मङ्गलाचरण
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र इस सप्ताह हम पाठ करेंगे चिर सिमंतिनी इस अध्याय का पाठ हमारा चल रहा है गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी हुई मां शारदा की जीवनी में ऑलरेडी श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि हो चुकी है और महासमाधि के ऊपर में जो विभिन्न डायरेक्ट डिसाइपल ने विवरण लिखे थे उसका भी हमारा पाठ हो चुका है। अभी हम फिर से वही पुस्तक की ओर चले जाते हैं और महासमाधि के बाद क्या हुआ उसका पाठ करेंगे। अभी जैसे कि हमारा लास्ट टाइम भी डिस्कशन हुआ था। ऑलरेडी इसके बाद की जो घटना है महासमाधि के बाद की इसका विषद विवरण विस्तृत हमने चर्चा स्वामी जी के जीवन में कर दी है। जिस गंभीरानंद जी की ही युगनायक विवेकानंद और इसी पुस्तक में से दोनों में से जितना भी मटेरियल हमको मिला है हमने कंपाइल करके उस समय पूरा डिस्कशन कर दिया है। तो यहां पर संपूर्ण डिस्कशन नहीं करके थोड़ा सा ऊपर ऊपर से ही देख लेंगे क्योंकि यह जो कुछ घटनाएं अभी होने वाली है अस्थि को लेकर के जो विवाद जो डिस्प्यूट होने वाला है और फिर वो तो एक इंपॉर्टेंट घटना हुई है। दूसरा है कि ठाकुर ने दर्शन की परंपरा प्रारंभ कर दी है। तो वह एक दूसरी इंपॉर्टेंट घटना महासमाधि के कुछ ही दिनों के बीच में यह दो इंपॉर्टेंट इवेंट हो चुकी है। हमने ऑलरेडी स्वामी जी के जीवन में इन दोनों के ऊपर में काफी विषद चर्चा की है। तो यहां पर सिर्फ मां की दृष्टि से ही इस दोनों घटनाओं को हम देखेंगे। गंभीरानंद और देखिए कि यह भी पिछली बार हमने डिस्कस कर ही लिया था कि किस तरह से जीसस को जब क्रुसिफाई किया गया उस समय जो मेल एपोस्टल थे पुरुष जितने भी जीसस के डिसाइपल थे वे लोग डर करके वहां से भाग गए थे और क्रॉस के पास में तो कोई खड़ा ही नहीं था। बस वही वह मेरी मैकडेलिन है और साथ में और दो लेडीज खड़ी थी वहां पे और यही मेरी मैकडेलिन जिसको कि चर्च ने लंबे समय तक एक प्रॉस्टिट्यूट है ऐसा करके ही चलाया था। अभी जस्ट रिसेंटली उसको कि नहीं वो सिर्फ एक प्रॉस्टिट्यूट नहीं वो एक जीसस की वन ऑफ द मोस्ट प्रोमिनेंट डिसाइपल है। ऐसा करके स्वीकार किया है। अभी जस्ट आई थिंक 6070 इयर्स पहले ही यह हुआ है। तो देखिए कि यही मेरी मैकडेलिन जबकि वहां जीसस की जो शब देह है मृत देह उनको जहां पर [गला साफ़ करने की आवाज़] दफनाया गया था। उसी चेंबर के बाहर में खड़ी थी। और जीसस ने आकर के जब रिजरेक्शन हुआ जीसस का तो सर्वप्रथम दर्शन मेरी मैकडेलिन को ही दिया था। फिर यही मेरी मैकडेलिन जाकर के जीसस के जितने भी एपोस्टल्स है सेंट पीटर वगैरह सबको जाकर के मैसेज मेरी मैकडेलिन ने ही दिया कि जीसस हैज़ रिजरेक्टेड। तो क्या है कि इतने लंबे समय तक चर्च का जो हिस्ट्री है 2000 साल तक तो उसको साइडलाइन ही कर दिया था यह कह के कि स्त्रियों का क्या स्थान है धर्म में और फिर अभी जस्ट रिसेंटली 1960 के आसपास में ही उसको एक सम्माननीय स्थान मिला है। किंतु देखिए कि ऑलरेडी उसके बारे में अच्छी धारणाएं बनना शुरू हो ही चुकी थी और सेंट टॉमस एक्विनास जो है उन्होंने मेरी मैकडेलिन को कहा था शी इज़ एन एपोस्टल ऑफ द एपोस्टल्स यानी कि एपोस्टल्स अर्थात कि जीसस के डायरेक्ट डिसाइपल एंड शी इज़ द एपोस्टल टू द एपोस्टल्स अर्थात कि इवन जीसस के डायरेक्ट डिसाइपल को जीसस रिजरेक्ट हुए हैं। यह गुड न्यूज़ देने वाली मेरी मैकडेलिन थी। अर्थात कि टीचर्स टीचर ऐसा आप कह सकते हैं गुरुओं की भी गुरु यदि हिंदी ट्रांसलेट करना है तो तो ये पोस्टल को यदि आप गुरु गिनते हैं तो गुरुओं की भी गुरु। सो यहां पे रामकृष्ण संघ में भी देखिए कि मां का जो स्थान है ठाकुर की आखिरी जो बीमारी चल रही थी उसी समय मां ने जैसे क्वाइटली साइलेंटली यह लीडरशिप का रोल लेना प्रारंभ कर दिया था ऑलरेडी यह जो डायरेक्ट डिसाइपल है त्यागी संतान है ठाकुर के नरेंद्र है राजा महाराज है महापुरुष महाराज शशि महाराज, लाटू महाराज, अद्वैतानंद जी खास करके यह लाटू महाराज, अद्वैतानंद जी, नरेंद्र ये जो ठाकुर की सेवा में जो सब समय वहां पर रहते थे उन्होंने मां को ही पूछ के मां की ही आज्ञा लेकर के सर्व कार्य करना प्रारंभ कर दिया था। और मां भी जब भी उनके पास में कोई भी यह लड़के आते त्यागी संतान तो उनको समयोचित सलाह उपदेश देती। तो ऑलरेडी यह घटना परंपरा प्रारंभ हो चुकी है और हमने इसके रिलेटेड यह भी डिस्कस किया था कि यह जो ठाकुर के अंतिम दिन और महासमाधि के बाद के यह जो दर्शन वाले दिन प्रारंभ प्रारंभ में जो ठाकुर ने दर्शन दिए हैं, मां को दर्शन दिया, स्वामी जी को दर्शन दिया। इससे क्या एस्टैब्लिश करना चाहते थे ठाकुर कि कंटिन्यूइटी ऑफ लीला लीला कंटिन्यूइटी लीला सातत्य माने अभी तक ठाकुर प्रकट लीला कर रहे थे अभी अप्रकट लीला कर रहे हैं। प्रकट लीला अर्थात कि पंच महाभूत के देह में उन्होंने लीला की और अप्रकट लीला अर्थात कि भक्तगणों के हृदय में विराजित होकर के अभी ठाकुर लीला कर रहे हैं। तो यह कंटिन्यूटी ऑफ रामकृष्णस टीचिंग्स एंड श्री रामकृष्णास उपदेश यह जो है यह कुछ दिनों में प्रतिपादित होता है। तो इस सबको लेकर के हमारा काफी कुछ डिस्कशन ऑलरेडी हो चुका है। हम सिर्फ थोड़ा सा पढ़ लेते हैं
महासमाधि के ही दिन ठाकुर प्रकट हो माँ को दर्शन देते है
कि महासमाधि के दूसरे दिन क्या हुआ है। उस म उसी दिन 16 अगस्त को अर्ली मॉर्निंग ऐसा ही तो कहेंगे। नाइट कहेंगे तो फिर बाद में हो जाएगा। अर्ली मॉर्निंग ऐसा ही कहा जाएगा कि 1:00 बजे माने सूर्योदय से भी पहले 1:00 बजे ठाकुर की महासमाधि हुई। फिर उसी दिन शाम को ठाकुर का जो है स्थूल देह उसको अग्निदाह किया गया काशीपुर महाशान में और फिर उसी दिन शाम को मां जो है एक के बाद एक अलंकार अपने देह से उन्मोचित करके रख रही है। तो यह जो घटना है गंभीरानंद जी कहते हैं ए के संध्या काले श्री मां देहो होइते एके एक अलंकार उन्मोचन करिया परिशेष जोख सोनार बाला खुली ते उत होले तोख अकस्मात ठाकुर गोरो के पूर्वकार मूर्ति ते आविर्भूत होइया तार हाथ चापिया बोलीलेन हाथ चापिया धरिया बोलीले आ की मोरे छ जे तुम एो स्त्री जिन हाथ के खुले फेल छो श्री मां आर बाला खुली लेना यहां पे संध्या के समय श्री मां अपने देह से एक के बाद एक अलंकार उन्मोचन करके आखिर में जब सोने की यह जो चूड़ियां है बाला उसको खोल निकालने के लिए उद्यत हुई प्रस्तुत हुई तैयार हुई उस समय एकाएक ठाकुर गले में जो रोग हुआ था उसके पहले जैसे सुस्थल ठाकुर थे तो उसी मूर्ति में उसी वेश में उसी देह के साथ में फिर से आविर्भूत हुए और मां का हाथ पकड़ कर के बोले मैं क्या मर गया हूं कि तुम यह सधवा स्त्रियों की यह जो निशानियां है उसको अपने हाथ में से निकाल दे रही हो। जब ठाकुर ने ऐसा कहा तब मां ने और फिर चूड़ियां निकाली नहीं। अभी आप देखेंगे कि जो मां का जो फोटोग्राफ है मंदिर मंदिर में जिसकी पूजा होती है वरशिप पोज जिसको कहते हैं देखेंगे कि वो चूड़ियां जो है स्पष्ट रूप से मां के हाथों में दिखती है और यह भी पता ही होगा अनफॉर्चूनेटली यही चूड़ियां जो है वो बेलूरमठ म्यूजियम से चोरी हो गई है तो अभी क्या करें मां की जैसी इच्छा वो ठाकुर की महासमाधि के बाद में ठाकुर के जो व्यवहृत वस्त्र वगैरह बलराम बाबू के घर में रखे गए थे तो वहां से बलराम बाबू का कोई नौकर के ऐसा कोई होगा उसने वो वस्त्र वगैरह जो व्यवहृत जो वस्तुएं थी व्यवहृत अर्थात कि उनके द्वारा उनके द्वारा व्यवहार की गई उनके द्वारा इस्तेमाल की गई तो जैसे चप्पल होते हैं जैसे कोट होता है शर्ट होता है वगैरह-वगैरह जो कुछ भी हम व्यवहार करते हैं छाता है वगैरह बर्तन वगैरह जो है उसको व्यवह कहते हैं। तो ऐसी कुछ चीजें बलराम भवन में से ही चोरी हो गई थी। सो अभी क्या कहेंगे जैसे ठाकुर की इच्छा तो यहां पर देखिए कि ठाकुर ने दर्शन देकर के मां को कहा कि मैं क्या मर गया हूं कि तुम यह चूड़ियां जो है यह निकाल दे रही हो। जब ठाकुर ने ऐसा कहा तो फिर मां ने वो उसको उनको पहन के रखा और इसका वही कि ठाकुर पंचमहाभूत के देह से यदि हमारी नजरों के सामने से चले गए हैं तो भक्तगण के हृदय में विराजित होकर के अभी लीला करने वाले हैं। और जब यह बात सुनी तो फिर सभी डायरेक्ट डिसाइपल ने कहा कि तो फिर लीला सेवा जैसे चल रही थी वैसे ही चलेगी। अर्थात कि यदि ठाकुर ने आकर के दर्शन दिया है मां को तो फिर अभी ठाकुर की जैसे पंचमहाभूत के देह में स्थूल देह में जैसे सेवा कर रहे थे वैसे ही अभी उनके सूक्ष्म देह की भी उनकी सेवा करेंगे ठाकुर की अस्थियों को वहां पर स्थापित करेंगे तो वह भी पूरा आएगा यहां पे और फिर गंभीरानंद जी
ठाकुर की महासमाधि बाद माँ सारदा पतला लाल बॉर्डर वाला वस्त्र धारण करती है
कहते हैं बलराम बाबू ताहार जनो सादा कापड़ किन्या आिया छले बलराम बाबू मां के लिए सफेद वस्त्र परचेस करके लाए थे। जिस तरह से विधवाओं को पहनने हैं। कलर वाले कपड़े नहीं पहन सकती सफेद वस्त्र पहनने हैं। उहा श्री मां के दीवार जनो गोलाप मार खाते दिल तीन आतंक बोलिया उठिले। जब यह सफेद वस्त्र बलराम बाबू ने गोलाप मां को दिया कहा कि श्री मां को दे दो तो गोलाप मां आतंक से बोल उठी बाप रे ए सादा थान कापड़ के तार हाथ देते जावे बाप रे यह सफेद वस्त्र कौन मां के हाथ में देने को जाएगा यह बहुत ही आप देखिए कि एक प्रोइग्नेंट एक सीन है। एक इमोशंस से भरा हुआ यह सीन है। अभी तक मां सधवा थी। लाल साड़ी, अलंकार वगैरह पहना करती थी। और अभी एकाएक देखिए ठाकुर की मृत्यु के बाद में सफेद वस्त्र पहनने हैं। अलंकार नहीं पहनने हैं। वगैरह-वगैरह जो उस समय के विधवाओं के लिए जो कठोर नियम थे उन सब का अभी पालन करना है। तो अभी यह सफेद वस्त्र लाकर के मां के हाथ में कौन देने को जाएगा? और बात भी सही है। देखिए अन्नपूर्णा स्वयं तो श्री श्री मां है जिनके पति जो है सदाशिव महेश्वर स्वयं जो कि उनकी शक्ति होकर के जिनके साथ में विराज करती है उनको कभी विधवा होना यह कांसेप्ट ही तो नहीं है। नारायण और नारायणी यह दोनों की तो अनंत नित्य लीला है। दोनों का जिस तरह से विच्छेद नहीं हो सकता वैसे नारायण की मृत्यु भी तो कहां हो सकती है। किंतु देखिए यह समाज में रहना है तो समाज के जो नियम है वगैरह थोड़ा तो फॉलो करने पड़ेंगे। तो यहां पर बेचारी गोलाप मां बड़े ही आतंक से यह बोल उठी कि अरे यह सफेद वस्त्र मां को कौन देने को जाएगा? सफेद वस्त्र उसमें भी उसकी जो किनारी जो होती है बॉर्डर जो होती है वह भी सफेद है। देखिए मां ने एक ब्रह्मचारी को कहा था उन्हें यह बहुत दिन सालों के बाद की बात है। रामकृष्ण मिशन प्रारंभ हो चुका है। मां उस समय जय राम बाटी में थी कि उद्बोधन में थी। मैं भूल गया। किंतु जब एक ब्रह्मचारी मां को प्रणाम करने को आया। मां ने देखा कि अभी ब्रह्मचारी को तो सफेद कपड़े पहनने हैं। किंतु जो धोती होती है उसको एक बॉर्डर होती है। यदि आपने साधुओं को खास करके ब्रह्मचारियों को यह ब्रह्मचारियों की धोती आपने निरीक्षण की होगी। बेंगली लोग जो है उनको तो पता ही होगा। नॉन बंगाली को शायद ना पता हो कि उसका जो बॉर्डर होता है कलर वाला बॉर्डर होता है। यहां पे साउथ इंडिया में इतनी बड़ी-बड़ी बॉर्डर होती है। माने 2 इंच 3 इंच वाली कलरफुल बॉर्डर होती है। हमारे जो पुजारी महाराज हैं यहां पे वो बड़े शौकीन है इस तरह की मोटी-मोटी बॉर्डर वाली धोती पहनने में। तो बंगाल में भी इस तरह की इतनी मोटी बॉर्डर वाली धोती मैंने बंगाल में नहीं देखी। ज्यादा से ज्यादा 1 इंच वाली और जैसे मैं प्रेफर करता हूं एक लाइन सिर्फ होनी चाहिए पतली सी इससे ज्यादा मुझे कलर नहीं पसंद है तो इस तरह की किंतु एक लाइन भी तो होनी चाहिए जो कि जनरली होती ही है किंतु कुछ-कुछ धोती होती है कंप्लीटली वाइट होती है बॉर्डर होती है क्योंकि क्या है बॉर्डर जो है धोती का वस्त्र तो यह तो कॉटन की बनी हुई है यदि यह जो स्ट्रांग एक बॉर्डर नहीं होगी तो धोती फट जाएगी। तो क्या है एक बॉर्डर तो होती है किंतु कोईकोई बॉर्डर होती है वाइट कलर की तो धोती भी वाइट है बॉर्डर भी वाइट है। तो विधवाओं को तो ऐसे ही वस्त्र पहनने हैं। तो अब जब यह ब्रह्मचारी जिसकी मैं बात कर रहा हूं मां को प्रणाम करने को गया। मां ने देखा ब्रह्मचारी की धोती तो सफेद होती है। ऊपर से बॉर्डर भी सफेद है। तो मां ने कहा अरे यह सफेद बॉर्डर वाली तुमने धोती क्यों पहननी है? इस तरह से तो तुम्हारा मन उदासित हो जाएगा। तुम मैं तुमको यह कलर वाली बॉर्डर की धोती देती हूं। उसको पहनो। तो मैं जब बेलूर मठ में गया था नया-नया उस समय मैं जॉइनिंग का ही पीरियड मेरा तो क्या है कि आप जब जॉइ करने को जाएंगे तो कुछ ठिकाना नहीं। आप कितने दिन रहेंगे, कितने दिन नहीं रहेंगे तो और वहां पर लड़के आते भी बहुत है। एकद सप्ताह रहेंगे फिर देखेंगे यह जो रूटीन है इतना डेंजरस है फॉलो नहीं कर पा रहे हैं तो वे लोग भाग जाएंगे। तो पहला एक महीना जब आते हैं उसमें से 50% भाग जाते हैं। 50% टिक जाते हैं विद इन वन मंथ ऑफ जॉइनिंग। तो क्या है कि 1 महीने तक आपको सेकंड हैंड कपड़े देंगे। क्योंकि जितने भी आते हैं हम सब तो पेंट शर्ट में आते हैं। फिर वह धोती कुर्ता वगैरह पहनना है ब्रह्मचारी का तो सभी को यदि नए वस्त्र बनाना शुरू करेंगे तो फिर बहुत खर्चा हो जाएगा। वैसे 50% भाग जाने वाला है। तो आफ्टर वन मंथ पहले जब हम जाएंगे सेकंड हैंड कुर्ता है। सेकंड हैंड धोती है। वहां पे बहुत बड़ा स्टॉक पड़ा हुआ है। उसमें से आपको वो वहां का जो हमारा मॉनिटर होता है जो लड़के जॉइ करने को गए उसमें से एक को मॉनिटर बना है जो कि रिलेटिवली सीनियर है। तो वो मॉनिटर ले जाएगा स्टोर रूम में। कहेगा यह सब सेकंड हैंड है। तुमको जो साइज फिट होता है ऐसा शर्ट वगैरह ले लो। तो उसमें से पसंद करके ले लेना है। एक आध महीना सेकंड हैंड पहनना है। फिर थोड़ा हम स्टेबल हो गए। इनको लगेगा कि अभी यह भागेगा नहीं रह जाएगा। तो फिर बेलूर मठ का टेलर है। उसको बुला करके वो स्पेशल वो मेजरमेंट लेकर के कुर्ता बनाते हैं और फिर वहां पर स्टोर में जो नई धोती होती है वह देते हैं। तो मेरा एक महीना हो चुका है। टेलर को बुलाया है कुर्ता सिलाने के लिए। टेलर ने मेजरमेंट ले लिया। फिर ये मॉनिटर मुझे वो स्टोर रूम में ले जाता है। बोला ये नई धोती पड़ी है। तुमको कौन सी चाहिए ले लो। तो क्या है बाय दैट टाइम हम लोग तो ऑब्जर्व करते हैं ना सबको धोती पहने हुए सीनियर बेलूर मट्टूपुरा साधुओं से भरा है 100 150 साधु ट्रेनिंग सेंटर के ब्रह्मचारी सबको तो हम देखते हैं भोजन के समय मंदिर में जाने के समय प्रणाम के समय तो मैंने ठीक करके रखा था कि जितनी भी टाइप की बॉर्डर है उसमें से एक पतली वाली बॉर्डर होती है एक मोटी वाली 1 इंच की साउथ इंडिया में तो 3-3 इंच की बॉर्डर होती है कभी-कभी तो इस तरह की बॉर्डर वहां वहां पे नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा 1 इंच की बॉर्डर होती है। तो एक सिर्फ एक लाइन है, एक आधे इंच की बॉर्डर है और एक 1 इंच की बॉर्डर है। मैंने जो क्लासिफिकेशन किया बाय दैट टाइम एक महीना ऑब्जर्व करके तो मैंने ठीक किया था कि जब मुझे अपनी नई धोती पर्सनल धोती जब मिलेगी तो वो जो 1/2 इंच वाली जो बॉर्डर है वो वाली धोती लूंगा। उसका भी कलर मैंने देखा वो तीनचार मैंने कलर देखे थे उसमें रेड मरून कलर था मुझे बहुत अच्छा लगा था तो मैंने कहा मॉनिटर को कि अच्छा मुझे इस तरह का धोती मिलेगा क्या तो बोला यह पड़ा है सब देख लो उसमें से तो नया धोती है ना वो प्लास्टिक वगैरह में पैक करके जैसे वो मिल में से आता है वहां पे स्टेक करके रखा था तो मैंने एक के बाद एक खोल के देखना शुरू किया काफी देखा मुझे एग्जैक्टली जो चाहिए मिल नहीं रहा है तो वो मॉनिटर किंतु पेशेंस वो वो खड़ा है शांति से बोला तुमको जो पसंद है ले लो डोंट वरी तुम सेलेक्ट करो मैं खड़ा हूं तो काफी 101 मिनट बड़ा स्टॉक था उसमें से आखिर में मुझे वो एग्जैक्ट वही बॉर्डर वाला धोती मिला जैसे दो-तीन धोती तो चाहिए एक से तो चलेगा नहीं तो दो-तीन इस तरह से मिल गई फिर उसको लेके मैं पहली बार जब पहना मुझे इतना खुशी हो रहा था सो देखिए कि अपने ऑर्डर में क्या है कि बिल्कुल सफेद वस्त्र और सफेद बॉर्डर इस तरह से मां भी पसंद नहीं करती थी। इवन मां भी कहती है कि एटलीस्ट कलर वाली बॉर्डर होनी चाहिए वरना मन उदास हो जाएगा। यह मन भी जो है ना इस तरह से माने वो विधवा की तरह हो जाएगा। तो यहां पे जब यह गुलाब मां यह सफेद साड़ी सफेद वस्त्र और उसकी सफेद कलर की बॉर्डर इस तरह से मां को जब देने को गई तो उन्होंने देखा क्या देखा? पर तनी श्री माय निकट गया देख त निजो होश कापड़ गुल पाड़ छड़िया शुरू करिया लोया छे तदबदी तनी खूब शुरू लाल पेड़े कापड़ पोरी ते जब वो उनको देने को गई गुलाब मां तो उन्होंने देखा कि मां के पास में शायद ऑलरेडी एक सफेद कलर का एक वस्त्र होगा जिसकी एक रेड कलर की बॉर्डर होगी किंतु यह बॉर्डर थोड़ी थोड़ी मोटी होगी। तो मां ने क्या किया है? बॉर्डर को फाड़ करके चीर करके एक पतली सी बॉर्डर रख दी है। और लाल कलर की इस तरह से मां ने पहनी है। और फिर इस उस समय से लेकर के मां खूब पतली लाल कलर की बॉर्डर वाली यह साड़ी पहनती थी। अभी आप देखिए मंदिर में मां का जो जहांजहां पर कलर फोटो है ब्लैक एंड वाइट फोटो में आपको बॉर्डर दिखता है किंतु कलर फोटो में बॉर्डर को कलर किया है रेड कलर का कलर सो उस तरह से फिर मां ने पहनना शुरू किया था ठाकुर नित्य लीला विराम नाई ठाकुर की नित्य लीला का विराम नहीं है चीर सधवा श्री मायरो शतकार विच्छेद नाई और चीर सधवा श्री मां का भी ठाकुर के साथ में सत्य सत्य कोई भी विच्छेद नहीं। ठाकुर की लीला भी नित्य है। मां के साथ में जो ठाकुर का मिलन है वह भी नित्य है। मां है चीर सधवा कभी विधवा हो नहीं सकती। इसको लेकर के फिर बादबाद में यह जो चूड़ियां पहन के रखी है, यह जो रेड बॉर्डर वाली साड़ी पहनती है, मस्तक मुंडन नहीं करवाती है, वगैरह-वगैरह लेकर के फिर बाद में काफी कुछ चलेगा। कामरार पुकुर जब मां वापस जाएगी उस समय उस सब घटनाओं को देखेंगे। तो यह हो गया कि जो लीला कंटिन्यूटी जो होने वाली थी उसका जो एक दर्शन ठाकुर ने ऑलरेडी दे दिया है और इसके बाद में ही डायरेक्ट डिसाइपल ने ठीक किया कि जिस तरह से सेवा चल रही थी ठीक वैसे ही सेवा कंटिन्यू
ठाकुर की अस्थि को लेकर गुरुभाई और रामचंद्र दत्त में विरोध
रहेगी। इसके बाद में वही अस्थि वाली बात डिस्प्यूट ऑन अस्थि क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? तृतीय दिन मध्याने श्री श्री ठाकुर पुता पूर्ण कलशीर सम्मुखे भोग निवेदित होइलो तीसरे दिन दोपहर को श्री ठाकुर के पूत अस्थि से पूर्ण कलसी के सामने भोग निवेदित हुआ ए के प्रवीणो भक्तगण स्थिर को ले जे ठाकुर देह त्यागे पोरे उद्यान बाटी राखा आर कोनो सार्थकता नाई यहां पे ठाकुर के प्रवीण भक्तों ने ठीक किया कि ठाकुर के देह त्याग के बाद में उद्यान बाटी रखने का अभी कोई सार्थकता नहीं है। श्री श्रीय तो नरेंद्र आदि युवक को भक्तगण अवश्य ठाकुर अस्थि संरक्षण एवं श्री माय शोक रा जन अंतत आरो किु दिन बाड़ीटी धरिया राखीते चाहिले नरेन वगैरह युवक भक्तों ने रिक्वेस्ट किया कि ठाकुर के अस्थि की रक्षा के लिए और श्री मां के शोक रास के लिए रास अर्थात कि कम होना शोक का कम होना। यह अभी जो तीव्र शोक है मां के हृदय में ठाकुर के अभी तो ठाकुर की महासमाधि हुई प्रारंभ के दिनों में जो तीव्र शोक रहता है उसके रास के लिए वह कम हो इसलिए उन्होंने रिक्वेस्ट किया कि यह जो बागानवाड़ी है और कुछ दिन हम रखते हैं। किंतु अर्थो सामर्थो ना थाका तहां देर पोखे तो प्राचीन देर मोते विरुद्ध किछुई कोरा संभव छिलोना किंतु इन त्यागी संतानों के पास में अर्थ सामर्थ्य की पैसों की कोई व्यवस्था न रहने से उनके पक्ष में तब प्राचीन प्राचीन जो भक्त थे माने ये जो सीनियर डिवोटीज थे उनके मत के विरुद्ध में कुछ भी बोलना कुछ भी करना संभव नहीं था वयोष् को देर बिचारे स्थिर
ठाकुर की महासमाधि के बाद काशीपुर उद्यानगृह त्याग करने का निर्णय
हो बाड़ी भाड़ में फुरया गले उहा छाड़िया देवा होवे यह जो वयस्क भक्तगण थे खास करके यह रामचंद्र दत्त उन्होंने ठीक किया कि यह जो वाड़ी है उसका जो भाड़ा है उसका जो रेंट है वह ऑलरेडी तो महीने भर का दे दिया गया है। ठाकुर की महासमाधि हुई है 16th अगस्त को तो यह महीने के आखिर तक तो यह भाड़ा है अभी तक तो महीने के आखिर तक रहेंगे और उसके बाद में इस वाड़ी को इस घर को छोड़ देंगे अस्थि तत्पुर्वे श्रीक्त रामचंद्र दत्त महाशय काकुड़गा योगोद्यान नाम में प्रसिद्ध भूमि खंडे समाहित होबे एवं श्री मां अनत्र चलिया जबे अस्थि इसके पहले ही अर्थात की यह जो उद्यान बाटी है उसको छोड़ने से त्याग करने से पहले ही श्रीजुक्त रामचंद्र दत्त महाशय के काकुड़ गाछी में आए हुए योगोद्यान नाम से प्रसिद्ध भूमि खंड में अस्थि समाहित होगी और श्री मां अन्यत्र चली जाएगी अन्यत्र कहां जाएगी बेचारी किंतु देखिए ठाकुर ने मां को कहा ही था कि तुम्हारा कामार पुकुर का जो घर है उसको को कभी तुम छोड़ना नहीं। भक्तगण तुमको रिक्वेस्ट करके भले ही चाहे कोलकाता अपने घर में लेके आए वगैरह-वगैरह किंतु अपना खुद का घर कभी छोड़ना नहीं है। और ठाकुर ने एक बड़ी इंपॉर्टेंट बात कही थी परम परो भाता होबा भालो किंतु पर घरो होवा भालो नहीं। अर्थात कि परभाता अर्थात कि दूसरों के हाथ दूसरों के द्वारा दिया हुआ अन्न ग्रहण करना फिर भी ठीक है। किंतु पर घोरो घरो अर्थात घर पर अर्थात अन्य का अन्य के घर पर डिपेंडेंट रहना यह ठीक नहीं है। इससे क्या है? अपना जो एक आत्मसम्मान है, अपना एक जो डिसीजन मेकिंग है, वह फिर हम लोग खो बैठते हैं। अब जैसे ठाकुर दक्षिणेश्वर में रहते थे, तो क्या है कि अपनी यह जो अपना खुद का जो संकल्प है उसके अनुसार रहते थे। उनका जीवन उनके हाथ में था। यदि वह इस तरह की जितनी ही चाहे चित्र विचित्र साधना करना चाहे। काली मंदिर में उनको संपूर्ण रूप से यह अनुमति थी क्योंकि यह मथुर बाबू है काली मंदिर के जो व्यवस्थापक वो संपूर्ण रूप से ठाकुर के सेवायत थे ठाकुर के आधीन थे तो क्या है ठाकुर के पास में स्वच्छंद्य से वहां पर रहने की अपनी खुद की इच्छा के अनुसार अपना जीवन बिताने की वह स्वाधीनता थी वरना एक ओर आप तपस्या कर रहे हैं। दूसरी ओर अब घर का मालिक ऐसा कहेगा कि अभी आप थोड़ा सा यह कर दीजिए, वो कर दीजिए, यहां पर थोड़ी पूजा कर दीजिए, वहां जाकर यह काम कर दीजिए। अपनी इच्छा नहीं होने से भी करना पड़ता है। तो क्या है? उसके उस समय फिर साधना में फिर धीरे-धीरे करके डिस्टरबेंस होना खड़ा होता है और फिर अपनी साधना गड़बड़ हो जाती है। इसलिए कभी भी किसी के घर पर भरोसा नहीं रखना है। यदि घर मालिक के साथ में गृहस्थ के साथ में यदि अपना थोड़ा सा भी डिफरेंस ऑफ ओपिनियन हुआ तो अपने पास में वह ऑप्शन होना चाहिए कि उनका घर छोड़कर के हम अपने घर चले जाएंगे। सो ठाकुर ने कहा था कि कामार पुकुर का अपना घर कभी छोड़ना मत। तो फिर मां ने भी प्रयास तो पूरा किया कि कामरार पुकुर में रहे। किंतु फिर कामरार पुकुर की घटनाएं तो हमको पता ही है किस तरह से मां को बार-बार यह इनके जो संबंधी है रामलाल दादा और लक्ष्मी दीदी वह तो मां को इग्नोर करते थे। फिर गांव में ही कुछ लोग ऐसे थे सतत मां की निंदा आलोचना किया करते थे। मां के लिए रहना खाना सब बड़ा ही मुश्किल था। एक बार श्यामा सुंदरी देवी मां की मां मां को मिलने के लिए आई कामार पुकुर देखा मां की साड़ी फटी हुई है। फटी हुई साड़ी पहन के मां वहां पर रह रही है। तो इसको देखकर के फिर श्यामा सुंदरी को इतना दुख हुआ। कहा कि अपनी लड़की को मैं यहां पर कैसे छोड़ के जाऊं? बोल के वह फिर से वो मां शारदा को अपने साथ में जय राम बाटी ले आई। यही घटना वो दक्षिणेश्वर में भी ऐसा ही हुआ था ना वो एक बार आई थी यही श्यामा सुंदरी देवी अपनी बिटियां मां शारदा के साथ दक्षिणेश्वर आई और फिर हृदय जो है अपमान करना शुरू कर दिया क्यों यहां पर आए हो किस लिए आए हो चले जाओ यहां से तो मां उस समय कहती है कि श्यामा सुंदरी देवी तो वह भी सिहोड़ की है और हृदय भी सिहोड़ का है तो फिर पता नहीं इन दोनों का क्या होगा डिस्प्यूट ना कि जो भी है तो हृदय श्यामा सुंदरी को थोड़ा सा कभी सम्मान नहीं देता। तो उस समय भी श्यामा सुंदरी वही कहती है कि मेरी अपनी बिटिया को यहां पर मैं किसके भरोसे छोड़ के जाऊंगी? बोल के वो मां को वापस लेकर के जय राम भाटी चली आई। तो देखिए कि श्यामा सुंदरी के हृदय में भी कितना बीता होगा कि इतनी लाडली बेटियां इतना मतलब स्नेह जिससे लालित पालित हुई है बड़ी हुई है उस बिटिया को अभी जब जामाई के घर ले जाते हैं तो वहां से इस तरह का निगलेक्ट है अपमान है सब बेचारी को सहन करना पड़ता है तो फिर दो बार एटलीस्ट हमको पता है ऑन रिकॉर्ड है कि श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा को अपने घर जयराम भाटी वापस ले गई है। तो वो भविष्य की बात है। तो यहां पे जैसे लिखा है जैसे कि मां का कोईेंस ही नहीं है। ऐसे ही यह सो जो रामचंद्र वगैरह लोगों ने ठीक किया कि मां और कहीं चली जाएगी। कामरार बुकुुर जाके रहे ना कि वो रामलाल दादा तो है दक्षिणेश्वर में उनके पास में जाकर रहे। वो लक्ष्मी दीदी ने तो ठीक किया ही था। ठाकुर ने कहा था कि तुम काम दो चीज कही थी ठाकुर ने। मृत्यु शैया के समय ही कि कामरार पुकुर में अपना घर रखना और लक्ष्मी को देखना उसको अपने पास में रखना तो लक्ष्मी दीदी ने किंतु ठीक किया कि वो मां के साथ में नहीं रह के अपने बड़े भाई रामलाल दादा के साथ रहेगी तो फिर लक्ष्मी दीदी उनके साथ में दक्षिणेश्वर में रहने को चली जाती है तो देखिए कि उसी समय जैसे एक जो डिवीजन ठाकुर के कैंसर के समय हो गया था एक प्रकार के जो भक्त थे वैसे तो ठाकुर को बहुत डिवोटेड थे किंतु जब यह देखा कि अरे ठाकुर अपना खुद का कैंसर नहीं ठीक कर पा रहे तो हमको क्या सहाय करेंगे ऐसा सोचकर के जैसे वे लोग निकल गए तो अंतरंग बहिरंग एक डिवीजन हो गया इसके बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां को किस दृष्टि से आप देखते हैं यदि वह गुरु पत्नी मात्र है और यह घर हम उसका भाड़ा देना बंद करेंगे और वह कहीं चली जाएगी। जहां जाना हो जाए। उससे हमको क्या है? बोलकर के जो एक भक्त थे वह एक दूसरा एक दल भले ही चाहे अंतरंग है। रामदत्त को हम अंतरंग कहते तो हैं किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में और एक डिवीजन हो जाता है। मां का संघ में क्या स्थान है? उसको लेकर के दो तरह से देखिए हम लोग कहते हैं त्यागी गृहस्थ में डिवीजन हुआ है। स्वामी जी का जीवन जैसे-जैसे पाठ करेंगे अभी भी वराह नगर में मठ की यही सब घटनावली में हम देखेंगे ही कि कैसे रामदत्त है और ये इवन सुरेश बाबू है। सुरेश बाबू ने हालांकि वराह नगर मठ का भाड़ा देते थे। वो खर्चा देते थे। इसके बावजूद नरेंद्र को जैसे कि ठाकुर का ही क्या कहेंगे कि गुरु परंपरा में नरेंद्र आता है नेक्स्ट। यह बात उन्होंने स्वीकार नहीं की। ठाकुर का मैसेज अभी नरेंद्र के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के माध्यम से प्रचारित होगा। यह बात जैसे कि उनको दिमाग में ठीक-ठीक बैठी नहीं और मां के बारे में ऐसा कोई उच्च धारणा नहीं है। तो देखिए कि दोनों ओर से त्याग रूपी जो इंस्टीट्यूशन है, सन्यास रूपी ये जो प्रथा है, उसका पालन करना ही क्यों? ऐसा तो एक प्रश्न दूसरा की मां है तो है तो गुरु पत्नी है उसमें क्या है तो यहां पर फिर जैसे महा कैंसर के समय दो डिवीजन हो गए थे बहिरंग और अंतरंग ये महासमाधि के बाद में फिर से दो डिवीजन होते हैं जो निकल गए अपने परंपरा से वे लोग ऐसे थे कि सन्यास का कोई आवश्यकता नहीं है और मां सिर्फ एक गुरु पत्नी है तो वह वाला एक दल सेपरेट हो गया और फिर अभी यह जो अपनी गुरु परंपरा प्रारंभ हुई है वह परंपरा के भीतर वाले रह गए। सन्यास जीवन है उसका प्राधान्य समझते हैं और मां का क्या प्राधान्य है वह समझते हैं। इसमें सबसे बड़ा नाम लिया जाएगा अपने मास्टर महाशय का। ऑलरेडी स्वामी जी का जीवन जो हम देख रहे हैं उसमें हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय बराह नगर मठ में आते हैं और गुरु भाइयों के साथ में कुछ दिन बिताते हैं। बीच-बीच में आते रहते हैं। और यहां पर मां को भी इतना भक्ति करते थे कि मां को भी अपने घर आमंत्रण देकर के ले आए थे। मां की सेवा करते थे। जयराम भाटी जाकर के मां के दर्शन करते थे। तो मास्टर महाशय है, बलराम बाबू है, गिरीश घोष है, यह गोलाप मां है, योगेन मां है। यह सब लोग जो है वो अपनी संघ की परंपरा के साथ में अभी जुड़ गए हैं। क्योंकि यह गुरु परंपरा है, लीला कंटिन्यूटी है, वह अभी मां और स्वामी जी के माध्यम से होने वाली है। इंस्टीट्यूशनल लेवल पर अभी स्वामी जी उसको देखेंगे और आध्यात्मिक जगत में अभी मां जो है वह गुरु है। तो यह जो इंपॉर्टेंट डिस्टिंशन जो भक्त नहीं समझ पाए वो धीरे-धीरे करके साइड लाइन हो गए।
त्यागी शिष्यगण ठाकुर की अस्थि का एक बड़ा हिस्सा अपने पास रख लेते है
युवक भक्त दे अनेके किंतु अतो सहज छाड़ीते चाहले ना युवक भक्तों में से बहुत कोई किंतु इतना सहज रूप से यह मामला अपने हाथों से जाने देना नहीं चाहते थे कारण ठाकुर सन्यासी ओ गृहस्थ भक्त शोकोले मिली तो होइया प्रथमे परामर्श स्थिर होइया छिलो जे पूत भागीरथी तीरे एक खंड जमी क्रो कोरिया उक्त कलश तथाय जथा नियम में क्षमा ही तो करा हो क्योंकि ठाकुर के त्यागी और गृहस्थ सभी भक्तों ने मिलकर के पहले इस तरह से ठीक किया था। एक निर्णय लिया था कि पूत भागीरथी पवित्र गंगा के किनारे एक खंड जमीन क्रय करके खरीद करके यह जो कलश है ठाकुर की अस्थि का वहां पे यथा नियम नियम अनुसार समाहित करना होगा। समाहित किया जाएगा। किंतु ओप करते बिष्टोर और थेर प्रयोजन देखिया किंतु ऐसा करने के लिए बहुत ज्यादा पैसा चाहिए। यह देखकर के एवं अन्नोना नाना कारण और विभिन्न दूसरे कारणों की वजह से ठाकुर गही भक्त गुण अनेके किछु दिन पर पूर्वोक्त संकल्प परित्याग करे ठाकुर के गही भक्तों में से बहुत सारे यह जो ऑलरेडी संकल्प ले लिया गया था उसका त्याग करते हैं तहां दिख रूप मत परिवर्तन ठाकुर सन्यासी भक्त दे मन पुत ना होए इन लोगों का इस तरह का मत परिवर्तन गृहस्थ भक्तों का मत परिवर्तन ठाकुर के सन्यासी भक्तों को अच्छा नहीं लगने से मनः पुत ना होने से मन में अच्छा नहीं लगने से ता पूर्व ताम्र कोश होते अर्धे केरो ऊपर भस्मावशेष वो अष्टि नीच बा कोरिया लोइया भिन्नो एक पात्र उहा रखा पूर्वक तहा श्रद्धास्पद गुरु भ्राता बाग बाजार निवासी श्रीक्त बलराम बाबू महाश भवने नित्य पूजा दी जनो प्रेरण करिया छिले इन लोगों के इस तरह के मत परिवर्तन से सन्यासी भक्त नाराज होकर के उन्होंने पहले यह जो ताम्र कलश था उसमें से आधे से ज्यादा भस्मावशेष और अस्थि बाहर करके करके अन्य एक पात्र में उसको रक्षा पूर्वक रखा और उनके जो श्रद्धास्पद गुरु भ्राता बाग बाजार निवासी श्रीजुक्त बलराम बाबू महाशय जो थे उनके भवन में नित्य पूजा के लिए भेज दिया परे तारा प्रथमोक्त ताम्र कोष्टी काकुड़ गाछ ते समाहित करते यथाशद्ध सहायता करिया छिले बाद में गुरु भाइयों ने त्यागी संतानों ने जो पहले वाला जो ताम्र कलश था जिसमें से और जो ओरिजिनल ताम्र कलश जिसमें से अस्थि आधे से ज्यादा निकाल के रख दिए थे अलग से तो पहले वाला ताम्र कलश काककोड़ गाछी में समाहित करने की जो विधि थी जो उत्सव था उसमें यथासाध्य सहायता गुरु भाइयों ने की थी। यहां पे ब्रैकेट में लिखा है 23 अगस्त भद्र माशेर जन्माष्टमी भाद्र महीने की जन्माष्टमी 23 अगस्त यानी कि 16th अगस्त को ठाकुर की महासमाधि हुई और 23 अगस्त को काकुड़गाछी में उनके अस्थियों की स्थापना की गई।
माँ कहती है, सोने का मनुष्य ही चला गया, अभी राख लेकर झगड़ रहे है.
श्री मां ए भीतर के अनेक खानी शूनिया छिले मां ने यह जो वितर्क हुआ था यह जो विवाद हुआ था कि अस्थियों को कहां रखा जाए उसमें से काफी कुछ सुना था किंतु प्रखर वैराग्य प्रतिष्ठितो तहार मन कोनो पखो ग्रहण को ते पारि लोना परंतु प्रथ प्रखर वैराग्य में प्रतिष्ठित उनके मन ने किसी भी पक्ष को ग्रहण न करना चाहा ग्रहण ग्रहण करना न चाहा त सुधु दीर्घ निश्वास त्याग कोरिया गोलाप मां के बोलीले माने सिर्फ दीर्घ निश्वास त्याग करके गोलाप मां को कहा एमोन सोनार मानुष ही चोले गले देखे छु गुलाब छाईनीय झगड़ा कर छे ऐसा सोने सोने का मनुष्य ही चला गया सोनार मानुष सोने का मनुष्य गोल्डन पर्सन अर्थात कि जिनका हृदय सोने का था। जिनका चरित्र गोल्डन था। जिनका चरित्र शुभ्र पवित्र था। इस तरह के मनुष्य ही चले गए। देखा गुलाब छाई नहीं झगड़ा कर छे राख लेकर के झगड़ा कर रहे हैं। स्वामी जी ने भी कहा कि देखिए ठाकुर के उपदेश अनुसार अपना जीवन गठन करना। यही इंपॉर्टेंट है। यह राख को लेकर के झगड़ा करना। बाद में फिर यह जो इतिहासकार है, भविष्य की जनरेशन है, वे लोग कहेगी कि यह ठाकुर के शिष्यों ने ठाकुर के अस्थियों को लेकर के झगड़ा किया। आओ हम यह सब डिस्प्यूट में ना जाए और हम त्यागी सन्यासी कब कहां रहेंगे, कब कहां जाएंगे कुछ ठीक नहीं। अस्थियों को रखेंगे तो नित्य पूजा करनी होगी। यह व्यवस्था हम कैसे करेंगे? यानी वह जो शुरू शुरू के दिनों में ही तो नरेंद्र ने ऐसा कहा कि हमको पता है कि शशि महाराज और निरंजन महाराज इन दोनों को यह बात अच्छी नहीं लगी और अस्थि में से आधे से ज्यादा अस्थि उन्होंने सेपरेट करके रख दिए थे। और फिर यहां पे तो क्या है कि मां की दृष्टि से यह कहानी कही गई है। बोलकर के कुछ कुछ इंपॉर्टेंट घटना का वर्णन नहीं। वरना तो यह काली महाराज हमको कहते हैं कि उसी दिन रात को नरेंद्र ने कहा कि हम ही लोग तो है ठाकुर की जीवंत समाधि। आओ हम अस्थियों का एक अंश ग्रहण करते हैं। बोलकर के ठाकुर की यह जो अस्थि थे उसका एक अल्प अंश सभी गुरु भाइयों ने ग्रहण किया। और काली महाराज लिखते हैं उस दिन रात को हमको गहन समाधि हुई थी। सभी को गहन ध्यान हुआ था। तो देखिए कि वह सब घटनावली अभी चल रही है। ए रूप दुष शोके तहार दृष्टि जागतिक विवेचनार कतो उध्व प्रसारितो विचार बुद्धि कतो निरपेक्षो इस तरह के दुस शोक ऐसा शोक जो कि सहा नहीं जा सकता ऐसा दुसह शोक के भीतर में भी जिनकी दृष्टि जागतिक विवेचना अर्थात कि यह सांसारिक कंसीडरेशंस है उसके कितने उर्ध्व प्रसारित थी विचार बुद्धि कितनी इतनी निरपेक्ष थी। वरना मां तो कह ही सकती थी। मां को उसी समय पता चल गया होगा कि यह गृहस्थ भक्त है। उनकी तो फिक्र करने वाले नहीं। भले ही चाहिए अस्थि नरन वगैरह को मिल जाए तो फिर क्या है? एक ऑथॉरिटी जैसा हमारा बना रहेगा। वरना यह जो अब जैसे वो सोवियत यूनियन में हुआ था लेनिन वहां का जो लीडर था उसका डेथ हुआ। तो स्टेलिन जो कि नेक्स्ट लीडर उसने क्या सोचा कि यह जो कम्युनिस्ट पार्टी है उसकी ऑथॉरिटी हमारे हाथ में रहे इसके लिए लेनिन को दफना करके दफनाने की वजह उसको ममीफाई करके एक माउजोलियम में रखा जाए। एक म्यूजियम में रखा जाए। जब पूरा सोवियत यूनियन से लोग उसका दर्शन करने को आएंगे तो सोचेंगे कि अभी ये माउजोलियम है ये ले लेनिन का जो टॉम है उसकी रक्षा कौन कर रहा है? तो स्टालिन कर रहा है। अर्थात कि लेनिन का जो उत्तराधिकारी है वो स्टेलिन है। तो ऐसा एक ये जो ट्रांसफर ऑफ पावर जो है वो ऑथेंटिकेट हो जाएगा। लेजिटमेट हो जाएगा। गुरु के महासमाधि के बाद में चेले लोग बहुत बार झगड़ा करते हैं कि गुरु का घर है। व्यवहृत वस्तुएं हैं। यह पॉलिटिकल पार्टीज में देखिए ना अभी यह लीडर मर गया तो उसकी बीवी के पास में अथॉरिटी आएगी। उसके भतीजे के पास जाएगी ना कि किसके पास जाएगी? देखिए कैसा वो लिगसी को लेकर के पावर को लेकर के ये सब लोग झगड़ा करते हैं। तो हमने तो काफी बार देखा है। तो यहां पे गंभीरानंद जी लिखते हैं कि इतना गहन शोक जिनको प्राप्त हुआ है। ऐसी मां की दृष्टि जागतिक विवेचना से कितनी उर्ध्व थी। उर्ध्व प्रसारित थी और विचार बुद्धि कितनी निरपेक्ष थी। ऐसा नहीं कहा कि अस्थि हमको दे दीजिए तो हमारे पास में यह ठाकुर के भक्त है वह आएंगे प्रणामी मिलेगा रिस्पेक्ट मिलेगा वगैरह वगैरह ऐसा नहीं कहा सिर्फ इतना कहा इस तरह का सोने का मनुष्य ही चला गया देखा गुलाब यह लोग अभी छाई यानी कि राख लेकर के झगड़ा कर रहे हैं। अभी इसके बाद जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: युवा अवस्था में भी स्वामीजी की दृष्टि अत्यंत व्यापक और उनका चरित्र अत्यंत गहन था।
बेस्ड ऑन दिस नाउ इमेजिन कि ठाकुर की डेप्थ क्या होगी जो लीला प्रसंग में जो वर्णन है शरद महाराज कहते हैं कि स्वामी जी की जो उत्कंठा व्याकुल ता जो थी ईश्वर प्राप्ति की वह हम सबको ऐसा मुग्ध करके रखती थी। हमने में से किसी ने ठाकुर के पास जाकर यह बात का कहा भी कि महाशय देखिए कि नरेंद्र की व्याकुलता कितनी है। तो ठाकुर ने कहा था कि इसके भीतर में जो ईश्वर प्राप्ति का जो झंझवात देख रहे हो उत्कंठा साधना का झंझवात तो यहां पे अपनी ओर इशारा करके कहते हैं यहां पे जो झंझवा चला है उसका एक शिकर शिकाई माने नॉट ए 100 ऑफ 100 पार्ट [हंसी] नाउ यू कैन इमेजिन ठाकुर [हंसी]
प्रश्न: स्वामीजी की व्याकुलता से ही निर्विकल्प समाधी संभव थी, तो फिर ठाकुर को उससे भी बहोत ज्यादा व्याकुलता की क्या जरुरत थी?
ना वो तो लीला ना कथामृत के प्रारंभ में ही है ना मास्टर महाशय ने कहा कि जो साकार है वो क्या निराकार हो सकते हैं निराकार क्या साकार हो सकते हैं ठाकुर ने कहा वो साकार भी है निराकार भी है और भी कितना कुछ है जो कि हमारी समझ के बाहर है माने विद दिस अंडरस्टैंडिंग तो अभी तो जो थ्यरी डेवलप हुई है सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मा निर्वाण अपने पर्सनल ईश्वर इष्ट यही तो कुछ 101 थ्यरी ही तो है ना एट द मोस्ट ईश्वर का स्वरूप क्या इसी थ्यरी के भीतर में थोड़ी ना लिमिटेड है इट कुड हैव बीन सो मच मोर ईश्वर इति नहीं तो किसी डिवोटी ने कहा महाशय अपनारो इति नहीं जैसे ईश्वर की इति नहीं आपकी भी इति नहीं है फिर ठाकुर सुनकर के हंसने लगे
प्रश्न: ठाकुर का भांजा ह्रदय या अन्य संबधी माँ का अपमान या अवगणना क्यों करते थे? माँ तो किसी का अहित नहीं करती थी.
किंतु यहां पर ऐसा कहेंगे माने दिस इज आल्सो वन पॉसिबिलिटी कि इंटेंशनली नहीं करते थे। दैट वाज़ दैट पोजीशन ऑफ वुमेन जो थी इंडियन सोसाइटी में व्हिच वाज़ सो मतलब पिटिएबल कि वे लोग अब मां के साथ में नहीं तो अन्य स्त्रियों के साथ में ऐसा ही व्यवहार करेंगे। नेगलेक्ट करेंगे, इंसल्ट करेंगे। स्त्री उसी के पात्र है। यह जो एक भारतीय समाज जो हो गया था। सो मर इज़ जस्ट अनदर वूमन कि जिनको आप इग्नोर कर सकते हैं, जिनको आप इंसल्ट कर सकते हैं। नथिंग पर्टिकुलर अबाउट मदर एंड व्हिच इज़ इवन मोर पिटिएबल। चलो मां के प्रति कोई पर्सनल द्वेष है तो हम समझ सकते हैं कि मां के साथ इस तरह व्यवहार करेंगे। किंतु इन जनरल सभी ज्यादातर स्त्रियों के साथ में ऐसा व्यवहार होता होगा। यह सुनकर के और भी कष्ट होता है। और इसीलिए तो स्वामी जी ने बार-बार कहा ना कि अमेरिका इज अ हेवन फॉर वुमेन एंड मासेस। अर्थात कि यह जो पदलित जन समुदाय है और स्त्रियां है इन दोनों के लिए हेवन है अमेरिका। यत्र नारियस्तु पूजयंते तत्र रमंतु देवता। ये जो भारत की जो अवनति हुई है स्त्रियों का अब स्त्रियों की और ये तथाकथित लोअर कास्ट की अवगणना करने से हुई। दैट वास स्वामी जीसस डायग्नोसिस। ना इसलिए स्वामी जी कहते हैं ना कि नो वेयर सच ग्रैंड आइडियाज हैव बीन प्रीचड एज इन इंडिया एंड नो वेयर एल्स दैट ह्यूमन राइट्स हैव बीन क्रश्ड एज इफ लाइक इन इंडिया। माने सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन भी कहते हैं। फिर वो जो केरल में जाकर देखा कि पागला गराज लोनाटिक एजाइलम वो वो भी अपने ही यहां पे होता है। देखिए अवतार का साइन क्या है? कोई एक संत महापुरुष आता है तो आपके ह्यूमन सिविल ह्यूमैनिटी का जो एक एस्पेक्ट है उसको वो अफेक्ट करता है। अब अब जैसे कि पर्सनल स्पिरिचुअलिटी है उनमें उन्होंने कुछ ऐड किया। कोईकोई सोशल रिफॉर्मर के रूप में आते हैं तो सोशल रिफॉर्म करते हैं। अवतार मींस के ह्यूमैनिटी के जितने भी एस्पेक्ट है वो सबको इफेक्ट करेंगे। तो पर्सनल स्पिरिचुअलिटी, कम्युनिटी लाइफ एज वेल एज सिविलाइजेशन तीनों पर उनका यह मैसेज जब स्प्रेड हो दैट मींस ही इज़ एन अवतार। तो ठाकुर इज दैट अवतार कि कम्युनिटी लेवल पे मां ने जो जिस तरह से हमको उपदेश दिया सिविलाइजेशन के बारे में जिस तरह से स्वामी जी ने बताया। सो ठाकुर इज अ ट्रू अवतार कि तीनों लेवल पे उनका मैसेज गया है। अदरवाइज पहले वाले जितने भी आए होंगे संत महापुरुष उन्होंने आध्यात्मिक जीवन में कंट्रीब्यूट किया किंतु सोशल लाइफ जैसा है कास्ट ये वो वगैरह वैसे का वैसा ही रखा। शंकराचार्य का सेम थिंग अद्वैत वेदांत के बारे में इतना सब कुछ कहा। किंतु इंडियन सिविलाइजेशन तो इसके बाद में डाउन को डाउन ही होती गई। जो अपना सोसाइटी था वही कास्ट रिडल ही रह गया। तो उनका कंट्रीब्यूशन वाज़ लिमिटेड टू वन एस्पेक्ट। जबकि ठाकुर कंट्रीब्यूशन इज़ टू ऑल एस्पेक्ट। दैट इज़ व्हाई ठाकुर इज़ एन अवतार। और स्वामी जी ने कहा वे लोग पंडित जी मात्र है यहां पर पूर्ण अवतार है ना माने ठाकुर का कंट्रीब्यूशन सिर्फ स्पिरिचुअलिटी के लेवल पे फिक्स नहीं है यस यस ऑफकोर्स यस पर या ऑफकोर्स यस कि ठाकुर पर्सनल स्पिरिचुअलिटी मां कम्युनिटी एंड स्वामी जी इज़ अ सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट किंतु दिस वाज़ ओनली बिकॉज़ ठाकुर हिमसेल्फ हैज़ एंबोडेड ऑल थ्री एस्पेक्ट दैट इज व्हाई ठाकुर इज एन अवतार विद इन वन पर्सन ऑल एस्पेक्ट हैव बीन एंबोडेड एंड लेटर ऑन एक्सपेंडेड अपॉन बाय मदर एंड स्वामी जी
प्रश्न: स्वामीजी का भी कितना शोषण और अपमान हुआ था उनके सम्बन्धिओ के द्वारा, ब्रह्मोसमाज द्वारा, किन्तु स्वामीजी कभी भी बदला लेने के बारे में नहीं सोचते
अब देखिए ना अमेरिका की स्वामी जी इतनी प्रशंसा करते हैं। वहां वही अमेरिका में स्वामी जी को कितनी रेस्टोरेंट में से निकाल दिया गया है। काले आदमी को जगह नहीं देते हैं। वह बारबर के वहां पे गए वह शेविंग वगैरह करो उसने मना कर दिया। सो, इस तरह के अपमान वहां पे कितने होते थे। स्वामी जी ने खुद ने कहा है। मैं जब बाहर में जाता था किसी काम के लिए किसी एक लेडी अ डिवोटी को साथ में लेकर चलता था। क्यों? यदि कोई वाइट वूमन साथ में चल रही है तो कोई स्वामी जी का अपमान नहीं करेगा। सो ये स्वामी जी ने खुद ने कहा है। किंतु इस तरह से कहा है कि जैसे दिस डज़ नॉट मैटर बात में यह एक इंफ़ॉर्मेशन फेंक दिया। नथिंग टु अह मैंने उसको लेकर के कोई ऐसा ये नहीं मचाया हल्लागुल्ला नहीं मचाया। क्योंकि क्या है देखिए आप यदि रियल स्पिरिचुअल होंगे तो स्वभाव परिवर्तन होगा। दैट इज वन साइन ऑफ स्पिरिचुअलिटी राइट? कि कैरेक्टर ट्रांसफॉर्मेशन वरना आपने बहुत जैसे आपने कहा आपके वो रिलेटिव की बात आध्यात्मिकता की बातें तो बहुत करते हैं। स्वभाव यदि परिवर्तन नहीं होता हृदय यदि विस्तृत नहीं होता तब तक तो कुछ हुआ नहीं ना। देखिए अ इसलिए तो ये तीन एस्पेक्ट पे हमको अपने को डेवलप करना है ना। अपना जैसे यह स्पिरिचुअल एस्पेक्ट है वैसे ही अपना ही एक सोशल एस्पेक्ट है। ऐसा तो नहीं कि मैं आध्यात्मिक जप ध्यान एक मैं करता हूं और अभी आश्रम के साधुओं के साथ में दूसरा एक वर्जन ऑफ मी इंटरेक्ट करता है और ऑफिस में काम करने को मेरा एक तीसरा वर्जन जाता है। सेम मायसेल्फ कि वही मैं मंदिर में बैठकर के ठाकुर की प्रार्थना करता हूं। वही मैं साधुओं के साथ में भक्तों के साथ में वार्तालाप करता हूं। मैं ही वो काम करता हूं। तो मुझे तो मेरे तीनों एस्पेक्ट डेवलप करने हैं। सो ओनली इफ आई कैन ट्रांसफॉर्म ऑल थ्री एस्पेक्ट ऑफ माय लाइफ माय पर्सनल स्पिरिचुअलिटी माय इंटरेक्शन विद अराउंड पीपल अराउंड मी एंड माय वर्क। देन ओनली आई एम ट्रूली स्पिरिचुअल। यह अवतार का भी यही साइन है। अवतार के फॉलोअ का या तो एनीवन हु इज ट्रूली स्पिरिचुअल उसका यह साइन है। वरना आप बोल रहे हैं कि मैं बहुत ही आध्यात्मिक हूं। किंतु मेरा पर्सनल इंटरेक्शन में मैं सबको इंसल्ट करता हूं। या तो मैं कर्म जो करता हूं पूरा सेल्फिश कर्म करता हूं। यानी कि दूसरों को नुकसान हो, दूसरों का शोषण हो तो फिर तो मेरे आध्यात्मिक होने का कोई अर्थ ही नहीं रहा। आध्यात्मिक जगत में यह जो हम लोग डेफिनेशन को सिकुड़ते जाते हैं ना कि एग्जजेक्टली यह होना चाहिए, एग्जजेक्टली यह होना चाहिए, ईश्वर का दर्शन होना चाहिए वगैरह सब ठीक है। किंतु अल्टीमेटली आपको जितनी आपने जगत से मोड़ घुमा करके भीतर में गए हैं, उतना ही भीतर में से बाहर आकर के जगत में प्रसारित करनी होगी। अपनी यह चेतना को। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर में प्रत्येक पदार्थ के भीतर में ईश्वर दर्शन करना होगा। मां का जीवन देखने से मैंने कहा ना कि यह जो मैं बड़ा इंप्रेस था एक समय यह मिरेकल के वर्णन पढ़ के। किंतु जब मैं मां का जीवन पढ़ना शुरू किया वो सब फीका लगने लगा। क्योंकि सही स्पिरिचुअलिटी क्या है? आपके पास में मिरेकल करने की कैपेसिटी है ना कि आपका हृदय इतना उदार है कि आप लोगों के लिए संपूर्ण न्योछावर कर सकते हैं अपने को। सो दैट इज मच ग्रेटर मिरेकल। मां का जो लाइफ है।
प्रश्न: रंगनाथानन्दजी का भी इतना विस्तृत vision था
यस यस यस। और यहां पे भी देखिए मैं एक बात ऐड करूंगा। देखिए मैंने ऐसे लोगों को देखा है। काफी डिसिप्लिन है पर्सनल लाइफ में। मंदिर में जाते हैं। सब प्रार्थना मेडिटेशन करते हैं और काम भी बहुत करते हैं जो अपनी सर्विस एक्टिविटी बहुत एक्सपंड करते हैं। किंतु जब ये अन्य साधु स्टाफ या डिवोटी उनके साथ में इंटैक्ट करना आता है सबका इंसल्ट करते हैं। सो देयर आर थ्री एस्पेक्ट्स एक्चुअली है ना पर्सनल स्पिरिचुअलिटी और यह जो शिव ज्ञान जीव सेवा जैसा यह दो एस्पेक्ट है। तीसरा जो मां वाला जो कम्युनिटी है कि आप जिनके साथ में रहते हैं उनके साथ में आप कैसा व्यवहार करते हैं? वि इज बहुत कम लोग देखिए कि मैं रांची में था उस समय तो वहां पे एक आईएएस ऑफिसर जिसके साथ में हमारा बीच-बीच में इंटरेक्शन होता रहता था। जो फंड वगैरह देते हैं। तो अभी हमारे मन में एक ऐसा ही बैठ गया है ना आईएएस ऑफिसर यानी सब भ्रष्टाचारी यह वह सब क्या-क्या नहीं करता होगा वगैरह-वगैरह एक दिन उसके ड्राइवर के साथ में मेरा बात हो रहा था तो ड्राइवर ऐसी प्रशंसा कर रहा है अरे साहब तो ऐसे हैं साहब तो ऐसे हैं वाह वाह मैंने कहा देखिए दिस इज अ साइन कि उस भीतर उस आदमी के भीतर में कुछ सत्व है वरना एक आईएएस ऑफिसर जिसको लोगों को ऐसा तुच्छता के साथ में ट्रीट करने का जिसका हैबिट हो वो ड्राइवर को एक सम्मान दे के बात करता है। दैट मींस देयर इज समथिंग कुछ सत्व है उसमें। पता है वो शेलॉक होम्स की एक कहानी मैंने एक बार कही थी। एक बार ऐसा मर्डर हुआ एक छोटे गांव में शेलॉक होम्स को बुलाया गया। अब पकड़ में नहीं आ रहा है कि मर्डरर कौन है। तो इसी इन्वेस्टिगेशन में शेलॉक होम्स एक आदमी के घर जाता है। वो ही इज़ वन ऑफ द सस्पेक्ट। तो शेलॉक होम्स उसके साथ बात करता है। यह आदमी इतना प्रूफ देता है कि उस समय में प्रेजेंट ही नहीं था। यह वो वगैरह-वगैरह। तो शेलॉक होम सोचता है अच्छा नहीं होगा यह चलो बाहर बोला अच्छा ठीक है ये ही इज़ नॉट अ सस्पेक्ट ऐसा करके बाहर निकल रहा है बाहर निकलने के समय वो जो ग्राउंड होता है देखा कि यही आदमी का लड़का वो किसी बिल्ली ना कुत्ते को मार रहा है तो जैसे ही शेलॉक होम्स ने देखा तो वो सोचा कि कुछ तो गड़बड़ है इस आदमी का लड़का इतना क्रूल है तो यह आदमी के भीतर में कुछ तो गड़बड़ होगी तो फिर से भीतर में जाता है और यह तो शेलक है वो आर्गुममेंट करके लॉजिक लगा करके प्रूव कर देता है यही मर्डरर। बट व्हाट वास द फर्स्ट पॉइंट ऑफ डाउट कि यदि वह आदमी कितना ही अच्छा बोले अपने मुंह पे देखा कि उसका लड़का है वो क्रूल है। नाउ दिस क्रुल्टी इज पार्ट ऑफ दैट। आपके भीतर में से निकल के छोटा बच्चा है ना। उसका तो अपना तो बुद्धि नहीं है। आप में से उसके भीतर में गई है। दैट मींस ये कम्युनिटी लाइफ है। दैट इज वन ऑफ द एज इक्वल एज सिविलाइजेशनल एंड इंडिविजुअल लाइफ।
प्रश्न: संसार माया है सुन कर हमारा मन भी भ्रमित हो जाता है और हम करुणा या मित्रता से व्यवहार करना भूल जाते है
किंतु यहां पर देखिए जो लोग महापुरुष है जिन्होंने यह सब प्रथाएं प्रारंभ की है। इवन पुष्टि मार्ग के जो संत होंगे भक्ति मार्ग के जो संत होंगे उनका जीवन परफेक्ट दिखेगा। प्रॉब्लम क्या है कि उन्होंने बाकी सब एस्पेक्ट को हाईलाइट नहीं किया। बोल के हमने उसमें से मिस ट्रेन आप कहेंगे कि मिस इंटरप्रिटेशन सब किया। अदरवाइज आप देखिए ना जितने भी संत महापुरुष हैं ऐसा कहीं है कि वह बड़े क्रूल थे कि सेल्फिश थे ना कि लोगों पे अत्याचार करते थे शोषण करते थे नहीं उनका पर्सनल लाइफ जितना शुभ्र था उतना ही कम्युनिटी लाइफ अर्थात कि उनके आसपास रहने वालों का भी उतना ही जतन करते थे लोक कल्याण तो किया ही है यह दोहा वगैरह ये करके कंपोज करके यानी उनका खुद का जीवन परफेक्ट था प्रॉब्लम इज दैट कि उन्होंने उस बात को हाईलाइट नहीं किया। व्हाट इज़ अ प्रॉपर स्पिरिचुअलिटी डजंट इज़ इज़ नॉट रिलेट मतलब लिमिटेड टू आवर इनर लाइफ। यह जो एक प्रॉपर फ्रेमवर्क डेवलप होना है वो उस समय नहीं हुआ था। जो कि अभी रामकृष्ण अवतार में हुआ है। एंड ओनली बिकॉज़ कि जैसे हमने अभी कहा कि मां और स्वामी जी इन दोनों ने यह जो अधर टू एस्पेक्ट को एग्जिंपलीफाई किया है। अदरवाइज देखिए ठाकुर ने लोक कल्याण तो किया ही है। अदरवाइज क्यों घर-घर जाकर उपदेश देते हैं। ठाकुर उनके आसपास में जितने भी लोग रहते थे स्नेहसूत्र से बांध लिया था। बोल के ही तो सब लोग वहां पे रहे। सो विद इन ठाकुर ऑल थ्री एस्पेक्ट आर देयर। बट बिकॉज़ मदर इज देयर बिकॉज़ स्वामी जी इज देयर अदर टू एस्पेक्ट हैव बिकम प्रॉमिनेंट। अदरवाइज हम लोग कथामृत पढ़ के हम लोग यह सब डिराइव ही नहीं करेंगे कि हमको ऐसा होना है।
प्रश्न: ठाकुर ने गहन आध्यात्मिकता, स्वस्थ परिवार, और राष्ट्र निर्माण को एक साथ मिलाया यह हमारे इतिहास में पहली बार हुआ है
किंतु मैं कहूंगा कि वैदिक युग में इंटीग्रेटेड था ही था। श्रीमद्भगवत गीता सबसे बड़ा उदाहरण है। तीनों लेवल पर उपदेश आपको वहां पर मिल जाएंगे। वि इज देयर प्रॉब्लम क्या है कि ये बुद्धिज्म और बाद में यह जो अपना ये जो शंकराचार्य वाला युग गया उसमें हमने ये सब डेफिनेशंस वैदिक युग की बड़ी नैरो कर दी। शंकराचार्य का शाह शंग भाष्य जो है गीता पे पढ़के लगेगा नहीं कि आपको युद्ध करने की आवश्यकता है। आपको यह समाज व्यवस्था की आवश्यकता है। प्रत्येक श्लोक को वो अद्वैत वेदांत के साथ में जोड़ने का प्रयास करते हैं। सो आवर अंडरस्टैंडिंग बिकम नैरोअ एंड नैरोअ आफ्टरवर्ड्स। इसलिए तो वैदिक युग के बाद में इतना बड़ा हमारा एक बुरा समय चला ना। आप सोचिए ना कि इवन शंकराचार्य वाज़ मॉडरेटिंग गडपादाचार्य। अभी यह स्वप्न, जागृत, सुशुप्त तीनों एक एक ही कर दिया उन्होंने। तुरिय इज सेपरेट और स्वप्न और जागृत अवस्था आर सिमिलर। तो अभी आप देखिए आप यह कहेंगे कि जागृत अवस्था स्वप्न के बराबर ही है। तो स्वप्न में मैं खाना खा रहा हूं। मान लीजिए खाना खाने का आवश्यकता है। वि इज स्वप्न के लेवल पर सत्य है। अभी बगल में भूखा आदमी बैठा है। मुझे उसको देने की क्या जरूरत है? स्वप्न में मैं खाना खाऊंगा। लोगों को सहाय क्यों करूंगा? वह आदमी तो स्वप्न के बाहर में उसका अस्तित्व ही नहीं है। यानी कि मैं खाना भी खाऊंगा और बगल में जो भूखा आदमी बैठा है उसको सहाय भी नहीं करूंगा। क्योंकि स्वप्न में इट इज नॉट जस्टिफाइड। इट्स नॉट रिलेवेंट। दैट मींस कि मैं कितना भयानक सेल्फिश हो जाता हूं। यदि आप यह कहे जागृत अवस्था स्वप्न के ही बराबर है तो मुझे देह की संभाल रखनी होगी। किंतु और किसी की संभाल रखने की जरूरत नहीं। हाउ इंक्रेडिबली सेल्फिश आई बिकम?
प्रश्न: लम्बे समय तक आश्रम में जाकर या सत्संग सुनकर भी भीतर कोई परिवर्तन नहीं होता। इसका कारण यही हो सकता है की हम community और civilization को ignore करते है
प्रॉब्लम कहां होता है? देखिए आप बोलेंगे मैं सिर्फ स्पिरिचुअलिटी में डेवलप होना चाहता हूं। अपने और किसी एस्पेक्ट को मैं टच नहीं होने देना चाहता। ओके? यदि आप 100% ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे व्हिच इज ओके। कि आप स्पिरिचुअली डेवलप होंगे और बाकी की जो सोशल लाइफ है, सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट है अपने से बाद में डेवलप हो जाएगा। प्रॉब्लम यह है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने की क्षमता नहीं या तो लॉन्ग टर्म तक करने की क्षमता नहीं। यानी स्पिरिचुअलिटी में डेवलपमेंट विदाउट ब्रह्मचर्य होता ही नहीं। सो वो एस्पेक्ट तो वहीं पर कट हो गया। अभी आप कहें कि एटलीस्ट इफ आई बिलीव इन सोशल एस्पेक्ट सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट को मैं अपने हृदय को विशाल करूंगा। शिव ज्ञान जीव सेवा करने का प्रयास करूंगा। तो वो बिल्ड अप होगा। दैट इवेंचुअली इन टर्न हेल्प मी इन मेंटेनिंग ब्रह्मचर्य। दैट इवेंचुअली हेल्प मी इन कंट्रोलिंग माय सेंसुअल डिजायर्स। साधना करते-करते आएगा। अभी हम लोग करते क्या है? यह समझ में तो आता है कि वासनाओं को कंट्रोल करने की जरूरत है। किंतु प्योर विल पावर पे करना चाहते हैं। रेदर हम लोग यह जो सोशल और सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट का हेल्प लेना ही नहीं चाहते। हमको लगता है कि जगत मिथ्या है। वहां पर जाकर करने से कुछ लाभ नहीं है। तो वह जो हेल्प हमको मिलना था आध्यात्मिक जगत में वह तो नहीं ही मिलता। ऊपर से त्याग करने की वासनाओं को संयम करने की क्षमता नहीं। यानी वो माया मिली ना राम ऐसा हो जाता है। हम लोग [हंसी] आध्यात्मिक जगत एनीवे प्रोग्रेस नहीं हो रहा है। और प्रोग्रेस होने के लिए जो लीवर हमको दिया है। अभी जस्ट रिसेंटली कल ही की बात करता हूं। एक बहुत बड़ा गाड़ी अभी ये तो ये आता है ना एसयूवी वगैरह तो एक एसयूवी आश्रम के सामने खड़ा है पंचर हो गया है वो पंचर हुआ है तो ये लोग वो जो होता है ना वो उसको ऊपर करना पड़ेगा ना पहले तो थोड़ा टायर निकालने के लिए तो ऐसा गोलगोल घूमने वाला जो आता है उसको ऊपर करने के लिए तो ऐसा गोल-गोल घुमा रहा है और धीरे-धीरे करके गाड़ी ऊपर हो रही है दिस ये लीवर का सिद्धांत है राइट आप सीधा उसको उठाने को जाएंगे नहीं चलेगा अब 10 बार घुमाइए तो वह भीतर का एक चक्का घूमेगा। फिर 10 बार घुमाइए तो एक चक्का ऐसा ऐसा-सा करके खड़ा होगा। तो ऐसा आप 10 बार 20 बार 30 बार घुमाएंगे। धीरे-धीरे करके 1/2 इंच 1 इंच गाड़ी खड़ा होगा। राइट? तो दीज़ आर द कांसेप्ट ऑफ लीवर। आप सीधा उसको उठाने को जाएंगे नहीं उठेगा। आपको 10 बार ये घुमाना होगा तो वो आधा मिलमीटर ऐसा उठेगा। दिस इज़ एग्जैक्टली व्हाट दिस दिस आर द लीवर्स। सोशल लाइफ है, सिविलाइजेशनल लाइफ है। दीज़ आर द लीवर्स। हम इसको कर सकते हैं। करके यहां पर थोड़ा सा सहाय होगा। आप 100 दिन शिव ज्ञान जीव सेवा कीजिए। देखिए आपको एक दिन सुंदर आपका ध्यान होगा। सो आप बोलेंगे मैं बस अपने विल पावर पे ध्यान करूंगा। वो सीधा गाड़ी उठाने बराबर हो गया। एक आदमी गाड़ी उठाता है दूसरा वो टायर चेंज करता है। नॉट पॉसिबल। आप देखिए ना मैं किसी को कहूंगा आज कि भाई तुम एक घंटा बैठ के ध्यान करो। बहुत मुश्किल होगा। किंतु मैं उसको एक कहूंगा कि चलो एक घंटा बैठकर के जो आसपास के जो बच्चे हैं फुटपाथ पर रहते हैं तुम उनको थोड़ा पढ़ाई लिखाई सिखाओ वो आसानी से कर पाएगा। राइट? अभी हम यह क्यों सोचे कि उसको पढ़ाई लिखाई सिखवाना इज़ नथिंग टू डू विद माय स्पिरिचुअलिटी। स्वामी जी का फेमस एक आदमी एक लड़का आकर स्वामी जी को कहता है मैं अपने घर के दरवाजे खिड़की बंद करके ध्यान करने का प्रयास कर रहा हूं। होता नहीं है। स्वामी जी का फेमस उत्तर पहले तो अपने खिड़की दरवाजे खोलो बाहर निकलो। आसपास में जो गरीब लड़के बैठे हैं उनको पढ़ाओ कुछ खाना दो फिर भीतर में कमरे में जाकर ध्यान करना