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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः मां शारदा देवी की जीवनी हमने देखा अभी तक कि इस तरह से ठाकुर और मां का विवाह हुआ ठाकुर कलकाता दक्षिणेश्वर चले आए और फिर उनकी साधना और तपस्या तो चालू ही रही एक के बाद एक शक्ति साधना अद्वैत वेदांत साधना भाव साधना वह सब करते-करते ठाकुर ने विविध रास्तों से ईश्वर को पहचाना ईश्वर का दर्शन किया निर्विकल्प समाधि की उपलब्धि की इसके बाद में जब वह आखिर में दक्षिण कामर पुकुर वापस आए भैरवी ब्राह्मणी के साथ में उस समय मां की अभी इस तरह की हो चुकी थी कि मां को समझ में आए कि विवाह क्या होता है पति क्या होता है वगैरह तो जयराम बाटी से मां को कामर पुकुर बुलाया गया मां ने ठाकुर की सेवा की और उस समय ठाकुर और मां का जो स्नेह संबंध स्नेह सूत्र स्थापित हुआ वह अभी कभी टूटने वाला नहीं था मां जब जयराम बाटी वापिस गई ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस आए तो वही जयराम बाटी वही जनक जननी भाई भगिनी बंधु वही कर्म वही सब कुछ चल रहा है किंतु मां का मन पड़ा है ठाकुर के पास में और आखिर में धीरे-धीरे देखना कि दक्षिणेश्वर से ठाकुर के बारे में सब उल्टे पल्टे समाचार वहां पर जयराम बाटी में आना शुरू हुए कि ठाकुर पागल हो गए हैं ठाकुर निव स्त्र होकर के दिगंबर होकर के घूमते रहते हैं पता नहीं मां मां करके चिल्लाते हैं ऐसा सब जब लोगों को अभी क्या है कि आज की तरह एंटरटेनमेंट के इतने सारे वो सुविधा साधन नहीं है तो जो मोबाइल खोल कर के पूरा वर्ल्ड एट योर फिंगर टिप ऐसा तो है नहीं कि एआई न्यूज़ फीड है कि सब समय आपके मन को लोभी करके रखने वाला है गांव में या तो फिर जात्रा नाटक वगैरह होता था या तो फिर इस तरह से गॉसिप होती थी यही तो थे उनके एंटरटेनमेंट के साधन तो यहां पे एकदम मैंने एकदम पावरफुल सोर्स मिल गया है ठाकुर के रूप में कि जब भी कोई भी कलकाता से वापस आता है इस तरह की सब रसपुर के बारे में लेकर आता है कि लोगों को सुनने में भी मजा आता है और फिर एक ह्यूमन नेचर होता है य क्या है कि जब बचपन जब दुख में बीता है या तो फिर जीवन में इतना कोई प्रोस्पेरिटी का कोई अपॉर्चुनिटी नहीं है तब क्या होता है हम अपने जीवन से तो निराश होते ही है किंतु जब इसका एक साइकोलॉजिकल डिफेंस यह है कि जब दूसरों के जीवन में दुख दिखता है तो हमको इससे यह एक साइकोलॉजिकल गुट मिलता है कि चलो भाई मैं अकेला दुखी नहीं हूं वह भी दुखी है और फिर इसका एक विकृत स्वरूप यह है कि यदि दूसरा दुखी नहीं है तो जाकर के उसको दुखी करो जिससे कि मेरे मन को थोड़ी शांतोना मिले शांति मिले दिस आर जस्ट साइकोलॉजिकल रिफ्लेक्सेस तो गांव में भी मां के पास में जाकर के सहानुभूति के छल से लोग ऐसा कहना शुरू कर दिए कि अरे शारदा तुम्हारा पति तो गल हो गया है किंतु चिंता मत करो उसको भूल जाओ और यहां पर शांति से रहो देखिए मुंह पर तो सब शांतना देने वाली वाणी है किंतु भीतर में सब पता चलता है कि ऐसी बात से मां के मन को ठेस पहुंचती है मां को दुख पहुंचता है तो खैर यह है ह्यूमन साइकोलॉजी किसी भी गांव को ऐसा नहीं है कि कोई एक एक ही गांव में इस तरह का होता है या एक ही प्रांत में ऐसा होता है इ वर्ल्ड ओवर ह्यूमन नेचर तो एनीवे माने जब ये एक के बाद एक सब कहानियां सुननी शुरू की तो मां के मन में भी किस तरह की कष्ट द्विधा होती होगी हमको पता है आखिर में मां ने ठीक किया कि चलो मैं ही अपने अपने से दक्षिणेश्वर जाती हूं अपनी नजरों से देखती हूं कि वही ठाकुर कि जिनकी मोहम मय बातें सुनकर के यह कामर पुकुर के गा सब पुरुष और स्त्री व एकदम ईश्वर भाव में मग्न होकर के घंटों भर घंटों ठाकुर के सामने बैठे रहते थे ठाकुर की वाणी सुनते थे घर का जो काम है वह सब विस्मृत हो जाते थे क्या वही ठाकुर है जो कि इस तरह से वर्तन करते हैं मन तो स्वीकार नहीं कर रहा है करण चाहे जो भी सुनते तो मां ने ठीक किया कि वह खुद जाएगी जयराम दक्षिणेश्वर कोलकाता और मौका भी आ गया कि कोई पर्व था कोई उत्सव था गांव की स्त्रियां कोलकात्ता जाने वाली थी गंगा स्नान करने के लिए मां ने भी मां के मन में भी आया कि इस बहाने में इनके साथ में जाती हूं किंतु पिताजी को कौन बताएगा मां तो थी बड़ी लज्जा शीला आखिर में मां ने अपनी एक सहेली को बताया और उस सहेली ने जाकर के मां के पिताजी रामचंद्र को बता दिया कि मां शारदा की यह मन की इच्छा है पिताजी भी बड़े उदार हृदय थे उन्होंने कहा बहुत अच्छा यदि शारदा जाना चाहती है तो भले ही जाए मैं ही साथ में चलता हूं उसको लेकर जाने के लिए तो ऐसा ठीक हुआ गांव से पूरा दल निकल पड़ा और अभी रास्ते में क्या होता है इसका वर्णन गंभीरानंद जी महाराज अभी आगे में लिखते हैं चैप्टर का नाम है देवीर बोधन हिंदी में इसका नाम है देवी का जागरण महाराज जी लिखते हैं कन्या और संगी संगी गोण शहीद श्री रामकृष्ण हाट आई तारकेश्वर पोथे कोलकाता रवाना होई लेन कन्या और संगियोवेसे बाकी सब संगी गण के साथ में रामचंद्र चलके ही कलकता के पथ पर तारकेश्वर के रास्ते से कलकाता जाने के लिए रवाना हुए प्राय 60 माइल पथ ताहा दिग के अतिक्रम्य ईबे प्राय 60 माइल 60 माइल्स का रास्ता है जो कि उनको पार करना होगा अभी मुझे पता नहीं कि यहां पर माइल में क्यों लिखा है जनरली तो इंडिया में हमारा मेजरमेंट किलोमीटर में होता है तो मैं ऐसा अनुमान करके कर सकता हूं यहां पर 60 माई का ऑलमोस्ट 100 किलोमीटर के आसपास होगा अनुमान करके एजेक्ट मुझे नहीं पता है तो जो भी है लंबा रास्ता है वह भी पैदल चलना यानी कि यह तो काफी दूर हो गया श्री मां संगी और संगिनी देर सहित प्रथम टा बेश आनंद चनीन मां संगी और संगी नियों के साथ में पहले तो बड़े आनंद से ही चलना लगी पौथे दुई धारे उन्मुक्त प्रांतर रास्ते के दोनों साइड में खुले मैदान है प्रांतर माझे माझे रब शस्य शामल छबी देखिए महाराज की भी ये पोएटिक वाणी य मैदान के बीच-बीच में रवि शस्य अर्थात की रवि एक सीजन का नाम है शस्य अर्थात की पाक या तो फिर यह धान तो रवि सीजन में जो धान आते हैं उस तरह उस तरह के खेतों की बड़ी ही मनोरम सुंदर छवि कोथा बा घनो बख समा छन्नो ग्राम कहीं कहीं पर घने वृक्षों से घिरे हुए गांव है मध्य मध्य सुशोभित दीर्घ का नयन मने आनंद प्रदान करते छन कहीं कहीं पे बड़ी ही सुंदर दीर्घ का अर्थात की यह बड़े-बड़े सरोवर तालाब नयन और को आनंद प्रदान करते हैं अच्छा यह तालाब की और सुशोभित तालाब की बात आ ही गई है तो मुझे एक बात याद आ गई येय क्वाल पाड़ा की ही हम लोग ये क्वाल पाड़ा के बारे में बात कर रहे थे ना कल परसों कि क्वाल पाड़ा का मां के जीवन में एक बड़ा ही एक सुमधुर एक स्थान है क्वाल पाड़ा के लड़के वहां के वो टीचर केदार बाबू मां के साथ में इस तरह से जैसे कि दक्षिणेश्वर में यह सब लड़के लोग आते थे लाडू महाराज बाबू राम महाराज राजा महाराज नरेंद तो इसी तरह मां के पास में भी ये क्वाल पाड़ा के लड़के आते थे तो एक उस उस दिनों की बात है जबकि क्वाल पाड़ा के लड़कों का मां के साथ में संपर्क नहीं हुआ था हमको पता है कि बैकग्राउंड क्या है केदार बाबू वहां पर टीचर थे और उन्होंने ठीक कर लिया कि चलो यह स्वदेशी आंदोलन चलते हैं ये 1901 दो उसके बाद की बात है तो यह स्वदेशी आंदोलन उस समय चलना शुरू हो चुका था मा ठाकुर की महासमाधि 18864 तो स्वदेशी आंदोलन के जवार में भास करके मैंने तेर करके इन लोगों ने ठीक किया कि हम लोग आश्रम की शुरुआत करते हैं केदार बाबू टीचर थे और यह लड़के उनके कुछ स्टूडेंट थे आश्रम की शुरुआत की स्वदेशी वगैरह करते थे ये चरखे के ऊपर में सूता काटते थे एक दिन और उनका ऐसा नियम था कि शाम को सभी लोग बैठ कर के वह गीता है महाभारत ऐसे कोई ना कोई धार्मिक ग्रंथ का पाठ करेंगे और आलोचना करेंगे तो एक दिन रात को बैठे हुए थे एकदम गांव का वातावरण एकदम शांत वातावरण आज की तरह डीजे वगैरह और लाइट पोल्यूशन वगैरह तो कुछ नहीं एकदम लाइट मने संध्या हो गई तो पूरा आकाश तारों से भरा हुआ जैसे कि अपने सर पर आकर बैठ जाता है हमको आशीर्वाद देने के लिए ऐसा ही लगता है कि ऐसा हाथ बढ़ाएंगे तो स्वर्ग हाथ में आ जाएगा आजकल तो रात को ऊपर में देखेंगे तो धुए के अलावा कुछ नहीं दिखता तो एनीवे तो इस तरह से सुंदर तारों से भरे हुए आकाश के नीचे में बैठ कर के ये लोग बातें कर रहे हैं धार्मिक ग्रंथों का पाठ कर रहे हैं एकाएक कहीं से बहुत ही सुंदर पद्म फूलों की सुगंध हवा में भर गई तो ये लोग आश्चर्य चकित हो गए अरे इतने सुंदर पद्म फूलों की सुगंध कहां से आ रही है तो किसी ने बोला अरे पीछे में ही जो हमारी यह जो पुष्कर्णी है वहां पर ये जो छो तालाब है उसमें से पद्म फूल शायद निकले होंगे और उसी की ये खुशबू होगी तो किसी ने कहा कि अरे किंतु यह तो पद्म फूलों की मौसम नहीं है मुझे पता है उस तालाब में पम फूल नहीं है तो यह सुगंध कहां से आई सभी लोग आश्चर्य चकित होकर के बात कर रहे हैं किंतु कोई भी उनको यह मैंने लॉजिकल सोल्यूशन नहीं मिला कि यह सुगंध कहां से आ सकती हो सकता है किसी के घर में पद्म फूल लाए होंगे किंतु वो तो सीजन ही नहीं थी और यह आजकल की तरह अगरबत्ती वगैरह यह सब भी तो चलन नहीं था गांव में बेचारे को दिन भर खेत में काम करेंगे फिर रात को आकर के थोड़ा सा पाठ चर्चा करेंगे सो जाएंगे कौन अगरबत्ती बनाने वाला है तो जो भी है पता नहीं चला कहां से ये सुगंध आई किंतु सबके मन को उसने एक हायर लेवल पर एलिवेटर दिया एक उच्च सूर पे सभी के मन को बांध दिया और उसी के बाद में इनका कुछ समय के बाद में मां का प्रथम दर्शन हुआ था जयराम बाटी ग्राव जाकर के तो देखिए कि इनका जीवन जैसे कि मां ने ही पहले इनको इनकी चोटी पकड़ करके अपने पास खींचना शुरू किया हो कि क्या यह सब साइन है तो जब ये ये पढ़ा कि मध्य मध्य सुशोभित दीर्घ का बीच-बीच में यह कलकाता जा रहा रास्ते में सुंदर तालाब देख कर के इनके नयन और मन को आनंद प्रदान कर रहे हैं आबार मध्य मध्य विस्तीर्ण पथ पार्श्व स्थ विशाल अस्वस्थ अभी बीच बीच में विस्तीर्ण मने विशाल मने रास्ते के बगल में विशाल वटवृक्ष बटो अश्वत्थ वटवृक्ष प्रवृति वृक्ष समूह क्लांत पथिक के विश्राम जन्नो सादर आहवान करते छ रास्ते से जा रहे हैं बेचारे भूखे प्यासे भी होंगे क्या करेंगे किंतु यह प्रकृति का जो नियमन है प्रकृति की जो अवस्था मने इतनी सुंदर व्यवस्था है इस प्रकृति में कि रास्ते में कहीं पर भी जाएंगे तो इस तरह से पुष्कर्णी या तो तालाब मिलेगा जल पान करने के लिए और रास्ते के किनारे में इस तरह से सुदीर घ वृक्ष रंगे जिसके ऊपर में से आपको फल प्राप्त होगा आपकी शुदा शांत करने के लिए और उसकी छाव रहेगी वट अश्वत वगैरे वृक्षों की जिसके नीचे में बैठ कर के आप अपने शरीर और मन को शीतल कर सकते हैं देखिए महाराज जी ने कितना पोएटिक लैंग्वेज में लिखा है विश्राम जन्नो सादर आह्वान परिते से पथिक जो रास्ते पर चल रहा है वह थक गया है तो यह वट वृक्षों की छाव पथिक को सादर आह्वान कर रही अपनी छाव में बैठ कर के विश्राम करने के लिए ही शब देखीते देखीते प्रथम दई तीन दिन बेश काटिया गलो यह सब देखते देख देखते पहले दो तीन दिन बढ़िया मजे से कट गए किंतु देहे फूर्ति थाकी लेओ एवम दीर्घ दक्षि एवं शीघ्र दक्षिणेश्वर पछ बार अदम उत्साह मने जागी लेओ मलेरिया देश बास कोरिया श्री मायर स्वास्थ तो उ भालो छीलो ना देह में शक्ति थी मा मा तो भी नव यौवना थी उनकी उम्र तो बड़ी कम थी तो अभी देह में शक्ति भी है और मन में वह आस भी है आशा भी है कि दक्षिणेश्वर जाएंगे श्री श्री ठाकुर के दर्शन करेंगे तो देह और मन वैसे दोनों तो साथ दे रहे हैं किंतु कम नसीब कैसा है कि मलेरिया के देश में रहते-रहते शरीर का स्वास्थ्य धीरे-धीरे असर करने लगा हमको पता है आज की मलेरिया जैसे जितने भी डिसीज है वो पानी की वजह से फैलते हैं तो उस समय तो यह सब नहीं था कि पानी को फिल्टर करके पिए या तो फिर यह मॉस्किटो बाइट है मच्छर की उससे रात को अपने को बचा करके सोए यह सब इतना तो नॉलेज इतना नहीं था एक समय था मने एक सतयुग था अपने ऋषि मुनियों ने कितने सारे विज्ञान कितने सारे वेद कितनी सारी विद्या आविष्कर की थी किंतु वो समय तो चला गया अभी आजकल के गांव में उस समय के गांव में बस वही एक आध्यात्मिक विद्या बज गई थी किंतु ठाकुर कहते हैं ना श चालाकी चालाकी माने वही विद्या असली विद्या है जो कि हमको ईश्वर के पास ले जाए यानी धनुर्वेद चले गए चाणक्य का नीतिशास्त्र चला गया ये आयुर्वेद चला गया पल्ली मांगला के उस छोटे से गांव में वो हमारी वेद वेदांत की ज्यादातर परंपराएं चली गई किंतु ईश्वर के प्रति सरल सहज विश्वास ईश्वर के प्रति श्रद्धा और निष्ठा और एक पवित्र जीवन जीने की चाह यह जो एसेंस ऑफ अवर हिंदुइज्म कोर ऑफ अवर इंडियन लाइफ यह वहां पर बच के रह गया था किंतु क्या करें कि स्वामी जी ने भी एक बार कहा था कि यदि बांग्लादेश में यदि इस देव का जन्म नहीं होता तो पूरे विश्व को मैं तोल पाड़ कर देता स्वामी जी के क ने का वही अर्थ कि देखिए बीमारी हमारे हिंदू शरीर को पहले से ही पकड़ के रखी हुई है तो इस शरीर में थोड़ी सी भी ताकत आ जाए तो हमारा मन इतना स्ट्रांग है कि हम अपने मन से पूरे विश्व को जय कर सकते हैं अखंडानंद जी का वह दर्शन था ना एक दिन सपने में देखा कि एक बलिष्ठ मुस्लिम फकीर का देह धारण करके स्वामी जी चल रहे हैं रास्तों से तो अखंडानंद जी ने विस्मित होकर के स्वामी जी को पूछा कि अरे स्वामी जी आप इस तरह का देह क्यों धारण किए हैं तो स्वामी जी ने क्या कहा ए बार एई इस बार यही वेदांतिका ब्रेन की जो शक्ति है हमारे हिंदू ब्रेन की वह सही सही निखर के आएंगी इसके बारे में एक बड़ी ही इंटरेस्टिंग स्टोरी है देखिए मंगोल्स जो मंगोलिया आपने यदि नक्शे में मंगोलिया देश को देख देख होगा देखिए कि भारत के ऊपर में है थोड़ा सा ड्राई कंट्रीज में आता है तो अभी मंगोल्स ने जब विश्व विजय प्रारंभ किया तो उनके पास में दो अस्त्र थे एक तो था घोड़ा और दूसरा था तीर इन दोनों की मदद से घोड़े पर बैठ कर के पूरे सेंट्रल एशिया में ये लोग घूम गए और उनकी तीरंदाजी इतनी पावरफुल थी कि एकदम फास्ट घोड़ा दौड़ रहा है और वैसे ही वह तीर मार देंगे दुश्मन को अचूक जाके लगेगा माने ये मंगोल होड उसको बोलते मंगोल लोगों का यह जो पूरा दल आकर के आक्रमण करता है तो लोगों की मने कियारी करते करते चिल्लाते चिल्लाते तो ऐसी कोई सेना नहीं थी उस समय विश्व में जिसके भीतर में यह साहस हो कि उन लोगों का सामना कर पाए तो अभी हुआ क्या यह लोग जब ये मंगोल लोगों ने वेस्ट में फैलना शुरू किया तो एक के बाद एक सभी यूरोपियन एंपायर गिरते गए इस्लामिक एंपायर थे यह बगदाद इराक वगैरह इराक मने इराक तो मॉडर्न वर्ड है वो बगदाद वगैरह जोप था उस समय इस्लामिक हेली फेट का तो वो सब एक के बाद एक गिरते गए और यहां पर चाइना वगैरह में अटैक किया किंतु जब भारत में प्रवेश किया प्रॉब्लम क्या हुआ पता है यह तो इंडियन सबकॉन्टिनेंट है तो यहां की क्लाइमेट बहुत ही ह्यूमिड है ड्राई नहीं है जैसे कि जैसे-जैसे नॉर्थ में जाते जाएंगे वैसे-वैसे क्लाइमेट ड्राई होती जाएगी ये विषुववृत्त कहते हैं जिसको कि पृथ्वी का जो सेंट्रल पार्ट ये थोड़ा ह्यूमिड होता है और जैसे आप नॉर्थ नॉर्थ पोल या साउथ पोल की ओर जाते जाएंगे वो ड्राई क्लाइमेट होता जाता है तो इसीलिए जब यह साउथ एशिया बड़ी ही ह्यूमिड क्लाइमेट है तो यह लोग अपने ड्राई क्लाइमेट को छोड़ कर के जो प्लेंस होते हैं ना स्टेप्स उसको बोलते हैं जो जियोग्राफिक फॉर्मेशन है सेंट्रल एशिया का उसको स्टेप्स बोलते हैं तो स्टेप्स में से यह जो रिवर वैली वाले देश में प्रवेश किए ह्यूमिड क्लाइमेट वाले वैसे ही क्या हुआ पता है उनके जो तीर थे ना तीर में जो शक्ति होती है आप खींच के तीर फेंकें तो कितना दूर जाएगा वो जो बास वगैरह का जो बनता है तीर पहले तो उसमें भेज प्रवेश किया और तीर अपनी ताकत खो बैठे माने आप वो जो धनुष होता है ना धनुष को आप कितना ही खींचें फिर तीर छोड़ने से इतना दूर तीर जाएगा नहीं क्योंकि धनुष की शक्ति कम हो जाती है दूसरा कि जैसे ये लोग ह्यूमिड क्लाइमेट में प्रवेश किए ये लोगों ने अपनी हेल्थ खोना शुरू कर दिया क्योंकि ड्राई क्लाइमेट में हेल्थ बड़ा ही ठीक रहता है खाना भी ये लोग मांस वगैरह खाते हैं जबकि ये साउथ एशिया में थोड़ा सा धान ज्यादा चलता है और हूम क्लाइमेट है इसकी वजह से मंगोल लोगों ने अपनी शक्ति खोनी जो प्रारंभ कर दी है वे लोग बेचारे बड़े डर गए कि इन लोगों को हराना तो इजी है किंतु फिर अपने को बचाना मुश्किल है मने ये क्लाइमेट है वही हमको मार देगा तो ये लोग वापस चले गए मने मंगोल लोग इंडिया पे अटैक नहीं किए इसकी बहुत सारी थिरी है किंतु जो लोग प्रॉपर रिसर्च करते हैं उन्होंने ये सब खोज के निकाला है कि एक्चुअली ये जो क्लाइमेट है ना इसी ने मंगोल लोगों को हरा दिया था तो ये यही ये साउथ एशिया की ह्यूमिड क्लाइमेट में हम लोग रह रहे हैं उसमें भी वेस्ट बंगाल में आप जाएंगे देखेंगे कि गंगा का किनारा वगैरह इतना ह्यूमिड है ठाकुर ने खुद कहा था कि यह गंगा के किनारे रहते रहते सभी का पेट बिगड़ता है तो इस तरह की क्लाइमेट है हमारी और मां का यह फिर शरीर वैसे तो शरीर और मन में स्फूर्ति बहुत थी किंतु मलेरिया के देश में रहते रहते स्वास्थ्य उनका धीरे-धीरे बिल्कुल छोटी उम्र से ही बिगड़ना शुरू हो गया था महाराज जी आगे लिखते हैं विशेषत य तो दीर्घ पथ चला तहर जीवने प्रथम इतना लंबा चलना मां के जीवन में यह प्रथम है देखिए हम शहर वालों को तो खड़े होकर के काम करने की भी हैबिट नहीं रहती छोटा सा आश्रम है या तो छोटा सा घर है शहर है तो जहां पर भी जाना है तो गाड़ी में बैठ के या बाइक में बैठ कर के जाना है स्कूटर प बैठ के हम लोग चलते हैं मैंने अपनी शेरी के सामने में ही अपने घर के सामने ही वो जो किराने की दुकान है वहां से जद कुछ बिस्किट वगैरह लेकर जाना है तो उसके लिए भी हम लोग स्कूटर पर चलते हैं तो ऐसी हमारी हैबिट हो गई है शहर वालों की गांव वालों की हैबिट ऐसे वैसे अच्छी है कि उन्हो को मने खेत में जाते हैं घर का काम करते हैं सब कुछ करते हैं किंतु फिर भी ये 60 माइल यानी ये 100 किमी के आसपास का ये पथ चलना ये तो मां के लिए भी तो पहली बार था वो जो इसके पहले जो गंभीरानंद जी महाराज ने मां के बारे में एक सुंदर बात लिखी है ना मां वैसे छोटी थी तभी से घर का सारा काम करती है खाना भी बनाती है किंतु मां के तो छोटे-छोटे हाथ माने बालिका है वो तो खाना बन जाएगा तो हंडी को उसके ऊपर में उतारना होगा आगन के ऊपर में से तो वह बेचारी कैसे कर पाएगी तो मा पिताजी को बुलाती थी पिताजी आकर के हांडी को उतार दीजिए तब रामचंद्र आते थे और वह जो खाना बनाई हुई हांडी उसको आगन के ऊपर में से निकाल उतारते थे तो वैसे ही मां बेचारी काम तो सब करती है किंतु क्या करें स्त्री शरीर है वह भी बालिका थी इतना लंबा चलना उनके लिए जीवन में यही प्रथम है अपरे असुविधा होई बे विशेष तो अपरे असुविधा हैवे पिता उद्ज हो बन इत्यादि भाया एवं स्वाभाविक संकोच वसत तिनी निजो चरण धर अपट उतार कोथा दोई तीन दिन चापि आई लेन चलने में कष्ट हो रहा है किंतु सभी लोग तो चल रहे हैं अभी मां जद बोलेगी कि मैं नहीं चल पा रही हूं थोड़ा सा विश्राम करिए तो फिर तो दूसरों को असुविधा होगी यानी कि दूसरों को असुविधा होगी और फिर पिताजी मां का स्विक संकोच है मां लज्जा शलाला थी दूसरों को कष्ट पहुंचे ऐसा मां बिल्कुल कभी भी नहीं करती थी इससे पहले भैरवी ब्राह्मणी की बात देखी भैरवी ब्राह्मणी वो बहुत ज्यादा मिर्च देकर के वो खाना वगैरह बनाएगी सब्जी बनाएगी और फिर मां को खिलाएगी मां को और रामलाल की मां को तो अभी रामलाल की मां तो एकदम चिल्ला उठेगी खाते खाते अरे इसमें इतना मिर्च डाला है किंतु मां का ऐसा स्वभाव था कि भले अपने को कष्ट पहुंचे किंतु दूसरे को ऐसा नहीं कहना है कभी भी कि उसको कष्ट पहुंचे तो मां की आंखों में से पानी भी निकल रहा है और मां यह तीखी सब्जी खा भी रही है और मुंह पर बोल भी रही है कि अरे बहुत अच्छा हुआ है बहुत अच्छा हुआ है तो यह थी हमारी मां भले ही हमको कष्ट हो मां को कष्ट हो चरण धर अपट उतार कोथा देखिए महाराज की पोएटिक लैंग्वेज दोनों च चरण ध्व अर्थात की दोनों पैरों की अपट उता अर्थात की अस क्म तार कोथा बातें दूसरों को कैसे बता आएगी लज्जा शीला संकोच शल मां अपने को कष्ट हो जाए किंतु हमारी वजह से दूसरों को कष्ट ना तो यही मां बिना कुछ भी बोले सब कुछ सर्वम स्वहा सर्वम सहा मां के बारे में कहा गया है सब कुछ सहन करती है वो यह मां है बाद की बात है मने एक दिन की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही मां वहां पर जयराम बाटी में रह रही है मां का प्रिय भाई छोटा भाई अभय वो तो बेचारा चल बसा डॉक्टरी की परीक्षा पास कर रहा था स्वामी जी को मिलने को गया तो स्वामी जी कहते हैं माय रेर कम भाई अच्छ मां का ऐसा भाई भी है ये तो सब गांव के मूर्ख लोग सब ये मां के भाई माने वरदा मामा काली मामा प्रसन्न मामा ये लोग क्या करेंगे वो मने खेत में खेती करेंगे और व शहर में जाकर के थोड़ा बहुत यजमान कर लेंगे किंतु अभय था वो इतना इंटेलिजेंट था कि मेडिकल की एग्जाम पास कर रहा था स्वामी जी भी आश्चर्य चकित सर्व विश्वविजय स्वामी विवेकानंद वो भी आश्चर्य चकी कि मां का ऐसा भाई है तो वो बेचारा भाई चल बस और फिर जब वो मां के ये जो सब छोटे छोटे ये भाइयों के बच्चे वो बड़े हो रहे थे मां ने क्या कहा तोरा मूर्खों को ही बेचे था तुम लोग मूर्ख होक के बचे रहो जब मां ऐसा कहती थी तो उनके भाइयों की पत्नियां बड़ी नाराज हो जाती थी कहती थी मां आप बच्चे को ऐसी उल्टी बात क्यों कह रही है ऐसा क्यों कह रहे है तुम लोग मूर्ख हो कर के बचे रहो तो मां रोती रोती कहती थी कि देखो मैंने अपने भाई अभय को बड़ा किया और उसको इतना पढ़ाया लिखाया किंतु अभय बेचारा देखो कि छोटी उम्र में मर गया तो मने ऐसा है ना कि आप हो तो शुद्ध पवित्र है पढ़ाई लिखाई करते हैं निष्ठा पूर्वक जीते हैं तो ईश्वर के बड़े प्रिय हो जाते हैं और ईश्वर आपको पहले ही अपने पास खींच लेते हैं क्या करें यह एक जगत का यह नियम है तो मां ने यह सब देखा था तो वही अभय की पत्नी सूर्यबाला वो पागल हुई और पागल होने के बाद में क्या उटपटांग हरकतें करती है एक बार तो कुछ कोई चीज उठा कर के सीधी मां को मार दी तो अभी मां भी अभी कष्ट होता है किंतु मां सब समय सुरबाला को अपने मन में आशीर्वाद ही देती रही तो यह सर्वम सहा मां शारदा अपना कष्ट है दूसरे को नहीं बताना है संकोच वसत चरण द्वे अपट उतार कथा दोनों चरणों की अक्षमता री बात दई तीन दिन चापि आई छीने दो-तीन दिन किसी को बताया ही नहीं किंतु अवशेष प्रबल जरे संपूर्ण अखम होया पड़ाए पिता पुत्री के बा होया एक खानी चोटी ते आश्रय लेते हुलो किंतु आखिर में प्रबल ज्वर इतना मने बुखार हुआ कि आखिर में मां बिल्कुल अचल हो गई अवश हो गई और पिता और पुत्र स्त्री को एक धर्मशाला में आश्रय लेना पड़ा देखिए यहां पर शब्द है चोटी अर्थात कि यह बांगला में भारतवर्ष में ऐसा है शहरों में तो हम ये सब प्रथाएं भूल गए हैं गांव-गांव में जब पिलग्रिम्स ये जो यात्री जब तीर्थ दर्शन के लिए जाते हैं तो रात को कहां पर विश्राम करेंगे शहरों में तो यह सब होटल वगैरह है यात्रियों को गांव में कहां कुछ मिलने वाला है तो यह गांव के बाहर में इस तरह से एक छोटी सी एक मकान की रचना की जाती जिसको चोटी या तो धर्मशाला हम कहेंगे वहां पर यात्री लोग रहेंगे पास और इसकी रचना भी इसी तरह से होगी कि पास में छाव है शीतल पेड़ों की छाव है या तो नदी है या तो यह पुष्कर्णी है तालाब है ऐसा कुछ ना कुछ सुंदर जगह देख करर के इस तरह की धर्मशाला हों की चोटी की रचना की जाती तो ऐसी ही एक चोटी में इन लोगों ने विश्राम ग्रहण किया आश्रय ग्रहण किया वई अस् य श्री मायर मोनेर निदु कटेर कथा सहज अनुमस्तिष्क बुखार की यह पीड़ा मां के जीवन में नई बात नहीं है गांव में रहना है मलेरिया के देश में रहना है बारबार मलेरिया तो होगा ही होगा हम सबने उन्होंने इसके साथ में जीना सीख लिया था तो बुखार की पीड़ा मां के लिए नई नहीं थी उ हाते होश होई बार कोनो कारण छलो ना बुखार से हताश होने की वैसे कोई बात नहीं थी एमन की अज्ञात स्थान तहा के ते मन चिंति तो कोरीते पारे नाई वैसे ये अज्ञात स्थान है जहां प ये लोग रह रहे हैं वो भी मां को चिंतित नहीं करता था देखिए हम शहर वालों को अंधेरे की बड़ी डर रहता है मैं एक मैं छोटा था तो मैं एक एक रिलेटिव मेरी ही उम्र का एक छोटा सा तो उसको आकाश की ओर देखने में डर लगता था मैं कहूंगा देखो ऊपर में आकाश में कितने तारे हैं वो हमारे घर में ही छत के ऊपर में हम बैठे चारों ओर इतने सारे लोग रह रहे हैं किंतु फिर भी आकाश की ओर नहीं देखेगा क्यों आकाश की ओर देखने से डर लगता है हम लोग शहर में जो रहते हैं ना हम लोग इतने प्रकाश के प्रदूषण आवाज का प्रदूषण इससे ऐसे गिरे हुए हैं और चारों र लोग लोग भर्ती जो सोसाइटी में रह रहे हैं अपार्टमेंट में रह रहे फ्लैट में रह रहे हैं इतने लोग भर्ती हम लोग थोड़ा सा भी एकांत मिलने से थोड़ा सा भी अंधेरा मिलने से हम लोग डर जाते हैं शहर वालों की बात कर रहा हूं गांव में ऐसा नहीं है मैंने वो जहां पे वह गांव का प्रांतर है गांव की सीम है खेतर में जाते हैं वहां पे खुला काश खुला मैदान खुले खेत और कोई नहीं अंधेरा जदी रात को मैं एक बार नारायणपुर गया था हम लोगों को तो पता है ना कि जब हम जॉइन करते हैं उसके बाद में दो-तीन साल एक सेंटर में रहना होता है फिर उसके बाद में ट्रेनिंग सेंटर जाना होता है तो अभी मैं ट्रेनिंग सेंटर मेरा जब था उस समय में जा रहा था रास्ते में नारायणपुर बोलकर के एक सुंदर जगह है वहां मध्य प्रदेश में वहां पर अपना एक आश्रम है ट्राइबल डेवलपमेंट का वो पूरा ट्राइबल एरिया है तो वहां पे मैं कुछ दिनों के लिए रहने के लिए गया था तो अभी वो हिली एरिया है ट्राइबल एरिया है कोई शहर वगैरह नहीं वस्ती नहीं तो अपने आश्रम में वहां वैसे ही तो आश्रम में कोई नहीं रहता और फिर आश्रम से दूर जहां पर हमारा यह था एक फार्म था वहां पर तो और भी कुछ नहीं वहां पर जो एक इंचार्ज स्वामी जी थे वो रहते थे और बस एक दिन रात को उन्होंने ऐसा कहा कि अच्छा देखो एक काम करते हैं कि यहां पे एक काम करते हैं कि यहां पे रात को रहते हैं और वो खाना थोड़ा सा बनाते हैं भजिया वगैरह हम लोग खाते हैं चलो तुम तो मैंने कहा चलो बैठते हैं बढ़िया मजे से गप लगाते हैं रात का समय था बड़ा सुंदर फार्म था कोई नहीं आसपास में मैंने कितने किलोमीटर दूर तक कोई नहीं था और हम दोनों लोग ये भजिया वगैरह बनाया और खा रहे हैं वो उस साधु को मैं पहचानता था पहले से ही पहचानता था तो हमारा अच्छा मित्र रहता था बहुत दिनों के बाद में मिले थे तो भजिया खाते खाते गरम चाय पीते पीते गप लगा रहे हैं सामने में थोड़ा सा एक छोटा सा आगुण जलाया है उस समय मैंने आकाश में देखा बाप रे आकाश में इतने तारे हो सकते हैं हम लोग शहर में रहने वाले लोग अनुमान नहीं कर सकते ऐसा ही आकाश मैंने एक बार कन्याकुमारी में देखा था कन्याकुमारी वैसे तो शहर छोटा सा गांव है किंतु इतना खुला तीनों ओर से समुंदर है तो समुंदर की हवा की वजह से जो भी ये एयर पोल्यूशन वो दूर हो जाता है तो एक बार मेरी ऐसी हैबिट हो गई थी कन्याकुमारी में कुछ दिन रहा था तो रात को मैं समुंद्र के किनारे जाकर के सो जाता था और आकाश देखता रहता था तो इतना स्वच्छ निर्मल आकाश कभी देखा नहीं था कभी अनुमान नहीं किया था तो सोता था एक दिन मैंने देखा कि आकाश में कुछ तारे चल रहे हैं तो मैं तो बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया भाई यह मुझे क्या दिख रहा है तारे चलते हैं क्या आकाश में जो प्रकाश का छोटा सा पुंज यदि चलता हुआ दिखे तो आप क्या अनुमान करेंगे या तो वो एरोप्लेन है या तो फिर यह शूटिंग स्टार है जो मेटराइड पृथ्वी पर गिरती है वो है या तो फिर और कुछ है किंतु देखिए मेटराइड की गिरने की गति बहुत ही फास्ट होती है एरोप्लेन की स्पीड भी मुझे पता है शहर में रहते-रहते हम सभी ने एरोप्लेन देखे हैं आकाश में उड़ते उड़ते तो उसकी भी गति नहीं है बहुत ही स्लोली चल रहा है तो इतना स्लोली आकाश में चलने वाला क्या हो सकता है मुझे थोड़ा सा एस्ट्रोनॉमी समझ में आता है मैंने सब कुछ इमेजिन करके देख लिया यह सैटर्न है ना कि मार्स है ना कि मून तो नहीं हो सकता है तो ये क्या ये दूसरे दिन मैंने वहीं पर रहने वाले किसी एक भाई को पूछा मैंने बोला भैया यहां प मैंने ऐसा देखा आकाश तारा चल रहा है मुझे तो एस्ट्रोनॉमी समझ में आता है थोड़ा बहुत मुझे नहीं लगता कि मैंने ऐसी कोई चीज अभी तक देखी है तो मुझे बोला कि अरे भैया वो तो सेटेलाइट है मने आकाश इतना क्लियर है कि सैटेलाइट दिखता है वहां पे तो जब ये गांव वालों को इस तरह के खुले आकाश में खुले मैदान में रहने का अनुभव होता है तो एक अजानी अनजानी जगह पर रह रहे थे तो मां को इसका कोई दुख नहीं था तो ये बुखार का भी दुख नहीं था और यह खुली एक एकांत जगह पे अनजानी जगह प रह रहे हैं वो भी कोई उनको चिंता करने की बात नहीं थी किंतु सर्वा पेखा कष्टदायक होलो किंतु सबसे ज्यादा कष्टदायक क्या था तिनी अति बांछित पति सं दर्शने कोब सकम होई बन ही समाधान हीन समस्या अति वांछित पति संदर्श अति वांछित हृदय की आकांक्षा से पति के दर्शन के लिए जो जा रही थी वह अभी कब होगा ये समाधान हीन समस्या ऐसी समस्या कि जिसका समाधान नहीं दिख रहा था तो ऐसी समस्या के साथ में क्या हुआ बाद में उसको हम कल देख आज यही ओ शांति शांति शांति हरि कसत श्री राम कृष्णर्पण मस्
Questions & Answers
ये एक बड़ी सुंदर इंसिडेंट है कि मां उद्बोधन में रह रही है ठाकुर की महा समाधि के बाद की बात और शरत महाराज ने मा मां बार-बार कलकाता आएगी जयराम बाटी से तो कहां रहेगी भाड़े भाड़े का घर यहां पे लेंगे वहां पे रहेंगे सब तरह से सुविधा तो मां को रहने के लिए उद्बोधन भवन का निर्माण किया अभी मां उद्बोधन में है इतना सब कुछ वहां पर मां को लेकर के है शरत महाराज मां के धवारी के रूप में खड़े हैं शरत महाराज जनरल सेक्रेटरी ऑफ रामकृष्ण मार्टन मिशन किंतु उनकी पहचान है मैं मां का चौकीदार हूं मैं मां का सेवक हूं मां का धवारी हूं तो वहां पे मां रह रही है किंतु मां का आवाज किसी को नहीं सुनाई दे रहा है इतना शांत भाव से चिल्ला जद आवाज सुनाई देगी तो कभी-कभी शरद महाराज की आवाज सुनाई देगी उनको कड़े आवाज में किसी को कुछ बोलना पड़ेगा पूरे मठ मिशन का जिम्मा तो वैसे उनके सर पे है गुलाब मां है बाद बाद में चिल्लाएगी योगिन मां साथ में रहती है इतने सारे साधु भक्त आते रहते हैं तो उद्बोधन के बाहर में खड़े रहेंगे तो आवाज किसकी सुनाई देगी मां की तो कभी भी नहीं सुनाई देगी किसी को पता भी नहीं चलता था मां वहां पे है इतना चुपचाप शांत रूप से रह रही है एक दिन क्या हुआ कि वो अभी तो आप उद्बोधन में गए होंगे देखांगे कि पतली सी गली है सामने ये सब झुग्गी झोपड़ी वगैरह है वहां पे एक दिन एक वो लेबरर्स लोग रहते हैं तो एक लेबरर एक दिन रात को घर पर आकर देखा कि उसकी बीवी ने उसके लिए जो खाना बनाया था जो बनाना था उसने बोला होगा शायद वो शायद नहीं बनाया था तो अभी इनलोग का भी एक नेचर रहता है ना लेबरर्स का मजदूर लोगों का शराब पीके शायद आया होगा तो जैसे उसने देखा उसकी बीवी ने उसके लिए खाना नहीं बनाया है या मनपसंद खाना नहीं बनाया उसने सीधा उसको मारना शुरू कर दिया और ऐसा मार मार मार रहा है क बीवी उसकी बेचारी पत्नी जोर-जोर से चिल्ला चिल्ला करके रो रही है अभी मां एक उनके मुंह से उच्च आवाज भी नहीं आती एक शब्द भी मां का किसी को नहीं सुनाई देता मां वहां पर उद्बोधन की पहले जो पहली मंजिल पर जहां पर रही थी रेलिंग है बरांडा है वहां पर जाकर के रेलिंग को पकड़ कर के मां ने जो चिल्लाया है रे मिनसे बटा के मेरे फेल भी शेश माने अरे साले तुम अपनी बीवी को मार ही दोगे क्या ऐसा जोर से चिल्लाई और जो रुद्र स्वरूप प्रकट किया वो जो शराब पी कर के धूर्त होकर के बीवी को मार रहा था और उद्बोधन में पूरा सन्नाटा छा गया मैंने मां की आवाज किसी ने नहीं सुनी और ये रुद्र स्वरूप क्रोधित स्वरूप सडन एकदम एकदम चुपचाप कोई एक आवाज भी नहीं कर रहा पिन ड्रॉप साइलेंस वो आदमी भी बीवी को मार रहा है तो वह एकदम जैसे फ्रीज हो जाता है ना वो भयानक डर नजर के सामने आता है साप जब चिड़िया के सामने आता है तो चिड़िया कैसे मेसमराइज हो कर के फ्रिज हो जाती है वो आदमी भी बेचारा डर के मारे जो स्थिर हो गया इसके बाद में किंतु फिर उसको अकल आई और फिर वो मारना बंद करके बीवी के साथ में समाधान करने लगा और फिर मां एक ही वाक्य बोली थी फिर वो अपने कमरे में वापस चली गई तो देखिए कि मां और ठाकुर के साथ में रहती थी तो लज्जा शलाला शांत रहना सर्वम सहा वह सब मां के लिए ठीक था किंतु ऐसा किसी का पति हो जो कि शोषण करता हो और उसके सामने बहु कुछ ना बोले यह तो मां को भी सहन नहीं था मां भी तो कहेगी कि अपने राइट के लिए हमको आवाज उठानी है यह तो एक चीज हो गई दूसरी चीज देखिए अभी जैसे आपने कहा कि आज के मॉडर्न एज में मां का उपदेश कहां तक हम लोग अभी यह तो एक एक्स्ट्रीम एग्जांपल हो गया मेरी खुद की बहन अमेरिका में रहती है जॉब करती है अभी अमेरिका का न्यूयॉर्क वगैरह तो आपने देखा है किस तरह की कंडीशन कैसे रहना होता है वहां पे मैं कैसे उसको बोलूं कि तुम मां की तरह रहो मां छोटे से पिंजरे में नबत में रहती थी घर के बाहर भी नहीं निकलती थी खजांची बोलता है हमको पता है कि मां रहती है किंतु हमने कभी उसका उनको देखा नहीं है तो इस तरह से जो न्यूयॉर्क में रहता है जॉब करता है ऐसी लड़कियों को क्या बताएंगे कि मां का जीवन में ऐसे सीख लो आप कैसे बताएंगे उनको आज की जो मॉडर्न महिलाएं हैं है स्त्री हैं उनको तो क्या है पता है देखिए हमारा काम क्या है जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि हैंड्स ऑफ हमको मां का जीवन चरित्र उनके सामने में रख देना है वो मुझे कोई भी क्वेश्चन करती है ना तो मुझे मैं मुझे कहना पड़ता है देखो इसमें से क्या लेना है क्या नहीं लेना है तुमको देखना है मैं कैसे तुमको बताऊं तुम्हारे जीवन में क्या रिलेवेंट है तुम किस तरह से इसमें से क्या उपदेश ग्रहण करोगी मैं तो तुमको ऐसा नहीं कहूंगा किसी भी मेरी बहन को किसी को भी नहीं कहूंगा कि अभी जॉब है करियर है वो सब छोड़कर के अभी एक छोटे से नबत जैसे पिंजरे में जाकर के रहो और पति की बातें चुपचाप सुन लो ईश्वर की लेडी साइंटिस्ट देखिए उनको देख कर के ही पूरे भारतवासियों को कैसा गर्व होता है तो कहां पर वह चंद्र पे सूर्य पे वो जो स्पेस प्रोप भेज रही है उनको हम कहेंगे कि मां की तरह चुपचाप एक कमरे में बंद होकर रहो संभव ही नहीं है किंतु हमारा काम क्या है कि मां का जीवन इनके सामने रख देना है फिर ये ो की जो साइंटिस्ट है यह जो अमेरिका में ये जो इतनी सारी बहने हमारी कैरियर उनको पसू कर रही लेटम डिसाइड कि मां के जीवन में से उनको क्या लेना है व एक स्त्री ही ठीक कर सकती है उसमें हम पुरुषों को बोलने के लिए उसमें ज्यादा कुछ नहीं है जैसे स्वामी जी ने कहा हैंड्स ऑफ