प्रार्थना
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है भार समर्पण किस तरह से श्री रामकृष्ण मां शारदा देवी को उनके भविष्य की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार तैयार कर रहा है। कल हमने ऑलरेडी देखा कि किस तरह से ठाकुर अपने जितने भी त्यागी संतान शुद्ध सत्वत्यागी संतान थे उनको मां के पास में ले जा रहे हैं। जिससे कि मां की कृपा उनको प्राप्त हो। लाटू महाराज वहां पर ध्यान कर रहे थे। उनको उठाकर के मां के पास में ले गए। कहा कि मां को रोटी बेलने के लिए आटा बनाने के लिए तुमको सहाय करनी है। फिर राजा महाराज राखाल स्वामी ब्रह्मानंद जब दक्षिणेश्वर में आए थे तो ठाकुर ही उनको लेकर के मां के पास में लेकर आए थे उनके आशीर्वाद दिलवाने के लिए। राजा महाराज की पत्नी जब दक्षिणेश्वर आई तो उसको भी ठाकुर ने मां के पास भेज दिया था। कहा कि पैसा देकर के इसका चेहरा देखें। घूंघट से तो चेहरा ढका हुआ है तो पैसा देकर के घूंघट खोल के चेहरे का दर्शन करना है। ऐसी जो प्रथा थी वहां पर उस समय की उसके बाद में गोपाल दादा बूढ़ो गोपाल भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद जी वह मां के लिए सब मार्केट में से बाजार में से कुछ परचेस करना है तो वह सब परचेस कर देते थे। योगिन महाराज है। योगिन महाराज उनको विभिन्न कार्यों में सहायता करते थे। योगानंद जी महाराज पूर्ण था। पूर्ण जब दक्षिणेश्वर आया था तो ठाकुर उसको मां के पास में ले गए थे। कहा कि जिस तरह से बाल गोपाल की यशोदा मैया सेवा करती थी वैसे ही इसकी सेवा करो। तो मां ने उसको माला पहना करके चंदन से लिप्त करके बड़े ही सुंदर रूप से उसको भोजन करवाया। ठाकुर वहीं पर नहबत के सामने खड़े रहकर के ही मां को कहते हैं, इंस्ट्रक्शन देते हैं कि इस इस तरह से तुम करो सेवा। तो और फिर उससे भी उनको संतुष्टि नहीं होती है। अपने कमरे की ओर जा रहे हैं। आधे रास्ते से वापस आकर के फिर से नहबत के सामने आकर के मां को फिर से नईनई इंस्ट्रक्शन देते हैं। देखिए कि मां का मातृभाव पूर्ण का एक बाल गोपाल भाव और ठाकुर का एक जो एक अधीर्य अधैर्य ठाकुर में था। छोटे बच्चे की तरह छोटा बच्चा कैसा अधीर हो जाता है। जब उसको मां का दर्शन नहीं होता या तो फिर मां से कोई खिलौना चाहिए और मां उसको अटेंशन नहीं देती है तो बच्चा कैसे अधीर हो जाता है। तो वैसे ही ठाकुर का भी अधीर भाव था। तो आधे रास्ते में गए हैं अपने कमरे की ओर फिर से आ रहे हैं नबत के सामने फिर से दे रहे हैं इंस्ट्रक्शन। तो यह सुमधुर यह भाव लीला ये लीला अवतार की नारायण और नारायणी की अवतार और शक्ति की यह लीला हम इसका पाठ कर रहे थे। अभी आगे गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं? भक्तों दे प्रति श्री माय
ठाकुर की आध्यात्मिक शक्ति उनके भाव, समाधि और दर्शन में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती थी; लेकिन माँ की शक्ति पूरी तरह अदृश्य रहकर कार्य करती थी
आत्मीयता बोध जागानो और जन ठाकुर बहु भावे सचेष्टो छिलेन भक्तों के प्रति मां का एक आत्मीय भाव मां का एक मातृभाव जागृत हो इसके लिए ठाकुर बहुत विभिन्न रूप से सचेष्ट थे बहुत सारी चेष्टाएं किया करते थे विभिन्न रूप से इस तरह की परिस्थिति खड़ी करते थे जिससे कि भक्तों के मन में ठाकुर के साथ-साथ में ही मां के प्रति भी भक्ति का उद्रेख हो, जागरण हो। देखिए यह कभी-कभी क्योंकि क्या है कि और ठाकुर को ऐसा क्यों कॉन्शियसली करना पड़ता था? क्योंकि ठाकुर की जो आध्यात्मिक उपलब्धि थी, ठाकुर की यह जो शक्ति थी, वह इतनी प्रभावशाली थी, इतने लोग इजीली आकर्षित हो जाते थे। एक तो ठाकुर की विध्वता। दूसरा कि ठाकुर बार-बार भाव समाधि में चले जाते हैं। तीसरा कि ठाकुर लोगों के हृदय मन में क्या चल रहा है? फट करके पकड़ लेते थे। व्यक्ति का चरित्र का आकलन कैसे करना है, असेसमेंट कैसे करना है, वह सब उनको क्षण भर में पता चल जाता था। तीसरा जो और एक है कि ठाकुर पर श्रद्धा रखने से यह जो पाप, ताप, शोक, संताप यह सब जैसे कि दूर हो जाता था भक्तों का। बोलकर के ठाकुर पर भक्ति करना बड़ा आसान था। किंतु मां कौन थी? मां तो वही एक छोटे से नौबत में रहती है। वही ठाकुर के लिए खाना बनाती है। ठाकुर को खाना खिलाने के लिए आती है। वही जो स्त्री भक्त आते हैं वहां पे उनको रहने के लिए उनकी सब तरह की सुविधा हो नहबत में यह सब करने के लिए वह सचेष्ट रहती थी। मां के पास जाएंगे तो ना ही आपको भाव समाधि दर्शन दिखेगा। ना ही ऐसा कोई आपको आध्यात्मिक जैसे कि ठाकुर की एक प्रचंड ज्ञान गंगा ठाकुर में से जो बह रही थी ऐसा भी मां के भीतर नहीं दिखेगा। ठाकुर स्पर्श करके लोगों को आध्यात्मिक अनुभूति करवा देते थे। ऐसा भी मां में नहीं दिखेगा। तो नेचुरली है कि कुछ-कुछ लोगों के मन में तो यह संदेह रहेगा ही कि क्यों हम मां के पास में जाएंगे। क्यों मां के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई चेष्टा करेंगे?
लज्जापटावृत्ता माँ सारदा: मौन में छिपी दिव्य शक्ति की कहानियाँ
गोलाप मां जैसी गोलाप मां जो कि मां का इतना संग किया उनके मन में भी कभी-कभी योगिन मां और गोलाप मां यह दो मां की जया विजया मां के सबसे घनिष्ठ रूप से उनके साथ में एसोसिएट रही है। बिल्कुल प्राथमिक अवस्था से। उस समय भी उनके मन में भी कभी-कभी यह संदेह प्रकट हो जाता। यह योगिन मां की तो जग प्रसिद्ध घटना है कि मां के ऊपर में एक बार संदेह हुआ कि ठाकुर तो इतने त्यागीश्वर है। मां अपने परिवार जनों से घिर करके रहती है। राधु का आकर्षण इतना है। राधु के मोह में फंसी हुई है। तो मां और ठाकुर में यह कंट्रास्ट क्यों है? ऐसा सोचते-सचते जब योगिन मां गंगा में स्नान करने के लिए गई। यह उद्बोधन की के वही उसी समय की घटना है। तो पास में ही गंगा है। गंगा में स्नान करने के लिए गई तो देखा कि उस समय एक छोटा सा शिशु संतान अभी उसका प्रसव हुआ है और प्रसव के समय उसका मृत्यु भी हो गया है। तो किसी ने उसको गंगा में फेंक दिया होगा। तो वह गंगा में बहता हुआ जा रहा है। तो जैसे ही यह योगिन मां ने यह दृश्य देखा साथ-साथ में ही ठाकुर प्रकट होकर के योगिन मां को कहते हैं कि देखो जिस तरह से गंगा में इस तरह के मृत देह कितने ही बहते जाते हो गंगा कभी भी अपवित्र नहीं होती। इसी तरह से मां के आसपास में तुम संसारिक कितनी भी लीलाएं देखो समझना कि मां स्वयं संसार से कभी भी लिप्त नहीं होती। तो यह दृश्य जैसे और ठाकुर को स्वयं को आना पड़ा उनको उपदेश देने के लिए तो योगिन मां तो थोड़ी घबरा गई। वह इमीडिएटली वापस गए उद्बोधन में जाकर के सीधा मां को प्रणाम किया और बड़े ही अनुताप के स्वर में पश्चाताप के स्वर में मां को निवेदन किया कि मां मेरा अपराध क्षमा कर दीजिए। अभी मां को पूछने की जरूरत नहीं है कौन सा अपराध? उन्होंने हंसते-हंसते कहा अच्छा ठीक है। योगेन योगेन ऐसा करके उनकी पीठ पर थोड़ा सा हाथ फहराया अपना। यही गोलापमा गोलापमा एक बार एक दिन की घटना है उद्बोधन की कि यह जो सब लड़के हैं ना सब तो साधु सन्यासी तो सब यंग है फिर उनका दर्शन करने के लिए इतने डिवोटी भी आते हैं तो मां रहती है उद्बोधन में फर्स्ट फ्लोर पे और ग्राउंड फ्लोर पर यह सब साधु सन्यासी और उद्बोधन का कार्य वो काज कर्म सब चल रहा है वो किताब पब्लिश करने का शरद महाराज तो ऊपर में से है रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी तो कितना सब हल्लागुल्ला हल्लागुल्ला वो चल रहा है ग्राउंड फ्लोर पे और यहां पे मां ऊपर फर्स्ट फ्लोर में बैठी हुई है तो अभी हल्लागुल्ला जो चल रहा था वो सहन नहीं करने की वजह से गोलापमा जाकर के मां को कंप्लेन करती है कि परमहंस महाशय तो ये लड़कों को किस तरह से शासन में रखते थे किस तरह से डिसिप्लिन में रखते थे थोड़ा बहुत हल्लागुल्ला होने से इसको यहां पर साधना करने के लिए भेज देंगे पंचवटी के पंचवटी में किसी को बेलतला साधना करने के लिए भेज देंगे। किसी को चांदनी में जप करने के लिए भेज देंगे। कथामृत में इनफ कहानियां है। वो मास्टर महाशय और यह नरेंद्र यह दोनों वार्तालाप कर रहे हैं। वो नरेंद्र कहता है मास्टर महाशय को कि आजकल के लड़कों का चरित्र बड़ा बिगड़ता जा रहा है। तो मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा मैंने तो ऐसा कोई ध्यान नहीं दिया। मेरी दृष्टि में से तो ऐसा कुछ आया नहीं है। तो नरेंद्र कहता है कि आप जो है आप बड़े ही इंट्रोवर्ट है। आपको पता नहीं होगा कि आपके समय में भी यह सब होता था। जब आप स्टूडेंट थे तब भी यह सब होता था। तो ऐसा करके और फिर नरेंद्र कहता है कि ये लड़कों के ये जो अभिभावक है जो उनके गार्डियंस जो है पेरेंट्स वगैरह वो इस बात पर ध्यान दें तो अच्छा रहेगा। तो ये सब वार्तालाप चल रहा है। ठाकुर आकर के खड़े हो गए। में थोड़ी देर तो उन्होंने सुना और फिर उन्होंने बड़े ही गंभीर होकर के मास्टर महाशय को ही डांट दिया। देखिए वह स्टार्ट किया है वार्तालाप नरेंद्र को किंतु डांट पड़ रही है मास्टर महाशय को। ठाकुर कहते हैं कि ये तो बच्चा है नरेंद्र उसको तो समझ में नहीं आता। तुम तो बड़े हुए हो। तुमको यहां पर इस पवित्र वातावरण में इस तरह की वार्ता वार्तालाप या तो बातचीत प्रारंभ करना तुम्हारे लिए उचित नहीं था। तो मास्टर अप्रस्तुत हो गए। शर्मिंदा हो गए। वो नरेंद्र चुपचाप खड़ा रह गया। उसको समझ में आ गया। जैसे वो ठाकुर कहते हैं ना कि घर में नई बहू आई है और अभी बहू को कुछ कहना है डांटना है सास को तो सास बहू को नहीं डांट करके अपनी लड़की को डांटेगी। अभी बहू को समझ जाना है कि अपनी लड़की को जो सास जो डांट रही है उस वो किस कारण से डांट रही है वही वो डांट उसको पड़ने वाली थी उसको नहीं करके वो लड़की के माध्यम से उसको समझा रही है सास कि तुमको इस तरह का कार्य करना है इस तरह का नहीं करना है तो यहां पे भी डांट पड़नी चाहिए थी नरेंद्र को उसकी बजाय पड़ गई मास्टर महाशय को तो यह सब घटनावली एक्चुअली यह यह तो एटलीस्ट लिपिबद्ध है लिखित है ऐसा तो कितना इतना सब दक्षिणेश्वर में चलता था। ठाकुर बड़े स्ट्रिक्ट थे कि किसको कौन सा वार्तालाप करना है। ठाकुर का ईश्वर का वार्तालाप साधन भजन को छोड़कर के और कोई उलटपुलट बात वहां पर नहीं होनी चाहिए। ठाकुर खुद उलटपुलट बात करते हैं तो ठीक है। वो जो नाचने वाली जो औरतें होती है किस तरह के वो अंग करके वो कस्टमर का मन लुभाती है। वह सब अभिनय करके ठाकुर उनको दिखाएंगे। और यह लड़के हंसते-हंसते लोटपोट भी हो जाएंगे तो वह चलेगा। ठाकुर उलटपुलट बातें करेंगे तो चलेगा। किंतु इन लोगों को आपस में इस तरह की बातें नहीं करनी है। तो क्या है कि गोलाप मां ने यह सब देखा था दक्षिणेश्वर में तो मां को कह रही है कि ये मैंने तो ठाकुर को देखा है कि लड़कों को किस तरह से अनुशासन में रखते थे। किस तरह से डिसिप्लिन में रखते थे। और तुम्हारा तो अपने लड़कों पर कोई डिसिप्लिन ही नहीं है। देखो यह ग्राउंड फ्लोर पर क्या हो रहा है। इतना हल्लागुल्ला हो रहा है। तुम बोलती भी नहीं हो इनको कुछ। तो फिर मां ने क्या उत्तर दिया कि देखो गोला मैं तो किसी का दोष देख ही नहीं पाती हूं। जो भी है सब मेरे लिए संतान के समान ही है। तो देखिए कि इवन यह योगेन मां गोलापमा इनका भी मन में यह संदेह कभी-कभी हो जाता था कि कहां हमने ठाकुर की आध्यात्मिक ऐश्वर्य देखा है ठाकुर का। यहां पर मां का तो कोई आध्यात्मिक ऐश्वर्य दिखता ही नहीं है। मां और ठाकुर का रियलाइजेशन शायद इक्वल होगा। किंतु यह रियलाइजेशन का जो बाह्य प्रकाश है मैनिफेस्टेशन जो है वो ठाकुर में जो दिखता था इतना तो मां में दिखता नहीं है। तो बोलकर के बहुत सारे लोगों के मन में यह संदेह भी होता कि यह काम मां ठाकुर की यह जो उत्तराधिकारिणी होने के लायक भी है कि नहीं। ठाकुर ने जब महासमाधि ग्रहण की उसके बाद में नरन में फिर भी हमको स्पार्क दिखाई दे रहा है। नरन में फिर भी हमको वो आध्यात्मिक बाह्य प्रकाश मैनिफेस्टेशन दिखाई दे रहा है। शक्ति दिखाई दे रही है। मां में तो ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता। तो किंतु देखिए
कहानी: कैसे एक त्यागी युवक का माँ सारदा पर अटूट विश्वास बना
बड़ी सुंदर घटना है। अपने ही संघ के एक विद्वान सन्यासी मैं नाम भूल जा रहा हूं उनका। वो मां के पास में दीक्षा लेने के लिए उन्होंने ठीक किया था। यह वही उद्बोधन के दिनों की ही घटना है। ठाकुर की भी महासमाधि के बाद की और स्वामी जी की भी महासमाधि के बाद की। तो अभी यह लड़का जो कि भविष्य में रामकृष्ण संघ में जॉइ करने वाला था। बड़ा ही विद्वान बड़ा ही तेजस्वी और अपने गांव गया। गांव जाकर के उनके यह जो उस समय तो यह कुल गुरु प्रथा थी ना कि प्रत्येक जो अच्छा घर होता है उनमें एक कुल गुरु होते हैं। अर्थात एक ट्रेडिशनल परंपरागत गुरु उनके होते हैं। तो घर में कोई भी उत्सव होता है, शोक का प्रसंग होता है तो कुलगुरु आकर के सांत्वना देंगे, विधि विधान करवाएंगे और दक्षिणा पाएंगे। तो इस तरह से कुलगुरु प्रथा थी। अभी गांव का ब्राह्मण है बेचारा। उसने तो पढ़ाई लिखाई इतना कुछ किया नहीं है। और बहुत बार ऐसा होता था ना कि इस तरह के ब्राह्मण लोगों की दृष्टि भी बड़ी संकुचित होती थी। बड़े ही नैरो माइंडेड होते थे। तो अभी यह लड़का भविष्य का साधु उसको तो यह सब पता था। स्वामी जी को पढ़ा था। एक लिबरल आउटलुक था। मां के पास में दीक्षा लेना है। यह ठीक कर लिया था। अर्थात कि मां की आध्यात्मिक शक्ति के बारे में वो वाकिफ था। और वि इज वेरी रेयर। कम ही लोगों को पता था कि मां की आध्यात्मिक शक्ति कितनी है। बहुत सारे लोग राजा महाराज के पास में दीक्षा लेना प्रेफर करते थे क्योंकि राजा महाराज के बारे में यह सब है कि ठाकुर के मानस पुत्र है। इतनी तपस्या की है। फिर तो एक पोजीशन का भी एक प्रेस्टीज है ना। रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट थे। संघ गुरु थे। तो वह भी एक प्रेस्टीज रहता है। तो राजा महाराज के पास में दीक्षा लेंगे। ऐसा था कि तो मां के पास में दीक्षा लेना कम ही भक्तों के मन में था। तो यह लड़के ने यहां तक ठीक कर लिया था। अर्थात कि वो यहां तक तो पहुंच गया था। अपनी आध्यात्मिक जर्नी में स्वामी जी का लिबरलिज्म भी था। मां के प्रति श्रद्धा भी थी। किंतु मन में एक संदेह रह गया था कि मां के पास में दीक्षा ले कि ना ले। संदेह एक तो था तो गया गांव में। गांव में जाकर के कुल गुरु से मिला। वही वह अनपढ़ ब्राह्मण गांव का तो मिलकर के कहता है कि देखिए महाशय पंडित महाशय मैंने ठीक किया है कि मां शारदा देवी से मुझे दीक्षा लेनी है। अभी जनरली कैसा होता है? कुल गुरु के पास में दीक्षा लेने की प्रथा थी। तो यह प्रथा को मन में रखकर के इस युवा लड़के ने पूछा कि आप अनुमति दें तो मैं मां से दीक्षा लूं। तो यह पंडित जी बड़े खुश हो गए। कहते हैं कि हां मैं तुमको बड़े आशीर्वाद पूर्वक तुमको यह अनुमति देता हूं कि तुम जाओ मां शारदा के पास में दीक्षा लो। अभी यह लड़के के मन में जो संदेह अब पहले तो उसको थोड़ा आश्चर्य हुआ कि ये नैरो नैरो माइंडेड यह सब ब्राह्मण होते हैं। उनकी तो यह चली जाएगी ना यह दक्षिणा चली जाएगी। यदि आप गुरु बनते हैं किसी के और यह लड़का तो पढ़ाई लिखाई करता है। अच्छे घर का है तो यानी उसका करियर तो अच्छा होने वाला है। इस तरह के लड़के को दीक्षा देंगे तो भविष्य में दक्षिणा भी अच्छे से मिलती रहेगी। तो सामने से यह दक्षिणा को लेट गो वो करके आशीर्वाद पूर्वक अनुमति देता है। तो लड़के को थोड़ा आश्चर्य हुआ। तो उसने सोचा अभी मन का जो संदेह है इस पंडित जी को बता ही देते हैं। तो यह लड़का पूछता है कि देखिए मेरे मन में किंतु एक संदेह है। आपने अनुमति दी मुझे अच्छा लगा कि मेरे मन में किंतु एक संदेह अभी भी है कि ठाकुर के बारे में तो मैंने इतना सब कुछ पढ़ा है। ठाकुर की आध्यात्मिक उपलब्धि स्पर्श मात्र से आध्यात्मिक अनुभूति करवा देना यह कल्पतरु दिन की घटना ठाकुर की साधनाओं का विवरण लीला प्रसंग वगैरह में सब कुछ काफी अच्छे से पब्लिश हो चुका है और मैंने पढ़ा भी है और ठाकुर अवतार थे इस बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है। किंतु यह ठाकुर की जो सहधर्मिणी है इनके बारे में तो ऐसा कुछ लिखा नहीं गया है। इनके बारे में ऐसी कोई किताब पब्लिश नहीं हुई है। इनके बारे में ऐसे कोई आर्टिकल प्रवचन नहीं हुए। साधु लोग जो है मां के बारे में कम ही बोलते थे। बड़े ही जो कि अंतरंग भक्त होते हैं घनिष्ठ भक्त उन्हीं के सामने मां की बातें चलती थी। ऐसे पब्लिक में मां के बारे में नहीं बोला जाता था। तो यह लड़का पूछता है अपने कुल गुरु को कि मुझे मां पे थोड़ा संदेह है। दीक्षा लेना ठीक तो किया है। किंतु संदेह है तो मैं क्या करूं? तो यह कुलगुरु कहते हैं कि देखो भाई तुम तो यूनिवर्सिटी में पढ़ाई लिखाई किए हुए बड़े ही विद्वान लड़के हो और मैं समझ सकता हूं कि तुमने किताब वगैरह पढ़ा है ठाकुर के बारे में तो ठाकुर पर तो तुम्हारी श्रद्धा हुई है। रामकृष्ण संघ पर तो तुम्हारी निष्ठा हुई है और मां के ऊपर में संदेह है। यह मैं समझ सकता हूं कि मां के बारे में किताब में कुछ नहीं लिखा गया। किंतु देखो भाई तुम यदि मेरी बात मानो तो यह बात समझना कि यदि ठाकुर अवतार है तो ठाकुर की सहधर्मिणी कोई सामान्य गांव की स्त्री नहीं हो सकती। वो नारायणी स्वयं है। जगदंबा स्वयं है। जगत जननी स्वयं यह पंचमहाभूत का देह धारण करके ठाकुर के साथ में लीला करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। तो ये पंडित महाशय ने जैसे ही ऐसा कहा लड़का बड़ा ही आश्चर्यचकित हो गया। वो स्मृति कथा में लिखा है कि एक गांव का पंडित अनपढ़ गवार आदमी इस तरह से एक विधान दे सकता है जो कि मेरे जैसे विद्वान लड़के के मन में जो द्विधा थी वो एक क्षण में दूर कर दे। मैंने जो ठाकुर माने रामकृष्ण संघ में जॉइ करने का ठीक करके रखा था। अर्थात कि हृदय भी पवित्र था। बुद्धिमत्ता भी तेज थी और यह गवार गृहस्थ पंडित वो मेरी संदेह इस तरह से इतने सरल शब्दों से दूर कर दे यह सुनकर मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ और फिर ठीक किया कि हां अभी मां के ऊपर में कोई संदेह नहीं अभी तो दीक्षा लेनी तो देखिए कि यहां पे भी ठाकुर जो एक प्रयस प्रयास करते थे चेष्टा करते थे क्योंकि क्या है कि ठाकुर के पास में आने वाले कोई अनपढ़ गवार सरल हृदय वाले जिनको कि यह सब गढ़ आध्यात्मिक तत्व है। बिना किसी किताब पढ़े ही जो समझ में आता था जो भारत की यह जो धरती है भारत की ये जो धरा है ये हजारों हजारों सालों से ऋषि मुनियों ने आध्यात्मिकता का जो सिंचन किया है बोलकर के गांव का गवार से गवार आदमी भी आध्यात्मिक तत्वों को बड़ा ही सहज समझ सकता है। किंतु यह विश्वविद्यालय की यह वेस्टर्न एजुकेशन लेकर के हमारा मन जो गड़बड़ सड़बड़ हो गया है। यह जो सब जटिलताएं हमारे मन में प्रवेश कर गई है बोल कर के यह जो सहज आध्यात्मिक तत्व है वो समझना हमारे लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है और इसीलिए ठाकुर के पास में आते थे सब कोलकाता के यही सब विद्वान ये सब त्यागी संतान भी ऐसे थे यूनिवर्सिटी के दाना दत्ति स्वामी जी बोलते हैं कि वो जीसस के पास में तो वो गवार मछुआारे आए थे ठाकुर के पास में यह यूनिवर्सिटी के यह सब दत्य दत्य और दानव लड़के सब आए हैं। दैत्य और दानव क्यों? क्योंकि यह सब बुद्धिमत बुद्धिशाली तो बहुत है। कार्य करने की क्षमता भी बहुत है। और प्रश्न करने का संदेह संदेह करने के लिए प्रश्न करने की क्षमता भी बहुत है। तो क्या है कि दोनों तरह से है। यदि विश्वास हो गया तो पूरी पृथ्वी को हिला देंगे। अविश्वास रहा तो फिर क्या है कि संदेह बना ही रहेगा। बुद्धिमत्ता से लॉजिकली उसका सॉल्यूशन ठाकुर को देना ही पड़ेगा। तो इसलिए ठाकुर के पास में यह सब यूनिवर्सिटी के दाना दति ये दैत्य और दानव आते थे। उनको मां की महिमा का एक भान करवाना मां की महिमा का गुणगान श्रवण करवाना विश्वास करवाना यह कोई सहज कार्य नहीं था। और इसीलिए ठाकुर यह सब चेष्टाएं करने के लिए बड़े ही सचेष्ट थे।
ठाकुर ने माँ को आदेश दिया कि वे पैदल जाकर बीमार भक्त की कुशलक्षेम पूछें
भक्त बोर श्रीजुक्तो बलराम बसु महाशय शधर्मिणी कठिन अशुखेर समय ठाकुर श्री मां के बोलीले जाओ देखे यशोगे भक्तवर श्रीजुक्तो बलराम बसु महाशय की सह धर्मणी के कठिन असुख के समय ठाकुर ने श्री मां को कहा जाओ जाकर के देखकर के आओ श्री मां पल्लीग्रा में पोत चोलीते अभ्यस्त थाकिले ओ वर्तमान स्थले नगर भव्यता एवं श्री रामकृष्ण मर्यादा रखार चिंता मने उदितो होई बोली लेन जाबो की गाड़ी टाड़ी नहीं श्री मां पल्ली ग्राम में अर्थात कि वही देहात में रास्ते में चलने के लिए अभ्यस्त तो थी किंतु वर्तमान परिस्थिति में एक तो कलकथा है महानगर उसकी भव्यता और दूसरा है कि श्री रामकृष्ण की मर्यादा रक्षा की चिंता यह दोनों उनके मन में उदित हुआ और इसलिए उन्होंने कहा मैं कैसे जाऊं गाड़ी टाड़ी तो है नहीं अभी देखिए कि
कहानी: माँ सारदा ने अपार कष्ट सहकर भी अपने संतानों के लिए प्रेमपूर्वक भोजन बनाया
पहली बात तो है कि मां चलना नहीं जानती थी ऐसा कुछ नहीं है एक स्मृति कथा है शंकरानंद जी की ही हमारे प्रेसिडेंट राजा महाराज के सेक्रेटरी राजा महाराज के सेवक और रामकृष्ण संघ के उस समय के प्रेसिडेंट तो वह जब यंग थे जॉइ करने के लिए आए थे और वह और सुबोधानंद जी अपने खोका महाराज यह दोनों गए थे जयराम भाटी मां का दर्शन करने के लिए तो शंकरानंद जी यह अमूल्य महाराज उनका नाम तो वह स्मृति कथा में लिखते हैं कि मां को प्रणाम किया दर्शन किया सब कुछ हुआ फिर दूसरे दिन बड़ी अर्ली मॉर्निंग को 3:00 बजे के आसपास में उठकर के दामोदर नदी के किनारे शौच वगैरह करने के लिए गए रास्ते में देखा कि पास के गांव से दो स्त्रियां आ रही है। सुनिए दोपहर को सुबह को 3:00 बजे का समय है। तो पास के गांव से दो स्त्रियां जयराम बाटी लौट रही है। तो जैसे ही यह दोनों साधुओं को देखा तो एक स्त्री ने क्या किया और दोनों के सर पर यह बोझा है। वह बास्केट में कुछ चीजें रखी हुई है और दोनों आ रही है। अभी रास्ते में सामना सामना आमनासामनी हो गई। तो एक स्त्री ने क्या किया? अपना जो बोझा था जो बास्केट था सर के ऊपर में ले आ रही थी वो दूसरी स्त्री को दे दिया और उसके पीछे में जाकर के छुप के खड़ी रह गई तो अभी क्या है कि उस समय की ये जो मर्यादा वगैरह है पुरुष के सामने वो घूंघट टाना है चेहरा नहीं दिखाना है वगैरह-वगैरह तो उस समय तो ज्यादा कुछ सोच सोचा नहीं ये सुबोधनांद जी अमूल्य महाराज ने शंकरानंद जी ने आगे तो चल पड़े किंतु फिर मन में कुछ संदेह हुआ तो उन्होंने सुबोधानंद जी को पूछा पूछा खोका महाराज को कि अच्छा आपने वो जो स्त्री छुप गई थी उसका चेहरा देखा क्या? तो खोखा महाराज कहते हैं एकदम स्पष्ट रूप से चेहरा देखा वह और कोई नहीं हमारी ही श्री श्री मां इतनी अर्ली मॉर्निंग को मॉर्निंग कहां सुबह तो 3:00 बजे तो लौट रही है यानी कि गए कब होंगे रात को 2:00 बजे 1:00 बजे 12:00 बजे किसको पता आधी रात को दूसरे गांव में जाकर के हमारी सेवा के लिए जय राम भाटी छोटा सा गांव है यह सब्जी वब्जी वगैरह तो कुछ मिलेगा नहीं बच्चों को अच्छे से खिलाना है तो रात को दोपहर को म दुप रात बांग्ला ते बोला यानी मध्य रात्रि को दूसरे गांव जाकर के सब्जी वगैरह लेकर के सुबह को 3:00 बजे जय राम भाटी लौट रही है जिससे कि सुबह-सुबह से ही नाश्ता वगैरह की अच्छे से वो व्यवस्था कर पाए। यह बात सुनकर के शंकरानंद जी कहते हैं कि तो फिर यहां पे नहीं रहा जाएगा। हमारी वजह से मां को इतना कष्ट होता है तो हम यहां पर कैसे रहे? तो फिर तीन ही दिन में फिर यह लोग लौट आए थे। तो देखिए कि यह मां है कि आधी रात को दूसरे गांव जाकर के पैदल चलकर के अपने संतानों के लिए सब्जी लेकर के आना यह कोई बड़ी बात नहीं थी और यह तो उन दिनों की घटना है। ठाकुर की महासमाधि के बाद की घटना है। यह सब बेलूर मठ के स्थापन के बाद की बात है। यह तो मां की उम्र भी बड़ी हो गई थी उस समय। उस समय और यह त्यागी संतानों ने आना शुरू कर दिया था। उस समय की यह घटना है। मां यदि आधी रात को दूसरे गांव पैदल जाकर के अपने सर के ऊपर में बोझा वहन करके जय राम बाटी आ सकती है वापस तो उस समय वो तो माने देह तो उस समय स्ट्रांग था ठाकुर के रहते-रहते और उम्र भी कम थी। तो उस समय पैदल चलकर के बलराम बसु के घर जाना वो मां के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। किंतु क्या है कि एक तो बात है कि जिस तरह से मां अपने को दक्षिणेश्वर में ही लज्जा से पटावृत्त लज्जा पटावृत्त होकर के जो रहती थी लज्जा से अपने को ढक करके जो रखती थी। क्यों? क्योंकि ठाकुर ने वो एक बार वो ठाकुर और हृदय का वार्तालाप सुन लिया था। ठाकुर कहते हैं कि अरे हृदय यह तो देहात की लड़की है। वह कहां पर सोच जाएगी, क्या करेगी, कब क्या करेगी कोई ठीक नहीं। लोग देखेंगे तो फिर मुझे बातें करेंगे और मुझे नीचा देखना पड़ेगा। मेरे लिए एक एंबरेसमेंट खड़ा हो जाएगा। तो ऑलरेडी मां बड़ी सावचेती से रहती थी। सुबह को अर्ली मॉर्निंग को 3:00 बजे ऐसा ही गंगा के किनारे जाकर के शौच वगैरह कर लेती थी। एक दिन तो ऐसा हुआ कि मगरमच्छ पड़ा था। वहां पर गंगा के किनारे उसकी पीठ पर पैर पड़ गया था। तो ठाकुर की कृपा की कुछ हुआ नहीं। किंतु उसके बाद में फिर मां लटन लेकर के जाती थी गंगा किनारे। तो देखिए कि इतना सावचेती से मां क्यों रहती थी और फिर मां ने जब यह वार्तालाप सुना तो मां ने यह फिर मां काली को प्रार्थना भी की कि मां ठाकुर को तो जो तुम देखना चाहते हैं ठाकुर वह सब तुम दिखा देती हो। अभी ठाकुर के मुंह से यह शब्द जब निकले हैं कि मैंने तो उसको कभी नहबत के बाहर में जाते हुए देखा नहीं। इधर-उधर जाते हुए मैंने देखा नहीं। तो अभी ये उनके मुंह से जो शब्द निकले हैं वह तो फिर तुम अभी मैं नहबत से बाहर निकलती हूं और ठाकुर की नजर में आ जाऊं ऐसा तुम मत करना मेरी लाज की रक्षा करना तो क्या है कि एक सामाजिक परिस्थिति ठाकुर का भी यह जो एक था कि लज्जा पटावृता होकर के रहना है लक्ष्मी दीदी जो कि भक्तों के सामने कीर्तन वगैरह किया करती थी तो ठाकुर ने मां को कहा था और ताले ताल मिली और लय लय मिलाए तू ही तुम तो लज्जा भांगवे ना माने उसके ताल में ताल मिलाकर के तुम अपनी लज्जा मत तोड़ना मत भांगना तो यह ठाकुर का स्पष्ट उपदेश था तो वो लक्ष्मी के लिए वह सब ठीक है वो उसका स्वभाव है किंतु तुम्हारे लिए यह सब नहीं है तो ठाकुर ने स्पष्ट रूप से कहा था यह सब कुछ तो मां क्यों इस तरह से कहती है जब ठाकुर कहते हैं कि बलराम बसु की पत्नी बीमार है तुम जाकर के उसको देख के आओ तो मां इस तरह का ऑब्जेक्शन क्यों क्यों खड़ा करती है कि मैं किस तरह से जाऊं। गाड़ी वगैरह तो है नहीं। तो इसके पीछे में यह सब पूरा हिस्ट्री है। किंतु देखिए एक और तो ठाकुर मां को लज्जा पटावृत्ता होकर के रहने का उपदेश देते हैं। किंतु जब भक्तों की बारी जब आ जाती है। ठाकुर ने पहले ही ऑब्जर्व कर लिया था। मां का मातृत्व का इलाका जब प्रारंभ होता है, मातृत्व का राज्य जब प्रारंभ होता है, मां ठाकुर की बातों का फिर ठाकुर की जो स्पष्ट आदेश है, उसको भी नजरअंदाज करने के लिए तैयार हो जाती है। और उसके हमने बहुत सारे उदाहरण देखे हैं। तो यहां पे किंतु एक आखिरी जो ठाकुर का उपदेश था और मां का ये जो इनब बोन इनेट नेचर जो था कि वो लज्जाला थी तो लज्जाशीला मां जब भक्तों के साथ में भक्तों के साथ में वार्तालाप करेगी भक्तों को उपदेश देगी तो नेचुरली हमने मां के पूरे जीवन में देखा कि जब भी कोई पुरुष भक्त पहले पहले तो बहुत ही कड़ाकड़ी थी। बहुत ही स्ट्रिक्ट था सब यह योगेन महाराज का जब तक यह सब आयोजन था कि मां को खड़ा करके प्रणाम नहीं करना है। मां खड़ी है फिर मां चली जाएगी तो जिस मिट्टी पर मां के पैर पड़े थे उस मिट्टी को अपने सर पर धारण करना है। मां को स्वयं को स्पर्श नहीं करना ना ही मां की उपस्थिति में आपको प्रवेश करना है। तो मां की मां के सामने आपको प्रस्तुत होना है। ये तो बहुत सारे नियम थे। बाद में भी जब मां कमरे में बैठी है तो पुरुष भक्त है वह वहां पर कमरे की चौखाट जो होती है दरवाजे की वहां से ही मां को प्रणाम करेंगे और गुलाब मां थी वो मां की द्वारपाल तो वो उच्च स्वर से उनका तो चिल्लाने का वो था ना बड़ा आवाज था तो उच्च स्वर से मां को कहेगी कि अमुक बाबू आपको प्रणाम कर रहे हैं तो मां फिर बड़े ही मृदु स्वर से आशीर्वाद देगी तो फिर गोलाप मां उच्च स्वर से फिर से उस पुरुष भक्त को कहेंगे कि मां तुमको आशीर्वाद दे रही है। या तो फिर मां का यदि कोई प्रश्न होगा तो गुलाब मां उस पुरुष भक्त को कहेगी। पुरुष भक्त रिप्लाई देगा। मां गुलाब मां मां को बताएगी। जैसे कि वो इंटरप्रेटर होता है ना आपको इंग्लिश आती है। उसको हिंदी आती है। एक तो फिर एक इंटरप्रेटर को रखना है। इंग्लिश का हिंदी करेगा, हिंदी का इंग्लिश करेगा। तो यहां पे गोलाप मां भी ऐसा लाउडस्पीकर रूपी इंटरप्रेटर का कार्य करती थी। तो देखिए यह सब कड़ाकड़ी तो थी किंतु साथ-साथ में ही मां धीरे-धीरे करके यह जो त्यागी संतान है उनके प्रति एक तरह से वो स्वच्छंद से उनके साथ में मिलना वार्तालाप करना वह सब ऑलरेडी प्रारंभ कर दिया था। तो ये अपने गौरेश्वरानंद जी महाराज राममई महाराज
कहानी: स्वामी सारदानन्द की माँ सारदा के प्रति अपार भक्ति
शरद महाराज दक्षिणेश जय राम भाटी जाते हैं मां का दर्शन करने के लिए कुछ काम के लिए मां ने बुलाया था तो वह सब काम तो समाप्त हो गया अभी शरद महाराज वहां पर है तो नियम ऐसा कि शरद महाराज ने पहले तो राममामई महाराज को देख लिया बच्चा है सहजता से मां के पास में आना जाना कर सकता है मां जिस कमरे में बैठी है मां रोटी बना रही है सब्जी बना रही है, पूजा कर रही है। तो उस समय तो घुमटा टाना नहीं होता है। तो यह राममामई महाराज फटाक करके मां के पास जाकर के वार्तालाप करते हैं। मां ने जो कार्य बताया है वह कार्य करते हैं। पास में बैठते हैं। तो शरद महाराज ने पहले तो सब कुछ ऑब्जर्व कर लिया कि मां के पास में स्वच्छंद से यह लड़का जा सकता है। फिर उसको बुलाया राममई को। राम महाराज को बुलाकर के कहा देखो मेरा एक काम करना है किंतु जो भी मैं कहूंगा ठीक ठीक उसी तरह से करना अपनी बुद्धि मत चलाना तो रामई महाराज पूछते हैं अच्छा ठीक है क्या करना है तो शरद महाराज कहते हैं पहले तो मां को ऑब्जर्व करना स्पाई की तरह स्पाइंग करने को सिखाते हैं मां को ऑब्जर्व करना फिर मां का पूरा काम जब समाप्त हो गया है मां जब शांति से बैठी है तो उस समय आकर के मुझे यह न्यूज़ दे देना कि मां का काम समाप्त हो गया है अभी मां विश्राम कर रही है या तो शांति से बैठी है। उस समय मैं जब तुमको कहूंगा तुम जाकर के मां के पास में जाकर के विनती करके कहना कि शरद महाराज प्रणाम करने के लिए आना चाहते हैं तो वह आए कि नहीं और फिर मां यदि हां कहती है तो आकर के मुझे समाचार देना मैं जाकर के प्रणाम करूंगा। तो राममाई महाराज कहते हैं अच्छा ठीक है। तो राममामई महाराज भी पूरा स्पाइंग करते हैं मां के ऊपर में। मां कब विश्राम कर रही है? कब शांति से बैठी है? कब मां का कार्य समाप्त हो गया है? उस समय जाकर के शरद महाराज को खबर देंगे। शरद महाराज के जैसे ही कहेंगे जाओ परमिशन ले आओ तो मां के पास जाएंगे परमिशन लेंगे। शरद महाराज को फिर से आकर के खबर देंगे। तो फिर शरद महाराज वो तो स्थूलकाई गणेश की तरह है ना तो धीरे से उठेंगे और फिर वो चलते धीरे से चलते चलते वो मां के कमरे में जाएंगे। अभी वह क्या गांव के लोग तो बेचारे दुबले पतले होते हैं। तो शरद महाराज शहर के थे तो कमरे का दरवाजा भी इतना छोटा कि सीधा प्रवेश नहीं कर पाएंगे। तो टेढ़े होकर के कमरे में प्रवेश करेंगे। जय राम बाटी का दर्शन करने का सद्भाग्य हुआ होगा। तो मां की वह कुटिया देखी होगी। तो कुटिया के भीतर में मां बैठी है। तो वह टेढ़े होकर के वो दरवाजे में से प्रवेश करके शरद महाराज मां को प्रणाम करेंगे और फिर मां घुमटा टाने हुए हैं। तो प्रणाम करके कहेंगे बड़े ही मृदु स्वर से बड़े ही विनम्रता पूर्वक कि मां आप कैसी है? तो मां कहेगी बेटा मैं ठीक हूं। तुम कैसे हो? तो शरद महाराज कहेंगे मां मैं भी ठीक हूं। बस इतना ही वार्तालाप फिर बड़े ही धीरे-धीरे मेहनत करके शरद महाराज खड़े होंगे। किसी टेढ़ा होकर के दरवाजे में से बाहर निकलेंगे और फिर जहां पर वो बाहर के कमरे में यह लोग रह रहे थे वहां पर जाकर बैठेंगे और पसीना पोछेंगे। जैसे कि वह जगत जननी के सामने जाना और जगत जननी की तपस्या आध्यात्मिकता का जो ताप होता है वो जैसे सहन नहीं होता है दो-ती मिनट की ये जो दर्शन है उसमें तो जैसे कि उनको पसीना हो जाता है वापस अपने कमरे में आकर के तो ऐसा उनका परिस्थिति तो राम महाराज लिखते हैं कि इतना सा उन दोनों का संपर्क में किंतु यह जो एक दो मिनट का उनका जो यह दर्शन था वह देखकर के हम लोग अभिभूत हो जाते थे। तो यहां पर क्या है देखिए कि मां धीरे-धीरे करके यह राममई वगैरह जो त्यागी संतान है उनको अपने पास में स्वच्छंद से बुलाती थी अपने पास में रखती थी तो यह जो शुरुआत के दिनों की बात है अभी भी माने जहां तक सत्य वचन का पालन करना है और या तो फिर इस तरह के लोग जिनका चरित्र अच्छा नहीं है वह ठाकुर की सेवा करना चाहते हैं। यह सब चीजों में तो मां ने ठाकुर की आज्ञा का भंग करना शुरू कर ही दिया था। किंतु यह लज्जा जो थी एक आखिरी एक पाश बचा हुआ था कि वह पाश शायद मां का यह जो गुरुत्व प्रारंभ होगा यह गुरुत्व शक्ति का प्रकाश जब होगा तो लज्जा शायद उनको उसमें थोड़ी सी बाधा डाले। तो ठाकुर आखिर में यह पाश भी तोड़ देना चाहते थे। इसलिए ठाकुर ने क्या पहले जब मां ने कहा मैं कैसे जाऊं गाड़ी टाड़ी तो है नहीं तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया आार बलरामर संसार भष जा छे यार तुम ही जाबे ना हटे जाओ हटे जाओ मेरे बलराम का संसार बहता जा रहा है पत्नी का मृत्यु पत्नी की इतनी बीमारी तो संसार में तो कष्ट कठिनाई होगा ही होगा तो ठाकुर कहते हैं मेरे बलराम का संसार बहता जा रहा है और तुम जाओगी नहीं पैदल जाओ पैदल जाओ। ऐसा स्पष्ट रूप से ठाकुर ने कहा। देखिए कि यह एक आखिरी लज्जा की जो बात थी कि शहर में रास्ते में चलना मां के लिए कितना कठिन हो सकता है। शारीरिक दृष्टि से नहीं इस अर्थ में कि पैदल चलना है, लंबा रास्ता है तो कष्ट होगा। उस दृष्टि से नहीं। मां का जो स्वभाव था उस स्वभाव की वजह से तो वह आखिरी पाश तोड़ने के लिए ठाकुर ने कहा पैदल जाओ चलकर के जाओ कोलकाता के रास्ते में चलकर के बलराम के पत्नी है उसकी खबर लेकर के आओ तो यह स्पष्ट आदेश ठाकुर ने मां को दिया था गुरु शक्ति का जब आविर्भाव होगा जब मैनिफेस्टेशन होगा उस समय मां जैसे कि यह जितने भी पाश है सब काट करके भक्तों को आशीर्वाद दे। भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति का संचार करें, दीक्षा दे। यह सब करने के लिए ठाकुर मां को तैयार कर रहे थे। किंतु ठाकुर की कृपा से हुआ क्या? शेष परजन तो श्री मां के आर हाटीते हो ना। आखिर में बात वही हुई कि मां को पैदल जाना नहीं पड़ा। एक खानी पालकी संगूहित तो होए तीन उहाते चोड़िया बलराम भवन गले एक खानी पालखी वह मिल गया तो उसमें बैठकर के मां बलराम भवन गई प्रसंगों क्रम में बोला जाए ते पारे जे श्याम पुकुरे थाका काले आर एक बार मां स्वतः प्रवृत्त होयाई पद ब्रजे बशुगहिणी के देखते गया छिले इसी बात के अनुसंधान में कह सकते हैं प्रसंग क्रम क्रम में कह सकते हैं कि जब ठाकुर श्याम पुकुर में अवस्थान कर रहे थे उस समय फिर से एक बार मां अपने से ही प्रवृत्त अपने से ही प्रेरित होकर के पैदल चलकर के बसु गृहिणी अर्थात बलराम बसु की पत्नी को मिलने के लिए गई थी। देखने के लिए गई थी। यानी कि एक बार तो मां इस तरह से कोलकाता के रास्ते पर चली थी। तो अब देखिए कि किस तरह से स्टेप बाय स्टेप ठाकुर मां को तैयार कर
मोटरगाड़ी में माँ सारदा
रहा है। यह जो कोलकाता के रास्ते पर जाना इसके रिलेटेड एक प्रसंग है। मां मोटर गाड़ी में बैठने से बड़ा डरती थी। उनको पसंद नहीं आता था। पता है हमको कि ठाकुर की स्वामी जी की महासमाधि के बाद में कोलकाता में यह गैस लाइट है। यह मोटर कार है वगैरह-वगैरह तो आना शुरू हो गया था। अभी हुआ ऐसा था कि एक बार मां इस तरह से कार में बैठकर के कहीं पर जा रही थी और पैदल वो पहिए के नीचे में एक कुत्ता आ गया तो कुत्ते का मृत्यु हो गया तो मां को बेचारी को बड़ा कष्ट हुआ था तो मां इस तरह से गाड़ी में कार में बैठती नहीं थी। अभी हुआ ऐसा कि एक बार एक भक्त के घर जाना हुआ। भक्त ने निमंत्रण किया है और खानेपीने का भी अच्छा आयोजन है और भक्त का घर होता है तो भक्ति भाव रहता है तो मां भी उनके साथ में आनंद से वार्तालाप कर रही है अभी किंतु जब उद्बोधन वापस आने का समय आया देखा कि बड़ी रात हो गई है तो अभी इस समय घोड़ागाड़ी वगैरह मिलना मुश्किल है। पैदल जाना मुश्किल है। किंतु ये कार वहां पर थी तो भक्त ने भी कहा और मां के साथ में जो सन्यासी सेवक जो आए थे उन्होंने भी कहा मां चलिए कार में चले जाते हैं आसानी से चले जाएंगे पैदल जाना घोड़ा गाड़ी की व्यवस्था करना यह सब मुश्किल हो जाएगा इस समय तो पहले तो मां बड़ी कतराती रही फिर आखिर में किंतु फिर से वो मोटर कार में बैठकर के उद्बोधन आई थी तो
कहानी: हास्यरसिक श्रीरामकृष्ण
भक्त दिग के मध्य राख्या रसिक ठाकुर की रूपे निजो जो कार्य साधन कर ते ताहार दुटी दृष्टांतो जैमन उपभोगो तेमनी आलोच विषय गंभीर व्यंजना पूर्ण अभी कभी-कभी क्या करते थे भक्तों को साथ में लेकर के किस तरह से अपना कार्य साधन करते थे उसके दो दृष्टांत जितने ही उपभोग्य है जितने ही मधुर है वैसे ही यह आलोच्य जो विषय है ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं गुरु गुरु दायित्व स्वीकार करने के लिए इस विषय पर गंभीर आलोकपात करते हैं। बड़ा ही गहरा प्रकाश डालते हैं। ठाकुर को ऐसा था कि कभी-कभी यह अब भक्तों को भक्तों के माध्यम से मां को कुछ कहेंगे या तो भक्तों को ऐसा कुछ कहे कि उनके मन में यह ज्ञान हो कि किस तरह से क्या है। तो इस तरह के दो एक दृष्टांत है। क्या है? श्रीजुक्ता गौरी मां तखन दक्षिणेश्वरे जाता आरंभो कोिया छे गौरी मां उस समय दक्षिणेश्वर में आना जाना प्रारंभ किया था कखनोबा श्री माय शहीद नबते बास कोरेन कभी-कभी वह मां के साथ में नबत में निवास करती थी एक दिन ठाकुर शेखा ने उपस्थित होया गौरी मां के कौतुक भरे जिज्ञासा कोले एक दिन ठाकुर वहां पर उपस्थित होकर के कौतुक के स्वर में थोड़ा सा विनोद के स्वर में गौरी मां को प्रश्न किया किया बोल तो गौर दासी तू काके बेश भो बाशीष बताओ तो गौर दासी तुम मुझ मुझे और मां दोनों में से किसको ज्यादा श्रद्धा करती हो किसको ज्यादा स्नेह प्रेम करती हो किसके ऊपर में तुम्हारी ज्यादा निष्ठा है अभी यह तो ऐसा हो गया कि ठाकुर स्वयं जब यह प्रश्न कर रहे हैं तो क्या उत्तर दे अभी इस प्रश्न का यदि यदि हमको यह प्रश्न हो जाए मुझे प्रश्न करेंगे तो मेरा उत्तर तो बड़ा स्पष्ट है। मां को ही मैं ज्यादा प्रेम मां के प्रति ही मेरा ज्यादा भक्ति है। श्रद्धा है। मां के प्रति संतान भाव है। किंतु देखिए यह मैं आपके सामने कह रहा हूं। ठाकुर स्वयं यदि आकर के यह प्रश्न करेंगे तो पता नहीं मैं इस प्रश्न का क्या उत्तर दे पाऊंगा। क्योंकि ठाकुर की भी तो आध्यात्मिक शक्ति है ना। उस शक्ति से मोहित करके ठाकुर अपने को ब्रेन वाश करके फिर प्रश्न करें तो फिर प्रश्न का उत्तर देना मुश्किल हो जाएगा। तो देखिए किंतु यह तो गौर मां है गौरी दासी है तो रंगमई गौरी मा सहज कथाए उत्तर ना दिया से भाबेर पूर्ति जन सुकंठे गान धरि लेन तो गौरी मां भी रंगमई है उन्होंने सहज बात में उत्तर ना देखकर के उसी भाव की पूर्ति के लिए अपने सुकंठ से सुललित स्वर से एक गान गाया राई होते तुम्ही बड़ो नो हे बांका बिहारी बांका का बंशीधारी लोकेर विपद होले डाके मधुसूदन बोले तोमार विपद होले पोरे बंशीते बोलो बंशीते बोलो राई किशोरी तुम राई से तो तुम बड़े नहीं हो हे बंकिम बंसीधारी राई अर्थात कि राधा राधा से तुम बंसीधारी बांके बंसीधारी तुम बड़े नहीं हो लोगों को जब विपद होती है तो तुमको मधुसूदन बोलकर के पुकारते हैं किंतु तुम जब विपद में आ जाते हो तो बासी के स्वरों से बोलते हो राई किशोरी। देखिए कितना सुंदर यह गीत है। हम लोग यदि मुसीबत में आ जाएंगे, हम लोग यदि तकलीफ में आ जाएंगे तो क्या करेंगे? भगवान को पुकारेंगे, भगवान कृष्ण को पुकारेंगे, भगवान राम को पुकारेंगे, भगवान शिव को पुकारेंगे, भगवान विष्णु को पुकारेंगे। किंतु कृष्ण स्वयं वह यदि विपद में आ जाते हैं तो बांसी के स्वरों से राई किशोरी का आलाप करते हैं। उनको पुकारते हैं। अर्थात कि देखिए कितने सुंदर रूप से यह गौरी मां कहती है कि हम लोगों के लिए आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत आप ठाकुर स्वयं है। किंतु आपकी आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत है मां शारदा। जगत जननी मां गानेर तात्पर्य जो सहज बोध गम्य इस गान का जो तात्पर्य है सहज रूप से ही समझ में आ सकता है। श्री मां लज्जाय गौरी मां और हाथ चापिया धरी लेन मां लज्जित होकर के गौरी मां का हाथ पकड़ कर के बैठी रही। इस अर्थ में कि कहां तुम ठाकुर के सामने मेरी प्रशंसा कर रही हो। किंतु ठाकुर ठाकुर हार मानिया हाशीते हाशिते चलिया गए ठाकुर खुद हार मान लिए और हंसते-हंसते वहां पर चले
कहानी: धर्म-संकट और उसका रंगरसमय समाधान
गए देखिए ये जब धर्म संकट आ जाता है तो बुद्धि बड़ी काम बुद्धि नहीं होने से मुश्किल हो जाएगा एक प्रसंग मैंने राजकोट में सुना था राजकोट के कुछ भक्त बेलूर मठ गए थे। अभी देखिए कि राजकोट में भूतेशानंद जी महाराज भी अध्यक्ष थे और अपने आत्मस्थानंद जी महाराज भी अध्यक्ष थे राजकोट में। अभी किंतु दोनों है बेलूर मठ में और मोस्ट प्रोबेबबली यह जिस समय की घटना है उस समय भूतेशानंद जी थे प्रेसिडेंट और आत्मस्थानंद जी थे जनरल सेक्रेटरी। किंतु देखिए कि भूतेशानंद जी थे बड़े नम्र स्वभाव के बड़े ही सॉफ्ट उनका नेचर था। जबकि आत्मस्थानंद जी थे बड़े ही अग्रेसिव थे उनका नेचर बड़े ही क्रोध में भी बड़े इजीली आ जाते थे। तो अभी यह कुछ भक्त गए वहां पर बेलूर मठ और प्रणाम किया तो हुआ योगानु योग ऐसा हुआ कि भूतेशानंद जी और आत्मस्थानंद जी पासपास में ही बैठे थे तो राजकोट के भक्त आकर के प्रणाम कर रहे हैं तो आत्मस्थानंद जी को ऐसा कुछ रंग रस करने का कुछ मन में आया तो उन्होंने राजकोट के भक्तों को पूछा कि अच्छा बताइए तो हम दोनों तो गुजरात में रहे हैं हम दोनों ने गुजराती सीखा है बताओ तो हम दोनों में से किसका गुजराती अच्छा है अभी भक्त आ गए धर्म संकट में अभी ऑफिशियली भूतेशानंद जी प्रेसिडेंट है सीनियर है और किंतु भूतेशानंद जी थे बड़े सॉफ्ट नेचर के और आत्मस्थानंद जी हालांकि तो है जूनियर किंतु थे बड़ा ही अग्रेसिव नेचर अभी किसके बारे में कहे यदि ऐसा कहे कि भूतेशानंद जी का गुजराती अच्छा है सीनियर होने की वजह से जो उनको प्रोटोकॉल रिस्पेक्ट देना चाहिए तो आत्मस्थानंद जी नाराज हो जाएंगे अभी आत्मस्थानंद जी को कहा कि आपका गुजराती अच्छा है तो भुतेशानंद जी नाराज तो नहीं होंगे किंतु फिर ये प्रोटोकॉल का भंग हो गया कि वो प्रेसिडेंट है और प्रेसिडेंट से ज्यादा सम्मान आपने जनरल सेक्रेटरी को दे दिया तो ये भक्त भी बड़े होशियार थे। कहा क्या पता है कि महाराज आत्मस्थानंद जी को उत्तर देते हैं कि महाराज जी आपका गुजराती है ना हमारे ही जैसा है। गुजराती में कहते हैं तो आत्मस्थानंद जी बड़े खुश हो गए कि देखिए कहते हैं कि मेरा गुजराती अच्छा है। किंतु भक्त दूसरे ही सेंटेंस में कहता है कि भूतेशानंद जी का गुजराती हमारे से भी अच्छा है। यानी कि देखिए कि किस तरह से बुद्धि लगा के आत्मस्थानंद जी को पहले एक ठंडा कर दिया और फिर भूतेशानंद जी को जो प्रोटोकॉल देना है वो भी दे दिया। तो देखिए इस तरह से धर्म संकट आने से यह बुद्धि काम करती है और यह सब क्या है पता है इस तरह की परिस्थिति में आने से हमारी भी एक कसौटी हो जाती है कि हमारी आध्यात्मिक शक्ति कहां तक जाती है क्योंकि इतने बड़े लोगों के सामने इस तरह का उत्तर देना वो कोई आम आदमी का कार्य नहीं होता है मेरे जैसा कोई होगा तो मैं तो बेचारा डर के मारे मेरी वाणी ही बंद हो जाती अवाखी में हो जाता किंतु इन लोगों ने जो उत्तर दिया वह दर्शाता है कि क्या है साधना की है। साधना करके कुछ अनुभूति भी प्राप्त हुई है। तो अनुभूति प्राप्त होने की वजह से यह हाजर जवाबी जिसको कहते हैं प्रेजेंस ऑफ माइंड यह भी एक उन लोगों के भीतर में प्रकट हुआ है। तो यहां पर जब गौरी मां ने कहा कि राई से तुम बड़े नहीं हो हे बांके बंसीधारी जब लोगों को विपद आती है पुकारते हैं मधुसूदन बोलकर के किंतु तुम खुद जब विपद में आ जाते हो तब तुम बंसी के स्वरों में पुकारते हो राय किशोरी को तो किस तरह से सहज रूप से गौरी मां इस धर्म संकट में से बच जाती है। इसके बाद का जो है अभी हम कल देखेंगे आज। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु राम