मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध चिर सिमंतिनी चीर सधवा इस चैप्टर का हमने प्रारंभ किया है। ऑलरेडी हमने देखा कि मां तारकेश्वर गई थी हत्या देने के लिए। यदि ठाकुर का देह त्याग होगा तो साथ में मां भी देह त्याग कर देगी। और यदि ईश्वर से यह आशीर्वाद मिला भगवान शिव से कि हां ठाकुर की लीला अभी और कुछ दिन चलेगी तो फिर मां भी अपना व्रत जो है संकल्प है उसकी परिसमाप्ति परिपूर्णता करके वापस लौट आएगी। किंतु हमने देखा कि किस तरह से एकाएक मां के हृदय में वैराग्य का उदय हुआ और उनके मन में आया इस संसार में कौन किसका है तो यह जो वैराग्य सूचक वैराग्य की महा अग्नि मां के हृदय में प्रकट हुई और सांसारिक जितने भी संबंध थे सब जैसे कि उस होमा अग्नि में सब भस्मीभूत हो गए। ऑफ कोर्स शिव और शक्ति का संबंध तो कोई सांसारिक संबंध है नहीं। यह तो कहां उर्ध्व मनुष्य की बुद्धि से परे इनका संबंध है इनका संगम है रिलेशन है किंतु फिर भी जहां तक यह प्रकट लीला का प्रश्न है जहां तक यह लौकिक जगत का प्रश्न है उनके यह जो संबंध और उनका यह जो रिलेशन था वह जैसे कि वहीं पर समाप्त हुआ। मां वापस आई और ठाकुर ने मां को पूछा भी। माने थोड़ा सा रहस्य करतेकरते थोड़ा सा विनोद करते-करते कीगो किु होलो किु ही नाम क्या कुछ हुआ कुछ नहीं हुआ अर्थात कि ठाकुर ने स्वयं जब देह त्याग करने का संकल्प ले लिया हो तो वहां पर भगवान शिव भी ठाकुर के संकल्प को चत नहीं कर सकते हैं। तो यह एक घटना हमने ऑलरेडी देख ली और साथ में देखा
महासमाधि की आहट: ठाकुर ने पहले ही बताए थे ये तीन संकेत
कि अब जैसे कि समय नजदीक आता जा रहा है ठाकुर का जीवन प्रदीप बुझने का ठाकुर की लीला अवसान का तो ठाकुर ने ऑलरेडी अपने लीला अवसान के बारे में अपनी महासमाधि के बारे में कुछ कुछ संज्ञाएं देकर के रखी है। कुछ-कुछ साइन देकर के रखी है कि हां यह यह जब आपको देखने को मिलेगा तब समझ लेना कि अब यह देह पृथ्वी पर ज्यादा रहने वाला नहीं। तो तीन जो लक्षण थे ठाकुर ने जो कहे थे वह पहले से ही दक्षिणेश्वर छोड़कर के काशीपुर आने से पहले ही यह तीन लक्षण मिल चुके थे। सर्वप्रथम तो था ठाकुर कहते हैं जिसके हाथ से मैं खाऊंगा एक लक्षण है दूसरा है कि कोलकाता में रात्रि निवास करूंगा और तीसरा लक्षण है अपने खुद के आहार का अग्र भाग जब मैं और किसी को देकर खाऊंगा। यह तीन लक्षण जब देखते हैं तो समझ लेना कि अभी लीला अवसान की ओर देह जाना शुरू हो चुका है। और देखिए कि इन तीनों के पीछे में एक कॉमन थीम क्या है? एक तो है कि भारतीय सनातन संस्कृति का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट कोर कंपोनेंट है कि ईश्वर सत्य है, जगत मिथ्या है। किंतु साथ में ही यदि यह एक पहलू है आध्यात्मिकता का तो इसी आध्यात्मिकता का दूसरा पहलू यह भी है कि हां सांसारिक जो संबंध है वह मिथ्या है। मैं किसी व्यक्ति के साथ में काम का लोभ रखकर के उसके साथ में संबंध बनाता हूं तो वो संबंध मिथ्या है। मैं यदि किसी वस्तु के प्रति धन का लोभ रखकर के उस वस्तु के प्रति मेरा आकर्षण होता है तो वो वो संबंध उस वस्तु के साथ वो मिथ्या है। तो यह जितने भी सांसारिक मेरी कामना वासना से प्रकट हुए संबंध जितने हैं वह मिथ्या अवश्य है। किंतु जिसके साथ में मैं संबंध रख रहा हूं वे लोग मिथ्या नहीं है। वे लोग वही ईश्वर या तो वही ब्राह्मण की एक-एक किरण मात्र है। सच्चिदानंद समुंदर की एक-एक लहर ही है। तो फिर जैसे कि अविद्या का संसार और यहां पे विद्या का संसार। यह हमारी जर्नी है। यह सिर्फ सांसारिक संबंधों का त्याग करके वैराग्य की ओर सिर्फ हमारी जर्नी नहीं जाती। हमारी जर्नी इससे भी लंबी है। हमारी जर्नी हमारी आध्यात्मिक यात्रा हमको कहती है कि जिस तरह से अविद्या के संसार से दूर जाते हो। किंतु सिर्फ यह इनफ नहीं है। विद्या का संसार करना होगा। मैं घर छोड़ देता हूं। यदि मेरे पर वैराग्य का आवेश हुआ है तो घर त्याग करना उचित है। किंतु घर त्याग करके मैं कहां जाऊंगा? अरण्य में जाऊंगा। वन में जाऊंगा। हिमालय में किसी आश्रम में जाकर के साधना करूंगा। नर्मदा किनारे किसी कुटिया में बैठकर के वहां पर मैं तपस्या करूंगा। कीजिए। कुछ समय के लिए कीजिए। किंतु फिर अल्टीमेटली तो आपको वही संसार में वापस आना है और फिर संसार में जैसे कि सब मेरे ही हृदय के एक-एक अंश है। वही जो आत्मन या ब्राह्मण की ही एक-एक किरण इन सबके भीतर में विराजमान है। यह स्वीकार करके उनकी सेवा करना है। शिव ज्ञाने जीव सेवा और देखिए यह जो हिस्टोरियन आर्नोल्ड टोयनबी मैंने उसके बारे में पहले भी एक दो बार बात की है। उसका यह जो थीसिस है उसने एक सेमिनल स्टडी किया है और वो किताब सीरीज ऑफ बुक्स लिखी है। उसमें वह है उसका स्टडी ऑफ हिस्ट्री। इस नाम से उसकी पूरी सीरीज ऑफ बुक्स है। तो उसमें उसने यह थीसिस डेवलप की है कि कोई भी संत महापुरुष होते हैं जैसे कि वह जीसस का ही उदाहरण देता है। तो क्या है कि इनके जीवन में एक सेट पैटर्न रहती है। वो सेट पैटर्न क्या है कि रिट्रीट एंड रिटर्न। क्या रिट्रीट अर्थात कि जगत को छोड़कर के कहीं अरण्य में कहीं पर रण मरुभूमि में जैसे कि जीसस थे तो डेजर्ट में गए थे मरुभूमि में गए थे ईश्वरीय चिंतन करने के लिए किंतु एक बार इस चिंतन की परिसमाप्ति हो जाती है। एक बार इस चिंतन का एक फल प्राप्त होता है। आध्यात्मिक कुछ उपलब्धि होती है। तब यही महापुरुष रिटर्न होते हैं। पहले तो किया रिट्रीट डेजर्ट में जाकर के और फिर वहां से आए वापस यानी कि हुआ रिटर्न। यह रिटर्न हुए। फिर वही गैलीली वही यह पैलेस्टाइन में चारों ओर घूमते-घूमते उन्होंने वही जो संदेश उनको प्राप्त हुआ था मरुभूमि में वही संदेश उन्होंने सबको कह के बताया। देखिए भारत के जितने भी संत हैं यह चैतन्य महाप्रभु जैसे कि एक उदाहरण है हमारे सामने उज्जवल उदाहरण कि किस तरह से हरि नाम की लूट करतेकरते उन्होंने नगर कीर्तन वगैरह किया था। तो यहां पर श्री रामकृष्ण का जीवन भी इसी तरह से रिट्रीट एंड रिटर्न इस थ्यरी को इस पैटर्न को फॉलो करता है। रिट्रीट अर्थात कि एक समय था कि जब ठाकुर प्रथम दक्षिणेश्वर काली मंदिर में आए थे और फिर उन्होंने ईश्वर साधना को ही सर्वस्व मान करके अपना पूरा देह मन प्राण उसमें अर्पित कर दिया था। कैसे एक के बाद एक उन्होंने साधन पद्धतियों का इस्तेमाल किया और कैसे एक के बाद एक दर्शन की भरमार जैसे कि उनके जीवन में लग गई। तो ठाकुर ने यह जो उस समय बहुत अल्प लोगों के साथ में ही ठाकुर का वार्तालाप होता था। किंतु एक बार जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई ठाकुर छ महीना निर्विकल्प समाधि में थे। उस समय देह त्याग की पूरी संभावना थी। ऐसा पॉसिबल था कि रिट्रीट करने के बाद में रिट्रीट में ही फिर उनका जीवन समाप्त हो जाए। किंतु ऐसा नहीं होकर के ठाकुर के जीवन में दो-तीन घटनाएं हैं। एक तो जब जड़ समाधि ठाकुर को हुई थी। उस समय एक साधु ने आकर के जड़ समाधि होने वाली थी। किंतु जड़ समाधि नहीं होकर के बिकॉज़ कि यह हलधारी है। हलधारी ने ठाकुर को श्राप दिया था कि तुम्हारे मुंह से रक्त निकलेगा। क्यों श्राप दिया था? हलधारी जो है और किसी स्त्री के साथ में कुछ ना कुछ वो यह करता रहता था तांत्रिक साधनाएं। तो बोलकर के ठाकुर ने उसको चेतावनी दी। तो हलधारी नाराज हो गया। ठाकुर को श्राप दिया तुम्हारे मुंह से रक्त निकलेगा। तो सही में एक दिन रात को ठाकुर अपने कमरे में बैठे हुए थे। उनके मुंह से गाढ़ा डार्क रंग का घने काले कलर का रक्त जो है वो निकलना शुरू हो गया। तो ठाकुर तो ऐसे डर गए हलदारी भी आकर के रोना शुरू कर दिया उसने। उस समय एक साधु महात्मा थे वहीं पर पंचवटी में वह आए और उन्होंने ठाकुर का यह रक्त का परीक्षण करके कहा कि देखिए आपका यह जो तालु है यानी कि मुंह के ऊपर का जो यह है प्रदेश वहां से यह रक्त निकल रहा है। इसका एक ही अर्थ है। आप यह जो सब साधनाएं योग की क्रियाएं जो सब करते हैं, आपको जड़ समाधि होने वाली थी। किंतु यह कुंडलिनी यह आपकी सहस्त्रार तक यहां पर सहस्त्रार चक्र है। यदि वहां पर पहुंच जाती तो क्या होता? आपका मृत्यु निश्चित था। किंतु यह कुंडलिनी शक्ति आपके सहस्त्रार तक नहीं पहुंच के आपके मुंह के माध्यम से मुंह से रक्त के माध्यम से जो बाहर आ गई है। इसका अर्थ यही है कि आपको जड़ समाधि होगी नहीं। आपका देह जो है टिक जाएगा। और इसके पीछे में वही एक संज्ञा है कि जगदंबा को जगत जननी को आपके माध्यम से कोई महत कार्य करवाना है। इसीलिए आपके देह की उन्होंने रक्षा की। तो देखिए कि कहां वह हलधारी का श्राप भी एक तरह से आशीर्वाद में परिणत हुआ और ठाकुर को यह समझ में आ गया कि हां उनके देह की रक्षा हुई इसीलिए है क्योंकि जिस तरह से चैतन्य देव ने वो हरि नाम की लूट वो जो गलीगली में गांवगांव शहरशहर में की थी वही कार्य आज ठाकुर को फिर से करना है। तो वो एक तो साइन हमको पता है। दूसरी तो फेमस हमको कहानी पता ही है कि वही निर्विकल्प समाधि में सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति में स्थित होकर के भी ठाकुर को वो जगदंबा का आश्रय आदेश आदेश मिला था तू भाव मुखे था अर्थात कि तुम भाव मुख में रहो यह कॉन्शियस और सुपरकॉन्शियस की जो बाउंड्री है वहां पर तुम रहो तो यह जो ठाकुर को आदेश मिला बोल कर के वह निर्विकल्प समाधि से वापस आए आए थे और वह भी एक सुंदर प्रसंग है कि जब ठाकुर छ महीने तोतापुरी के जाने के बाद तोतापुरी ने तो उनको निर्विकल्प समाधि का करवा ही दिया था। वह सब उसी समय निर्विकल्प समाधि हो गई तोतापुरी की वेदांत साधना के परिणाम से तोतापुरी ने उनके पास में जो वेदांत साधना करवाई उसके परिणाम से वेदांत साधना की सर्वोच्च जो उपलब्धि है निर्विकल्प समाधि ठाकुर को हो ही गई थी। किंतु जब तोतापुरी ने वहां से विदाई ली उसके बाद में ठाकुर छ महीने तक सतत निर्विकल्प भूमि पर उन्होंने निवास किया था। अभी प्रॉब्लम यह है कि यदि आप सतत निर्विकल्प समाधि में रहेंगे तो देह की रक्षा कैसे होगी? तो पता नहीं एक रमता साधु कहां से आ गया उस समय दक्षिणेश्वर। उन्होंने ठाकुर की यह अवस्था देखी और उन्होंने ठाकुर की सेवा का भार अपने पे ले लिया। कैसे भी करके मेहनत करके ठाकुर को बीच-बीच में होश में लाते थे। जागतिक जगत में ले आने का प्रयास करते थे। और जैसे ही ठाकुर थोड़े से होश में आएंगे होश बेहोश जो होता है वह होश में आता है। ये तो सुपर कॉन्शियस लेवल पे थे। तो एनीवे अपने पास में शब्द भी तो नहीं है तो फिर यह सब सामान्य शब्द यूज करने पड़ते हैं। तो यह सुपरकॉन्शियस से जब कॉन्शियस लेवल पर वापस आएंगे तुरिय से जागृत लेवल पर जब वापस आएंगे उस समय थोड़ा सा भी ठाकुर को बाह्य जगत का एक एहसास हो उस समय यह साधु ठाकुर के मुंह में कुछ ना कुछ आहार जोर करके खिला देता था। बोलकर के छ महीना ठाकुर का देह टिका रहा। तो देखिए कि यह बार-बार ठाकुर निर्विकल्प समाधि में या जड़ समाधि में जाने के समय भी जैसे कि उनके देह की रक्षा हुई जिससे कि ठाकुर रिटर्न हो पाए। वो था रिट्रीट। तो यह है रिटर्न। रिटर्न होकर के वापस आकर के उन्होंने फिर शोडशी पूजा के माध्यम से शोडशी पूजा के बाद मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के उन्होंने कोलकाता में यह धर्म चक्र प्रवर्तन यह जो नया नया भी नहीं कहेंगे किंतु यह जो ठाकुर का यूनिक संदेश जो था कि कोऑपरेशन एंड कोऑर्डिनेशन बिटवीन एव्री ब्रांच ऑफ रिलीजन तो वह संदेश का प्रचार ठाकुर ने कोलकाता में घर-घर करना शुरू किया। तो देखिए कि बिकॉज़ कि ठाकुर ने अपनी यह रिटन समय की रिट्रीट के समय की साधना के समय की जो कठोर तपस्या और यह जो कठोर ये जो ट्रेडिशन को जो फॉलो करते थे भारतीय सनातन परंपरा को जो फॉलो करते थे वो रिटन के समय तो वह ब्रेक होने ही वाली है। उस आध्यात्मिक साधना के लिए जितने भी ब्राह्मण के संस्कार मान के चले किंतु एक बार उन्होंने यह धर्म चक्र प्रवर्तन करना शुरू किया। भक्तों को बुला करके अपना करके उनके करुणा से परवश होकर के उनको आध्यात्मिक संदेश देना आध्यात्मिक दीक्षा देना जब से शुरू किया तब से ही जैसे कि ये ऑर्थोडॉक्सी की ये जो सब ट्रेडिशनल ये जो सब बाउंड्रीज उन्होंने अपने आसपास बना के रखी थी वो बाउंड्रीज टूटना शुरू हो गई। और इसीलिए यहां पे देखिए कि ये तीनों जो साइन है तीनों साइन उसी का लक्षण है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या यह जो उन्होंने निर्विकल्प समाधि में उपलब्धि जो की थी अनुभव अनुभूति जो की थी उसी सत्य की यह जो सेकंड एस्पेक्ट जो है सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन अर्थात कि इस विश्व में जो कुछ भी देख रहे हैं सब कुछ ब्रह्मन ही ए ईशा वास्यम इदम सर्वम इस पूरे जगत को ई अर्थात कि वही दैवी शक्ति ने ही सब कुछ उसी के माध्यम से जीवित है तेन त्यक्तेन भंजिता अर्थात कि इनके साथ में ये जो मिथ्या संबंध जो है हमारे जगत के साथ में काम कांचन का संबंध राग द्वेष का संबंध वह संबंध का त्याग करके उसको को भोगना है। तेन तक्तेन भंजिता अर्थात कि जगत को त्याग नहीं करना है। जगत के प्रति यह जो अपना मिस एअलाइनमेंट है मिस रिलेशन है उसका त्याग करके मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा चित्त प्रसाद जिसको कि योग की भाषा में कहते हैं वो संबंध स्थापित करना है। तो वह रिटर्न और यह जैसे ही मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा यह जो हृदय की करुणा से ठाकुर ने भक्तों को अपनाना शुरू किया तो ये जो उनके जितने भी ऑर्थोडॉक्स रेगुलेशंस एंड रूल्स थे वह सब टूटना शुरू हुए और इसी ये रूल्स को टूटना ही यहां पे तीन लक्षण के रूप में बताया गया है कि ठाकुर जिसके हाथ से खाएंगे। यानी कि पहले तो जब साधना करते थे रिटन मोड में रिट्रीट मोड में जब वह थे उस समय ब्राह्मण के माध्यम ब्राह्मण के द्वारा पकाया हुआ अन्न ही आएंगे किंतु एक बार यह रिटन मोड में आ गए जगत में धर्म चक्र प्रवर्तन करने को जब वापस आए सभी के भीतर में वही ब्राह्मण ही है। यह वो स्पष्ट देखने लगे। तब कौन ब्राह्मण, कौन शूद्र, कौन चंडाल, कौन यह बागदी, कौन डोम यह सब जो भेदभाव थे वो धीरे-धीरे करके अदृश्य होने लगे। बोलकर के जिसके हाथ से खाते थे। अन्न सबके वहां पर नहीं खाते थे। जैसे कल भी हमने देखा अन्न सिर्फ बलराम बाबू का ही ग्रहण करते थे। क्योंकि उनकी जगन्नाथ की सेवा थी बोलकर के। किंतु बाकी यह जो कचोरी वगैरह जो है ठाकुर की बड़ी प्रिय थी। ठाकुर तो खाने के शौकीन थे। तो तो वह जो कोई भी आकर के ले आके ठाकुर को देता था ठाकुर खा लेते थे। तो जिस के हाथ से खाएंगे प्रथम लक्षण कोलकाता में रात्रि निवास करेंगे। अर्थात कि यह दक्षिणेश्वर मंदिर की पवित्र जो वातावरण है साधना का अखंड प्रवाह जहां पर ठाकुर ने बहाया है उसको छोड़कर के यह गृहस्थों के घर में रात्रिवास जब करेंगे ठाकुर तो वह दूसरा लक्षण किंतु यहां पे भी देखिए कि कोलकाता में रात्रिवास खास करके उन्होंने बलराम मंदिर में ही किया है। मुझे याद नहीं आ रहा कि बलराम मंदिर को छोड़कर के और कहीं ठाकुर रात को रहे हो तो कोलकाता में रात्रिवास करेंगे तो वह भी किंतु उन्होंने बलराम के बलराम बाबू के घर में ही किया और अपने खाने का अग्रभाग और किसी को देकर के बाद में खुद आहार करेंगे। तो यह समझ लीजिए कि सही में उन्होंने अपने ही आत्मन को दूसरों के भीतर में देखना शुरू किया है। अभी यह जो अपने खाने का अग्र भाग किसको दिया है? तो जहां तक मुझे याद है नरेंद्र को ही दिया है। दो घटनाएं हमको याद है। कल भी हमने डिस्कस की थी कि एक बार नरेंद्र ठाकुर के कमरे में आया है। बैठा है ठाकुर के दर्शन के लिए और उस समय ठाकुर ने अपना जो आहार का थाला था उसमें से नरेंद्र को खिलाना शुरू किया। तो फिर उस समय मां बड़ी ही उद्वेगित हो गई। बड़ी ही डर गई कि यह ठाकुर अपने खाने का अपने खुद के खाने से पहले अग्रभाग नरेंद्र को कैसे दे रहे हैं? मां ने कहा कि मैं आपके लिए अलग से बना देती हूं। फिर से खाना या तो नरेंद्र के लिए अलग से बना देती हूं। तो ठाकुर ने कहा नहीं मेरे ही थाले में से नरेंद्र खाएगा। तो यह एक घटना है। दूसरी घटना वो छिलिम माने वो जो पाइप जिसको आज हम कहते हैं स्मोकिंग करने का चिरूट। तो वो चिरूट वो ठाकुर स्मोक करते हैं। थोड़ा सा नरेंद्र को स्मोक करने को देते हैं। तो क्या है? आप उसको अपना मुंह लगाएंगे तो तो वो झूठा हो ही गया। फिर उसी को ठाकुर अपने से फिर से स्मोक करते हैं। तो नरेंद्र एकदम डर जाता है। कहता है कि अरे महाशय आप यह क्या कह रहे? उसको तो मैंने अपना मुंह लगाया है। आप उसी को स्मोक कर रहे हैं। तो ठाकुर कहते हैं अरे दूर यह तुम्हारे मन में कौन सा भेदभाव कि तुम अलग, मैं अलग। मेरे भीतर में जो आत्मन ब्राह्मण है वही तुम्हारे भीतर में ही तो है। तो वो ऑलरेडी दो घटनाएं ऐसी हो चुकी है कि दूसरों का झूठा अपने मुंह पर लगाना या तो फिर अपने आहार का अग्रभाग नरेंद्र को देना। तो यह तीनों लक्षण मिल जाते हैं और तीनों लक्षण के पीछे में वही सर्वम खलव इदम ब्राह्मण यह जो कांसेप्ट है ठाकुर के हृदय में इतना फिट बैठ गया है। देखिए एक इसके बाद में यही सब धीरे-धीरे करके ठाकुर को जब ठाकुर ने जब मां को कहा मां काली को प्रार्थना की कि थोड़ा बहुत मैं खा सकूं ऐसा कर दे क्योंकि गले में कैंसर हो गया है और इतना दर्द होता है कि कभी-कभी ठाकुर आहार करते हैं तो गले के घाव से वह आहार अन्न जो है वह निकल जाता था। इतना कष्ट होता था। तो ठाकुर ने मां को प्रार्थना की कि थोड़ा बहुत मैं खा सकूं ऐसी व्यवस्था कर दो। तो मां ने क्या कहा? यह जितने भी भक्त वगैरह थे ठाकुर के अंतरंग शिष्य उनको दिखा के कि इन सबके मुंह से ही तो तुम ही तो खा रहे हो। तो देखिए कि यह सबके भीतर में वही ब्रह्म भाव का दर्शन करना। सबके भीतर में वही मां काली का या तो अपने खुद के स्वरूप का दर्शन करना। वह हो गया जीवन की अंतिम उपलब्धि और वह जो अंतिम उपलब्धि को भी अब ठाकुर ने क्रॉस कर दिया है तो फिर अभी इस संसार में रहने के लिए और कोई अभी उपाय नहीं है। आवश्यकता नहीं है। यह एक चीज है। दूसरा फैक्टर यह भी है ठाकुर की महासमाधि के पीछे में कि दो लोगों को ठाकुर रेडी करके गए हैं। जो कि उनके बाद में ये रामकृष्ण संघ के सिंहासन पे गुरु के सिंहासन पे वे लोग विराजित होंगे। पहले तो मां शारदा स्वयं दूसरे स्वामी विवेकानंद। तो दो जो उनके उत्तराधिकारी है इन दोनों को ठाकुर तैयार करके ऑलरेडी रखे हैं। और तीसरे यदि कहे तो स्वामी ब्रह्मानंद क्योंकि उन्होंने 20 साल तक रामकृष्ण संघ की अध्यक्षता उन्होंने की। तो तीन कह सकते हैं स्वामी विवेकानंद, स्वामी ब्रह्मानंद और मां शारदा। ये तीनों को ठाकुर तैयार करके गए थे। फिर तो यह 16 माने राजा महाराज और स्वामी जी को माइनस करें तो यह 14 जो डायरेक्ट डिसाइपल है वह तो है ही है मास्टर महाशय बलराम बाबू वगैरह जो कि गृहस्थ जीवन में रहने के बावजूद उच्च आध्यात्मिक उन्होंने अवस्थाएं प्राप्त की है वह सब तो है ही है किंतु संघ के शीरमोर जो है संघ गुरु की जो पदवी जो अलंकृत करने वाले थे तो वो ये तीन थे स्वामी जी ऐसे ऑफिशियली या तो कहेंगे कि मतलब फॉर्मली संघ गुरु नहीं थे। किंतु स्वामी जी की लीडरशिप कितनी इंपॉर्टेंट थी वह तो हम सबको पता ही है। तो देखिए कि यह जो तीनों लक्षण मिल जाते हैं इसका अर्थ है कि सबको पता चल गया है कि ठाकुर अभी अपना देह त्याग करने वाले हैं। इसके बाद में किंतु
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि सूचक चतुर्थ लक्षण
और एक लक्षण है जो कि ठाकुर यहां पर हमको गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं। क्या कहते हैं? 1885 ख्रिस्ताब्दे रोथो यात्रा उपलक्ष बलराम भवने अबोष्ठानेर पोर अर्थात कि 1885 की रथ यात्रा के उपलक्ष में ठाकुर ने बलराम भवन में निवास किया था रहे थे इसके बाद में दक्षिणेश्वर फिरियातिनी श्री मां के चतुर्थो आर एक्ट लखन बोलिया छ बलराम भवन में रुके थे ठाकुर रथ यात्रा उत्सव के उपलक्ष में 1885 के उसके बाद में जब वह दक्षिणेश्वर वापस आए उस समय उन्होंने श्री मां को और एक चतुर्थ लक्षण कहा था क्या यह चतुर्थ लक्षण था जो देखबे अधिक लोक एक देवो ने मानबे श्रद्धा भक्ति करबे तो जानबे ए अंतर्धाने समोए होए ऐसे छ जब देखोगी कि बहुत लोग इसको ठाकुर तो अपनी ओर मैं ऐसा करके तो कहते नहीं थे। यह ऐसा करके कहते थे तो अपनी खुद की ओर इशारा करके कहते हैं इसको यानी उनको खुद को उनको देव ज्ञान है। उनको श्रद्धा भक्ति करेंगे। उनको देवता मानेंगे। देवता ज्ञान है। श्रद्धा भक्ति करेंगे। तब जानना कि इसके अंतर्धान का समय आ गया है। यह जो अपने को मैं नहीं करके यह ऐसा जो थर्ड पर्सन में जो ठाकुर पुकारते थे इसके बारे में भी ठाकुर मथुर बाबू एक बार ठाकुर को कहते हैं कि अरे बाबा आपको यह सब करने की क्या जरूरत है? ठाकुर ने और किसी को ऐसा करके करते हुए देखा था कि मैं ऐसा नहीं कह के अपने को सेकंड पर्सन में बुलाएंगे। ये म ऐसा करके अपनी ओर इशारा करके कहेंगे इसको अपने को नहीं इसको ऐसा करके थर्ड पर्सन में अपने को एड्रेस करेंगे तो ठाकुर ने और किसी को एक साधक को ऐसा करते हुए देखा था तो ठाकुर ने उसको देखा देखी उन्होंने भी ऐसा करना शुरू कर दिया कि मैं नहीं बोल के कहेंगे इसको इस देह को इस खोल एक खोल ठाकुर वो जो ब्राह्मण समाजियों के सामने कहता है ना खोल अर्थात की आवरण तो यह इस आवरण का ऐसा करके वह कहते थे जिससे कि अहंकार ना हो जाए। मैं ऐसा जितनी भी बार में मैं कहूंगा उतनी ही बार मेरा अहंकार बढ़ता रहेगा। घमंड बढ़ता रहेगा। तो यह अहंकार त्याग करने की साधना के रूप में ठाकुर यह मैं नहीं करके इसको ऐसा ऐसा कहते थे। तो मथुर बाबू कहते हैं ठाकुर को अरे बाबा मथुर बाबू तो ठाकुर को बाबा करके पुकारते थे। अरे बाबा आपको यह सब करने की क्या जरूरत है? वो तो साधक है। वे लोग तो निम्न कक्षा के हैं सामान्य साधक वे लोग अपने को मैं नहीं कह के ये वो ये इसको ऐसा करके थर्ड पर्सन में पुकारे वो उनके लिए ठीक है आप तो इस आध्यात्मिक ऊंचाई पर आप सवार है आपको यह सब करने की क्या जरूरत है तो एनीवे ठाकुर सिर्फ साधना के रूप में ऐसा नहीं करते थे सिद्धि प्राप्त हो जाने के बाद में सही सही में अपने देह के साथ में उनका संपर्क जो है वो टूट ही गया था। बस जैसे कि कॉन्शियसनेस ही रह गई है। यह मिट्टी का बना हुआ देह जैसे उसके साथ में कोई संपर्क ही नहीं है। तो देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि जब देखूंगी मां को कहते हैं चतुर्थ लक्षण के बारे में जब तुम यह देखोगी कि बहुत सारे लोग मुझे देवता के देवता मानते हैं और देवता समझ के मेरी पूजा करते हैं। तब समझना कि मेरे अंतर्धान का समय आन पड़ा है। तो से लक्षणों मिलिया गया छे बोली ले चले तो यह लक्षण भी मिल गया है। ऐसा कहने से ही चलेगा। देखिए यह लक्षण कैसे मिला है। गंभीरानंद जी एक कहानी कहते हैं। क्या कहते हैं? काशीपुर अवस्थित काले श्रीमा उहार आरो निदर्शन पायलेन काशीपुर में रहने के समय में अवस्थान करने के समय में अवस्थित काल अवस्थान करने के समय में श्री मां को उसका और भी एक निदर्शन प्राप्त हुआ और एक उसका प्रूफ मिला। यह प्रूफ क्या है कि हां बहुत सारे लोग अभी ठाकुर को देवता ज्ञाने पूजा करते हैं। कौन सा प्रूफ है यह? एक बार जोन को एक भक्तों मिष्ठान आदि लोया दक्षिणेश्वर जाइया देखी लेन एक बार कुछ भक्त मिष्ठान वगैरह लेकर के दक्षिणेश्वर में जाकर के देखा ठाकुर चिकित्सार्थे काशीपुर चलिया गया छ के ठाकुर चिकित्सा के लिए गले में कैंसर हुआ है उसकी ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर में आ गए तो तारा ठाकुर छबीर शाम ने भोग दिया प्रसाद ग्रहण को ले तब उन्होंने क्या किया ठाकुर के फोटोग्राफ के सामने ही यह मिष्ठान वगैरह जो लाए थे मिठाई वगैरह उसका भोग देकर के प्रसाद ग्रहण किया देखिए जनरली कोई जीवित व्यक्ति होता है उसका फोटो हम इस तरह से माला वगैरह नहीं पहनाते हम सबके घर में आपने ऑब्जर्व किया ही होगा जब हमारे दादा-दादी नाना नानी वह जब जीवित होते हैं तब तो वह हम उनका फोटो कहीं पर टांगते नहीं है। किंतु जैसे ही उनका देहांत होता है एक अच्छे से फ्रेम में सजा करके उनका फोटो दीवाल पर टांगते हैं और बीच-बीच में कभी हार भी पहनाते हैं। कभी-कभी अपने नाना नानी दादा-दादी का फोटो कोई-कोई अपने शाइन जो है वहां पर भी रखते हैं। वह धूप अगरबत्ती भी करते हैं। किंतु इस तरह से फोटो को हम कब रिस्पेक्ट करते हैं? जबकि वह सदैवह वर्तमान नहीं है। उस समय जब तक वह जीवित है। उनके फोटो को इस तरह से माला पहनाना या धूप अगरबत्ती करना वह अच्छा नहीं है। अपशुकन है। इसके बाद में हो सकता है कि उनका देहांत हो जाए। तो मां के मन में भी इस बात को लेकर के कि ठाकुर जीवित है और ठाकुर के फोटोग्राफ के सामने में उन्होंने इस तरह से यह मिठाई धराई मिठाई ऑफर की जैसे कि ठाकुर का देहांत हो चुका है और फिर जैसे ठाकुर के फोटो के सामने हम यह मिठाई वगैरह अर्पण ऑफर करते हैं। जैसे कि रामकृष्ण संघ के जितने भी मंदिर है जहां पर भी रामकृष्ण के भगवान रामकृष्ण के भक्त वो रहेंगे वहां वहां पर ठाकुर के फोटो की पूजा होती है। कुछ ना कुछ यदि अन्नभोग नहीं तो कुछ ना कुछ मिठाई वगैरह तो अवश्य उनको ऑफर की जाती है। तो वह तो आज की बात है। जबकि ठाकुर अभी देह में सदैव वर्तमान नहीं है। यह पंचमहाभूत के देह में अभी निवास नहीं करते। भक्तों के हृदय में रहते हैं। अभी आज की बात है। किंतु ठाकुर के रहते रहते ठाकुर के फोटो को इस तरह से मिठाई ऑफर करना यह तो जैसे कि अपशुकन ही है। इसका अर्थ तो वही हुआ ठाकुर ने जो चौथी चतुर्थ जो लक्षण बताया था कि जब बहुत सारे लोग मेरी देवता मानकर के पूजा करें तब समझना कि मेरे अंतर्धान का समय आ चुका है। तो वह जो ठाकुर ने बात बताई थी तो वह बात जैसे कि बार-बार सत्य हो रही है। ठाकुर जब पानीहाटी गए थे हमको पता है कि इस घटना का भी हमने विशद रूप से डिस्कशन किया है। डिटेल में डिस्कशन किया है। ठाकुर जब गए थे पानीहाटी 1885 में आखिरी जो उनकी पानीहाटी की वो जो यात्रा थी उस समय जब वो कीर्तन कर रहे थे। इतने लोग चारों ओर ठाकुर के आसपास एकत्रित हो गए थे। इतने लोग इकट्ठा हो गए थे कि जैसे कि उस भीड़ में से ठाकुर को बचा करके निकाल के ले आना वह भी एक बहुत बड़ी समस्या हो गई थी। तो ऑलरेडी ठाकुर की यह जो आध्यात्मिकता का प्रभाव चारों ओर फैल ही रहा है। देखिए किसी ने ठाकुर को कहा कि ये केशव बाबू ने अपने न्यूज़ पेपर में आपके बारे में लिख दिया है। तब ठाकुर चमकित होकर के बोल उठे शेकी छापिए देवा शेकी लिखे देवा माने यह क्या छाप दिया मेरे बारे में ये क्या मेरे बारे में लिख दिया ठाकुर चमकित हो गए थे तो उस समय हमको सहज रूप से लगेगा कि अरे ठाकुर तो प्रसिद्धि के खिलाफ ही है इस अर्थ में कि नेम और फेम अननेसेसरी नहीं बढ़ना चाहिए तो बोलकर के ठाकुर को शायद यह बात का थोड़ा सा यह एजिटेटेड हो गए होंगे, चमकित हो गए होंगे। किंतु देखिए कि एक बात को पढ़कर के और इसके पीछे का एक रीजन पता चलता है कि जब बहुत सारे लोग ठाकुर को देवता के रूप में पूजा करना शुरू करेंगे तब फिर उनका देह रहेगा नहीं। और यह केशव बाबू के साथ में जो घटना हुई केशव बाबू ने उनके बारे में अपने समाचार पत्रों में लिखना शुरू किया। उस समय तो ठाकुर के अंतरंग भक्तों का आगमन प्रारंभ भी नहीं हुआ था। तो देखिए कि ठाकुर सहज है कि म स्वाभाविक है कि ठाकुर चमकित हो गए होंगे। तो देखिए म कंट्राडिक्शन यही है कि यदि उनके नाम का प्रचार केशव बाबू नहीं करते केशव सेन नहीं करता तो फिर यह ठाकुर के अंतरंग भक्त जो है यह जो सब लड़के यंग लड़के नरेंद्र राखाल शशि शरद वगैरह उन लोगों को ठाकुर के बारे में हो सकता है कि इतना टाइम पर जानकारी नहीं मिलती। टाइम पे वे लोग ठाकुर के पास ना आते ऐसी भी तो एक संभावना है। तो यानी कि देखिए कि ऑलरेडी यह सिस्टम गेम हो चुका है। ऑलरेडी जैसे ही साधना समाप्त हुई, जैसे ही शोडशी पूजा समाप्त हुई ठाकुर की नेम एंड फेम केशव सेन के माध्यम से फैलना शुरू हो ही गई थी। उसके बाद में बस अभी यह टिकिंग टाइम बम टाइम बम पता है ना कि यह वो मूवीज में हम देखते हैं ना टाइम बम वो टाइम सेट करके रखते हैं। 1 मिनट ऐसा टाइम सेट करके रखा है। अभी वो काउंटडाउन चालू हो गया है। अभी वो हीरो को वहां से बच के निकलना है। वो विस्फोट हो उससे पहले तो वो जितना जोर हो सके उतना वहां से भागने का प्रयास करता है। तो यह टिकिंग टाइम बम तो जैसे ही यह केशव बाबू ने केशव सेन ने ठाकुर की प्रसिद्धि प्रारंभ की वो रिवर्स काउंट या तो काउंट डाउन स्टार्ट हो ही गया था। अभी यह पूरा इट इज़ अ रेस अगेंस्ट द टाइम। समय के खिलाफ अभी यह पूरा युद्ध ही है कि कब यह अंतरंग भक्त आना शुरू हो जाए। कितना जल्दी ठाकुर उनको शिक्षा देना शुरू कर दें और कितना जल्दी उनका मिशन जो है समाप्त हो जाए। क्योंकि अब यह काउंटडाउन समाप्त होने को ही आया है। तो यह जिस दिन से यह केशव ने ठाकुर के बारे में न्यूज़पेपर वगैरह में लिखना शुरू कर दिया था। उसी दिन से जैसे कि यह काउंटडाउन स्टार्ट हो ही गया था। उसके बाद में इट वाज़ ओनली अ रेस अगेंस्ट द टाइम कि क्या पहले होता है। ठाकुर की महासमाधि पहले हो जाएगी ना कि फिर यह भक्तों का आना और फिर उनका शिक्षण उनका ट्रेनिंग, उनका चरित्र गठन, उनका आध्यात्मिक जीवन का गठन पहले होगा। बाद में ठाकुर देह त्याग करेंगे। तो वह एकदम पूरे वो कांटे की टक्कर थी। ऑफ कोर्स ठाकुर तो लीला लीलाधीश है। लीला है उनके अधीन में तो वह काउंट डाउन को कितनी ही बार रिसेट कर सकते हैं यदि वह चाहे तो किंतु अभी जो समय है काशीपुर का नरेंद्र भी तैयार हो गया है। मां भी तैयार हो गई है। राजा महाराज भी अभी तैयार हो गए हैं। ठाकुर को जो करना था वह हो चुका है। बोल के अभी काउंट डाउन को रिसेट करने की कोई आवश्यकता नहीं। बस अभी महासमाधि सामने ही है। तो फिर यहां पर देखिए कि एक संवाद पया यह समाचार पाकर के ठाकुर तो उस समय काशीपुर में थे और पता चला दक्षिणेश्वर में कुछ भक्तों ने जाकर के फोटो के सामने यह भोग अर्पित कर दिया है। नैवेद्य अर्पित किया है। तो यह संवाद पाकर के समाचार पाकर के ठाकुर बोलिया छिले ठाकुर ने कहा था ओरा मां काली के भोग निवेदन ना करे छबी के केनो दिलेले वे लोग मां काली को भोग निवेदन ना करके छवि अर्थात कि फोटोग्राफ को क्यों दिया अभी वह अपना फोटो मेरा फोटो ऐसा नहीं कहते किंतु हमको समझ लेना है कि उन्होंने भक्तों ने मां काली को भोग निवेदन नहीं करके ठाकुर के फोटो के सामने क्यों निवेदन किया अकल्याण होइबे भाबिया श्री मां प्रभुति शकले भीत होले अकल्याण होगा सोच के श्री मां वगैरह जितने भी भक्त हैं भयभीत हो गए इहा देख्या ठाकुर बोलीन किंतु मां को जब भयभीत होती हुई जब ठाकुर ने देखा तो ठाकुर ने क्या कहा ओगो तोमरा के भेो ना अरे तुम लोग ऐसा कोई चिंता मत करना ये ओगो ठाकुर का जो स्पेशल है अरे तुम लोग ये सब चिंता मत करना एयरपोर्ट घरेघरे अमर पूजा होवे इसके बाद में घरघर मेरी पूजा होगी मायरी बोल छी बापान तो दीबी कसम से बाप की कसम से कह रहा हूं देखिए ठाकुर ये जो ग्राम्य भाषा जो थी ठाकुर की कभी-कभी असंस्कृत लगती है खास करके जब लीला प्रसंग की लैंग्वेज इसके साथ में कंपेयर करते हैं। तो किंतु देखिए कि यह जो अपने हृदय से ठाकुर बोलते हैं ना तो यह संस्कृत वाणी है। यह असंस्कृत वाणी है। ऐसी सब चिंता ठाकुर नहीं करते हैं। इसलिए कहते हैं कसम से कहता हूं बाप की कसम वहां तक वो मैं जाकर के कहता हूं। तो देखिए कि यह एक बहुत बड़ा रिवलेशन है रामकृष्ण भावधारा के प्रवाह में। देखिए कि अभी तक जो था कि हां ठाकुर साधक थे बोल करके उन्होंने साधना की। ऐसा एक जनसाधारण में था। उसके बाद में जैसे ठाकुर के पास में यह लोग जो आना शुरू हो गए तो उसमें खास करके यह जो अपना गिरीश घोष है गिरीश घोष के आने के बाद में ना मामला जैसे कि संपूर्ण रूप से पलट गया है केशव सेन ने ठाकुर का प्रचार किया वो उसको देखकर के ही म केशव सेन के ठाकुर के प्रचार उनके प्रवचन या तो न्यूज़पेपर आर्टिकल को देखकर के ही यह ज्यादातर जो ठाकुर के अंतरंग अंग थे। वे लोग ठाकुर के पास में आए थे। मास्टर महाशय स्वयं ब्राह्म समाज में आना जाना करते थे। और वैसे तो सिद्धू बोलकर के उनका यह जो कजिन है वह उनको ले आया था दक्षिणेश्वर प्रथम बार। किंतु मास्टर महाशय को ऑलरेडी ठाकुर के बारे में पता ही था। तो यह ब्राह्म समाज के साथ में जुड़े हुए लोगों का ठाकुर के पास में आगमन जुड़े हुए या तो फिर वहां पे आउट ऑफ क्यूरियोसिटी आना जाना जो लोग करते थे उन सबका ठाकुर के पास में आगमन केशव के प्रचार की वजह से हुआ किंतु वो क्या था कि एक ठाकुर संत महापुरुष है जैसे कि एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति संपन्न एक महापुरुष है वहां तक तो सब चलता था किंतु ठाकुर वही राम और कृष्ण का ही अवतार वही जैसे कि परम सनातन नारायण परम पुरुष स्वयं पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। पूरी पृथ्वी का आध्यात्मिक उद्धार करने के लिए वह तो कंप्लीटली नया लेवल है। एक कंप्लीटली नई तरह का एक पूरा ठाकुर के बारे में थिंकिंग है। अब देखिए ठाकुर ने स्वयं तो यह सब अनुभूति कर ली थी और फिर यह मास्टर महाशय वगैरह को उन्होंने पूछना शुरू कर दिया था। वो यही जो दूसरी ही या दूसरी ही मुलाकात में आई थिंक ठाकुर तीसरी मुलाकात आई थिंक तीसरी मुलाकात में ही ठाकुर मास्टर महाशय को पूछते हैं कि आमा के तोमा की बोध को कि तुम मेरे मैं तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो मेरे बारे में तुमको क्या लगता है तो फिर वो मास्टर महाशय फिर पूछते हैं तुमको क्या लगता है मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है आना अर्थात कि वो पैसा उस समय का आना ये सोल आना होता है 16 16 आने का ₹1 ऐसा कुछ होता था। तो कितना आना ज्ञान हुआ है? आज की लैंग्वेज में कहें तो कितना परसेंटेज ज्ञान हुआ है? 50% 70% 80% 90% 100% कितना ज्ञान हुआ है। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि कितना आना वगैरह तो मुझे नहीं पता किंतु मैं इतना तो समझ पा रहा हूं कि आपके जितना भक्ति, प्रेम, ज्ञान और किसी में मैंने देखा नहीं। तो फिर ठाकुर हंसने लगे। तो ऑलरेडी ठाकुर ये जो परीक्षा करते थे कि ये भक्त जो है उनके बारे में क्या मानता है क्या सोचता है उसके हिसाब से उसकी आध्यात्मिक उन्नति वो मेजर करते थे। हालांकि नरेंद्र था एक उसमें जो कि किसी भी मेजरमेंट में पड़ने वाला नहीं था। नरेंद्र का ठाकुर पे आखिरी तक वो जो एक संदेह रहा किंतु नरन की कैटेगरी अलग है। नरेंद्र जो करता था कहता था वो करके दिखाता था। तो उसका जो प्रचंड त्याग था वही तो उसका सबसे बड़ा एसेट था। किंतु यह जो गृहस्थ जितने भी भक्त हैं जो कि काम कांचन का संपूर्ण त्याग नहीं करने वाले हैं। करने की क्षमता नहीं है तो फिर उनके साल्वेशन का क्या उपाय है? उनकी मुक्ति का क्या उपाय है? तो उनकी मुक्ति का उपाय है श्री रामकृष्ण को अवतार मानकर के अवतार के रूप में स्वीकार करके उनके श्री चरणों में मन प्राण समर्पित कर देना। तो जो शरणागति जिनका रास्ता था आध्यात्मिक यात्रा का उनके ठाकुर अवश्य प्रारंभ से ही यह पूछना शुरू कर दिए थे कि मेरे बारे में तुम क्या सोचते हो बताओ तुमको क्या लगता है मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है तो यही कथामृत में यह महिमा महिमा चरण वही मोस्ट प्रोबेबबली है कि ठाकुर उसको कहते हैं कि अवतार के बारे में कुछ बताते हैं तो अवतार लीला के बारे में बताते बताते इनडायरेक्टली तो वही है कि वह अपने बारे में बता रहे हैं कि मुझे यह यह सब अनुभूति हुई है और इसका अर्थ है कि मैं अवतार हूं। ऐसा इनडायरेक्टली उसको बता रहे हैं। तो महिमा चरण क्या कहता है कि महाशय आपका भाग्य अच्छा है। इसलिए आपको यह सब अनुभूति हुई है। ठाकुर कहते हैं कि स्त्री स्पर्श सपने में भी नहीं हुआ। तो ये अवतार छोड़कर के और किसी के जीवन में संभव ही नहीं है। तो यह महिमा चरण कहता है कि महाशय आपका भाग्य अच्छा है। तो इसलिए आपको यह सब हुआ है अनुभूति। तो उस समय मास्टर महाशय कहते हैं लिखते हैं स्पष्ट रूप से कि देखिए महिमाचरण जैसे कि जानकर के भी अनजान बन रहा है। वो जानबूझकर के वह स्वीकार नहीं करना चाहता कि हां ठाकुर कोई सामान्य महापुरुष संत नहीं है। अवतार स्वयं है। तो यह ठाकुर अवतार है। यह स्वीकार करना यह जो लोग कामकांचन में पड़े हैं जिनका भक्ति मार्ग शरणागति मार्ग जिनकी मुख्य साधना है उनके जीवन में यह जो मेजरमेंट यही है कि वे लोग कहां तक पहुंचे हैं तो ठाकुर को कितना परसेंटेज ज्ञान हुआ है ठाकुर कितने पानी में है वो जब वे लोग उसका यह मेजरमेंट है वो कहेगा कि ठाकुर को 20% नॉलेज ज्ञान हुआ है अर्थात कि वो 20% ही पहुंचा है। कोई कहेगा ठाकुर सही में अवतार है। अभी यह मुंह से बोलने से तो होगा नहीं। यह जो एक कहानी है एक ब्राह्मण भक्त के घर पर ठाकुर बैठे हैं तो उनका पड़ोसी आकर के ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रहा है। प्रश्न कर रहा है। तो प्रश्न के बाद प्रश्न करता जा रहा है। अभी यह जो पड़ोसी था वह सब जज था। वो सब जज अर्थात कि उस समय की एक प्रेस्टीजियस एडमिनिस्ट्रेटिव पोजीशन तो वो ठाकुर को प्रश्न के बाद प्रश्न कर रहा है तो वो जो पड़ोसी था और ठाकुर भी बड़े आनंद से उसका उत्तर दे रहा है तो ये पड़ोसी था वो भी थोड़ा सा नाराज हो गया उसको ऐसा लगा कि यह सब जज है तो गवर्नमेंट ऑफिसर है तो अपना बढ़ाई दिखा रहा है ठाकुर को प्रश्न करके प्रश्न के बाद प्रश्न करके तो वो वो सब जज को कहता ये पड़ोसी अरे भाई तुम मान लो ना बिना मतलब क्यों प्रश्न करते हो तो साथ में ही ठाकुर नाराज हो गए समझ शेकी मैंने नेवा मने यह क्या बोल रहे हो सिर्फ म आंख बंद करके स्वीकार कर लेना यह कौन सी बात हुई तो वो बेचारा जो ऐसा बोला था वो आदमी लज्जित हो गया शर्मिंदा हो गया तो यह झूठमठ का स्वीकार करना नहीं किंतु सही सही में अपने हृदय में से जब आता है कि हां ठाकुर को 100% ज्ञान हुआ है ठाकुर अवतार है तो उसका अर्थ यह है कि अपनी आध्यात्मिक यात्रा में वह एक लेवल पर आ चुका है उससे उसके बाद में अभी यह ऑटो पायलट पर गाड़ी चलेगा ठाकुर ठाकुर को जितना गाइड करना था ठाकुर ने कर दिया। अभी उसका गाड़ी ऑटो पायलट पर चलेगा। तो यह ठाकुर को फिर वह भरोसा होगा। तो देखिए कि ठाकुर के जितने भी संतान थे भक्त संतान सबके हृदय में ये जो ठाकुर एक सिर्फ महापुरुष संत नहीं है। एक अवतार है। यह ठाकुर की बीमारी जो प्रारंभ हुई तब से ये दो डिवीजन स्टार्ट हो गए थे। किंतु ये जो पूरा मामला जो है ना उसने माने चल रहा था बैकग्राउंड में सब कुछ धीरे-धीरे करके चल रहा है। एकाएक ये गिरीश घोष कहां से आ गया और भरे बाजार में उसने यह हांडी फोड़ दी। भरे बाजार में उसने जैसे यह डिक्लेअ कर दिया और पूरे अपनी जो राक्षसी शक्ति थी उसकी यह जो भैरवसम उसकी जो बुद्धिमत्ता थी सब लेकर के वो आर्गुममेंट कर रहा है कि ना ठाकुर अवतार ही है। ठाकुर भी आश्चर्यचकित के मास्टर महाशय को कहते हैं देखो देखो इसकी भक्ति देखो इसका विश्वास देखो मास्टर महाशय भी आश्चर्यचकित कि उनको खुद को इतने दिन लगे 81 से आ रहे हैं 85 एटलीस्ट उनको 4 साल लगे हैं ठाकुर को अवतार के रूप में स्वीकार करने को यह गिरीश घोष है तीनचार मुलाकात में ही उन्होंने ठाकुर को अवतार बोल के प्रचार प्रसार भी करना शुरू कर दिया है तो यह कौन सी बात हुई तो देखिए कि गिरीश घोष के आने के बाद में ना मामला एकदम पलट जाता है। यह गिरीश का आना यह ठाकुर की महासमाधि की ओर जाने की प्रथम कड़ी है। मुझे ऐसा लग रहा है। क्योंकि ठाकुर ने ही तो कहा कि जब तुम देखोगी मां को कहते हैं जब तुम देखोगी कि बहुत सारे लोग इसको अब मुझे अवतार मान करके ईश्वर देवता मानकर के पूजा करते हैं। तब समझना कि इस देह के अंतर्ध्य का समय आ चुका है। तो मां भी मां ने भी एक बार कहा था गिरीश घोष के बारे में ऐसा ही कुछ कहा था। मां कहती है कि देखो ठाकुर को फिर बीमारी कहां वो तो शुद्ध पवित्र देह है। इतना बुरा बीमारी जो इतना कष्टदायक बीमारी ठाकुर को क्यों हुआ? तो इसलिए हुआ गिरीश के पाप ग्रहण करके। तो मां ने भी यह बात कही। एक तो दोनों ओर से है। एक तो गिरीश के पाप ग्रहण किए। वह तो एक बात है ठाकुर को इससे बीमारी हुई। दूसरा कि गिरीश ने यह जो खुलेआम बोलना शुरू कर दिया था बिना किसी लज्जा के बिना किसी शर्म के वो तो बहुत बार ऐसा होता है ना हम जिस को अपना गुरु या अपना टीचर मानते हैं छुपा करके रखते हैं लोग क्या कहेंगे ऐसा बोल के तो यहां पर गिरीश को तो ना ही लाज है ना ही शर्म है ना ही किसी की आंखों की ये फिकर है आंखों की लज्जा ऐसा कहते हैं ना चौखेर लज्जा तो नहीं आंखों की शर्म है वो वो तो एक बार जो मान लेता है पर पूरा पूरा मन प्राण देकर के उस बात को स्वीकार कर लेता है। तो फिर गिरीश ने जब ऐसा कहना शुरू कर दिया कि ठाकुर अवतार ही है तो फिर समझ लीजिए कि ठाकुर की यह देह अवसान की लीला है गिरीश के आने से जैसे कि प्रारंभ हो चुकी थी। तो यहां पर भी यह तो एक बात है। फिर दूसरा देखिए कि ठाकुर ने कितना इंपॉर्टेंट बात कही है कि इसके बाद में घर मेरी पूजा होगी। यह इतना बड़ा स्टेटमेंट और देखिए कि अभी तक इवन आज ठाकुर के लीला अवसान को ऑलमोस्ट 110 इयर्स से भी ज्यादा समय हो चुका है। 150 के आसपास अभी जा ना 150 के आसपास तो जा रहा है। तो इतना लंबा जो समय हुआ है किंतु अभी भी देखिए कि ठाकुर के भक्तों की संख्या बाकी सब संप्रदाय को देखते हैं। उसके कंपेयर में तो बड़ी अल्प ही है। कम ही दिखती है। तो देखिए कि स्वामी जी ने तो कहा है कि 1500 साल तक यह मिशन चलने वाला है। यानी कि यह जो ठाकुर की भविष्यवाणी है कि मैं बाप की कसम देकर के कहता हूं कि घरघर मेरी पूजा होगी। वो समय तो जैसे कि अभी भी नहीं आया। कंपेयर टू काशीपुर। काशीपुर में जो ठाकुर थे उसके कंपेयर में आज ठाकुर के भक्तों की संख्या बहुत बढ़ गई है। यह बात तो सच है किंतु जितना होना चाहिए वह अभी नहीं हुई। तो अभी भी हमारे सामने देखिए कि रामकृष्ण संघ का श्री रामकृष्ण के अवतारत्व का एक सुवर्ण युग आने वाला है और वो जो सुवर्ण युग प्रारंभ होगा। स्वामी जी यह बाबूराम महाराज को कहते थे कि मेरे लड़के तो अभी आए नहीं है। वह आएंगे तब देखना क्या धमाल कर खड़ी करते हैं। तो ये मेरे शिष्य तो स्वामी जी को ठीक-ठीक समझ करके स्वामी जी ठाकुर मां के संदेश को अपने हृदय में उतार करके अपना जीवन परिवर्तित करके इस संसार को मजा की कुटिया में परिवर्तित करने के लिए वो जो राम प्रसाद का गीत कि यह संसार धोकार टाटी यह संसार जो है धोखे की ये है धोखा ही धोखा है इस संसार में तो वह जो आजू गोसाई हमने वो डिस्कस किया था वो है कि उसने कहा कि यह संसार मजार कुटी आमी खाई दाई मजा लूटी तो यह संसार है मजे की कुटिया मैं खाऊंगा पऊंगा और आनंद करूंगा तो यह संसार को मजे की कुटिया में परिवर्तित करने के लिए यह जो इनके संतान गण है वह तो आने वाले हैं भविष्य में और फिर रामकृष्ण संघ रामकृष्ण भावधारा का सही सुवर्ण युग उस समय प्रारंभ होगा तो यहां यहां पर देखिए कि ठाकुर ने अपने पिताजी की कसम देकर के कहा है कि घरघर मेरी पूजा होगी। सुतान श्री माय बुझते बाकी छिलोना जे सुधु देवताई बाम न श्री ठाकुर लीला शण उन्मुख अच्छा इसके बाद में फिर दूसरा टॉपिक स्टार्ट होता है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम