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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

नीरव साधना || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 30 Jan 2025

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है नीरव साधना अभी तक हमने देखा कि अभी तक जितने भी चैप्टर का हमने पाठ किया जिसका हमने चर्चा किया इन सब में देखा कि गंभीरानंद जी महाराज मां के जीवन को मां के जीवन के सभी प्रसंगों को एक के बाद एक लेकर के हमारे सामने एक क्रोनोलॉजिकल प्रस्तुत करते हैं गंभीरानंद जी महाराज ने अभी तक यदि किसी एक चैप्टर में किसी विशेष रूप से मां के जीवन की व्याख्या की हो कि हां मां के जीवन का दार्शनिक तात्पर्य क्या है फिलोसॉफिकल सिग्निफिकेंट क्या है तो वह किया है उन्होंने अवतरण का में दैट इज द इंट्रोडक्टरी चैप्टर प्रीफेस ऑफ दिस बुक तो उस प्रीफेस में उन्होंने हमको बताया है कि जिस तरह से अवतार के अवतार का पृथ्वी पर आगमन होता है वैसे ही अवतार के साथ में ही अवतार की शक्ति का आगमन होता है जैसे ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्म शक्ति एक ब्रह्म और शक्ति अभेद तो यहां पर भी अवतार और अवतार की शक्ति दोनों एक साथ में पृथ्वी पर आगमन करते हैं जैसे कि भगवान राम और मां सीता जैसे भगवान कृष्णा और राधा रानी तो इन दोनों के अवतार और शक्ति के दोनों के आगमन से दो तरह के प्रयोजन साधित हो ते हैं अवतार के आगमन से एक व्यक्ति का जो इंडिविजुअल स्पिरिचुअल जर्नी है कि जितने भी साधक है साधक का संपर्क तो ईश्वर के साथ में ही है अवतार के साथ में ही है इष्ट देवता के साथ में ही है तो मेरे इष्ट का मेरे साथ में जो संपर्क है उस संपर्क में मैं कैसे आगे बढ़ सकता हूं वह जो एक इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी जो होती है वह अवतार के क्रिया कलाप से हमको पता चलती है और यह समाज में किस तरह से एक सामाजिक सुदृढ़ता स्थापित हो सामाजिक एक कोही जन एक कोऑपरेशन एक तरह से एक सूत्र कैसे स्थापित हो एक सृष्टि में कैसे एक सूत्र आए किस तरह से इस प्रकृति को सौम्य बनाया जाए किस तरह से इस समाज को सौम्य बनाया जाए जिसकी मदद से जिसकी वजह से साधक शांति से अपनी साधना कर पाए वरना यदि फैमिली में किसी का प्रॉब्लम चल रहा है जॉब के ऊपर में या बिजनेस में कुछ टेंशन चल रहा है या तो फिर अपना देश किसी के साथ में युद्ध कर रहा है या तो फिर जैसे यह पडेम चला था कोरोना इस तरह की उपाधियों का प्रगट प्रगट होने से हम लोग अपनी साधना ठीक से नहीं कर पाएंगे साधना में सब समय विघ्न आता रहेगा तो यदि साधना को साधना का पथ प्रशस्त करना है भक्तों के लिए तो भगवान को दो चीजें करनी होगी सर्वप्रथम तो है कि साधना के मूल मंत्र क्या है साधना के उद्देश्य क्या है उसके बेसिक कांसेप्ट क्या है साधना का साइंस क्या है मन का विकास कैसे हो ईश्वर का स्वरूप क्या है अपना मन और ईश्वर इन दोनों के बीच में तादात्म्य कैसे बने वह आध्यात्मिक विषयों की जिस तरह से उनको एक तरह से विषद रूप से छना वट करनी होती है डिटेल में हमको एक्सप्लेन करना होता है तो वैसे ही प्रकृति को भी इस तरह से सौम्य बना के रखे कि जिस वजह से कि जिसके बाद में हम लोग इस प्रकृति में रह कर के शांति से साधना कर पाए जैसे कि ये आश्रम की शांति है आप जैसे कि अ ऋषि मुनियों के आश्रम देख लीजिए आज से 10000 साल पहले के हमारे वैदिक युग के आदि के समय जो ऋषि मुनियों के आश्रम थे उसमें जिस तरह से शांति हुआ करती थी नीरवता हुआ करती थी वहां पर सबके लिए एक अपना-अपना स्थान है सबको सम्मान है सबके लिए साधना की विशेष रूप से व्यवस्था है और कोई ज्यादा टेंशन नहीं है अपना अपना काम करो और फिर साधन में रत रहो यह जो आश्रम की शांति है उसको पूरे समाज में इस तरह से फैलाया जाए कि पृथ्वी पूरा एक मठ बनके रह जाए पूरी पृथ्वी एक आश्रम बन जाए पृथ्वी एक तपोवन बन जाए और जितने भी नागरिक हैं जितने भी मनुष्य हैं हम सभी लोग साधक हो पाए यानी कि यह समाज देखिए कि कहां एक समय था कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट यह डार्विन का नियम चलता था पृथ्वी पे कि जिसके पास में ज्यादा शक्ति है ज्यादा बल है ज्यादा वीर्य है शौर्य है पराक्रम है ज्याद ज्यादा बड़ी सेना है वे लोग दूसरों के ऊपर में अत्याचार करेंगे उनका धन लूट लेंगे उनके घर जला देंगे उनको गुलाम बना देंगे और उनके ऊपर में जो चाहे वह अत्याचार करें वह एक डार्विन का नियम तो धीरे-धीरे करके हमारे समाज को पृथ्वी पर चल रहा था उसमें जैसे कि यह ब्रेक लगा एक सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट नहीं किंतु सर्वाइवल बाय कोऑपरेशन यह चेंज जो इवोल्यूशन के नियम में आया यह चेंज कौन लाया है तो वह शक्ति का परिणाम है शक्ति के आगमन से ही समाज धीरे-धीरे करके एक कराल रूपी एक समाज था इंग्लिश में इवोल्यूशनरी साइंस में कहते हैं नेचर रेड इन टूथ एंड क्लोज अर्थात कि यह प्रकृति है य शेर के जैसी है और यह शेर रूपी प्रकृति के अ वाघ रूपी प्रकृति के दांत और नाखून वह हमारे खून से रंगे हुए हैं हमारे खून से लाल रंग के रंगे हुए हैं तो इस तरह से इंग्लिश में कहते हैं नेचर रेड इन टूथ एंड क्ल तो वो एक समय था और यह एक समय है कि पृथ्वी पर कोऑपरेशन ज्यादातर देशों में देखिए कि यह सेकंड वर्ल्ड वॉर और यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद में एकदम ज्यादातर समय तो पृथ्वी पर शांति बनी रही है भारत जैसा 150 करोड़ का इतना बड़ा देश है हम अपने खुद के जीवन में देखेंगे कि कब हमको ऐसी कोई बहुत बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा है तो वह पडेम एक था और कभी-कभी सिटी में रायोस हो जाते हैं अदर वाइज देखिए कि हम सभी का जो जीवन है वह एक समान रूप से शांति से चलता है उतार चढ़ाव तो आते ही रहते हैं फैमिली लाइफ में भी आते ही रहेंगे किंतु ज्यादातर समय देखेंगे आज से अभी हम 100 200 साल पहले भी अपने पूर्वजों के साथ में हमारी कंपैरिजन करें तो उसी में देख लीजिए कि उनका जीवन कितना वायलेंट था उनका लाइफ एक्सपेक्टेंसी मुश्किल से 30-35 साल का था और एक के बाद एक युद्ध में पडेम में वह इजली मर जाता थे आज देखिए कि अपना लाइफ एक्सपेक्टेंसी भी बड़ा है और समाज में ज्यादातर तो शांति ही है एक्सेप्शनल केसेस को छोड़ कर के तो यह और फिर यह मेडिकल साइंस नेचुरल साइंस इन्होंने जो इतना प्रगति किया है हमारे जीवन में कितना आसानी ला दी है अभी यह फ्रिज का ही एक छोटा सा इन्वेंशन यह फ्रिज की बद है अपने घर में तो हम एक साथ में फल दूध वगैरह लाकर के रख सकते हैं ग्रीन रेवोल्यूशन वाइट रेवोल्यूशन यह ग्रीन रेवोल्यूशन की अ वजह से भारत में उन्नत किस्म की खेती का प्रारंभ हुआ और सभी लोगों को पर्याप्त धन भारत में ही उगना शुरू हुआ वरना तो हर साल हमको आजादी के बाद में आफ्टर इंडिपेंडेंस अमेरिका के सामने हाथ लंबा नहीं पड़ते थे प्रसारित करने पड़ते थे कि हमको भिक्षा दीजिए हमारे पास में खाने को कुछ नहीं है आज भारत में इतना ग्रेन प्रोडक्शन होता है कि वी आर द नेट एक्सपोर्टर कंट्री तो यह एक के बाद एक चाहे ग्रीन रेवोल्यूशन हो कि वाइट रेवोल्यूशन अर्थात कि दूध का प्रोडक्शन इतना बढ़ गया है कि जो वेजिटेरियन फैमिलीज होते हैं उनके लिए भी पर्याप्त मात्रा में मिल्क और मिल्क प्रोडक्ट्स इंडिया में बनता है तो यह जो पृथ्वी के ऊपर में यह लौकिक जगत में जो सहूलियत हमको प्राप्त हुई है जो ईज ऑफ लाइफ जो हमारा बना है यह शक्ति का परिणाम है कि ईश्वर की शक्ति का पृथ्वी पर धीरे-धीरे करके विकास हो रहा है यदि मुझे ठीक-ठीक रूप से एक आध्यात्मिक जीवन जीना है तो मुझे दोनों चीज करनी पड़ेगी एक तो मुझे एक डिसिप्लिन लाइफ चाहिए जिसमें त्याग हो वैराग्य हो यह यम नियम का पालन थोड़ा बहुत रूप से मैं करता रहूं यह सब भी मुझे अपने जीवन में चाहिए और साथ-साथ में ही एक्सटर्नल वर्ल्ड में थोड़ा बहुत पीस एंड प्रोस्पेरिटी चाहिए वरना फिर मैं अपने मन को बाकी सब चीजों से हटा कर के एक मात्र ईश्वर में नहीं लगा पाऊंगा तो यह दोनों चीजें चाहिए यदि मुझे आध्यात्मिक विकास करना है तो तो यह आध्यात्मिक विकास के लिए इंडिविजुअल व्यष्टि साधना के लिए अवतार के सब आदेश उसमें लिए हमको काम लगते हैं और प्रकृति या तो फिर समाज के विकास के लिए शक्ति का आगमन होता है अभी यह हमने पूरा देखा कि गंभीरानंद जी महाराज इस ऐसा ही कुछ काफी चीजें मैंने अपनी जोड़ दी है किंतु शक्ति का आगमन का क्या तात्पर्य है उसका बहुत अच्छा एक चितार गंभीरानंद जी महाराज हमको प्रीफेस में देते हैं इस किताब के इसके बाद में किंतु देखिए कि महाराज जी मां के जीवन के एक के बाद एक प्र संग लेते हैं और उसके ऊपर में थोड़ा बहुत एनालिसिस करते हैं बहुत ज्यादा नहीं करते हैं तो यह ठाकुर के कैंसर होने तक इस तरह से चला ठाकुर को कोलकात्ता ले जाया गया ट्रीटमेंट के लिए अभी किंतु यह जो चैप्टर है नीरव साधना इसमें फिर से गंभीरानंद जी महाराज उसी दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर वापस चले जाते हैं और कहते हैं कि मां ने वहां पर रहकर के किस तरह से नीरव से साधना की है मैंने बात सिर्फ यह नहीं है कि मां के जो व्यवहार लोगों के साथ में है उसमें मां की आध्यात्मिकता मां की यह जो गभीर लोगों के प्रति करुणा उनके प्रति दया उसकी जो हमको एक झलक मिलती है किंतु साथ-साथ में ही मां ने ईश्वर प्राप्ति के लिए जो साधना की है या तो फिर कहेंगे कि मां तो जगदंबा स्वयं थी उनको तो अपने को प्राप्त नहीं करना है किंतु बिकॉज के यह पंचमहाभूत का शरीर देह धारण किया है तो इस देह में तपस्या करनी पड़ती है पंचमहाभूत का देह ही है तपस्या करने के लिए बना जद यदि तपस्या नहीं करनी है तो देव योनि में ही आप आराम से रह सकते हैं पंचमहाभूत का देह धारण किया अर्थात की तपस्या करनी ही है तो मां एकदम शांति से नीरवता से तपस्या करती थी तो अभी प्रश्न यह होता है कि गंभीरानंद जी महाराज ने अभी तक एक के बाद एक जो प्रसंगों का आलोचना उनका आलेखन किया उनको जो लिपिबद्ध किया तो अभी फिर से दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर वापस जाने की जरूरत क्या पड़ गई क्या यहां से ही कैंसर के बाद के दिनों की कि हां ठाकुर का अंतिम समय पृथ्वी के ऊपर में उनका सूर्य अस्ताचल की और दैहिक जीवन का पार मार्थी जो दैहिक जीवन है उनका वह सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ चला था अदर वाइज ठाकुर तो भक्तों के हृदय में हमेशा चीर काल के लिए जीवित रहने ही वाले थे किंतु यह ठाकुर के आखिरी दिनों की चर्चा और फिर मां को किस तरह से और ज्यादा तपस्या करनी पड़ी ठाकुर के महासमाधि के बाद में उसी की चर्चा क्यों नहीं प्रारंभ कर देते हैं बीच में एक नया टॉपिक ले आने की क्या आवश्यकता पड़ी तो गंभीरानंद जी महाराज पहले तो यह प्रश्न हमारे सामने उप स्थापित करते हैं कि कोई पूछेगा कि मां जो नीरवता से साधना करती थी वह साधना नीरवता से जो की उन्होंने कौन-कौन से प्रसंग के द्वारा हमको पता चलता है यह सब अलग से डिस्कस करने की क्या जरूरत है वहां पर ही देखिए ना कितना बड़ा एक पाप मां ने अपने सर पर ले लिया था निस्वार्थ की वजह से कि ठाकुर को झूठ बोल कर के ज्यादा करके दूध पिलाती थी अभी देखिए कि इस तरह का कार्य करना वो उन्हीं के लिए संभव है जो कि आध्यात्मिकता की सर्वोच्च शिखर के ऊपर में विराजमान हो जैसे कि ठाकुर ने खुद ने उदाहरण दिया था कि भगवान कृष्ण ने एक बार बीमारी का स्वांग रच करके बीमारी का ढोंग लगा कर के उन्होंने नारद मुनि को कहा कि अभी मेरी बीमारी मेरी असु स्तता तभी ही ठीक होगी जबकि भक्तों के चरणों की रज मुझे मिलेगी तो नारद मुनि बोल रहे हैं कि सर्वश्रेष्ठ भक्त कौन है तो यह रुक्मिणी वगैरह रानियां ही होगी तो वह वहां पर जाकर के पूछते हैं कि आपके चरणों की रज दीजिए तो भगवान कृष्ण ठीक हो जाएंगे तो ये रानियां बेचारी डर गई वो बोलने लगी वो तो त्रिभुवन के स्वामी स्वयं है वो तो एक अज्ञान का एक आवरण मात्र सर के ऊपर में रख कर के लीला मात्र कर रहे हैं उनको कोई बीमारी बीमारी कुछ नहीं हुई है हम बिना मतलब अपने चरणों की रज उनको देंगे और चरम पाप में पतित होंगे हम क्या ऐसी मूर्ख है तो फिर नारद मुनि ने सोचा वृंदावन जाया जाए वहां पर यह जो भोले भले गोप गोपियां है उनको पटा करके उनके चरणों की रज ले ली जाए हथिया ली जाए तो ऐसा बोल कर के नारद मुनि वहां पर गए और जैसे ही कहा भगवान कृष्ण को रोग हुआ है असाध्य रोग आपके चरणों की रज मिलेगी तो वह ठीक हो जाएंगे किंतु याद रखिएगा एक डिस्क्लेमर जो होता है ना आजकल डिस्क्लेमर नारद मुनि ने दे दिया आपके चरणों की रज भगवान को देंगे तो याद रखना कितने भयानक पाप में पतित होंगे तो ये सभी लोग बोलना शुरू कर दिए अरे हम पाप में पतित होते हैं तो क्या है भगवान तो ठीक हो जाएंगे यह लीजिए हमारे चरणों की रज तो यहां पर भी मां इस तरह के पाप में ऊपर ऊपर से लगता है देखिए भीतर का तो मामला पूरा अलग होता है भीतर में तो मां और ठाकुर दोनों के बीच में आध्यात्मिक एक सूत्र बनी हुई थी जैसे गंभीरानंद जी महाराज कल ही हमको कहते थे या हमने कल पढ़ा था महाराज को यह लिखते हुए कहते हुए कि दोनों के हृदय एक ही छंद में एक ही सूर में जैसे कि मुक्ति का गान गा रहे हैं तो भीतर में से तो एक तादात्म्य था किंतु बाहर में जो लीला चल रही है उस लीला के अनुसार मां जैसे कि हमको ऐसी दिखाई देती हुई सी प्रतीत होती है कि वह जैसे पाप में पड़ती है ठाकुर को झूठ बोल कर के उनको ज्यादा दूध पिलाते हुए तो यह सब तो मां की त तपस्या के सब प्रसंग आ ही गए अभी एक अलग से चैप्टर बना कर के अलग से मां की तपस्या का वर्णन करने की क्या जरूरत पड़ गई तो गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि देखिए आपकी बात तो सही ही है कि कोई विधि नियम का पालन करके तो ठाकुर मा स्वामी जी कोई तपस्वी नहीं बने थे उनके जितने भी क्रियाकलाप है लौकिक हो ना कि आध्यात्मिक हो सब आध्यात्मिक साधना के तपस्या के साथ में ही जुड़े हुए थे उनके सभी क्रियाकलाप उनकी सभी एक्शंस वो साधना ही थी तपस्या ही थी इस बात में कोई प्रश्न ही नहीं है अलग से यह कुछ लिखने का प्रयोजन नहीं है किंतु फिर भी हमारी शिक्षा के लिए हमारे आदर्श का एक पुष्टि करने के लिए यह अलग से एक टॉपिक निकाला गया कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर में नबत में रहकर के नीरवता से साधना करती थी तपस्या करती थी और उसमें जैसे कि वह सिद्ध हस्त थी अर्थात कि शी हैड बिकम एक्सपर्ट इन द तपस्या फील्ड ऑफ तपस्या तो यहां पर यह बात सबसे पहले गंभीरानंद जी महाराज हमको कहते हैं पढ़ते हैं हम सुधु लौकिक खेत्र ज तहा देर सम प्रणता प्रकाश पाई तो ताहा न अभी जैसे कल गंभीरानंद जी ने कहा य पाणी हाटी का उदाहरण देकर के या तो फिर वह लक्ष्मी नारायण मारवाड़ी आ करके वह 00 देना चाहा उसका उदाहरण देकर के कि किस तरह से ठाकुर का त्याग मां के भीतर में भी था मां के भीतर में भी भर भर करके था और ठाकुर जिस विषय के बारे में एक निर्णय करके एक डिसीजन पर आकर के उपस्थित होते थे मां भी उसी थिंकिंग प्रोसेस से गुजर करके उसी टाइप के डिसीजन प आती थी तो यह हमने कल देखा तो आज गंभीरानंद जी कहते हैं कि यह बाह्य जो विषय हमको दिखते हैं सिर्फ उसी में ठाकुर और मां में एक सूत्र थी एक तान थी ऐसा नहीं है आध्यात्मिक विषय में भी साधना के विषय में भी ठाकुर और मां का मन एक ही रंग से रंगा हुआ था एक ही सर से त्याग का गीत गा रहा था शुद्धू लौकिक खेत्र ज तहा देर सम प्राण का प्रकाश पाई तो ताहा न सिर्फ लौकिक क्षेत्र में ही उन दोनों की सम प्राण प्रकाशित होती वह नहीं है अध्यात्म विषय ओ श्री मायर प्रति पद विक्षेप श्री श्री ठाकुरे रही अनुरूप चलो अध्यात्म विषय में भी मां का प्रति पद शेप प्रत्येक स्टेप ठाकुर का ही अनुसरण करते हुए जा रहा था ज्ञा तो सारे ओ अज्ञात सारे तीनी तहा रही अनु बतीनी छि लेन कॉन्शियसली या तो सबकॉन्शियसली जान कर के समझ करके या तो फिर अनजाने रूप से मां ठाकुर का ही अनुसरण करती थी आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रत्येक फुट स्टेप प्रत्येक पद शेप ठाकुर के ही साथ में ठाकुर के ही पीछे-पीछे वह लेती थी उनके पीछे ही वह चलती थी शोड़ी पूजा काल आमरा इहा देर एकात्मता प्रकट प्रमाण पाइया छ सड़सी पूजा के विवरण के समय में उसके डिस्क्रिप्शन के समय में हमने इन दोनों के भीतर में जो एकात्मता थी इसका बड़े ही अच्छे रूप से प्रमाण पाया है प्रकट प्रमाण पाया छी मने बहुत अच्छे से इनका प्रमाण हमको मिला है हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज इसका वर्णन करते हैं कि जैसे ही मां ठाकुर ने मां की पूजा करनी प्रारंभ की वैसे ही मां जैसे कि समाधि में चली गई और ठाकुर भी साथ-साथ में भाव समाधि में चले गए और जैसे कि समाधि में इन दोनों का एक यूनिटी एक दोनों के बीच में एक एकात्मता स्थापित हुई यह समाधि के समय में उच्च भाव राज्य में दोनों के बीच में संपूर्ण रूप से एक यूनिटी जो स्थापित हुई थी इसको तो हमने देखा है उस प्रसंग का चर्चा करने के समय हमने काफी डिस्कस किया है नह बते घरे ओ श्याम पुकुरर चाता पति सेवा योपो देशे श्री मायर तपस्या ईशन मात्र आभास लाभे आमरा स्तंभित होया छी नबत में या तो फिर श्याम पुकुर की उस छत के ऊपर में रह कर के मां जिस तरह से तपस्या करते-करते पति सेवा कर रही थी इसका भी एक आभास हमको मिला है आभास मात्र ही कह सकते हैं क्योंकि यह 10 साल 11 साल की जो तपस्या मां ने नौबत में की थी और फिर यहां पे तीन-चार महीनों की जो तपस्या थी दो ढाई महीनों की यह श्याम पुकुर में और फिर बाद में काशीपुर में तो यह तपस्या कितनी कठिन थी इसका हमको तो ऊपर ऊपर से सिर्फ एक आभास ही मिलता है सही में देखा जाए तो उसकी गहराई में हम शायद कभी भी प्रवेश नहीं कर पाएंगे तो यह आभास एक हमको मिला है और मिलकर के आभास मात्र से हम लोग स्तंभित हो गए हैं कि हां मां इस तरह की तपस्या भी कर सकती थी श्री मां इहा तो संतुष्ट ना था क्या श्री रामकृष्ण रही न्याय समस्त जीवन के एक अभिराम साधनाए परिणत करिया छले किंतु ये पति सेवा करके नहब में या श्याम पुकुर में तपस्या करके ही मां संतुष्ट नहीं थी अपने पति श्री राम कृष्ण की तरह ही अपने पूरे जीवन को एक अविराम साधना में माने परिणत किया था इहा लोका तो व्यवहार यह जो मां का व्यवहार है यह जो मां का बिहेवियर है वो जैसे कि लोकाक है इस लोक के अतीत है पृथ्वी के ऊपर में इस तरह की समान रूप से एक तपस्या करते जाना पूरे जीवन को एक अविराम साधना में बद्ध कर देना एक अविराम साधना में परिणत कर देना यह कितने लोगों के लिए संभव है ताई मने होय अतः पर लौकिक दृष्टि ते ई सकोल आत्म प्रचे स्टार विवरण दते जाले पाठक होई तो श विस्मय जिज्ञासा कररी बेन इसीलिए ऐसा लगता है कि यह मां की निरव अविरत साधना का वर्णन अभी जो हम देने को जा रहे हैं उस विवरण की अपेक्षा से उस विवरण को देख कर के पाठक यानी कि वाचक हो सकता है कि यह प्रश्न करें किंतु देखिए कि यहां पर महाराज क्या लिखते हैं इस तपक तपस्या का विवरण हम लौकिक दृष्टि से कर रहे हैं लौकिक दृष्टि से तपस्या का विवरण करना अर्थात कि देखिए कि हमारी दृष्टि तो कोई गभीर अंतर दृष्टि नहीं है कि मां के अंत मन में क्या चल रहा है जब वह तपस्या कर रही थी कितनी नीरव शांति कितना आनंद कितना संतोष कितना जैसे कि संसार से उनका मन उर्ध्व में चला जाता होगा यह जो मां के आध्यात्मिक अनुभव है उसका विवरण तो हमारे लिए करना असंभव है उस उनकी जो गहराई थी आध्यात्मिक अनुभूति की उस गहराई को नापना उसको मेजर करना हमारे लिए असंभव सा है तो फिर हम मां की तपस्या का जो विवरण करेंगे वह तो एक लौकिक दृष्टि से ही करेंगे हमको जो दिखता है वह हम लिखते हैं हम देखते हैं कि मां प्रतिदिन एक लाख जप करती थी मां के पास में जितने भी पागल आदमी आते थे उन सबकी पागलपन सहन करके मां बड़े अच्छे से उनके साथ में बिहेव करती थी यह जो बाह्य दृष्टि से जो हमको दिख रहा है उसी का तो वर्णन हम करेंगे लौकिक दृष्टि से दिखने वाली साधना का ही हम विवरण करेंगे अभी देखिए कि लीला प्रसंग में अर्थात कि श्री राम कृष्ण देव की साधना हों का विवरण जिस लीला प्रसंग में है उसमें शारदानंद जी महाराज शरत महाराज जब ठाकुर की साधना हों का वर्णन करते हैं तो उसमें इतना सारा फिलोसोफी डाल दे ते हैं जिससे कि हमको समझ में आए कि क्या कॉन्टेक्स्ट है क्या डेप्थ है ठाकुर की तपस्या का परिप्रेक्ष्य और एक पट भूमिका नहीं समझने से ठाकुर की साधना की गंभीरता हम नहीं समझ पाएंगे इसके लिए लीला प्रसंग में बहुत सारी फिलोसोफी का विवरण है जैसे कि यदि ठाकुर मधुर भाव की साधना करते हैं तो मधुर भाव का परिप्रेक्ष्य क्या है कॉन्टेक्स्ट क्या है उसका बैक स्टोरी क्या है मधुर भाव का हिस्ट्री क्या है किस तरह से चैतन्य महाप्रभु ने मधुर भाव का एक पॉपुलर रूप से प्रचार किया था मधुर भाव को उन्होंने जनसामान्य के भीतर में प्रसारित किया था वह सब कुछ उसमें आता है किंतु यहां पर देखिए कि जब मां की नीरव साधना का वर्णन करने को जाएंगे तो प्रसंग के बाद प्रसंग की ही उपस्प्रिंग कहीं किसी तरह का फिलोसॉफिकल डिस्कशन करने का प्रयास गंभीरानंद जी महाराज नहीं करते हैं तो फिलोसोफी के अभाव में यह प्रश्न तो हो ही सकता है कि जो तपस्या हमको दिख रही है उसमें क्या सही में कोई गंभीरता है कि नहीं उसमें हमको ऐसा लगेगा अरे यह तो कोई भी कर सकता है अपने अपना कोई रिलेटिव बीमार है हॉस्पिटल में जाकर के हमको दो-तीन महीना रहना पड़े तो वह तो हम भी कर सकते हैं करते ही है करते भी है सरकारी हॉस्पिटल में जाइए जिस तरह से रहने की व्यवस्था है जिस तरह से ट्रीटमेंट होती है वह देख कर के ही हमको लगता है कि अरे बाप रे यहां पर कौन एडमिट होगा किंतु फिर भी लाखों करोड़ों भारतीय गवर्नमेंट हॉस्पिटल में एडमिट भी होते हैं और जो अपने प्रियजन है एडमिट हुए उनके साथ में रह करर के उनकी सेवा भी करते हैं तो यहां पे माने एक नया क्या कुछ किया है तो ऐसा एक प्रश्न हो सकता है तो यहां पर गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि देखिए कि इसका एक कॉन्टेक्स्ट समझना होगा मां जो अपने पति की सेवा मात्र सिर्फ नहीं कर रही है मां जो कार्य करती है वह सभी जैसे कि ईश्वर आराधना के लिए उपासना है अपने प्रियजन की सेवा करना और प्रियजन के भीतर में ईश्वर का दर्शन करके ईश्वर की उपासना कर रहे हैं इस तरह से उनकी सेवा करना इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है और इसीलिए मां जो कार्य करती है जीवन को उन्होंने तपस्या उपासना में परिणत कर दिया है इसके पीछे का एक बैकग्राउंड हमको समझना होगा तो इसीलिए महाराज कहते हैं कि लौकिक दृष्टि से हम यह जो तपस्या आत्म प्रचे का विवरण हम जो देने को आगे बढ़े हैं उसको देख कर के पाठक हो सकता है कि स विस्मय जिज्ञासा कोरीव विस्मय से होकर के विस्मय विष्टल से आविष होकर के प्रश्न कर सकता है किहार र्थ की इसका अर्थ क्या है सड़सी पुजार अबो साने जिनी श्री राम कृष्ण समस्त साधन फल अनाया से दान स्वरूप पाया छन चारित्रिक और व्यावहारिक सौंदर्य माधुर ज जिनी स्वत सकलर मने श्रद्धा भक्ति और अनुप्रेरणा जागन एवं दहिक क्लेश आदि सज्ज करिया जीनी तिति खादिर पराकाष्ठा प्रदर्शन करेन तहर श शकोल स्वार्थ गं हीन निरब क्रियाकलाप की चरम तपस्या न वाचक प्रश्न कर सकता है कि शशी पूजा के बाद में शशी पूजा समाप्त करके श्री रामकृष्ण स्वयं युगा वतार स्वयं ने अपनी समस्त साधना का फल जीन मा को स्वरूप दान स्वरूप दे दिया था प्रणामी के स्वरूप अर्पण कर दिया था जिनके चारित्रिक और व्यवहारिक सौंदर्य के माधुर्य से जो आ स्वतः ही सहज रूप से सभी की श्रद्धा पात्र हुई है अर्थात कि यह मां मां कौन है मां वो है कि जिनको ठाकुर ने अपनी समस्त साधना का फल अर्पण कर दिया था मां कौन है जिनका चारित्रिक और व्यवहारिक सौंदर्य उनके चरित्र का सौंदर्य और व्यवहार का सौंदर्य इतना मधुर है कि सहज रूप से सभी की श्रद्धा और भक्ति की वह पात्र होती रही है और दैहिक क्लेश जिन्होंने सहन करके तितिक्षा आदि की पराकाष्ठा प्रदर्शित की है उनकी यह जो स्वार्थ गंध हीन निरव क्रियाकलाप जो है वही क्या चरम तपस्या नहीं है वो मां शारदा जिनके श्री चरणों में युगा वतार श्री राम कृष्ण देव ने अपनी तपस्या का फल प्रदान कर दिया वही मां शारदा जिन्होंने इतनी कठिन तपस्या की है कि जिस तपस्या के परिणाम से हम सभी लोग उनके प्रति नतमस्तक हो गए हैं जिनका चरित्र और जिनका व्यवहार इतना मधुर है कि जो उनके पास में जाता है उनके हृदय के क्लेश पिघल जाते हैं और जैसे कि उनके श्री चरणों में पतित हो जाते हैं वो मां शारदा इनका प्रत्येक कार्यकलाप दिव्य है तो क्या यह जो उनके जो बाह्य रूप से जो कार्यकलाप है वही क्या एक बहुत बड़ी साधना नहीं है आप इस मां की साधना को दो विभाग में क्यों बांटते हैं एक तो मां का जगत के साथ में व्यवहार है और ठाकुर के साथ में व्यवहार है जो कि संपूर्ण रूप से तपस्या में परिणत हुआ है और यहां पर मां की खुद की एक नीरव साधना है ईश्वर प्राप्ति के लिए दिन में लाख-लाख जप करती थी अति मॉर्निंग में अति सुबह उठ जाती थी पूरा दिन भर जो भी कार्य करेगी मन के भीतर में संपूर्ण रूप से ईश्वर का नाम तो चलता ही रहेगा यह मां की साधना का अलग से वर्णन करने की क्या जरूरत है शुद्धू विधि अनुयाई कतक गुली नियम पालन ना करी ले कि धर्म जगते उन्नति होए ना विधि के अनुसार कुछ नियमों का पालन जब तक नहीं करेंगे तब तक क्या धर्म जगत में उन्नति नहीं होगी डबल नेगेटिव यहां पर यूज किया है इसलिए सेंटेंस थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड हो जाता है महाराज जी जो कहना चाहते हैं विधि का पालन करने से ही धर्म और विधि का पालन नहीं करने से धर्म नहीं होगा ऐसा किसने कह दिया स्वामी जी तो स्वयं कहते हैं कि यह चंडाल नारायण दरिद्र नारायण रोगी नारायण इनकी सेवा कीजिए आप मंदिर में जाकर के छोड़ो श उपचार से होम यज्ञ वगैरह करके भगवान शिव की उपासना नहीं करेंगे तो चलेगा यह दरिद्र के भीतर में ही भगवान शिव का दर्शन कीजिए तो इतनी उदार फिलोसोफी जिस संघ की है इस संघ में इसी संघ जननी का चरित्र निरूपण करने के समय संघ जननी अपने संतानों के साथ में पति के साथ में जिस तरह से व्यवहार करती थी जिस तरह से उनको उनकी सेवा करती थी जिस तरह से उनके प्रति उनकी करुणा थी कंपेज था तो वही क्या हमको दिखाता नहीं है यथेष्ट रूप से दिखाता है कि उनकी तपस्या कितनी है इसके बाद में अलग से तपस्या का वर्णन करने की क्या आवश्यकता है उत्तर है आमरा बोली अधैर जेर कोनो कारण नहीं इसके उत्तर में हम कहेंगे कि अधैर रखने की कोई बात नहीं है अब यह इतना लंबा पैराग्राफ पढ़कर के हमको लगेगा ही कि गंभीरानंद जी महाराज बिना कारण का यह आर्गुमेंट यहां पर क्यों ला रहे हैं अभी तक तो उन्होंने कोई आर्गुमेंट वाद विवाद उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष ऐसा कुछ किया नहीं है अभी अननेसेसरी यहां पर क्यों ला रहे हैं सीधा-सीधा प्रसंग आप लिखते जाइए हम प्रसंग पढ़ते जाएंगे और आनंद पाते जाएंगे अननेसेसरी इस तरह का आप एक आर्गुमेंट क्यों खड़ा करते हैं तो उसके उत्तर में महाराज जी कहते हैं बिल्कुल अधैर होने की जरूरत नहीं है इंपेशेंट मत होइए आमरा जीवनी लिखते बोसिया छी मां शारदा का जीवन लिखने के लिए हम बैठे हैं निरपेक्ष भावे सबई बोलिया जाब निरपेक्ष रूप से सब कुछ बोल के जाएंगे य हार प्रयोजन बा तात्पर्य जो बचारे भार अमा देर ऊपर न किस प्रसंग के रूप बारे में किस तरह से हम इसका विवरण करते हैं उसका प्रयोजन है कि भी नहीं उसका क्या तात्पर्य है अर्थात कि क्या कांटेक्ट है किसी भी इंसिडेंट का क्या रीजन है क्या हम एक रेशनल क्या है यह प्रसंग हमने यह इवेंट हमने यहां पे लिखा है व्हाट इज द रीजन व्हाट इज द बैकग्राउंड व्हाट इज द रेशनल व्हाट इज द अल्टीमेट एम ऑफ राइटिंग ऑल दिस इंसिडेंट यह सब चीजों के बारे में हम इतना विचार नहीं कर रहे हैं हम सिर्फ मां के जीवन की घटनाएं लिखते जाएंगे उसका क्या रे नाल है क्या बैकग्राउंड है क्या रीजन है क्या अल्टीमेट एम है वह सब आप ही डिसाइड कीजिए उहा वर्तमान और भविष्यत पाठक गणर विवेचना दीन यह रेशनल खोजना वर्तमान और भविष्य के पाठकों के ऊपर में ही रीडर्स के ऊपर में ही हम डाल देते हैं वही लोग यह सब ठीक करें तबे आमरा टक जानी किंतु हमको सिर्फ इतना पता है ज श्री मां प्रवृति देवी मानवीर कोनो प्रचे टाई निष्प्रभ मानवी की शक्ति स्वयं आद्या शक्ति जगदंबा स्वयं जब पृथ्वी पर नरदह धारण करके आती है नारी देह धारण करके अवती होती है तो उनका एक भी कार्य उनकी एक भी एक्शन अनरीजनेबल नहीं है एवम ताहा केवल बधिर अनुसरण ना होया अंतरेर आवेग बशई होईया थाके और मां की जितनी भी एक्शंस है जितने भी कार्य है वह किसी विधि विधान को फॉलो नहीं करके अंतर की प्रेरणा से ही होते हैं मां क्यों इतना जप करती है हां ठाकुर ने कहा होगा कि घड़ी के कांटे की तरह सतत जप करते जाना है किंतु मां का जो स्वभाव था उसमें यह सतत जप करते जाना वह मां का स्वभाव ही था यदि ठाकुर कहे ना कहे यदि मां नहीं चाहती ऐसा करना तो ठाकुर हजार उपदेश भी दे देते तो मां उसको स्वीकार नहीं कर पाती भीतर से ही यह सब साधना उनके मन में उत्पन्न होती है प्रस्फुटित होती है और इसीलिए मां यह साधना करती है किसी नियम के चलते नहीं ठाकुर ने कहा है कि पुरुष की नजरों में नहीं आना है तो इसलिए मां सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठ कर के शौच वगैरह करके वह फिर अपना कार्य करने के लिए नबत में चली जाती और फिर मां बाद में कहती कि अरे पूरा दिन भर कभी बीच में शौच के लिए जाना पड़े तो नबत से नहीं निकल पाएगी क्योंकि नबत से निकलने से ही किसी के पुरुष की दृष्टि में पड़ेगी तो वो शौच का वेग धारण करते-करते मां को पेट का दर्द हो गया पेट का रोग लग गया तो यह बात बात क्या मां सिर्फ ठाकुर की बातों को फॉलो करके करेगी ना कि यह जो कष्ट है सौज को दिन भर धारण करके रखने का माने कितने कितनी छोटी-छोटी चीजें हैं जो कि हम समझ ही नहीं पाते फिर बाद में पेट का रोग लग जाना यह सब मां क्यों करती है लोगों की नजर के सामने यदि आ भी जाए तो भी कौन सा बड़ा पाप है क्या मां अकेली स्त्री है जो कि काली मंदिर में रहती है क्या गांव में मां जाती है व नदी के किनारे किंबा तालाब के किनारे या फिर ये कुए के पास में लोग नहीं देखते हैं क्या तो इतना कठोर भी करने की क्या आवश्यकता है तो यह कठोरता जो है मां ठाकुर के कहने से कभी नहीं करेगी उनके खुद के मन में यह कठोरता करने का स्वभाव प्रकट होता है बोलकर के मां ये कठोरता करती है अब दूसरा एक एक प्रश्न है कि इतना सब भी करने की क्या जरूरत थी तो वो प्रश्न का तो उत्तर बड़ा कॉम्प्लिकेटेड है कि क्या आवश्यकता थी वो तो हम सबको अपना अपना उत्तर खोजना होगा किंतु बात यह है यह तो सिद्ध है कि मां ने कठोरता की है शारीरिक क्लेश उन्होंने सहन किया है और इस शारीरिक क्लेश के अंत में उन्होंने चरम शांति प्राप्त की है चीर शांति प्राप्त की है इस एक ऐसी शांति जिसका ना ही आदि है ना ही अंत है तो यह बात तो मां के जीवन में स्वतः सिद्ध है तो यहां पर मां जो भी कार्य करती है तपस्या करती है कठोरता करती है उसकी प्रेरणा उनके खुद के हृदय में से आई है ठाकुर के कहने से या ब्राह्मण पत्नी को या ब्राह्मण की स्त्री को जिस तरह के नियम पालन करने हैं इस तरह के विधि नियम निषेध को फॉलो करके नहीं हृदय की प्रेरणा से मां यह सब करती है तरान तहा देर प्रत्येक कार्य एकटा निज स्व चमत्कार दव एकटा व्यक्तिगत अभिनव तोव थाके और इसीलिए मां के कक्षा के जो साधक है सर्वोच्च लेवल के जो साधक है उनके प्रत्येक कार्य में एक चमत्कार त्व चमत्कार नहीं चमत्कार दव दोनों में डिफरेंस क्या है चमत्कार होते हैं मिरेकल जबकि चमत्कार अर्थात कि एक ऐसा कार्य वो देख कर के हम लोग आश्चर्य चकित हो जाए अरे मां इस तरह की कठोरता करती है क्या क्या जरूरत है क्यों करती है एक ऐसा आश्चर्य हमको हमारे मन में हो इसको कहते हैं एक चमत्कार क्व एकटा व्यक्तिगत अभिनव तोव थाके एक इंडिविजुअल नोवेल्टी रहती है अभिनव अर्थात कि एक अभिनव अनुभव एक अभिनव कार्य उनका खुद का उनके लिए खुद में एक यूनिक एक नोवेल्टी है इस तरह का कार्य मां के जीवन में रहता है आमरा स् तोरे स् तोरे तहरी आलोचना करते छी हम प्रत्येक स्टेप में प्रत्येक पद शेप में यही आलोचना करते चलेंगे तबे दुखेर विषय ई निरव साधना अनेक खानी अज्ञात किंबा सुविधि तो न है तभी यह दुख का यह एक ऐसा विषय है कि माने जो नीरवता से साधना की है तपस्या की है इसका पूर्ण विवरण हमको कहीं पर भी मिलता नहीं है बहुत ज्यादा तो हमारे लिए ज्यादातर विवरण अज्ञात ही है हमारे लिए दृष्टांत स्वरूपे बोला जाते पारे ज स्वामी शारदानंद जी दिन लिपि एवं श्री जुक्तो मास्टर महाशय स्मारक लिपि होई ते जद आमरा जानी ते पारिया छी जे श्री मां एक समय संभवत 20 में 1883 साबित सावित्री ब्रतो अनुष्ठान करिया लेन तथापि ही उल्लेख मात्र भिन्न अन अन्य कोनो तत्व आमरा अबतो न यह जो मां के जीवन की साधना ज्यादातर रूप से वह हमारे लिए अज्ञात है इसका एक उदाहरण हमको मिलता है कि शारदानंद जी की दीन लिपि और यह मास्टर महाशय की डायरी इन दोनों के आधार से हमको यह पता चला है कि एक समय मां ने सावित्री व्रत का अनुष्ठान किया था और वह समय कौन सा था 20 में 1883 20th में 1883 के यह संभवतः दिन है कि मां ने सावित्री व्रत का अनुष्ठान किया था किंतु इसका उल्लेख मात्र ही हमारे पास में है कि हां मां ने ऐसा व्रत किया है किंतु किसी भी तरह का अन्य विवरण नहीं है कि क्यों माने यह व्रत किया किस तरह से किया था क्या तात्पर्य था ठाकुर की ठाकुर कहां पर थे उस समय ठाकुर का क्या आदेश था यह कुछ भी हमको पता नहीं है सिर्फ यह मेंशन मात्र है कि मां ने यह व्रत किया था ताहा होले ई सकोल अमूल अर्थपूर्ण इंगी तो अवलंबन आमा दिग के श्री मायर जी बनेर ई दटर परिचय ग्रहण करते होई बे यह ज्यादातर घटनाएं हमारे लिए अविद है अननोन है इसके बावजूद और इसी की वजह से यह जितने भी अमूल्य अर्थपूर्ण इंगित अवलंबन अर्थात कि यह जो हमको एक आभास मात्र मिलता है ना यह मास्टर महाशय की डायरी से एक आभास मिला यह शारदानंद जी की दीन लिपि यानी उनकी डायरी में से एक आभास मिला किसी भक्त ने ऊपर ऊपर से हमको कुछ कह दिया और हमारे मन में रहा ऐसे आभास मात्र ही इशारों इशारों में ही जो बातें की गई है उसी के आधार पर मां की तपस्या का विवरण हमको लिपिबद्ध करना होगा विवरण हमको करना होगा ताहा होले अमूल्य अर्थपूर्ण इंगत यह जितने भी इशारे हमको प्राप्त हुए हैं वह अमूल्य है और अर्थ से भरपूर है उसी के आधार पर मां के जीवन की यह बात को हमको अच्छे अच्छे से लिखना होगा धर्मर सहित घनिष्ठता घटे धर्मात्मा दिगर उपदेश और आचार व्यवहारे एर मध्य दिया अच्छा धर्म आप किस तरह से करेंगे धर्म के साथ में आपकी घनिष्ठता किस तरह से बढ़ेगी तो जो धार्मिक व्यक्ति है उनके साथ में व्यवहार करके उनके साथ में वार्तालाप करके और कार्य करके उनके साथ में आपका किस तरह का इंटरेक्शन हो रहा है मैं यदि एक साधक हूं मैं एक डिवोटा हूं तो मेरी साधक जीवन का मेरे साधक जीवन का मेरे रिलीजियस लाइफ का चितार एक आपको आकलन असेसमेंट कैसे मिलेगा मैं दूसरे रिलीजियस स्पिरिचुअल पर्सन है उनके साथ में किस तरह से इंटरेक्ट कर रहा हूं इस इंटरेक्शन के माध्यम से हमको पता चलेगा कि यह स्पिरिचुअलिटी मेरे खुद के जीवन में कितनी गहन तर कितनी इन डेप्थ हुई है दक्षिणेश्वर श्री मां अने अनेक धर्मात्मा संपर से आशिया लेन एवं श्याओ लेन थेट दक्षिणेश्वर में मां शारदा देवी बहुत सारे स्पिरिचुअल सीकर स्पिरिचुअल एस्पायरेंट साधकों के संपर्क में आई थी और इन साधकों के संपर्क से उन्होंने सीखा भी था बहुत आमरा सुधु श्री रामकृष्ण भक्तो देर कथा बोली ते छी ना दक्षिणेश्वर आगत साधु सन्नासी देर कथाओ बलते छ यहां पर सिर्फ श्री रामकृष्ण देव के भक्त उन्हीं की बात नहीं है और भी बहुत सारे साधु सन्यासी साधक दक्षिणेश्वर में आया जाना करते थे द्वितीय श्रेणी अनेकर विषय किछुई जाना जाए ना किंबा श्री रामकृष्ण जीवने आलोचने पुनर उल्लेख ब्रथा अब यह जो दूसरी श्रेणी के साधक थे दक्षिणेश्वर में किस तरह के साधक आते थे किस तरह के स्पिरिचुअल एस्पायरेंट आते थे एक तो थे कि ठाकुर के डिसाइल थे ठाकुर के शिष्य थे इसके अ अलावा भी हमको पता है कि दक्षिणेश्वर काली मंदिर जो जैसे वह जो लोग जगन्नाथ यात्रा करते थे या तो फिर गंगा सागर जो लोग जाते थे वे लोग कभी-कभी दक्षिणेश्वर में रुक जाते थे क्योंकि वहां पर भिक्षा की अच्छी सुविधा थी तो यह जो ट्रेडिशनल साधक यात्रा करते-करते जब वह दक्षिणेश्वर में आकर रुकते थे तो उनके साथ में भी मां का इंटरेक्शन होता था अभी ये बहुत सारा इंटरेक्शन यहां पर लिपिबद्ध या तो रिटर्न इसलिए नहीं है कि या तो हमको इनके बारे में पता नहीं है या तो फिर ऑलरेडी लीला प्रसंग में लीला प्रसंग में इसका विषद रूप से डिटेल में डिस्क्रिप्शन दे दिया गया है श्री मायर जी मनीर सहीद विशेष भावे संबद्ध भैरवी ब्राह्मणी जोगेश्वरी कथा पूर्वे लिपि बद्धो करा होया छ मां के साथ में जिसका विशेष रूप से संबंध था वोह भैरवी ब्राह्मणी उनकी बात हमने ऑलरेडी डिटेल में कह दी है तत व्यतीत आर एक जन भैरवी कथाओ आमरा जानी ते पारी यह जो भैरवी ब्राह्मणी ओरिजिनल थी जिसने आकर के ठाकुर को शक्ति साधना सिखाई थी और वही भैरवी ब्राह्मणी जब ठाकुर के साथ में कामर पुकुर आई थी तो मां शारदा देवी को जयराम बाटी से कामर पुकुर बुलाया गया था और इस भैरवी ब्राह्मणी के साथ में जो प्रसंग हुए वह तो पहले ही हमने डिस्कस कर दिए हैं वही वह फेमस घटना कि भैरवी ब्राह्मणी बड़ा ही तीखा तरकारी बनाया करती थी एकदम हट वो सब बनाया करती थी खाना जिसमें बहुत सारा चिली अर्थात कि मिर्च डाला हो फिर क्या करती थी मां इनको भी देती भैरवी ब्राह्मणी मां को भी देती थी और रामलाल दादा की मां अर्थात कि ठाकुर के भाई की पत्नी उनको भी देती थी अभी रामलाल दादा की मां है वह इतना तीखा खाने से बोलती कि अरे इतना तीखा हुआ है त तब जब मां कहती अब मां क्या है कि भैरवी की थोड़ा सा डर कर डरती थी और एक सास की तरह उनको सम्मान भी देती थी तो मां अपनी आंखों से तीखा खाया है तो आंखों से तो पानी निकलेगा ही तो आंखों में से पानी वो पहुंच भी रही है और और फिर मुंह से बोल भी रही है बहुत अच्छा हुआ है बहुत अच्छा हुआ है वरना फिर भैरवी नाराज हो जाएगी तो भैरवी खुश होकर रामलाल दादा की मां को कहती है कि देखो बहु मां अर्थात की मां शारदा वो तो कहती है कि बड़ा अच्छा हुआ है तुमको तो मैं कितना अच्छा बना करके दूं फिर भी तुमको नहीं अच्छा लगता अभी कल से मैं तुमको मेरी बनाई हुई तरकारी नहीं दूंगी तो यह सब प्रसंग हमने डिस्कस किए हैं इसके अलावा भी एक भैरवी ब्राह्मणी आई थी दक्षिणेश्वर में बाद में जिसका विवरण अभी हम कल देखेंगे आज यहां तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्ण ण मस्तु