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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम आज पूजनीय स्वामी सुहितानंद जी महाराज राजकोट की मुलाकात के लिए आ रहे हैं राजकोट में पधार रहे हैं और भक्तों को आशीर्वाद देंगे यहां पर दीक्षा भी होगी तो तीन-चार दिन बड़ा ही सुंदर सब प्रसंग उत्सव जैसा रहेगा तो राजकोट में रहने का यह एक है बेनिफिट कि हर छ महीने पर एक ना एक वाइस प्रेसिडेंट महाराज की विजिट होती रहती है सो वी आर वेरी फॉर्चूनेटली की जीवनी स्वामी गंभीर रानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका अभ्यास कर रहे थे इसका पाठ कर रहे थे और हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज शोड़ी पूजा की पूर्व भूमिका बांध रहे हैं शोशी पूजा क्यों इसके पीछे बहुत सारे तात्विक हम लोग चिंतन वगैरह कर सकते हैं और करेंगे भी किंतु उसके साम उसके आगे आने वाले जितने भी स्टेप्स है पहले महाराज जी क्या लिखते हैं वो हम पढ़ लेते हैं कल एक स्टेप हमने देखा कि महाराज जी लिखते हैं कि ठाकुर और मां का जो रिश्ता है उसको तीन लेवल पर हम एनालिस एनालाइज कर सकते हैं उसका एनालिसिस कर सकते हैं यदि जागतिक व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो उनका रिश्ता था पति और पत्नी का किंतु अति जागतिक या तो फिर कहेंगे कि आध्यात्मिक जगत में यदि देखा जाए आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उनका नाता था दो उसमें भी दो लेवल है पहला तो लेवल है कि गुरु और शिष्य का और उसके बाद का हायर लेवल है पूज्य और पूजक का अभी देखिए किस तरह से इन लोगों का रिलेशन इनका नाता स्टेप बाय स्टेप प्रोग्रेसिव होता जाता है जहां तक जागतिक जगत का प्रश्न है हम लोग देखेंगे कि मां ठाकुर के लिए खाना बनाती है ठाकुर अपने कमरे में रहते थे तो मां अपने हाथों से थाला खाने का जाकर के उनके सामने रखती थी और बातों-बातों में ठाकुर को खिलाती थी बात-बात में भुला भुला करके क्योंकि ठाकुर की तो हैबिट थी कि बीच-बीच में समाधि मगना हो जाना थोड़ा सा ही ट्रिगर मिला कहां कुछ भगवान का नाम सुना ना कि कोई भी आध्यात्मिक चीज देखी या तो कोई वाणी सुनी तो फट कर के समाधि में चले जाएंगे तो खाना तो वैसा ही पड़ा रहेगा तो मां ही थी कि ठाकुर को भुला करके फुसला करके छोटे बच्चे को अपनी मां जैसे कि छोटा बच्चा होता है बहुत ही चंचल होता है अभी यहां पर दौड़ेगा वहां पर दौड़ेगा मित्रों के साथ में खेलने के लिए जाएगा मां उसको डरा के धमका करके फिर कभी के फोसला करके बिठा करके जैसे खिलाती है तो वैसे ही यहां पे मां ठाकुर को डराती धमकाते तो नहीं थी किंतु एटलीस्ट उनको फुसला करके बातों-बातों में भुला करके उनको खाना खिलाती थी क्योंकि ठाकुर का मन तभी तो जागतिक जगत में रहेगा खाना खा पाएंगे तो वो तो एक जो ट्रेडिशनल पति और पत्नी का रोल हुआ वो हुआ किंतु उससे हायर रोल है गुरु और शिष्य का जिस तरह से तोतापुरी ने ठाकुर को कहा कि यदि ब्रह्मज्ञान में तुम्हारी प्राप्ति तुम्हारी सिद्धि टेस्ट करना चाहते हो तो तुम अपनी पत्नी के साथ में रहो देखो कि बिना किसी कामना और वासना के उसको तुम यदि धर्म के रास्ते पर ले जा सकते हो कि नहीं धर्म की शिक्षा दीक्षा दे सकते हो कि नहीं तो तोतापुरी का ही जो आदेश था या तो तोतापुरी का ही जो निर्देश था उसका पालन करते करते ठाकुर ने मां को धर्म शिक्षा देने का प्रारंभ किया था किंतु उससे भी एक स्टेप आगे का रोल है पूज्य और पूजक का भक्त और भगवान का डिवोटा का और डीटी का तो यहां पे किंतु देखिए जो ट्रेडिशनल रोल है वह रिवर्स हो जाते हैं हालाकि मां के लिए जैसे यहां पर ही गंभीरानंद जी महाराज ने इसके पपले ऊपर वाले सेंटेंस में ही कहा कि मां जब जयराम बाटी में थी ठाकुर के बारे में जो सब बातें सुनती थी अपवाद कटु वाक्य सब बातें सुनती थी मां के हृदय में बड़ी ही वेदना होती थी दक्षिणेश्वर आई तो देखा कि हां ठाकुर वैसे के वैसे ही है तो फिर माने सोचा कि हां देवता देवता अछन वन ऑफ द ग्रेट सेंटेंसेस ऑफ दिस बुक देवता देवता ही है जब मैं जबी पढ़ता हूं कोई भी किताब तो मेरा हैबिट है उसको अंडरलाइन करना जो कोई भी पैसेज मुझे अच्छा लगता है या तो मुझे सिग्निफिकेंट लगता है पहले मैं हाईलाइट यूज करता था फिर मैंने देखा कि हाईलाइट यूज करने से वैसे तो किताब के पेजेस पतले हैं तो पीछे की ओर उसका इंप्रिंट हो जाता है इसलिए मैं वह जो डार्क कलर की जो पेंसिल होती है वह यूज करता हूं तो अभी मेरा एक टेंप्टेशन ऐसा होता है कि एक पेज पे आधा पेज जदी शुरू शुरू में ऐसा होता था कि आधा पेज मैंने अंडरलाइन करके रखा है फिर जब मैं पिछले पिछले पेजेस को पिछली पुरानी किताब खोल कर के देखता था तो आधी किताब अंडरलाइन की हुई या हाईलाइट की हुई है अभी अंडरलाइन या हाईलाइट क्यों करते हैं जबकि हम किताब को रिवाइज करना चाहते हैं तो उसके जो सिग्निफिकेंट पॉइंट है उसको इमीडिएट पकड़ पाए तो यहां पे तो जब आधे से ज्यादा किताब उसको यदि हमने सिग्निफिकेंट के रूप में किया है तो फिर हम कितना स्टडी करेंगे किसको लेंगे किसको छोड़ेंगे मुझे याद है ट्रेनिंग सेंटर में मेरे पास में मायर कथा बोलकर के पुस्तक थी जैसे कि ये गंभीरानंद जी की जीवनी है मां के बारे में लाइफ है बायोग्राफी है तो वैसे ही मां के ऊपर में मां के शिष्यों ने जो रेमसंस लिखे हैं जो स्मृति कथाएं लिखी है उसका सुंदर कलेक्शन है मायर कथा या तो फिर मां की बातें बहुत सुंदर किताब है तो वो किताब में जब टीसी से जा रहा था टीसी में वो किताब मेरे पास थी बहुत सारी एंड उसमें उस समय में हाईलाइट किया करता था तो हाइलाइटर्स है तो मैं जब टीसी छोड़ने के समय कौन-कौन सी किताब ले जानी है नहीं ले जानी है तो मैंने मायर कथा खोल के देखा तो ऑलमोस्ट सभी पेजेस पे आधे से ज्यादा पेज हाईलाइट किया हुआ है मैंने सोचा इस किताब को ले जाने से क्या लाभ है वैसे ही तो पूरे पूरी हाईलाइट है अच्छा है कि मैं दूसरी किताब खरीद दूं और फिर उसको मैं स्पेयरिंगली मैंने जो जो ट्रूली सिग्निफिकेंट लिखे लगे उसको मैं हाईलाइट करूं तो वो किताब मैंने वहीं पर छोड़ दी अभी आज मुझे उस बात का बड़ा ही रिग्रेट होता है क्योंकि उस किताब को मने वो मेरी इतनी प्यारी थी मैं उसको बार-बार पढ़ता रहता था और उसमें इतने सारे मेरी नोट्स थी यह किताबें जो है ना अभी अपने प्राण स्वरूप हो जाती है एक समय ऐसा आता है अभी जैसे कि मेरी अपनी खुद की एक पर्सनल लाइब्रेरी लेकर के मैं घूमता हूं जहां प भी जाता हूं तो एक बार एक जगह पे मैं मेरा जब मतलब एक सेंटर से दूसरे सेंटर में पोस्टिंग होता है तो पूरी लाइब्रेरी मेरी वो जो बड़े-बड़े क्रेट होते हैं ना छह सात क्रेट भर कर के मेरी लाइब्रेरी मेरे साथ में जाएगी तो ऐसा एक नए सेंटर में मेरा पोस्टिंग हो गया तो वहां पे किसी ने वो सब इतने सारे क्रेट्स देख करके बोला अरे तुम इतनी सारी किताबें साथ में लेकर के क्यों घूमते हो तुम जब नई जगह जाओ तो लाइब्रेरी में तो यह सब किताबें मिलती है और तुम चाहो तो परचेस भी नहीं कर सकते हो तो मैंने सोचा कि देखो इस तरह की जो एडवाइस देता है उसने कभी किताब पढ़ी नहीं है ठीक से क्योंकि जद आप ठीक से किताब पढ़ेंगे तो उसमें आपकी एक इंप्रिंट रह जाएगी आपकी जो आइडियाज है आपका जो आपकी जो अनुभूतियां है आपका किताब के साथ में जो रिश्ता है उसकी छाप किताब के ऊपर में रह जाएगी अभी मैं यहां पे ब्रह्मचार्य के लिए क्लास लेता हूं दोपहर को तो लेटर्स ऑफ स्वामी विवेकानंद तो मैं बंगाली जो लेटर है उसमें से पढ़ रहा हूं तो उसकी इतनी मोटी किताब है माने स्वामी जी की पत्रावली बंगाली में सभी 750 प्लस लेटर्स उस किताब में है तो वो वो यह किताब मेरे साथ में कब से थी मुझे लग रहा है कि टीसी से पहले से ये मेरे साथ में चली आ रही है मोर देन 18 इयर्स हो गया कि व किताब मेरे साथ में है पत्ते भी उसके ये हो गए हैं कहां-कहां से थोड़ी सी फट गई है किताब तो किसी ने कहा कि अरे आप पुरानी किताब क्यों यूज करते हैं नहीं ले लीजिए तो मैंने उसको खुला किताब को खोल करके दिखाया देखो पत्ते पत्ते प कितनी सारी नोट्स लिखी हुई है कितनी हाइलाइट्स की है कितनी अंडरलाइन की है यह किताब जद मैं छोड़ दूंगा तो मेरा जो स्वामी जी के लेटर्स का जो रीडिंग है वो पूरा रीडिंग ही चला जाएगा किताब के साथ में तो वैसे ही जब यह सब किताबें पढ़ते हैं तो प्रश्न होता है कि कितना हाईलाइट करें कितना ना करें तो ये जो देवता देवता ई आछ वैसे इसको हाईलाइट करने की जरूरत है किंतु फिर भी मैंने नहीं किया क्योंकि इसके नीचे और भी सिग्निफिकेंट पैसेज था वही पैसेज जो कि हम डिस्कस कर रहे हैं कि ठाकुर और मां का जीवन तीन लेवल पर है पति और पत्नी का गुरु और शिष्य का और पूज्य और पूजक का तो यह हो गया अच्छा अभी जो हम बात कर रहे थे पति और पत्नी का गुरु और शिष्य का तो ट्रेडिशनल रोल है किंतु पूज्य और पूजक का जो रोल है ठाकुर और मां के जी वन में दिस इज वेरी सिग्निफिकेंट एक पूरा हमको हमको ऐसा लगेगा कि आध्यात्मिक जगत में एक नई क्रांति जैसे ला देता है इस तरह से यह तो है हालांकि यह भी एक बात है कि हिंदू धर्म में जिस तरह से शक्ति को डिफाइन किया गया है हिंदू धर्म में जिस तरह से शक्ति का प्रभाव महता और महत्व वर्णित किया गया है उस दृष्टि से यह कोई नई बात नहीं है किंतु फिर भी बिकॉज के कि हम लोग खास करके यह जो थोड़े से चिंता करने की जिनको ज्यादा हैबिट है वे लोग जब बाकी सब रिलीजन का स्टडी करेंगे जैसे कि जीसस का लाइफ स्टडी करेंगे जैसे कि बुद्ध का लाइफ स्टडी करेंगे तो हमको ऐसा लगता है कि जैसे कि महावीर जैन का लाइफ स्टडी करेंगे तो हमको लगता है कि अरे इनके जीवन में तो वह जो अवतार जो थे हालांकि वे लोग तो उनको अवतार नहीं कहेंगे हमारी दृष्टि से यदि हम उनको अवतार के रू में गिने तो उनका जीवन देखिए वह अकेले आए अकेले चले गए उनके जीवन में और किसी का इतना सिग्निफिकेंट नहीं है या तो फिर यदि होगा तो उनके जीवनी कारों ने उस सिग्निफिकेंट को हाईलाइट नहीं किया है जबकि हिंदू धर्म अपनी सनातन परंपरा ही एक ऐसी परंपरा है जहां पर शक्ति का महात्म्य इतना इतना भक्ति भाव से वर्णित किया गया है किंतु यहां पर भी देखिए जैसे कि अ राधा और कृष्ण मां सीता और भगवान राम इन दोनों के जो जीवन का जो आलेखन है और ठाकुर और मां का जीवन का आलेखन इसमें कुछ-कुछ सिग्निफिकेंट हमको यह दिखता है यूनिकनेक्ट नहीं कहूंगा क्योंकि डिफरेंस कहना उचित नहीं होगा मुझे ऐसा नहीं लगता कि हमारी भारतीय परंपरा में आइडियाज कोई नए आते हैं यह जो इवोल्यूशन हो होता है आइडियाज का मुझे ऐसा लगता है कि आइडियाज का एक्सप्रेशन चेंज होता है अंडरलाइन आइडियाज चेंज नहीं होते तो वह जो सिग्निफिकेंट कनेस क्या है उसका भी थोड़ा-थोड़ा अभ्यास हम आगे चलकर करेंगे तो हम लोग यहां तक पहुंचे हैं आगे देखते हैं कि महाराज जी क्या लिखते हैं आमरा ठाकुरे अनुष सड़सी पूजा वर्णना भूमिका कोरीते छी हम लोग ठकुर द्वारा अनुष्ठा अनुष्ठा नित शशी पूजा की भूमिका बना रहे हैं श अचिंत्य पूर्व घटनाए आशी बार पूर्वे एई देवो दंपति अपा प विद्ध संबंध टी आमा दग के आर एकट आलोचना करिया देखीते ईवे किंतु उस सिग्निफिकेंट विश्व जगत में अध्यात्मिक जगत में इस तरह की यूनिक घटनाएं जो रेयरली हुई है उस तरह की घटना प आने से पहले अापद दंपत्ति अर्थात कि एक ऐसा दंपति जिनके शरीर में मन में कभी भी किसी तरह का पाप का प्रवेश नहीं हुआ इस तरह का यह अ पाप विद्ध दंपत्ति के जीवन की घटनाओं का थोड़ा सा विशेष रूप से आलोकनगर ही समय अवसर मतो गृह कर्मों आत्मीय वर्ग प्रति व्यवहार अपरे गृहे भव्यता प्रव सांसारिक शिक्का होते आरंभ करिया भजन कीर्तन ध्यान समाधि और ब्रह्मज्ञान कथा पर जंतो सकल विषय श्री मां के उपदेश दिया ठाकुर ने इस समय में गृह कर्म कैसे करना है अर्थात की घर का काम कैसे करना है आयो बोर्गर प्रति व्यवहार अर्थात की जो रिलेटिव्स है जो संबंधी है उनके प्रति किस तरह से व्यवहार करना है अपरे गृहे भव्यता अर्थात कि जद दूसरों के घर पर जाते हैं तो किस तरह से विचार आचार करना है वगैरह सांसारिक शिखा होते आरंभ कोरिया अर्थात की यह सब सांसारिक शिक्षा से प्रारंभ करके भजन कीर्तन ध्यान समाधि और ब्रह्मज्ञान कथा पर जंतो सकल विषय श्री मां के उपदेश दिया लेन भजन कीर्तन ध्यान समाधि और ब्रह्म ज्ञान यह सभी विषयों के बारे में श्री मां को उपदेश दिया है ई शकल तत्व कथा सुनिया श्री मायर निकट मानव जीवने कर्तव्य उद्देश्य अति स्पष्ट भावे प्रकट तो होया छलो यह सब तत्व कथा सुनकर के मां के पास में मानव जीवन का कर्तव्य और उद्देश्य अति स्पष्ट भाव से प्रकट हुआ था यह जिस जिस तरह ठाकुर मां को शिक्षा देते गए वैसे-वैसे ही मां को समझ में आने लगा या तो फिर समझ में तो ऑलरेडी था क्लेरिटी बढ़ती गई कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है और कर्तव्य क्या है यह स्पष्ट से स्पष्ट तर होता गया ठाकुर तहा के एक दिन बोलिया छिले ठाकुर ने मां को एक दिन कहा था चांदा मामा जमन शोब शिशु मामा जैसे कि चांदा मामा सभी शिशु के तमनी ईश्वर श कोलेर आपना वैसे ही ईश्वर सबके अपने है ताके डाक बार सकले रही अधिकार आछ उनको पुकारने का अधिकार सभी को है जे डाक बे तीनी ताकी देखा दिया कृतार्थ कोर बेन जो पुकार का उन्हीं को दर्शन देकर के ईश्वर कृतार्थ करेंगे तुम डाको तो तुमियो देखा पावे तुम पुकारो तो तुम भी देख पाओगी तीनी उपदेशो दयाई खान तो होई तेना ठाकुर सिर्फ उपदेश देकर के रुक नहीं जाते थे श्री मा ओई शकोल कोथा क तोटा कीरू पे जीवने प्रतिपाल करते छन तहारो खोज राखी तेन श्री मां इस सब बातों का किस तरह से पालन करती थी अपने व्यवहार में जीवन में किस तरह से उसका अमल कर करती थी यह सब चीजों के ऊपर में भी ठाकुर नजर रखते थे तो यह म इतनी सुंदर बात है जैसे आजकल के बच्चों को हम ये जो कहानियों के माध्यम से उपदेश कथाओं के माध्यम से कुछ सिखाना चाहते हैं तो हमको ऐसे इतने उच्च आदर्श है इतने मने गंभीर आध्यात्मिक सत्य है बच्चों को कैसे समझाएंगे एकदम जिनका सरल जीवन है जिन्होंने कोई बौद्धिक प्राप्ति जिनके जीवन में नहीं है सरल गांव की बालाएं हैं बच्चे है स्त्रियां है कैसे समझाएंगे उनको तो इस आध्यात्मिक उपदेश को एकदम सरल रूप से व्यक्त कर देना यह देखिए कि ठाकुर को कितना सुंदर आता है कि चांदा मामा जैसे सबके मामा है वैसे ही ईश्वर हमारे सबके है ईश्वर को पुकारने का हम सबको अधिकार है जैसे ही पुकारेंगे वैसे ही ईश्वर हम सबको आकर के दर्शन देंगे देखिए मैंने एक उपमा ऐसे दे दी जैसे जितने भी छोटे बच्चे होंगे आजकल आजकल का तो मुझे पता नहीं मेरी जनरेशन के पहले की जनरेशन के तो ये चांदा मामा की बातें फिर वो एक चांद को देखते हैं तो कैसे उसमें एक बूढ़ी औरत और एक खरगोश जैसा कुछ दिखाई देता है यह सब बातें मुझे याद है मैं जब छोटा था और मैं अपने गांव में जाता था मसाल कहते हैं ना मां के घर को तो छुट्टी में मां के घर जाते थे मेरी मां का घर एक गांव में था तो वहां पे वह बैठ कर के वह मेरे दादा थे नाना उनके साथ में बैठ कर के वह मुझे कहानियां सुनाते थे और मैं सुनता था हम चार-पांच मेरी ही उम्र के सब कजंस वगैरह थे तो कहानी सुनाते थे मैं सुनता था हम लोग सब बैठ कर के मुझे अभी भी याद है तो व कहानियां कैसे अपने जीवन में बुन जाती है यह कहानियां कैसे ही अपने बचपन का यह जो डेवलपमेंट होता है वह बचपन का हमारा साइकोलॉजी उसमें कैसे फिट बैठ जाती है फिर यह सब उसी कहानियों का माध्यम से यदि हमको कोई कुछ सिखाए तो हम लोग इमीडिएट समझ जाते हैं कि हां वो क्योंकि क्या है कि हमारे सबकॉन्शियस लेवल तक यह सब कहानियां पहुंच गई है और जो कहानी के माध्यम से इस तरह का उपदेश देता है उन लोगों को भी तो हमको देखना चाहिए कि उनकी इनसाइट कितनी गहरी होगी जैसे कि फॉर एग्जांपल अ कहानी या तो फिर इस तरह से उपमा के रूप में उपदेश देना अ स्वामी जी होलिस्टन बोलकर के एक लड़का था जब वो रिजली मेनर गए थे रिजली मेनर की बात है मोस्ट प्रोबेबली तो वहां पे एक लड़का था तो स्वामी जी उसको अद्वैत वेदांत सिखा रहे है अभी एक अमेरिकन लड़के को अद्वैत वेदांत सिखाना ये मने कैसा लगेगा ये कितना विचित्र है कैसे सिखाएंगे अद्वैत वेदांत समझने के लिए हम इंडियन लोगों को ही सालों साल तपस्या करनी पड़ती है क्या से क्या करना पड़ता है तब कहीं जाकर के हमको अद्वैद समझ में आता है अभी एक अमेरिकन लड़का जिसको आध्यात्मिक ता भारतीय संस्कृति कुछ कुछ आईडिया नहीं है कैसे उसको अद्वैत वेदांत समझाएंगे तो ठाकुर ने स्वामी जी ने क्या कहा पता है कि देखो ईश्वर अभी शब्द ईश्वर यूज करते हैं क्योंकि गॉड शब्द यूज नहीं करेंगे आत्मन या ब्रह्मण करेंगे यूज तो बच्चा वैसे ही कंफ्यूज हो जाएगा तो स्वामी जी उसको गॉड अर्थात कि ईश्वर वो अपने कितने नजदीक है पता है तो स्वामी जी उसको पूछते हैं तो वह बोलता है नहीं कैसे पता होगा कि ईश्वर हमारे कितने नजदीक है हम लोग तो उन लोगों को चर्च में जो पढ़ाया जाता है गॉड लीव्स इन हेवन मने वो स्वर्ग में या तो बादल के ऊपर में भगवान रहते हैं और उनको प्रार्थना करो तो उनका दर्शन देंगे तो स्वामी जी कहते हैं कि वो बादल के ऊपर में ना कि कोई चर्च में ना कि देवालय में ऐसा कुछ नहीं अपने कितने नजदीक है तो कितने नजदीक है जितनी ही नजदीक तुम्हारी आंख है ये आंख मेरी कितनी नजदीक है किंतु प्रॉब्लम क्या है पता है मैं अपनी आंख को देख नहीं पाऊंगा मेरी इतनी नजदीक होने के बाव क्यों क्योंकि इसी आंख से तो मैं जगत को देखता हूं तो आंख आंख को कैसे देखेगी आंख को रिवर्स कर देना पड़ेगा क्या उसको खुद को देखने के लिए तो आंख को देखने के लिए या तो फिर मिरर में देखना होगा तो देखिए कि यह अद्वैत वेदांत कितना परफेक्टली स्वामी जी ने समझाया है यहां पर जैसे कहा ना स्वामी जी पहले ही हमको याद है कि कॉस्मो माइक्रो कजम में स्वामी जी क्या कहते हैं इस आंख की दृष्टि से ही हम जगत को देखते हैं जगत का ये जो सिग्नल है बुद्धि को जाता है मन को जाता है मन बुद्धि को देता है बुद्धि आत्मन को देती है तो अपने को ही अपने को देखना है सब्जेक्टिव ईश्वर सब्जेक्टिव है नहीं कि ऑब्जेक्टिव ये अद्वैत वेदांत क्या कहता है ईश्वर मैं ही हूं मैं ही ईश्वर स्वरूप हूं किंतु मैं अपना सही स्वरूप समझ नहीं पाता हूं इसके लिए मैं पूरे आकाश में ना कि कहीं कहीं पर मैं ईश्वर को देखने का प्रयास करता हूं किंतु मुझे अपनी खुद की आंख देख हो तो क्या करना पड़ेगा मिरर में देखना पड़ेगा आईने में देखना पड़ेगा तो ये आईना जो है वो है अवतार अभी ईश्वर और अवतार में यह डिफरेंस है अवतार हमारी ही तरह मनुष्य है अवतार के भीतर में दिव्यत्वाची इस दिव्यता का वहन करने के लिए सक्षम है आपको कोई ईश्वरीय शरीर नहीं चाहिए दिव्य शरीर नहीं चाहिए आपको यह सब पाव योगिक पावर्स नहीं चाहिए कि मैं हवा में उड़ पाऊं मैं कोई कहां पे वो आका में हवा में से खाना प्रकट कर पाऊं यह जो मिरेकल्स होते हैं वोह मिरेकल्स हमको नहीं चाहिए मनुष्य का शरीर इज कैपेबल इनफ टू कंटेन डिविली तो यह जो मिरर है यह मिरर है अवतार अवतार को देख कर के पता चलता है कि मेरे भीतर में भी यह दिव्यता प्रकट हो सकती है यदि मैं वह साधना करूं तो देखिए एक ही उदाहरण में स्वामी जी ने कैसे द्वैत और अद्वैत ब्राह्मण और अवतार दोनों कांसेप्ट समझा दिए तो यह ग्रेट लोग जो होते हैं ग्रेट टीचर होते हैं उनकी ये खूबी होती है उनकी यह स्पेशलिटी होती है कि एकदम छोटे-छोटे इस तरह के उपदेश के माध्यम से आपको ईश्वरीय शिक्षा दे दे कि जैसे वो सीधे अपने हृदय में चली जाए तो यहां पे भी ठाकुर वो चांदा मामा का उदाहरण चांदा मामा की बातें कहानियां सभी लोगों ने सुनी होगी और सभी कोई ऐसा नहीं कहेगा कि इस पार्टी र ग्रुप या इस पर्टिकुलर रिलीजन या इस पार्टिकुलर जात या नात के चांदा मामा है चांदा मामा सबके है तो वैसे ही उस समय का यह जो भारत बटा हुआ था तो हमारा समाज यह सब नाती जाति में बटा हुआ था किंतु चांदा मामा जितने ब्राह्मण के हैं उतना ही जो अब्राह्मण जात है उनके भी है तो वैसे ही ईश्वर सभी के है ईश्वर को पुकारने का हक सभी को है राइट सभी को है श्री मां सारा दिन नह बते थाक संसारे काज करम कोरी तेन किंतु प्रति रात्रे तिनी ठाकुर घरे तहर सज्जा शयने अनुमति पाया लेन श्री मां पूरा दिन नबत में रह कर के सारा काज कर्म करती थी सारा काम करती थी किंतु रात को तो ठाकुर के साथ में ही एक ही कमरे में सोने की अनुमति उनको मिली थी इ हार एक समय श्री मां के एकांत पाइया ठाकुर परीक्षा छले जिज्ञासा करिया लेन उसी दौरान एक रात को मां को अकेले देख कर के ठाकुर ने परीक्षा के रूप में प्रश्न किया था की गो तुम की आमाई संसार पथे टेने निते से छो क्या तुम मुझे संसार के रास्ते पर खींच जाने के लिए आई हो क्या श्री मां बिंदु मात्र इत स्त ना कोरिया उत्तर दिया लेन माने बिना किसी संकोच के बिना किसी द्विधा के उत्तर दिया था ना आमी तो मा के संसार पथे केनो टान जाओ ना मैं तुमको संसार के रास्ते पर क्यों खींच के ले जाऊंगी तुम्हार इष्ट पथ सहज करते ऐसे छी तुम्हारे इष्ट पथ अर्थात की आध्यात्मिक यात्रा में ही सहाय करने के लिए आई हूं देखिए किस तरह की ये एक डिलीशियस आईरनीज बोलती है कि जो आध्यात्मिक यात्रा है आध्यात्मिक जगत की उनकी सफर है उसमें सहाय करने के लिए आई है साथ-साथ में ही ठाकुर की आध्यात्मिक यात्रा का जो डेस्टिनेशन है जो उसका अंतिम छोर है वो छोर वो डेस्टिनेशन ही तो मां स्वयं है जिस मां काली की आराधना ठाकुर करते हैं जिस मां काली की पूजा ठाकुर करते हैं मां शारदा वही मां काली का जीवंत स्वरूप नरदह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण की है तो यह ठाकुर के जीवन में जो उनकी इष्ट जो उनके इष्ट है वही इष्ट उनकी साथ में शक्ति के रूप में उनका हाथ पकड़ कर के उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं ये ये जद देखे इसके बारे में थोड़ा सा तो कितना एक ये सर्कल जैसा लगता है कि ठाकुर मां काली और मां शारदा यहां पर दो नहीं है तीन है माने भक्त है भगवान है और भगवान के भी रिप्रेजेंटेटिव है व तीनों मने अवतार शक्ति और ईश्वरी यह तीनों यहां पर कार्य कर रहे हैं तीनों का डायनेमिक्स हमको दक्षिणेश्वर में देखने को मिल रहा है श्री माओ एक दिन ठाकुरर पद संवाहन करते कोरीते जानी ते चाहे नेन माने भी एक दिन ठाकुर के पग दबा रही थी उस समय माने ठाकुर को पूछा था कि आमा के तुमार की मुने होए तुम मुझे किस तरह से देखते हो तुम में तुम्हारी क्या हूं ठाकुर तद उत्तरे बोली ले ठाकुर ने उसके उत्तर में कहा जे मां मंदिरे आन तिनी शरीर जन्म दिए छन नहते बास कोर छन जो मां मंदिर में है वही इस शरीर को जन्म दी है अर्थात कि ठाकुर अपने को बोल कर के वही जो मां मंदिर में है अर्थात मां काली वही मां काली ने इस शरीर को जन्म दिया है अर्थात कि ठाकुर के शरीर को व एको नबत बास करछ वही मा काली नबत में निवास कर रही है आर तीनी एकन अर पद सेवा करछ और वही मां काली अभी उनकी पद सेवा कर रही है साक्षात आनंदमय रूप बोले तो माय सर्वदा सतो सतो देखते पाई साक्षात आनंदमय का रूप बोलकर के मैं तुमको सम हमेशा सत्य सत्य तुमको मैं देख पा रहा हूं किस तरह का यह है कि जिनकी पूजा करते हैं वही उनकी पूज्य उनकी पत्नी का शक्ति के रूप में देह धारण करके उनकी पद सेवा कर रही है उनकी सेवा कर रही है खाना बनाना वगैरह जो कुछ भी करना ठाकुर को सहाय कर रही है अभी ठाकुर को हमको यह बात पढ़कर के एक प्रश्न हो सकता है कि ठाकुर को मां की सेवा ग्रहण करने में क्या संकोच नहीं होगा क्योंकि वह जिनकी आराधना करते हैं ठाकुर स्वयं यदि यह कहते हैं कि मैं जिनकी आराधना करता हूं मां काली वही मां काली यदि मां शारदा का स्वरूप धारण करके मेरी सेवा कर रही है तो मां शारदा की सेवा में कैसे ग्रहण कर सकता हूं यह प्रश्न क्या नहीं होगा तो होगा और इसका बड़ा ही सरल उत्तर है कि ठाकुर को मां की सेवा मां शारदा की सेवा ग्रहण करने में संकोच इसलिए नहीं है कि उनको यह भी पता है कि उनके खुद के भीतर में मां काली है अर्थात कि वही मां काली जिनकी मंदिर में पूजा उपासना होती है वही मां काली उनके हृदय में विराजित है और वही मां काली मां शारदा का स्वरूप धारण करके उनकी सेवा कर रही है यह जो पूरा विश्व ईश्वरम देखना यह अद्वैत वेदांत का हाईएस्ट मेनिफेस्टेशन हमको यहां पर दिखता है किंतु देखिए हमारा लिटरेचर पढ़ कर के जैसे कि मास्टर महाशय स्वयं थोड़ा सा कंफ्यूज हो जाते थे कथामृत में उन्होंने लिखा है कि श्री राम कृष्ण देव का विशिष्ट अद्वैतवाद अर्थात कि भगवान रामकृष्ण विशिष्ट अद्वैतवाद को प्राधान्य देते हैं ऐसा उनको कभी-कभी लगता है तो इसीलिए मैं जब नया-नया जॉइन करने को आया था तो दो-तीन साधुओं ने मुझे ऐसा कहा था कि देखो तुम कथामृत इतना ज्यादा मत पढ़ना अभी कथामृत भक्तों के लिए लिखा गया है तुम लीला प्रसंग पहले अच्छे से पढ़ लो क्योंकि वोह साधुओं के लिए लिखा गया है और उसमें अद्वैत के ही मने अद्वैत का ही महात्म सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रतिपादित किया गया हालांकि आप जद लीला प्रसंग पढ़ेंगे तो उसमें तो ठाकुर ने जितनी भी साधनाएं की सभी साधनाएं को इक्वल इंपॉर्टेंस ही दिया गया है किंतु फिर भी अवेद का महात्म वर्णित है अलोंग विथ मधुर भाव साधना अलोंग विद शक्ति साधना तो वो अद्वैत साधना का महात्म अपने मन में पहले ठीक-ठीक बिठा दो बाद में यह भक्ति भक्त भगवान वगैरह की बातें करना ऐसा मुझे किसी किसी ने बताया था तो मुझे उस समय प्रश्न हो था कि ठाकुर क्यों जानबूझ कर के अपने भक्तों को भ्रमित करेंगे क्या प्रश्न यहां पर यह है कि किसकी क्या क्वालिफिकेशन है उसके अनुसार उसको व फिलोसोफी समझाना जैसे कि यह जो ध्व अध जो ध्व वाद विशिष्ट अद्वैतवाद और अद्वैतवाद यह जो तीनों मुख्य वाद है अपनी भारतीय वेदांत परंपरा में वेदांतिका एं हैं है वेदांत के भीतर में किंतु यह तीनों को यदि मुख्य गिना जाए तो हमको प्रश्न होगा कोई ऐसा पूछेगा कि तीनों का क्या है इंपॉर्टेंस किस तरह से किसको क्या लेना है तो अधिकारी वाद के अनुसार जो साधक अभी शुरू कर रहा है अपनी साधना तो उसको ध्व वाद सिखाओ अर्थात कि उसको कहो कि तुम भक्त हो यह भगवान है जो कि मंदिर में विराजित है तुम जाकर के मंदिर में भगवान की उपासना करो प्रार्थना करो भगवान के सामने बैठ कर के जप ध्यान करो फिर जैसे-जैसे अद्वैतवाद से विशिष्ट अद्वैत वास से अद्वैत वास की ओर जैसे वो साधक का जो चित्त शुद्धि होता जाएगा साधक के कर्मों के संस्कार जैसे-जैसे कटते जाएंगे वैसे-वैसे ही दिव्यता की जो उपलब्धि होगी उसके हृदय में उसको यह समझ में आता जाएगा कि हां ईश्वर जिनकी मैं मंदिर में उपासना कर रहा हूं वो मेरे ही हृदय में विराजित है और मैं ही ईश्वर का ही एक किरण हूं ईश्वर की दिव्यता का ही एक किरण हूं और वहां से और भी आगे जाएगा तो आखिर में अनुभूति होगी मैं ही ईश्वर हूं अहम ब्रह्मास्मि तो यह जो यात्रा है कि ईश्वर मेरे बाहर में है मैं पापी हूं उनकी उपासना कर रहा हूं वहां से लेकर के ईश्वर मेरे ही हृदय में विराजित है मैं ही ईश्वर की दिव्यता की एक किरण हूं और वहां से लेकर के मैं ही ईश्वर हूं मैं ही ब्रह्मण हूं यह जो यात्रा है साधक की यात्रा इसके अनुसार यह सब फिलोसोफी डेवलप की गई है तो अब भी जब कथामृत जैसे ग्रंथ कि जबकि ठाकुर भक्तों के सामने खास करके बात कर रहे हैं ईश्वर ईश्वरी की बात कर रहे हैं भक्त और भगवान की बात कर रहे हैं तो हमको शायद यह कंफ्यूजन हो सकता है कि ठाकुर मुख्यतः ज्यादातर तो यह अद्वैतवाद विशिष्ट अद्वैतवाद या तो द्वैतवाद का ही प्राधान्य प्रतिपादित कर रहा है किंतु ऐसा नहीं है जद इवन यह जो द्वैतवाद या विशिष्ट अद्वैतवाद को भी हम बिल्कुल ध्यान से स्टडी करें इसके भीतर में भी अद्वैत है क्योंकि यह जो जिस तरह से बाकी सब द्वैतवाद की फिलोसोफी है जैसे की क्रिश्चियनिटी वगैरह है और हमारे यहां पे जो ध्व वाद है उसमें जो आपको पता होगा कि डिफरेंस क्या है वहां का जो द्वैतवाद है वहां पे ईश्वर जो है वो हमेशा भक्त से सेपरेट रहेगा भक्त और भगवान के बीच में एक स्टोन वल जैसा है भक्त भगवान की उपासना करके उनके गुण अपने में प्रवेश करवा सकता है जैसे कि स्टिग्माता बोलकर के एक कांसेप्ट है जैसे सेंट फ्रांसिस वगैरह कोई कोई थे एगजैक्टली मैं भूल गया सेंट फ्रांसिस ही थे शायद ऐसे संतों को जब ईश्वर जीसस की बहुत सारी उपासना करेंगे तो क्या होगा कि जैसे जीसस को शूली पर चढ़ाया गया था क्रुस विद्ध किया गया था तो हाथों में जो खीले बा डाले गए थे तो उस तरह की जो हाथों प घाव उनको हो जाएगा स्टिग्मा जिसको कहते हैं कि मैं जीसस के साथ में इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट जैसे कि है ना वो किताब है मैं जीसस के साथ में इतना एकरूप हो गया हूं इतना तादात में हो गया है कि जीसस के गुण धर्म मेरे में आ रहे हैं और उनके शरीर पर जो घाव किए गए हैं उनकी हत्या करने के समय वो भी मेरे शरीर में प्रकट हो रहे हैं किंतु इतना होने के बावजूद भी देयर इज अ क्लियर डिस्टिंक्शन बिटवीन अ मैन एंड गॉड क्योंकि जीसस जो है इज द सोल सन ऑफ गॉड उसके अलावा और कोई सन नहीं हो सकता हम सभी लोग डिफरेंट है तो किंतु यहां पर अपनी भारतीय परंपरा में ऐसा नहीं है यदि मैं ईश्वर की आराधना करता हूं तो वही वेदांत एक समय कहता है कि भक्त और भगवान और जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा हमारी प्योरिटी बढ़ती जाएगी वही वेदांत कहेगा भक्त ही भगवान है भगवान ही भक्त है जैसे कि ठाकुर ने कहा कि वृंदावन में भगवान कृष्ण को भी गोपी का स्वांग रचना पड़ा था गोपी के वस्त्र परिधान करके रास लीला में करना पड़ा था क्योंकि तभी तो गोपियों के साथ में प्रकृति के साथ में एकाकार तदुपरांत में यदि हम चाहे द्वैत को भी स्टडी करते हैं तो इस तरह से अद्वैत आ जाता है कि जिसने फिलोसोफी ठीक ठीक स्टडी की हो वे पकड़ पाएंगे कि हां अद्वैत के नाम पर यहां पर एक्चुअली हम अद्वैत के नाम पर यहां पर एक्चुअली अद्वैत ही सिखा रहे हैं तो यह जो एक छोटी सी घटना है कि जब ठाकुर क कते हैं कि हां जिस मां काली की पूजा मंदिर में होती है जो मां काली ने इस शरीर को इस देह को जन्म दिया है वही मां काली नबत में मां शारदा के रूप में रह रही है और वही मां काली मेरी पद सेवा कर रही है तो यह एक्चुअली द्वैत नहीं एक तरह से देखा जाए तो अद्वैत ही हुआ तीनों ही मां काली के ही डिफरेंट डिफरेंट मेनिफेस्टेशन है एक तीनती एक तो यह अद्वैत ही है बस थोड़ा सा इसको इंटेलेक्चुअली समझने की जरूरत है तो आज यही तक कल फिर से शाति शांति शांति हरि ओ तस श्री रा
Questions & Answers
कम ना एक्चुअली देखिए कि यह जो त और अधत का यह जो मिलन भूमि और यह जो सामंजस्य वगैरह है ना वह हम अपनी किताबें पढ़ते हैं तो हमको बड़ा इजी लगता है किंतु यह अद्वैतवाद भी तो कम नहीं थे तोतापुरी को ही देख लीजिए ठाकुर जब ताली बजाते बजाते मां का नाम लेते थे तो क्या कहते थे क्या रोटी ठोक रहे हो क्या व शक्ति को नहीं मानना फिर पेट में दर्द होना गंगा में हत्या देने के लिए जाना फिर पता चलना कि अरे शक्ति के इलाके में ही सब कुछ है य सुंदर एक बात है व सर्वप्रिया अंद जी हमको क्लास में बताया कर थे ट्रेनिंग सेंटर में कि वह जो गांव के बाहर में जो धर्मशाला जैसा होता है ना तो वह साधु वगैरह जो यात्रा करते करते वो वहां पर जाकर के रुकेंगे और गांव वाले आकर उनको थोड़ा खिलाएंगे और उनके आशीर्वाद उपदेश सुनेंगे तो एक रात को वो एक ध्व वादी और अद्वैतवाद दोनों इकट्ठा हो गया तो वो जो अद्वैतवाद था वो जो दीवाल पर लग देता है कि सो हम फिर वह लिख कर के उसके सामने बैठ के ध्यान करेगा तो वह जो धत वादी है वो देख कर के बड़ा ही नाराज हो गया बोला कि अच्छा अपने को सोहम बोलता है अच्छा देख उसने वो कोयला का वो उठा कर के आगे में लिख दिया दा अर्थात की दासो हम तो अद्वैत वादी बड़ा ही नाराज हो गया बोलता है अच्छा दासो हम तो पता नहीं है कि हमारे भीतर में आत्मन है वो तो अपने को दास बताते हैं जो आत्मन स्वयं वो दास कैसे हो सकता है तो उसने वो बुद्धि होती है ना इन लोगों की तो कोयले के टुकड़े से उसने उस आगे स लिख दिया सदा सोहम व द्वैतवाद कहता है अरे भाई मैं भक्त हूं मुझे हमेशा ये सो हम ये क्या उल्टा पुल्टा सिखा रहा है उस आगे दा लिख दिया दास दासो हम मैं सिर्फ दास नहीं हूं दास का भी दास हूं ये झगड़ा चलता गया वो स लिखता है वो दा लिखता है दास दास दासो हम सदा सदा सदा सोहम हां वो तो ठाकुर ने खुद ने कहा है ना वो कहानी बता करके भगवान राम जब वन में जा रहे थे कुछ ऋषियों के साथ में मुलाकात हो गई तो उन्होंने कहा कि हम तो तुमको हम तो आपको दशरथ के बेटे के रूप में ही जानते हैं तो अभी जब यह बात हुई तो भक्तगण जो सामने बैठे थे ऐसे होते हैं ना वो बढ़ा चढ़ा करके वो बोलने वाले तो उसने इमीडिएट बोल दिया ऋषि रा बोका छिले ऋषि मुनि जो कि भगवान राम को भगवान के रूप में ना देख पाए वो मूर्ख थे तो इमीडिएट ठाकुर किंतु नाराज हो कर के बोले अरे ऋषि मुनियों के बारे में ऐसा नहीं कहना जो कि साधना तपश्चार्य कर रहा है इवेंचर परब्रह्म की पूजा कर रहे हैं या तो परब्रह्म को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे वही भगवान राम स्वयं है तो एक मेन चीज है कि यदि हमने एक यात्रा प्रारंभ कर दी तो ईश्वर की कृपा से यात्रा के अंत तक अवश्य पहुंचेंगे यदि यात्रा का प्रारंभ ही नहीं किया आध्यात्मिक जगत में पैर ही नहीं रखे तो फिर एक दूसरी बात हो गई किंतु यदि एक पैर भी रख दिया तो बाकी के 100 पैर भगवान ही हमको हाथ पकड़ कर के ले जाएंगे अप टू अवर फाइनल डेस्टिनेशन राम कृष्ण अपना जो संघ है ना उसकी नियमावली स्वामी जी बना कर के गए थे अभी इतनी छोटी सी पुस्तिका है पॉकेट साइज की है व एकदम पतली है मेरे ख्याल से मुश्किल से 253 पेज ना कि इतना कुछ होगा मैं भूल गया एग्जैक्ट संख्या क्यों तो बहुत छोटी किताब है तो अभी हम लोगों के जो सीनियर साधु है कभी-कभी हमको कहा करते हैं कि हम लोगों ने बहुत सारा टेंप्टेशन हमारे सामने आया कि बहुत सारे नियम ऐड करते रहे जैसे-जैसे कि अपना एक्सपीरियंस बढ़ता या इस संघ को चलाने का किंतु फिर भी हमने उस टेंप्टेशन को रोक के रखा है एडमिनिस्ट्रेटिव लॉज तो बनते रहते हैं क्योंकि वह गवर्नमेंट कंप्लायंस वगैरह होता है किंतु ये जो स्पिरिचुअल लॉज है वह इतना छोटी सी पुस्तिका में ही हो जाता है जबकि बुद्धिस्ट संग देख है तो मैंने उनके नियमावली वगैरह पढ़ा है बड़े-बड़े थोथे होते हैं और उसमें ऐसे चित्र विचित्र नियम कानून सब लिखे होते हैं वो कैथोलिक ऑर्डर्स जो होते हैं उनके भी वो लॉज एंड रूल्स एंड रेगुलेशन का ऐसा भरमार हो गया है किंतु जब यह बातें ऐसी होती है ना तो मेरे मन में यह भी प्रश्न आता है कभी तो हमको 150 200 साल ही हुए हैं कि 2000 साल हो गए तब क्या होगा वो पता नहीं ये जो अपनी जो फ्लेक्सिबल है फिलोसॉफिकल फ्लेक्सिबल वो हम बजाए रख पाएंगे कि भी नहीं जैसे देखिए कि बुद्धिज्म में ही किस तरह के डिवीजन हो गया है कि एक तो थेरा वाद और फिर यह महायान तो थरावत क्या है कि मोर ओरिएंटेड टुवर्ड साधना तपस्या त्याग एंड मेडिटेशन महायान इ मोर ओरिएंटेड टुवर्ड्स द मने प्रोपेगेशन अमंग द जनरल पब्लिक कि हां जनरल पब्लिक को यह तारा देवी वगैरा देवी देवता जो कि जिसको कि भगवान बुद्ध ने यह कर दिया था भगवान बुद्ध हिमसेल्फ बिकम वन ऑफ द गॉड उसको पॉपुलर इज करके उतना स्प्रेड करो उतना स्प्रेड कर पूरा डाइल्यूट हो जाए सो ट इज मने स्प्रेड करने का एक टेंटेशन है दूसरा है कि प्योरिटी मेंटेन करने का तो वट पाथ विल यू चूज और ऐसा भी हो सकता है कि टू ब्रांचेस वन ब्रांच सेज लेट अस डाइल्यूट बट लेट अस स्प्रेड दूसरा बोलेंगे स्प्रेड करने की जरूरत नहीं है प्योरिटी मेंटेन करके चले सो ऑल दिस कोई भी रिलीजियस मूवमेंट में देखिए इस तरह के वो क्रिटिकल डिसीजन मेकिंग जंक्शंस आते ही है और वो जंक्शन पे फिर व पाथ अलग होते ही है क्रिश्चियनिटी में देखिए कि यह जो ऑर्थोडॉक्स कैथोलिक प्रोटेस्टेंट इस्लाम में देखिए शिया सुन्नी बुद्धिज्म में देखिए इतने सारे जितने भी साउथ एशियन कंट्रीज है सबका एक एक य ज तिबेट का वज्रयान है जापान का जन है चाइना का चान बुद्धिज्म तो दिस इ इनएविटेबल ओवर ए लंग पीरियड ऑफ टाइम