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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय नमः तो कल हमने देखा कि मां शारदा देवी सर्वप्रथम ठाकुर का दर्शन करने केलिए जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर की ओर यात्रा कर रही है बाद में ऐसा होगा कि मां बहुत बार जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर जाएगी दक्षिणेश्वर से जयराम बाटी वापस आएगी बहुत सारी यात्राएं होंगी किंतु यह पहली यात्रा और जैसे ही उनके मन में और इस यात्रा के पीछे क्या एक परिब था कौन सा फैक्टर था वह भी हमने देखा कि मां जयराम बाटी में रह रही थी लोग आकर के मां के सामने बातें कर रहे थे कि हां ठाकुर पागल हो गए हैं ठाकुर की हरकतें सब उटपटांग है ऐसी सब बातें कर रहे थे तो मां के मन में यह हो गई इच्छा कि मैं जाऊं ठाकुर का दर्शन करूं पिताजी को बताया पिताजी भी तैयार हो गए हां चलो मैं ही तुमको लेकर के चलता हूं तो पिताजी के साथ में अपनी सहेलियों के साथ में मिलकर के यह मोटर नकी ऐसा सब कुछ जिनके पास में पैसा होगा वे पालखी वगैरह की व्यवस्था करेंगे किंतु बेचारी मां के पास में तो पैसा भी कहां था थी लक्ष्मी ी स्वयं संसार का जितना भी धन वैभव श्री मां की कृपा से ही उद्भव हुआ है किंतु मां के अपने पास में फूटी कोड़ी भी नहीं थी यह है मनुष्य लीला का यह तात्पर्य पता नहीं क्या है तो मां पिताजी के साथ में चलना शुरू किया रास्ते में एक जगह पर एकाएक मां को बुखार हो गया अभी बुखार होना यह तो चलो अभी उस मलेरिया के जहां पर मलेरिया बारंबार हो रहा है वैसे ही प्रदेश में मां रह रही थी तो शारीरिक कष्ट से तो मां बहुत ज्यादा अनभिज्ञ नहीं थी शारीरिक कष्ट की हैबिट तो मां को पड़ी ही हुई थी किंतु एक बात का जो सबसे ज्यादा दुख हो रहा था कि उनके मन की इच्छा कि दक्षिण श्वर जाकर के ठाकुर का दर्शन करें वो इच्छा अभी शायद पूर्ण नहीं होंगी पता नहीं इस वरान अकेले में अकेली यहां पर पड़ी हुई है पिताजी के साथ में बुखार में क्या ऐसा होगा कि बुखार इतना बढ़ता जाएगा कि आखिर में वे लोग ना आगे ना जा पाए मने विवश होकर के घर वापस जाना पड़े ऐसा हो सकता है क्या तो ठाकुर का दर्शन नहीं होगा इस बात को लेकर के मां के मन में इतना कष्ट इसके बाद में क्या होता है देखिए गंभीरानंद जी महाराज इतना सुंदर रूप से एक प्रसंग का वर्णन करते हैं महाराज जी लिखते हैं ही सम वेदना और दहिक जंत्रण मध्य एक अलौकिक दर्शन उपस्थित होया तहा के शांति प्रदान करीलो इस वेदना और दैहिक यंत्रणा के बीच में एक अलौकिक द श ने आकर के मां के मन को शांति प्रदान की मां के मन को शांति से भर दिया कौन सा ये अलौकिक दर्शन था श्री मां च वरे जोखन एके बारे बेश मां जब बुखार से बिल्कुल बेहोश जैसी हो गई थी लज्जा शोरोम रोहित होया पड़िया अछन लज्जा और शर्म के बिना रहित लज्जा शर्म रहित जब पड़ी हुई है वैसे देखिए कि स्त्रियां जब शयन करती है सोई होती है तो अपने शरीर को अच्छे से वस्त्रों से ढक कर के इस तरह से वे लोग रहते हैं जिस तरह से लज्जा और शर्म से रहित लज्जा और शर्म से आपको रहना चाहिए मां के बारे में कहा गया है ना लज्जा पटा वृता लज्जा के आवरण से आवृत यह मां है मां का चेहरा किसी ने दक्षिणेश्वर की वह फेमस बात कि दक्षिणेश्वर में रह रही है और यह खजांची अर्थात कि वहां के जो एडमिनिस्ट्रेटर काली मंदिर के व लोग आपस में बात करते हैं कि हां हमको पता है हमने सुना है कि मां यहां पर रह रही है दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में किंतु हमने कभी उनका दर्शन नहीं किया क्यों क्योंकि मां का ऐसा रूटीन था दक्षिणेश्वर में रहते कि बिल्कुल अर्ली मॉर्निंग अर्ली सुबह जब भी कोई भी शयन त्याग करके उठा नहीं होता है उसी समय जाकर के वहां तो इंडोर प्लंबिंग वगैरह कुछ था नहीं तो सबसे पहले जाकर के निद्रा त्याग करके वह शौच वगैरा कर दिया करती थी तो इसीलिए कोई उनको देख नहीं पाता था अभी मां ने खुद ने कहा है देखिए कि दिन में एक ही बार सोच जाने को मिलता था क्योंकि बाकी जब दिन एक बार प्रारंभ हो जाता है सूरज का उदय हो जाता है तो पुरुष लोग तो इधर उधर घूमते रहते होंगे तो उनके सामने मां कैसे बेचारी नबत के ब नबत से बाहर निकलेगी तो सोच का वेग धारण करते-करते सोच का यदि वेग आ भी गया है तो भी वह सोच के लिए नहीं जा पाएगी माने खुद ने कहा है शोच का वेग धारण करके करके पेट की बीमारी हो गई थी तो यहां तक मां अपने को कष्ट में डाल कर के हमेशा अपने को छुपा कर के रती रखती थी क्यों क्योंकि ठाकुर की वो जीवन संगीन थी और इतना ही नहीं अवतार के साथ में उनका अवतरण हुआ था जब वोह दूसरी वो फेमस घटना कि जब सभी लोग वो वहां पे पाणी हाटी में एक मेला था वहां पर जा रहे हैं ठाकुर ने कहा अपने शिष्यों को कि तोमरा तो यंग बंगोल तोमरा तो ये सब देखो नहीं अर्थात कि तुम लोग तो यंग बंगोल हो ये उस समय का एक फेमस टम ये यंग टर्क वगैरह ये यंग बंगोल अर्थात कि बंगोल के ये यंग लड़के तो यह यंग बंगोल हो तुम लोग तो तुमने तो यह सब पुराने पुराने ट्रेडिशनल उत्सव देखे नहीं चलो हम लोग पानी हाटी चलके वहां पे वो उत्सव होता है गौरंग महाप्रभु का उसका दर्शन करते हैं उसमें नृत्य कीर्तन वगैरह करेंगे तो सभी लोग बहुत सारे लोग तैयार हो गए पहले धीरे-धीरे करते करते ठाकुर की स्त्री भक्त भी तैयार हो गई मां को पता चला अभी मां के मन में तो वो एक इच्छा तो होगी ही कि ठाकुर जाएंगे इतने सारे भक्त जाएंगे स्त्री भक्त भी आंगी तो फिर वो इतना नृत्य कीर्तन होगा कितना आनंद होगा दिव्य आनंद का ऐसा स्रोत बहेगा उस समय उस उत्सव में मैं भी जाऊं तो मां ने ठाकुर को वह मैसेज पहुंचाया कि मैं भी आऊं क्या तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया और जद इच्छा था कि आशु माने उसकी जद इच्छा है तो वो आए तो इमीडिएट मां समझ गई कि नहीं ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं जाऊ क्योंकि यदि ठाकुर की इच्छा होती कि हां मां भी सबके साथ में आए तो ठाकुर ऐसा नहीं कहते कि और जद इच्छा था कि उसकी जद इच्छा हो ठाकुर ऐसा कहते कि हां हां चलो चलो सब लोग चल रहे तुम भी चलो मैंने उत्साह के साथ में कहते तो ठाकुर का जो रिप्लाई था जो उत्तर था उसका जो टोन था बात करने का तरीका उसी से मां समझ गई कि नहीं ठाकुर की इच्छा नहीं तो फिर मां ने जाना बंद कर दिया तो फिर ठाकुर ने क्या कहा कि देखो वो को तो बुद्धिमता मां कितनी बुद्धिमता है उसको पता चल गया कि हम दोनों जद साथ में जाएंगे तो लोग क्या कहेंगे देखो हंसो हंशी अर्थात कि हंस और हंसी ठाकुर को परमहंस कहते थे तो मां को फिर हंसी कहेंगे माने लोगों को तो क्या है कि इस तरह से निंदा कटाक्ष करने की जो ह्यूमन नेचर है हैबिट है तो ठाकुर को देख कर के ऐसा दोनों ठाकुर और मां को देख कर के ऐसा कहेंगे तो ठाकुर ने कहा कि देखो कितनी बुद्धिमता है हम दोनों जाते तो लोग कहते कि हंस और हंसी आए हैं तो अच्छा हुआ नहीं आई तो मां इतनी लज्जा के पट से आवृत रहती है किंतु बुखार हुआ है शरीर में कोई होश ही नहीं है बिल्कुल लज्जा और शर्म के बिना मां एक जगह पर पड़ी हुई है तो खन देखी नेन उस समय देखा पार्श्व एक जन रमणी आशिया बसलो उनके बगल में एक स्त्री आकर के बैठ गई मेटी रंग कालो किंतु ए मोन सुंदर रूप तिनी कोखोनो देखे नाई वो लड़की का उस स्त्री का वर्ण था कलर था शरीर का वो काला था किंतु इतना सुंदर रूप मां ने कभी देखा नहीं था श बसिया तहर गाय माथाय हाथ बुलाई ते लाखन वह स्त्री मां के बगल में बैठ गई और मां के सर के ऊपर में शरीर के ऊपर में अपने हाथ लाने लगी एम नरम ठंडा हाथ गायर ज्वाला जेनो तखन छुड़ाया गलो इतने ठंडे हाथ कि शरीर की ज्वाला शरीर की गर्मी जैसे वैसे ही शांत हो गई बुखार की जो गर्म था वो वैसे ही शांत हो गई श्री मां जिज्ञासा कोरी लेन मां ने पूछा तुम कोथा थे के आ छोगा मां ने पूछा अरे इतनी सुंदर रूपवान युवती हालांकि उसका वर्ण काले कलर का है किंतु इतने रूपवान कहां से आ सकती है तो माने पूछा कि तुम कहां से आई हो न बागता कोहिलो आमी दक्षिणेश्वर थे के आ व स्त्री ने कहा मैं दक्षिणेश्वर से आ रही हूं शनिया अबा ईया मां बोली लेन मां यह सुनकर के अवाक हो गई अरे दक्षिणेश्वर तो मैं भी जा रही हूं तो यह स्त्री क्या दक्षिणेश्वर से आ रही है तो माने अवाक होक के पूछा दक्षिणेश्वर थे के अर्थात कि क्या दक्षिण श्वर से आमी मोने कोरे छन दक्षिणेश्वर जाबो ताके देखबो तार सेवा करो मैंने सोचा था मैं भी दक्षिणेश्वर जाऊंगी उनका दर्शन करूंगी उनका अर्थात श्री श्री ठाकुर का और उनकी सेवा करूंगी किंतु पथे जोर य अमार भाग्य ई शब आर बोलोना किंतु रास्ते में बुखार होने की बज से मेरे भाग्य में ऐसा हुआ नहीं मेटी बोली लो शेकी स्त्री ने कहा वह स्त्री जो रूपवान सुंदर स्त्री थी उसने कहा क्या बात कर रही हो तुम दक्षिणेश्वर जावे बोई की तुम दक्षिणेश्वर जाना और अवश्य जाओगी भालो होए शेखाने जाबे ताके देख बे अच्छी हो जाओगी ठीक हो जाओगी फिर वहां पर जाओगी और उन को देखना तोमार जन्नई तो ता के शेखा ने आठ के रेखे जीी तुम्हारे लिए ही तो उनको वहां पर बिठा के रखा है देखिए यह अपने लिटरेचर में जो कुछ कुछ ग्रेटेस्ट सेंटेंस जो होते हैं जब ठाकुर निर्विकल्प समाधि में थे उस समय मां ने उनको कहा था त भावो मुखे था मां काली ने जगदंबा ने तो उस समय निर्विकल्प समाधि में से ठाकुर य कॉन्शियस और सुपरकॉन्शियस की की बॉर्डर लाइन है वहां पर आकर के रहने लगे तभी तो यह जगत में सनातन धर्म का पुनः जागरण संभव पर हुआ उसके बाद में काशीपुर में ठाकुर ने एक बार एक कागज के टुकड़े पर लिख दिया था नॉरेन शिखे देवे अर्थात की ठाकुर ने कहा ना कि जखन चाप ना पले तोरा उपदेश देते पारना अर्थात कि ईश्वर का आदेश प्राप्त नहीं होगा तब तक प्रवचन नहीं दे पाओगे केशव सैन को बोला कि तुम प्रवचन दे हो किंतु होता क्या है सब लोग तुम्हारा संघ छोड़ कर के चले जाते हैं दूसरा संघ बनाते हैं तुमको गाली देकर जाते हैं तो यहां पर देखिए ठाकुर ने अपने हाथों से नरेण के लिए लिख दिया नरेण शिक्षा देगा और फिर जब स्वामी जी अमेरिका जाकर के ब्रदर्स सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका वह जो एक सेंटेंस जो उन्होंने कहा दैट वाज द संगम पूर्व और पश्चिम का संगम एक सेंटेंस में हो गया जो ग्रेटेस्ट सेंटेंस अपने ऑर्डर के महावाक्य जो कहे जाएंगे तो यह एक है कि तोमार जगन तो ता के ओखाने आट के रेखे जीी तुम्हारे लिए ही तो ठाकुर को वहां पर बिठा कर के रखा है ठाकुर को आठ के रेखे जीी अर्थात की रोक करके रखा है ठाकुर को पता है ना उस दिन एक बार क्या हुआ था हृदय ने जब वो इनके जो कालीवाड़ा बू के जो पुत्र थे त्रैलोक्य नाथ उनकी लड़की की मु कुमारी पूजा की तो वे लोग बड़े ही भयभीत हो गए कि अरे यह ब्राह्मण हमारी बच्ची की पूजा करता है तो पता नहीं क्या पाप लगेगा तो हृदय को तो निकाल दिया साथ-साथ में किसी ने आकर के ठाकुर को मैसेज दिया कि आपको भी जाने को बोला है तो ठाकुर तो क्या है वो तो फकीर आदमी है कंधे प कमछा डाला और निकलने लगे वो गेट तक पहुंच गए फिर उन्होंने देखा अरे अरे ठाकुर जा रहे तो दौड़ कर के आकर के ठाकुर की क्षमा मांगी फिर उनको वापस ले आए तो ऐसा तो ठाकुर कहां पे जाएंगे कहां पर रहेंगे कुछ ठीक नहीं किंतु यहां पे देखिए मां ने कहा है तोमार जन्नई आट के रेखे जी तुम्हारे लिए ही तो ठाकुर को दक्षिणेश्वर में रोक करके रखा है क्योंकि दक्षिणेश्वर में ठाकुर और मां दोनों रहेंगे और फिर उनके संतान जब वहां पर आना शुरू होंगे फिर यह नरेण आएगा फिर यह राजा महाराज आएंगे काली महाराज आएंगे सुबोधा अंद जी आएंगे सुबोध महाराज और फिर आकर के उनको तो रोटी और दाल और तरकारी खिलानी है मां को तब तो कहीं जाकर ये लोग पुष्ट होकर के पूरे विश्व में सनातन धर्म का संदेश प्रसारित करेंगे यह सब तो लीला होनी है इसीलिए ठाकुर को वहां पर रोक करके रखा है तोमार जन्नई ताके आट के रखे जीी यह सब सेंटर्स हम लोग चाहे बेंगोली हो कि ना हो इसी बेंगोली में हमको मुख स्त कर लेने है और फिर यही महावाक्य का मंत्र जप करते रहेंगे उसी से हम लोगों का हो जा जाएगा हमको कोई वो वेदांत के जो महावाक्य है कि अहम ब्रह्मास्मि कि तत्व मसी न कि शिवो हम न कि प्रज्ञान ब्रह्म वो सब यदि पाठ नहीं भी करेंगे अपने संग के ये महावाक्य है उसका यदि पाठ करते रहेंगे तो भी हमको मुक्ति मिल जाएगी एक बार भजनानंद जी हमारे क्लास में कहते थे भजनानंद जी इज वन ऑफ द ग्रेटेस्ट मोक इन अवर ऑर्डर तो हम लोगों में हम लोगों का टीसी में क्लास लेते थे अभी भजनानंद जी के बारे में सबको पता है प्रचंड वेदांती प्रचंड ज्ञानी इतना मतलब स्वाध्याय अभ्यास करते हैं और उनका रूटीन भी इतना पक्का है तो हम लोगों के मन में वही है कि भजनानंद जी के जैसा ज्ञानी और कोई नहीं तो एक दिन क्लास में बात-बात में क्या कहते हैं कि देखो हमको जद मुक्ति मिले ना मिले यदि राम कृष्ण लोक में भी चले जाए तो भी हमारे लिए काफी है मैं तो कहता हूं कि अभी इस जन्म में राम कृष्ण लोक मिल जाए तो भी ब्रह्मज्ञान पढा रहा अपने घर में नहीं चाहिए तो वैसे ही इस तरह के जो महामंत्र है अपने के उसका एक के बाद एक मंत्र जब भी करेंगे तो भी हमारा कल्याण हो जाएगा तो ऐसा ही यह एक महामंत्र तोमार जन्नई ता के उखाने आट के रेखे ी तुम्हारे लिए ही ठाकुर को वहां पर रोक करके रखा है श्री मां बोली ने बटे माने कहा अच्छा तुम अर के होगा तुम मेरी कौन हो तो वो लड़की क्या बोली उस स्त्री ने क्या कहा अमी तुमार बोन कोई मैं तुम्हारी बहन मां बोली लेन बोटे मां ने कहा अच्छा ताई तुम ऐसे छो इसलिए तुम आई हो कोई रूप कथा बरतार परे तीनी माया पड़ने यह बात होने के बाद में ही मां शयन मां निद्रा में चली गई मां सो पड़ी अभी किसी को कहने की जरूरत नहीं है कि वह स्त्री कौन थी जो कि दक्षिणेश्वर से आई थी मां के साथ में बैठ कर के मां को शांतोना दे रही थी वो कौन थी वो कहने की हम में से किसी जरूरत नहीं है और फिर देखिए और भी उन्होंने क्या कहा कि मां की बहन है अब जैसे हम लोगों की उस दिन चर्चा हो रही थी ना कि बहुत सुंदर जैसे आपने कहा कि दक्षिणेश्वर में एक बार मां ने ठाकुर को पूछा कि आप मुझे किस रूप में देखते हैं मैं आपकी कौन होती हूं जैसे माने यह प्रश्न मां काली को कहा कि मैं तुम्हारी कौन होती हूं जैसे ही मां ने उत्तर दिया मैं तुम्हारी बहन हूं तो वही प्रश्न मां ने दक्षिणेश्वर में ठाकुर को पूछा था कि आप मुझे किस दृष्टि से देखते हैं मैं आपकी कौन हूं तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया व जनी उखाने बसे आ छन मंदिर की ओर इशारा करके उन्नी तुम्हार भीतर छन अर्थात की जो जगन माता मां काली मंदिर में बैठी हुई है जिनकी उपासना ठाकुर ने जीवन भर की वही काली आज मां का स्वरूप धारण करके मां के हृदय में विराजित होकर के यहां पर आकर के ठाकुर की सेवा कर रही है वही काली और देखिए कि जब ठाकुर का देहांत महासमाधि हुई उस समय मां चिल्ला कर के क्या बोल उठी आर मां काली आमा के छेड़े पोथाई चोले गले अर्थात कि मेरी मां काली मुझे छोड़ कर के कहां चली गई यानी कि मां भी ठाकुर को भीतर में ठाकुर में मां काली का दर्शन करती थी दोनों एक दूसरे में मां काली का दर्शन करते थे तो कैसा ये एक सुंदर एक चक्र है इन दोनों के बीच में ठाकुर मां शारदा और मां काली ये तीन एक एक तीन तीनों के भीतर में एक ही सत्ता विराजमान है वही एक ही सनातन सत्ता के दो अंश है तीन अंश है एक है जो कि मंदिर में मां काली के रूप में पूछते हैं दूसरे हैं भगवान श्री राम कृष्ण तीसरी मां शारदा तो देखिए कि यहां पर वह मां काली ने स्वीकार किया कि जब मां ने पूछा तुम कौन हो मां काली ने कहा मैं तुम्हारी बहन हूं और यह जो बात हुई इसके बाद में मां फिर सो गई मां को नींद लग गई प दिन प्राते देखा गलो दूसरे दिन सुबह को देखा गया श्री मायर जोर सारिया गया छ मां का बुखार शांत हो गया है मा मा का बुखार चला गया है ई दिव दर्शन पर तहर मने तखन जते उत्साह आश छ इस दिव्य दर्शन के बाद में मां के मन में भी थेट उत्साह आया है सतराम पिता जखन बोने विदेश निरूपा होया पड़िया था का अपेक्षा धीरे-धीरे अग्रसर हुवाई बालो इसीलिए जब पिताजी ने कहा कि इस अनजाने प्रदेश में निरूपा होकर के असहाय होकर के पड़े रहने की बजाय धीरे-धीरे हम जदी दक्षिणेश्वर की ओर कलकाता की ओर कदम बढ़ाते हैं तो भी अच्छा है तभी अच्छा तोख तीनी सानंद समत होया पिता सहित लेन तब मां बिल्कुल आनंद से सम्मत हो गई सहमत हो गई और पिताजी के साथ में चलने लगी सौभाग्य क्रम उल्प दूरे एक खानी पालकी पावा गलो सौभाग्य क्रम से सौभाग्य से वहां पास में ही एक पालखी भी मिल गई अभी देखिए यह पालखी में जाना मां के लिए तो एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि पैसे तो इतने थे नहीं किंतु और वह भी अभी इस तरह के अनजान प्रदेश में पालखी का मिल जाना तो हम तो अनुमान करके कह ही सकते हैं कि मां काली ने ही पालकी को भेजा होगा और जब रामचंद्र मां के पिताजी जब पूछे होंगे कितना रुपया लोगे तो फिर रुपया भी कम ही बताया होगा तभी तो रामचंद्र एफोर्ड कर पाए होंगे यह बात यहां पे लिखी नहीं है किंतु हम लोगों की इमेजिनेशन ऐसी है कि वह सब कलर भरना वो अच्छा लगता है वो जब एक चित्र होता है ना हम वो स्केच बुक जब लाते हैं ना छोटे होते हैं तो एक आउटलाइन दी होती है घर की फिर ये पंखी की पेड़ की और लिखते हैं कि इसमें कलर भरो तभी तो वो आउटलाइन जो काले कलर का वो जो आउटलाइन कलर डालने से तो सुंदर दिखता है तो वैसे ही यहां पे आउटलाइन वगैरह दी है इसके भीतर में रंग पुरना यह हमारी कल्पना का काम है तो यहां पे बिल्कुल पास में पालकी भी मिल गई मां काली की कृपा से और फिर पालकी में बैठ कर के मां चलने लगी भग रामचंद्र मां के साथ साथ चल रहे हैं रास्ता आबार चर आशी लो रास्ते में फिर से एक बार बुखार हुआ किंतु तहर प्रकोप ते मन अस्य न है किंतु उसका प्रकोप उसका पावर इतना असह्य नहीं था और वैसे भी मां पालकी में जा रही है तो चलना और कष्ट करना नहीं है तो फिर वह बुखार है तो पालकी में बैठे बैठे ही वह बुखार सहन हो सकता है अधिक तु श्रीमा तोख ओहा नन और साथ साथ में ही श्री मां उस समय असहाय नहीं थी चलना तो नहीं है पैदल पालकी में जाना है तरान पिता दुश्चिंता बाड़ा अनावश्यक भाप कहा केव किछु बोली लेता इसलिए पिताजी की दुश्चिंता बढ़ाने की वजह माने किसी को कुछ बोला नहीं क्रम सुदीर घ भ्रमण पर शेष पथ तुक नौका छोड़िया रात्रि नोटर समय त हारा दक्षिणेश्वर उपनीत होलेन क्रम क्रम सुदी घ पथ बड़ा लंबा पथ पार करके छे वटे आखिर में थोड़ा सा रास्ता जो बचा था वह नौका में बैठ कर के नौका में यात्रा करके आखिर में रात्रि 9 बजे के आसपास में वे लोग दक्षिणेश्वर में उपस्थित हुए जयराम बाटी ईते आगत श कोले जोखन दक्षिणेश्वर गंगार घाटे ना मिते छन जयराम बाटी से आए हुए सभी यात्रा यात्रा यात्रा वासी जब गंगा के किनारे नौका में से उतर रहे थे तो खन श्री मा सुनीत पायले उस समय माने माने ठाकुर की यह आवाज सुनी सुन के सुन सकी ठाकुर क्या बोलते हैं ठाकुर बोली ओ रिदु बार बेला ई तो रे प्रथम बार आछ ठाकुर कह रहे हैं ओ रिदु हृदय अर्थात की उनका भांजा हृदय उनका सेवक ठाकुर कहते हैं ओ रिदु बार बेला नहीं तो रे बार बेला अर्थात की एक कु मुहूर्त एक अच्छा मुहूर्त होता है बुरा मुहूर्त होता है बार बेला बुरा मुहूर्त है तो यह बार बेला नहीं है तो अरे प्रथम बार आ रही है पहली बार आ रही है श्री मा निश्चिंत छने ज तीनी गंगार ऊपर नौका ते बार बेला कटाया असश छन मां निश्चिंत थी कि वह गंगा के ऊपर में ही नौका में ही बार बेला काट करके आई है अधिक तो श्री रामकृष्ण सेही प्रथम कथा दे एमन एकटा प्राण डाला प्रेमेर पर्ष छलो जहार ने तिनी शोजा ठाकुरे घोरे किया उठले मां को पता था कि वह गंगा के किनारे ही नौका में ही बार बेला समाप्त करके काट करके आई है और साथ साथ में ही ठाकुर की यह जो सर्वप्रथम बात उन्होंने सुनी उनके कर्ण में प्रवेश की उसमें ऐसा प्राण ढाला बालो भाषा महाराज जी का ही शब्द प्राण ढाला स्नेह जिसमें इस तरह का स्नेह जिसके भीतर में ठाकुर ने अपने पूरे प्राण ढाल दिए हो तो प्राण ढाला भलो भाषा इस तरह की यह जो प्रेम का स्पर्श जिसमें था इस तरह की बात सुनकर के प्राण प्राण टानेनबाउम कि इस इस बात में यह प्राण का उत्साह और स्नेह कैसे हो सकता है ठाकुर को तो ऐसा कहना चाहिए अरे पहली बार आ रही है उसके लिए कुछ बंदोबस्त करो यह सब करो ठाकुर यह सब कहेंगे बाद में कहेंगे किंतु सबसे पहले ऐसा क्यों कहा कि अरे बार बेला नहीं है तो माने ये कम मुहूर्त नहीं है तो पहली बार आ रही है हमको जदी कोई कहेगा किसी के घर में जाएंगे और जब वो हमारे जो होस्ट होंगे यह जो यजमान आपस में यदि ऐसी बात करेंगे अरे यह कम रुत में तो नहीं आए अभी तो हमको बुरा नहीं लगेगा क्या यह मैंने ठाकुर का जीवन और सब कुछ किस तरह से यह दिव्य आंचल में बंधा हुआ था वो व यह सुनकर के हमको कभी-कभी कष्ट भी हो सकता है खास करके मां की दृष्टि से ठाकुर की बातें ठाकुर का वर्तन देखें तो कभी-कभी बहुत ही वृक्ष दिखता है एक बार मां जब दक्षि जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर आई उस समय उस आने के कुछ ही समय पहले ठाकुर गिर गए थे और उनका हाथ हाथ में हड्डी में क्रैक हो गई थी तो वह प्लास्टर बंधा हुआ था तो जैसे ही मां आई ठाकुर ने पूछा अरे तुम क्या बार बेला वहां से निकली हो क्या जयराम बाटी से देखो इसी वजह से मेरे हाथ में फैक्चर हो गया जाओ तुम वापस जाओ और यात्रा बदल करके आओ तो यह बात सुनकर के मां फि फौरन जयराम बाटी वापस चली गई अभी देखिए कि दक्षिणेश्वर से जयराम टी का रास्ता कैसा कष्ट करर है कैसा दुर्गम है यह तो इस बार तो मां को बुखार हो गया एक बार वह तेलो भेलो के मैदान से आ रहे हैं तो एक डाकू के साथ में वो मुलाकात हो गई तो इस तरह का दुर्गम पथ अतिक्रमण को दर्शन करने के लिए उनकी सेवा करने के लिए आ रही है तो ठाकुर ऐसा मुंह पर बोल देते हैं अरे कम मुहूर्त में निकली हो तो मेरा हाथ टूट गया जाओ जाओ यात्रा बदल करके फिर से वापस आओ तो ठाकुर की यह बात यहां पे तो और कुछ नहीं बोलते सिर्फ ये हिंट दे दिया है भविष्य में क्या होने वाला है तो यह बात सुनकर के हमको थोड़ा सा एक यह तो अवश्य होता है खास करके मुझे मां की दृष्टि से जब ठाकुर का यह वर्तन देखता हूं पता है ऐसा करके ही मां एक बार चली गई थी वो हृदय ने जब अपमान किया और मां चली गई तो फिर मां आई ही नहीं एक साल तक वापस और उस समय क्या हुआ कि ये जो ठाकुर की सेवा करने के लिए हृदय तो था फिर ये रामलाल था ठाकुर का वो भतीजा तो ये लोग रामलाल हृदय वगैरह मिलकर के ठाकुर की सेवा करते थे किंतु क्या हुआ कि हृदय का तो चला जाना हुआ और फिर यह रामलाल था वो काली का पुजारी हो गया तो रामलाल सोचता है अभी तो मैं मां काली का पुजारी हूं अभी तो यह मैंने हाईएस्ट सीईओ होता है ना कंपनी में जैसे माने टॉप पोजीशन अभी तो मैं टॉप पोजीशन में हूं तो अभी तो ठाकुर की सेवा करने की क्या जरूरत है मैं इतना बिजी हूं तो ठाकुर बार-बार जयराम बाटी में मैसेज पहुंचाते हैं कि रामलाल अभी काली का पुजारी हो गया है और जब बामने दोने बामने दोले संगे मिसे छ अर्थात कि ये जो वो बहुत सारे ब्राह्मण होते हैं ना पूजा के पूजा करने के लिए पुजारी के असिस्टेंट तो उनके दल में जाकर के मिल गया है वो आर खोज नहीं ना व मेरी संभाल नहीं रखता मेरी केयर नहीं करता तुम यहां पर आओ जैसा भी करके आओ पालखी करके आओ कैसे भी करके आओ ₹ लगेगा 20 लगेगा मैं दूंगा किंतु आओ तो ठाकुर को जब अपनी जरूरत पड़ गई सेवा की जब ला उनकी सेवा नहीं कर रहे हैं तब मां को बुला रहे हैं किंतु मां बेचारी इतना कष्ट करके दक्षिणेश्वर आती है तो पहले ही पूछते हैं कि अरे ये बार वेला में तो नहीं आ रही कम मूर्त में तो नहीं आ रही मां का स्वागत करना चाहिए मां को पूछना चाहिए अरे रास्ते में कोई कष्ट तो नहीं हुआ यह नहीं पूछ कर के ऐसा सब करते हैं कि बार वेला हो गई है यह सब मां की दृष्टि से देख कर के ठाकुर का व्यवहार कैसा विचित्र लगता है और उल्टा देखिए मां को तो और ही कुछ लगता है मां क्या कहती है कि ठाकुर की यही बात में ऐसा प्राण ढाला भालो भाष छीन ऐसा प्राण का स्नेह भरा हुआ था कि उसी के आकर्षण से जब बाकी सब स्त्रियां नबत में जाकर के चंद्रा मणि देवी रह रही थी उनके पास में गई मां सीधी उसी आकर्षण से बंद करके कर्षण की धागे से खींच करके वही ठाकुर के कमरे में आकर के उपस्थित हुई तो या तो फिर हम लोग प्रेजुड इस है ना कि मां ठाकुर को बिल्कुल डिफरेंट दृष्टि से देखती है पता नहीं किंतु यदि हम लोग तो मां के संतान है तो हमको तो हम लोग हमेशा प्रेजुड रहेंगे यदि देखिए कि मां और पिताजी के बीच में झगड़ा होता है कभी-कभी तो हम लोग इंस्टिंक्टिवली मां का ही पक्ष लेंगे तो यहां पे भी ऐसा है कि ठाकुर जब मां को ऐसा कोई उटपटांग बातें करेंगे मां के साथ में तो हम तो मां का ही पक्ष लेकर बात करेंगे मां भले ही चाहे ठाकुर को बार-बार क्षमा कर दे ठाकुर ने जब वहां से निकाल दिया अच्छा जाओ यात्रा बदल करके आओ इतना लंबा दुर्गम पथ पार करके मां जो दक्षिणेश्वर आई है वही रास्ता पार करके चली भी गई एक शब्द मुंह से नहीं निकाला और जब ठाकुर ने पुकारा फिर से कि मेरी सेवा करने के लिए मुझे असुविधा हो रही है कोई है नहीं तुम आ जाओ तो ठाकुर की इस पुकार सुन कर के वापस भी चली आई मां के भीतर में बिल्कुल स्वार्थ गं हीन प्रेम यह शब्द मां के बारे में यूज किया है अर्थात कि मां के भीतर में जो प्रेम था ठाकुर के प्रति सिर्फ ठाकुर के प्रति नहीं पूरे जगत संसार के प्रति थोड़ा सा भी स्वार्थ नहीं था माने कभी ऐसा हम लोगों को जो बुरा लग जाता है हमको कोई अपमान करेगा किसी के घर जाएंगे तो फिर क्या हम इस जन्म में उसके घर में पैर रखेंगे वो कितना ही चाहे पुकारे हमारा आत्म सम्मान जो इतना स्ट्रांग है मैं खुद तो कभी नहीं जाऊंगा मेरा खुद का अपने ईगो ऐसा है कि मैं किसी के घर गया और अपमान किया और भगा दिया और मैं वापस आ ऐसा हो ही नहीं किंतु मां का देखिए क्या हृदय है सोने का हृदय अपमान करके निकाला है फिर भी ठाकुर ने जब पुकारा वह वापस चली आई क्योंकि पता है कि ठाकुर और मां की लीला पर ही इस संसार का आधार यह हमारा जो नया भारत है फ्यूचर इंडिया इसका फाउंडेशन ही है मां और ठाकुर का यह दिव्य संबंध जद इसमें मां अपना ईगो लाती कि ठाकुर ने तो मुझे अपमानित करके निकाला है जब मेरा अपमान कर रहा था ठाकुर कुछ बोल नहीं पाए तो अब जब ठाकुर को जरूरत है तो मैं क्यों जाऊं माने जद ऐसा सोचा होता तो पता नहीं वही गुलाम होकर के हम शायद आज भी पड़े होते और यदि आजादी मिली भी होती तो खून की नदियां बह गई होती और देखिए हमारे साथ में ही कितने सारे देशों को आजादी मिली है यही इजिप्त यही इंडोनेशिया वही वियतनाम ये कितने देश है उन सबकी परिस्थिति देखिए और आज का भारत देखिए कैसे सभी क्षेत्रों में में स्पेस हो कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो इंडस्ट्रियल इजेशन हो इकोनॉमी हो जितने भी क्षेत्र है सभी क्षेत्र में आज सर्वश्रेष्ठ देशों की हार में भारत जाकर के खड़ा हुआ है वही 17 साल अभी तो कल ही तो आजादी मिली आज हम यहां पर खड़े हैं तो और 17 साल में हम कहां पे होंगे अनुमान कीजिए तो यह सबका फाउंडेशन है मां का स्वार्थ गंद हीन प्रेम ठाकुर के ऊपर में होता तो पता नहीं क्या होता मां ने ही इस संबंध को टका करके रखा है तो ठाकुर ने जैसे ही कहा कि अरे रिदु बार बेला नहीं है तो रे पहली बार आ रही है तो जैसे ही मां ने यह सुना हम अलग सुर से सुनते हैं मां ने अलग सुर से सुना मां को तो यही सुनाई दिया कि ठाकुर का पूरा प्राण से भरा हुआ स्नेह इस बात में है और उसके आकर्षण से मां सीधे ठाकुर के कमरे में जाकर के उपस्थित हुई इस के बाद क्या होता है वह हम कल डिस्कस करेंगे ओ शांति शांति शांति हरि प्रसत श्री राम कृष्ण पर
Questions & Answers
मस्तु नारी केना मने सिर्फ स्त्री ही क्यों हम सभी लोग स्त्री कहो ना कि पुरुष कहो साधारण और दिव्य यह दोनों वर्त होते हैं मैंने जो अपने वो जो रंग नाथा आनंद जी महाराज है वगैरह इन सब साधुओं को जो नजरों से तो देखा है ना तो उनका स्वभाव देख कर के वर्तन देख कर के सही सही में लगता है कि ठाकुर कीय जो आशीर्वाद है यह जो अपना भक्त संघ है सिर्फ साधु सन्यासी ब्रह्मचारी नहीं सभी भक्त है दीक्षार्थी है वॉलंटस से डिवोटा है सबके ऊपर में मां ठाकुर का आशीर्वाद अभी भी है अभी भी ऐसे साधक मिल जाएंगे कि जिनका जीवन इनके दिव्य स्पर्श पाक के धन्य हो गया है जैसे गौरांग महाप्रभु में ने अवतार और शक्ति ए आधार है उनकी तो अलग से शक्ति नहीं थी हालांकि गौरांग तो अपनी ही ट्रेडीशन में अवतार है बाकी सब ट्रेडीशन जैसे भगवान बुद्ध कहो कि जीसस कहो उन लोगों में शक्ति का कांसेप्ट नहीं है किंतु अपने तो गौरांग प्रभु तो अपने ही ट्रेडिशनल में राधा थी भगवान राम के साथ में मां सीता थी तो गौरांग महाप्रभु के साथ में ऐसा तो कौन था विश्व विश्वंभरी ना की उनकी क्या उनकी विश्व विष्णु प्रिया विष्णु प्रिया हां तो किंतु उनको तो शक्ति के रूप में नहीं गिनते तो गौरांग महाप्रभु को तो शक्ति और अवतार एक के साथ में क्योंकि फिर मधुर भाव का प्रचार व कैसे करेंगे उनके खुद के शरीर में तो राधा का अवतरण हुआ था हालांकि ठाकुर ने मधुर भाव का साधना की किंतु शक्ति तो अलग से देह धारण करके ही आई है तो जैसे आपने कहा वो है गौरंग महाप्रभु का तो उदाहरण है कि एक ही शरीर में अवतार और शक्ति का आगमन यह भी है माने दोनों हो सकता है युग प्रयोजन के अनुसार यह उदाहरण तो है ही है अपनी ट्रेडीशन में हम बुद्ध या जीसस को इस उदाहरण में नहीं डालेंगे किंतु गौरांग महाप्रभु तो अपने ही है और वो भी वैष्णव थे इसलिए यह शक्ति का कांसेप्ट तो उनको तो पक्का लगता है देखिए वैष्णव के बारे में मेरा इतना कोई रीडिंग नहीं है मेरा तो जो रीडिंग है अपनी ट्रेडिशनल म मृत वगैरह पढ़ कर के ही आया है तो यह तो मैं अनुमान करके कह रहा हूं वैष्णव शास्त्र मैंने इतना अभ्यास नहीं किया किंतु जब मधुर भाव होगा अब जैसे राधा की जब इतनी बातें हुई है तो शक्ति का तो अभी शक्ति जो ट्रेड इस रूप में जो जैसे अवतरण का जो आर्टिकल लिखा है ना वो मैंने ये इसकी अवतरण का है ना ये इसके बेस पर लिखा है गंभीरानंद जी के हां तो गंभीरानंद जी ने जिस तरह से शक्ति का विश्लेषण किया है उस तरह से वे लोग शायद नहीं करते होंगे क्योंकि यह तो शक्ति साधना का विश्लेषण है तो उनका विश्लेषण थोड़ा सा अलग होगा ऐसा मैं मान लेता हूं मेरा जो मेरा पर्सनल जो ओपिनियन है हम लोग हिंदू धर्म में खास करके य जो इवोल्यूशन का कांसेप्ट से ही लोगों को थोड़ा सा यह होता है कि हमारे आइडियाज इवोल कैसे हो सकते हैं पहले से ही वेद उपनिषद में या तो भागवत में सब कुछ है फिर उसी को हम आगे बढ़ाते हैं किंतु अभी मैं जो पर्सनली मानता हूं यह अपनी जो वैष्णव ट्रेडीशन जो कि भागवत में से चली आ रही है यह एक डेवलप हुई ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम और यहां पर शक्ति साधना डेवलप हुई देवी भागवत वगैरा चंडी वगैरा ग्रंथ के बाद में और फिर यह सभी ट्रेडीशन का संगम वेदांतिका संगम ठाकुर के जीवन में हुआ लिटरली भी संगम हुआ और फिलोसॉफिकली भी हमारे शरद राज ने शारदानंद जी ने लीला प्रसंग में किया तो यह संगम यानी कि परिपूर्णता हमको इस अवतार में दिखते है अभी जब भगवान कृष्ण का जो एनालिसिस है भागवत में तो इस तरह से नहीं है कि राधा की सहायता से उन्होंने यह सनातन धर्म को पुनः स्थापित किया ऐसा नहीं है तो वह हमारे यहां पर है क्योंकि सभी ट्रेडिशनल यहां पर है तो माने ऑफकोर्स वैष्णव ट्रेडिशनल देखा जाए तो मुझे नहीं लगता कि शक्ति का यह स्थान जो कि हमने डेवलप किया है संगम करके वो वहां पे होगा ऐसा नहीं ही हो सकता है किंतु क्या है कि आइडिया बिखरे पड़े हैं पूरी भारतीय ट्रेडीशन जो हजारों सालों से एक के बाद एक एक के बाद एक साधक इसको जो डेवलप कर रहे है एक के बाद एक अवतार आ करर के अपना कंट्रीब्यूशन कर रहे हैं तो ये एनरिच होता जाता है ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम फिर इस मैंने फाइनल जो इस एनरिच सोइल में जो फाइनल क्रॉप है फाइनल वृक्ष है वो है भगवान श्री राम कृष्णा रूपी यानी सभी ट्रेडिशनल है इसका संगम यहां पे है तो ऑफकोर्स ठाकुर ने जिस तरह से मां का हमने एनालिसिस यहां पे है वो हम बाकी सब ट्रेडिशनल मेरा ये ट्रेडिशनल रीडिंग थोड़ा सा कच्चा है इसलिए मैं कोई आउटरा इट ओपिनियन नहीं दूंगा मैं ये कहूंगा कि मेरा जो लिमिटेड जो रीडिंग है उसमें ये मेरा मत हां ये देवी भाग हां यह देवी भागवत की ट्रेडिशनल है फिर यह भागवत की ट्रेडीशन आ रही है हां फिर यहां पे ये जो वेदांत की ट्रेडिशनल है फिर सिर्फ इतना ही नहीं ये जैनिज्म बुद्धिज्म जो ट्रेडिशनल है ये भगवान शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध क्यों कहते हैं क्योंकि बुद्धिज्म के कुछ-कुछ एलिमेंट्स उन्होंने वेदांत की अपनी एनालिसिस में मिक्स अप कर दिए हैं तो ये जितनी भी ट्रेडिशनल का संगम और एक सुंदर रूप से एक मिक्सचर यहां पर हुआ है सो इस तरह से जो एनालिसिस है यह मुझे नहीं लगा कि और कहीं प होगा किंतु यहां पे एक भी बात है जैसे आपने कहा कि ये सब डिशन में कंफ्लेक्स किंतु जद आप क्रिटिकल स्टडी करते हैं ना बहुत बार क्या होता है हम भक्ति की वजह से आज का जो आइडियाज है ना वो हम इतिहास के ऊपर में डाल देते हैं ये देवी भागवत में ऐसा लिखा है तो उसका यह अर्थ नहीं वो जो उस समय जो किया गया था आज के हिसाब से उसको करना है भगवत श्रीमद् भागवत में यह जो लिखा गया उसका वो अर्थ नहीं है ठीक ठीक अर्थ जो कि उस समय के लोगों ने किया आज के अनुसार उसका अर्थ करना है स्वामी जी कहते हैं ये टेक्स्ट टॉर्चरिंग है कि ध्व वालों ने अद्वैत टेक्स्ट के ऊपर में अपना मीनिंग डाल दिया फिर अद्वैत वालों ने द्वैत टेक्स्ट के ऊपर में अपना मीनिंग डाल दिया अभी वो जो जो साधकों ने जिस दृष्टिकोण से लिखा होगा उसका उस पार्टिकुलर वैलिडिटी है उसको ऊपर में हम आज का मत नहीं ठोप देना है या तो फिर मेरा मत सही है बोलकर के देवी भागवत में यही लिखा है श्रीमद् भागवत में यही लिखा है वेदांत में वही लिखा है इस तरह से टेक्स्ट टॉर्चरिंग नहीं करना माने उसको एक हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट के रूप में देखना है हिस्टोरिकल इवोल्यूशन के रूप में देखना है ये हम हिंदू लोगों के साथ में खास करके हम लोगों का हिस्ट्री का कांसेप्ट नहीं है ना हम लोग सोचते हैं ये तो चक्रा का है ना सृष्टि स्थिति प्रलय तो ये तो माने ये ये हमारे स्क्रिप्चर भूतकाल में लिखे गए कि वर्तमान में लिखे गए क्या फर्क पड़ता है तो ये भूतकाल के स्क्रिप्चर को आज उठा कर के वर्तमान में व्याख्या करके भूतकाल के ऊपर डाल देते मेरा जो इसके बारे में है समय के बारे में के यह जो है ना क्वांटम डायनेमिक्स कहते है प्रोबेबिलिटी ये जो जितने भी इवेंट्स है ये इवेंट एक्चुअली दिस अ प्रोबेबिलिटीज ऑफ इवेंट हैपनिंग तो ये सभी इवेंट्स का एक क्लाउड होता है प्रोबेबिलिटी क्लाउड फिर अब ये प्रोबेबिलिटी क्लाउड को जब आप ऑब्जर्व करेंगे तो एक प्रोबेबिलिटी कॉलेप्स होगा और ये कॉलेप्स होगा और एक पार्टिकुलर इवेंट होगी तो प्रश्न होता है जो प्रोबेबिलिटी क्लाउड में बाकी जो इवेंट थी उसका क्या हुआ तो ये लोग कहते हैं पैरेलल यूनिवर्स में एक साथ में वे लोग एसिस्टिंग है तो अभी ये समय का मने आज सतयुग है और कहीं हो सकता है पैरेलल यूनिवर्स में त्रेता युग होगा और कहीं तीसरे यूनिवर्स में वो द्वापर युग होगा माने ऑल द टाइम एजिस्ट साइमल नियस इन अ प्रोबेबिलिटी स्फीयर फिर जैसे जैसे हमारी टेंडेंसी है जैसे हम लोग कहते हैं कि मैं साधना करूंगा तो मेरे मैं धीरे-धीरे करके यूनिवर्स क्रॉस करते करते मेरा फ्यूचर जो है वो सतयुग की ओर जाता जाएगा दिस इज मैं सीरियसली इस सब चीजों के बारे में सोचता हूं कि ने वेदांत को जद क्वांटम डायनेमिक्स है रिलेटिविटी है जो आज के माइंड बेंडिंग आइडियाज है उसके साथ में जद ये फ्यूज किया जाए तो कैसे विचित्र विचित्र आईडियाज खड़े होते हैं क्योंकि जितना भी नॉलेज है वह सब तो एक साथ में विद्यमान है राइट तो अभी मेरी इनसाइट जहां तक जाती है उतना नॉलेज में अर्जन करूंगा अभी ऋषि मुनियों ने सुपर कॉन्शियस स्टेट में जाकर के जो दर्शन किए होंगे वही दर्शन मान लीजिए शैल क्रिया है या तो फिर यह आयुर्वेद है यह जितने भी सेकुलर साइंस है वो उन्होंने प्राप्त किए होंगे वोह निख करके गए हैं तो आज का मडन साइंस के साथ में कुछ कुछ मिल जाता है तो उसमें आश्चर्य की बात नहीं है हालांकि यह भी एक बात है कि यहां पर एक लड़का कुछ दिनों के पहले आया था मुझे बोला कि अरे देखो कि हमारे सब शास्त्र में तो सब कुछ लिख कर के गया ये लोग क्या डेवलप कर रहे हैं मैंने कहा देखो कि हमारे शास्त्र के बारे में हमको गर्व हो यह तो अच्छी बात है किंतु साथ-साथ में ही ये मॉडर्न साइंस किसी काम का नहीं है इस तरह का मूर्खा में फिर से मत करना क्योंकि एक बार करके हम हजार साल की गुलामी भुगत करके गए हैं वो मूर्खा फिर से स्टार्ट ना हो विद्या विद्या है वो पूर्व की हो कि पश्चिम की हो समान आदर्श से उसको ग्रहण करना है वरना मैं हमारी ही विद्या को ग्रहण करूंगा विदेशी विद्या को छोड़ दूंगा तो फिर वे लोग जब गन पाउडर लेकर के आए भजनानंद जी के बारे में एक बात बताता हूं मैं तो ट्रेनिंग सेंटर में था तो हमारे आचार्य थे और इतने गंभीर रहते थे कि उनके साथ में बात करना व तो मैंने हम लोग तो सपने में भी नहीं सोचे कि उनके साथ में कभी साथ में बैठ कर के कोई बात करने का मौका मिलेगा वो क्लास में आएंगे और इतना सुंदर रूप से व्याख्यान देंगे फिलोसोफी तो उनका अच्छा ही है तो सब और फिर वो चले जाएंगे तो अभी उनका साथ में हमारा क्या कहां चांद कहां पृथ्वी पर हम लोग पड़े हैं वो चांद का वो ठाकुर कहते हैं ना चांद का प्रकाश पानी में गिरता है तो मछलियां उनके साथ में खेलती है सोचती है ये हमारे ही लेवल के है कहां वो कहां हम किंतु जब ठाकुर की कृपा से कंप्लीट वर्क्स में जब मेरा पोस्टिंग हुआ तो ऐसा देखिए कि मन की इच्छा से इतना भर गया उनके साथ में उनका सत्संग पा कर के कि वहां पर क्या है बेलूरमठ में एक पुराना ट्रेनिंग सेंटर है अभी तो नया ट्रेनिंग सेंटर हो गया तो पुराना ट्रेनिंग सेंटर को अभी वहां पे मोंगस क्वाटर में वो परिणत कर दिया है तो वहां पे एक ऑफिस मा हमको दी गई है भजनानंद जी को कंपीट वर्ष के लिए तो उस ऑफिस में जाना है फिर उसी ऑफिस में उनके साथ में बैठ कर के यह सब डिस्कस करना है कि ये जो लेटर्स वगैरह जो है उसमें जो एडिट क्या करना है वगैरह माने एक तो स्वामी जी टॉपिक है और फिर साथ में वो को वर्कर के रूप में बैठे हैं नानंद जी तो वो जो एक के बाद एक एक दिन प्रतिदिन जो उनका जो सत्संग हुआ मन सही में भर गया जो टीसी में मैं सोचता था कि वो हां जद उनके साथ में बात करने को मिले कोई अच्छे टॉपिक प बात करने को मिले तो वो मेरा मन भर गया बिल्कुल पहले दिन की बात बताता हूं जब मैं गया ऐसे मैं तो डर रहा हूं हृदय में एकदम धक धक हो रहा है भजना अंजन जी के साथ में बैठ के काम करना है पता नहीं वो कहां हमका तो जैसे ही और ऑफिस में ताला था तो महाराज ने बोल दिया था इस टाइम पे आ जाना मैं भी आ जाऊंगा मैंने कहा ठीक है मैं तो 10 मिनट जाकर के पहले खड़ा रह गया हूं कब महाराज जाता है कब महाराज एम टाइम पे आए एग्जैक्ट टाइम पे आ कर के वो अपने पॉकेट में से चाबी निकाला तो मैंने कहा ऑफकोर्स हमको तो कहना ही चाहिए कि महाराज लाइए चाबी मैं खोल देता हूं तो महाराज बोले ना ना आमी खोल जी तो ऐसा गंभीर होकर बोले तो फिर मैं भी कुछ बोला नहीं तो ठीक है जदी महाराज बोलते हैं उन्होंने अपने हाथों से चाबी से ताला खोला फिर दरवाजा खोला अभी दरवाजा पहले ही दिन में पहली बार जाते हैं तो क्या है ऑफिस का मेंटेनेंस तो वर्कर लोग करेंगे रात को जब जाएंगे तो क्या खिड़की वगैरह बंद करके जाएंगे लाइट बाइट सब बंद होगा तो जैसे ही हम भीतर में प्रवेश किए तो खिड़की वगैरह बंद है तो महाराज जी अपने हाथों से खिड़की खोलने लगे तो मैंने कहा ऑफकोर्स हम तो कहेंगे महाराज जी लाइए आप बैठिए मैं खिड़की लता बोला नहीं नहीं तुम बैठो यहां पे वो जो वहां पे जो र्सी था तुम बैठो मैं खिड़की पलता अभी महाराज बोल रहे है तो हमको तो हम क्या करेंगे मैं बैठ गया कुर्सी पे मैं कु कुसी प बैठा हूं महाराज एक के बाद एक खिड़की खोल रहा है और फिर वो खिड़कियां भी बहुत सारी थी और पुराने समय की वो जो ऐसा फोल्ड होती है ना प्रत्येक फोल्ड पे वो एक स्टॉपर होता है तो एक के बाद एक स्टॉपर ओपन कर रहा है और फिर और जो उनकी जो ये है ना जैसे लगता है कि ही इज मेडिटेटिंग व इतना एवरी एक्शन इज प्रेसा इज माने एक भी वेस्टेड एक्शन नहीं हम लोग जदी मैं खुद जदी सुबह आज सोचता हूं ऑफिस में आऊंगा तो क्या करूंगा इधर-उधर देखूंगा थोड़ा तो पहले कि भाई सब ठीक-ठाक है कि नहीं फिर ये क्लास करना है तोय कैमरा वगैरह ऑन करूंगा हमारी एक्शंस कितनी वेस्टेड होती है महाराज का एवरी एक्शन इज मेजर्ड जैसे कि वो पूरा एकदम मशीन की तरह प्लान करके एक के बाद एक खिड़की खोल रहे है फिर स्विच ऑन किया लाइट ऑन की फैन ऑन किया फिर वो अभी अभी मैं पूरा बैठा हूं आप सोच मेरे हृदय में क्या चलता होगा हम लोग कैसे बैठे रहे और महाराज काम करें फिर उन्होंने कबटो शुरू किया तो मैं इमीडिएट खड़ा हो गया उन्होंने तो ऐसा कहा है ना कि मैं खिड़की खोलता हूं तब तक बैठो ऐसा तो नहीं कहा मैं कवाट खोला तब बैठे रहो तो कट खोल र में खड़ा हो गया महाराज अभी किताबें निकालनी है कटा कड में से लाइए मुझे दीजिए बोला नहीं नहीं दाओ दाओ खड़े रहो खड़े मैं निकाल अपने अपने हाथों से किताब निकाली टेबल पर रखी अभी प्लान ऐसा था कि मैं कंप्यूटर में बैठ के एडिट करूंगा फिर जो बाकी हमारे टीम के जितने भी है इंक्लूडिंग भजनानंद जी हम लोग सभी डिस्कस करेंगे और फाइनल जो डिस्कशन होगा तो वो कंप्यूटर प एडिट मुझे करना है तो एटलीस्ट आई एम अ कंप्यूटर गाय एटलीस्ट उस उस परिप्रेक्ष्य में तो जैसे ही अभी बैठ गए तो कंप्यूटर ऑन करना है तो मैं जैसे कंप्यूटर ऑन कर रहा हूं तो ना ना ना तुम बसो वहा कंप्यूटर ऑन किए मैंने स्विच ऑन करके व सीपीयू ऑन करना वो पीसी ऑन करना सब ऑन किया फिर आखिर में मैं बैठ गया स्क्रीन चालू हो गया तब उन्होंने कहा अच्छा एकन अभी अभी खोलो कंप्लीट वर्स की कहां प है फाइल मैंने से फ्रीलांस को किस हद तक लेकर जाते हैं यह उनका देखिए उनका सब कुछ है भक्ति है ज्ञान है सब कुछ है किंतु एज अ ह्यूमन बीइंग इज अ वेरी सेल्फ रिलायंट पर्सन यह बात मैंने पहली बार उनकी देखी हमको पता है ट्रेनिंग सेंटर में क्या होता था कि हम जो ब्रह्मचार्य को उनके सेवक के रूप में ड्यूटी दी जाती है अभी सेवक का क्या काम है झाड़ू पोछा लगाना कपड़े धोना उनके लिए कुछ दूध वगैरह लाना है तो वह कुछ लेकर आना और छोटा-मोटा कोई भी काम वो देंगे तो उनके सेवक से सुना है कि बड़ा रेयरली कुछ काम देंगे एक्स्ट्रा कुछ नहीं जो मिनिमम जो करना पड़ता है सेवक को उसके बिना उन को नहीं चलेगा उसके अलावा एक भी एक्स्ट्रा काम वो किसी से नहीं करवाएंगे ही इज दैट मच सेल्फ रिलायंट तो ये सब मैंने सुना था ये मैंने पहली बार नजरों से देखा कि महाराज सो रिलायंट अभी वो यह नहीं सोचेंगे मुझे अस्वस्थ हो रही है मैं ये हो रहा हूं वो भी एक है किं तो ये था उनका ही इज अ वेरी सेल्फ रिलायंट पर्सन