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Meditation ·

Meditation || rewrite your past || 15 Dec 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः

धारणा : ध्यान का प्रथम सोपान — stick and carrot : प्रलोभन और शासन

मेडिटेशन के बारे में हम लोग बात कर रहे थे जो योग सूत्र के अनुसार ध्यान की या तो मेडिटेशन की जो डेफिनेशन ेशन तीन स्टेजेस में योग सूत्र में इसको बांटा है। धारणा, ध्यान और समाधि। उसमें से सबसे पहला है धारणा। तो धारणा की डेफिनेशन क्या है? योग सूत्र में पतंजलि के देशबद्ध चित्तस्य धारणा। देश अर्थात कि एक ऑब्जेक्ट। उसके ऊपर में अपने चित्त को बांध देना। वह है धारणा। अर्थात कि मान लीजिए कि मैं एक इमेजिनेशन कर रहा हूं कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में मैं बैठा हुआ हूं। ठाकुर का कमरा देखा होगा तो आपने देखा होगा कि किस तरह से यहां पे एक दरवाजा है जो काली मंदिर से आने के समय प्रवेश करने का एक दरवाजा। इसके बाद में सामने ही आपको दो कोट दिखते हैं। दो बेड दिखते हैं। एक थोड़ा सा हाइट में बड़ा है, एक हाइट में छोटा है। तो बड़े वाले कोट पर ठाकुर शयन करते थे। छोटे वाले कोर्ट पर बैठकर के ठाकुर वार्तालाप किया करते थे। तो वह दो कोर्ट है। इसके बाद में आप देखेंगे कि गंगा की ओर बाहर जाने का एक रास्ता है जो कि उद्यान पथ और फिर गंगा नदी की ओर ले जाता है। और फिर यहां पर पंचवटी की ओर नहबत की ओर एक जाने का रास्ता है। दरवाजा है। तो इस तरह से ठाकुर का कमरा है। तो हम लोग इस तरह से ध्यान कर सकते हैं कि मैं वही ठाकुर के कमरे में बैठा हुआ हूं। मेरा जो फेवरेट स्पॉट है वह जो गंगा की ओर जो दरवाजा खुलता है वहां पे तो एक ओर यहां पे मैं भीतर में देखूंगा तो देखूंगा कि वह कोर्ट के ऊपर में ठाकुर बैठे हैं और फिर उस उनके जमीन पर ही हम भक्त लोग बैठे हैं भक्तों में भी एक है स्वामी जी एक है राजा महाराज एक है महापुरुष महाराज एक है अखंडानंद जी महाराज वही जो सब स्टोलवाट अपने संग के स्पिरिचुअल जयंट्स वह सब तो उस समय युवक थे तो वहां पर ठाकुर के सामने बैठ के ध्यान कर रहे हैं। वहां पे बड़ी कोर्ट पर ठाकुर है और फिर यहां पर मैं बाहर में नजर करता हूं तो सुंदर गंगा और यह उद्यान और वातावरण इतना सुंदर मुझे दिख रहा है। तो यह एक हो गया ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन। देश बंध चित्तस्य धारणा देश अर्थात कि एक ऑब्जेक्ट यहां पर मैंने दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे को ऑब्जेक्ट के रूप में सेलेक्ट किया है। अभी मैं अपने चित्त को बार-बार इस ऑब्जेक्ट के ऊपर में बांधने का प्रयास करूंगा। हमने ऑलरेडी देखा था कि देखिए कि अपना जो ब्रेन है वो है पाकिस्तान और अपना हार्ट है वह है इंडिया। तो हृदय में हमेशा हार्ट में ही ध्यान करना चाहिए। और यह जो अपना ब्रेन या तो माइंड जो है वहां से कंटिन्यूस नेगेटिव थॉट्स यह टेररिस्ट की तरह अपने हार्ट में इनफिल्ट्रेशन करने का प्रयास करते हैं। तो हमको एक पक्का बॉर्डर सिक्योरिटी चाहिए जो कि इस टेररिस्ट को इस नेगेटिव थॉट्स को अपने हृदय में प्रवेश ना करने दे। तो देखिए कि यह स्टिक एंड कैरेट अप्रोच हो गया कि एक तो है कि मुझे ध्यान करने के समय अपने हृदय को एक ऐसा लुभाववना दृश्य देना है जिसके आकर्षण से मेरा जो अटेंशन है, मेरा फोकस है, मेरा कंसंट्रेशन है, वह उसी के ऊपर में पड़ा रहे। तो, वह तो हो गया कैरट पार्ट। और फिर हो गया स्टिक यानी कि लकड़ी और गाजर। लकड़ी इस तरह से इसलिए रखनी है डंडा इसलिए रखना है कि यह ब्रेन में से जितने भी नेगेटिविटी है वह हार्ट में प्रवेश करने का प्रयास करती है और इसको हमको बलपूक रोकना है। एक स्ट्रांग बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स चाहिए। तो वह है स्टिक। तो स्टिक एंड कैरेट एक लुभाववना दृश्य और ब्रेन में से जितनी भी नेगेटिविटी आने का प्रयास करती है मेरे अटेंशन को जितनी भी बार डिसररप्ट करने का प्रयास करती है उतनी ही बार यह स्ट्रेंथ जो है मेरी संकल्प शक्ति वह संकल्प शक्ति इस नेगेटिविटी को रोक करके रखे। तो यह हो गया धारणा का स्टेज। इसके बाद में आता है

ध्यान : ध्यान का द्वितीय सोपान — मन की एक-तानता

ध्यान। देखिए यह स्टिक एंड कैरेट वाला अप्रोच यदि अपना काम कर जाता है। यदि यह एक लुभाववने आध्यात्मिक आनंद देने वाले मन को शांत करने वाले शीतल करने वाले अपने को आशीर्वाद से भर देने वाले इस दृश्य पे अपना मन आ जाता है और फिर जितना भी डिसरप्शन खड़ा करने का अपना ब्रेन प्रयास करता है तो अपना विल पावर इतना स्ट्रांग है कि प्रत्येक इनफिल्ट्रेशन को मैं बॉर्डर पर ही वहीं पर उसको उसको खत्म कर दूं तो क्या होगा कि स्टिक एंड कैरेट वाला एप्रोच सक्सेसफुल हुआ और यह जो मैं अपने चित्त को बांधने का प्रयास कर रहा हूं बार-बार बांधने का वो बांधने की क्रिया जो है मैं फोर्सफुली जो अपने चित्त को रीडायरेक्ट कर रहा हूं डिजायर्ड ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन की ओर वह बांधने की क्रिया में से अभी सहज एक तरह का प्रवाह बहना शुरू होगा। तत प्रत्यय एक तानता ध्यानम इस ऑब्जेक्ट जिसको कि मैंने सिलेलेक्ट किया ठाकुर का कमरा उसके प्रति मेरा मन मेरा अटेंशन जो है एक तान में एक लय में एक प्रवाह में एक सुर में उसी की ओर बहता है। मुझे यह स्टिक और कैरट की अभी इतनी ज्यादा जरूरत नहीं जितनी कि मुझे यह धारणा के फेज में थी। अभी ऑकेजनली इन दोनों को यूज करना है। वरना ध्यान वाले स्टेज में तत प्रत्यय एक तानता ध्यानम इस ऑब्जेक्ट के ऊपर में एक तान होकर के एक सुर में मेरा मन का प्रवाह मेरा अटेंशन जो है वो बहता रहेगा।

समाधि : ध्यान का तृतीय सोपान — स्वरूप शून्यम्-इव

और उसके बाद में होता है तत तदैव अर्थ मात्र निर्भाषसम स्वरूप शून्यमीव समाधि अर्थात कि सिर्फ ऑब्जेक्ट ही रहेगा बाकी सब मेरा जो मैं है यह अदृश्य हो जाएगा ठाकुर का कमरा ही रहेगा ठाकुर ही रहेंगे यह जो गुरु भाई थे नरेंद्र राखाल लाटू सुबोध हरी शशि शरद वही बैठे हुए हैं किंतु मैं उस कमरे में से अदृश्य हो गया। बस वही ठाकुर और वही गुरु भाई ही रह गए। तो फिर हो गई समाधि। तो यह एक ट्रेडिशनल मेथड ऑफ

द्वैत ध्यान -- धारणा, ध्यान, समाधि एक साथ कैसे कार्य करते हैं? (उदाहरण सहित व्याख्या)

मेडिटेशन। वैसे इंस्टिंक्टिवली हम सबको पता ही है कि हां आप जप भी करते हैं तो जप में भी क्या है? गुरु ने एक जो मंत्र दिया है ओम नमः शिवाय। फॉर एग्जांपल तो मैं कंटीन्यूअस अपने मन को इस मंत्र के ऊपर में एकाग्र करने का प्रयास करूंगा। ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ऐसा कंटीन्यूअस जप करूंगा और जितनी भी बार और कोई विचार आएगा उसको मैं भगाने का प्रयास करूंगा। तो यहां पर भी देश बंध चित्तस्य धारणा एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपने मन को अपनी एकाग्रता को बांधते हैं। जोर जबरदस्ती करके स्टिक एंड कैरेट वाले एप्रोच से बांधना पड़ता है। उसके बाद में जब जप करते-करते मन लग जाता है। मां का देखिए कि वहां पर नहबत में बैठे-बैठे जप करती थी। तो जप करते-करते ऐसा मन उसमें लग गया था। एक एक लाख जप मां प्रतिदिन किया करती थी। मां खुद कहती है कि एक बार यह छले जोगेन अर्थात कि हमारे योगानंद जी महाराज यह दो योगेन थे तो एक तो योगेन मां थी एक तो योगानंद जी थे तो योगेन मां को मां कहती थी मैं जोगेन अर्थात कि स्त्री योगेन और छेले जोगेन अर्थात कि लड़का योगेन और लड़की योगेन तो यह जो छले योगेन अर्थात कि हमारे योगानंद जी महाराज मां कहती है कि मैं जप कर रही थी जप में मन ऐसा डूब गया कि मेरा आंचल जो है वह हवा में उड़ता जा रहा है। मुझे पता नहीं। चांदनी का प्रकाश है शीतल यहां पर ठाकुर है। अपने कमरे में मां काली स्वयं जाग्रता गर्भगृह में मंदिर में विराजमान है। पुण्य सलीला गंगा भागीरथी बह रही है। इस तरह का सुंदर स्वर्गमय वातावरण में मां का मन कहीं अपने स्वस्वरूप में स्थित हो गया। तो मां कहती है कि वह जो योगेन वहां से जा रहा था उसने इस अवस्था में मुझे देखा था और मुझे होश ही नहीं है कि कोई इस तरह से आ रहा है या जा रहा है। तो देखिए कि जप में मन एक बार लग गया तो फिर देखिए वो ध्यान में परिणत हो जाता है ऑटोमेटिक। तो कोई भी तरह की आप मेडिटेशन मेथड है वो बोधी धर्म जो कि भारत में से बुद्धिज्म चाइना में ले गया उसकी फेमस यह कहानी है कि कितने सालों तक 20 साल ना कि समथिंग उसने एक गुफा में रहकर के ध्यान किया। ध्यान कैसे किया कि गुफा की दीवाल में एक काला एक बिंदु है तो उसी के सामने वह देखता रहता है। उसको छोड़ के और किसी चीज के सामने देखेगा नहीं। एक तरह का त्राटक कहो इस तरह से तो कंटीन्यूअस इस तरह से ध्यान करके उसने सिद्धि प्राप्त की थी। यानी कि हमेशा देखिए कि ध्यान जो होता है उसकी डेफिनेशन में ही आता है देश बंध चित्त। तीन ऑब्जेक्ट है। एक तो है अपना चित्त यानी कि अपना कॉन्शियसनेस। फिर है देश अर्थात कि एक ऑब्जेक्ट और बंध अर्थात कि अपनी कॉन्शियसनेस को एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में बांधना है। यह हो गया ध्यान का फंडामेंटल मूल सूत्र। यह कितनी जितनी भी तरह की यह आध्यात्मिक साधना की मेथड है। यदि हम पूजा करते हैं तो पुजारी महाराज की एकाग्रता है। वह पूजा के जो उपकरण है, मंत्रोचार है, सामने देवता जो बैठे हुए हैं, साक्षात विराजमान है, यही सबके ऊपर में उनका मन एकाग्र होगा। यदि आप कर्म योग कर रहे हैं तो आपका मन एक तरह का सेल्फ एनालिसिस सेल्फ रिफ्लेक्शन करना चाहिए। जैसे मैंने बताया था कि रांची के दिनों में मैं सब समय यह अवेयर रहता था कि मैं जो कार्य कर रहा हूं इस कार्य के पीछे कहीं नेम एंड फेम की एक वासना तो कहीं प्रवेश नहीं कर गई है। जो लोग गलती कर रहे हैं उसके ऊपर में मैं कहीं क्रोध तो नहीं कर रहा हूं। जो कोई एक ऑब्जेक्ट ऑफ डिजायर अपनी नजर में आ जाता है तो मन में कहीं विकार तो प्रकट नहीं होता है। यह कंटिन्यूस सेल्फ एनालिसिस हमको करना होगा यदि हम कर्म योग करना चाहते हैं। यहां पर सिर्फ यह बात नहीं है कि आप लोगों की सहायता के लिए कर्म करते हैं। सिर्फ उससे कर्म योग नहीं होगा। कर्म योग तब होगा जबकि आपका मन शुद्ध पवित्र रहता है। थ्रूउ योर पीरियड ऑफ एक्शन। तो वह एक सेल्फ एनालिसिस वह भी तो एक तरह का धारणा ही है कि मन को अपने रिएक्शन के ऊपर में बांधा है। उसको एनालिसिस कर रहे हैं। तो और फिर यह ज्ञान योग में देखिए कि स्मरण मनन निध्यासन वेदांत की जो मेथड है उसमें भी वही महावाक्य का स्मरण करना है। महावाक्य पर मनन करना है। उसके ऊपर में निध्यासन करना है। अर्थात कि उसको अनुभूत करने का या तो उसके साथ में एकात्मता स्थापित करने का प्रयास करना है। तो देखिए कि जितनी भी यह मेथड्स ऑफ मेडिटेशन है सब चीजों में तीन रहते हैं। एक तो हूं मैं यानी कि सब्जेक्ट दूसरा है कि ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन और तीसरा है कि मेथड ऑफ मेडिटेशन दैट इज टिक एंड कैरेट। बेसिकली यही दो मेथड है। पुजारी महाराज देखिए अपने गर्भगृह में देवता को इतना सुंदर रूप से सजाया क्यों जाता है? फूल है, ये फिर यह अगरबत्ती है, धूप है, दीप है। इस सब चीजों से क्यों देवता को सजाते हैं? इसके पीछे का साइकोलॉजी वही है। मंदिर में आप बैठे हैं तो देवता को इतना सुंदर रूप से सजाया गया है कि आपका मन कहीं 10 चीजों में नहीं जाएगा। वही उन्हीं के ऊपर में रहेगा। मुझे याद है। वैसे जनरली अपने मंदिर में दीप देकर के भगवान ठाकुर को नहीं सजाते। वैसे आरती के समय दीप रहता है। वह प्रज्वलित रहता है। किंतु वह थोड़ा सा दूर में जहां पर पुजारी महाराज पूजा करते हैं वहां पर रहता है। किंतु लास्ट टाइम दीपावली के दिन यहां पे पुजारी महाराज ने क्या किया था कि वह जो दीप स्तंभ जो आते हैं तो दीप [गला साफ़ करने की आवाज़] स्तंभ अर्थात कि दो-ती फीट की हाइट वाले जहां पे आप दीप रख सकते हैं। इस तरह के सुंदर वो आते हैं मेटल के वो। तो इस तरह से चारों ओर ठाकुर को रखा था और प्रत्येक को चारचार पांचप प्रदीप से प्रज्वलित किया था। तो ठाकुर को प्रदीप से प्रज्वलित करना यह मैंने पहली बार देखा। मुझे याद नहीं आ रहा है कि राजकोट में इस तरह से करते थे या और कहीं पर मैं जहां पर रहा हूं। यह मैं पहली बार देखा कि दीपावली के दिन ठाकुर के सामने इतने सारे प्रदीप रखे हैं कि इतना खूबसूरत लग रहा है। माने पुष्प से सज्जित ठाकुर को देखते हैं। वह जो एक आनंद आता है पुष्प माल्य धूप इन सब चीजों से ठाकुर को सजाते हैं। तो उनको देख के जो आनंद आता है उससे कहीं ज्यादा आनंद वो चाहे नोवेल्टी की वजह से हो कि सही-सही में हो मुझे बहुत अच्छा लगा था। तो देखिए कि धूप दीप माल्य इस तरह से फूल पुष्प इस तरह से ठाकुर को सजाते हैं। इसीलिए कि वह मन प्रलोभित होकर के ठाकुर पे ही पड़ा रहे और कहीं ना जाए। तो स्टिक एंड केयरट यही एक मेथड है अपने मन को वो जो ईश्वरीय ऑब्जेक्ट है उनकी समीप ले जाने का। किंतु देखिए यह तो हो गया द्वैतिक मेडिटेशन जहां पर दो है द्वैत मैं हूं सब्जेक्ट है और ऑब्जेक्ट है ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन और यह मेडिटेशन की प्रक्रिया है। सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट एंड दिस प्रोसेस ऑफ मेडिटेशन। तो यह द्वैतिक कांसेप्ट है।

अद्वैत ध्यान -- हम अपना अतीत बदल सकते हैं: we can rewrite our past

अद्वैतिक कांसेप्ट क्या है? पता है कि मैं सब्जेक्ट ही हूं। मुझे यह स्वीकार ही कर लेना है। मुझे यह एक दृढ़ रूप से मान्यता दृढ़ रूप से एक संकल्प कर लेना है कि यह जन्म जन्मांतर की यात्रा कि कितने मेरे भूतकाल के दुष्कर्म है, कुकर्म है, उसके फलों का जो बंधन है, उसको काटते काटते मैं कहां एक समय आएगा कि सब ऑब्जेक्ट के साथ में मेरा मन का संगम होगा। एक ही कृत्य होगा। उनका एक दूसरे में विलयन हो जाएगा। स्वरूप शून्यम इव यह जो समाधि की जो डेफिनेशन कही गई है तो यह जो मेरा स्मॉल आई है छोटा अहम है मन बुद्धि चित्त अहंकार का यह जो कॉम्प्लेक्स है वो विलीन हो जाएगा। मैं भूल जाऊंगा कि मैं इस दिन मेरा जन्म हुआ था। इस घर में मैं पला बड़ा था। इस तरह के मेरे संस्कार, मेरा एजुकेशन, मेरा नेटवर्थ या तो मेरा सोशल कैपिटल, सोशल रिकॉग्निशन यह सब है सब कहां हवा हो जाएगा? स्वरूप शून्यव तदैव अर्थ मात्र निर्भासम सिर्फ ऑब्जेक्ट ही रहेगा। ठाकुर कहते हैं ना कभी मैं सोचता हूं कि आमी आमी मैं मैं हूं और तुम ही तुम ही और तुम तुम हो। कभी मैं सोचता हूं मैं मैं हूं और तुम तुम हो। और कभी हो जाता है तुम ही तुम ही होए जाए। तुम ही तुम हो ऐसा हो जाता है। तब उस समय मैं कहां हूं यह मुझे खोज करके भी नहीं मिलता। तो दैट इज द समाधि की अवस्था। पहले मैं कहता हूं कि मैं भक्त हूं। मैं संतान हूं। मैं साधक हूं। मैं योगी हूं। मैं कर्म योगी हूं। मैं वेदांती हूं। मैं भक्त हूं। यह जो भी अपने को उपाधि देते हैं साधक और यह इष्ट है ईश्वर है ना कि फिर यह ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन है ना कि जो सेवा के दरिद्र नारायण है जिनकी मैं सेवा कर रहा हूं। यह ऑब्जेक्ट सब्जेक्ट डिवीजन रहता है। किंतु अद्वैत मेडिटेशन आप यदि करते हैं तो आप यह स्वीकार कर लीजिए कि जिसको आप ईश्वर कहते हैं या तो फिर जिनको आप आत्मन कहते हैं, ब्राह्मण कहते हैं, जिनके साथ में एकीकृत होना जन्म जन्मांतर की यात्रा है, वह जैसे कि समाप्त हो ही गई है, मैं वह हो चुका हूं। यदि यह एक उपमा हमने ली बहुत बार हम कहते हैं कि यह द्वैत मेडिटेशन को क्यों हम इतना सीरियसली लेते हैं? क्योंकि यह संस्कार का थ्यरी है। कर्म का थ्यरी है कि बड़ा स्पष्ट कहा गया है कि भूतकाल के जो कर्म है जो वो कर्म का भोग तो हमको भुगतना ही होगा। बस वही है कि भविष्य के जो कर्म है वह कर्म जो है वह अपने हाथ में है। यानी कि मान लीजिए पिछले 1000 जन्म जिसमें कि मैंने दुष्कृत किया है, कुकर्म किया है तो उसके यह जो ऑलरेडी जो तीर निकल गया है वो जो एरो जो है वह निकल गया है वो एरो निकला हुआ है उसको तो हमको भोग कर लेना होगा किंतु फिर जो भविष्य का कर्म है वह मेरे हाथ में है। कल मैंने क्या किया जो किया सो किया अभी उसका फल मुझे आज भुगतना है। किंतु आज मैं ऐसा कर्म करूं जो शुद्ध पवित्र कर्म अच्छा कर्म सुकृत कर्म करूं जो कि मेरा कल जो है आने वाला कल वह सुधर जाए तो यह कर्म की थ्यरी अपने मन में ऐसी बैठ गई है कि हम लोग सोचते हैं कि मेडिटेशन हमेशा इसी तरह से सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट के भीतर में बंद करके ही रहेगा। मैं सब्जेक्ट हूं। मेरे जो भूतकाल के जितने भी कर्म है उसको मुझे भुगतना है और इसीलिए मेरा मन जो है मेरा ब्रेन जो है पाकिस्तान बनके बैठा हुआ है और यह बार-बार नेगेटिविटी फैलाता है तो मुझे इसको काउंटर करना है। कब तक? जब तक कि यह चित्त शुद्धि नहीं हो जाती तपस्या करके जप ध्यान मेडिटेशन करके तब तक जैसे ही चित्त शुद्धि हो गई। साथ-साथ में ही मैंने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लिया। तो यह जो एक रैशन थिंकिंग जो है वह हमने काफी बार देखा है। किंतु देखिए अद्वैत वेदांत की दृष्टि से यदि हम ध्यान करने को जाएंगे तो सबसे पहला तो कांसेप्ट है कि कर्म का सिद्धांत ही मिथ्या है। यह भूतकाल में दुष्कर्म किए, उसका जो परिणाम है, उसका जो फल है, आज मुझे लगा हुआ है और इस फलों के जंजीर से कर्मों की जंजीर से जब तक मुक्ति नहीं प्राप्त होती है। जब तक चित्त शुद्धि नहीं होती है तब तक ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा। सर्वप्रथम तपस्या करके चित्त शुद्धि करना है। फिर ब्रह्म ज्ञान ऑटोमेटिक मिल जाएगा। यह कांसेप्ट को ही भगा दीजिए। मेरा चित्त शुद्धि हो चुका है। मैं ब्रह्म ज्ञान में स्थित हो चुका हूं। यह दृढ़ रूप से मान करके हमको ध्यान करने को बैठना है। या तो फिर ब्रह्म रूप में स्थित होना है। क्योंकि जितनी भी बार मैं यह कहूंगा कि मुझे ध्यान करना है। ध्यान का प्रोसेस जहां पे भी आया वहां पे मैं स्वरूप आया। मेरा सब्जेक्ट आया। फिर ऑब्जेक्ट आया। जिसके ऊपर में मैं ध्यान कर रहा हूं। फट करके वह डलिटी में सेपरेट हो गया। किंतु मुझे ध्यान नहीं करना है। मुझे मेरा जो सही स्वरूप है उसका आनंद उठाना है। स्वस्वरूप में स्थित होकर के उसका उपभोग आनंद ही उपभोग करना है। यह हो गया अद्वैत मेडिटेशन। आप कहेंगे कि पिछले जन्म के कर्म, मेरे कल के कर्म, पिछले सप्ताह के कर्म, पिछले साल के कर्म, बचपन के युवानी के कर्म इसका क्या? तो यह भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों ही तो यह माया के राज्य में है। ब्रह्म ज्ञान में मैं स्थित हो गया। तो मैं यह भूत, भविष्य, वर्तमान की यह जो रेखा है उससे ऊपर उठ गया। जिस तरह से मेरा आने वाला कल मेरे हाथ में है, वैसे ही मेरा बीता हुआ कल भी मेरे हाथ में है। यह तो ऐसा हो गया कि जैसे देखिए कि कल अब जैसे कि मैं प्रतिदिन सुबह को क्लास लेता हूं। तो अभी इसका जो कर्म फल हुआ सो हुआ। अभी पिछले सप्ताह भी क्लास लिया था। पिछले महीने भी क्लास लिया था। अभी मुझे इसका कर्म फल जो कि पुण्य जो थोड़ा बहुत मिलता है मुझे नहीं चाहिए मुझे क्योंकि पुण्य मिलेगा तो स्वर्ग में जाऊंगा पुण्य भी नहीं चाहिए तो इसको काटने के लिए मैं क्या कर सकता हूं कल से मैं शायद क्लास लेना बंद कर दूंगा नहीं करूंगा किंतु जस्ट फॉर एग्जांपल कि यदि मैं कर देता हूं बंद तो इससे पुण्य जो होता है नहीं मिलेगा किंतु देखिए कि मैं तो यही सोचूंगा ना कि अभी इतने दिनों से तीन साल से जो मैं क्लास ले आ रहा हूं लेता आ रहा हूं उसका पुण्य तो संचित हुआ है तो फिर इसका क्या करें? किंतु अद्वैत मेडिटेशन में मेडिटेशन नहीं अद्वैत भाव में जैसे ही स्थित होते हैं तो मैं यह जो मेरा चॉइस है कि आने वाले कल का क्लास मैं ना लूं साथ में ही मेरे पास में यह भी चॉइस है कि पिछले तीन साल के जो क्लास लिए थे उनको सीधा मैं रीाइट कर सकता हूं। पास्ट को रीाइट कर सकता हूं। इसके पास्ट में जितनी भी घटनाएं हुई है सबको मैं रीाइट करके सबके कर्म जो है पुण्य कहो ना कि पाप कहो अच्छे कर्म कहो ना कि बुरे कर्म कहो उसको मैं अद्वैत भाव में स्थित होकर के काट सकता हूं। यह जो एक नॉर्मल थिंकिंग है अपना कि मान लीजिए कि मेरे 10 कर्मों को काटने के लिए मुझे एक सप्ताह तपस्या करनी है। 10 रे 10 एक कर्म को काटने के लिए एक दिन तपस्या करनी है। 10 कर्मों को काटने के लिए 10 दिन तपस्या करनी है। ऐसा यदि मैथमेटिक्स मेरे मन में बैठा हुआ है तो वह मैथमेटिक्स द्वैत के राज्य में है। अद्वैत कहता है कि 10 कर्म क्या 10,000 कर्म भी मुझे काटने हैं तो मैं 10 सेकंड में काट सकता हूं। मेरे पूरे भूतकाल को रीाइट कर सकता हूं। इस तरह से जैसे कि वह दुष्कर्म मैंने किए ही नहीं है। आज मुझे याद यदि ऐसा आता है कि एक समय था कि मैंने किसी के साथ दुर्व्यवहार किया था। अभी वह दुर्व्यवहार का जो दुष्कृति कर्म का जो जो बुरा फल है वह मेरे पर लगा हुआ है। अभी पता नहीं कितने साल मुझे लगेंगे इससे छुटकारा पाने के लिए। किंतु अद्वैत में स्थित होकर के वो जो घटना घटी थी उसी घटना को मैं रिवाइज रिवजिट कर सकता हूं। उसी दिन उसी समय जाकर के फिर से मैं इस घटना को रीाइट कर सकता हूं। जैसे कि उस समय उसने जो मुझे कुछ कहा बोलकर के मैंने उसके साथ में जो दुर्व्यवहार किया वह नहीं करके मैंने रिप्रोग्राम इस तरह से मेरी मेमोरी को किया है कि मैं उसके साथ में सत व्यवहार कर रहा हूं और सत व्यवहार करने का जो शुभ फल है वह मुझे प्राप्त हुआ है। यानी कि जो चीज आपको जन्म जन्मांतर साल साल लगेंगे कि पिछले दुष्कर्मों को काटने के लिए आज मैं तपस्या कर रहा हूं। उसकी वजह ब्रह्म भाव में स्थित होकर के हम उसी घटना को रिवजिट कर सकते हैं। उसी घटना को रीाइट कर सकते हैं। और उसके उस घटना से प्रकट हुए कर्म को काट करके अशुभ फल से शुभ फल में उसी समय परिणत कर सकते हैं। क्योंकि अल्टीमेटली ब्रह्म भाव में स्थित होते हैं तो यह पूरा जगत आपके सामने की प्रोबेबिलिटी की तरह खुल जाता है। कौन कहता है कि भूतकाल जैसे कि पत्थर पर अकी हुई लकीर है उसको आप मिटा नहीं सकते। पत्थर भी मिथ्या है। पत्थर पर जो आकी हुई जो लकीर है वह भी मिथ्या है। जैसे ही मैं ब्रह्म भाव में स्थित हो गया। मैं अपने भूतकाल को पूरा पूरा रीाइट करके सब तरह के कर्मों को काट सकता हूं। हमको करना क्या

अद्वैत ध्यान — मैं ही हूँ श्रीरामकृष्ण

है? ज्यादा कुछ नहीं करना है। वही भगवान श्री रामकृष्ण के कमरे में बैठे थे। मैं सब्जेक्ट था। श्री रामकृष्ण ऑब्जेक्ट है। उसकी वजह मैं ही सब्जेक्ट हूं। मैं ही श्री रामकृष्ण हूं। श्री रामकृष्ण होकर के श्री रामकृष्ण के कोर्ट के ऊपर में बैठा हूं। और उनके भीतर में जो प्रचंड वैराग्य, प्रचंड जो ज्ञान, प्रचंड भक्ति यह जो उनकी जो सद्गुण राशि है, गुणावली है, वह ऑलरेडी मेरे भीतर में प्रवेश कर चुकी है। यही मुझे सिर्फ अनुभूति ही करनी है। बैठकर के आनंद ही लेना है कि भगवान श्री रामकृष्ण के जितने भी पुण्य, उनकी जितनी भी साधनाएं, उनकी जितनी भी सद्गुण राशि है सब मेरे भीतर में प्रवेश कर चुकी है और मैं बस बैठकर के वहां पर आनंद कर रहा हूं। यदि मैं निराकार निर्गुण ब्रह्म की उपासना करता हूं तो सतचित आनंद यह जो ब्रह्म है वही सतचित आनंद में हो चुका हूं। यदि [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं इस तरह से ध्यान करता हूं कि यह जो सी शोर का मैं उदाहरण काफी बार देता हूं कि मैं समुंदर के किनारे बैठा हूं। यह विराट समुंदर मेरे सामने लहरें जो है समुंदर की आकर के टकराती है। खुला विशाल आसमान है और बिय्ड द होराइजोन यह जो सूर्योदय हो रहा है। तो जैसे कि मैं जो दो हूं कि यहां पर मैं एक साधु साधक बैठकर के समुंदर के ऊपर में सूर्योदय के ऊपर में यह पचरंगी बादल जो है उनके ऊपर में समुंदर की लहरों की तर्जन गर्जन जो है उसके ऊपर में ध्यान कर रहा हूं। उसकी वजह मैं ही समुंदर हो गया हूं। मैं ही यह विराट आसमान हो गया हूं। मैं ही यह जो होराइजन के परे जो उदय उदित हो रहा सूर्य हूं। मैं ही यह सुबह की शीतल हवा हूं। मैं ही यह सब कुछ विराट समुंदर बना हुआ हूं। और यह जो सौंदर्य और उसके साथ में मन की शीतलता, मन का आनंद, मन की प्रफुल्लता जो कि मैं पाने का प्रयास कर रहा था, वह मेरा स्वभाव ही है। वह मैं ही हूं। वह मैं हो चुका हूं। यह हो गया अद्वैत भाव में स्थित होना। देखिए, यह जो

क्या क्षणभर में ब्रह्मज्ञान संभव है? हमारी कंडीशनिंग ही हमें रोकती है

मैं पहली बार किसी किसी को बताता हूं, यहां पे मैं मेडिटेशन गाइडेड मेडिटेशन के क्लासेस कंडक्ट करता हूं। जब मैं पहली बार यह सब बताऊंगा, तो ये स्टूडेंट्स को थोड़ा सा आश्चर्य होगा कि क्या यह पॉसिबल भी है कि नहीं? यह थोड़ा सा काउंटर इंटूटिव नहीं लग रहा क्या? यदि यह इतना ही सहज है तो क्यों लोग मूर्ख की तरह अपने चित्त शुद्धि के लिए तपस्या करते रहते हैं? क्यों नहीं पहले से ही ब्रह्म भाव में स्थित हो जाते? क्यों हम साधु लोग यह गेरुआ पहन के, घर छोड़कर के, आश्रम में रह के तपस्या करते हैं, कष्ट करते हैं? क्यों नहीं हम संसार में ही रहकर के ब्रह्म भाव में स्थित हो जाते? यह हजार प्रश्न आ सकते हैं। मेरा तो सिर्फ इतना मानना है कि देखिए कि यह जो नेगेटिव कंडीशनिंग हमारा हो चुका है बचपन से लेकर के यह हिप्नोटिज्म जो हो चुका है हमारे ऊपर में बचपन से लेकर के एक तरह की नास्तिकता कि ईश्वर है ही नहीं। ब्रह्म वगैरह जो है बातों की बातें हैं। प्रत्येक घर में देखेंगे एक शाइन तो होगा ही और प्रत्येक घर में देखेंगे कि लोग भक्ति भाव से मंदिर में जाते भी हैं। किंतु फिर ठाकुर वो कहते हैं ना कि यदि पता चला एक चोर को कि बगल वाले कमरे में धन एक खजाना छुपा हुआ है तो वह चोर क्या शांति से सो पाएगा? वह कितना ही मेहनत करके ताला तोड़ेगा। भीतर जाएगा और खजाना हस्तगत करेगा। किंतु आप जब यह देखते हैं कि यह चोर बढ़िया मजे से सो रहा है। यह समाचार मिलने के बावजूद कि बगल वाले कमरे में खजाना पड़ा हुआ है और चोर सो रहा है शांति से। उसका दो ही अर्थ है। या तो चोर चोर नहीं है या तो फिर उसको यह बात पर विश्वास नहीं हो रहा है कि खजाना पड़ा है। हम सबके साथ में वही है। बचपन से मंदिर में जाना, पूजापा थोड़ा बहुत करना, उत्सवों का सेलिब्रेशन करना सब कुछ थोड़ा बहुत हम कर ही लेते हैं। किंतु यह जो जीवन समर्पित कर देना है, ईश्वर प्राप्ति के लिए, ब्रह्म साक्षात्कार के लिए वह नहीं करते हैं। मन पूरा संसार में ही पड़ा है। थोड़ा बहुत पाप ना लगे। मेरा सांसारिक जीवन सुख पूर्वक चले। वह सब चीजों के लिए थोड़ा बहुत मैं धर्म कर लेता हूं। किंतु मान लीजिए ऐसा एजुकेशन सिस्टम हो कि जहां पर सर्वप्रथम यह अद्वैत भाव में स्थित स्थित होना सिखाया जाए। प्रथम कक्षा से ही बाल मंदिर से ही तो देखिए कि यह लड़के स्टूडेंट है। बाय द टाइम वेलो ग्रेजुएट होंगे। कितना उनका मन जो है सुदृढ़ उनका चरित्र जो है कितना पावरफुल सक्षम हो जाएगा तो ये बचपन में यह सब नहीं किया बोलकर के ही इसलिए देखिए ना वैदिक युग में क्यों ब्रह्मचर्याश्रम गृहस्थ आश्रम इस तरह से था यदि बचपन में ही ब्रह्मचर्याश्रम हमने बाय द बच जन्म से लेकर 25 साल में ब्रह्मचर्या आश्रम यदि हम करके आते तो फिर क्या है गृहस्थ जीवन में मन की शांति यह जो आध्यात्मिक आनंद है वह हमारा सेकंड नेचर सेकंड नेचर कहां यह इंग्लिश शब्द प्रयोग है वो अपना रियल नेचर होकर के पढ़ा रहता किंतु ऐसा नहीं करके वैदिक एजुकेशन सिस्टम को हमने पूरा भूल ही गए बोलकर के आज हमारी यह परिस्थिति है कि जब बड़े हो जाते हैं सर के ऊपर में जवाबदारी आ जाती है मन में अशांति प्रकट होती है तब कहीं जाकर करके ध्यान कैसे करें? ऐसा पूछने को जाते हैं।

पश्चिमी प्रभाव से ग्रस्त एक लड़के से मेरी भेंट

इंटरेस्टिंगली यहां पे एक फैमिली आया था। एक मां अपने दो लड़कों को लेकर के आई थी। एक लड़का है, एक लड़की है। तो लड़का पढ़ाई कर रहा है नाइंथ स्टैंडर्ड में और लड़की पढ़ रही है सेवंथ स्टैंडर्ड में। तो हुआ ऐसा था कि मैं यहां पे एक कॉलेज है। वहां पे मैं लेक्चर देने को गया था। तो यह जो मदर थी वह वहां पर प्रोफेसर थी तो उसने मेरा लेक्चर सुना तो उनको लगा कि हां इनके साथ में बात की जाए तो मुझे मिलने के लिए शाम को आए साथ में अपने दो लड़कों को लेकर के आई है वो मर और आकर के मुझे कहती है कि यह जो मेरा लड़का है वो पता नहीं उसके मन में किस तरह का एक एंटी इंडिया भाव प्रवेश कर गया है। इतना यह वेस्टर्नाइज हो गया है यह सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंस से वगैरह से तो जितनी भी हमारी इंडियन कल्चर, इंडियन लर्निंग, इंडियन संस्कृति है सबके प्रति उसका एक अविश्वास हो गया है। तो मैं चाहती हूं कि उसको अच्छे संस्कार मिले। तो आप उसको कुछ समझाइए। तो मैं उस लड़के को देख रहा था। लड़का है, ब्रिलियंट लड़का है और यंग है नाइंथ स्टैंडर्ड यानी कि माइंड भी अभी फ्लैक्सिबल है बहुत कुछ सीखने के लिए। यदि वह चाहे तो अपना फ्यूचर कंप्लीटली एक धर्म के अनुसार बना सकता है। यह ध्यान वगैरह सीख करके अपने जीवन को संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दे सकता है। यह ओपॉर्चुनिटी है। ठाकुर के पास में जब आता है कोई तो ठाकुर उनको यह ओपॉर्चुनिटी देते हैं। अनफॉर्चूनेटली ज्यादातर लोग बड़ी उम्र में आते हैं ठाकुर के पास में जो कि बंगाल के बाहर है। बंगाली लोगों का क्या है कि वह घर का ही यह सब संस्कार है। बोल के उनकी बात अलग है। किंतु जो आउट ऑफ बंगाल है अब जैसे मैं मेरा जन्म हुआ गुजरात में तो इस तरह से इन लोगों को ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में इतना ज्यादा पता नहीं होता। उन लोगों का इस उम्र में नाइंथ में वह पढ़ रहा था लड़का। इस उम्र में ठाकुर के पास आना और यदि कुछ थोड़ा मेहनत करें तो ठाकुर को उनको पढ़कर के जीवन को परिवर्तित करने का इतना सुंदर मौका है। दिस इज द प्राइम टाइम फॉर दिस बॉय। यह इस उम्र में यदि कुछ कर लेता है तो भविष्य उसका कितना सुधर जाएगा। किंतु देखिए कि यह जो हिप्नोटिज्म जो है वेस्टर्न हिप्नोटिज्म इस लड़के पर ऐसा सवार है कि मैं वो मां बेचारी मुझे बता रही है कि महाराज देखिए मेरे लड़कों को आप कुछ बताइए ऐसा करके वो मुझे बता रही है। फिर लड़के को बार-बार बोल रही है कि तुम महाराज को कुछ प्रश्न करो। तुम घर में ये जो सब बोलते रहते हो एंटी इंडिया सब बातें ये अपना कल्चर किसी काम का नहीं। अपनी संस्कृति किसी काम की नहीं। ये जो पूरे वेस्टर्नाइज हो चुके हो। महाराज को प्रश्न करो। तुम तुमको क्या पूछना है? अपने कल्चर के बारे में, हिस्ट्री के बारे में, अपने रिलीजन के बारे में, संस्कृति के बारे में पूछो महाराज को। वो लड़का उसकी मां ऑलमोस्ट हाफ एन आवर तक बैठी थी। एक शब्द मुंह से नहीं निकालता। एक शब्द नहीं निकालता। अभी देखिए मेरा उसके ऊपर में सिंपैथी भी हो रहा है। एक समय था कि मेरी भी ऐसी परिस्थिति थी। यह वेस्टर्न एक थिंकिंग, एक सेकुलर थिंकिंग से मैं इस तरह से प्रभावित हो गया था। कि जो कुछ भी इंडियन है यह अपना हिस्ट्री है, अपना कल्चर है, अपना ट्रेडिशन है, रिलीजन है, अपनी सोसाइटी है। सबके प्रति एक तरह का तुच्छ भाव हो गया था मेरे मन में। किंतु देखिए ठाकुर की कृपा से जैसे ही मैंने ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ना शुरू किया, यह सब जितना भी हिप्नोटिज्म है, सब मेरे माइंड में से चला गया। तो किंतु क्या है? देखिए, मुझे लंबा टाइम लगा। दूसरा कि मेरे मन में यह डिटरमिनेशन था कि ना कैसे भी करके सत्यानुसंधान करना है। किंतु इस लड़के को देख के ऐसा लगता था कि जैसे स्केप्टिसिज्म होना अच्छा है। वह तो मैं हमेशा वेलकम करता हूं कि प्रश्न करो क्वेश्चन करो। डाउट संदेह जैसे स्वामी जी ने भी ठाकुर पे इतना संदेह किया था। बहुत अच्छा है। किंतु साथ में ही अपने में वह एक स्ट्रेंथ होनी चाहिए कि संदेह करने के बाद में प्रश्न करने के बाद में उसको इन्वेस्टिगेट करके एक लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचा जाए। मैं एक प्रजुडाइस लेकर के अपनी संस्कृति के प्रति अपने धर्म के प्रति अपनी यह साधन पद्धतियों के प्रति एक तरह का प्रजुडाइस लेकर के यदि बैठ जाता हूं हमेशा के लिए तो फिर क्या होगा ना कि पूरा अभी तो यह लड़के को पता नहीं कि जीवन कितना टफ है। बड़ा होगा शादी ब्याह होगा। जिम्मा जब आएगा सर के ऊपर में वृद्ध थोड़ा सा होगा। देह जो है धीरे-धीरे करके वह फिर गड़बड़ करना शुरू करेगा। तब पता चलेगा कि देखिए कि धर्म आध्यात्मिकता थोड़े से यंग एज में किया होता तो आज हमको मन से कितनी शांति मिलती। धन से इतनी शांति आपको कभी नहीं मिलने वाली है जितनी कि यह शरणागति और मन की एकाग्रता से चरित्र की शक्ति से जो मिलती है। तो वह सब चीजें देखिए उसके पास में एक गोल्डन अपॉर्चुनिटी था। आधा घंटा वो बैठा था और मैं उसकी मां के साथ में ही बात कर रहा हूं क्योंकि बिकॉज़ के मैं खुद इस तरह की एक परिस्थिति में रहा हूं कि सभी चीजों के प्रति डाउट तो कोई आकर के मुझे कुछ बताता भी ना मैं उसको कभी स्वीकार नहीं करता। मुझे अपने से स्टडी करके मैंने स्वीकार किया है। किसी के कहने से मैंने कुछ स्वीकार नहीं किया। तो मैं यह लड़के को परफेक्टली समझ सकता हूं कि हां वो मुझे किस दृष्टि से देखता है। मैं उस उम्र में था तो मैं साधुओं को किस दृष्टि से देखता था। वो निकम में है। समाज के ऊपर में बोझा है। मुफत में खाते हैं और कुछ काम नहीं करते। कुछ कंट्रीब्यूट नहीं करते। लोगों में अंधश्रद्धा फैलाते हैं। वो मैं सोचता था और मुझे स्पष्ट दिख रहा है कि वो लड़का मेरे बारे में एग्जैक्टली वही सोच रहा है। तो मैं उसको तो कुछ नहीं बोल रहा हूं। अंटिल एंड अनलेस वो प्रश्न करे। मैं उत्तर देने से या तो फिर सीधी उसके साथ बात करने से कोई काम नहीं है। कोई लाभ नहीं है। उसकी मां के साथ में ही मैं बात कर रहा हूं। मां उसको बार-बार कह रही है तुम महाराज को प्रश्न करो कुछ प्रश्न करो कुछ बोलो कुछ बोलो वो आधा घंटे में एक शब्द भी उसने नहीं निकाला सो आई सिंपथाइज हिम इन वन वे कि मैं भी उस परिस्थिति में था किंतु देखिए कि वो एक

श्रीरामकृष्ण साधन मार्ग : ब्रह्मज्ञान और उल्लसित भक्ति का संगम

युग था कि हम सब एक डाउट में से प्रसार होकर के अभी एक आध्यात्मिक रास्ते पर आए हैं। लेट अस रीइजीनियर द सोसाइटी। हम लोग क्यों इस तरह की एक ऐसी परिस्थिति में एक ऐसी सिचुएशन में बैठे हैं कि हम सबको डाउट हो जाता है अपनी संस्कृति के प्रति क्यों हम सबको हमारे धर्म अध्यात्म हमारे महापुरुष हमारे अवतार हमारे गुरुजन हमारी संस्कृति हमारी भाषा संस्कृत भाषा क्यों इस पर संदेह हो योग वेदांत क्यों उस पर संदेह हो बचपन से ही बच्चों को यह ब्रह्म भाव में स्थित होना सिखाना होगा। कहिए कि आपने जो पाप किया है हजा फट करके बोलिए। मुझे पाप किस बात का? मैं श्री रामकृष्ण का संतान हूं। मैं वेदांत का वेदांत मेरी रगरग में बह रहा है। देखिए ठाकुर का भक्ति भाव ठाकुर का भक्ति भाव कभी-कभी ऐसा लगता है भक्ति मार्ग अर्थात कि यह कर्म का एकदम हार्ड एंड फास्ट कोर उसका हार्ट है कि मैंने पाप किए हैं। मैं पापी हूं। अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा हूं। मेरे पापों से मुक्त होने के लिए ठाकुर का जो भक्ति मार्ग है उर्जिता भक्ति है उल्लास से भरी हुई शुद्ध बुद्ध मुक्त मैं मां का संतान हूं मां को मुझे दर्शन देना ही है मेरे भीतर में पाप कौन सी चीज का मां कहती है ना मां शारदा ही कहती है हमारे छले जगे मुते ता होले ना की आमी की ओके छेड़े दे वो ओके माने लड़का जो है मेरा संतान है जदी शोच करता है वो पेशाब करता है तो क्या मैं उसको छोड़ दूंगी उसको क्लीन करके करके मैं अपनी गोद में बिठाऊंगी। तो हम तो बालक है। बालक बुद्धि से जो किया सो किया। भक्ति मार्ग से भी आप देखिए। हार्ड को और ज्ञान मार्ग से देखेंगे। मैं ब्राह्मण हूं। और जैसे ही मैंने यह सोचा साथ-साथ में ही मेरे पास में वो पावर एक आता है कि मैं अपने पूरे भूतकाल को रीाइट कर सकता हूं। मेरे पूरे पास्ट को रीाइट कर सकता हूं। वेदांत मार्ग से यदि देखते हैं तो ठाकुर का जो भक्ति मार्ग है उसकी दृष्टि से भी आप देखिए। मैं श्री रामकृष्ण की गोद में बैठा हूं। अभी मुझे कौन सा पाप है? भूतकाल, भविष्य, वर्तमान सब मेरे सामने तुच्छ हो जाते हैं। यदि श्री रामकृष्ण देव का कृपास्त मेरे सर पर है। मां शारदा का कृपास्त मेरे सर पर है। उनकी गोद में यदि बैठा हूं तो हजार पाप आकर के मुझे स्पर्श नहीं कर पाएंगे। तो वह यह उर्जिता भक्ति और यह कोर हार्ड कोर ज्ञान मार्ग देखिए दोनों दृष्टि से देखिए पाप पाप कर्म का बंधन चित्त शुद्धि वो सब तो हमारे लिए इस तरह से माने पलक झपक के हम उसको भगा सकते हैं। वो एक हिप्नोटाइज हो जाना कि मुझे तपस्या करनी है। तपस्या करके चित्त शुद्धि करनी है। पता नहीं जन्म जन्मांतर लगेंगे चित्त शुद्धि करतेकरते तब कहीं जाकर के मुझे कुछ आध्यात्मिक शांति मिलेगी। मन को मेरे शीतलता मिलेगी। वो सब जो भी अब हमको हिप्नोटिज्म हो चुका है वो गंगा में फेंक दीजिए। समुंदर में फेंक दीजिए। जिस क्षण मैंने ठाकुर का नाम लिया। जिस क्षण मैंने यह सोचा कि मैं मां और ठाकुर का संतान हूं। जिस क्षण मैंने मेरे मन में यह दृढ़ धारणा बैठ गई कि हां मैं वही ब्राह्मण हूं। तो साथ-साथ में ही देखिए कि चित्त शुद्धि भी हो गई और शीतल आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होना भी प्रारंभ हो गया। यह जो एक ट्रेडिशनल मेथड स्टिक एंड कैरट हां चलो उसका भी प्रारंभ में उसको भी आजमा लेते हैं कि स्टिक एंड कैरेट करके या समुंदर के किनारे बैठा हूं या ठाकुर के कमरे में बैठा हूं। मन को एकाग्र करने का प्रयास कर रहा हूं। एकाग्र नहीं होता है तो डंडा मारता हूं विल पावर का। यह भी एक प्रयास कर लिया। किंतु इमीडिएटली ग्रेजुएट इनू दी अद्वैतिक भाव, अद्वैतिक रियलाइजेशन कि हां मैं ही श्री रामकृष्ण का संतान हूं। श्री रामकृष्ण की गोद में बैठा हूं। मैं ही श्री रामकृष्ण हूं। और उनकी जितनी भी आध्यात्मिक संपद है मेरे हृदय में प्रगट प्रकटित हो रही है। प्रकाशित हो रही है। ठाकुर का ब्रह्मचर्य ठाकुर का त्याग ठाकुर की भक्ति उर्जिता भक्ति ठाकुर का यह जो ज्ञान ठाकुर का अपने संतानों के प्रति करुणा और वात्सल्य जो है सब मेरे हृदय में प्रकट हो रहा है। तो यह दोनों या तो मैं संतान होकर उनकी गोद में बैठा हूं या तो मैं वह स्वयं होकर के वहां पर बैठा हूं। जैसे ही यह भाव प्रकट हुआ देखिए साथ-साथ में ही सब कुछ मन का संताप, मन का दुख, यह डिप्रेशन, यह चिंताएं, यह स्टिक, कैरट, फेरड सब आपका हवा हो जाएगा। सबको उठा के आपको गंगा में फेंक देना है और सबको आपको भूल जाना है। साथ-साथ में ही मन का आनंद प्रारंभ हो जाएगा और प्रतिदिन ऐसा प्रयास करना है। प्रत्येक दिन इसको हमको इस स्थिति में स्थित होना है। क्योंकि क्या है? प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट। अभी आज मैंने यह अद्वैत भाव का चिंतन किया तो आप बोलेंगे कि तो दगधबीज हो गया क्या हमारा मन? क्योंकि अद्वैत भाव का तो अल्टीमेटली यही समाधि प्राप्त हो गई। तो जैसे ही समाधि प्राप्त हुई एक काम कांचन रूपी अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश रूपी पंच्लेश है वह दग्ध बीज हो जाएंगे उनका सीड भी कट जल जाएगा वो फिर कभी प्रकट ही नहीं होंगे तो एक ही दिन में नहीं होगा किंतु दिन प्रतिदिन आपने यह प्रैक्टिस करना शुरू किया तो धीरे-धीरे करके यह ब्रह्म भाव है ब्रह्मानंद है अपने प्रत्येक डीए प्रत्येक सेल के भीतर में प्रत्येक ऑर्गन के भीतर भीतर में प्रत्येक ऑर्गन के प्रत्येक सेल के भीतर में जाकर के उसको रीइजीनियर करना प्रारंभ करेगा। यह भाव सर्वप्रथम हृदय में प्रकट होता है। किंतु मेरी किडनी को अभी पता नहीं कि यह अभी मैं ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो गया है। मेरे ब्रेन को अभी पता नहीं कि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो गया है। तो यह हार्ट में से धीरे-धीरे करके ब्रह्म भाव ब्रह्मानंद जितने भी ऑर्गन है उसमें जाएगा। फिर ऑर्गन के प्रत्येक सेल है उसमें उसमें जाएगा। प्रत्येक डीएनए में प्रवेश करेगा। मन के भीतर में जितने भी संस्कार पड़े हैं, सबको एक के बाद एक पकड़ करके रिइजीनियर करने का रीडायरेक्ट करने का वह प्रारंभ करेगा। तो यह जो प्रोसेस है कि प्रथम बार मैंने ब्रह्म भाव का अनुभूति किया। ब्रह्म भाव में स्थित होने का प्रैक्टिस किया। तब से लेकर के मेरे यह जो संस्कार दग्ध बीज हो जाते हैं। उसमें थोड़ा सा समय अवश्य लगेगा। तो किंतु यह जर्नी आपका वह वाला जर्नी नहीं है कि मैं ऑब्जेक्ट सब्जेक्ट हूं और मुझे ऑब्जेक्ट की ओर जाना है। मैं सब्जेक्ट हो गया हूं। किंतु बस अभी मेरे अब ठाकुर राजा महाराज राजा महाराज का फेमस वो जो भक्त महाराज को पूछता है कि ठाकुर ने तो आपको आध्यात्मिक सब कुछ प्रदान कर ही दिया है। निर्विकल्प समाधि भी दे दी है। आध्यात्मिक सभी जो कुछ भी है सब संपद आपने प्राप्त कर ली है। तो फिर आप इतनी तपस्या क्यों कर रहे हैं? तो महाराज ने क्या उत्तर दिया था? एटा निजे कोरे नेवार जन ठाकुर की कृपा से जो हमको प्राप्त हुआ था वह मुझे अपना लेना है। अर्थात कि मेरे हृदय के मन के देह के प्रत्येक कण-कण में इसको व्याप्त हो जाना है। व्याप्त कर देना है। उसके लिए अभी यह प्रयास है। तो वैसे ही जिस क्षण आज ही मान लीजिए आपने इस आनंद का आपने लाभ उठाया। आपने यह ब्रह्म भाव का प्रैक्टिस प्रारंभ किया तब से लेकर के अपने हृदय के मन के देह के तन के संस्कार के जितने भी यह एक डिफरेंट डिफरेंट ऑर्गेनिज्म है सब में प्रवेश करके सबको रिइजीनियर करना जो हुआ यह प्रारंभ वो प्रोसेस थोड़ा सा टाइम लगेगा तो वह प्रोसेस को आपको कंटीन्यूअस करते जाना है। यदि करते जाएंगे तो देखिए कि कुछ ही समय में अपना मन जो है संपूर्ण शुद्ध हो जाएगा। यह विश्वास ही हमको नहीं होगा कि ऐसा होगा कि नहीं यह मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा। संदेह जो है संदेह को मार देना है। संदेह को उठा के समुंदर में फेंक देना है। संपूर्ण विश्वास के साथ में इस रास्ते पर आगे बढ़ना है। तो एक मेडिटेशन के बारे में थोड़ा डिस्कशन। अभी कल से स्वामी जी का लाइफ हम प्रारंभ करते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: पश्चिमी प्रभाव से ग्रस्त उस लड़के के बारे में: पश्चिमी संस्कृति हम पर इतनी प्रभावी क्यों है?

देखिए एक तरह से मैं लड़के पे सिंपथाइज करता हूं। आई आई आई एट द सेम टाइम मैं उसको देख रहा हूं। आई एम पुटिंग मसेल्फ इन ह पोजीशन। मेरी मां मेरे पिताजी यदि इस तरह से किसी साधु के पास लेकर जाते इसको समझाओ तो मैं भी उसको कुछ नहीं पूछता क्योंकि वह उस उम्र में मेरे माइंड में भी यह सब बैठ गया था कि ये साधु बाबा जी किसी काम के नहीं किंतु एटलीस्ट देखिए कि आई हैड दैट कैपेसिटी टू सेल्फ लर्न मैं किसी पर विश्वास नहीं करूंगा प्रश्न भी नहीं करूंगा उत्तर भी नहीं सुनूंगा किंतु मैंने सेल्फ स्टडी किया सो इन वन वे आई सिंपथाइज विद हिम यदि वह सेल्फ स्टडी करके आगे बढ़ता है सम हाउ अपने प्रश्न का निरा निराकरण लाता है तो वेरी गुड किंतु वो यदि सेल्फ स्टडी भी नहीं करता इव प्रजुडाइज हो चुका है तो फिर उसका फिर कोई उपाय नहीं वरना आप कोई भी अच्छी लाइब्रेरी में जाइए ना आपको अच्छी-अच्छी किताबें मिल जाएगी स्टडी करने के लिए जो कि आपके मन के संदेह का वो भंजन कर सकती है ठीक ही बोल यदि देखिए मैं तो कभी भी किसी को उपदेश देता नहीं क्योंकि मुझे पता है उपदेश किसी लाभ का नहीं है मैं अपने खुद के एक्सपीरियंस वर्णन करता हूं मैं क्लास भी जब भी लेता हूं यहां पे स्टूडेंट्स के तो मैं अपने एक्सपीरियंस बताते रहता हूं क्योंकि मुझे पता है कि दैट इज अ बेस्ट वे टू कन्विंस समवन एल्स तो किंतु क्या है वो लड़का एक शब्द भी यदि मुंह से नहीं निकालेगा तो मैं कुछ भी बोलूंगा ना तो वो पत्थर पर पानी डालना ही होगा। उसकी मां के साथ में मैं बात कर रहा हूं। जो लड़के को कहना है वो मैं इनडायरेक्टली उसकी मां को बता रहा हूं। लड़का सुन भी रहा है किंतु उसके साथ में डायरेक्ट तभी बात हो सकती है जब वो एटलीस्ट एक बार मुंह खोले। मेरी एक थ्यरी क्या है पता है? क्यों वेस्टर्न कल्चर इतना परवेजिव है हमारे यूथ में? क्योंकि कहते हैं ना कि नथिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस। अभी देखिए वेस्टर्न कंट्रीज को यह रेनेसा क्या है? रेनेसा का जो एक रैशन थिंकिंग जो स्टार्ट हुआ उसके रूट में है सेपरेशन ऑफ स्टेट एंड चर्च। यह चर्च का जो एक परवेजिव कंट्रोल था सोसाइटी के ऊपर में जैसे कि वो म सफोकेटिंग कंट्रोल जो था उसको उन्होंने तोड़ दिया और खुलेआम उन्होंने चर्च की निंदा करना शुरू कर दिया। यह जो खास करके ब्रिटेन है और यह बाद में अमेरिका है जो प्रोटेस्टेंट रिलीजन जहां पर भी गया माने प्रोटेस्टेंट ब्रांच ऑफ क्रिश्चियनिटी पॉप की निंदा करता है। पूरे कैथोलिक चर्च की निंदा करता है। आप यह जो हॉलीवुड के मूवीस देखेंगे ना चर्च को चर्च में जाकर के क्रॉस को जलाते हैं। ये क्रॉस को जलाना या क्रॉस को उल्टा करके शैतान का प्रतीक बनाना। यह जो होली जितने भी सिंबल थे क्रिश्चियनिटी के कैथोलिसिज्म के सबको उन्होंने म बिल्कुल ही तर छोड़ दिया। कोई भी होली सिंबल हमको नहीं चाहिए। सो यह कंप्लीटली अपने को रैशनलिस्ट सेकुलरिस्ट करके उन्होंने ये साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलप किया। और एज अ रिजल्ट ऑफ द डेवलपमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी आज वो देखिए कि एआई मिलिट्री टेक्नोलॉजी इलेक्ट्रॉनिक्स जेनेटिक्स स्पेस एक्सप्लोरेशन ये सब की चरम शिखर पर बैठे हैं। अभी हमारी जनरेशन में द सेम क्वेश्चन इंडिपेंडेंस के समय से ही प्रारंभ हो गया था। माने फ्रीडम मूवमेंट के समय से ही स्वामी जी के समय ही देखिए कि यदि भारत को ब्रिटेन जैसा एडवांस होना है तो उन्होंने जिस तरह से ये कैथोलिसिज्म के पंगा छुड़ाया कैथोलिक जो सुपरस्टिशन है वो आइकॉन्स थे ये जो उनके सेंट थे उनका हिस्ट्री है पॉप का वर्चस्व है सबसे जिस तरह से उन्होंने जान छुड़ाई हमको भी यह सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट करना होगा तभी हम उस साइंटिफिक डेवलपमेंट को कॉपी कर पाएंगे। दिस आईडिया इज देयर स्वामी जी के समय से है कि यह जब तक सुपरस्टिशन से धार्मिक सुपरस्टिशन से आप मुक्त नहीं होंगे साइंस के युग में आप प्रवेश नहीं करने वाले हैं। ये दैट बिगिनिंग ये अपना खुद का एग्जांपल वे लोग बताते हैं ना। वे लोग ऐसा नहीं कहते कि आप अपना धर्म छोड़ दीजिए। वे लोग खुद अपना एग्जांपल बताते हैं कि हमने जब से रेनेसा के समय से सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट किया। आप वेस्टर्न मॉडर्न हिस्ट्री को आप खास करके यह एक प्रोटेस्टेंट हिस्ट्री को पढ़ेंगे। एकदम क्लियर है उन लोगों का कांसेप्ट कि यह कैथोलिसिज्म जो है उसने यह अत्याचार, दुराचार, अनाचार उसके अलावा कुछ नहीं किया। जितने भी पॉप थे सब भ्रष्ट थे। कैथोलिक चर्च का जो पूरा यह वर्चस्व था उसने सोसाइटी को पूरा खत्म करके रख दिया। यह जो गैलीलियो को नजरबंद कर दिया। ये जो सब जितने भी एग्जांपल है चर्च के नेगेटिव एग्जांपल एकदम आपकी नजर के सामने स्टूडेंट्स के सामने स्पष्ट करके रखेंगे। कैथोलिसिज्म से मुक्ति पाना है। प्रोटेस्टेंटिज्म वि इज फ्री ऑफ सुपरस्टिशन। उसको स्वीकार करना है। अभी यही थिंकिंग उन्होंने अपने यहां पे एक्सपोर्ट किया है। और हम लोग स्पष्ट ये खास करके ये जो थिंकिंग पीपल है अपने फिलॉसोफर उन लोगों को तो आप वैसे तो मूर्ख नहीं है ना कि उनकी आंखों में धूल झोंके मैं करूंगा कुछ बोलूंगा कुछ कि मैं खुद कैथोलिसिज्म को फॉलो कर रहा हूं। सुपरस्टिशन को फॉलो कर रहा हूं और आपको बोल रहा हूं कि आप अपनी सुपरस्टिशन से मुक्त हो जाए। ऐसा तो मैं नहीं कर रहा। माने वेस्टर्न कंट्रीज ऐसा तो नहीं कर रहे हैं। पहले तो उन्होंने अपनी सुपरस्टिशियस बेड़ियों से मुक्त जंजीर से मुक्त किया है और फिर हमको कह रहे हैं कि फॉलो मी। ऐसा तो नहीं कह रहे कि और किसी पाथ को फॉलो करो। यदि मेरे जैसा सक्सेस होना है तो मुझे फॉलो करो। यह सुपरस्टिशन से मुक्ति पाओ। सो दैट वी हैव सीन देयर एग्जांपल एंड दैट इज़ व्हाई वी आर कोपिंग देम। ओनली प्रॉब्लम इज़ कि कैथोलिक जो थिंकिंग सिस्टम थी वो आपको कहती थी कि अर्थ इज क्रिएटेड 4ाउ 5000 इयर्स एगो। जबकि अपना वेदांत है कहता है कि यह सृष्टि स्थिति प्रलय का यह कल्प एक के बाद एक कल्प चलते हैं। साइकिल चलती है व्हिच इज मच मोर नियरर टू मॉडर्न साइंस। तो यह बात हम लोग भूल जाते हैं। हम लोग वही समझते हैं कि हिंदू ट्रेडिशनल हिंदूइज़्म जिसको कहते हैं वो वो कैथोलिसिज्म जैसा ही है। सुपरस्टिशन से भरा हुआ, अत्याचार, अनाचार, जाति प्रथा से भरा हुआ और जब तक इस ट्रेडिशनल हिंदूइज़्म से मुक्ति नहीं पाएंगे तब तक हम लोग भी इस अमेरिका, ब्रिटेन की तरह सुपर पावर नहीं होंगे। सॉल्यूशन इज नॉट कि हम लोग उनको यह कहे कि जितनी भी सुपरस्टिशियन है आकर के उनको फिर से ग्रहण करो जो कि बहुत सारे लोग ऐसा करना शुरू कर दिए जो कि मुझे हमेशा डर लगता है कि हिंदू धर्म का पुनर्जागरण उसका अर्थ क्या कि अब मैं बोलना नहीं चाहता अगेन वो फिर कंट्रोवर्सी अननेसेसरी होगी किंतु हिंदू धर्म के पुनर्जागरण के रूप में जिस तरह की बातें चल रही है थोड़ा सा भी आप न्यूज़पेपर खोलकर देखेंगे उसमें से ज्यादातर चीजों के साथ में ना मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूं क्योंकि क्योंकि हिंदू धर्म मींस वेदांत एंड वेदांत मींस अद्वैत वेदांत। जब तक अद्वैत वेदांत को आप और अद्वैत वेदांत इज़ कंप्लीटली रैशन कंप्लीटली एंटाई सुपरस्टिशियन। तो अब जाति प्रथा है, यह प्रथा है जो कि बोलना सेफ है। किंतु इसके अलावा भी ऐसी बहुत सारी चीजें जो कि हम लोग आजकल खास करके पॉलिटिकल हिंदूइज़्म के नाम पर खड़ी कर रहे हैं। व्हिच वि आई डू नॉट एग्री। अभी मैं एक ही एग्जांपल दूं आपको कि वह स्वामी जी के पास में गौ रक्षक वाला एक आदमी गया। कहता है कि गौ माता के पालन के लिए पैसा चाहिए। स्वामी जी कहते हैं इतने लोग भूखे मरते हैं। इन लोगों को आदमी की चिंता करो। तुम गौ माता की इतनी चिंता क्यों करते हो? तो उत्तर देता है वो गाय अपनी माता है। तो स्वामी जी कहते हैं गाय के ही लड़के ऐसे हो सकते हैं। तो उसको समझ में नहीं आया। किंतु ना प्रॉब्लम है आज इस तरह की बातें करना मुश्किल है। सो व्हिच इज़ अ कि हिंदू धर्म को ओरिजिन जो है उसको जागृत करना है। नहीं कि उसके ऊपर में बनी सुपरस्टिशियंस को। इन अ वे उस लड़के के साथ में मैं संपूर्ण रूप से सिंपथाइज होता हूं। क्योंकि न्यूज़पेपर खोल करके आपको क्या दिखता है? यही सब दिखता है जो कि किंतु यदि उस लड़के में थोड़ा सा दम है और थोड़ा सा इन्वेस्टिगेट करें देन ही विल अंडरस्टैंड कि रियल हिंदूइज़्म क्या है? वो जो कहते हैं ना कि थ्रोइंग द बेबी विद द बाथ वाटर। माने वो बाथ वाटर यानी वो छोटा सा टब होता है ना उसमें वो स्नान करवाने के लिए पानी डाला। उसमें बेबी को रखा है। बेबी को नहला रहे हैं। अभी स्नान हो गया तो पानी को फेंक देना है। तो पानी के साथ में बेबी को भी फेंक दिया। ऐसा भी हमारे साथ में हो गया है। और मैं बहुत बार सोचता हूं। देखिए यूथ में क्या है ना दो जोर होता है ना भीतर में जोश होता है हम लोग धर्म किसी काम का नहीं बोल के धर्म को इग्नोर करते हैं बुढ़ापा होता है फिर जब कष्ट आता है वो बीमारी आती है तो चलो धर्म करते हैं किंतु फिर हम कौन सा धर्म करने को जाते हैं जो धर्म जो कि यह सब पूरा सुपरस्टिशन का लेयर चढ़ा हुआ है उस धर्म को हम करेंगे यानी कि एक एक्सट्रीम से दूसरे एक्सट्रीम तक एक यूथ में आपने धर्म धर्म को ही रिजेक्ट कर दिया। और जब अभी ऐसा लगा कि चलो इतना कष्ट है तो धर्म का रास्ता अपना के देख ले तो आपने उस तरह का धर्म अपनाया है जो कि पूरा सुपरस्टिशन से भरा हुआ है। वन एक्सट्रीम टू अनदर एक्सट्रीम। अंगूठी पहनते हैं, विधि करवाते हैं, ग्रह शांति करवाते हैं। फिर यह वास्तु शास्त्र में जाते हैं। किंतु देखिए आपने यह जो कहा ऑफकोर्स कि अभी कौन इस उम्र में 60 70 की उम्र में कौन वेदांत पढ़ के उसका गुण अर्थ समझने को जाने वाला है। एट द सेम टाइम जैसे हमारे क्लास का जो बेसिक प्रिमाइसिस है ठाकुर मां स्वामी जी की बातों पे यदि आपको रस आ जाता है तो फिर आपको वो सब झमेले में जाने की जरूरत नहीं है। उसके बाद में आपका वह सूर्योदय अभी होने ही वाला है। आकाश में लालिमा फैल गई है। हां, वह फ़ेमस कि ठाकुर भांगते ऐसे नहीं ठाकुर गढ़ते ऐसे। ठाकुर तोड़ने के लिए नहीं आए। कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं। तो ऐसा कहीं स्पेसिफिकली मेंशन नहीं है कि जाति प्रथा गलत है, फिर यह गलत है। नहीं, ऐसा स्पेसिफिकली मेंशन नहीं। किंतु जो मेंशन है वो इतना पॉजिटिव है कि फिर उसके सामने बाकी सब फीका हो जाता है। आज के एमनी में शीघ्र दुट तो शीघ्र शी शिगिर दुटो खे ना हो। आज ऐसा ही मिलने वाला है। जल्दी-जल्दी थोड़ा सा खा लो। फिर तब तभी तो प्रसाद होगा। सब बच्चों को खिलाना है। ऑटोमेटिक आपका हार्ट रीइंजीर होता जाएगा। आपको कॉन्शियसली कुछ करने की जरूरत नहीं। ये जो कभी-कभी डर लगता है ना कि अरे मैं कुछ नया कर रहा हूं। ट्रेडिशन से अलग कर रहा हूं। कुछ गलत तो नहीं कर रहा हूं। वो डर जो बैठा भी होता है तो हम कॉन्शियसली ठाकुर मा स्वामी जी किसी को कहते भी नहीं है तुम ऐसा मत करो क्या करना है वो कहते हैं और इतना पॉजिटिवली कहते हैं कि फिर ऑटोमेटिक वो सब रीइजीनियर होता जाता है भीतर सा मातृभाव का सार पढ़ लो [हंसी] रामकृष्ण विवेकानंद सार पढ़ लो और सार जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि देखिए वो गाय है तो गाय के सिंह है पूछ है मुंह है पैर है किंतु हमको काम किस चीज का है वो आंचल का है जहां से दूध मिलता है। तो ऐसे वह पूरा जो धार्मिक साहित्य है हिंदू धर्म का ठाकुर मा स्वामी जी की कहानियों से पूरा सार मिल जाता है। ओम