Transcript
ओम स्थापका धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी श्री मां शारदा देवी की जीवनी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज लिखित अवतरणिका में से हम पाठ कर रहे हैं। थोड़ा सा उसमें चिंतन कर रहे हैं। महाराज जी अवतारणिका में लिखते हैं कल हमने जो पढ़ा कि गीता श्री कृष्ण जदियो इंगित कोरिया छिल गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि भगवान स्वयं मानव देह धारण कोरिया आशीले ओ खुद्रो चित्तो मानुष तहार परमेश्वरत्व ना बुझिया भगवान स्वयं मनुष्य का देह धारण करके आने के बावजूद क्षुद्र चित्त मनुष्य अर्थात कि जिसकी बुद्धि जिसकी मेधा शक्ति कुंठित हो गई है, संकुचित हो गई है। वे लोग ईश्वर को नहीं समझ पाते। उनको नहीं रिकॉग्नाइज नहीं कर पाते। वैसे लोग तहार अवज्ञा कोरिया था केके ऐसे लोग उनकी अवज्ञा किया करते हैं। उनको इग्नोर किया करते हैं। तो इसके बारे में हमने कल देखा कि थोड़ा सा तो स्केप्टिसिज्म हेल्दी है। क्योंकि फिर कितने ही लोग अपने को अवतार और धर्मुरु बोलकर के डिक्लेअ करते रहते हैं और थोड़ा उनके प्रति ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि उनके जीवन में क्या से क्या सब उलटपुलट सब घटनाएं मिलेगी हमको। तो ठाकुर के पास में यह जो अंतरंग शिष्य जितने भी आए थे सभी ने ठाकुर के ऊपर में थोड़ा बहुत संदेह किया था। ठाकुर को टेस्ट किया था। फिर आखिर में कहीं जाकर के ठाकुर को 100% एक्सेप्ट किया था। तो वह सब हमने कल देखा। महाराज जी आगे लिखते हैं अवजानती माम मूढ़ा मानुषिम तनु आश्रितम। यह गीता में ऐसे श्लोक है जो गीता के बारे में उन्होंने कहा था। अवजानंतिम माम मूढ़ा मूढ़ा मूढ़ शब्द यहां पर यूज किया है। मानुषिम तनुम आश्रितम मनुष्य का तनु अर्थात कि देह धारण करके जब मैं आता हूं तब ये मूढ़ लोग मुझे अवजानती मेरी अवज्ञा करते हैं। तथापि तादृश्य देह अवलंबने तिनी जुगे जुगे सुख दुख ओ भ्रम प्रमाद पूर्ण मानव जीवन के देवी संपत्त संपोदे भूषित कोरबार प्रणाली देखाइया थाके केन इसके बावजूद कि लोग मनुष्य शरीर तनु या देह धारण करके आए हुए ईश्वर की अवज्ञा करते हैं। इसके बावजूद ईश्वर यही मनुष्य का देह धारण करके युग युगांतर से पृथ्वी पर अवतरित हो रहे हैं। और हमको यह जो भ्रम प्रमाद पूर्ण मानव सभ्यता है उसको रास्ता दिखा रहे हैं। कारण स्वार्थ बीजड़ी तो संसारे निबद्ध दृष्टि जनसाधारण पखे उच्चतर आदर्श जन उद्दीपना लाभर अन्न कोनो उपाय नहीं क्यों क्योंकि स्वार्थ विजित संसार यह स्वार्थ से जड़ित संसार जो है उसमें निबद्ध दृष्टि जनसाधारण जो स्वार्थ में बंध बंधा हुआ संसार उसमें जो लोग फंस गए हैं यह संसारी जनसाधारण उनके लिए उच्चतर आदर्श के उच्चतर आदर्श वो अपने जीवन में प्राप्त करें अपने जीवन में वह स्वीकारे अपने जीवन में वह धारण करें उसके लिए और कोई उपाय नहीं है। देखिए हम जब पुराण पढ़ते हैं तो विष्णु पुराण है ना कि शिव पुराण है ना कि देवी पुराण है देवी भागवत है तो हम देवता या देवियों के कार्यकलाप के बारे में उसमें देखते हैं कि किस तरह से एक उच्च आदर्श लेकर के यह देवता गण रह रहे हैं। किस तरह से वे धर्म की रक्षा करते हैं। किस तरह से वे अधर्म को पनिश करते हैं। अधर्म को शास्ति देते हैं। उनको पनिशमेंट देते हैं। यह हम पुराण में पढ़ते हैं। किंतु जब हम ये सब भगवान शिव या भगवान विष्णु या देवी जगदंबा ना कि देवी दुर्गा मां काली इन सब के जीवन के प्रति देखेंगे या तो पुराण में उनकी जो घटनावली जो लिपिबद्ध की गई है। हम लोग सोचेंगे कि हमारे जीवन में ये सब कुछ करना किस तरह से संभव है। अभी ऋषि विश्वामित्र के बारे में वो लिख दिया कि 1000 साल ना कि कुछ तपस्या किया। वो फिर ध्रुव था। उसके बारे में लिखा कि 1000 साल तक एक पैर पर खड़े रहकर के तपस्या किया। ऐसे हजारों हजारों सालों तक एक पैर पर खड़े तपस्या करेंगे ना कि बिना खाए तपस्या करेंगे। ना कि क्या करेंगे? हम मनुष्यों के लिए क्या ये तो संभव ही नहीं। एक एक पैर पर खड़ा आप कितनी देर तक रह पाएंगे? 10 मिनट, 20 मिनट, एक घंटा, दो घंटा, ज्यादा से ज्यादा एकद दिन आप 1000 साल थोड़ी ना एक पैर पर खड़े रह के तपस्या करने वाले हैं। तो मनुष्य की बुद्धि शक्ति, मनुष्य की शारीरिक क्षमता यह सब कुछ सीमित है। तो फिर यह देवताओं की तरह धर्म का पालन मनुष्य कैसे करेगा? तो उसका उपाय है कि मनु ईश्वर भी देवता भी यदि मनुष्य का शरीर धारण करके आए और मनुष्य के जितने भी दुख ताप संताप है वो सहन करें तब कहीं जाकर के हम लोग देखेंगे कि अरे भगवान राम पंचभूते फांदे ब्रह्म पड़े कांधे जैसे ठाकुर ने कहा है पंचमहाभूत का यह शरीर धारण करने के बाद में ब्राह्मण को भी रोना पड़ता है भगवान राम मां सीता के लिए रोए थे। पता है कि सब कुछ लीला है। रावण का उद्भव भी एक लीला है। मां सीता का अपहरण भी एक लीला है। यदि मनुष्य लोक में संसार लोक में यह दिखाने की आवश्यकता है कि युद्ध धर्म और अधर्म का जब युद्ध होता है तब हमेशा धर्म का विजय होता है। यह आदर्श स्थापित करने के लिए पूरी लीला रची गई है। भगवान राम को सब कुछ पितर में से पता है। किंतु फिर भी मां सीता का अपहरण हुआ तब वे रोए थे। तो ये मनुष्य होकर के आने से उनको सब कुछ सहन करना पड़ता है जो कि मनुष्य को करना पड़ता है। इस इस कठिन परिस्थिति में जब हम देखेंगे कि अरे वे लोग अभी भी उसी उच्चतर आदर्श का पालन कर रहे हैं जो कि हमको देवताओं के जीवन में मिलता है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि देवता गण खुद कहीं वह मदिरा पी के वह कुछ क्या किस तरह का वो बिहेव कर रहा है। पुराणों में तो देखेंगे इंद्र वगैरह देवों को तो हमको लगेगा कि अरे देवताओं से भी अच्छा आचरण व्यवहार तो इन अवतार का है जो कि पृथ्वी पर शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। मां को ही देखिए। मां पूरा संसार लेकर के रहती थी। दो भाई थे। उनकी पुत्रवधुएं थी। फिर यह पागली मामी, यह नलिनी, यह माकू, यह राधु, ये वर्दा मामा, काली मामा, प्रसन्न मामा ये सब लोगों का जीवन यदि देखें तो हमेशा मां को परेशान करते रहेंगे। फिर इस बार इस साइड में देखिए तो ठाकुर के सब रिलेटिव्स हैं। यह लक्ष्मी दीदी, यह रामलाल दादा जब ठाकुर का ठाकुर की महासमाधि हुई। इसके बाद में ठाकुर ने कहा था कि तुम जाकर के कामार पुकुर में अपना घर है वहां पर रहना और यहां पे कोलकाता में किसी भक्त के घर पर मत रहना जिसके सामने हाथ लंबा ना हाथ हाथ पाते हो माने बंग में जो ठाकुर ने कहा है जिसके सामने आप हाथ फैलाते हैं कुछ ग्रहण करने के लिए कुछ लेने के लिए तब आपको उनका गुलाम होकर के रहना पड़ता है इसीलिए ठाकुर ने कहा था कि कोलकाता आकर के बीच-बीच में शायद रहना हो तो रहो किंतु अपना कामार पुकुर का जो घर है उसको हमेशा ठीक रखना वही तुम्हारा घर होना चाहिए। ऐसा ठाकुर ने मां को कहा था। तो मां कामार पुकुर जाकर के रह रही थी। तो एक बार श्यामा सुंदरी देवी ने जाकर के कल कामरार पुकुर देखा तो मां की साड़ी फटी हुई थी। इस तरह की साड़ी पहनी थी और फिर यह बगीचे में वो कुछ सब्जी वगैरह बोई थी तो लक्ष्मी दीदी वो पैरों से वो सब्जियों को हट उसको नष्ट कर दिया तो इस तरह और रामलाल दादा वगैरह मां को मां की अवज्ञा करते थे। मां को इग्नोर करते थे। ये देखिए ये जो एग्जैक्टली जो लिखा है कि मनुष्य देह धारण करने के आने के बाद में ये मूढ़ चित्त या तो ये जो जो जिनकी बुद्धि समा संकुचित है। वे लोग हमेशा इनकी अवज्ञा करते हैं। तो ये एग्जजेक्टली यही हुआ मां के साथ में जब मां कामारपुर गई थी। ये लक्ष्मी दीदी और रामलाल दादा दोनों जिनके बारे में हम हमारी बड़ी श्रद्धा भक्ति है। अभी हमारे रामकृष्ण ज्योत मैगजीन में लक्ष्मी दीदी के बारे में एक सीरीज पूरा हमने पब्लिश किया था। तो बड़ा उनका रामलाल दादा को देखेंगे कि राजा महाराज का उनके ऊपर में बड़ा ही स्नेह था। जब भी रामलाल दादा बेलूर मठ आते थे तो राजा महाराज उनको बड़ा ही स्नेह आदर पूर्वक बिठाते थे पूछते थे कि अरे ठाकुर के समय वो जो सब आप कीर्तन गान भजन गाते थे वो हमको गा के सुनाइए और रामलाल दादा भी बड़े भाव विभोर होकर के वो कीर्तन करतेकरते या तो फिर वो नृत्य करतेकरते यह सब भजन वगैरह गाएंगे और फिर इनको इनके साथ में फिर राजा महाराज भी मिल जाएंगे ये गुरु भाई लोग भी मिल जाएंगे इतना सुंदर पवित्र वातावरण उस समय बेलूर मठ में रचित होता था। किंतु यही रामलाल दादा फिर मां को मां की इस तरह से अवज्ञा किया है की है। अभी मां ने खुद ने कहा था एक बार उद्बोधन में मां ने कहा था कि अभी आजकल ये लोग ऐसा कहते हैं कि मैं उनकी देखभाल नहीं करती। माने देखभाल नहीं करती। यानी कि ये लोग देखते हैं कि मां के पास में इतना ये दक्षिणा आता है, प्रणामी आता है, इतनी साड़ी आती है, ये मिठाइयां आती है, फल आते हैं। कितना सब कुछ लोग मां को देते हैं। वो मां के इतने धनी धनी सब बड़े-बड़े पैसे वाले उनके भक्त हैं। तो मां यदि चाहेगी तो उनको बोलकर के यह कामार पुकुर में ये लोग उनका परिवार है। उनके लिए भी कुछ करवा देगी। तो किंतु मां तो ऐसा कुछ कहेगी नहीं अपने भक्तों को। तो अभी यह रामलाल दादा वगैरह ने बोलना शुरू कर दिया था कि मां अभी हमारी संभाल नहीं रखती। तो मां ने कहा है एक जगह पे कि अभी ये लोग बोलते हैं कि मैं उनकी देखभाल नहीं करती या संभाल नहीं रखती। किंतु मैं जब कामार पुकुर में थी तो यह लोग मेरी कितनी अवज्ञा करते थे वो मुझे ही पता है। फिर ऐसा करने के ऐसा होने के बाद में भी किंतु देखेंगे कि मां ने कभी भी उनकी सही-सही अवज्ञा कभी नहीं की और कोई होता तो वह सोचेगा कि अच्छा जब मेरी परिस्थिति मेरी अवस्था बेहाल थी तब आप लोगों ने मेरे साथ में जो सुलक किया था मेरे साथ में जो व्यवहार किया था तो आज मेरी अवस्था बड़ी अच्छी हो गई है। आज मेरे इतने सारे भक्त हो गए तो मैं भी आपको इन टर्न इग्नोर करूंगी। किंतु मां ने ऐसा कभी नहीं किया। एक बार लक्ष्मी दीदी मां को मिलने के लिए आई थी उद्बोधन तो उद्बोधन ही होगा शायद। तो मां ने कहा कि देखो योगेन मां बीमार है। योगेन मां ना कि कोई बीमार था तो जाओ जाकर के उनको मिल के मिलकर आ जाओ वापस। तो लक्ष्मी दीदी उनको मिलने के लिए गई और फिर मिलने के बाद में वहीं से वो वापस चली गई। अभी थोड़ी देर के बाद में मां ने पूछा कि अरे लक्ष्मी कहां चली गई? तो किसी ने कहा कि लक्ष्मी दीदी ने तो उनको मिला उनको देखा और फिर अभी तो वो घर वापस चली गई है। तो मां बड़ी ही परेशान हो गई। अरे लक्ष्मी तो शीतला का अवतार स्वयं है। ऐसा ठाकुर ने कहा है। अभी यह लक्ष्मी मेरे पास आई नहीं। मैंने उसको साड़ी, यह फल, मिठाई, ठाकुर का प्रसाद ऐसा मैंने तो उनको उसको कुछ देने का मुझे मौका ही नहीं मिला। वह घर चली गई। फिर मां ने किसी को बोला अरे जाओ जाकर के लक्ष्मी दीदी के घर जाकर के ये साड़ी ये प्रसाद ये फल मिठाई दे के आओ और कहना कि मां की ओर से कि आप आई नहीं तो इसलिए हम आपको यह दे नहीं पाए। ऐसा करके किसी को भेजा और जब लक्ष्मी दीदी को यह सब मिला तो बड़ी लज्जित हो गई और उन्होंने कहा कि अरे मेरे साथ में जो साथी लोग थे वे लोग जाने के लिए बड़े उतावले हो रहे थे। बड़े ही उत्सुक हो रहे थे। इसलिए मैं वहां से निकल आई। मां को कहना कि मैं एक-द दिन के बाद में वापस आऊंगी और मां के साथ में पूरा दिन भर रहूंगी और सही में वो आई भी सही, मां के साथ में पूरा दिन भर रही भी सही। और मां ने बड़ी ही उनकी खातिर भी की। अभी देखिए कि और कोई यदि होता तो वह सोचता कि अच्छा मैं जब कामरार पुुर में थी तो मुझे तो यह पूरा इग्नोर करते थे। मैं जो सब्जियां बोती थी गार्डन में उसको यही लक्ष्मी दीदी नष्ट कर देती थी। तो अभी जब मेरे पास में ये साड़ी है ना ये फल प्रसाद है मिठाई प्रसाद है मैं उनको क्यों देने उसको क्यों देने को जाऊंगी किंतु मां ने ऐसा कभी नहीं कहा कभी नहीं किया तो हम जब यह व्यवहार देखते हैं तब हमको पता चलता है कि हमको अपने जीवन में किस तरह से रहना चाहिए माने यदि अपने मन में से उस उनके प्रति यदि थोड़ा बहुत भी क्रोध होगा थोड़ा बहुत भी दुख होगा थोड़ा बहुत भी यदि यदि ग्लानी हुई होगी उसको मां ने संपूर्ण रूप से तज दिया। तो हम यदि 100% किसी को क्षमा ना कर पाए तो एटलीस्ट हम इतना तो कर सकते हैं कि हां भाई चलो मेरे मेरी जब अवस्था अच्छी होगी तो मैं एटलीस्ट उतना बुरा व्यवहार करने को नहीं जाऊंगा। अच्छा व्यवहार सामने से बुला करके उनके साथ में बात करना सामने से बुला करके मैं उनकी खातिर यह सब करूं यह यदि शायद मेरे से ना हो किंतु एटलीस्ट बुरा व्यवहार भी मैं सामने से चलकर के इनके साथ में नहीं करूंगा बाबूराम महाराज की मां मातंगिनी देवी वो एक बार ठाकुर को कह रही है मैं आमी तो शबा खेते पारलामना मैं सभी लोगों का खाना नहीं खा पा रही हूं अभी भी जैसे वैष्णव थी और वैष्णव धर्म में जिस तरह से होता है कि आपको यदि साधना ठीक-ठीक से करनी है तो ब्राह्मण के द्वारा पका हुआ या भगत या तो फिर साधक के द्वारा पका हुआ ही खाना खाना चाहिए। हर किसी के हाथ का खाना खाने से आपकी भक्ति को हानि हो सकती है। तो अभी मातंगिनी देवी सोचती है कि मैं जो भी मेरे पास में खाना लेकर आता है वो तो मैं नहीं खा सकती हूं। मैं तो अभी भी मुझे यह आचार व्यवहार विचार जो है जो वैष्णव शास्त्र में कहे गए हैं। मुझे इस तरह का थोड़ा पालन तो करना पड़ता है। तो अभी मैं क्या करूं? ठाकुर को कहने को गई कि मैं सभी के हाथ का खाना अभी भी नहीं खा पा रही हूं। तो ठाकुर ने कहा कि सभी के हाथ का खाना खाने से ना कि क्या धर्म हो जाता है। सभी के हाथ का खाना खाने से ना कि ईश्वर मिल जाएंगे। वो तो कोई इंपॉर्टेंट चीज नहीं है। इंपॉर्टेंट चीज है कि अपना अहंकार, अपनी वासनाएं, इंद्रियों के विषय इनको संपूर्ण रूप से तज कर यह जितना हो सके जप, ध्यान, प्रार्थना इसमें निरत रहना चाहिए। यह हमारे लिए इंपॉर्टेंट चीज है। नहीं कि यह सब बाह्य आचार विचार को लेकर के सर घुमाना। ठाकुर ने सब कुछ किया है। ठाकुर ने माटी टाका टाका माटी बोल के वो जो पैसा था वह गंगा में वह अर्पण कर दिया है। यह सोच के कि मुझे मेरे मन में पैसों के प्रति धन के प्रति तनिक भी स्प ना रहे। ऐसा सोच कर के पैसा वगैरह ठाकुर ने गंगा में विसर्जित कर दिया। किंतु ये तो ठाकुर की बात है। ठाकुर को पूरे संसार के सामने आदर्श रख के जाना था। हमको यदि इतना दूर तक नहीं जा सके तो हमको थोड़ा बहुत तो करना चाहिए। इतना जब ठाकुर ने किया तो इसका 10% आदर्श 1% आदर्श तो हम अपने जीवन में उतारे तो इसके लिए किंतु सबसे पहली बात है कि वो आदर्श हम अपने जीवन में उसको इंप्लीमेंट कर सकते हैं। यह भरोसा हमको होना चाहिए। भगवान विष्णु चाहे तपस्या कर लेंगे तो हमको लगेगा अरे तो भगवान है वो तपस्या करेंगे कौन सी बड़ी बात है? उनका तो काम ही है तपस्या करने का वरना नहीं करेंगे तो भगवान किस काम के ऐसा बोल के हम छोड़ देंगे किंतु जब ठाकुर अपने बचपन से ही वो उन्होंने ठीक कर लिया था कि चाल कोला विद्या आमी अर्जित कर्मोना अर्थात कि जिस तरह की विद्या से मुझे यह भिक्षा प्राप्ति हो या तो फिर धन प्राप्ति हो चाल कोला शब्द यूज किया है चाल अर्थात कि धान और कोला अर्थात कि केला यानी कि फल यह धान है या फल है। यह सब चीजें जो मुझे मिले इस तरह की विद्या मुझे अर्जित नहीं करनी। मुझे तो ईश्वर प्राप्ति के लिए यह जीवन लगाना है। तो ऑफकोर्स हमारा तो हम हम तो जब संसार लेकर के बैठे हैं तो किस तरह से यह संभव है कि हम लोग ये कहे कि ना मैं ग्रेजुएशन नहीं करूंगा। मैं पढ़ाई लिखाई नहीं करूंगा। मैं बचपन से ही ईश्वर का नाम लेकर के रहूंगा। सभी के लिए संभव नहीं। किंतु जब हम ठाकुर को देखते हैं तो एग्जजेक्टली ठाकुर जैसे ना भी हो पाए। किंतु हमारे लिए वो वैदिक आदर्श तो है। पहले 25 साल ब्रह्मचर्य आश्रम, फिर 25 साल गृहस्थ आश्रम, फिर 25 साल वानप्रस्थ आश्रम और आखिर में 25 साल सन्यास आश्रम। यह तो हमारे सामने आदर्श है। क्यों नहीं हम वृद्ध विद्यार्थी अवस्था में अच्छे से पढ़ाई लिखाई करें। गृहस्थ जब है गृहस्थ आश्रम में जब है तो पूरा जवाबदारी लेकर के गृहस्थ आश्रम का पालन करें। वो संसार संपन्न करें। फिर जब धीरे-धीरे करके संसार ठिकाने लग जाए तब कहीं जाकर के अपने मन को विड्रॉ करतेकरते ईश्वर में यह शरीर और ईश्वर की सेवा में यह शरीर और ईश्वर की चिंता स्मरण मनन में यह मन को लगाए। हम इतना तो कर सकते हैं। भले ही चाहे शंकराचार्य की तरह ठाकुर की तरह बचपन से ही सर्वस्व त्याग करके बस ईश्वर प्राप्ति ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यह सब ना करें। किंतु ग्रेजुअली स्लोली एंड स्टेडीली हम ईश्वर के प्रति तो जा ही सकते हैं। तो यह आदर्श हम ग्रहण कब करेंगे? जब हम देखेंगे कि हां हमारे ही तरह एक मनुष्य शरीर धारण करके आए हुए एक महात्मा ऋषि ना कि अवतार इन्होंने यह करके जब दिखाया है तब कहीं जाकर के मैं यह कर सकता हूं। यह भरोसा मुझे होगा। तो इसीलिए यहां पर कहते हैं स्वार्थ विजड़ित संसार में अपनी दृष्टि जिन लोगों ने बांध दी है ऐसे जनसाधारण लोग के लिए उच्चतर आदर्श की उद्दीपना उच्चतर आदर्श की प्रेरणा उनके जीवन में जागृत हो उसके लिए अन्य कोई उपाय नहीं है। सिवाय के इसके अलावा कि ईश्वर मनुष्य देह धारण करके आए ईश्वर को क्रुसिफाई किया जाए तब भी ईश्वर कहीं जाकर के बोलेंगे फॉरगिव देम फादर दे नो नॉट व्हाट दे आर डूइंग जीसस को क्रुसिफाई किया गया था तब उन्होंने कहा था कि हे ईश्वर हे पिता हे पिता परमेश्वर आप इनको क्षमा कर दीजिए क्योंकि इनको पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं। जब हमारे सामने यह अत्यंत उच्चतर आदर्श मनुष्य के देह में जब विद्यमान दिखाई देगा तब कहीं जाकर के हम अपने शत्रु है उनके प्रति थोड़ा सा करुणा या तो फिर थोड़ा सा इनके प्रति द्वेष कम करने का प्रयत्न कर पाएंगे। वरना तो फिर अपने मुझे इसके प्रति मुझे नफरत है। यह मेरा शत्रु है। यह मेरा दुश्मन है। यह मेरा अहित करना चाहता है। इनको तो बस मैं बदला मेरे पास में जैसे ही थोड़ी बहुत ताकत आ जाएगी मैं बदला लूंगा। तो यह जब अपने मन में यह क्रोध और ईर्ष्या और यह विद्वेष भरे विचार जब सब समय चलते ही रहेंगे तो इसका परिणाम क्या होगा? तो परिणाम हम आज देख रहे हैं। आज विश्व में कितने युद्ध चल रहे हैं। जितने भी युद्ध चल रहे हैं सबके पीछे यही एक विचार है। जिसके पास में थोड़ा सा भी पावर आ गया वो अपने शत्रु पर हमला करेगा और वो शत्रु जो अभी मार खा रहा है उसके पास में थोड़ा सा पावर आ गया तो आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों वह सामने हमला करेगा। यह साइकिल ऑफ वायलेंस हमेशा चलता ही रहेगा। इसके सामने गांधी जी को देखिए। उन्होंने कहा कि सत्याग्रह की लड़त हमको करनी है। बाकी सब जितने भी देश हैं उन्होंने यह खून बहा करके युद्ध करके अपने शत्रुओं का विनाश करके कत्लेआम करके उन्होंने मुक्ति प्राप्त की है। या तो फिर उन्होंने उनके समाज के ऊपर में पूंजीपतियों का जो यह कंट्रोल था वो कंट्रोल को हटाने के लिए उन्होंने सिर्फ ब्लड शेड या तो रक्तपात ही किया है। यह रशियन रिवॉल्यूशन, चाइनीस रेवोल्यूशन, यह फ्रेंच रेवोल्यूशन, यह अमेरिकन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस जो कुछ भी है आप देख लीजिए। सब जगह पे रक्तपात हुआ है। किंतु गांधी जी का यह एक सत्याग्रह मैं सिर्फ गांधी जी के बारे में नहीं कह रहा। गांधी जी ने भले चाहे सत्याग्रह के बारे में बोला हो, किंतु भारत की इस भूमि ने इस आदर्श को उठा लिया है। क्यों? क्योंकि ये जो भीतर की जो ओजस शक्ति है सोल फोर्स जिसको कि इंग्लिश में गांधी जी ने इसको इस तरह से डिस्क्राइब किया है। आत्मन की शक्ति एक तो है कि बाहुओं की शक्ति हाथ की शक्ति शस्त्र शक्ति अस्त्रशक्ति और दूसरी है आत्मशक्ति। आत्मश्रद्धा जब हमारे भीतर में आत्मश्रद्धा प्रकट होती है तब हम देखेंगे कि यह ठाकुर मां स्वामी जी किसी ने भी अंग्रेज लोगों को गाली नहीं दी। हालांकि इनके नजर के सामने भारत के ऊपर में अंग्रेजों के अत्याचार चल रहे थे। किंतु फिर भी हमने एक के बाद एक अनेक घटनाएं आज से पहले भी देखी है कि क्षणिक उनका मन मां का या स्वामी जी का कभी-कभी विचलित हुआ है। किंतु स्वामी जी ने खुद कहा है जब वो इंग्लैंड में गए थे उसके बाद में उन्होंने एक पत्र में किसी को कहा कि इंग्लैंड में आने से पहले लंदन आने से पहले मेरे जितना इन लोगों का विरोधी और कोई नहीं होगा। जिस तरह से इन लोगों ने भारत पे राज किया है, अत्याचार किया है, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक शोषण किया है। इन लोगों की नीतियों के विरोध में मेरे जितना अड़ग और कोई नहीं होगा। मेरे जितना इनका विरोधी और कोई नहीं होगा। किंतु इस देश में आ जाने के इस देश में आने के बाद में इन लोगों को ऑब्जर्व करने के बाद में इन लोगों का मेरे जितना बड़ा एडमायर, एडमायरर भी और कोई नहीं होगा। इनका मेरे जितना बड़ा कोई प्रशंसक भी नहीं होगा। क्यों? क्योंकि स्वामी जी ने देखा कि इनकी भारत में जो कोई भी नीति है अपने खुद के देश में उन्होंने एक कंस्टिट्यूशनल बेसिस के ऊपर में एक गवर्नेंस चला रहा है। गवर्नमेंट चला रहा है। जहां पे सभी के लिए थोड़ा बहुत सोशल जस्टिस का प्रावधान है। आज के जितना स्ट्रांग नहीं है। कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स वगैरह वुमेन के लिए वहां पे वोटिंग राइट्स नहीं था। वहां पे सर्फ प्रथा उस समय चलती थी कि नहीं मैं भूल गया। किंतु जो भी है मतलब जितना स्ट्रांग क्स्टिट्यूशनल सपोर्ट आज गवर्नमेंट जितना करती है ब्रिटिश गवर्नमेंट अपने सिटीजंस का उतना स्ट्रांग उस समय नहीं था। किंतु उस सामने में स्वामी जी ने भारतीय राजाओं को भी देखा था। देखा था कि वह किस हद तक वो भोग विलास में लोलूप हो के रहते हैं। कुछ-कुछ को छोड़कर के जैसे वड़ोदरा के राजा है, खेतड़ी के राजा है, यह मैसूर के वो निजाम है। ऐसा कुछ-कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो बहुत सारे राजा थे भोग विलास में वो लिप्त रहते थे। अपनी प्रजा के बारे में थोड़ा सा भी सोचते नहीं ये अखंडानंद जी ने जब लिखा कि वो खेतड़ी राज्य में जाकर के वो कह रहे हैं कि आपके ये जितने भी ये गोमास्ता इनको कहते हैं। गोमास्ता अर्थात कि ऐसे लड़के जिनके पास में खुद का कोई ह्यूमन राइट्स जैसा नहीं है। वो जो ये जो धनपति है ना कि राज्य चलाने वाले जो लोग हैं अधिकारी लोग वो जो कहेंगे उनको करना करना पड़ेगा। तो इनके लड़कों को मैं पढ़ाई लिखाई सिखाऊंगा। तो वो खेचड़ी नरेश भी थोड़ा सा परेशान हो गया था। ये कहां यह सब उलटपुलट बातें कर रहा है। इनके दिमाग में कोई ज्यादा अकल आ जाएगी तो फिर वो अपना राइट्स मांगने लगेंगे। तो इस तरह की परिस्थिति सब जगह पे थी कि ये अपनी जहां पे अपने लोकल राजा थे अपनी खुद की लोकल प्रजा को पूरा दबा करके शोषण करके रख दिया था। तो यह देख कर के स्वामी जी लंदन और ब्रिटेन गए थे। और उन्होंने देखा कि हां चलो अमेरिका की तो बात ही छोड़ दीजिए। स्वामी जी ने कहा है अमेरिका इज अ हेवन फॉर मासेस एंड वुमेन जो कि और कहीं पर नहीं मिलेगा। अमेरिका स्त्रियों के लिए और जनसाधारण के लिए स्वर्ग है। ऐसा तो अमेरिका तो अमेरिका की तो बात ही अलग है। किंतु इवन ब्रिटेन में भी जनसाधारण के थोड़े बहुत राइट्स हैं। ये स्वामी जी ने देखा और यह भी देखा कि किस तरह से ये वहां का वो जो एंग्लिकन चर्च है वो एंग्लिकन चर्च यानी कि वहां का ऑफिशियल चर्च उनके जितने भी पदाधिकारी ये पादरी ना कि ये रेवरण ना कि ये कार्डिनल ना कि फादर जो भी इनका नाम हो ये लोग प्रिस्ट जो भी इनको कहो सभी लोग स्वामी जी के कितने फेवर में थे स्वामी जी को कितना ही वे लोग एडमायर करते थे स्वामी जी की कितना ही वो प्रशंसा करते थे और किसी ने तो कहा कि स्वामी स्वामी जी जिस तरह से हम लोग वहां पर क्रिश्चियन मिशनरीज को भेज रहे हैं। आप भारत से हिंदू धर्म के दूत होकर के यह हमारा एंग्लिकन चर्च है। उसको शिक्षा देने के लिए आप यहां पर मिशनरी के रूप में आए हैं। तो यहां तक उन्होंने स्वामी जी को कहा था कि ये टैलेंट रिकॉग्नाइज करने की और टैलेंट को बढ़ावा देने की सराहने की उनकी जो क्षमता है वो स्वामी जी ने इनमें देखी और उसके अगेंस्ट में भारत में देखिए। स्वामी जी ने खुद ने कहा है हम लोग भारत में जितनी ईर्ष्या है अपने ही देश भाइयों के प्रति देश बांधवों के प्रति ऐसा और कहीं पे भी आपको नहीं देखने को मिलेगी। स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो ये क्रिश्चियन मिशनरी तो उनकी निंदा करेंगे ही करेंगे। किंतु यह ब्राह्म समाज का मजूमदार वो स्वामी जी के पीछे इस तरह से लग गया था जो जितना भी उलटपुलट है वह स्वामी जी के बारे में वो अमेरिका में भी वो निंदा करता था वो भारत में भी निंदा करता था। तो कब तब कहीं जाकर के स्वामी जी को एक लेटर लिखना पड़ा कि इसको शर्म नहीं आती है मेरे बारे में यह सब कुछ भारत में कोलकाता में जाकर के बोलता है मेरी बूढ़ी मां वहां पर रह रही है वो बेचारी सोचेगी कि अरे मैंने अपना मेरा बच्चा मेरे लिए तो कुछ नहीं कर पाया मेरी सेवा नहीं कर पाया तो चलो एटलीस्ट धार्मिक एक साधु तो बना है। आज उसको पता ये चल रहा है कि वो विदेश में जाकर के जितना भी दुराचार है, जितना भी अनाचार है, जितना भी वो धर्म के विरुद्ध काम है वो कर रहा है। तो ये सब वो सोचेगी, सुनेगी, पढ़ेगी तो उसको कितना आघात पहुंचेगा। ये पागल लोगों में इतना भी ये अकल नहीं है। तो ये देखिए कि स्वामी जी ने देखा कि अमेरिका में ये टैलेंट को रिकॉग्नाइज करने की और उसको सराहने की यह कैपेसिटी है। तब कहीं जाकर के स्वामी जी ने कहा कि इंग्लैंड के प्रति मेरी धारणा का संपूर्ण परिवर्तन हुआ है। तो यह सत्याग्रह है। वो क्या है? हमको हमारे शत्रुओं को शस्त्र से नहीं जीतना है। सोल फोर्स आत्मशक्ति से जीतना है। सबसे पहले तो हमारे देश में जितने भी ये जितने भी यह अन्याय हम लोग अपने खुद के देश बांधवों के प्रति कर रहे हैं। यह अछूत प्रथा यह किसी को समाज में से निकाल देने की प्रथा। यह जो लोअर कास्ट है, नीच जाति के लोग हैं, उनको समाज में सभी अधिकार से वंचित करने की प्रथा यह सबको हमको हटा देना पड़ेगा। हमारे जितने भी भारतीय भाई बहन हैं, सबको एक समान अधिकार देना पड़ेगा। तब तो कहीं जाकर के हम ब्रिटिश लोगों के पास से अपने खुद के अधिकार की डिमांड कर सकते हैं, मांग कर सकते हैं। बाकी सब जगह पर देखिए कि ऐसे कोई लोग जो कि अपने शत्रुओं के साथ में लड़ते हैं जब वो जीत जाएंगे तो शत्रु लोग जितना अत्याचार करते थे उससे कहीं ज्यादा अत्याचार वे लोग करना चालू कर देंगे। ये फ्रेंच रेवोल्यूशन देखिए ना कि ये रशियन रेवोल्यूशन देखिए ना कि चाइनीस रेवोल्यूशन देखिए। ये स्टालिन या ना कि माओ ना कि ये हिटलर ना कि ये नेपोलियन इन लोगों ने अपने खुद के भाई बहनों को जितना नहीं जितना मारा होगा शत्रुओं ने जितना नहीं मारा होगा उससे कहीं ज्यादा इन लोगों ने मारा है। रशिया में रेवोल्यूशन आया। कितने लोगों को गुलाब में भेज दिया। कितने लोगों की हत्या कर दी। सब स्टालिन ने किया है। चाइना के जितना भी नरसंहार हुआ है सब मांओं ने करवाया है। वो उतने शत्रुओं ने जितना नहीं करवाया जितना कि वो वहीं की कम्युनिस्ट पार्टी ने करवाया। तो जब हम लोगों के पास में इस तरह का फ्रीडम आ जाए जिसको कि हम डिर्व ना करते हो जिसको कि हम पचा ना पाए जिसको कि हम डाइजेस्ट ना कर पाए तब कहीं जाकर के क्या होगा? हम हमारे शत्रु हैं उससे भी कहीं ज्यादा दानवीय हो जाएंगे। उससे भी कहीं ज्यादा क्रूर और निष्ठुर हो जाएंगे। इसके लिए यह जो आदर्श है कि आत्मशक्ति का आदर्श, यह अहिंसा का आदर्श, सभी के प्रति समानता और प्रेम और स्नेह, भालोसा का आदर्श यह दिखाने के लिए इन लोगों का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। और जब हम ये इनके जीवन में देखेंगे, इनके शरीर में देखेंगे, इनके वाणी, व्यवहार और वर्तन में देखेंगे, तब कहीं जाकर के हम लोग कहेंगे कि हां इसमें से 100% तो नहीं तो एटलीस्ट 50%, 50% नहीं तो 10% 10% नहीं तो एटलीस्ट 1% मैं अपने जीवन में पालन करने का प्रयत्न करूं। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु