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Meditation ·

Guided Meditation || श्रीरामकृष्ण ध्यान || 8 may 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः ध्यान का और एक क्लास

theory of meditation

ध्यान और बाकी जो भी साधनाएं आध्यात्मिक जीवन की वह चाहे जप हो, स्वाध्याय हो, पूजा पाठ हो ना कि और कुछ भी हो। इन सब में एक बहुत बड़ा डिफरेंस है। ध्यान जिसको हम कहते हैं राज मार्ग है। अन्य जो सब मार्ग है, वह जनरल रास्ते हैं और यह दिस इज अ रॉयल पाथ। इसीलिए इसको राजयोग की उपमा दी गई है। क्यों इसको राजयोग कहा गया है? क्या है इसमें इतना स्पेशल? बाकी सब देखिए साधन पद्धतियों में वैसे आप साधक है सा हम है साधक। ईश्वर या तो आत्मन जिस पर हम विश्वास करते हो वो है साध्य। और इन दोनों को जो कनेक्टिंग ब्रिज है वह है साधना। आप साधना करते जाइए। धीरे-धीरे करके साध्य वस्तु के समीप पहुंचते जाएंगे। और साथ में ही जितना हम साध्य वस्तु के समीप पहुंचते हैं उतना ही हमारे मन में आनंद। क्योंकि जो साध्य वस्तु है आध्यात्मिक जीवन की वह चाहे ईश्वर हो ना कि चाहे हो आत्मन उसका स्वरूप है आनंद उसका स्वरूप है माने यह जो संसार है इससे परे तो वह सब उपलब्धियां हमको वहां पर होना शुरू हो जाती है। अभी ध्यान जो है और जैसे-जैसे यह उपलब्धियां होगी, साथ-साथ में ही हमारे मन में, हमारे स्वभाव में काफी सब परिवर्तन आते जाएंगे। जबकि ध्यान योग का जो रास्ता है यहां पर अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना दैट इटसेल्फ इज ए साधना। हम यह यदि सोच करके बैठे रहेंगे कि मैं अपने मन को साध्य वस्तु पर एकाग्र करता हूं। इससे जितना मैं साध्य वस्तु के समीप जाता जाऊंगा वैसा ही मेरे मन के भीतर में यह सब जो परिवर्तन है आना शुरू होगा। यह लॉजिक तो अच्छा है किंतु फिर ऐसा करने से ना ध्यान का जो रियल बेनिफिट है वह हम प्राप्त नहीं कर पाएंगे। ध्यान पथ का रियल बेनिफिट यदि हमको प्राप्त करना है तो हमारे स्वभाव को प्रारंभ से ही परिवर्तित करना शुरू करना होगा। तभी कहीं जाकर के हम मन को ठीक-ठीक एकाग्र कर पाएंगे। अब जैसे कि मैं जप करता हूं। मन में यदि विक्षेप पहुंचता भी है तो भी मैं कैसे भी करके उससे मन को छुड़ा करके जप के ऊपर में एकाग्र कर सकता हूं। क्योंकि जबकि जो साधना है वह फिर भी हमारे कंट्रोल में है थोड़ी बहुत किंतु जो मन को प्योर एकाग्र करना है यह जो प्योर ध्यान है यह इतना सूक्ष्म है इतना सूक्ष्म है कि थोड़ा भी मन के भीतर में कहीं से भी एक डिस्टरबेंस आया कहीं से भी एक विकार आया कहीं से भी एक दूसरा विचार आया फट करके मन भटकने लगता है इसलिए ध्यान की साधना में प्रवेश करने से पहले अपने मन को संपूर्ण रूप से अपने आपे में लाना होगा। यह जो दो तरीके से होता है सर्वप्रथम तो हमको पता है संकल्प शक्ति। आत्म श्रद्धा और संकल्प शक्ति। दृढ़ संकल्प शक्ति चाहिए। जैसे घोड़े हैं चारों ओर दौड़ते हैं तो सारथी क्या करता है? लगाम से और चाबुक मार मार करके घोड़ों को सीधे रास्ते पर ले जाता है। तो यह चाबुक मारने की यह क्षमता जो है वह सारथी में होनी चाहिए। तो वह तो एक संकल्प शक्ति या विल पावर है। किंतु एक दूसरा भी रास्ता है। वह है अपने को संपूर्ण रूप से शरणागत कर देना। जैसे कि गिरीश घोष का जो इनसाइट है महामाया दो लोगों को अपनी जाल में बांधने के लिए आई। स्वामी विवेकानंद और नाग महाशय स्वामी विवेकानंद को जब जाल में बांधने का प्रयास किया। स्वामी जी इतने बड़े हो गए कि जाल उनके लिए छोटी पड़ गई और नाग महाशय इतने छोटे हो गए कि जाल के जो छिद्र होते हैं उसमें से निकल गए। तो हमको भी एक और तो यह संकल्प शक्ति को डेवलप करना ही होगा। किंतु द्वितीय जो है अपनी यह जो शरणागति है ठाकुर के प्रति समर्पण है इसको आपको डेवलप करना होगा और अपने भीतर में जहां कहीं भी स्वार्थ का एक लेश मात्र भी है उसको संपूर्ण रूप से तिलांजलि देनी होगी। जैसे ही ध्यान में हम बैठते हैं वैसे ही ईश्वर को प्रार्थना कीजिए कि हे ईश्वर मेरा मेरे मन में जिसके भी प्रति कटु भाव है मैं जिसको भी द्वेष करता हूं जो लोग मुझे द्वेष करते हैं मेरा यह ध्यान का फल जो है उनको दे दो मुझे कुछ नहीं चाहिए मेरा जो हृदय है संपूर्ण रूप से खाली हो जाए यह ध्यान ज्ञान भी तो एक ऐसा प्रोसेस है कि जिससे हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं। जिस क्षण हमने यह सोचा कि मुझे कुछ प्राप्त करना है। ध्यान करके मुझे इष्ट प्राप्ति करनी है। इष्ट साक्षात्कार करना है। वहां पे भी थोड़ा सा स्वार्थ आ जाता है और वह जो स्वार्थ है हमारा साइज थोड़ा सा बढ़ा देगा। फिर वो जो जाल का छोटा सा छिद्र है उसमें से हम नहीं निकल पाएंगे। उससे हम बड़े हो जाएंगे। वह जाल के छोटे से छिद्र में से निकलने के लिए संपूर्ण रूप से अपने को शून्यवत कर देना है। वो ठाकुर वो गए थे ना गांव में तो पालखी में जा रहे हैं। कुछ गुंडे आ गए कहीं से। किसी ने कहा डाकात आ गए हैं डकैत। तो ठाकुर ने सभी का नाम लेना शुरू कर दिया। काली-काली महावीर महावीर दुर्गा दुर्गा वह जो काम कर रहे हैं। तो यहां पे भी कभी हम सोचेंगे कि मेरी साधना शरणागति की है। कभी हम सोचेंगे कि मेरी साधना संकल्प शक्ति की है। तो हम ऐसा एक को पकड़ करके क्यों बैठे रहे? क्या मैं स्वामी जी की तरह विराट संकल्प शक्ति डेवलप करने सकता हूं क्या? नहीं होगा। और यदि मैं क्या ऐसा भी होगा कि नाग महाशय की तरह संपूर्ण रूप से अपने को शून्य कर दूं वो भी नहीं होगा। तो दोनों कीजिए। जो भी काम करें जिस दिन महामाया की जाल थोड़ी सी छिद्र बड़े है तो उसमें से निकल जाना है। जिस दिन महामाया की जाल थोड़ी छोटी है तो अपने को बड़ा करके निकल जाना है। सो दोनों साधनाएं हमको करनी है। संकल्प शक्ति भी डेवलप करनी है और साथ में ही अपने को संपूर्ण रूप से शून्य कर देना है। जैसे ही ध्यान का प्रारंभ करें। साथ में ही प्रार्थना कीजिए कि जो मेरे दुश्मन है, जिन्होंने मुझे कष्ट पहुंचाया है, जिन्होंने मेरा अहित करने का प्रयास किया है, उन सबको मैं नमन करता हूं। क्यों? क्योंकि ऐसा करके उन्होंने मुझे एक ऐसा सबक सिखाया है, एक ऐसा लेसन सिखाया है कि मैं निस्वार्थ के रास्ते पर जा सकता हूं, आगे बढ़ सकता हूं। यदि मेरे जीवन में संघर्ष नहीं, यदि मेरे जीवन में किसी के प्रति द्वेष नहीं, तो मैं किस चीज का त्याग करूंगा? त्याग करने के लिए भी तो कुछ चाहिए। मुझे द्वेष का त्याग करना है तो कोई तो चाहिए कि जिसका मेरे प्रति द्वेष हो। यदि मुझे किसी के प्रति कटुता का त्याग करना है तो ऐसा तो हो कि जिसकी मेरे प्रति कटुता हो तो देखिए कि यह जो द्वेष कटुता जो लोग मेरा अहित चाहते हैं आप आंख बंद करेंगे देखेंगे कि इस तरह के लोग सर्वप्रथम हमारे मन में आएंगे आएंगे ही आएंगे जगत में लोगों के प्रति द्वेष भाव होगा ही होगा किसी ना किसी के प्रति यदि किसी व्यक्ति के प्रति नहीं है तो किसी सिचुएशन के प्रति होगा तो यह सबसे अपने को मुक्त करने के लिए क्या करना है अपने को संपूर्ण रूप से खाली कर देना है। भीतर से अपने को संपूर्ण रूप से भीतर में से शून्य कर देना है। तो यह है हमारी साधना। तो याद रखिए ध्यान में यदि आगे बढ़ना है, संकल्प शक्ति को डेवलप करना है और फिर साथ-साथ में ही अपने भीतर में से जितना भी अहंकार है, स्वार्थ है, द्वेष है, कटुता है, संपूर्ण रूप से ईश्वर को समर्पित कर देनी है। अपने को भीतर से पूरा खाली कर देना है। तो यह है आध्यात्मिक साधना। यह है ध्यान की साधना। यह है ध्यान का मार्ग। अच्छा। अभी आज हम क्या करेंगे?

method of meditation

हर बार जैसे करते ही आए हैं। सर्वप्रथम है हमारा गीता चटिंग। उसके बाद में हम ध्यान प्रारंभ करेंगे। दो राउंड में करेंगे। दोनों ही राउंड में प्रथम होगा गीता चटिंग। मैंने गीता का 15वां अध्याय आपको कहा था। तो यह 15वां अध्याय हम करेंगे पाठ और फिर ध्यान करेंगे। ध्यान के प्रारंभ में आप जब ध्यान प्रारंभ करेंगे मैं थोड़ा सा कथामृत में से पाठ करूंगा जिससे कि क्या होगा कि आपका मन जो है थोड़ा सा ग्राउंडिंग होगा। क्योंकि अपना मेथड क्या है? मेथड है गीता पाठ करके संकल्प शक्ति को जागृत करना है। क्योंकि बिना संकल्प शक्ति के अपने मन को कंट्रोल में रखना मुश्किल है। गीता पाठ का उद्देश्य ही है संकल्प शक्ति को तीव्र करना। तो वो एक हो गया। सेकंड स्टेज क्या है? आंखों को पहले तो संपूर्ण रूप से बंद कर देना। फिर हल्का सा उसको खोलना। 1 मिलीमीटर जितना हल्का सा उसको खोलना। यह हो गया सेकंड स्टेप। थर्ड स्टेप है अपने हृदय में ठाकुर का वही चिर परिचित कमरा है उसको विजुअलाइज करना है और यदि ठाकुर अपने खाट पर बैठे हैं पास में ही मां बैठी है बाकी जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल है लाटू महाराज है योगिन महाराज है स्वामी जी है राजा महाराज सब लोग जमीन पर बैठे हैं और मैं भी उन्हीं की तरह ठाकुर का प्रिय प्रिय संतान होकर के गुरु भाइयों के साथ में बैठा हूं। तो यह हो गया हमारा विजुअलाइजेशन। आप और कुछ भी विजुअलाइज कर सकते हैं। यदि आपके जीवन में ऐसे आनंद और शांति के पल है तो आप उसको भी विजुअलाइज कर सकते हैं। अब जैसे कि कुछ दिनों पहले मैं ध्यान करने का प्रयास कर रहा था। तो ऐसा जो यूजुअल जो जो सब सीन मैंने डेवलप करके रखे हैं वो काम नहीं कर रहा है। तो ठीक है। अभी मुझे तो साइकोलॉजी पता है कि यदि एक काम नहीं करता है तो दूसरा सीन हमको डेवलप कर देना है। मेरा एक जो एक फेवरेट सीन है मैं छोटा था अपने गांव में जाता था और वहां पे दीपावली का उत्सव मनाते थे। तो बहुत सारे कजिन वगैरह रिलेटिव्स वगैरह इकट्ठा होते थे। इज़ अ वन ऑफ द बेस्ट टाइम इन माय लाइफ। बहुत आनंद आता था। तो मैं कभी-कभी विजुअलाइज करता हूं कि मैं वहां गांव में चला गया हूं और दीपावली का उत्सव गुजरात में आपने देखा होगा बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। बहुत सारे पटाखे फोड़े जाते हैं। अच्छा खाना आता है। लोग मिलने को आते हैं वगैरह-वगैरह। सो एक पूरा उत्सव और आनंद का वातावरण है। तो मैं वहां पर बैठा हूं और बाकी चारों ओर उत्सव और आनंद की तरंगे फैल रही है। उसके बीच में बैठ के मैं ध्यान कर रहा हूं। और यह जो आनंद में से ओजस खींच रहा हूं। आध्यात्मिक शांति को खींच रहा हूं। सो विजुअलाइज एनीथिंग दैट वर्क्स। वो आपके ऊपर है। आपको इस तरह के सीन की लाइब्रेरी डेवलप करनी होगी। आज यह सीन एक आपने यूज किया विजुअलाइज करने के लिए। यदि आप कंटिन्यू कर सकते हैं बहुत अच्छा है। यदि वह काम नहीं करता है तो और एक सीन आप विजुअलाइज कीजिए। किंतु इस तरह से आप डेवलप करके रखिए। जिसको कि कभी भी आप चाहे हृदय में बिठा करके उसके ऊपर ध्यान करें। तो यह है अपनी मेथड है। और फिर ध्यान करने से सबसे पहले तो प्रार्थना करनी है। अपने को शून्य बना देना है। ईश्वर के सामने दो हाथ जोड़कर के संपूर्ण विनम्रता से संपूर्ण शरणागति से ईश्वर को कहना। देखिए बहुत बार ना हमको प्रार्थना करना भी नहीं आता। आजकल प्रार्थना एक फार्मूला जैसा हो गया है। हम स्कूल में प्रार्थना करते हैं तो क्या है? कुछ संस्कृत के श्लोक है बिना समझे रट लेते हैं। यहां मंदिर में भी आएंगे तो इवनिंग आरती होती है। तो सबके साथ में बैठकर के हम लोग भी गा लेते हैं। तो वो तो अच्छा ही है। सही-सही में प्रार्थना करना। यानी कि आप अपने किसी एक मित्र के साथ में, अपने मां-पिताजी के साथ में या तो फिर अपने किसी रिलेटिव्स के साथ में जिस तरह से वार्तालाप करते हैं वन टू वन इसी तरह से ईश्वर के साथ में वार्तालाप करना है। इसी तरह से ईश्वर को धीरे-धीरे करके दोनों हाथ जोड़कर के संपूर्ण शरणागत होना है। कहना है कि हे प्रभु तुम मेरे हो और मैं आपका हूं। इस जगत में अभी और कुछ नहीं है। जिस क्षण मैं ध्यान करता हूं उसी क्षण मैं और मेरे इष्ट इन दोनों के अलावा अभी मेरे जगत में और कुछ नहीं है। जो भी रिस्पांसिबिलिटीज है जो भी टेंशन है जो भी हमारा डिमांड जो होती है हमारे समय के ऊपर में 10 लोग आकर के कोई कहेंगे खाना बना दो मेरे लिए। कोई कहेंगे मेरे लिए यह रिपोर्ट बना दो। पुरुष होंगे तो आपको रिपोर्ट बनाना है। स्त्री है तो खाना बनाना है। वर्किंग लेडीज भी होते हैं। सो उनको दोनों दोनों करना है। सो [हंसी] वो जो डिमांड है अपने समय के ऊपर में वो और जो डिमांड्स है हमारे पे सबसे हम ध्यान के समय में मुक्त हो चुके हैं। ध्यान के समय में मैं हूं और ठाकुर है मेरे इष्ट है। और दोनों हाथ जोड़कर के बड़ी ही विनम्रता से बड़े ही शरणागति पूर्वक उनसे वार्तालाप करना है। जो कोई भी वार्तालाप हम कथामृत में सुनते हैं उसको यदि थोड़ा सा याद करके थोड़ा सा हम यह डायलॉग जो भक्त पता है आज हम जो मैं कथामृत पाठ करूंगा आप देखेंगे भक्त प्रश्न करता है ठाकुर उत्तर देते हैं। भक्त प्रश्न करते हैं ठाकुर उत्तर देते हैं। तो हम भी विजुअलाइज करें कि मैं भी वही भक्त हूं। मैं ठाकुर के साथ में एक्चुअली वार्तालाप कर रहा हूं। प्रश्न कर रहा हूं। तो यह ठाकुर के साथ में सीधा नाता बिठाना है। और फिर जैसे-जैसे ध्यान गंभीर होगा बाकी सब चला जाएगा। इष्ट है आपके हृदय में और आपका इनके साथ में सतत नाता है। तो यह हो गई हमारी ध्यान की प्रक्रिया। हम गीता के पाठ

Gita chanting 1

से स्टार्ट करेंगे। किंतु आज हम क्या करेंगे? 15वें अध्याय में 20 श्लोक है। तो लास्ट टाइम तक 10 10 करके हम दो बार करते थे। इस बार हम सात ही करेंगे। फर्स्ट राउंड में सेवन श्लोक वन टू से और सेकंड राउंड में 8 टू 14 आठ से 14 साथ-साथ ही करेंगे। जिससे कि क्या होगा? हमको ध्यान करने के लिए ज्यादा समय मिले। और चटिंग कैसे करना है वह भी तो आपको पता ही है कि मैं दो बार चटिंग करूंगा। आपको यदि आता है तो आप दोनों बार मेरे साथ में दोहराइए। आपको फायदा ही होगा और यदि नहीं आता है तो आप एक बार सुनिए। दूसरी बार दोहराइए। आवाज को थोड़ा सा स्पष्ट रखिएगा। ऊंची माने एक नॉर्मल कन्वर्सेशन की आवाज में आप चटिंग कीजिएगा। यदि धीरे स्वर से गुनगुन करके करेंगे तो फिर प्रॉब्लम क्या होगा कि संकल्प शक्ति बढ़ाना है तो गीता के श्लोक का यही तो हमारे लिए प्रयोजन है तो वो होगा नहीं तो वि दिस हम प्रारंभ करते हैं अथः पंचदशोध्याय श्री भगवान वाच उधम मूल मदह शाखम उर्ध्व मूल मदः शाखम अश्वत्थम प्राहुरव्ययंम छंदस यस्य पर्णानी छंद यस्य पणानी यस्तम वेदसवेद अध चोधम प्रसुतास शाखा अध चोधम प्रसुतास शाखा गु प्रवद्धा विषय प्रवाला गुण प्रव विषय प्रवाला अध चमला संतति अध मूल्यनुसंतानी कर्मानुबंध मनुष्य लोके कर्मानुबंध मनुष्य लोके न रूप मस्य तथो पलभ्यते न रूपमस्य तथो पलभ्यते नंतो न चाद न चस प्रतिष्ठा नंतो नचा न चस प्रतिष्ठा अश्वत्थमेनम सुवि मूलम अश्वत्थमेनम सुविरू मूलम असंग शस्त्रे दृढ़ नित्वा असंग शस्त्रे दृढ़ न चित्वा ततः पदम त परिमारितव्यम ततः पदम त परिमार्गव्यम यस्मिन गता निवर्त भू यस्मिन गतना निवर्त भयः तमेव चाध्यम पुरुषम प्रपध्य तमे वचाध्यम पुरुषम प्रपध्य यतः प्रवत्त प्रसुता पुरण यतः प्रवृत्ति ही प्रसुता पुराण निर्माण मोहा जित संग दोष निर्माण मोहा जित संग दोष अध्यात्म नित्या विनिव काम अध्यात्मा नित्या विनिवत्तमा ध्वध्व विमुक्त सुख दुख संगै ध्व विमुक्त सुख दुख संगै गच्छंत्य मूढ़ा पदमव्ययंम त गच्छंत्य मूढ़ा पदमवयं त न तसते सूर्य न तसते सूर्य न शशको न पावक न शशाशको न पावक यगत्वा निवर्तते यगत्वा निवर्तते तधाम परम मम तधाम परम मम ममशो जीव लोके ममैवाशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः मनः षष्ठा इंद्रियण मन षष्ठा इंद्रिय प्रकृति स्थान कर्षति प्रकृति स्थानी कर्षति वेरी गुड

guided meditation 1

अभी ध्यान का प्रारंभ करेंगे। सर्वप्रथम तो दोनों आंखों को बंद कीजिए। फिर हल्का सा ओपन कीजिए। हृदय में ठाकुर विराजमान है। दो हाथ जोड़कर के सर्वप्रथम तो उनको प्रार्थना कीजिए। कहिए ठाकुर मैं आपका संपूर्ण शरणागत हूं। मेरे जीवन में जो उपलब्धि है, जो सक्सेस है, जो फेलियर्स है, सब आपके श्री चरणों में अर्पण करता हूं। जो क्रेडिट है, जो संघर्ष है, सब आपके हैं। आप ही मेरे जीवन सर्वस्व है। आपके अलावा इस जगत में अभी मेरा और कोई नहीं। ठाकुर को प्रार्थना कीजिए अपने को संपूर्ण रूप से उनके श्री चरणों में ऑफर कर दीजिए और फिर उनके ऊपर में ही मन प्राण उसको एकाग्र शुक्र कीजिए। मैं कथामृत में से पाठ करता हूं। आप ध्यान के साथ में उसका श्रवण कीजिए। ठाकुर श्री रामकृष्ण कोकाताए आज शुभगमन कोरिया छे ठाकुर श्री रामकृष्ण ने कलकाता में आज शुभ आगमन किया है श्रीक्त प्राण कृष्ण मुखोपाध्याय श्याम पुकुर बाटीर द्व तोलाय बैठक खाना घरे भक्तों शंगे बोिया छे श्रीयुक्त प्राण कृष्ण मुखोपाध्याय के श्याम पुकुर घर के दूसरे मंजिल पे बैठक खाना घर में भक्तों के साथ में विराजमान है। ए मात्र भक्तों शंगे बोसिया प्रसाद पया छ बस अभी मात्र भक्तों के साथ में बैठकर के प्रसाद पाया है आज दुईरा अप्रैल रविवार 1882 क्रष्टाबो एके चैत्रो 128 शुक्ला चतुर्दशी आज सेकंड अप्रैल अप्रैल रविवार 1882 की साल 21 चैत्र 1288 1288 शुक्ल चतुर्दशी एक बेला देठा होइबे अभी दोपहर को डेढ़ बजे हैं कातेन ओई पाई थाकेन कैप्टन उसी गली में रहते उसी शरी में रहते हैं। ठाकुर इच्छा ई बाड़ी ते विश्राम पर कैप्टेन बाड़ी होइया तहां के दर्शन करिया कमल कुटीर नामक बाड़ी ते श्रीजुक्त केशव सेन के दर्शन करते जबेन ठाकुर की इच्छा यहां पे इस घर में विश्राम के बाद कैप्टन के घर होकर के उनका दर्शन करके कमल कुटीर नामक घर में श्रीयुक्त केशव सेन के दर्शन करने को जाए। प्राण कृष्ण बैठक खाना बश्या छन प्राण कृष्ण के बैठक खाने में बैठे हुए हैं। राम मनोमोहन केदार सुरेंद्रों गिरिंद्रो सुरेंद्र भ्राता राखाल बलराम मास्टर प्रवृत्ति भक्तरा उपस्थितो वगरा भक्त उपस्थित है पाडार बाबूरा ओ अन्नानो निमंत्रितो व्यक्तिराओ आन शरी के अन्य रहवासी और अन्य निमंत्रित लोग भी उपस्थित है ठाकुर की बोले ठाकुर क्या कहेंगे शनिवार जनो शक्ल उत्सुक होया छ सुनने के लिए सभी उत्सुक है ठाकुर बोली ते छ ठाकुर कह रहे हैं ईश्वर ओताहार ऐश्वर जो ईश्वर और उनका ऐश्वर्य ए जगोतार ऐश्वर जो यह जगत है उनका ऐश्वर्य किंतु ऐश्वर जो देखे शोकले भूले जाए किंतु ऐश्वर्य देखकर के ही सब भूल जाते हैं जार ऐश्वर्य जो ताके खोजे ना जिनका ऐश्वर्य है उनको खोजते नहीं कामिनी कांचन भोग करते शकले जाए कामिनी कांचन भोग करने के लिए जाते तो सब हैं किंतु दुख अशांति बेशी किंतु दुख और अशांति ही ज्यादा शसार जेनो विशालाक्षीर दो संसार जैसे कि विशालाक्षी का वमल नौका दोहे एक बार पले आ रख खान नाई नौका इस वमल में एक बार पड़ी तो उसकी रक्षा नहीं सैकुल कांटार मतो एक छाड़े तो आर एक्ट जोड़ाए सैकुल कांटे की तरह एक निकाले तो और एक आन पड़ता है गोलोक धांधा एक बार ढुकले बेरूनो मुश्किल गोलोक धांधा गेम का नाम है। उसमें एक बार प्रवेश है तो वहां से निकलना मुश्किल है। मानुष चेनो झलसा पोए जाए आदमी जैसे कि जल जाता है। एक जो भक्तो एक भक्त एक उपाय अभी उपाय क्या है? श्री राम कृष्ण ठाकुर कहते हैं उपाय साधु संगो आर प्रार्थना उपाय साधु संग और प्रार्थना वैद्य काछे ना गले रोग भलो होए ना वैद्य के पास ना जाए तो रोग अच्छा होगा नहीं साधु संगो एक तीन कोरले होए ना शर्बदाई दरकार साधु संग एक दिन करने से होगा नहीं हमेशा आवश्यक रोग ले आ रोग लगा ही है आहार वै काछे ना थाकले नाड़ी ज्ञान होय ना और वैद्य के साथ में ना रहे तो नाड़ी ज्ञान होगा नहीं शंगेशंगे घूरते हो साथसा में फिरना पड़ता है तब कौन कॉफेर नाड़ी कौन पित्तेर नाड़ी बोझा जाए तब कौन सी कफ की नाड़ी है कौन सी पित्त की नाड़ी है यह समझ में आता है भक्त भक्त प्रश्न करता है साधु संग की उपकार होए साधु संग से क्या उपकार होता है श्री राम कृष्ण ईश्वरे अनुराग होय श्री रामकृष्ण कहते हैं ईश्वर पे अनुराग होता है तार ऊपर भो भाषा होय उनके ऊपर में स्नेह श्रद्धा प्रकट होती है व्याकुलता ना एले किु ही हो ना व्याकुलता ना आने से कुछ होता नहीं साधु संग करते ईश्वर जन प्राण प्राण व्याकुल होए साधु संग करते करते ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। बाड़ी ते कारुर अशुख होले सर्वदा ही मौन व्याकुल होए थाके किसे रोगी भो होए जैसे घर में किसी को अशुख होने से हमेशा मन व्याकुल होकर रहता है। किस तरह से रोगी अच्छा होगा। आर ज को जाए से व्यक्ति आप घुरे गुरे बेए व्याकुल होते होए शेरो और यदि किसी की नौकरी चली जाती है तो वह व्यक्ति जिस तरह से ऑफिस ऑफिस घूम फिरते फिरते जाता है व्याकुल होता है वैसे ही यह है यदि कोनो अभिषेक बोले कर्म खाली नहीं आ तार पोर दिन ऐसे जिज्ञासा कोरे आज की कोनो कर्म खाली होए छे यदि किसी ऑफिस में कहे कि काम नहीं है तो दूसरे दिन ही आकर के फिर से पूछता है कि आज क्या कोई काम खाली हुआ है तो यह कथामृत में से पाठ ध्यान में और ज्यादा से ज्यादा गंभीरता में प्रवेश करने का प्रयास कीजिए। ओम धीरे से ध्यान से बाहर आइए। धीरे से समय लीजिए अपना। मन को धीरे-धीरे बहिर्मुख कीजिए।

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श्लोक नंबर एट से प्रारंभ करेंगे। शरीरम यदवापनोति यच्चापत्राश्वर गहित्वतानी सया तिहित सयाति वायुर गंध निवासयात वायुर गंधा निवाशयात श्रोत्रम चक्षु स्पर्शम च श्रोत्रम चक्षु स्पर्शम च रसम ग्राणमेव च रस म ग्राणमेवच अधिष्ठाय मनम अधिष्ठाय मनचायम विषयानुपसेवते विषयापसेवते उत्रामंतम स्थितम वापी उत्रामंतम स्थितम वा भजानम वा गुणान्वितम भजानम वा गुणान्वितम विमूढ़ानापश्यती विमूढ़ना पश्यती चक्षुष पश्यती चक्षुषः यतंतो योगिन चैनम यतंतो योगिन चैनम पश्यंतात्मन्यवस्थितम पश्यत्मन्यवस्थितम यतंतोप्य कृतात्मानो यतंतोप्य कृतात्मानो नैनम पश्यंत्य चेतस नैनम पश्यंत्य चेतस यदादित्य गतम तेजो यदादित्य गतम तेजो जगत भाषयते खिलम जगत भाषयते खिलम य चंद्रमसी चागो य चंद्र मसीग्नो तत्तेजो विधि मामकम तत्तेजो विधि मामकम गामा विष भूतानी गामा विषच भूतानी धारयाम्य मोजसा धारयाम्य यह मोजसा पुष्णाम चौषदी सर्वा पुष्णाम चौषध सर्वा सोमो भत्वा रसात्मक अहम वैश्वा नरो भत्वा अहम वैश्वा नरो भूत्वा प्राणी नाम देह माश्रितः प्राणापान समायुक्त प्राणापान समायुक्त पचामयनम चतुरविम पचाम यनम चतुरविम हम वेरी गुड फिर से ध्यान करेंगे

guided meditation 2

ओम मैं आखिर में कुछ मिनट समाप्त करने के समय की कुछ मिनट कथामृत पाठ करूंगा। फिलहाल हम ध्यान में गहराई में प्रवेश करेंगे। ओम ओम ओम ओम मैं कथा अमृत में से पाठ करता हूं। आप ध्यान करते करते श्रवण कीजिए। ठाकुर कहते हैं आर एक उपाय आर एक उपाय है व्याकुल होए प्रार्थना व्याकुल होकर के प्रार्थना तीन जे आपनार लोग वह तो जो हमारे अपने हैं ता के बोलते हुए उनको बोल सकते हैं तुम केमोन देखा दा देखा देते ही होवे तुम कैसे हो दर्शन दो दर्शन देना ही होगा तुम आमा के सृष्टि कोरे छु केनो तुमने मेरा सर्जन किया ही क्यों शिखरा बोले छिलो ईश्वर दयामय सिख लोगों ने कहा था ईश्वर दयामय है आमी तादेर बोले छिलाम दयामय कनो बोलो मैंने उनको कहा था दयामय क्यों कहूं तनी आमादे सृष्टि कोरे छ उन्होंने हमारा सजन किया है जाते आमादे मंगल होए ता जोदी कोरेन शकी आर आश्चर्यो जिससे कि हमारा मंगल हो ऐसा कुछ वो करें इसमें आश्चर्य क्या है? मांबाप छेले के पालन कोबे श्याबर दया की मांबिताजी बच्चे का लालनपालन करते हैं। उसमें दया कहां पे आ गई से तो कोरते ही होगे। यह तो करना ही पड़ेगा। ताई ताके जोर करे प्रार्थना करते हो। इसीलिए उनको जोर करके प्रार्थना करनी है। तजे आपनार मां आपनार बाप वह तो जैसे कि मेरी मां है। मेरे ही पिताजी है। अपनी ही मां अपने ही पिताजी छेले जदी खावा त्याग कोरे बाप मां तीन वर्ष आगे ही हिस्सा फैले दे लड़का यदि खाने का बंद करेगा तो मां पिताजी तीन साल के पहले ही उसको हिस्सा दे देते हैं जमीन जायदाद का आार जोख छेले पैसा चाहे और पुनः पुनः बोले मां तो दुटी पाए पड़ी आमा के दुटी पैसा दे तोन मां बेजार होए तार व्याकुलता देखे पैसा फले दे और बच्चा यदि पैसा चाहता है और बार-बार कहता है मां तुम्हारे दो पैरों में पड़ता हूं मुझे दो पैसे दे दो तब मां परेशान होकर के उसकी व्याकुलता देखकर के पैसे फेंक फेंक देती है साधु संगोकर को ले आर एक उपकार होए साधु संग करने से और एक उपकार होता है सदस सत विचार सत असत विचार सत नित्य पदार्थ अर्थात ईश्वर सत नित्य पदार्थ अर्थात ईश्वर असत अर्थात अनित्य असत अर्थात अनित्य असत पथे मौन गले ही विचार करते हो असत पथ में मन जाने से ही विचार करना है हाथी परेर कोलागाज खेते शून बाड़ा ले से समय माहुत डांगश मारे हाथी दूसरों के केले को खाने के लिए जैसे ही अपनी सूंड बढ़ाता है। उसी समय महावत उसको अंकुश मारता है। तो यहां पे आज का ध्यान क्लास ऑफिशियली समाप्त करते हैं। आप सबको रिक्वेस्ट कि ध्यान का जो वातावरण खड़ा हुआ है आपके मन में तो आप जितना कर सकते हैं अभी और भी 8:30 हुए हैं 9 बजे तक यदि कर सकते हैं तो बहुत अच्छा है जिससे क्या होगा आपका ध्यान और भी दृढ़िभत होगा किंतु ऑफिशियली फॉर्मली क्लास यहां पर करते हैं समाप्त ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम