मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र इस सप्ताह पाठ करेंगे
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद संन्यासीगण और माँ सारदा के जीवन का एक विहंगावलोकन
श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि के बाद के जो कुछ साल थे। सभी के लिए तपस्या से पूर्ण साल थे। यहां पे गुरु भाई पहले तो वराह नगर मठ में एकत्र होकर के रह रहे हैं। इसके बाद में जब आर्थिक समस्या का सामना होने लगा। एक और दूसरा कि जैसे सन्यासी का होता है कि उनका हृदय उनका मन हमेशा खुली जगह खोजता है। हमेशा जनसाधारण से दूर जाकर के तपस्या करने का भाव उनके हृदय में रहता है। तो जैसे ही यह गुरु भाई है, यह अंतरात्मा की आह्वान को उत्तर दे करके एक के बाद एक मठ छोड़ कर के प्रवृज करना प्रारंभ किए। और फिर उसके बाद में धीरे-धीरे करके आलम बाजार मठ में एकत्र होना शुरू हुआ। बाय दैट टाइम अमेरिका से न्यूज़ आ चुका था कि स्वामी जी वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में उनको अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है और स्वामी जी वहां से पत्र लिख लिख कर के अपने गुरु भाइयों को कहते हैं कि अभी तुम सबको इकट्ठा होकर के रहना है और एक श्री रामकृष्ण देव का यह जो वर्ल्ड मिशन है उसको कार्यरत करना है। तो यह जो 1886 से लेकर के ऑलमोस्ट 1894 यह जो समय है नाइन इयर्स के आसपास का ऑलमोस्ट 9 साल के आसपास का तपस्या से भरपूर रहा है। धीरे-धीरे करके उस समय ठाकुर के जितने भक्त संतान थे गृहस्थ हो ना कि त्यागी हो पूरे विश्व में बिखर गए थे। सभी लोग ठाकुर ने उनको जो पार्टिकुलर मिशन दिया है उसको कार्यरत करने में रह गए थे। मास्टर महाशय है। यहां पे कथामृत का ओरिजिनल जो ड्राफ्ट है वो तैयार कर रहे हैं। यहां पे मां है। पहले तो कामार पुकुर में और फिर जयराम बाटी में तपस्या करनी पड़ रही है। और यह गुरु भाई का तो पता ही है कौन कहां पे है। कि जब भी स्वामी जी का यह प्रथम मैसेज आया आलम बाजार मठ में कि अभी तुम लोग एकत्र हो राखाल कहां पे है हरि भाई कहां पे है शरद कहां पे है सबको बुला बुला के मठ में बुलाओ सब लोग साथ में बस बस करके रहो और फिर जब स्वामी जी भारत आए 1886 1887 में तो ये ये जो बाय दी टाइम 1897 सो 1886 से लेकर के 1894 तक का पीरियड मैं कहूंगा। ऑलमोस्ट 9 साल का यह पीरियड 8 9 साल का प्रचंड तपस्या से भरपूर था सभी के लिए। उसके बाद में स्वामी जी के यह जो अग्नि मंत्र से भरपूर पत्र भारत आना शुरू हुए। गुरु भाई धीरे-धीरे करके एकत्रित होना शुरू हुए। एक ऑर्गेनाइजेशनल सेटअप स्टार्ट हुआ। तब से गुरु भाइयों ने मां की यह जो मां का जिम्मा है वह उन्होंने स्वीकार करना शुरू किया। योगेन महाराज तो खैर वैसे मां के साथ में काफी समय से मां की सेवा करते ही थे। किंतु क्या है कि इंडिविजुअल लेवल पर सब कुछ होता था। कुछ भक्त लोग करते थे। किंतु एक ऑर्गेनाइजेशनल सेटअप प्रारंभ हो और ऑर्गेनाइज ऑर्गेनाइजेशनली एक सिस्टमेटिक वे में मां को सहाय हो। यह धीरे-धीरे करके यहां से प्रारंभ होता है। तो देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां के जीवन को हम ऑलमोस्ट तीन डिवीजन में बांट सकते हैं। एक तो सर्वप्रथम डिवीजन है अ कि महासमाधि से लेकर के 1894 जबकि ये प्रवरज्या और तपस्या का दौर चल रहा था। मां को भी बहुत तपस्या करनी पड़ी थी। तो यह एक पीरियड है। द्वितीय पीरियड है कि जब स्वामी जी ने अग्नि मंत्र से भरपूर पत्र लिखना शुरू किया 1894 और फिर स्वामी जी स्वयं भारत पधारे 1897 और फिर बेलूर मठ की स्थापना हुई। मां बीच-बीच में कोलकाता आती है। मां को कभी नीलांबर मुखर्जी के गार्डन में मां को रहने का स्थान होता है तो कभी-कहीं पे ऐसा करके यह पूरा चला और यह चला तब तक जब तक कि उद्बोधन जो है उसका निर्माण नहीं हुआ। उद्बोधन जो है मायरबाड़ी उद्बोधन उसका निर्माण जो शरद महाराज ने करवाया अ 196 से 199 के बीच का यह जो पीरियड है कंस्ट्रक्शन वगैरह चला यह जो निर्माण हुआ तब से लेकर के मां के जीवन का तृतीय एक दौर प्रारंभ होता है जो कि मां की महासमाधि तक चला जबकि मां फ्रीक्वेंटली कोलकाता आती थी और कोलकाता में शरद महाराज जो है उन्होंने मां का जिम्मा स्वीकार किया था और शरद महाराज के रिस्पांसिबिलिटी जो थी उसकी वजह से बहुत सारे भक्त मां के पास में सिस्टमेटिकली आकर के दीक्षा ग्रहण कर पाए थे। तो यह जो अभी हम जिस पीरियड के बारे में बात करने वाले हैं, वह पहले 8 9 साल वाला यह पीरियड है। जबकि गुरु भाइयों को भी तपस्या करनी है। मां को भी तपस्या करनी है। बस वही बात है कि मां की तपस्या का जो क्षेत्र है वो है कम्युनिटी लाइफ। मां कहीं प्रवृजजा में नहीं गई। हां तीर्थ यात्रा के लिए गई थी एक साल। किंतु जैसे ही तीर्थ यात्रा समाप्त हो गई फिर जो मां पहले कामारपुक और फिर बाद में जयराम भाटी में रहती है तो मां का जो तपस्या का दायरा था वह था यह कम्युनिटी लाइफ। और यह गुरु भाइयों का जो तपस्या का दायरा था, यह पूरा विश्व उनका तपस्या था। क्योंकि क्या है कि स्वामी जी को सिविलाइजेशनल स्केल पे काम करना है। मां को कम्युनिटी स्केल पर काम करना है। यह जो हमारा अह फ्रेमवर्क है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य को समझने का हमने ठीक किया है कि श्री रामकृष्ण देव उनका जो फील्ड है वो है स्पिरिचुअलिटी। आत्मन की ईश्वर की ओर जर्नी जीवात्मन की आत्मन की ओर या तो फिर ईश्वर की ओर जर्नी यह जो काम कांचन से घिरा अपना जो अंतःकरण है उसको हमको छोड़कर के यह जो अपना सही स्वरूप है सतचित आनंद उसको प्राप्त करना है। यह था ठाकुर का खुद के जीवन का एक तो प्रयास और दूसरा था कि उनके जो संपर्क में जितने भी आए वह चाहे गृही हो ना कि त्यागी हो ना कि यह कैजुअल विजिटर हो ना कि कोई क्यूरियस बाय स्टैंडर्ड हो बाय स्टैंड स्टैंडर्ड हो कोई भी हो सबको ठाकुर ने यह जो आध्यात्मिकता का संदेश जो है लाइव आध्यात्मिकता उनको पहुंचाई है। तो, यह ठाकुर का दायरा था इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी फ़ील्ड जो था ठाकुर का मां का है कि कम्युनिटी लाइफ़ और यह स्वामी जी और गुरु भाइयों का था ये सिविलाइजेशनल स्केल पे काम करना। तो, यह मां जो है तपस्या कर रही है कम्युनिटी में और यह गुरु भाई तपस्या कर रहे हैं पूरा भारत का और फिर बाद में पूरे विश्व का भ्रमण करके। तो यह जो है ठाकुर की महासमाधि के बाद का पीरियड हमारा जो चैप्टर चल रहा है स्वामीर भटा गंभीरानंद जी महाराज की मां शारदा की जो जीवनी है स्वामीर भटा अर्थात कि पति का घर यह जो हमारा चैप्टर चल रहा है हमने प्रारंभ ही किया है इस चैप्टर का इसके ऊपर एक ही क्लास हुआ है और जो सर्वप्रथम जो प्रसंग है वही ही अभी तक हमने लिया है कि किस तरह से तीर्थ यात्रा से वापस आने के बाद में मां एक बार दक्षिणेश्वर ठाकुर के ये जो स्मृति चिन्ह की स्मृति रक्षित जो स्थान है उसका दर्शन करने के लिए तो गई किंतु उसके बाद में वह फिर कामार पुकुर यात्रा करती है। जो यह जो पूरा डिस्कशन है कि क्यों मां कामार पुकुर जाती है। मां के संबंधियों ने मां के साथ में किस तरह से व्यवहार किया। फिर यह कामार पुकुर उस दिन का कामार पुकुर कैसा था? यह पूरा वर्णन अभी हम इस चैप्टर में पति का घर इस चैप्टर में गंभीरानंद [गला साफ़ करने की आवाज़] जी महाराज जो कहते हैं उसका हम पाठ करेंगे। प्रारंभ में ही जो प्रसंग हमने ऑलरेडी देख लिया है कि उस समय कोलकाता से कामार पुकुर जाने के समय इन लोगों के पास में पूरता पैसा नहीं था। इतना रुपया नहीं था कि यह बैलगाड़ी है ना कि यह पालखी है। ऐसा कुछ करें। तो इसकी वजह से जहां तक ट्रेन जाएगी वहां तक जाएंगे। इस उसके बाद में फिर ऑलमोस्ट 26 कि.मी. का रास्ता उनको पैदल क्रॉस करना पड़ा है। अभी आप सोच लीजिए 26 कि.मी. चलना वो कितना मुश्किल है और वह भी उस समय के बात है। जबकि यह जो रेडी कंफर्ट जो होते हैं आजकल के युग में इस तरह से नहीं थे। रास्ता कहीं पर कादव कीचड़ से भरपूर है। कहीं पर कांटा के कांटे वाली झाड़ियां है। कहीं पर यह विश्राम की व्यवस्था नहीं है। खाने की व्यवस्था नहीं है। इस तरह की जैसे कि मां सीता वनवास में जा रही हो। इस तरह से मां शारदा को कामारपुुर जाना पड़ा था। और हमने यह भी देखा कि उचालन बोल के एक जगह है। वहां पर कैसे भी जुगाड़ करके गोलाप मां ने थोड़ी सी खिचड़ी रादी थी। और मां पैदल चलते-चलते इतनी थक गई थी। इतनी भूख लगी थी कि यह जो थोड़ी सी खिचड़ी भी खाई उसमें भी मां बार-बार बोलती है कि अरे गुलाब तुमने क्या अमृत ही रंधा है। क्या अमृत ही तुमने पकाया है? तो यह एक सर्वप्रथम प्रसंग इस चैप्टर का हमने देखा है। इसके बाद के जो प्रसंग है वह अभी हम देखेंगे। इस चैप्टर में आप देखेंगे कि यह पूर्व भूमिका हो गई इस प्रसंग की और यह इस प्रसंग का एक पैराग्राफ अभी हमको पढ़ना बाकी है। यह इसी प्रसंग का पैराग्राफ समाप्त कर लेते हैं। उसके बाद में आगे के चैप्टर में क्या होने वाला है उसका एक आउटलाइन देख लेंगे। तो यह
कामारपुकुर में माँ सारदा के तपस्यामय जीवन का प्रारम्भ
जो पैदल गए हैं कामार पुकुर उसके बाद उसके रिलेटेड जो है क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? कामार पुकुरे दिन क थाकिया स्वामी जोगानंदो प्रभुति शकली अन्नत्रो चोल्या गले मां शारदा को कामार पुकुर तक पहुंचाने के लिए योगानंद जी महाराज और गोलाप मां गए थे साथ में शायद और भी कोई भी होगा। इन दोनों का नाम हमको महाराज जी यहां पर कहते हैं। इसके बाद में जो है महाराज कहते हैं कि कामार पुकुर कुछ दिन रुकने के बाद में स्वामी योगानंद वगैरह और किसी जगह पे चले गए। कामार कोलकाता गए हो ना कि जहां पे भी गए हो। अतः पर श्री माय अति दुखमय कामार पुकुर जीवन आरंभ होलो। इसके बाद में श्री मां का अति दुखमय कामार पुकुर जीवन प्रारंभ हुआ। लक्ष्मी स्वयं जैसे कि तपस्या कर रही है। इहार अधिकांश समय तिनी एकाकी छले यह जो पूरा समय था इस समय के अधिकांश समय ही वह अकेली थी। दुई चार जन पूर्व परिचितो ग्राम वासी छाड़ा ताहार दुखेर संवाद लब बा सहानुभूति करीब बार के हो छिलोना दो एक पूर्व परिचित ग्रामवासियों को छोड़कर के उनके दुख का संवाद लेने वाला या सहानुभूति दिखाने वाला कोई नहीं था। सोच करके देखिए कि ठाकुर ने मां को इतना रिस्पेक्ट दिया है। मां की पूजा तक की है। जब कोलकाता रहती थी मां तो ठाकुर की उन्हें शक्ति के रूप में यह जो अंतरंग भक्तगण है एटलीस्ट उनकी श्रद्धा की वह पात्र थी। ठाकुर ने स्वयं मां को कहा है कि अरे मैंने तो और क्या किया है? तुम्ही को तो ज्यादा काम करना है मेरे से। तो यह सब जो वैसे तो मां का कोलकाता का जीवन कोई माने ऐसा तो नहीं था कि बहुत ज्यादा लग्जरी या कंफर्ट से भरा हो। तपस्या जितनी कामार पुकुर में थी उतनी ही तपस्या मां को वो वहां पे नहबत में वो जो छोटी सी वो कमरे में रहती थी वहां पे भी इतनी ही थी। श्यामपुक और काशीपुर में भी इतनी ही थी। जहां तक शारीरिक कष्ट का सवाल है, मां शारदा को कभी भी ऐसा कंपैरेटिव लग्जरी में रहने का मौका जीवन के बिल्कुल आखिरी समय में जब यह उद्बोधन की रचना हुई है और फिर यह शरद महाराज और पूरे रामकृष्ण संघ के सभी साधु यह जो मां की सेवा के लिए तत्पर थे, उस समय जो आखिरी आखिरी समय था जीवन का, उसको छोड़कर के जन्म से लेकर के यह जो पूरा मां का अधिकांश समय समय था वो शारीरिक कष्ट शारीरिक तपस्या से तो भरपूर था ही किंतु जहां तक मां कोलकाता में थी जहां तक ठाकुर स्वयं जीवित थे या तो कहेंगे नश्वर देह में लीला कर रहे थे नश्वर देह अर्थात कि यह पंचमहाभूत का देह आज है कल चला जाएगा क्षणभंगुर शरीर तो यह जब तक क्षणभंगुर शरीर में ठाकुर लीला कर रहे थे इस तब तब तक क्या था कि मां का एक सम्मान था। मां के पास में सतत भक्तों का आना जाना लगा रहता था कोलकाता में। और यह भक्तगण भी मां को संपूर्ण रूप से श्रद्धा भक्ति करते थे। कामार कुकुर में यह शारीरिक कष्ट है, शारीरिक तपस्या है। यह तो कंटिन्यू होता ही है। किंतु साथ में ही एक और भी भयानक एलिमेंट ऐड होता है। वह है एकाकीपन। लोनलीनेस। देखिए जो आजकल के युग में बहुत सारे डॉक्टर आपको कहेंगे कि यह लोनलीनेस है सबसे बड़ा किलर डिसीज है आज के युग में। खास करके यह जो एडवांस इंडस्ट्रियल कंट्री है, यूरोप है, अमेरिका है। वहां पे क्या है कि बच्चे जो होते हैं मां-बाप को छोड़कर के अलग से अपना लाइफ बनाते हैं। तो फिर वहां पे अभी क्या है कि वो मां-पिताजी को ऐसा मटेरियल चीजों की ऐसी कोई खास तकलीफ नहीं होती। हो तो वृद्धाश्रम में रहते हैं या ओल्ड एज रूम में रहते हैं। जहां पे भी रहते हो। मटेरियल कंफर्ट जो है वह तो सब मिलते हैं किंतु जो कंपनी एक मिलनी चाहिए। एक जो अपने लोग जो है अपने लोगों का यह जो एक सानिध्य मिलना चाहिए। अपनापन जो लगना चाहिए वो नहीं लगता। सब समय कहीं एक तरह का एलियनेशन जैसा भाव रहता है। तो यह लोनलीनेस में ही धीरे-धीरे करके एक इस तरह का स्ट्रेस प्रकट होता है कि फिर वह देह और मन को तोड़ देता है। तो यहां पे यह जो लोनलीनेस जो कि आज के युग का जो भयानक डिसीज है वह आकर के कामार पुकुर में मां को घेर लेता है। ज्यादातर समय मां अकेली ही रहती थी। दो चार ग्राम वासियों के अलावा उनकी संभाल रखने वाला सहानुभूति के दो शब्द कहने वाला कोई नहीं था। किंतु यहां पर दूसरी भी एक बात है आज के युग की तरह आज के युग में जिस तरह से हिडन अथेज्म ये छुपी हुई नास्तिकता जो थी आज के युग में हम लोग मंदिर में भी जाएंगे लिप सर्विस भी देंगे भगवान को तीर्थ यात्रा में भी जाएंगे सब कुछ करेंगे किंतु मन में जो है वह विश्वास प्रकट नहीं होता जो कामार पुकुर में मां का बिल्कुल उल्टा था कामार पुकुर में भले ही चाहे शारीरिक कष्ट करना पड़ा हो भले ही चाहे मां को लोनलीनेस ने आकर के घेर लिया हो किंतु जो हृदय के भीतर में अविराम ईश्वर का जप चलना चाहिए अविराम ईश्वर की यह जो सानिध्य और उनका जो आशीर्वाद ईश्वर ज्ञान का जो आनंद है वह अविराम मां के मन में बहता रहता था बोलकर के यह जो शारीरिक कष्ट है और यह जो लोनलीनेस जो है यह दोनों सहन हो जाती थी। माने सहन ही कहां माने यह जो ईश्वर ईश्वरीय आनंद जो है इस हद तक मां के भीतर में था कि यह जो बाह्य तपस्या कष्ट उसके सामने कहां तुच्छ हो जाएंगे। किंतु हमेशा जैसे हमने लीला प्रसंग में भी शरद महाराज डिस्कस करते हैं शारदानंद जी महाराज कि देखिए इन लोगों के भीतर में ईश्वरीय अंश था। ईश्वरीय आनंद का झरना इनके हृदय में बह रहा था। इनका जन्म उनका जीवन उनका संदेश दिव्यता से भरपूर था। बोल के हमको उनके यह जो कष्ट है, तपस्या है, सफरिंग जो है उसको बी लिटल नहीं करना है। उसको तुच्छता छिल्य नहीं करना है कि अरे हम लोग तो एक सामान्य आदमी है। मां कहां जगत जननी जगत धात्री जगदंबा है। नारायणी शक्ति स्वयं है। ठाकुर के कार्य में सहाय करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई है। तो मां की लोनलीनेस कहो या तो फिर कामारपुर में मां को जो कष्ट करना पड़ा तपस्या करनी पड़ी वह तो हमारा जो कष्ट तपस्या है वह तो रियल है जबकि मां का जो है एक तरह से लोक देखानो मात्र लोगों को दिखाने के लिए मात्र है फेक [हंसी] है आज की लैंग्वेज में कहे तो तो इस तरह से हम इसको तुच्छता ना कर दें मां की तपस्या को शारीरिक कष्ट को यह कोई फेक कष्ट नहीं है। माने लोक कल्याण के लिए किया हुआ कष्ट नहीं है। लोग सीखे लोग करें इसके लिए किया हुआ कष्ट नहीं है। यह जेन्युइन कष्ट है। जेनुइन तपस्या है। क्यों? क्योंकि मां और ठाकुर दोनों के भीतर में ईश्वरीय और मानवीय दोनों गुणों का अद्भुत संगम था। अवतारवाद जो है जिस तरह से भारत में डेवलप हुआ है पूरा थ्यरी पूरा प्रैक्टिस यह जो पिछले कुछ हजार सालों से उसमें यह बात स्पष्ट रूप से दिखती है। ठाकुर ने भी कहा था पंचमहाभूते फांदे ब्रह्म पड़े कांधे। यह पंचमहाभूत का यह जो फंदा है यह जो चाल है ट्रैप जो है उसमें फंस जाने से ब्रह्म को भी रोना पड़ता है। भगवान राम को पता ही था कि पृथ्वी पर उनके आगमन का तात्पर्य ही है कि एक तो आदर्श की स्थापना करना दूसरा कि राक्षसों का वध करना। यह तात्पर्य उनको पहले से पता होने के बावजूद जब मां सीता का हरण हुआ तब भगवान राम स्वयं रोए थे तो उनकी यह जो सफरिंग है उसको हमको बिलिटल नहीं करना है। उसको नजरअंदाज नहीं करना है। ऐसा नहीं कहना है कि अरे वे लोग इस तरह की कठिन परिस्थिति में आदर्श को मेंटेन करके चलते हैं। तो बोलकर के मेरे से इसमें से कुछ भी होने वाला नहीं क्योंकि वह अवतार है। मैं मनुष्य हूं। नहीं जिस तरह से कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने आदर्श का पालन किया है वैसे ही हम जब जिस कठिन परिस्थिति में आए हमको आदर्श का पालन करना है। वरना फिर मनुष्य जीवन और पशु जीवन में कोई डिफरेंस नहीं रह जाएगा। दिव्यत्व की ओर जाने की हमारी यात्रा है। ईश्वरीय ज्ञान ईश्वरीय आनंद प्राप्त करने की ये हमारे जीवन की ये हेतु है। हमारे जीवन का लक्ष्य है। यदि इस लक्ष्य से हम चत हो जाएंगे। इस लक्ष्य से हम पथ भ्रष्ट हो जाएंगे तो फिर हम सीधा पशुत्व की ओर चले जाएंगे। यह जो हमारा
कर्म ही बनाते हैं हमारा स्वरूप—सत्कर्म से दिव्यत्व, दुष्कर्म से पशुत्व
लास्ट क्लास में डिस्कशन हुआ था ना कि वहां पे नीलांबर गार्डन में नीलांबर मुखर्जी गार्डन में उस समय मठ था। स्वामी जी अमेरिका से वापस आए हैं भारत में और वहां पर बेलूर मठ की स्थापना के लिए जमीन परचेस कर दी गई है। उस दिनों की बात है कि स्वामी जी रात को 2:00 बजे तक ये जितने भी साधु ब्रह्मचारी हैं उन लोगों में फाइट करवाते हैं माने डिबेट करवाते हैं कि पुनर्जन्म है कि नहीं? ये आत्मन है कि नहीं? ये फिर आत्मन का इवोल्यूशन ही सिर्फ नहीं होता। डिवोल्यूशन भी होता है कि नहीं? यह सब टॉपिक पे स्वामी जी ने बढ़िया सा चर्चा करवाया। इसके बाद में रात को 2:00 बजे स्वामी जी ने कहा कि बस अभी यह चर्चा भंग कर दो। सोने को जाओ। सुबह को 4:00 बजे स्वामी जी रेडी होकर के वहां गंगा के किनारे टहल रहे हैं। गंगाधर महाराज को उठाया। कहा कि बस अभी सहन नहीं होता। यह देखकर के कि सभी लोग सोए हुए हैं। बजाओ जोरों से घंटा उठाओ सबको। कहो कि मंदिर में जाकर के अभी जब ध्यान प्रारंभ करें तो ये किसी ने कहा गंगाधर महाराज ने कहा कि अरे स्वामी जी ये लोग तो रात को 2:00 बजे सोए हैं। थोड़ा सा और सो ले अभी 4:00 ही बजे हैं। ज्यादा तो रेस्ट नहीं मिला होगा। तो स्वामी जी कहते हैं कि क्या 2:00 बजे सोए हैं बोलकर के 6:00 बजे तक लेटे रहेंगे। यह सोने के लिए मठ बना है क्या? मेरे रहते रहते ही यह सब क्या है? एक तो उठाओ बजाओ घंटा उठाओ सबको तो गंगाधर महाराज जोर-जोर से घंटा बजा रहा है। अभी बाकी सब लोग धड़मड़ करके उठ गए चिल्ला रहे हैं। कौन घंटा बजा रहा है? कौन घंटा बजा रहा है? अखंडानंद जी कहते हैं मुझे मुझे मार ही देते। मुझे मार ही डालते हैं। किंतु देखा पीछे में स्वामी जी खड़े-खड़े हंस रहे हैं। तो फिर और कोई कुछ बोला नहीं। सब मंदिर में जाकर के जप ध्यान करना प्रारंभ कर दिए। तो यह जो डिबेट का एक पॉइंट था कि अह जो आत्मन या तो जीवात्मन है उसकी सिर्फ उन्नति ही नहीं होती उसकी अधोगति भी होती है। आज जैसे-जैसे सुकृत हमारे कर्म है सुकर्म वो इकट्ठा होते गए तो हम यदि मनुष्य हैं तो अगले जन्म में और ज्यादा धार्मिक मनुष्य के रूप में जन्म ग्रहण करेंगे। उसमें भी ज्यादा सुकृत हमारी हुई, सुकृति हुई, अच्छे कर्म किए तो उसके बाद में जैसे यह शंकराचार्य की तरह चाइल्ड प्रोड जी के रूप में जन्म लेंगे। बचपन से ही वेद वेदांत मुखस्थ है। 8 साल की आयु में 16 साल की आयु में यह सब धर्म शास्त्रों की रचना कर दी है और फिर मुक्ति प्राप्त करके हमेशा के लिए जन्म मृत्यु जरा व्याधि के इस चक्र से मुक्त हो गए हैं। तो यह एक जैसे गति है। सामने ही यदि हम पशुत्व की ओर हमारा बिहेवियर जो है सतत एक तरह का लोगों के प्रति द्वेष रखना लोगों के प्रति ईर्ष्या रखनी लोगों के प्रति कटुभाव रखना लोगों को हानि पहुंचाने का प्रयास करना ऑल इन द नेम ऑफ सेल्फ डिफेंस जो राक्षस होता है जो क्रिमिनल होता है जो इस तरह का दुष्ट व्यक्ति होता है उसका जो रेशनल जो होता है एकदम परफेक्ट होता है वो हमेशा यही यही कहेगा कि मैं जो गलत कार्य कर रहा हूं इसमें या तो सेल्फ डिफेंस है या तो फिर सामने वाला जो कर रहा है उसी को मैं रेसिप्रोकेट करता हूं। चोर चोरी करने के समय यह नहीं सोचेगा कि मैं कोई गुनाह कर रहा हूं। वो यही सोचेगा कि यह बड़े-बड़े पॉलिटिशियन है, बड़े-बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट है। वे लोग जनता से पैसे लूटते हैं और मैं जाकर के उनसे पैसे लूटता हूं। तो मैं तो रोबिनहुड की तरह हूं। उनके पास में से पैसे लूट करके थोड़ा सा मैं धन शुद्धि कर दूंगा। थोड़े से ये गरीब लोगों को खाना खिला दूंगा। तो फिर मैंने जो किया वो पाप के दायरे में नहीं आता। ये धार्मिक फेनेटिक्स जो होते हैं रिलीजियस फेनेटिक्स वो जो दूसरों की हत्या करते हैं धर्म के नाम पे। सबका एक पक्का माने वाटर टाइट रैशनल होता है। पक्का उनका एक भीतर भीतर में कन्विक्शन रहता है कि भाई मैं जो कर रहा हूं सही ही है। बाकी सब गलत है। तो यह जो ट्विस्टेड रैशनल जो है एक ट्विस्टेड थिंकिंग जो है वो डेवलप करने से हम दूर रहे क्योंकि वह रास्ता है पशुत्व की ओर जाता है। जैसे ही नया जन्म आया उसमें देखेंगे कि किसी अधार्मिक परिवार में जन्म हुआ है। वहां पे भी यदि और ज्यादा बुरे कर्म करते रहेंगे तो नेक्स्ट जन्म में पता चलेगा कि ऑर्फन होकर के जन्मे है। मां-पिताजी पहले ही चल बसे हैं। माने माने जन्म देने के बाद चल बसी है। देखिए ऑर्फंस का जीवन जैसे होता है। इसके बाद में भी यदि ऐसा ही करते रहे तो फिर यह मानसिक शारीरिक विकलांग के रूप में और माने यह अधोगति का कोई अंत नहीं है। सीधा आपको पशुत्व की ओर लेकर के जाएगी। तो क्या है देवत्व का जो है वहां पर भी अंत नहीं है। एक अनंत जर्नी है। वो मुक्ति के साथ में ही अंत आता है। पशुत्व है। इस जर्नी का भी कोई अंत नहीं। और यह लिटरली अंतहीन जर्नी है। जन्म मृत्यु जरा व्याधि जन्म मृत्यु जरा व्याधि संसार की इस चक्की में पिसते ही रहेंगे। हमको पिसता ही रहेगा। यह हमारा जो नसीब है हम लोग मैं रिसेंटली एक व्यक्ति के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। तो इस व्यक्ति ने मुझे कहा डिवोटी है वैसे इतना क्लोज भी नहीं है हमारे से किंतु है फिर भी डिवोटी। तो मुझे कहता है देखिए स्वामी जी मुझे तो बचपन से इतना कष्ट मिला है। इतना कष्ट मिला है। मेरी मां का लोगों ने अपमान किया है। वो पॉलिटिक्स में थी उसकी मां तो दूसरे पॉलिटिशियन ने उनका अपमान किया। उनकी टिकट छीन ली। उनको इलेक्शन में नहीं खड़े रहना दिया। वो जब इलेक्शन में खड़ी रही तो उन्होंने उनको दगा देकर के इलेक्शन में हरवा दिया। यह सब मेरे साथ में हुआ है। बोल कर के अभी भगवान है इस बात पे ही मुझे विश्वास नहीं रहा। मैंने कहा देखिए ऐसा नहीं है। यदि आप कहते हैं कि मेरे जीवन में या मेरी मां के जीवन में कष्ट क्यों है तो उसके पीछे का थ्यरी है यह पुनर्जन्मवाद और यह कर्म का सिद्धांत पिछले जन्म जन्म जन्मांतर के तो हमारे ये सुकृति दुष्कृति है। उसका तो हमको कैसे भी करके उसको काटना है। पशुत्व से दिव्यत्व की ओर जाना है। पशुत्व से मनुष्यत्व मनुष्यत्व से दिव्यत्व की ओर। ये है उसका रैशनल। ये है उसका लॉजिकल रिप्लाई। जैसे वो ठाकुर एक कहानी कहते हैं कि एक आदमी रास्ते से जा रहा है। देखा शशान में एक तांत्रिक शब्द साधना करने के लिए सभी उपकरण जुगाड़ करके रखे हैं। सब तैयार है। सब की जो जो पूजा के लिए जो उपकरण जो है धूप दीप नैवेद्य वगैरह सब तैयार है। वह तैयार होकर के जैसे उसने बेचारे ने बहुत मेहनत करके यह सब कुछ किया होगा। किंतु जैसे ही वह शब पर बैठने को जाता है वो ठाकुर कहते हैं ना कि वो साथ में वो जो छोला वगैरह रखना चाहिए जिससे क्या होगा शब्द यदि जप करते-करते मुंह खोले डर दिखाने को आए तो उसके मुंह में थोड़ा सा यह डाल देना है तो शब वो खाता रहेगा और हमको तब तक डर नहीं दिखाएगा तो यह शब साधना का एक सिस्टम था उस समय तो जैसे ही वह शव के ऊपर में विराजित होने को जाता है एक शेर आकर के उसको पकड़ करके ले गया मार डाला और खा गया। तो यह जो आदमी दूसरा रास्ते से जा रहा था उसने सोचा सब कुछ तैयार है। सभी उपकरण तैयार है। शव भी तैयार है। तो उसने जाकर के बैठ गया शव के ऊपर में जप करना प्रारंभ कर दिया आचमन करके और जैसे ही थोड़ा सा जप किया मां भगवती प्रसन्न हुई और अवतरित हो प्रकटित होकर के कहा कि अच्छा बेटा तुम वरदान मांगो। तो यह आदमी पहले तो प्रश्न करता है कि मां ऐसा बताइए। पहले तो एक प्रश्न का उत्तर दीजिए कि यह आदमी ये जो तांत्रिक जिसने कि ये पूरी व्यवस्था की थी उसके बाद उसको वाघ आकर के खा के चला जाता है और मैंने कुछ नहीं किया। थोड़ा सा बैठा मैंने जप किया साथ में ही तुम प्रसन्न हो गई। बताओ तो माजरा क्या है इसके पीछे का? तो मां कहती है कि बेटा तुमको जन्मांतर की बात याद नहीं है। जन्मांतर की बात अर्थात कि पूर्व पूर्व जन्म ने जन्मों में तुमने जो सुकृति की है उसका यह परिणाम है कि तुम जैसे ही जप करना प्रारंभ किए तुम्हारा थोड़ा सा बच गया था। तो ये थोड़ा सा तुमने जप किया उसी में मैं प्रसन्न होकर के तुमको वर देने को आई हूं। जबकि जिसको कि वो शेर खा के चला गया है। उसका अभी बहुत लंबा जर्नी बाकी है। तो क्या है यह गहना कर्मणो गति ही जैसे गीता में कहते हैं।
हमारा मन दुष्टता और भोग के लिए हमेशा कोई-न-कोई बहाना खोजता रहता है
हमारा मन जो है हमेशा एक्सक्यूज फेंकता है। हमेशा बहाने खोजते रहता है कि मुझे मेरे मन को एक स्वस्थ एक हेल्दी माइंड बनाना है। उसकी वजह मैं अपने मन में विकृतियों को प्रवेश करवाने देता हूं। हमेशा मैं रैशनल खोजता रहता हूं। हमेशा मैं वो पॉइंट खोजता रहता हूं कि जो मुझे हेल्प करें मिस बिहेव करने में जो कि मुझे मेरी जो कॉन्शियस जो है उसको एलिवेट करें। मेरी जो भीतर में से एक जो अंतरात्मा की एक तो ये होती है ना इनर वॉइस जो हमारा कहता है कि अरे भाई तुम जो कर रहे हो वो सही नहीं है। तो ये जो अंतरात्मा की ये जो आवाज है उसको मफल कर दे। उसका गला घोट दे। उसको शांत कर दे। इस तरह के पॉइंट हमारा मन हमेशा खोजता रहता है। मुझे झूठ बोलना है। मुझे असत कार्य करना है। लोगों के प्रति द्वेष रखना है। लोगों को लोगों का बुरा करके मुझे अपना फायदा कर लेना है। ये जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आप देखेंगे पॉलिटिक्स हो ना कि ये इंडस्ट्री हो ना कि ये जो कॉर्पोरेट सेक्टर हो ना कि एकेडमिक सेक्टर हो ये क्लास रूम हो जहां पे भी आप जाएंगे ऐसे लोगों भरपूर भरे हुए आपको मिलेंगे कि लोगों का अहित करके खुद का जो बेनिफिट है वह खोजने का प्रयास करेंगे और इस तरह के लोग हमेशा इस तरह के पॉइंट खोजते रहेंगे जिससे कि वह अपने ही मन में अपने को वह पक्का म सही है वह साबित कर पाए तो यह जो अवतार है बोलकर के वह तपस्या कर सकते हैं। मैं तो एक आम आदमी हूं बोलकर के मैं कैसे तपस्या करूंगा। मां जब परिवार में रहती है, एक कम्युनिटी में रहती है, तो को उस परिवार जन मां को कष्ट के बाद कष्ट दिए जा रहे हैं। मां ज्यादातर समय हंसते-हंसते सब सहन कर लेती है। यह जो पागली मामी मां को दिन रात गाली देती थी। एक दिन उसने बोल दिया तुम सर्वनाशी हो। तो मां ने कहा देखो तुम मुझे बाकी सब कहो। तुम मुझे सर्वनाशी मत कहो। पूरे जगत में मेरे संतान है उनको अहित होगा ऐसा तुम मत कहो। तो माने इतना माइल्डली मां उसको ये करती है और उसके सामने उसका गुस्सा बढ़ता ही जाता है। बढ़ता ही जाता है। जब हम यह परिस्थिति देखते हैं तब हम कहेंगे कि अरे यह कम्युनिटी लाइफ है। उसमें यह पागली मामी जैसे ये काली मामा जैसे ये राधु जैसे जितने भी कैरेक्टर हमारी लाइफ में है उसको या तो हम ठिकाने ला देंगे या तो फिर हम उनका संग त्याग करके अलग से रहने को चले जाएंगे। यह हमारा एक नॉर्मल रिएक्शन होता है। और उस समय जब ये मां की कहानियां पढ़ते हैं तो लगता है अरे भाई वो तो जगत जननी स्वयं है। भगवती स्वयं है वो यह सब करें। पागली मामी के साथ में जितना भी पागलपन है वो सहन करके रहे। राधु है उसका पागलपन सहन करके रहे। काली मामा का पागलपन सहन करके रहे। यह भक्तगण भी तो कम नहीं थे। मां के पार्षद गण भी तो कहीं कम नहीं थे। ऐसा मां को कष्ट देने का किसी ने कुछ
कहानियाँ: अच्छे भक्त भी अनजाने में माँ सारदा को कष्ट दे बैठते थे
बाकी नहीं रखा है। और देखिए माने गुड इंटेंशन से भी कष्ट होता है मां को कभी-कभी मां का एक त्यागी संतान क्वालपाड़ा से मां को मदद करने के लिए सहाय करने के लिए बीच-बीच में जय राम भाटी जाता था। उस समय ऐसा हुआ कि कुछ समय बहुत ही वृष्टि हुई थी। बहुत ही बारिश हुई थी। बोलकर के यह जो ग्रोसरी वगैरह जो होती है किराना की चीजें वह परचेस नहीं हुई थी। तो मां ने कहा जब ये त्यागी संतान जय राम भाटी आया तो मां ने कहा बेटा अच्छा हुआ तुम आए एक काम करो तुम थोड़ा सा ये मार्केटिंग करके चला बगल वाले गांव से पास में एक गांव है वहां से ये सब चीजें खरीद करके ले आओ तो वो भी त्यागी संतान भी बेचारा बड़ा ही उत्साह से गया मां ने पैसा दिया था वो लेकर के फिर जब वो गांव गया बाजार में गया वहां से सब चीजें परचेस करना शुरू किया ये केरोसिन है मैदा है आ यह फिर यह शक्कर है, मसाला है, फिर यह मिरी है वगैरह सब्जी है, आटा है। सब कुछ उसने परचेस तो किया और फिर ऑलमोस्ट 8 10 केजी वेट हो गया होगा। तो अभी वो सोच रहा है कि सर के ऊपर में वहन करके ले जाना। ये क्या है? ये तो सब मिडिल क्लास सब लड़के थे ना। एजुकेटेड लड़के थे। उनको ऐसा सर के ऊपर में बोझा वहन करके ले जाना ऐसा हैबिट नहीं है। तो यह किंतु अब यह तो त्यागी संतान है। पहले तो त्याग तपस्या का जीवन वरण किया है। दूसरा कि मां ने जो पैसा दिया वह तो चीजें परचेस करने के लिए किया है। दिया है। मां ने तो ऐसा नहीं कहा कि तुम किसी कुली को या मजदूर को लेकर के उसको पैसा देकर के उसके सर पर रख के चले आना। ऐसा तो मां ने नहीं कहा। तो बोल के उन्होंने क्या किया? जितना भी ये बोझा था जितनी भी चीजें परचेस की थी वो कहा कि एक पूरा बंडल बना दो एक बास्केट में रख दो और फिर यह बास्केट अपने सर पर रख के वो महाराज जी चले आ रहे हैं किंतु इस तरह से वजन उठाने का कोई अभ्यास नहीं जीवन भर का तो बेचारे माने एक तो एकाएक सर दर्द होने लगा और फिर बारिश स्टार्ट हो गई फिर से तो एक छाता और फिर ये चीजें जो है वो गीली होगी भीग जाएगी तो फिर वो नष्ट हो जाएगी जाएगी। आटा है, मैदा है, मसाला है। उसमें तो पानी गिरेगा तो और भी सब खत्म हो जाएगा। और आज की तरह वाटर टाइट पैकिंग वगैरह कहां था उस समय। तो बेचारे महाराज एक हाथ से ये बास्केट पकड़े हैं दूसरे हाथ से उसके ऊपर में एक छाता ऐसा धारण किया है और कैसे भी करके और कादव है रास्ते में पैर फिसल जाएगा। तो ये जितनी भी चीजें सीधी जमीन पर गिरेगी। वो बेचारे चारों ओर से ऐसे ये हो गए थे। क्या करें? कैसे भी करके एक हाथ में बास्केट पकड़ा है। दूसरे हाथ में छाता बास्केट के ऊपर में रखा है। जो अपने को खुद भेजेंगे तो दिक्कत नहीं। बास्केट में रखी हुई चीजें नहीं भीगनी चाहिए। पैर फिसलना नहीं चाहिए। भले ही चाहे अभी यह पानी का प्रवाह स्टार्ट हो गया है। कादा कीचड़ कांटा वगैरह हो गया है। कैसे भी करके मां का नाम लेकर के ठाकुर का नाम लेकर के जय राम भाटी वापस आए। वो आकर के क्या देखा? मां वरांडा में टहल रही है। चेहरा लाल हो गया है। आंखें जैसे कि सर के ऊपर में उठ गई है। और ऐसा लग रहा है जैसे मां को स्ट्रोक ही आने वाला है। तो ये महाराज कहते हैं एका कहते मां क्या हुआ? मां क्या हुआ? तो मां ने कहा अरे बेटा तुमको समझ में नहीं आता क्या कि मैंने तुमको यदि नहीं कहा है कि तुम कुली की सहाय लो तो तुमने नहीं कहा बोल कर के तुमने नहीं लिया सहाय। ऐसा क्यों किया? उस समय एकाएक महाराज को पता चला कि देखिए तो कभी-कभी कष्ट होता है ना तो हमारा मन जो है ना थोड़ा ये हो जाता है। अनबैलेंस हो जाता है। वो जब रास्ते से आ रहे थे इतना कष्ट करके एकाएक उनको ऐसा लगा कि सर के ऊपर और मां का नाम ले रहे हैं। कह रहे मां मैं बड़ी मुसीबत में हूं रक्षा करो। तो एकाएक उनको ऐसा लगा कि सर के ऊपर का यह जो बोझा है ना एकदम हल्का हो गया है। जैसे कि वो म वो रुई का बास्केट में रुई जो है इंस्टेड ऑफ के यह केरोसिन है, आटा है वगैरह की वजह बास्केट में रुई भर करके ला रहे हो। इतना हल्का वेट हो गया है और फिर आराम से उन्होंने बाकी का जर्नी पार किया है। तो अब जब मां को देखा उन्होंने इस अवस्था में तब उनको उनकी गलती समझ में आई। जैसे ही उन्होंने मां को पुकारा मां ने जैसे कि पूरा बोझा अपने सर पर ले लिया। मां का चेहरा लाल हो गया था। आंखें जैसे कि ये जो ये होती है अपनी आइरिस जैसे कि पूरी वो आंख में ऊपर उठ गई थी। ऐसा लगने वाला था जैसे मां को स्ट्रोक ही आने वाला है। तो तब महाराज को पता चला कि अरे बाप रे उन्होंने मां के साथ में कितना बड़ा अन्याय किया है। तो देखिए यह पागली राधु है। यह पागली मामी है। यह पागल काली मामा है। वे लोग तो मां को कष्ट देते ही थे। किंतु जो लोग जेनुइन मां के डिवोटी है जेनुइन जिन्होंने मां को जीवन सर्वस्व समर्पित किया है। वे लोग भी जाने अनजाने मां को किस तरह से कष्ट देते थे। कितनी कहानियां है। एक भक्त आया जय राम भाटी मां को कहता है कि मां मैं तो बहुत दूर से आया हूं। मैं एक काम करूंगा। आप आपका यह जो अन्न प्रसाद है उसको मैं सुखा करके यह जगन्नाथ में जगन्नाथ पुरी में वह जो आठ के महाप्रसाद होता है ना चावल को सुखा करके वह रखते हैं जिससे कि लंबा समय तक आप अपने घर में रख सके डेली एक-एक दाना आप प्रसाद ग्रहण कर सके तो यह भक्त कहता है मां को कि मां मैं आपका जो अन्न प्रसाद है सुखा करके मैं अपने घर ले जाऊंगा और प्रतिदिन एक-एक दाना ग्रहण करूंगा तो मां ने कहा ठीक है चलो कुछ समय के बाद में मां जब आहार के लिए बैठी और फिर जब खड़ी हुई तो यह भक्त को कहा कि तुम्हारे लिए वह रखा है जो चीज तुमने मांगी थी। प्रसाद ऐसा शब्द मां नहीं यूज़ करती है। कहते हैं कि तुमने जो चीज मांगी थी वो मैंने वहां पर रखी है। फिर मां ने ही खुद ने क्या किया कि वहां पे एक रस्सी से वो जो ये टांगा था। पता है आपने वो जो पुराने घरों में देखा होगा कि बिल्ली है या चींटी है वगैरह ना आ जाए। इसके लिए छत से रस्सी के ऊपर में एक घटी या ऐसा कुछ वो जो मिट्टी का एक पात्र बांध करके रखते हैं जिसमें ये सब मिठाई वगैरह कुछ रखते हैं। जो छत के ऊपर से टंगा है बोल के बिल्ली या ये जो चींटी है कीड़े हैं वगैरह उसमें नहीं आएंगे। तो वहां पे भी मां के [गला साफ़ करने की आवाज़] घर के वरांडे के सामने में इस तरह से छत के ऊपर में रस्सी से कुछ टांगा था। एक पात्र जिसमें कि डायरेक्ट धूप आ रही थी। इसके भीतर में मां ने यह जो चावल है अन्न प्रसाद रख दिया और फिर कहा कि देखो बेटा तुम थोड़ा सा ध्यान रखना कि ये जो कौवा जो है उसमें मुंह ना मारे वरना तो फिर क्या है प्रसाद अशुद्ध हो जाएगा। तो ये भक्त लोग भी ऐसा भक्ति तो बड़ी-बड़ी दिखाएंगे। मां तुम्हारा अन्न प्रसाद में ले जाऊंगा घर सुखा करके रखूंगा वगैरह-वगैरह। किंतु जब मां ने अन्न प्रसाद दिया। मां ने स्पष्ट वार्निंग दिया है कि तुम यहां पर बैठना देखना कि कौवा उसमें मुंह ना मारे। वो सीधा वो चला गया कहीं पर गप लगाने के लिए सोने के लिए। भक्तों का तो होता है कंसिस्टेंसी कहां होता है। अभी यहां पे मां बेचारी टेंशन में कि बेचारे भक्त ने बड़े ही साध करके बड़े ही भक्ति पूर्वक प्रसाद मांगा। अभी उसमें कौवा आकर मुंह मारेगा तो तो प्रसाद नष्ट हो जाएगा। मां पूरी दोपहर विश्राम करने की वजह वहीं वो वरांडे में बैठी रही। वो जो टांगा था मिट्टी के पात्र में जो प्रसाद रखा था अन्न प्रसाद उसको देखती रहती है और ये ठीक करके बैठी है। जैसे ही कौवा चौंच मारने को आएगा कौवा को भगाएंगी। पूरी दोपहर ऐसा बैठी रही। फिर ये भगत को ऐसा अकल आया होगा कि ये वहां पर टांग के रखा है। एक बार जाकर देख के आऊं क्या अवस्था है। जाके देखा मां स्वयं उसकी रक्षा करने के लिए बैठी है। तब उसको अकल आई कि देखो मां को कितना कष्ट दिया उसने। तो माने जो पागल लोग थे वे लोग तो मां को कष्ट देते ही थे। किंतु जो भक्त थे त्यागी और गृहस्थ उन लोगों ने भी मां को कम कष्ट नहीं दिया। या तो फिर कहेंगे कि मां ने उनका कष्ट अपने सर पर उठाया है। तो जो भी आप कहिए कष्ट तो हुआ। तो यहां पर देखिए हम अपने जीवन में अपने साथ में थोड़ा सा भी कुछ बुरा होता है। थोड़ा सा भी कोई हमारा अहित करने को ट्राई करता है। कटु वचन कहता है। हमारे साथ में द्वेष रखता है तो हम उसको 100 गुना करके उसको लौटाएंगे। जहर उसने एक बिंदु डाला है। हम 100 बिंदु उसके ऊपर में फेंकने को जाएंगे और रेशनल अपना बड़ा ठीक है। स्वामी जी ने कहा है आत्मरक्षा करना। गीता में कहा है कि शत्रुओं की हत्या करना। भगवान राम ने स्वयं राक्षसों की हत्या की थी। राम कंस माने रावण का वध किया था। भगवान कृष्ण ने कंस का वध किया था। तो हम लोग भी इनका वध करेंगे। माने मेंटली [हंसी] उनके प्रति द्वेष भाव रख के। किंतु देखिए ये जो ट्विस्टेड थिंकिंग है यही ट्विस्टेड थिंकिंग हम यह नहीं सोचेंगे कि यदि भगवान राम भगवान कृष्ण ने ये जो राक्षसों की हत्या की सामने उन्होंने तपस्या भी कितनी की है। अपने माइंड को प्यूरिफाई भी कितना किया है। तो अपने मन को प्यूरिफाई नहीं करना है। सीधासीधी लोगों के ऊपर में यह द्वेष रूपी जहर ढाल ढाल देना है। यह तो कोई दिव्यत्व की ओर जाने का रास्ता नहीं हुआ। यह पशुत्व की ओर जाने का ही रास्ता हुआ। तो यह जो मां का यह जो पूरा पारिवारिक जो जीवन है, पारिवारिक जीवन है, एक गांववासी मां को इग्नोर कर रहे हैं। कोई उनकी खबर लेने वाला नहीं है। यह जो रामलाल दादा वो फालतू की ये सब कहानी आएगी कि किस तरह से उन्होंने मां को इस तरह से ये मां के प्रति वे लोग इनडिफरेंट है। मां की जो तपस्या है, कष्ट है, मां को सहाय करने का तो दूर ही रहा। मां को ऊपर से बहुत तरह की बाधाओं की सृष्टि की है। यह सब गंभीरानंद जी अभी हमको डिटेल में बताएंगे और यह पढ़कर के हमारे मन में यह कहीं ना हो जाए कि देखो कि इतना विषम वातावरण में रहकर के भी मां ने इनके प्रति आशीर्वाद ही दिए हैं। मां ने इनके प्रति सद्भाव ही रखा है। मां के हृदय में इनके सबके प्रति मातृभाव ही रहा है। तो यह तो मां के लिए संभव है क्योंकि मां भगवती है। हमारे लिए संभव नहीं क्योंकि हम यह अर्जुन की तरह युद्ध करने को आए हैं। यह जो ट्विस्टेड लॉजिक बताना शुरू करेंगे देखेंगे कि पशुत्व की ओर ही जाते जाएंगे। दिव्यत्व की ओर जाना है। जहां तक यह कम्युनिटी लाइफ का प्रश्न है, चाहे अपना परिवार हो, अपना यह पड़ोस हो, अपनी यह सोसाइटी या अपार्टमेंट हो, अपना वर्क प्लेस हो, अपना यह एकेडमिक जो जहां क्लास रूम हो, जहां पे भी आप जहां पे भी जाएंगे आपके आसपास में कुछ लोग तो रहेंगे ही रहेंगे। वो एक क्या कहेंगे? कम्युनिटी लाइफ रहेगा ही रहेगा। माने रास्ते में जहां पर वो रेड लाइट होती है आपको वहां पर खड़े रहना है। वो सिग्नल चौराहा जिसको बोलते हैं ना क्रॉस रोड पे सिग्नल की वजह से आपको खड़े रहना है। आप देखेंगे कि आपके साथ में आसपास में 10-15 व्हीकल 2025 व्हीकल डिपेंडिंग ऑन ट्रैफिक वे लोग खड़े हैं। वो भी एक कम्युनिटी बन जाता है। 1 मिनट के लिए वो जो सिग्नल जो रेड लाइट होती है कितना मिनट तक रहती आई थिंक 60 सेकंड माने इतना कुछ रहती है। तो माने इवन दो 60 सेकंड के लिए भी आप लोग साथ में खड़े हैं। कम्युनिटी बनती है। जहां पे भी आप मनुष्य के संपर्क में आएंगे एक कम्युनिटी बनती है। वहां पे आपको यह जो मां का जीवन है किस तरह से मां ने जिया है वो हमको याद रख के इस तरह से उसका 1% अनुकरण करने का प्रयास करना है। और जो 99% ना हो पाए उसके लिए एक्सक्यूज नहीं देना है कि मेरे से कहां होगा? वह तो मां से ही होगा। कहो कि मां मैं दुर्बल हूं बोल करके नहीं हो पा रहा है। मुझे यह शक्ति दीजिए कि जिससे कि आपने यह जो आदर्श स्थापित किया है उस पे मैं चल पाऊं। तो यह कामार पुकुर के जैसे महाराज कहते हैं कि अति दुखमय कामार पुकुर जीवन का प्रारंभ हुआ। तो इसके जितनी भी घटनाएं हैं अभी अभी नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
एक भक्त: माँ इतना सहन करती थी. हम तो संसार में रहते है. हम लोगो को कितना सुधारे, कितना सहन करे? लोगो को डांटेंगे नहीं तो लोग सीखेंगे कैसे?
देखिए मां डांटती नहीं थी ऐसा नहीं था। माने जथेष्ठ कहानियां है कि ये नलिनी है। एक बार नलिनी ने मां को कहा एक एक लड़का आया था मनसा उसका नाम। तो मां के पास में आकर कहता है मां मुझे सन्यास चाहिए। मां आप मुझे सन्यास दीक्षा दीजिए। मां ने उसको गेरुआ दिया, आशीर्वाद दिया और फिर वो आनंद से वो वरांडे में बैठकर के हारमोनियम से वो गाना गा रहा है। बड़ा सुमधुर कंठ था। तो वो मां काली के वो जो काली कीर्तन है बेंगलु में फेमस वो गा रहा है। तो मां के घर की जितनी भी स्त्रियां है वो सब वहां पे वो बैठकर के सुन रही है। तो नलिनी मां को कहती है अरे मां इतना अच्छा लड़का है। कहां वो मां-पिता जी की सेवा करेगा? नहीं तुमने उसको साधु बना दिया। अभी वो कनखल जाकर के ये रोगियों के मल मूत्र साफ करेगा। क्या तुम उसको साधु होना है तो अपने से हो। तुम क्यों इसमें पाप लेती हो उसको साधु बना करके? तो नलिनी ने जैसा ऐसा कहा मां ने उसको जो डांटना शुरू किया है कि तुम्हारी तरह सभी लोग क्या पशु भाव का आश्रय ले जीवन जीने के लिए आए हैं। तुम्हारा हर साल तुमको बच्चा पैदा होता है। फिर भी पति के पास जाती हो। तुमको इतना कष्ट होता है। ये पशु भाव दूर करो वरना मैं तुमको भगा दूंगी यहां से। ऐसा जोर से डांट के कहा तो नलिनी बेचारी चुप हो गई। सो ऐसे इनफ उदाहरण है। मां ने डांटा है। देखिए यहां पे जो रूल ऑफ थंब है मां का संतान के प्रति वात्सल्य भाव है। एट द सेम टाइम मां उसको मारती भी है। माने डिसिप्लिन भी करती है, मारती भी है। की कहां पे है? एक टीचर एक स्टूडेंट को मारेगा और मां अपने बच्चे को मारेगी। व्हाट इज अ मेजर डिफरेंस? टीचर कभी गुस्सा होकर के नाराज होकर के द्वेष भाव से मारता है। मां स्नेह भाव से उसका भविष्य सुधारने के लिए उसको मारती है। तो सीक्रेट इज दिस कि हम किस भाव से उसको डिसिप्लिन करते हैं। गीता में तो यही है ना अल्टीमेटली कि शत्रुओं का वध नहीं करना यह कोई धर्म नहीं है। शत्रुओं का वध करो। किस भाव से वध करोगे? मुझे शरणागत होकर के करो। नहीं कि तुमको राज्य शासन प्राप्त करना है। उसके लिए उनका वध करो। सो डिसिप्लिन देम पारिवारिक लेवल पर सिविलाइजेशनल लेवल पर किल योर एनिमीज़ किंतु इस आशय से नहीं कि मुझे कोई सेल्फिश कोई लाभ प्राप्ति होती है। धर्म के आश्रय लेकर के करो। दैट इज अ सीक्रेट। मां ने इनफ डांटा है। इनफ कहानियां है। उन्हें एव्री लेवल पे साधुओं को भी डांटा है। एक साधु ने कुछ गलत काम किया। मां का बड़ा ही क्लोज वो सेवा किया है। मां की बहुत सेवा की है उसने। किंतु जब यह डिसाइड किया गया कि उसको अभी संघ से निकाल देना है तो यह साधु गया मां के पास में। मां ने कहा देखो भाई जो मां के हिसाब से तो मैं हमेशा तुम्हारा भला ही चाहूंगी। किंतु संघ के जो बड़ों ने जो डिसाइड किया है संघ के नियम के अनुसार वो तो तुमको फॉलो करना ही होगा। और फिर और किसी उसको तो मुंह पे ऐसा कहा और फिर मां ने दूसरों और किसी को कहा कि हमारा संघ ऐसे ही चलेगा। जो नियम बना के स्वामी जी ठाकुर संघ के जो बड़े अभी है उस समय तो राजा महाराज थे प्रेसिडेंट शरद महाराज जनरल सेक्रेटरी तो हमारा संघ ऐसे ही चलेगा जिसको रहना है वो रहे जो जो माने इस नियम में रह पाता है वो रहे जो नहीं रह पाएगा वो चला जाएगा तो मां ने तो स्पष्ट कह दिया है सो इन दैट सेंस मां वाज़ अ ग्रेट डिसिप्लिनरियन आपने गलत किया बोल के आपको स्वीकार कर लिया हर परिस्थिति में ऐसा नहीं इंडिविजुअल लेवल पे स्वीकार करेंगे संघ के लेवल पे नहीं करेंगे ये जो सब नंसेस जो होते हैं मां के बड़े क्लियर थे। वरना तो ऐसा हो जाएगा ना संघ कोई पागल लोगों को इकट्ठा करके एक दिन ऐसा आएगा। यह लोग ऐसा पागलपन करेंगे कि संघ का नाम बदनाम होगा। तो ये तो मां के कांसेप्ट्स बड़े क्लियर थे। सो ऐसा नहीं है कि मां ने नहीं डांटा या नहीं डिसिप्लिन किया। पागली मामी को श्राप दिया था। जग जाहिर है। उसको तो फिर यह कुष्ठ रोग हो गया। उसका हाथ गल गया। है ना? सो इनफ एग्जांपल्स आर देयर। किंतु सीक्रेट वही है कि मां में माने हृदय में मातृभाव है। किसी का अहित करने के लिए अपना स्वार्थ सिद्धि करने के लिए मां ने किसी को डांटा नहीं। बस वही सीक्रेट है। माने देखिए सिचुएशन और कॉन्टेक्स्ट अलग है किंतु रूल एक ही है। प्रिंसिपल सेम है। ठाकुर भी डांटते थे तो हित करने के लिए डांटते थे। अहित करने के लिए नहीं। स्वामी जी इवन गीता में भी हत्या करनी है तो एक लार्जर धर्म के आधार पर करनी है। माने हत्या करने से बड़ा और कुछ नहीं हो सकता। डिसिप्लिनरी एक्शन राइट? सो इवन दैट आपको धर्म के आधार पर करना है
एक भक्त: दूसरों को सुधारें या स्वयं सहते रहें—यह समझना कठिन हो जाता है कि कब क्या करना उचित है। ऐसा कौन-सा विवेक है, जो हमें सही निर्णय लेने में सहायता कर सकता है?
ना आध्यात्मिकता है दैट सीक्रेट कि कुशनिंग करता है स्पिरिचुअलिटी कुशनिंग्स ऑल दिस एक्सट्रीम्स ये जो ठाकुर मां स्वामी जी का जो सेंट्रल थीम यही है ना भले चाहे कॉन्टेक्स्ट भले चाहे उनका एनवायरमेंट डिफरेंट हो जिसमें उन्होंने ने काम किया द कॉमन थ्रेड गीता से लेकर के राम और कृष्ण से रामकृष्ण तक का कॉमन थ्रेड क्या है? इज़ अ स्पिरिचुअलिटी। लाइफ विल थ्रो यू करब्स। यह लाइफ आपको गुगली फेंकने ही वाला है। आपका बेट पक्का होना चाहिए कि आप बेटिंग कर पाए। सो बेट क्या है? दैट इज़ स्पिरिचुअलिटी। यदि वही वीक है तो आप तो क्लीन बोल्ड होते ही रहेंगे कंटीन्यूअसली। है ना? सो देखिए स्मार्ट चॉइस के दूसरों से सीखें। बैड चॉइस कि हम खुद गिरते रहे, गिरते रहे और हमारे खुद के कष्ट से सीखे। व्हाई नॉट टू लर्न फ्रॉम अदर्स? इनफ एग्जांपल है ना सोसाइटी में आज लोनलीनेस के, डिप्रेशन के, सुसाइड के। व्हाई डोंट वी लर्न फ्रॉम दैट?
एक भक्त: तो क्या कोई Golden Rule नहीं है कि कब सहें और कब लोगों को डाँटें?
गोल्डन रूल इज़ दैट अपना हार्ट एकदम क्लियर होना चाहिए। दैट आई एम एक्टिंग आउट ऑफ नॉट आउट ऑफ सेल्फिश डिज़ायर। दिस हैज़ टू बी क्लियर। उन्हें रूल ऑफ़ थंब यदि है सो दैट इज़ दैट कि सेल्फिशनेस नहीं होनी चाहिए। इवेंचुअली व्हाटएवर आई मे डिसाइड। कीप ऑन सफरिंग और कीप ऑन रिमेनिंग साइलेंट और टू प्रोटेस्ट। द रूल ऑफ़ थंब इज़ दैट नो सेल्फिशनेस मस्ट एंटर इन माय हार्ट।
एक भक्त: चुपचाप सहते रहने और अपने अधिकार के लिए खड़े होने के बीच ideal balance क्या है?
देखिए देखिए मैं कहूंगा कि देयर इज नो सच ए थिंग एज आइडियल बैलेंस लाइफ इज अ वर्क इन प्रोग्रेस राइट इवन आज आप ठाकुर मां स्वामी जी के लाइफ को भी यदि आप स्टडी करेंगे आपको कभी-कभी लगेगा कि व्हाटएवर दे हैव डन इज इट परफेक्टली आइडियली बैलेंस्ड और इट कुड हैव बीन इंप्रूव्ड विथ साइट ऐसा आपको लगेगा राइट हृदय ने मां का अपमान किया। ये कहां तक उचित था ठाकुर के लिए चुप रहना? व्हाट टाइप ऑफ जजमेंट कॉल वास दिस? मैं तो स्वीकार नहीं करूंगा इस बात को। तो [हंसी] भगवान राम ने मां सीता का त्याग किया। व्हाट टाइप ऑफ जजमेंट कॉल वास दिस? ये मैं भी नहीं स्वीकार अभी कर पाऊंगा। सो दैट यू कैन विथ हैंडसाइट ऑलवेज से कि वेदर दे राइट ऑोंग। दिस इज़ ऑलवेज अ वर्क इन प्रोग्रेस। आज का आपका जो जजमेंट है कल आपको लगेगा इन हैंडसाइट कि वह ठीक नहीं था। लेट मी आई कुड हैव डन बेटर। सो दैट इज ऑलवेज देयर एस लॉन्ग एज वी रिमेन ट्रू टू आवर आइडियल और दूसरा क्या है स्वामी जी कहते हैं ना अल्टीमेटली देखिए कि ये सब तो एक सुपर कॉन्शियस लेवल से आता है ना सो आध्यात्मिकता में जितना आगे बढ़ते जाएंगे अपना इंस्टिंक्ट इट विल गेट हड शार्प होती जाएगी कि क्या सही है क्या गलत है ठाकुर कहते हैं ना परमहंस गलती से भी गलती नहीं करता सो वो गलती से भी गलती नहीं करना वो आता जाएगा आएगा धीरे-धीरे
एक भक्त: ठाकुर कहते हैं—जिसने अपना सारा भार जगन्माता को सौंप दिया है, उसके पाँव गलती से भी गलत जगह नहीं पड़ते। हमें इससे क्या सीखना चाहिए?
तो शरणागति तो पहले लाना है ना जैसे-जैसे शरणागति आती गई फिर हम जितने भी जजमेंट को लेंगे दे विल प्रूव करेक्ट इन अ लॉन्ग टर्म होपफुली