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ओम संस्थापक धर्म स्वरूप नमः शारदा देवी जीवन कथा स्वामी गंभीर राणा जी महाराज महाराज जी कहते हैं की पहले पुराण में पौराणिक युग में जी तरह से देव और असुर संग्राम बाहर के जगत में होता था अभी अंतरित जगत में होता है हमारे हृदय में होता है हमारी सुरतिया और कुवृतियां इन दोनों के बीच में होता है ये एक पॉइंट था और दूसरा की बाहर का जो संग्राम है सही-सही रक्सन के साथ में जो मां का आध्या शक्ति का जो युद्ध होता था उससे भी कहानी जाता भाया वह हमारे भीतर का संग्राम है क्यों क्योंकि वो बाहर का संग्राम बाहर ही राहत था लोगों के मां में मां के प्रति देवी देवताओं के प्रति आध्यात्मिक जीवन के प्रति या तो फिर धर्म के प्रति वो श्रद्धा भक्ति बरकरार रहती थी भले ही चाहे रक्षा आए और जाए उनकी धर्म साधना जो है उसमें कभी त्रुटि नहीं आई थी किंतु आज के जो आज के जमाने में जी इंटरेस्ट है आज के समय में जी तरह हमारे हृदय में जब संक्षेप प्रकट हो जाता है हमारे हृदय में जब यह संदेह एक बार ए जाता है की भगवान है की नहीं और मैं क्यों नहीं यह भौतिक जगत को ही मेरा सब कुछ मां लो क्यों नहीं मैं इस भौतिक जगत को ही मेरा अल्टीमेट एम बना करके ना रहूं ऐसा संदेह जब प्रकट होता है तब हमको यह संदेह भीतर से का जाता है सो डेट इस मैच मोर डेंजरस और ये बात भी सही है की भीतर में एक बार संदेह प्रकट होता है तो वो संदेह आउटसाइड जिसको स्पीड ओवर इफेक्ट बोलते हैं वो हमेशा होता है मेरे हृदय में यदि शांति है तो मैं जहां पर भी जाऊंगा सभी लोगों को खुशी महसूस होगी मेरे हृदय में अशांति है मैं बाहर जाकर के जहां पर भी जाऊंगा मैं कुछ ना कुछ डिस्टरबेंस खड़ा करूंगा यानी की भीतर का जो संग्राम है वह भीतर में भी चला है बाहर में भी चला है जबकि जो बाहर का संग्राम था वो बाहर में ही चला था कभी-कभी किसी के मां में संदेह हो जाता होगा शायद की अरे ये शुभ निशान या तो फिर ये रक्तबीच एन किया कंस है एन किया रावण है इतने पावरफुल है तो भगवान इनको किस तरह से मार के हटाएंगे किंतु ये संदेह क्षणिक भर राहत था क्योंकि भगवान की विजय अवश्य हमेशा होती ही थी किंतु आज के समय ये जो संदेह इतना व्यापक है की हम लोग यदि मंदिर में भी जाते हैं हम लोग यदि किसी को प्रार्थना भी करते हैं मंदिर में जाकर के या तो फिर हम सत्संग करने का भी पर्यटन करते हैं हम जो कुछ भी करते होंगे हमारा जो कन्वैक्शन है वह कभी इतना दृढ़ नहीं होता की हमको साधना के मार्ग पर आगे ले जाए और सिर्फ ये ग्रह हस्तका नहीं हम लोगों का भी मैं अपनी बात करूं तुम मेरे लिए आदर्श क्या है आज मुझे तकरीबन 20 साल होने को आए हैं रामकृष्ण संघ में साधु की तरह रहते हुए साधु बन के रहते हुए तो मेरा तो मेरे लिए आदर्श यह है की मैं पुरी रात भर जब ध्यान करूं दिन में थोड़ा सा सोनू जैसे राजा महाराज कहते थे की हमारे लिए साधुओं के लिए पांच घंटे से ज्यादा की नींद किसी कम की नहीं है आवश्यक नहीं है तो मैं सही में 5 घंटे से ज्यादा नहीं सता किंतु ऐसा नहीं है की फिल्म में जब जगत हूं तो फिर जब ध्यान करता हूं फिर वो कम है ऑफिस में जितना भी कम है मैं बहुत ज्यादा टाइम ऑफिस में बिताता हूं और फिर रूम में जाता हूं तो मैं पढ़ना शुरू कर देता हूं मेरा एक बहुत ही पढ़ने का रीडिंग का बड़ा ही स्ट्रांग हैबिट है उसे समय निकालना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल हो जाता है तो जल्दी सही-सही जैसे स्वामी जी कहते हैं ना ठाकुर कहते हैं की अपने एक चोर है उसको पता है की बगल के कमरे में धन संपत्ति वैभव रखा हुआ है एक खजाना रखा हुआ है तो वो चोर यदि इमीडियाटली खड़ा होकर के वो बीच वाला दरवाजा तोड़ के जब तक वो खजाना हस्तगत नहीं करेगा तब तक उसको चैन नहीं पड़ेगा वो सही चोर है किंतु यदि किसी चोर को अपने बोल दिया की अब देखो तुम्हारे बगल वाले कमरे में खजाना पड़ा है तो वो आराम से लेटर रहेगा बोलेगा की अभी मैं पहले भी नींद से जग लूं पहले मैं सो जाऊं फिर थोड़ा विश्राम कर लो बाद में देखा जाएगा तो दो चीज या तो वो सही चोर नहीं है या तो फिर उसको ये कनविक्शन नहीं है की ये बगल के वाले कमरे में सही-सही खजाना है और दरवाजा तोड़ने की उसकी जो मेहनत है उसका कुछ उसको रिजल्ट मिलने वाला है उसको लगेगा की सामने वाला सिर्फ उसको मूर्ख बना रहा है गलत गलत बातें करके तो ये कनविक्शन यह होना भीतर में की हां मैं थोड़ा सा मेहनत करूंगा ठाकुर क्या कहते हैं की जब मौका चालक जो होता है उसको जब जड़ वृष्टि आई है तो वो एकदम खड़े र करके दत करके वो वो रोमिंग जिसको कहते हैं हाल ऐसा लगा करके मौका को कैसे भी करके तूफान से पर निकाल लगा फिर जब तूफान शाम जाता है तूफान शांत हो जाता है सुंदर हवा बहाने लगती है तब वो अपना सब पाल उठा करके सेल जिसको इंग्लिश में कहते हैं उसको उठाकर के वो नोखा को पवन के साथ में नेचुरल हवा के साथ में बहाने देता है और बैठ करके आराम से वो हक का पिता है तंबाकू खाता है या तो फिर वह बीड़ी पिएगा जैसे गुजरात में होता है लोग बीड़ी पीते हैं तो यह जब संघर्ष एक बार कर लेना है मां को शांत हो जान देना है मां को भीतर में से हमारे जो अशांति है जो जिसको कहते हैं की विकेंद्रित मां है जो चारों और बिखरा पड़ा है उसको एक बार मेहनत करके केंद्रित करना है एक बार मां की जो रिस्टलेसनेस से मां का जो राजा से उसके ऊपर एक बार विजय प्राप्त कर लेनी है मां को ओजस और सत्व से भर देना है फिर इस मां से चाहे हम कुछ भी करें ठाकुर के लिए एक परफेक्ट इंस्ट्रूमेंट हो जाएगा वो तो वो इस मां से फिर ठाकुर ही अपना कम करवा लेंगे किंतु होता क्या है ज्यादातर बात हम ज्यादातर दिन हम लोग यह सब सुनते तो है किंतु उसके ऊपर में उसको इंप्लीमेंट करना उसके ऊपर में कार्य करना वह हमसे नहीं हो पता है यानी की हम लोग उसे चोर की तरह है या तो वह सच्चा चोर नहीं है या तो उसको कनविक्शन नहीं हुआ है यह दरवाजा तोड़ने की की जो मेहनत है उसका उसको कुछ पॉजिटिव रिजल्ट मिलने वाला है तो हम सभी लोगों के साथ में यह बात है की संदेह और संशय या तो फिर कहे की एक तरह का लेज़ीनेस आजकल लोग संदेह भी नहीं करते आप बोलेंगे की क्या भगवान पर विश्वास है तो वो फटकार के बोल देगा हां मुझे विश्वास है किंतु भीतर में इतना लेज़ीनेस राहत है इतना तमाशा राहत है की फिर भगवान को प्राप्त करने के लिए कुछ करने को आप अब किसी को भी बोल लिया जाए आ आज के जितने भी कॉलेज में पढ़ने हुए लड़के लड़कियां हैं स्कूल में पढ़ने हुए अब बोलेंगे की भगवान पे विश्वास है तो हां विश्वास है विश्वास कोई नहीं बताया किंतु फिर साथ में यह पूछेंगे की भगवान को प्राप्त करने के लिए क्या थोड़ा सा मेहनत करना पसंद करेंगे क्या मेहनत करना चाहेंगे तो सीधा उत्तर ना में मिल जाएगा पहले पढ़ाई-लिखाई कर ले फिर एक करियर बना दे फिर फैमिली बना दे फिर थोड़ा सा सोसाइटी में एक जगह बना दे अपने लिए फिर थोड़ा सा बैंक बैलेंस बना दे फिर थोड़ा सा इन्वेस्टमेंट कर ले फिर थोड़ा सा प्रमोशन मिल जाए उसके बाद में जब बूढ़े होंगे तब देखा जाएगा ऐसा जो ऑनेस्ट होंगे वो इस तरह से उत्तर देंगे और जो डिशऑनेस्ट होंगे वह इतना भी नहीं कहेंगे की ना हम लोग नहीं करना चाहते वो बोलेंगे हां बता दो एक बार क्या है हमारे यहां देखिए की राजकोट आश्रम में इतने सारे कार्यक्रम वगैरा होते हैं इतने हजारों हजारों स्टूडेंट यहां पे वो नियमित रूप से आते हैं किंतु यदि आप उसमें से साधु बने के लिए कितने लोग आते हैं एक चीज और दूसरा की सही सही भले चाहे गुरु हस्त भी रहे अपना जीवन बचपन से ही यंग आगे में से ही ये 15 20 साल की जो उम्र है तभी से सही सही साधना करनी चाहिए साधना का अर्थ यह नहीं की आप घर बार छोड़ करके यहां पे ए जाए सन्यास सन्यासी होना बड़ा जरूरी है मैं आवश्यक भी है और अच्छे भी बात है किंतु घर में रहकर के भी ऐसे गृहस्ती अब बड़ा ही सीरियस साधना कर सकते हैं किंतु कितने लोगों का जीवन इस तरह से परिवर्तित हुआ होता है वो देखने के लायक है और मैं मैं जब यहां पे 2013 में एक यूथ कन्वेंशन हुआ था तो उसमें राजकोट आश्रम में तकरीबन 2.5-3 हजार यंग लड़के लड़कियां आए थे तो की कोई कोई बोल रहा था हमारे देवोते इमेज से करें इतना बड़ा प्रोग्राम क्या रिवॉल्यूशन ए जाएगा पूरे गुजरात में इतने सारे लड़के लड़कियां आते हैं क्या उनका उनका कितना अच्छा होगा उनके साथ में मैंने कहा देखो आज से 10 साल के बाद में तुम देखना की ये जो आते हैं यहां पे उनमें से कितना लोगों का जीवन सही सही धर्म की और चलित होता है धर्म की और डायरेक्शन वह लेते हैं नोट नेसेसरी के साधु होते हैं किंतु उनके जीवन में जो प्रतिदिन जो समय देना है योग साधना करने के लिए वो कितने करते हैं जो और कुछ नहीं तो योगासन प्राणायाम भी कर ले यदि ऐसा है की जब ध्यान करने की इच्छा नहीं है या तो फिर भगवान को प्रार्थना करना वो उनको अच्छा नहीं लगता है तो एटलिस्ट लहसुन और प्राणायाम भी कर ले जो की हमारे आज की गवर्नमेंट जो है यह आजकल सब जगह पे वो योग प्राणायाम के वो गुणगान गए जा रहे हैं आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है तो मतलब आपकी एकाग्रता के लिए बहुत अच्छा है पढ़ाई लिखी करने के लिए बहुत अच्छा है तो वो योग आसन प्राणायाम भी कर ले नियमित रूप से इतने भी कितने लोगों का जीवन परिवर्तित हुआ होगा वो देखने लायक है हम लोग इस तरह का स्टडी नहीं करते हैं की एक बार हमारे संपर्क में जो आते हैं उन लोगों का फ्यूचर ट्रांजैक्ट्री क्या होता है किंतु इस तरह का स्टडी करना चाहिए वो बड़ा ही इंटरेस्टिंग रिजल्ट हमको देखने को मिलेगा की हां मां लीजिए की राजकोट आश्रम में आखिरी 10 साल में एक साल में मां लीजिए एक साल में स्टूडेंट आश्रम की मुलाकात ली आश्रम के कार्यक्रमों में पार्टी से पेशेंट किया और आश्रम की विभिन्न एक्टिविटीज में वो लोग उपस्थित रहे अंग्रेज देवोटी और असो वॉलिंटियर तो फिर 1000 लड़के लड़कियां उनका 10 साल के बाद में उनके जीवन में क्या परिवर्तन आता है 20 साल के बाद में क्या तहत 30 साल के बाद में क्या आता है उनकी जब वो रिटायर हो जाते हैं तो रिटायरमेंट के बाद में किस तरह से वो लोग लाइव लीड करते हैं इस तरह का स्टडी होना मतलब बड़ा ही इंटरेस्टिंग होगा फॉर्मल ही नहीं तो इनफॉर्मल ही एक दूसरे को पूछ करके पूछे की आप लोगों ने इस तरह से होने से क्या होता है अच्छा मैं अपना खुद का इंटरेस्टिंग उदाहरण बताता हूं की यहां के जो बड़े महाराजा निखिलेश्वरानंद जी महाराज तो मैं खुद एक ऐसे लड़के लोगों का एक ग्रुप था हमारे सिटी में उनके साथ में मैं था एसोसिएटेड तो उन लोगों ने एक बार यहां पे पास्ता एक सिटी है जूनागढ़ आई थिंक जूनागढ़ जूनागढ़ में एक बार इस तरह से युद्ध कैंप किया था तो मेरी उम्र कितनी होगी शायद आई थिंक 20 प्लस होगी उसे समय तो हमने कैंप किया और ठीक किया की किसी अच्छे स्पीकर को बुलाया जाए तो ये बोला की ये जो निखिलेश्वरानंद जी महाराज हैं उसे समय वो वडोदरा थे वडोदरा के इन कर थे ना वो उसे समय पोरबंदर में थे तो पोरबंदर सिटी ये जूनागढ़ सिटी से पास में ही है स्वामी जी जूनागढ़ गए थे जूनागढ़ में पहाड़ है गिरनार माउंट है माउंट गिरना और उसके ऊपर में स्वामी जी ने साधना भी की थी तो वो बड़ा अच्छा सिटी है बड़ा ही सुंदर धार्मिक स्थान है वहां गिरनार पर्वत जो है उसकी परिक्रमा हर साल एक बार होती है बहुत सारे श्रद्धालु भाभी आ जन्म वी पत्तल लोग जाते हैं बड़ी सुंदर जगह है तो हमारा कैंप था वहां पर लड़के लोगों का तो बोला की अभी किसी अच्छे स्पीकर को चार-पांच स्पीकर थे उसमें से एक बोला की पोरबंदर में ही पास में ही निखिलेश्वरानंद जी महाराज है तो उनको बुलाया जाए और उनका भी एक स्पीच रखा जाए तो वो बुलाया उनको फिर उनका भी एक स्पीच रखा गया और जो थॉट्स ऑफ पावर जो है ना वो छोटी सी किताब उनको सबको डिस्ट लड़की थी तो देखिए की एटलिस्ट मेरा तो एक उदाहरण है की इस तरह से किसी एक साधु के संपर्क में आया इस तरह से उनका प्रवचन सुना और जिनका लाइफ परिवर्तित हुआ तो ऐसे कितने लोग होंगे ऐसा स्टडी होना चाहिए हालांकि मैं अगर ऐसा नहीं का रहा हूं की मैंने कोई बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त कर दी है अभी जो करना चाहिए मुझे उससे मैं 10% मुश्किल से कर रहा हूं और ये बात है की मैं जिसने घर भी त्याग कर दिया है ठाकुरमार स्वामी जी के ऊपर में संपूर्ण श्रद्धा है फिर भी आज मेरे मां में विश्वास नहीं है किंतु मेरे मां में थोड़ा सा तमस है तमस इस तरह का की अभी मेरी 20 साल साधु होने के रहने के बाद में दिन में 5 से 6 घंटा जब ध्यान तो करना ही चाहिए वरना तो साधु बने ही क्यों साधु होने का क्या फायदा है किंतु मेरा ऐसा है की सब समय या तो मैं पब्लिकेशन के कम में डूबा रहूंगा और रूम में जाऊंगा तो मैं पढ़ना ही रहूंगा यह पांच छे घंटा ध्यान जो करना चाहिए थियोरेटिकल में एक्सेप्ट करता हूं प्रैक्टिकल में नहीं कर पता तो पहले तो ऐसे कुछ लोग होते पहले सीधे-सीधे नास्तिक होते हैं भगवान है ऐसा विश्वास ही नहीं आता तो ऐसे लोग की संख्या भी बहुत कम हो गई है आजकल इस ज्यादातर लोग ऐसे होंगे अच्छा ठीक है भगवान है तो उसमें क्या है किंतु भीतर में एक संदेह हमेशा राहत है की सही में है क्योंकि मैं एक चारों और जो अराजकता ये ये गरीबी है ये बहाली है क्या-क्या स्टोरी हम न्यूज़पेपर में पढ़ने हैं लोगों के साथ में कितनी बुरी बुरी घटनाएं होती है तब हमको लगता है की किसी छोटी बच्ची के साथ में अत्याचार हुआ ना की क्या-क्या सब हम लोग पढ़ने हैं न्यूज़ पेपर में तब वो संदेह प्रकट हो जाता है की भगवान होते तो ऐसे छोटे बच्चों के साथ में इस तरह का अत्याचार कैसे करने देते तो वह एक संदेश भगवान पर विश्वास ही नहीं है उससे भगवान पर विश्वास है किंतु संदेह है की भगवान है चलो मां लिया किंतु छोटे बच्चों के साथ में इस तरह से जो अत्याचार हो रहे हैं वह किस तरह से वह सहन कर पाते हैं वह एक संदेह राहत है इससे भी यह ऊपर जड़ी थोड़ा सा हायर कैटिगरी चाहिए जैसे की मेरे जैसे लोग की भगवान है वो विश्वास हो गया संदेह भी चला गया किंतु भीतर में से एक लेजी ने से एक तमस है की हां जैसे जैसे दिन बढ़ते जाते हैं जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़नी जाति है जैसे जैसे मेरा राम कृष्णा विवेकानंद मां शारदा के साथ में संगठन पुराना होता जाता है इतना ही मेरा साधन भजन जब ध्यान की संख्या बढ़नी चाहिए समय बढ़ाना चाहिए ऐसा नहीं करके मुझे तो ऐसा कभी-कभी लगता है की मैं जब ब्रह्मचारी था तो आज से अपेक्षा ज्यादा मैं सीरियसली ओम जब ध्यान करता था सीरियसली में समय देता था सुबह शाम बैठ करके आज ऐसा होता है की शाम को रूम में गया और सोचा की चलो आज मतलब संध्या आरती के बाद में तो और कुछ नहीं करना चाहिए ठाकुर ने कहा की सब कम छोड़ करके भगवान का नाम लेना चाहिए उसकी बजे में किसी किताब ले करके पहले से ही प्लेन करके गया हूं की आज इस किताब को पढ़ेंगे और पढ़ना शुरू कर दिया मां में यह ऐसा एक मतलब एक गिल्ट फीलिंग भी नहीं आता क्या अरे ये क्या कर रहे हो संध्या के समय जब क्यों नहीं कर रहे हो तो मैंने इस हद तक अभी धीरे-धीरे करके होने लगा है की मतलब बैठना ठाकुर का नाम लेना इतना भीतर से ही इतना एक लजीनेस जैसा दिखाई दे रहा है की वो करने की इच्छा नहीं होती तो यह जो असद था जो यहां पे कहते हैं की परलोक के बाद में अशुद्ध होने से मैन क्या होता है की इतने ग्रेडेशन है ऐसा नहीं है की मैंने भगवान नहीं है ऐसा नहीं मानता मैं तो मानता हूं भगवान है मैं तो मुझे तो बिल्कुल भी संदेह नहीं है मैं 100% कनविक्शन है की ठाकुर का आशीर्वाद मिलने से ही मेरा जीवन पवित्र हो जाएगा सब कुछ है किंतु आखिर जो वो बड़ा है वो है लजीनेस वो है तमस जब तक तमस रहेगा तब हम सही साधना नहीं कर पाएंगे और यही जो भीतर का जो अंतर है मोस्ट डेंजरस हमको लगता है की हमने बाहर का युद्ध भी जीत लिया अभी आज के जमाने में ना ही रावण है ना ही ये आपका दुशासन है ना ही वो आपका ये है शुभ भविष्य है ना ही वो मेघनाथ है ना ही इंद्रजीत है आजकल तो हम लोग कहां हम लोग चंद पर बेचा करके देख लिए चंद के साउथ पाल भी जाकर के देख लिए वहां पे भी ऐसा कोई रक्षा नहीं है हमारा हिट संग्रह यानी वहां पे बैठा हुआ है तो पूरे ब्रह्मांड में हम लोग जहां पर भी दूरबीन से देखते हैं हमको कोई दानव या रक्षा नहीं दिखता है वे आर सेफ एक्सटर्नल्ली और आज यदि रक्षा ए जाएंगे तो अपने पास में एटम बम है एटम बम फेंकेंगे रक्षा भाग जाएंगे तो बाहर में हम लोग सिर्फ भीतर में भी हम लोग सिर्फ ठाकुर के पास ए गए हैं ठाकुर के किताबें पढ़ने हैं ठाकुर के बड़े में बात करते हैं ठाकुर की बातें सुनते हैं तो सेफ फ्रॉम आउटसाइड इस विलेज इनसाइड हमको कोई डरने की जरूर नहीं किंतु डरने की जरूर है एक आखिरी बैरियर जो हम सबके जीवन में है वो है ये लजीनेस स्पिरिचुअल लजीनेस जिसको की हम तमस कहते हैं की समय करके बैठना समय करके समय समय करके साधना के लिए टाइम साधना करना यह नहीं हो पता है डेट इस दी लास्ट बैरियर डेट वे हैव तू क्रॉस और वंस वे क्रॉस थिस बैरियर फिर तो ठाकुर रूपी सूरज अभी हमारा जो जैसे की नेक्स्ट टारगेट है वह आदित्य उन्होंने वो एक आदित्य बोलकर के और रॉकेट हम लोग छोड़ने वाले हैं और सूरज का स्टडी करेगा तो इस तरह से चंद्र के बाद में ही है सीधा सूर्य मिशन सूरज के पास हमको जाना है इसरो को तो वैसे ही यह हम लोग माया का आखिरी पर्दा कैट लेंगे अभी तक चंद तक पहुंचे हैं सीधा सूरज तक पहुंच जाएंगे किंतु वह अखी पर्दा जो है माया का तमस वह काटना कितना कठिन है वह हम लोग अपने जीवन में देखते हैं मैं अपने खुद के जीवन में देखकर के इसको महसूस करता हूं और आश्चर्यचकित होता हूं की इतना मैं सोने के बाद में भी इतना करने के बाद में भी ये आखिरी बैरियर अभी तक क्यों नहीं जाता तो था इस वही ये महाराज जी कहते हैं की आज के जमाने का और असुर युद्ध एनीथिंग था गान आउटसाइड इन डी आगे ऑफ पुराण आधुनिक आई मानो राज्य संग्राम पौराणिक देव दानवीर युद्धों पर खाओ घोर्टार आधुनिक यह मानो राज्य का संग्राम मानव राज्य का संग्राम अंतर राज्य का संग्राम पौराणिक देवदनाओं के युद्ध की अपेक्षा गोटन रहे बड़ा ही डेंजरस है अतीत संघर्ष साधारण तो फूल जगत गोंडी अतिक्रमण कारी तो ना पुराण युग का जो संघर्ष है वो सामान्य रूप से वाक्य जगत में ही राहत था भारतीय जगत में से अंतर जगत में कभी भी प्रवेश नहीं करता था वह वह यह भी था विभीषण उसको भी पता था की उसका भाई रावण है और रावण का भाई है किंतु फिर भी उसके हृदय में कनविक्शन था की राम है भगवान राम वही सत्य है और रावण जो कर रहा है वह गलत है यह जो कुंभकरण कुंभकरण जब नींद से उठा तब उसने रावण को दांत की अरे पागल तुमको पता नहीं है तुमने कितना बड़ा घोर्टार अपराध कर दिया मां सीता का अपहरण किया मुझे यदि मैं यदि जगत होता तो इस समय में तुमको रॉक लेट यानी ये रक्षा भी है किंतु भीतर में से कन्वैक्शन है की सही कौन है आज सात कौन है असत कौन है सही कौन है गलत कौन है देव कौन है असुर कौन है असुर के मां में भी यह संदेश नहीं होता था ऋषि मुनियों के मां की तो बात ही छोड़ दीजिए और आज है की हम लोग कहते हैं की हम भगवान राम के मां सीता के संतान है फिर भी भगवान राम को प्राप्त करने के लिए एकादशी का जो उपवास करने की बात आएगी मेरे से कभी नहीं हुआ हमें बेलूर मठ में जॉइन किया था तो वहां पर हमको कंपलसरी उपवास करना पड़ता था पुरी लाइफ में एक बार कंपलसरी उपवास किया है बेलूर मठ में हमारा है वह ट्रेनिंग सेंटर था वहां पर तो वहां पर एवरी एकादशी को उपवास तक क्या अर्थ है की आपको अन्य ग्रहण नहीं करना था बात नहीं करना है तो उसे दिन उपवास के दिन फिर क्या होता था वो हवा बंता था रोटी आई थी और फिर उसे दिन क्या है की बेलूर मठ के सभी साधुओं के मां में बड़ा ही दया का वह अपने वह प्रकट हो जाति थी उनके मां में अरे बेचारे बच्चे बेचारे कुछ नहीं का का रहे हैं हम लोग आज भारत का रहे हैं और वह बेचारे वो हवा पुरी का रहे हैं हवा रोटी का रहा है चलो उनको जाकर के कुछ डर आते हैं बोलकर के हमारे मैनेजर महाराज बेलूर मठ के वो दया से इतने ही वो गदगद हो जाते थे इतना सर खाने को भेज देते थे पीसी ने हमारे बच्चों के लिए की एकादशी के दिन हमको केयर करना पड़ता था संभल के रहना पड़ता था की आज कुछ ज्यादा ना का ले प्रतिदिन तो क्या है वो सामान्य खाना जो होता है तो उसमें तो जितना खाना चाहते इतना मतलब जितना भूख लगता है उतना खाता है तो एकादशी के दिन उपवास है बोल करके हम ब्रह्मचारियों का कंपलसरी साधु लोग इतना सब कुछ अच्छी-अच्छी चीज वह बिस्कुट है ना की फल है ना की मिठाई है ना ड्राई फ्रूट है इतना सब कुछ भेज देते थे की वह हम लोगों को उसे दिन संभल के रहना पड़ता था अलर्ट रहना पड़ता था की ज्यादा का लेंगे सिर्फ पेट बिगड़ेगा तो एकादशी के दिन थोड़ा सा अलर्ट रहो की ज्यादा ना खाली बहुत अच्छी-अच्छी चीज आने वाली है मैन हम लोग मां सीता भगवान राम के संतान होने के बावजूद एक एकादशी का उपस्थित से नहीं कर पाते हैं किंतु उसे समय राम के साथ में ही जितने भी रक्षा भी थे राम के साथ में युद्ध करने वाले भगवान राम के साथ में उन लोगों के मां में भी ये बड़ा क्लियर था की सही कौन है और गलत कौन है वे लोग गलत थे भगवान राम सही है उतना भीतर से कनविक्शन उसे समय में भी था जो की आज हमको नहीं है कनविक्शन है शायद किंतु वह तमस का एक ऐसा पर्दा खड़ा है की मैं चाहता तो मैं सोच सकता था की अरे एकादशी के दिन तो चलो थोड़ा सा थोड़ा हल्का खाना खाता हैं या तो फिर उपवास करते हैं किंतु नहीं जैसे बाकी सबके साथ में मैं भी वो पूरा जब वो मैनेजर महाराजा भेज दे देते पूरा एक बड़ा सा बास्केट भर कर के यह मिठाई है यह बिस्कुट है यह है वह है तो हम लोग सब ब्रह्मचारी हमारा होता था सबको बुलट था अरे चलो चलो मैंने चलो महाराज ने बड़ा अच्छा अच्छा चीज भेजो है तो हम लोग सब जोड़ करके जाते थे तो मैं सोच सकता था की चलो एक दिन तो उपवास करें किंतु मैन शायद हो सकता है की विभीषण ने किया होगा उपवास किंतु हम लोग नहीं करते तो ये है भीतर का संदेह या तो फिर तमाम अतिथि संघर्ष सामान्यतः साधारण ओला जगतराम कारी तो ना भीतर का अतीत का संग्रह बाहर के जगत में भी राहत है बाहर के जगत में ही राहत था किंतु आधुनिक द्वंद अंतर जगत उठो दीनानदीन जीवन में प्रसारितो हो या मानव बर मनुष्य उठा रगड़ कुरते उद्योगाचे किंतु आधुनिक ध्वंत्र जो है वो हमारे अंतर जगत में प्रवेश करके हमारे दाहिना दिन जीवन में प्रतिदिन का जो यह सामान्य जीवन है उसमें प्रवेश करके उसमें फेल जाकर के हमारा जो मनुष्यता है उसकी जड़ पे आघात करने के लिए उद्देश्य यानी की तैयार हो गया है हमारा प्रतिदिन का जो जीवन है उसमें यह जो एक लेशंस एक तरह का प्रकट हो गया है जैसे बहुत सारे लोग ऐसा कहते हैं की हम लोग दुकान में जिनका दुकान होता है दुकान में जाकर के सबसे पहले हम लोग एक अगरबत्ती जलाएंगे तो अगरबत्ती जलन के लिए शायद उनके पास में आधा मिनट लगेगा 30 या तो फिर एक मिनट लगेगा और अगरबत्ती जलाएंगे फिर भगवान को ऐसा गोल घुमा करके दिखाएंगे फिर अगल बत्ती रख देंगे वहां पे सामने कैसा एक मिनट ज्यादा से ज्यादा लगेगा फिर यदि आप उनको ये कहेंगे की आपने अगरबत्ती जलन के लिए नियम किया है तो साथ में आपने 108 जाप कर लेते हैं नोट नेसेसरी की यहां से दीक्षा ले अपने वो भगवान राम का जय श्री राम जय श्री राम या तो फिर वो हर हर बम बम यह भगवान शिवा का जाप कर ले गायत्री मंत्र है वो महामृत्युंजय मंत्र है थोड़ा सा हनुमान चालीसा है वो पाठ करने में कितना टाइम लगेगा 5 मिनट ज्यादा से ज्यादा 108 या 108 जाप करण करूंगा अगरबत्ती घुमा ले और थोड़ा सा पाठ कर लेने तो उसके लिए समय नहीं है वो क्या है की हमारे कस्टमर स्टार्ट हो जाते हैं आना तो ये मैंने प्रतिदिन के जीवन में यह तमस जो प्रवेश कर गया है शुत्रण वर्तमान में शक्ति क्रिया एवं अश्वसंहार प्रधान तो मानसिक क्षेत्र होगा आवश्यक परिणाम परिणाम टी उसका अर्थ है की आज के युग में यह शक्ति का प्रादुर्भाव और असुर संघर्ष प्रधनत्व मानसिक क्षेत्र में होना आवश्यक है हमारे मां में प्रवेश करके हमारे ये जो असुर है पहले तो विश्वास है उसके बाद में संदेह है और आखिर में तमाशा तीन लेवल पे ये विश्वास और श्रद्धा यह धर्म फैला हुआ है ये तीनों लेवल पे जो धर्म है इनका नस करने के लिए मां को हमारे हृदय मंदिर में प्रवेश करना होगा तब कहानी जाकर के यह भीतर के रक्सन का सहर होगा आधुनिक जगत सर्वाधिक प्रयोजन नैतिक उन्नति एवं आध्यात्मिक अनुभूति आधुनिक जगत में सबसे बड़ा प्रयोजन सबसे बड़ी आवश्यकता है नैतिक उन्नति की और आध्यात्मिक यदि हमको कोई आध्यात्मिक अनुभूति नहीं होगी तब तक हमको यह कनविक्शन और यह एटलिस्ट देखो यह लेजी ने शायद इतना इजीली नहीं जाएगा किंतु संदेह जो है संदेह कोई अनुभूति से जा सकता है आज मैंने देखा है एक जनरल ऑब्जरवेशन है रामकृष्ण मिशन के ज्यादातर साधु और जो सिंसियर देवोटी है वो प्रतिदिन या तो नियमित रूप से मंदिर में आते हैं या कथामृत का पाठ करते हैं उनको कुछ ना कुछ अनुभूति हुई होती है और अनुभूति ही आखिर में उनको यहां तक पकड़ करके ले आई है और पकड़ करके रखती है मैं खुद यहां पर जॉइन करने के लिए आया था और फिर बीच में चला गया था मैंने सोचा था मैं गांव में कम करूंगा मुझे इस तरह से यह पूछा पाठ वगैरा मुझे नहीं करना तो हमारे बिल्कुल मठ में उसे समय के जो बड़े महाराष्ट्र उन्होंने कहा की रांची में अपना आश्रम है वहां पे गांव का कम होता है तुम वहां पर चले जो इसे ब्रह्मचारी के रूप में ही रहना किंतु भले तुम जॉइन मत करो ब्रह्मचारी के रूप में ही रहना और गांव का कम करना तो मैं छोड़कर के बेलूर मठ चला गया रांची में रहा ऐसे ब्रह्मचारी और गांव का कम किया बहुत कम किया फिर आखिर में वो कम करते-करते सेवा करते करते जो मनुष्य शुद्ध होता है तो इस तरह से धीरे-धीरे करके मैंने साइड बाय साइड अपनी किताबें भी पढ़ना शुरू रखा था की ठाकुर मां स्वामी जी क्या का रहे हैं पहले बार में इतना सीरियसली पढ़ा जॉइन करने से पहले मेरे मां में ऐसा था की स्वामी जी कहते हैं की आसमान जगत हटा है चाहे तो मुझे ऐसा लगता था की मुझे जगत का कल्याण करना है इसलिए मैं साधु बनेगा मैं मुझे खुद के एटमून्नति करना है वो मेरे मां में था ही नहीं जगत का कल्याण सबसे पहले और जगत का कल्याण करते करते जो कुछ होना है ऑटोमेटिक हो जाएगा मैं यदि अपने लिए मैं सोचूंगा की हां मुझे ठाकुर का दर्शन करना है तो यह तो बहुत बड़ा सेलफिशनेस का कम हो जाएगा बड़ा ही वो तो स्वार्थ वृत्ति हो जाएगी मेरी मेरे लिए जगत का कल्याण करते हैं वो मेहमान में बहुत ही स्ट्रांग था की गांव में जाएंगे बच्चों के लिए कुछ कम करेंगे गरीब बच्चों को सिखाएंगे ऐसा बड़ा ही स्ट्रांग डिजायर था बचपन से ही मेरे मां में जब मैं अब छोटा था मैं जब स्कूल जाता था तो रास्ते के पास में ही एक बड़ा ही मदान था तो मैदान में मैं देखा था जो माइग्रेंट लेबर्स होते हैं जो गांव से गर्मी के सीजन में गर्मी में विंटर में या तो फिर मानसून सीजन में बारिश होता है तो खेत में कम राहत है गांव में किंतु बारिश खत्म हो जाता है एक बार समर सीजन स्टार्ट हो जाएगा खेत में इतना कम नहीं राहत तो यह लोग सब गांव शहर में ए जाते हैं और यह कंस्ट्रक्शन साइट है वहां पर कम करते हैं जिसको की हम माइग्रेंट लेबर कहते हैं तो यह माइग्रेंट लेबर जो है वह बड़े मैदान में रहते थे ना ही झोपड़ी है ना ही कुछ उनके बच्चे है जैसे ही वह भूखे प्यास नंगे ऐसे वह बड़े मैदान में खेलने रहते थे कभी रोटी थे तो उनको शांत करने के लिए भी कोई नहीं तो मैंने उनको शिखा करके मैंने शुरुवात किया था मैंने सोचा था मैं उनके लिए कुछ उनको मिला करके मैं कुछ उनको सिखाऊंगा तो इस तरह से मैंने शुरुआत की थी मैं जब स्कूल में पढ़ना था तब बड़ा हुआ तो सोचा की मैं गांव में जाऊंगा गांव में बच्चों को सिखाऊंगा डेट बिल बी डी ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन ऑफ मीन तू डी सोसाइटी को कुछ कंट्रीब्यूट करना है तो इस तरह से मैं आया था बेलूर मठ में ए गया पता नहीं किस तरह से ठाकुर कान पड़कर के ले आए किंतु डॉलर मठ में जाके देखा की नहीं इस तरह से तो मुझे नहीं रहना साधु साधु लोग के आए गए दिन भर आश्रम में बैठे रहते हैं थोड़ा बहुत कम करते होंगे जी तरह से मुझे उसे समय का अंडरस्टैंडिंग था इसकी बजाई में गांव में जाऊंगा और गांव में कम करूंगा तो वहां के बड़े महाराज ने रांची भेज दिया रांची में बहुत अच्छा और डेवलपमेंट क हो रहा था ट्राईबल लोगों के बीच में तो मैं वहां पर चला गया तो वहां पर जाकर के बहुत कम किया किंतु फिर आखिर में ठाकुरमार स्वामी जी को भी पढ़ना था तो एक दिन कहानी जाकर के वह बुद्धि ए गई अकाल ए गई की नहीं आध्यात्मिकता भी साथ में चाहिए यदि दोनों और साथ में नहीं है तो हम लोग 100% निष्काम हो करके कर्म सेवन नहीं कर सकते तो एक वो जो मुझे कनविक्शन एक दिन सुद्दनली हो गया था वो था डेट वज मी आ मतलब इस तरह का अनुभूति यह हुआ तब मैं वापस आया इस तरह का जो मुझे एक कन्वैक्शन नहीं हुआ होता एक अनुभूति नहीं हुई होती तो मैं वापस आता ही नहीं वापस आने के बाद में भी मेरे मां में कितने भी अशांति थी और एक के बाद एक कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी हुई की फिर आखिर में मैं कन्वेंस हो गया की नहीं रहना है तो यही पे रहना है जीवन देना है तो ये ये जीवन परिचय आपूर्ति दे देना है बाद में फिर ठाकुर जो करें सो करें नेक्स्ट लाइफ में जो हमको अपने से जो करना है करेंगे मेरा जो ड्रीम है गांव में जाकर के बच्चों को सीखना इस लाइफ में नहीं होगा तो अगली लाइफ में करेंगे इस ये जीवन ठाकुर को दे देते हैं तो देखिए की इस तरह से कुछ ना कुछ अनुभूति होने से हम लोग यहां पर ए सकते हैं और यहां पर टिक सकते हैं तो अनुभूति नहीं होने से सिर्फ बातें सुनने से या सिर्फ किताब पढ़ने से ये होता नहीं है इसलिए यहां पर महाराज जी लिखने हैं एक जगह से सर्वाधिक प्रयोजन इस जगत में इस युग में सबसे ज्यादा जरूरी है नैतिक उन्नति यानी की हमारी नैतिकता जिसको किम सत्य अहिंसा असते परिग्रह वगैरा जो कहते हैं मैत्री करुणा मुदिता अपेक्षा सदगुण जो है दूसरों के प्रति संभव दूसरों के प्रति मैत्री भाव वह नैतिक उन्नति और साथ-साथ में ही आध्यात्मिक अनुभूति तो अजय हिट कल फिर से मिलते हैं