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ओम स्थापनाय धर्म स्वरूप राम कृष्णा यतीम नमः पिछले सप्ताह हमने देखा था की किस तरह से महाराज जी बताते हैं की यह जो देव और असुर संग्राम सर्वप्रथम तो देवी हमको आध्या शक्ति हमको भरोसा दिलवाती है हमको वचन देती है की एटम याद याद वो था भविष्यति सदा सदा अवश्य रिया हम कारी शाम कारी शमशायम अर्थात की जब जब हरि या तो फिर असुरों का उत्पाद या तो प्रकोप बाढ़ जाएगा तब तब मैं अवतरण करके पृथ्वी पे उनका सहर करूंगी और जब हमको प्रश्न होता है की अरे इस तरह से जो असुर हमको पुराण में दिखे जाते थे वह जैसे की रक्त बी रखना बी रक्षा उसको आप यदि उसको मारेंगे तो उसके शरीर में से जितने बूंद गिरेंगे रक्त के उसमें से एक नया रक्षा खड़ा हो जाएगा तो अभी इस तरह के रक्षा का मतलब संघार करने के लिए आई है तो देवी के अलावा आध्या शक्ति के अलावा और कौन कर सकता है हम लोगों की तो ताकत ही नहीं है हम लोग तलवार या तो फिर तीर से मारेंगे यदि कोई राजा उनका वध करने को जाता है जैसे की राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा का रक्षण करना प्रजा का पालनपुर करना और इस तरह के दोनों यदि प्रजा को पीड़ित करते हैं तो वो उजागर के दोनों का संसार करना अभी ये मां लीजिए की कोई राजा जल्दी जाता है ऐसे रखना बी का सहर करने के लिए वो तलवार से उसका मां लीजिए हाथ भी कैट दिया तो जितने बिंदु गिरेंगे रक्त के उसमें से और एक एक रक्त बीच खड़ा हो जाएगा अब कैसे इसका सुधार करेंगे उसके लिए तो जगदंबा को स्वयं ही पृथ्वी पर आना होगा और उनका संघार करेगी तो इस तरह से मैन हमको वचन दिया है अभी प्रश्न होगा की आधुनिक युग में तो रक्तबीग जैसे रक्षा ने ही दिखाई देते हैं आधुनिक युग में रक्षा या तो फिर आसुरी प्रकृति के लोग हैं हम जब न्यूज़पेपर पढ़ने हैं जो जो क्राइम है यह वगैरा जो कुछ भी हम देखते हैं समाज में हमको लगता है की अरे इससे तो मतलब रखना 20 तो अच्छा था चलो उसको एक बार संभल कर दिया तो बात खत्म हो गया यहां तो एक के बाद एक जैसे की है वह उसका कितने लोगों का वध करेंगे इतना बड़ा सोसाइटी है इतने सारे दुर्गुण वाले लोग रहते हैं आ दुराचारी लोग रहते हैं अब कितने लोगों का संघार करने को जाएंगे समाज को बचाने के लिए वहां तो एक रक्षा को मार दिया बात खत्म हो गई पृथ्वी पर शांति फेल गई आजकल तो राक्षसी प्रति वाले लोग इतने सारे इतने सारे हो गए हैं अब कितने कितने लोगों को करने को जाएंगे ये प्रश्न होता है तो महाराज जी लिखने हैं गंभीरानंद जी महाराज की आज के जमाने में ये जो देवासुर संग्राम है वो हमारे हृदय में है हमारे हृदय में आसुरी प्रवृत्ति और देवी प्रवृत्ति मुझे एक शांत एक आशीर्वाद मैं जीवन जीना है एक निष्ठा एक ऑनेस्टी प्रमाणिकता हमारे जीवन में हनी चाहिए मैं जो कुछ भी करूं इस 54 में धर्म अर्थ कम मोक्ष ये जो कर पुरुषेर थे उसमें से यदि मैं अर्थ या तो कम यह भी जड़ी में पसंद करूं की इसका मुझे एन अनुज्ञा करना इसको मुझे अनुसरण करना है तो वो भी धर्म के आधार पर हो नहीं की अधूरा कर के आधार पर दुराचार के मध्य से कम और अर्थ जो कठे किया गए हैं वो हमको ही नहीं सिर्फ पूरे समाज के लिए वो संकट विपत्ति में वो विपत्नजक हो सकता है पूरे समाज को संकट में दाल सकते हैं तो यह जब हमको देखते हैं तो इसलिए महाराज जी कहते हैं की ये जो अच्छी प्रवृत्ति या तो हो यह तो फिर अच्छी प्रवृत्तियां या तो फिर बुरी प्रवृत्तियां जो कुछ भी आप देखते हैं वह सब संग्राम हमारे हृदय में चला राहत है और इस संग्राम में हमारी जो अच्छी प्रवृत्तियां हैं हमारे सदगुण है हमारे देवी प्रकृति उसको बूस्ट करने के लिए उसको बढ़ावा देने के लिए उसको ट्रेन करने के लिए जैसे की मतलब हम गुरु के पास जाते हैं धनुर्विद्या सीखने के लिए पुराने जमाने में भगवान राम वगैरा जय करते थे तो धनुर्विद्या गुरु के पास सीखे तो फिर उसे विद्या से वो असुरों का संघार करेंगे तो हमारी सतप्रभुतियों को ट्रेन करने के लिए कोई आध्यात्मिक विद्या सीखने के लिए मां का इस बार शक्ति का अवतरण हुआ है इस बार शक्ति स्वयं सुधार नहीं कर रही है शक्ति हमको सिखाती है शक्ति हमको आशीर्वाद देती है की किस तरह से यह जो देवासुर संग्राम हमारे हृदय में चल रहा है उसमें हम हमारे ही बेहतर रहे आसुरी गुना को हम उसके ऊपर में विजय प्राप्त करें तो यह है आज का आधुनिक समय का देवासुर संग्राम हमारे हृदय में और शक्ति का पृथ्वी पर अवतरित होने का पृथ्वी पर प्रादुर्भाव होने का असली करण उसका प्रयोग है अभी थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं अंतर जगत सोवृति और करती मध्य अविराम संघर्ष चलीद हमारे अंतर जगत में सोवृति और कुवती इन दोनों का जो अविराम संघर्ष चल रहा है नाम देवासुर संग्राम नाम में निर्देश करो याची उपनिषद में इसको भी देव असुर संग्राम के नाम से निर्देश किया गया है आस्तिक के बुद्धि पर लोग चिंता प्रभृति सदगुण राशि के निर्मल परिवार जानो वर्तमान के ऊपर में विश्वास होना यह मैं मानता हूं किंतु हमारे भीतर में भीतर में हमको लगता है की अच्छा ठीक है ईश्वर है तो है तो मौसम मुझे क्या है मैं तो जो चाहे वो करता रहूंगा फिर बीच-बीच में मंदिर में जाकर के थोड़ा बहुत दान दक्षिण देती है थोड़े बहुत जा करके साधुओं का सत्संग कर लिया इससे कम समाप्त हो गया स्वामी जी ठाकुर कहते हैं की यदि तुम मां लो की एक चोर है की वह सोचता है की वह उसके बगल वाले कमरे में बहुत सर धन पड़ा हुआ है और वह कैमरा उसका दरवाजा पे ताला लगा है तो क्या ये चोर शांति से बैठ पाएगा की हां मेरे बगल वाले कमरे में इतना सर धन पड़ा है उसे बीच में ताला है तो वो शांति से सो पाएगा कभी नहीं सो पाएगा वो सीधा उठ करके ताला तोड़कर के दरवाजा तोड़कर के भीतर जाके धन हस्तगत करने के लिए वो प्रभु हो जाएगा किंतु मां लीजिए की ऐसा कोई चोर है वो आराम से बैठा हुआ है किसी ने उसको बोल दिया है तुम्हारा बगल वाला कैमरा जिसमें ताला लगा हुआ है उसमें बहुत सर सोना जावरा तो ये सोना मोहनी यह सब पड़ा है तो वो चोर बोलेगा अरे भाई जान दो तुम तो जो कुछ भी बोलते हो किसको पता ये होगा की भी नहीं मैं दरवाजा तोड़ने की मेहनत करूंगा फिर मेहनत करने से फिर और क्या मुझे कुछ सही में कुछ मिलेगा की भी नहीं इससे बजाई बटर है मैं थोड़ा सा रेस्ट ले लेट हूं बाद में देखा जाएगा अर्थात की इस चोर को इनफॉरमेशन है की बगल वाले कमरे में कुछ बहुत अच्छा सा खजाना पड़ा होगा किंतु उसका कनविक्शन नहीं है कन्वैक्शन होता तो इमीडियाटली खड़ा होकर के दरवाजा तोड़ने के लिए पर्यटन करता तो वैसे ही धार्मिक जगत में है यदि हम सोचते हैं की ये जो मुझे थोड़ा बहुत मान-सम्मान चाहिए थोड़ा बहुत मेरे लिए एक अच्छी जगह हो जानी चाहिए एक फैमिली हो जाए फैमिली को फिर मिले करके मुझे इतना चाहिए की बीच-बीच में मैं लंबा छुट्टी लेकर के फैमिली को लेकर के कहानी जा पाऊं मेरा अच्छा सा एक बैंक बैलेंस हो एक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी जैसा हो और बस समाज में एक अच्छा नाम हो इतने समय संतुष्ट हूं उसका अर्थ है की वह सही सही एक जगत नियंत्रण ईश्वर है जो की सामग्र जगत को चलित करते हैं या तो फिर का सकते हैं की जगत उनकी ही लीला है और उनको अपने से इस लीला के राज्य पर हम विजय का सकते हैं सामग्र विश्व ब्रह्मांड जिनका दास है जिनका गुलाम है उसे ब्राह्मण को हम साक्षात्कार कर सकते हैं ब्राह्मण स्वयं बन सकते हैं ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं तो यह सुनने से हम लोग यदि कुछ कहेंगे नहीं तो हमको विश्वास कन्वैक्शन नहीं हुआ हमारे पास में इनफॉरमेशन हमारे पास में कनविक्शन नहीं है हमको पता है की हां ब्राह्मण है आत्मन है ईश्वर है किंतु है तो है पहले तो मैं इस जीवन को ठीक से जी लूं बाद में जब बूढ़े होंगे या तो फिर रिटायर होने के बाद में ये सब किया जाएगा अभी ये जवान अवस्था में जबकि मेरे हाथ पर इंद्रियों की इतनी प्रबल शक्ति है तो पहले तो मुझे इंद्रियों के भोग करने दो बाद में सब ईश्वर के बड़े में देखा जाएगा मैं जब साधु बने के लिए यहां पर आया था तो वो आखिरी कुछ एक-दो दिन बच्चे थे वो सबको पता चल गया था की यह तो कोई घर छोड़कर जा रहा है तो मेरा एक मित्र मेरा बहुत अच्छा मित्र मैंने हम लोग बहुत बचपन से साथ में रहे थे साथ में पढ़ाई लिखी किया खेलने भी थे होमवर्क भी करते थे बहुत गैप लगाते थे वो मुझे मिलने को लिया मुझे बोला क्या रे ये तुम्हारे मां में ये सदन लिए क्या सब बेटू की बातें चल रही है मैंने तो सोचा नहीं था की तुम इस तरह से निकलोगे ये सब चीज तो रिटायर होने के बाद की जाति है तो ओबीसी ये सब क्या कर रहे हो पहले तो तुम संसार संसार करो उसका आनंद लोग बाद में ये सब करना जब ये नहीं हो पाएगा संसार तब भगवान की चिंता करना तो अभी मैं उसको क्या बताऊं इसका इतना जब और मैं खुद तो जब हम इस रास्ते पे चलने की शुरुआत करते हैं और जब ऐसे लोग आकर के हमको ये सब कहते हैं वो ब्राह्मण और कर चोर की कहानी है की जैसे ब्राह्मी ने गे लेकर के जा रहा था तो कर चोरों ने देख लिया उन्होंने सोचा की ब्राह्मण से पंडित जी से वह चोरी चोरी कर लेते हैं तो उन्होंने कुछ कुछ अंतर पर रास्ते पर खड़े हो गए और पहले मिला वो पंडित जी ये क्या कर रहा है बकरी लेक जा रहे हैं पंडित हो करके ऐसा बकरी लेकर के जान का क्या प्रयोजन हुआ तो वो पंडित जी गुस्से हो करके बोले अरे क्या बात करो ये तो गे है बकरी थोड़ी ना है फिर थोड़ा सा आगे निकले देखा दूसरा चोर खड़ा था वो फिर वो चोर बोल रहा है की अच्छा पंडित जी आपके पास में गे नहीं है तो आप बकरी क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं आप गे ले लीजिए बकरी को छोड़ दीजिए तो वो पंडित जी बेचारा सोच में पद जाता है अरे दो-दो लोग बोल रहे हैं गे नहीं है बकरी है फिर वो गे की और ध्यान से देखा है उसको तो ग ही दिखती है फिर थोड़ा रास्ते में आगे जाता है तीसरा चोर मिलता है वही से बात करता है की अरे ये तो गे नहीं बकरी है चौथ चोर मिलता है तब जाकर के वो पंडित जी खुद इतने दुविधा में पद गए थे उनको लगा की अरे नहीं नहीं चार-चार लोगों ने कहा है की ये बकरी है गईनी है तो सही सही है बकरी ही हनी चाहिए वो गे छोड़कर के चले तो कर चोरों ने गे लेकर के वो खुशी से चले गए देखिए तो हमको दुविधा में डालने हम यदि सोचते भी है की हां मुझे धर्म के रास्ते पे चलना है भले ही चाहे मैं मैं यंग भी हूं भले ही चाहे अभी तो मेरी वो उम्र नहीं हुई रिटायर होने की भले ही चाहे समाज की जवाबदारी घर की जवाबदारी मेरे पर है ये सब होने के बावजूद भी मैं थोड़ा बहुत समय भगवान के लिए निकलेगा निष्ठा पूर्वक निकलेगा नियमित निकलेगा नियमित जाकर के यदि पास में मंदिर है तो आरती वगैरा अटेंड करेंगे नहीं हो पता है तो मेरे घर में नियम करके 15 मिनट 20 मिनट आधा घंटा ये नियम इतना होना बड़ा आवश्यक है मैंने पूरा साल भर कम किया फिर एक सप्ताह जाकर के कोई रिट्वीट में चले गए इससे नहीं होने वाला है प्रतिदिन 10 मिनट 15 मिनट आधा घंटा भी निकलेंगे तो वह हम कब करेंगे जबकि हमारा आस्तिक के बुद्धि है मैन अर्थात की ईश्वर अस्ति ईश्वर है उसे पर विश्वास कन्वैक्शन होने से तो यह सब करेंगे वरना स्पीड किताबें में पढ़ लिया है भगवान है तो हम बोलेंगे अच्छा ठीक है पहले संसार कर लो बैग में बाद में जब समय मिलेगा संसार में ऐसे फिर वो भोग करने की हमारी लालसा चली जाएगी वो जो कहते हैं ना की दुर्गा पूजा क्यों बैंड हो गई यहां पे तो दांत गिर गए अर्थात की दुर्गा पूजा में बाली दी जाति है और बाली देने के लिए वो बड़े लोग खाकर पक्का करके कहते हैं अभी दांत गिर गए तो अभी वो खाने की शक्ति नहीं रही तो दुर्गा पूजा बैंड हो गई तो वैसे जब तक दांत थे तब तक का लो फिर दांत गिर जाएंगे तब भगवान का नाम लेंगे यह जो इस इसको पता भी मतलब जानकारी है किंतु कनविक्शन नहीं है की भगवान है सही सही कन्वैक्शन होने से इस तरह का कोई चिंतन इस तरह का प्लेन कोई कभी नहीं करेगा तो इसीलिए कहते हैं आस्तिक या बुद्धि जड़ी भी मेरे हाथ में भोग है भोग करने की क्षमता है भोग हाथ के पास में भी है फिर भी बीच-बीच में अमित होकर के योग के प्रति ध्यान देता हूं योग के लिए समय देता हूं तो तभी होगा जब ईश्वर है यह भरोसा मुझे होगा यह जितने भी गन दिए हैं आस्तिक के बुद्धि पर लोक चिंता अर्थात की यह यह जगत के अलावा भी एक अन्य जगत है यह मटेरियल वर्ल्ड है एक्सपायरॉयल वर्ल्ड है तो यह हम लोग आंख बैंड करके क्या सोचते हैं की हमारे हृदय में एक चिड़कस है इस चिड़कस में श्री राम कृष्णा बेटे हैं कमल के ऊपर में विराजमान है तो इस चिता काश का जब हम चिंतन करते हैं ये वाक्य आकाशीय मटेरियल वर्ल्ड उसको छोड़ करके तब वो परलोक चिंता होती है उसको परलोक का दूसरा भी बहुत सर मीनिंग है यदि भक्ति साहित्य में देखा जाए तो वही कुंड है वही कुंड में भगवान विष्णु विराजमान है पूनिया करेंगे तो हम बैकुंठ में जाएंगे तो इस तरह से जो अभी से चिंता करता है वरना तो फिर वो चिंता सब बाद में होती रहेगी अभी यह सब करने का हमारे पास समय नहीं है तो अभी से परलोक चिंता करना अभी से दृढ़ विश्वास होना आस्तिक के बुद्धि होना की हां ईश्वर है भोग में विराम करके योग करना आवश्यक है यह सदगुण राशि ध्यान निष्ठा अर्थात की ध्यान नियमित रूप से करने की ये कौशल ये स्किल और एडरवाइज हम लोग दीक्षा लेते हैं गुरु के पास से गुरु बेचारे गुरु महाराज बेचारे बड़े ही आपको एन निष्ठापूर्वक को बड़े ही ध्यान से आपको सब कुछ बता देते हैं देखो इस तरह से जाप करना है इस तरह से करें जब करना है इस तरह से ठाकुर का चिंतन करना है अपने दीक्षाली होगी यदि तो आपको पता होगा की गुरु महाराज आपको कितना प्रेम करके कितना स्नेहपूर्वक कितना वो मतलब वो श्रद्धा पूर्वक ठाकुर के प्रति जो श्रद्धा है उनकी प्रत्येक बटन में किस तरह से छलक रही है वह हमने देखा होगा अभी वो हम भी उसे दिन बड़ा ही संकल्प ले लेते हैं जी दिन हमारा दीक्षा का दिन है गुरु भाई सब बैठे हैं वो गुरु महाराज स्वयं विराजमान है फिर वह हम दीक्षा समाप्त होने के बाद में जब बाहर आएंगे तो हम लोग बाकी सब सन्यासियों को प्रणाम करेंगे आशीर्वाद मांगेंगे उनसे फिर शुरू शुरू में बड़ा ही हमारे में वो एक ये रहेगा हम गुरु भाइयों जो होंगे उनके साथ में भी बात करते रहेंगे अरे हां आज तो मैंने सुबह को ठीक किया है की सुबह को इतना समय जब करना है मैंने ठीक किया है की कथा अमृत का पाठ करना ही है या तो फिर मैंने ठीक किया है की ये राम नाम संकीर्तन जब भी होगा मैं आऊंगा ही आऊंगा भाई जो कुछ भी हो जाए मैं मेरा जो दुकान है उसमें से वो और किसी को दे दूंगा और रिस्पांसिबिलिटी उतना आधा घंटे के लिए 1 घंटे के लिए राम नाम तो मुझे आना ही आना है इस तरह से वो एक उत्साह राहत है उत्तेजना रहती है एक नया नया दीक्षा है तो वो गुरु भाई फिर जल्दी मठ में चले गए बीच बीच में कभी तो गुरु महाराज का फिर वो प्रणाम कर लिया या तो फिर महाराज जी प्रेसिडेंट महाराज जी हमारे ऑर्डर में जैसे दीक्षा देते हैं तो फिर से कभी आश्रम में आए फिर से दीक्षा देने के लिए तो फिर से उनको प्रणाम किया फिर से उनका प्रवचन किया तो उसे समय शुरू शुरू में तो बड़ा ही उत्साह राहत है किंतु जैसे-जैसे दिन चलते जाते हैं जैसे जैसे पावर प्लेन हमारे यह जो रिस्पांसिबिलिटी संसारी को वो हमको लगता है की इतनी बाढ़ गई है की अभी वो पहले तो ठीक किया था की आरती में प्रतिदिन जाएंगे वो नहीं हुआ फिर ठीक किया की राम नाम संकीर्तन कभी नहीं छोड़ेंगे वो भी चला गया फिर ठीक किया की ठाकुर जी की थी पूजा कभी नहीं छोड़ेंगे उसमें तो एटलिस्ट जाएंगे ही जाएंगे वो भी धीरे-धीरे छठ गए तो देखिए ये जो ध्यान निष्ठा अर्थात की ये जो हमको मंत्रम मिला है मंत्र को नियमित रूप से जाप करना और जब करने के लिए जो हमको ये एक प्रेरणा चाहिए एक हमको एक बूस्ट चाहिए उसके लिए नियमित रूप से आश्रम में आना शुरू में तो होता है मंत्र लेने के बाद में फिर धीरे-धीरे करके सब ठंडा होता जाता है तो ये ध्यान निष्ठा जिसमें है वो सदगुण कितना जनों का उसका अच्छे गन होंगे कितने जनों का उसका सुपर होगा अच्छे कर्म उसने किया होंगे तब कहानी जाकर के यह तीन जो आ सदगुण है आस्तिक्य बुद्धि पर लोग चिंता और ध्यान निष्ठा यह हमारे में डेवलप होते हैं किंतु देखिए महाराज जी क्या कहते हैं आस्तिक के बुद्धि पर लोग चिंता ध्यान निष्ठा वगैरा सदगुण राशि को निर्मल करने के लिए वर्तमान युग में अशरफ्ता जड़वाड़ प्रियता भोग परायणता प्रकृति वगैरा आसुरी भुरावली के युद्ध की घोषणा की है यह तीन सदगुण बताए हैं और तीन दुर्गुण बताए हैं तीन सद्गुणों के ऊपर में तीन दुर्गुणों ने आधुनिक युग में युद्ध घोषित किया है तीन दुर्गुण क्या है और श्रद्धा अश्रुद्ध जैसे की हमने देखा की आस्तिक के बुद्धि है तो फिर नास्तिक के बुद्धि आजकल लोगों की नहीं होती आजकल हम लोग बड़े स्मार्ट हो गए पहले के जमाने में ऐसा था की वो जैसे वो बोल देगा की ये भगवान है नहीं क्या भगवान भगवान कर रहे हो ये सब गलत चीज है आजकल हम लोग कहेंगे की मेरे में नास्तिक के कोई नास्तिक कोई नहीं है सब लोग आस्तिक है सबको पता है की भगवान है भगवान में विश्वास कर दो थोड़ा सा बहुत हो जाकर के मंदिर में थोड़ा सा दक्षिण दे दो भगवान ठंडा हो जाएंगे भगवान शांत हो जाएंगे और हमारा कम चल जाएगा ऐसा भगवान को कैसे भी तरह करके वो माना लो बात हो गया खत्म तो असद नास्तिक बुद्धि नहीं है मतलब भगवान नहीं है ऐसा हम लोग कभी नहीं मानते किंतु भगवान जो सही है वो कनविक्शन नहीं होता इसलिए जो नास्तिक आस्तिक के बुद्धि है उसका विरोधाभास महाराज जी ने नास्तिक के बुद्धि नहीं कहा कहा है आश्रद्धा भगवान है किंतु भगवान सही सही है वो कन्वैक्शन नहीं है वो श्रद्धा नहीं है इसलिए कहा अशरफ था मां लिया की भगवान है तो जाकर के थोड़ा सा उनको ध्यान दक्षिण देकर के थोड़ा बहुत करके उनको शांत कर लो की जैसे की मेरे जीवन में कुछ अजीब ना कर ले बस बाकी का मैं अपने से चला लूंगा मैंने नास्तिक नहीं हूं किंतु मेरे में कनविक्शन नहीं है मेरे में श्रद्धा नहीं है इसलिए ये एक दुर्गुण हो गया अशरफ था जड़वाड़ प्रियता यह जो परलोक वध की जो चिंता करते हैं की यह जगत के अलावा और एक जगत है बैकुंठ है एक चिड़कस है जिसके भीतर में भगवान विष्णु या तो फिर यह ब्राह्मण है जिसका मुझे साक्षात्कार करना है जिनका मुझे दर्शन करना है उसका विरोधाभास क्या हो गया जड़ वध प्रियता की ये मटेरियल वर्ल्ड यह जो यह लोग जो है जो की मुझे नजरों से दिखाई दे रहा है जो की मेरी इंद्रियों को बाहर रहा है मेरी इंद्रियां जिसके पीछे ललई थे जिसके लिए ललई थे ये मटेरियल वर्ल्ड तो जड़ वध प्रियता वो है होगा परलोक होगा उससे मुझे क्या है जब मिलेगा तब मिलेगा अभी तो मैं इस जड़ जगत में हूं अभी तो मेरी इंद्रियां इनको इनके लिए इनको बड़ी रखती है बड़ी ही तृष्णा रखती है तो फिर इनका ही बुक कर लो बाद में फिर पढ़ लोग देखा जाएगा पहले इस जगत का बैंक बैलेंस ठीक कर दो बाद में पर लोग का बैंक बैलेंस किया जाएगा और भोग परायणता यह भोग परायणता अर्थ यह सब एक ही तरह के शब्द है एक ही तरह के गन है उनके भीतर में डिफरेंस से किंतु हम लोग समझ सकते हैं की भगवान प्रियता क्या है हमने भोग परायणता मां सब समय भोग के पीटर में वह लिपट राहत है वो भोग परायणता वगैरा ये सब आसुरी गन है वो देवी गन है तो आसुरी गुना ने देवी गुना के ऊपर में युद्ध की घोषणा की है इस आधुनिक युग में महाराज जी आगे लिखने हैं एवं जहर फल धर्मवीर ग्लानि अधर्मीर वृद्धि एवं इरशाद विश कांपृति आधिक्य अधिक्यावश्यक लोकसायक्करी युद्ध विग्रह संगठित हुई ते छे यह कलर देवासुर संग्राम यह जो दुर्गुण राशि ने सदगुण राशि के ऊपर में युद्ध की जो घोषणा की और इसके परिणाम से धर्म की ज्ञानी होती है धर्म की वृद्धि होती है और इरशाद द्वेष कम वगैरा दुर्गुणों की बढ़ोतरी होती है उससे क्या होता है लोकोक्षयकारी युद्ध विग्रह संगठित हुए थे इससे क्या होगा की भीतर में यदि आसुरी गुना की प्रबलता बाढ़ जाएगी तो बाहर के जगत में हम लोग दूसरों का धन ग्रहण करले के लिए दूसरों को कष्ट देने के लिए हम बाहर में युद्ध करेंगे भीतर में यदि लोगों का विजय हुआ तो हम बाहर में युद्ध छेद देंगे क्योंकि मेरे भीतर में भोग प्रिया इतनी बाढ़ गई है की मेरे खुद के पास में जो धनु भाई बहुत संपत्ति है भोगो की जो चीज हैं इससे मुझे अभी ये नहीं होता अब मैं संतुष्ट नहीं हूं मुझे और भी ज्यादा चाहिए मुझे और भी ज्यादा वैभव चाहिए मुझे और भी ज्यादा वो भोग चाहिए तो अभी मेरे पास नहीं है तो दूसरों से मैं जबरदस्ती छन लूंगा भीतर में यदि आसुरी प्रवृत्तियां की बढ़ोतरी होती है तो बाहर में संग्राम छिड़ जाता है संग्राम या तो क्राइम या तो फिर दूसरों को कष्ट देने की प्रवृत्ति बाहर के जगत में बाढ़ जाति है कलर देवासुर संग्राम यही है इस युग का देव असुर संग्राम तो आज यही तक कल फिर से हरे