फोटोग्राफ ले लिया गया है और धीरे-धीरे करके भीड़ बढ़ने लगी। तो शत्कार शकल द्रव्य संग्रह करा शेष होइया छ उस समय अग्नि सत्कार जो करना था उसके लिए जो द्रव्य चाहिए था वह सब संग्रह करना समाप्त हो चुका है बेला पांच घटिकार समय काशीपुर होते श्री श्री ठाकुर दिव संकीर्तन करित करते विपुल जन श्रोते मध्य दिया जवा हो लाो शाम को पांच 5:00 बजे के समय में काशीपुर से ठाकुर का दिव्य देह संकीर्तन करतेकरते विपुल जन स्रोत के मध्य से होकर के जाने लगा ले जाने ले जाया जाने लगा विपुल जन स्रोत बहुत सारे लोग इकट्ठा हो गए थे और इसका कारण भी यही है पहले तो सर्वप्रथम तो ब्रह्मो समाज की ये जो पत्र पत्रिकाएं हैं ब्रह्मो समाज का जो ऑर्गेनाइजेशन है उसके माध्यम से ठाकुर के बारे में समाचार कोलकाता में फैलना शुरू हुआ था और फिर बाद में हम देखते हैं कि ठाकुर ने स्वयं कोलकाता में भक्तों के घर जाकर के आनंद की हाट बिठानी शुरू की थी। मास्टर महाशय का वर्णन पढ़ेंगे। जहांजहां ठाकुर जाते हैं उसे उत्सव लग जाता था। मास्टर रामबाबू का घर हो ना कि ये सुरेश मित्र का घर हो ना कि ये बलराम बाबू का घर हो ना कि ये जो ब्राह्म समाज के जो उत्सव होते थे माघोत्सव वगैरह वहां पे हो बहुत सारे लोग इकट्ठा होते थे मारवाड़ी के घर ठाकुर जाते हैं तो सब तरह के लोग ठाकुर का दर्शन करने का सद्भाग्य प्राप्त करते थे तो फिर जैसे ही ठाकुर की महासमाधि का विवरण फैलना शुरू हुआ तो उस समय देखा कि बहुत सारे लोग इकट्ठा हो गए हैं। खोल करताल और कीर्तनेर शब्द चतुरिक माता या तुली लोग खोल करताल और कीर्तन की आवाज उससे चारों ओर लोग मदमस्त हो गए। माताइया तुली लोग अर्थात कि प्रेम से मतवारे हो गए। त्रिशूल ओमकार खोता क्रूश क्रसेंट प्रवृत्ति विभिन्न धर्म प्रतीक लोया शोभा यात्रा शो श्री श्री ठाकुर पुण्य देहो काशी पुरुष मशाने लया जावा होइलो त्रिशूल है ओमकार है क्रोस है ये क्रेसेंट अर्थात इस्लाम का जो चंद्रमा का प्रतीक है खोजता क्या है पता नहीं वगैरह ले वगैरह धर्म के विभिन्न प्रतीकों को लेकर के शोभा यात्रा सह श्री श्री ठाकुर का पुण्य देह काशीपुर श्मशान में ले जाया गया। श्री रामकृष्ण पार्षदों भक्तगण अश्रु भार क्रांतो नेत्रे श्री रामकृष्ण पुण्य शरीर सत्कार करब जनो घृतो चंदन काष्ठो मालो प्रभवृति दबे व्यवस्था करिया छिलो श्री रामकृष्ण पार्षद और भक्तगण अश्रु भाराक्रांत नेत्र अर्थात कि जिनके नेत्र अश्रुओं से भर आए हैं। इस तरह से इस तरह के ये रामकृष्ण पार्षद और भक्तगणों ने श्री रामकृष्ण देव के पुण्य शरीर का सत्कार करने के लिए यह घी चंदन लकड़ियां माला वगैरह द्रव्यों की व्यवस्था करके रखी थी। क्रमे जथा जथाबहित भावे गंगाय श्री श्री ठाकुर शरीर धत और माल सज्जित करिया चिता स्थापन करा हो क्रमे एक के बाद एक क्रमशः जिस तरह से रीति है जिस तरह की प्रथा है इस तरह की प्रथा को फॉलो करके गंगा के पवित्र जल में श्री श्री रामकृष्ण देव का शरीर स्वच्छ किया गया मालाओं से सज्जित किया गया और फिर चिता के ऊपर में स्थापित किया गया। देखिए ये हम समझ सकते हैं जिन भक्तों ने जिन त्यागी संतानों ने यह सब किया होगा उनके हृदय में कितनी व्यथा होगी अभी कल तक तो यही पुण्य देह के साथ में उनका जीवन सर्वस्व जुड़ा हुआ था आज वही पुण्य अवतार श्री रामकृष्ण देव स्वयं मृत देह बनकर के उनके सामने विराज रहे हैं। ठाकुर का आध्यात्मिक प्रवेश तो उनके देह में हो गया है। किंतु, यह दैहिक पंचमहाभूत का यह जो शरीर है, उसका भी तो एकेंस है। उसी की तो सेवा वे लोग अभी तक किए जा रहे थे। तो, उसी देह को गंगा के जल में धो के पुष्प माला से सज्जित करके फिर चिता के ऊपर में स्थापित करना। भक्तों के हृदय में कितनी व्यथा हुई होगी। चितार अग्नि शत शत लीहा विस्तार कोरिया उध्व उत्थित होइलो चिता का अग्नि शत शत जहवा विस्तार करके उर्ध्व परिवर्तित हुआ उर्ध्व उत्थित हुआ सेवक और भक्तगण अग्निकुंडे पुष्प वर्षण करते लागीो सेवक और भक्तगण अग्निकुंड के भीतर में पुष्प वर्षण करने लगे खोल करताल और कीर्तन मधुर ध्वनि ते श्मशान घाट प्रतिध्वनित होते लालो खोल करताल और कीर्तन के मधुर ध्वनि से शशान घाट प्रतिध्वनित होने लगा ताहा एक अवर्णनीय अपरूप दृश्य वह एक अवर्णनीय अपरूप दृश्य था श्री रामकृष्ण देव संतान उभक्त गण शेष बारेर मतो श्री श्री ठाकुर दिव शरीर निरीक्षण कोरिया श्रद्धा चित्ते प्रणाम कर लो श्री रामकृष्ण देव के संतान और भक्तगण आखिरी बार के लिए श्री श्री ठाकुर के दिव्य शरीर का निरीक्षण करके श्रद्धा चित्त से प्रणाम करें करे करने लगे प्रणाम किया के होबा तव पाठ करते लागी लो कोई कोई है स्तव पाठ करने लगे क्रमे श्री श्री ठाकुर पार्थिव शरीर भस्म स्तूपे परिणत हो क्रमशः ठाकुर का पार्थिव शरीर भस्म स्तूप में भस्मीभूत हो गया भस्म स्तूप में परिणत हुआ देखिए जो अवतार लीला का अवसान यह एक कितनी बड़ी घटना है क्योंकि अभी तक अवतार है सदैवह वर्तमान थे और इस घटना के बाद में अवतार अपने भक्तों के हृदय में प्रवेश करके यह रामकृष्ण संघ के माध्यम से स्थूल देह त्याग करके विराट देह के माध्यम से ठाकुर पृथ्वी पर अवतरित है। पृथ्वी पर विचर रहे हैं। हम सभी लोग सिर्फ साधु सन्यासी ही नहीं प्रत्येक भक्तगण हम सबके भीतर में ठाकुर का अवस्थान है। ठाकुर घर करके रह रहे हैं और हमारा सबका जीवन इस तरह से होना चाहिए कि ठाकुर जैसे कि हमारे हृदय और मन को पवित्र मंदिर बनाकर के वहां पर रह पाए। वरना तो फिर मुंह से ठाकुर का नाम लेते हैं। हृदय में ईर्ष्या द्वेष पड़ा हुआ है। तो फिर हमारा हृदय और हमारा मन और ठाकुर के निवास के लिए उपयुक्त कैसे होगा? ऐसा नहीं है कि हमको परफेक्ट होना है। परफेक्ट होने के पीछे दौड़ना वह एक दूसरा प्रॉब्लम खड़ा करता है। एक हीन भावना खड़ी कर देता है। उससे भी बचना है। और ठाकुर ने जैसे कहा आत्मरक्षा तो करनी ही करनी है। किंतु विदिन दिस लिमिटेशंस यथांभव यथाशक्ति एक पवित्र जीवन जीने का आध्यात्मिक जीवन जीने का प्रयास करना है। इसके बाद भी वर्णन है। काली महाराज का अभी भी एक पैराग्राफ बाकी है और फिर इसके बाद में रामचंद्र दत्त का वर्णन है। वह भी काफी इंटरेस्टिंग है। तो इसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: आपने श्री रामकृष्ण की तिथिपूजा के दिन क्या किया?

नया तो कुछ है नहीं यहां पर सेलिब्रेशन में। बेलूर मठ में यदि होते तो वह पब्लिक सेलिब्रेशन देखने को मिलता। बहुत सारे फोटो चल रहे हैं पब्लिक सेलिब्रेशन के। वेल मठ में आपको यह भी पता होगा कि ठाकुर की तिथि पूजा की मध्य रात्रि को फिर सन्यास सेरेमनी होता है और फिर नवसन्यासी तीन दिन भिक्षा करते हैं। तो मठ में रहने से एक बहुत ही एक सुंदर एक अनुभूति होती है। सन्यास सेरेमोनी देखने को मिलती है। फिर भिक्षा करने को मिलती है नए सन्यासियों के साथ में। उसके बाद में सन्यासी लोग भिक्षा जो ले आएंगे तो मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज को सर्वप्रथम जाकर के उसका हिस्सा देंगे। फिर वहां पर कीर्तन भजन वगैरह होगा। फिर जहां पर सन्यास कैंप होता है बेलूर मठ के भीतर में वहां पर वो कीर्तन वगैरह होता है। बहुत सारे साधु फिर उस दिन भिक्षा की भिक्षा का अन्न ही ग्रहण करते हैं। फिर वो वहां पर किचन में खाना नहीं खाएंगे। तो वो एक बहुत ही एक सुंदर अनुभूति है बेलूर मठ में। ब्रांच सेंटर में तो क्या है वही है पूजा है होम है और प्रवचन होगा बड़े महाराज का प्रवचन था इतना ही और कुछ नहीं है

प्रश्न: ज्ञानमार्ग में त्याग स्वाभाविक है। उसमें संसार का पूर्ण परित्याग आवश्यक माना गया है। कर्म तभी संभव है जब हम संसार को किसी स्तर पर वास्तविक मानें।

मैं इस तरह से देखूंगा कि देखिए शंकराचार्य का जो हार्ट है कि ज्ञान और कर्म साथ में कभी नहीं रह सकते। कर्म का आपको त्याग करना है। अभी जो भोग है ना बाय इट्स वेरी नेचर कर्म कोई भी भोग करेंगे आपको कर्म करना ही है। बिना कर्म किए भोग ही नहीं हो सकता। जैसे बोथ आर सिनोनिम तो भोग का त्याग करने के लिए कर्म है। कर्म त्याग है। तो स्वामी जी ने इस बात को तो स्वीकार किया है। इस अर्थ में कि यदि आप भोग रूपी जो कर्म करेंगे तो फिर आप वह माया में ही जड़ित होंगे। ज्ञान के पथ से दूर हो जाएंगे। किंतु देयर आर अनदर टाइप ऑफ कर्म वि इज उपासना। वो तो आप कर ही सकते हैं। सो कर्म इज पार्ट ऑफ उपासना। माने ईश्वर को प्राप्ति करवाने का जो कर्म है वह आप कीजिए। वह कर्म मत कीजिए कि जो आपका भोग रूपी कर्म है। सो दैट इज हाउ यहां पर स्वामी जी डिफरेंशिएट करते हैं उपासना जो है वो शंकराचार्य पर से उसको एक्सेप्ट नहीं करेंगे क्योंकि उपासना भी कर्म के भीतर में आ जाएगी। किंतु एज ए इंटरमीडियरी स्टेप तो उसको हम एक्सेप्ट कर ही सकते हैं। स्मरण मनन निधि्यासन या तो फिर महावाक्य विचार यह क्या है? उपासना है किंतु कर्म ही तो है। बिना कर्म के तो आप उपासना भी नहीं कर सकते। यानी कि कर्म बाय इट्स वेरी नेचर संसार की ओर ले जाता है। दैट इज अ भोग कर्म ईश्वर की ओर ले जाता है। वो है उपासना कर्म। आप भोग कर्म को से माइनस करके उपासना रूपी कर्म कीजिए। एंड फ्रॉम देयर यदि उस उपासना रूपी कर्म कंक्लूजन तक पहुंचते हैं वो कर्म भी निकल जाएगा। फिर प्योर ज्ञान रहेगा। बट एज लॉन्ग एस ज्ञान एस सच डायरेक्ट ज्ञान प्राप्त नहीं होता। एज लॉन्ग एस कि आप स्मरण मनन निध्यासन कर रहे हैं। आप उपासना रूपी कर्म कर रहे हैं। तो स्वामी जी ने उस उपासना रूपी कर्म में जो कि ट्रेडिशनल स्मरण मनन निधि्यासन या महावाक्य विचार रूपी जो उपासना है उसमें सेवा कर्म को ऐड किया है। दैट वे देयर इज नॉट मच डिफरेंस बिटवीन शंकराचार्य एंड स्वामी जी। कि स्वामी जी ने उपासना का डेफिनेशन को एक्सपैंड किया है। यहां तक ही और जब शंकराचार्य यह कहते हैं कि अल्टीमेटली उपासना रूपी कर्म भी जैसे कि अंतिम जो सत्य है वहां जाकर चला जाएगा तो यहां पे भी तो कि नेति नेति करके या कैसे भी करके जब निर्विकल्प समाधि होती है तो वहां पर तो सब कुछ स्थिर हो ही जाता है। वहां पर कोई प्रश्न ही नहीं है। जो एक एक्स्ट्रा डायमेंशन ऐड होती है ना वह है कि निर्विकल्प समाधि के बाद में आप इति इति करके जगत में आते हैं और फिर जो कर्म करते हैं व्हिच इज कंप्लीटली डिफरेंट वो ना ही उपासना कर्म है ना ही वह भोग कर्म है तब जब मधुमक्खी मधुपान करके कैसा वो गुनगुन करके आनंद से गीत गाती है उससे कर्म का कोई बंधन उसको नहीं लगता गलती करके भी परमहंस गलती नहीं कर सकता जो कर्म है सिद्ध का कर्म जो कि बिना बिना किसी अटैचमेंट का होता है। दैट इज समथिंग न्यू। जीवन मुक्ति का जो कांसेप्ट है शंकराचार्य में है वैसे। किंतु वहां पे फिर ऐसा नहीं कहा गया है कि आप जो कर्म करते हैं ऑटोमेटिक लोक कल्याण के लिए हो जाते हैं। शंकराचार्य का खुद का देखिए। उन्होंने ये जो व्याख्या टिकाएं लिखी उन्होंने ये जो सब मठ की स्थापना की उन्होंने जो आर्गुममेंट करके विभिन्न जो मत है उनके ऊपर में विजय प्राप्त किया। ऑल ऑफ़ दैट वाज़ कर्म ओनली। किंतु वो मुक्ति प्राप्त करने के बाद में के कर्म थे जिससे कि शंकराचार्य को खुद को कोई बंधन में नहीं डालने वाले थे या तो ब्रह्म ज्ञान से दूर नहीं ले जाने वाले थे। सो मुझे ऐसा लगता है कि अल्टीमेटली यहां पर डेफिनेशन को ही थोड़ा एक्सपैंड करना है। अदरवाइज ऑल थ्री कॉमोनेंट्स आर ऑलरेडी देयर कि भोग कर्म है उसका त्याग करना है। उपासना रूपी कर्म को करते रहना है। कब तक कि जब तक आप एक्चुअली पूर्ण ज्ञान में सिद्ध ना हो जाए। और फिर पूर्ण ज्ञानी हो जाते हैं। तो शंकराचार्य ने स्वयं जैसे शंकर दिग्विजय जो पूरा शास्त्र ही लिखा गया है। उन्हीं के द्वारा म शंकराचार्य के फॉलोवर्स के द्वारा ही लिखा गया है। शंकराचार्य एक शहर से दूसरे शहर जाकर के दूसरे मतावलंबी दूसरे मत वाले थे। उनसे आर्गुमेंट करते थे। इतने शास्त्रों की रचना की। हाउ इज दैट पॉसिबल? कि यदि कर्म संपूर्ण चले जाते हैं। तो सो ऑल थ्री आर ऑलरेडी प्रेजेंट इन आवर ऑर्डर बट डेफिनेशन थोड़ा एक्सपैंड हो गया है।

प्रश्न: शंकराचार्य शायद यह नहीं देख पाए थे कि कर्मत्याग करने वालों में तमस भी आ सकता है। बहुत से लोग अत्यंत सज्जन और सभ्य होते तो हैं, पर साथ ही अत्यंत आलसी भी होते हैं।

मैं रांची में था ना तो मैं प्रतिदिन मैं गांव में जाता था। सुबह को 7:00 बजे जैसा नाश्ता स्टार्ट किया 7:30 को खत्म हो गया। 8:00 बजे निकले हैं। रात को 8:00 बजे मैं लौटता था। 12 आवर्स गांव में रहना प्रत्येक दिन दैट वास माय रूटीन। कभी-कभी यदि मैं गांव नहीं जाऊंगा तो मुझे पूरा ऑफिस में बैठा रहना पड़ता है काम करने के लिए। सो 8 टू 8 दैट वाज़ माय रूटीन फॉर एवरीडे ऑलमोस्ट एवरीडे रयली मुझे याद आ रहा है कि मैंने कभी छुट्टी ली होगी। अभी मेरे बगल में ही मैं जिस कमरे में रहता था वहां पे और एक रहता था साधु होने को आया था उसका नाम था सुधीर। हम लोग उनको सुधीर जी करके पुकारा करते थे। ही इज डायमेट्रिकली ऑोजिट टू मी। आदमी बड़ा अच्छा एक्चुअली क्या है? जॉइ नहीं कर पाए थे क्योंकि उनकी उसकी उम्र थोड़ी ज्यादा हो गई थी तो जॉइ तो नहीं कर पाएगा तो वहां पर शशांकानंद जी ने उसको वैसे ही रखा था तू ब्रह्मचारियों के कपड़े पहन यहां पे सेवा कर तू किचन में है मंदिर में है वो सेवा करता रहता था बड़ा ही उसका शरीफ नेचर था हम लोगों को पक्का पता है कि वो झूठ नहीं बोलेगा हमें एकदम पक्का पता है कि इधर-उधर का कुछ नहीं करेगा एट द सेम टाइम आई वास सो फैसिनेटेड बाय हिम क्योंकि क्योंकि मैं एक सेकंड भी बिना काम किए नहीं रह सकता। आइदर मुझे पढ़ना है, कुछ काम करना है। समथिंग आई मस्ट डू। आई कैन नॉट डू विदाउट डूइंग एनीथिंग। और मैं उसको जब देखता था आई वास सो सरप्राइज कि वो जैसे ही वो किचन का मंदिर का काम खत्म हुआ वो अपने कमरे में आएगा और बैठा रहेगा। वैसे ही बैठा रहेगा। कुछ नहीं किए बिना। तो शुरू में तो आई वास मैंने सोचा कि क्या जप ध्यान कर रहा है? स्मरण मनन कर रहा है ना कि वो मतलब कुछ मुखस्थ कर रहा है मन के भीतर में गीता फिर मैंने उसके साथ बात करना शुरू किया ऐसा कुछ नहीं है जस्ट एक विलेज बॉय है बड़ा शरीफ लड़का है किंतु वैसा बिना काम के बैठे रहना उसका जो कैपेसिटी वास इनक्रेडिबल आई वास सो फैसिनेटेड बाय हिम मैं हमेशा उसके साथ में बात करता था कि अच्छा बताओ तुम क्या सोच रहे हो क्या कर रहे हो क्या तुम्हारा बैकग्राउंड है सो एक्चुअली वेरी सिंपल विलेज बॉय किंतु देखिए उस समय मुझे लगा कि इसके भीतर में लड़का बहुत अच्छा है किंतु तमस बड़ा भयानक है। यदि आप उसको कहेंगे नहीं ना यह करो तब तक वो कुछ नहीं करेगा। वो बैठा ही रहेगा या सोता रहेगा व्हिच इज इनक्रेडिबल। सो जैसा आपने कहा कि सत्व तो है उसके भीतर में देख सकता हूं। किंतु साथ में तमस भी इतना है और यह कॉम्बिनेशन संभव है यह पहली बार मैंने देखा और सब तरह से झूठ बोलना बिल्कुल नहीं उस मतलब इवन शायद मैं इधर-उधर झूठ बोल दूंगा किंतु मुझे गारंटी पक्का पता है वो झूठ नहीं बोलेगा। सो दैट वे जो एथिक्स एंड मोरालिटी कहते हैं जो सत्व का मानदंड है वो सब था उसके भीतर में। एट द सेम टाइम कर्म की दृष्टि से देख भयानक तमस वो सब लोग उसकी मजाक उड़ाया करते थे। शशांकानंद जी उसको दीर्घसूत्री कहते थे। उस गीता का वो जो है ना दीर्घसूत्री अर्थात कोई भी काम करने में वो लंबा लंबा टाइम लेगा। जो काम 10 मिनट में हो जाना उसको 1 घंटा लगेगा।

प्रश्न: ठाकुर अपने अंतिम दिन अत्यंत आनंद में थे। यही तो वास्तव में सफल जीवन का लक्षण है, है न? फिल्मों में नायक को अनेक संघर्षों से गुजरना पड़ता है, पर अंत में वही विजयी होता है। उसी प्रकार जीवन की सच्ची विजय यह है कि मृत्यु के क्षण में भी मन भय, दुःख और पछतावे से मुक्त होकर आनंद में स्थित रहे।

ऑब्वियस्ली अब मां का ही देखिए ना मां और स्वामी जी दोनों का कितने बीमार थे। भयानक बीमार एट द सेम टाइम दोनों के बारे में विवरण है। महासमाधि के बाद के उनका चेहरा मां के बाद बारे में जब वह मां कोलकाता वापस आई लास्ट टाइम तो ये जो वर्दा महाराज थे उनको ले आए थे तो गोलाप मां वर्दा महाराज को कह रही है कि ये की मां के नहीं ऐसे छो माने ये किस तरह की मां के ले आए हो चेहरा पूरा काला पड़ गया है देह पूरा माने कंकाल सार हो गया है आखिरी बार जब मां उद्बोधन आई तो मतलब मां का चेहरा इतना मलिन हो गया था देह इतना मतलब यह हो गया था सब जैसे हड्डी पसली दिख रही है एट द सेम टाइम वही मां की महासमाधि के समय में जितने लोगों ने विवरण किया है वह भी हम जब वो मौका आएगा देखेंगे सब विवरण एक साथ में इतना मां का चेहरा प्रकाशित हो रहा है मलिनता जितनी भी थी सब जैसे कि अदृश्य हो गई है शुभ्र चेहरा हो गया है और प्रकाशित हो रहा है सो एव्री वर्णन स्वामी जी के बारे में सेम थिंग आखिर आखिर में तो कितना सफर किया है स्वामी जी के तो फोटो भी आप देखेंगे जो दो आखिरी फोटो लिए गए हैं उनका चेहरा देख के ही पता चलता है कि बड़े कष्ट में है एट द सेम टाइम जब महासमाधि के बाद में सब लोगों ने जब उनका दर्शन किया सभी लोगों ने नोट किया कि चेहरे पे एक जैसे कि आध्यात्मिक झलक दिख रही है। सो ऑब्वियसली महापुरुष है। दैट मींस दैट कि लाइफ का अंत जो है जिसका अंत अच्छा उसका सब अच्छा जैसे हिंदी में कहते हैं ना स्टोरी टेलिंग जो साइंस है ना उसमें बहुत सारे स्टडी हुए हैं। वही स्टोरी सक्सेसफुल होती है जिसमें कि हीरो आखिर में हैप्पी रहता है। मतलब उसको उसकी गोल प्राप्ति होती है। यदि यह अनहै एंडिंग होते हैं ना वह स्टोरी ज्यादा सक्सेसफुल नहीं होती है। ह्यूमन साइकोलॉजी आल्सो एंड फैक्ट आल्सो

प्रश्न: एक फिल्म में देखा हीरो मर जाता है आखिर में. इसे देख में बहोत हताश हो गया था.

किंतु इसमें भी देखिए मोरल विक्ट्री तो होती है ना देखिए उसका जो रिडेंशन जिसको कहते हैं अब जैसे कि स्टारवर्स मूवी है। राइट? तो उसमें डार्थ वेडर है। डार्क वेडर सपोज टू बी वन ऑफ द डारकेस्ट विलेन इन ऑल मूवी मूवीज। तो आखिर आखिर में वो लास्ट उसका जो पार्ट है उसमें वह खुद वो जो एपरर है उसका मर्डर कर देता है। दैट मींस उसने जितने भी बुरे काम किए हैं सबका रिडेंशन उसका आखिरी घड़ी में होता है। सो इफ ही इज़ नॉट सक्सेसफुल इन दिस वर्ल्ड इन दी रिडेंशन आर्क इस जो हीरो का होता है दैट हैज़ टू रीच इट्स कंक्लूजन। यदि रिडेंशन नहीं होता कि वह बुरा कार्य करते-करते ही जिया बुरा कार्य करके ही मरा तो फिर वी विल रियली डिसपॉइंटंटेड। माने हि माने उसका जो फाइनल सेल्वेशन जो है ही अटेन द सेल्वेशन आइदर वर्ल्डली सक्सेस और अल्टीमेट स्पिरिचुअल सेल्वेशन दैट हैज़ टू रीच इफ अ मेन कैरेक्टर डजंट रीच आइदर ऑफ़ देम तो वह फिर बड़ा ही डिसपॉइंटिंग होगा। ना यू आर राइट यू आर राइट। सेम थिंग बट आपने जैसे कहा कि सबका वर्णन इतना नहीं मिलता है। अ जैसे लाटू महाराज का महासमाधि हुआ काशी में मोस्ट प्रोबेब्ली इफ आई रिमेंबर करेक्टली तो आई आई डू नॉट थिंक के वो महासमाधि का वर्णन कहीं पे नोट किया है। सो अब जैसे देखिए ना सबसे बुरा मृत्यु हुआ है त्रिगुणातिनंद जी का। राइट? तो एट द सेम टाइम देखिए कि त्रिगुणातिनंद जी ने अपने आखिरी सांसों के साथ में जिस पागल ने वह जो अटैक किया था बम फेंका था उसको क्षमा कर दी है। सो विदाउट दैट स्पिरिचुअल एलिवेटेड फ्रेम ऑफ माइंड वो कैसे यह कर सकते हैं। उनका कोई वर्णन नहीं है आखिरी दिनों का। बस यही वर्णन है कि हॉस्पिटल में उनको लाया गया था। पूरा क्षतविक्षत थे। ब्लड निकल रहा था। कुछ दिन बचे बहुत ही सफर किया एंड देन ही पास्ड अवे इतना तो वर्णन है बट इतना तो पक्का रिकॉर्डेड है कि उन्होंने आखिरी सांस के साथ में उसको क्षमा कर दी थी