मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः
method of meditation
फिर से एक बार ध्यान का क्लास बाकी जितनी भी साधन पद्धतियां हैं चाहे हम जप करते हैं। चाहे हम प्रार्थना करते हैं, चाहे हम आश्रम में आकर के कोई भी एक रिस्पांसिबिलिटी लेकर के कार्य करते हैं, जिसको कि हम कहेंगे कर्म योग। जितनी भी अन्य साधनाएं हैं आप देखिए कि उन सबके साथ में ध्यान का क्या डिफरेंस है। बाकी सब साधनाएं हैं अपूर्ण है। हमको पूर्णत्व प्राप्ति करनी है। जबकि ध्यान एक ऐसी साधना है। हम पूर्ण ही हैं। हमको पूर्णत्व की अनुभूति करनी है। बाकी सब साधनाएं हैं। मैं गरीब हूं। मुझे पैसे कमाने हैं। ध्यान है मेरे पास में बैंक में ऑलरेडी रुपए पड़े हुए हैं। मुझे बस बैंक का अकाउंट ओपन करके पैसों को अपने पॉकेट में रखना है। पूर्ण होकर के पूर्णत्व की अनुभूति करना। शिव होकर के शिवत्व में स्थित होना। यह है ध्यान। और इसीलिए यदि आप सही-सही ध्यान करने को जाएंगे थोड़ा सा आपको मुश्किल लगेगा। जिसको हम जप ध्यान कहते हैं, वह आसान है। जप ध्यान क्या है कि मैं जप कर रहा हूं। अभी यह जप मैं चाहे अपने उंगली में काउंट करके करूं ना कि मैं माला से जप करूं। मैं अपने मन को उस काउंटिंग के ऊपर में एकाग्र करता हूं। वह हो गया जप ध्यान। मैं अपने मन को जप के ऊपर में एकाग्र करता हूं। प्रार्थना भी एक ध्यान है। मैं मंदिर में जाता हूं। पुजारी महाराज आरती कर रहे हैं। श्री रामकृष्ण की मैं पुजारी महाराज को ठाकुर की मूर्ति को ध्यान से उनका दर्शन कर रहा हूं और फिर जिस तरह से अपना खंडना वगैरह जो आरती के गीत है उसका मैं श्रवण कर रहा हूं। तो यह जो दृश्य श्राव्य जो है दृश्य श्राव्य ऑडियो विजुअल कि ठाकुर का जो विजुअल है और यह आरती रूपी जो ऑडियो है उसके ऊपर में मैं मन को एकाग्र करता हूं वो एक ध्यान है। किंतु वो जितने भी ध्यान के प्रकार है अह अकाउंटेंट महाराज हमारे आश्रम में अकाउंट लिख रहे हैं। वह अकाउंट के ऊपर में मन को एकाग्र करते हैं। वो एक ध्यान है। आप अपने घर में खाना पका रहे हैं। तो खाना पकाने के ऊपर में जो आप मन को एकाग्र करते हैं, वह एक ध्यान है। आप स्वाध्याय कर रहे हैं। शास्त्र का पाठ कर रहे हैं। पूजा कर रहे हैं। तो यह पूजा की विधि पर मन को एकाग्र करते हैं। वह ध्यान है। स्वाध्याय जो करते हैं तो शब्दों के ऊपर में मन को एकाग्र करते हैं। वह एक ध्यान है। किंतु वह जितने भी ध्यान है वह चाहे प्रार्थना ध्यान हो, स्वाध्याय ध्यान हो, पूजा ध्यान हो, जप ध्यान हो, कुकिंग ध्यान हो, अकाउंट ध्यान हो, ड्राइविंग कर रहे हैं। ड्राइविंग के ऊपर में मन को एकाग्र कर रहे हैं। ड्राइविंग ध्यान हो जितने भी ध्यान के प्रकार है देखेंगे कि अपूर्ण है पूर्णत्व की प्राप्ति करनी है। जबकि जो कि हम प्योर ध्यान कहते हैं प्योर मेडिटेशन कहते हैं। उसमें हमको पूर्ण होकर के ही प्रवेश करना है। यदि हम उसमें अपूर्ण होकर के प्रवेश किए तो क्या है कि वह प्योर मेडिटेशन हुआ ही नहीं। फिर एक तरह का प्रार्थना मेडिटेशन हो जाएगा। एक तरह से चट पाठ मेडिटेशन गीता पाठ मेडिटेशन गीता चटिंग मेडिटेशन हो जाएगा। वह प्योर मेडिटेशन नहीं होगा। प्योर मेडिटेशन के लिए ध्यान में प्रवेशने से पहले ही मुझे पूर्ण होना है। और इसीलिए यदि हमको ठीक-ठीक ध्यान करना है तो हमारी पूरी लाइफ स्टाइल को हमको ट्रांसफॉर्म करना होगा। हमारे पूरे जीवन को हमको परिवर्तित करना होगा। यदि हम अपने जीवन को परिवर्तित ना कर पाए, यदि हम अपने लाइफ को ट्रांसफॉर्म ना कर पाए तो हम ठीक से ध्यान कर ही नहीं पाएंगे। देखिए मैं एक एग्जांपल देता हूं। दो-तीन दिन पहले का ही मैंने अपने कुक को कहा था कि मैं खाने को देरी से आऊंगा। तो तुम एक काम करना। मेरे लिए जो है थोड़ा सा खाना एक कटोरी में या एक हॉट पॉट में रख देना। तो ठीक है। मैंने कहा फिर मैंने देरी से जाकर के किचन में देखा तो वो हॉटपॉट में कुछ था ही नहीं। उसने खाना रखना भूल गया था और जो रेगुलर खाना था वह तो सब खत्म हो गया। तो मुझे इतना गुस्सा आया। मैंने कहा अभी मुझे भूखा रहना पड़ेगा। अभी ऐसा नहीं कि मैं भूखा रहूंगा। रामकृष्ण मिशन में मां की कृपा से कोई भूखा कभी नहीं रहता। किंतु एक जो एक प्रॉपर फूड जिसकी मैं आशा रख के आया था वह नहीं था। फट करके मुझे आ गया गुस्सा। मैंने को फोन किया कि अरे भाई मैंने तुमको कहा था रखने को। तुमने रखा क्यों नहीं? वो बोला महाराज भूल गया गलती हो गया। तो ठीक है अभी और क्या कर सकते हैं? वो वो कहता है कि और बहुत कुछ पड़ा हुआ है। वो नाश्ता वगैरह तो होता है ना वो सब जगह पे वो मिक्सचर होता है वगैरह वगैरह फ्रूट होते हैं। आप खा लीजिए। ठीक है वो देयर इज़ ऑप्शन इज दैट किंतु देखिए उस दिन मैंने क्या ठीक किया पता है मैं जैसे ही यह फोन रखा ना मुझे लगा कि देखिए मैं खुद अभी दुनिया भर के लोगों को उपदेश देकर घूमता हूं। मैं खुद लोगों को कहता हूं कि आपको अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करना है। मैं खुद लोगों को कहता हूं कि अपने मन पर संयम बरतना है। और मैं एक छोटी सी चीज के लिए गुस्सा हो गया। देखिए मुझे गुस्सा किस चीज का आया? भूख का गुस्सा आया। ठीक है ना? तो मैंने ठीक किया कि बस अभी उस समय मैं नहीं खाऊंगा। उपवास करूंगा। क्यों मुझे गुस्सा आया? क्यों मैं अपने मन को संयम में नहीं रख पाया? देखिए यह जो सेल्फ एनालिसिस सेल्फ रिफ्लेक्शन है यदि हमको सीरियसली ध्यान करना है तो यह सेल्फ एनालिसिस सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है। अपने मन के ऊपर में सतत एक संयम बरतना है। मन यदि क्रोध करता है तो कहना है कि जिनके ऊपर तुम क्रोध कर रहे हो वह वही शिव है जो शिव बनकर के तुम बैठते हो ध्यान करने को। भूख लगती है उसका दुख यह जो कुछ मेरी अपेक्षाएं हैं वह पूर्ण होती नहीं तो उसका क्रोध यह सब क्रोध को तुम खा जाओ नीलकंठ हो जाओ जो समुद्र मंथन करके हलाहल विष जो निकला था भगवान शिव उसका पान करके नीलकंठ हुए वो नीलकंठ हुए बोलकर के ही तो ठाकुर कहते हैं ना कि भगवान शिव कभी आत्माराम होकर के ध्यान करते हैं और कभी अहम का यदि यदि उदय होता है तो फिर वह राम राम करके नृत्य करते हैं। क्यों वह ऐसा कर पाते हैं? क्योंकि उन्होंने हलाहल खाया है। हमको भी जीवन में जो भी फ्रस्ट्रेशन है, क्रोध है, रिग्रेट्स है, उस सबको खा जाना होगा। शिव की तरह नीलकंठ होना होगा। पूर्णत्व प्राप्ति करनी होगी। तभी हम ठीक-ठीक से ध्यान कर पाएंगे। वरना क्या है? देखिए यदि यह नहीं कर पाते हैं तो बाकी सब ऑप्शन हमारे सामने खुले हैं। प्रार्थना ध्यान प्रार्थना आप मंदिर में जाकर अटेंड करते हैं। उसके ऊपर में मन को एकाग्र कीजिए। स्वाध्याय ध्यान आप पाठ कीजिए ठाकुर मां स्वामी जी की किताब का और फिर उसके ऊपर में आप ध्यान कीजिए। बहुत बहुत सारे आपके पास में ऑप्शन है कि जिसके ऊपर में आप ध्यान कर सकते हैं। बहुत सारे आपके पास में उपाय है जो कि आध्यात्मिक जीवन में आपको पूर्णता की ओर ले जाएंगे। किंतु यदि प्योर ध्यान करना है तो जीवन को ट्रांसफॉर्म करना होगा। अच्छा तो विद दिस प्रीलिमिनरी आज हम फिर से ध्यान के सेशन का प्रारंभ करेंगे। आप सबको पता ही है कि क्या मेथड है। पहले तो हम करेंगे गीता चटिंग। गीता चटिंग से क्या होगा? अपना मन जो है वो चारों दिशाओं में जो बिखरा पड़ा हुआ है वो धीरे-धीरे करके एकाग्र होगा। वह हुआ प्रथम स्टेप। सेकंड स्टेप होगा कि फिर मैं गीता पाठ समाप्त होने के बाद में अपनी आंखों को बंद करूंगा। आंखों को बंद करने के बाद में मैं फिर से हल्का सा ओपन करूंगा। यह वार्निंग मैंने पहले भी सबको दिया है। फिर से कह रहा हूं। आंख बंद करके कभी ध्यान नहीं करना है। आंख को हल्का सा खुला रखना है। 1 मि.मी. जितना तो खुला होना ही चाहिए। जैसे ही आंख हम अच्छा फिर पिछली बार प्रश्न हुआ था कि बीच-बीच में यदि आंख बंद हो जाए तो चलेगा। वो चलेगा। दैट इज ओके। प्रारंभ में थोड़ा सा बंद हो गया। बीच-बीच में थोड़ा सा बंद होता है। उसको कोई टेंशन नहीं लेना है। किंतु मेजॉरिटी समय ओपन रहना चाहिए। 1 मि.मी. भी हाफ मि.मी. भी ओपन रहेगा तो भी चलेगा। तो और फिर तीसरा है अपना स्टेप है हृदय के भीतर में भगवान श्री रामकृष्ण को दर्शन करना है और इसके रिलेटेड भी हमारा चर्चा हुआ था कि यदि मैं अब जैसे हमारा जो एक स्टैंडर्ड सीन है कि हम लोग दक्षिणेश्वर में ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं वो खाट के ऊपर में चिर परिचित कमरा जैसे मास्टर महाशय कहते हैं ठाकुर के पास पास में ही मां बैठी है। जमीन के ऊपर में सभी गुरु भाई बैठे हैं। मैं भी उनके साथ में बैठा हूं। यह अपना एक स्टैंडर्ड सीन है। किंतु जैसे हमारा डिस्कशन हुआ था। इसके अलावा और कोई भी सीन जो कि आपके हृदय को शांति देता है। आपके हृदय में पूर्णत्व प्रकट करता है। तो वह सीन उसके आप अपने हृदय में फ्रीज़ कर सकते हैं। मेरे पास में पूरा लाइब्रेरी है ऐसे सीन का। तो मैं अपने मूड के अनुसार, अपने विम के अनुसार यह सब चेंज करता रहता हूं। आपको यह सब सीन धीरे-धीरे करके डेवलप करने हैं। मेरा एक फेवरेट सीन है कि मैं नौका में बैठकर के पहली बार मैं जब दक्षिणेश्वर गया था, मुझे याद है कि हम सभी ब्रह्मचारियों को बेलूर मठ से नौका में बिठा करके दक्षिणेश्वर लेकर गए थे। दैट वास परफेक्ट मतलब एक एंटीिसिपेशन जो होता है आपको तो पता ही होगा बेलूर मठ घाट से आपको मां काली का मंदिर तो दिखता ही है। तो जैसे-जैसे आप पास में जाते हैं वैसे-वैसे जो एंटीिसिपेशन बढ़ता जाता है और फिर जैसे ही आप वहां पे चांदनी के घाट पर नौका लगती है। आप उसमें उतरते हैं। आपने सब पढ़ा है। मैंने तो कितने साल से मैं कथामृत पढ़ रहा था। सब कुछ मन में बैठा है। द्वादश शिव मंदिर, फिर यह नाट मंदिर, मां काली का मंदिर, राधाकांत का मंदिर, ठाकुर का कमरा, यह अर्धचंद्राकार वरांडा, यह जो गंगा के किनारे यह जो उद्यान पथ पंचवटी कितना पड़ा है। पहली बार जब देखता हूं तो ऐसा आनंद आता है। तो यह जो नौका यात्रा है, मैं क्या करता हूं? एक ऐसा सीन बनाया है कि मैं पहली बार जा रहा हूं दक्षिणेश्वर और अंधेरा है। रात का समय है मिडनाइट का। पूरा आकाश तारों से चांद से भरा हुआ है। चांदनी है चारों ओर और मैं दक्षिणेश्वर जा रहा हूं और फिर उसी समय 1881 में जब मास्टर महाशय, नरेंद्र वगैरह पहली-पहली बार ठाकुर के पास जाते थे। तो उसी समय का टाइम है। मैं गंगा में बैठकर नौका में बैठ के गंगा में बहते-बहते वहां दक्षिणेश्वर जा रहा हूं। और यह इलेक्ट्रिक लाइट फिलेक्टिक लाइट कुछ नहीं। वो मशाल जल रही है। कहीं पर दिया जल रहा है। सो सी इस तरह के सीन आपको बनाने हैं। उसका एक पूरा लाइब्रेरी होगा। जैसे-जैसे आपकी यह जो गहनता बढ़ती जाएगी जप में ध्यान के भीतर में। इस तरह से सीन आप डेवलप कर सकते हैं। तो यह है हमारा मेथड। सर्वप्रथम गीता पाठ जिससे कि मन एकाग्र हो। सेकंड स्टेप है आंखों को पहले बंद करके फिर हल्का सा खोलना। और थर्ड स्टेप है हृदय में एक ऐसे सीन को विजुअलाइज करना जो कि हमारे मन को फोकस करे, एकाग्र करे, एक जगह पे पकड़ के बिठा रहे। ठीक है? तो हम गीता पाठ से स्टार्ट करते हैं। मैंने कहा था 15th चैप्टर। राइट? तो 15th चैप्टर के पहले 10 श्लोक और हमारी मेथड भी अभी आपको पता ही है। मैं एक बार पाठ करूंगा। मैं दो बार करूंगा पाठ। आपको यदि आता है तो आप दोनों बार मेरे साथ में पाठ कर सकते हैं। नहीं आता है तो एक बार सुनिए। सेकंड टाइम पाठ कीजिए। और जब आप पाठ करते हैं तो स्पष्ट शब्दों में कीजिए। धीरे-धीरे से या तो फिर मन में मन में पाठ करने से क्या है? वो फल नहीं मिलेगा। और यदि गलत प्रोनाउंस होता है तो कोई टेंशन नहीं। आप थोड़ी ना कोई परीक्षा देने को बैठे हैं। गलत प्रोनाउंस हो गया तो आप फेल हो जाएंगे। आपके अलावा और कोई सुनने भी नहीं वाला है। तो आपको वो टेंशन नहीं है। ओके? तो स्पष्ट शब्दों में पाठ कीजिए। भले ही चाहे प्रोनाउंस गलत हो धीरे-धीरे करके ठीक हो जाएंगे। तो हम पाठ
Gita chanting 1
स्टार्ट करते हैं। श्री भगवान वाच श्री भगवान वाच उर्ध्व मूल मदः शाखम अश्वत्थम प्राहुरव्ययंम छंदसयस्य पर्णानी छंद यस्य पणानी यस्तम वेदस वेदवी अध चोधम प्रसुतास शाखा अध चोधम प्रसुतास शाखा गुणा प्रव विषय प्रवाला गुण प्रव विषय प्रवाला अध च मूल्युसतानी अध च मूल्यनुसंतानी कर्मानुबंध मनुष्य लोके कर्मानुबंध मनुष्य लोके न रूपमस तथो पलभ्यते न रूपमस तथो पलभ्यते नंतो न चादर न चस प्रतिष्ठा अश्वत्थमेनम सुविरू मूलम अश्वत्थमेनम सुविरू मूलम असंग शस्त्रे दृढ़ न चित्वा असंग शस्त्रे दृढ़ न चित्वा ततः पदम त परमार्ग तव्यम ततः पदम त परिमार्गव्यम यस्मिन गतना निवर्त भयः यस्मिन गतना निवर्त भयः तमेव चाध्यम पुरुषम प्रपध्य तमेव चाध्यम पुरुषम प्रपद्य यतः प्रवत्ति ही प्रसुता पुराण यतः प्रवत्ति ही प्रसुता पुराण निर्माण मोहा जित संग दोष निर्माण मोहा जित संग दोष अध्यात्म नित्या विनिवत्तमा अध्यात्म नित्या विनिवत्तमा ध्वन विमुक्त सुख दुख संज्ञ विमुक्त सुख दुख संगै गच्छंत मूढा पदमव्ययम तत गच्छंत मूढा पदमव्ययंम तत न तदभासयते सूर्य न तभासयते सूर्यो न शशांको न पावक यदगत्वा निवर्तते यदगत्वा निवर्तते तधाम परम मम तधाम परम मम ममवाशो जीव लोके मममेशो जीव लोके जीव भूतः सनातन जीव भूत सनातन मन षष्ठाण मन षष्ठा इंद्रियण प्रकृति स्थानिकति शरीरम यदवापनोति शरीर म यदवापनोति यच्चापत्राश्वर गहित्वता निसयाति गहित्वैतान निसयाति वायुरगंधा निवासयात वायुरगंधा निवासयात श्रोत्रम चक्षु स्पर्शम च रसम ग्राणमेव च रसम ग्राणमेव च अधिष्ठाय मनचायम अधिष्ठाय मनचायम विषयानुपसेवते विषयापसेवते उत्क्रामंतम स्थितम वापी उत्क्रामंतम स्थितम वापी भंजानम वाग गुणान्वितम भंजानम वा गुणान्वितम विमूढ़ नुपश्यती विमूना पश्यती पश्यती ज्ञान चक्षुष पश्यती ज्ञान चक्षुषः
practice of Meditation 1
वेरी गुड अभी ध्यान करेंगे मेथड आपको पता ही है पहले अपनी आंखों को बंद करिए। उसके बाद में हल्का सा ओपन कीजिए और हृदय के भीतर में ठाकुर को स्थापित करके अपना पूरा ध्यान ठाकुर की ऊपर में एकाग्र कीजिए। ऊ मैं कथामृत का पाठ करता हूं। आप ध्यान ही कीजिए। आज सुबह को जो पैसेज हमने पढ़ा था इसी को एक बार दोहराते हैं। संध्या होइलो शाम हुई ठाकुर जगन माता नाम और ता चिंता को करते छ ठाकुर जगन माता का नाम और उनका चिंतन कर रहे हैं भक्तरा निर्जन गिया जे चार ध्यानादि कोते लागी लेन भक्तगण भी निर्जन में जाकर करके जिसको जैसा आया ध्यान वगैरह करने लगे ए के ठाकुर बाड़ी ते मां काली मंदिर श्री श्री राधाकांत मंदिर ओ द्वादश शिव मंदिर आरती होते लागीो यहां पे ठाकुर वाणी में मां मां काली के मंदिर में, श्री श्री राधाकांत के मंदिर में और द्वादश शिव मंदिर में आरती होने लगी। आज कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि शार की काल पर चंद्रोदय हो। संध्या के कुछ समय पश्चात चंद्रोदय हुआ सेलो मंदिर शीर्षो चतुर दिके तरुलता ओ मंदिर पश्चिमे भागीरथी बखे पड़िया अपूर्व शोभा धारण करिया छे वही प्रकाश मंदिर शीर्ष चतुर दिक चारों ओर की तरुलता और मंदिर के पश्च पश्चिम में भागीरथी वक्ष के ऊपर में पड़कर के अपूर्व शोभा धारण किया है। ए समय से पूर्व परिचितों घरे ठाकुर श्री राम कृष्ण बोश्या छ इसी समय वही पूर्व परिचित घर में ठाकुर श्री राम कृष्ण बैठे हैं। मणि मेझे ते बोश्या छ मणि जमीन पे बैठे हैं मणि बैले वेदांतो संबंध जे कथा अवतारणा कोरिया छिलेन ठाकुर आार से कथाई कहते छे मणि ने शाम को वेदांत के बारे में जिस बात के बात कही थी ठाकुर फिर से वही बात कर रहे हैं श्री राम कृष्ण मणि प्रति श्री रामकृष्ण मणि की ओर जगत मिथ्या के होवे जगत मिथ्या क्यों होगा वो सब बिचारे को था वह सब विचारों की बातें हैं ताके दर्शन होले तो खून बुझा जाए जे तीन जीव जगत होए छ उनको दर्शन होगा तब समझ में आएगा कि वही जीव और जगत हुए हैं। आमाई मां काली घरे देखिए दिलन मुझे मां ने काली घर में दिखा दिया जे माई सब होए छ कि मां ही सब हुई है। देखिए दिलन शो चिन्मय दिखा दिया सब चिन्मय प्रतिमा चिन्मय वेदी चिन्मय कोशाकुशी चिन्मय चौकाट चिन्मय मार्बलर पाथर सब चिन्मय घर भीतर देखी घर के भीतर में देखा सब जेनो रोश रोए छे सब जैसे कि रस में डूबा हुआ है सच्चिदानंद रोश सच्चिदानंद रस में काली घरे सम्मुखे एक जन दुष्ट लोक के देखलाम काली घर के सामने एक दुष्ट व्यक्ति को देखा किंतु तारो भीतर तार शक्ति झोलझोल को छे देखला किंतु उसके भीतर में भी ईश्वरीय शक्ति ज्वलजल कर रही है देखा ताई तो बिाल के भोगे लुची खिला इसीलिए तो बिल्ली को भोग की पूरी खिलाई थी। देखना माई सब होए चैन बिडाल परजन तो देखा माई ही सब हुई है बिल्ली तक तो खाजानची शेजो बाबू के चिट्ठी लिख ले जब भटचार जी महाशय भोगे लुची बिाल देर खावा छ तब खजानची ने सेजो बाबू को चिट्ठी लिखी कि भट्टाचार्य जी महाशय भोग की पूरी बिल्ली को खिला रहे हैं। सेजो बाबू आमार अवस्था मुझ सेजो बाबू मेरी अवस्था समझता था। पत्र उत्तरे लिख ले पत्र के उत्तर में लिखा उन जा कोन ताते कोनो कथा बोलो ना वह जो करते हैं उसमें कोई बात बोलना मत ताकि लाभ कर ले ईगुली ठीक देखा जाए उनको लाभ करने से यह सब ठीक ठीक देखा जा सकता है तीन जीव जगत चतुर्विंशति तत्व होए छे वही जीव जगत चतुर्विशति तत्व हुए हैं तब यदि तनी आमी एक बारे पूछे दे तो जे की हो मुखे बोला जाए ना किंतु जब वह हम संपूर्ण रूप से विलीन कर देते हैं तब क्या होगा मुंह से बोल नहीं सकते राम प्रसाद जैमन बोले छ राम प्रसाद ने जैसे कहा है तखन तुम भालो की आमी भालो से तुम ही बुझवे तब तुम अच्छी ना कि मैं अच्छा वह तुम ही समझो से अवस्था हमार एक-एक बार होए वह अवस्था भी मेरी एक-एक बार होती है विचार को एक रकम देखा जाए विचार करके एक तरह दिखता है आर तीन जो देख तो आर एक रकम देखा जाए और वह जब दिखाते हैं तब और एक तरह से दिखता है वेरी गुड हरि ओम
Gita chanting 2
अभी हम क्या करेंगे? गीता का 15th चैप्टर का 11 से 20वा श्लोक पाठ करेंगे। यदि किसी को ध्यान कंटिन्यू करना है तो वह कर सकते हैं। जिसको पाठ करना है मेरे साथ में पाठ कर सकते हैं। यतंतो योगिन चैनम यतंतो योगिनम पश्यंतत्मन्यवस्थितम पश्यंतात्मन्यवस्थितम यतंतोप्य कृतात्मानो यतंतोप्य कृतात्मानो नैनम पश्यंत चेतस नैनम पश्यंत चेतस यदादित्य गतम तेजो यदादित्य गतम तेजो जगत भाषयते खिलम य चंद्रमस यच्चाग्नो य चंद्र मसी यग्नो तत्तेजो विधि मामकम तत्तेजो विधि मामकम गामा विष भूतानी गामा विष्य च भूतानी धारयाम्य मोजसा धारयाम्य मोजसा पुष्णाम चौषध सर्वा पुष्णाम चौषधि सर्वा सोमो भूत्वा रसात्मक अहम वैश्वा नरो भूत्वा प्राण नाम देह माश्रितः प्राणी नाम देह माश्रितः प्राणापान समायुक्त प्राणापान समायुक्त पचाम्यम चतुरविम पचामयनम चतुरविम सर्वस्य चाहम सनविष्टो सर्वस्य चाहमद सनविष्टो मतः स्मृति ज्ञान मपोम च मत्त स्मृति ज्ञान मपोम च वेद च सर्व रहमेव वेदो वेद सर्व रहमेव वेदो वेदांत कृत विदेव चाहम वेदांत कृत्व विदेव चाहम धवी मौ पुरुषो लोके वावी मौ पुरुषो लोके क्षर चाक्षर एवच क्षर सर्वाण भूतानी कूटस्थोक्षर उच्चते कूटस्थोक्षर उच्चते उत्तम पुरुष्य परमात्मदा यो लोकत्रयमा विष यो लोकत्रयमा विषभव्यय ईश्वर विभव्यय ईश्वर यस्मात मती तोहम यस्मातर मती तोहम अक्षरादपि चोत्तमः अक्षरादपिचोत्तमः अतोस्म लोके वेद च तो लोके वे प्रथित पुरुषोत्तम प्रथ पुरुषोत्तमः यो मामेव समूढो जाि पुरुषोत्तमम जा पुरुषोत्तमम स सर्ववि भजति माम स सर्ववि भजति माम सर्वभावे भारत सर्वभावे भारत इति गुहतम शास्त्रम इति गुहतम शास्त्रम इद मुक्तम मयाघ इद मुक्तम मयानख एतद बुद्ध्वा बुद्धिमानस्यात एतद बुद्धवा बुद्धिमानस्यात कृत कृत्यस भारत अब ये लास्ट पार्ट हम सब साथ में ही करेंगे ओम तत्सद श्रीमद् भगवत गीता सु उपनिषद सु ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्णार संवादे पुरुषोत्तम योगो नाम पंचदशोध्याय वेरी गुड फिर से ध्यान करेंगे
practice of Meditation 2
आंख बंद और फिर हल्के से ओपन करना है। हृदय में ठाकुर को बिठाना है और अपना पूरा प्राण शक्ति पूरी एकाग्रता ठाकुर पे रखनी है। माइंड को स्विच ऑफ कर देना है। हृदय को स्विच ऑन कर देना है। ओम मैं कथामृत का पाठ करता हूं। आप सब ध्यान में ही इसका श्रवण कीजिए। शार पर ठाकुर बाड़ी ते आरती होते छे संध्या के बाद ठाकुर वाड़ी में आरती हो रही है। संध्या समागम में ठाकुर श्री रामकृष्ण नीचे घरे ठाकुर दे नाम करते छ संध्या समागम में ठाकुर श्री रामकृष्ण अपने कमरे में भगवान का नाम ले रहे हैं। घरे धना देवा हो कमरे में धूप दिया गया ठाकुर बधांजलि होया छो तक पोस्ट ऊपर बस छ ठाकुर बधांजलि होकर के छोटे तख्तपश के ऊपर में बैठे हैं। मार चिंता कोते छ मां का चिंतन कर रहे हैं। बेल घरे श्रीक्त गोविंद मुख ओ ताहार बंधुग आशिया प्रणाम कोरिया मेते बोलेन बेल घर के श्रीयुक्त गोविंद मुखजे और उनके बंधु गण ने आकर के प्रणाम करके जमीन पर विराजे मास्टरों बोशिया मास्टर भी बैठे हैं। राखालो बोशिया छ राखाल भी बैठे हैं। बाहरे चांद उठिया छे बाहर में चांद खिला हुआ है। जगत निह शब्द हसते छे जगत निह शब्द हंस रहा है। घर भीतर शकले निशब्द बोशिया ठाकुर शांत मूर्ति देखते छ घर में सभी लोग बैठकर के निशब्द निरवता पूर्वक ठाकुर की शांत मूर्ति का दर्शन कर रहे हैं। ठाकुर भाविष्ट ठाकुर भाविष्ट है कि पोरे कथा को लेन कुछ समय के बाद में बात कर रहे हैं एको भाब था अभी भी भाव की अवस्था है श्री राम कृष्ण भाव श्री राम राम कृष्ण भाव में बोलो तो देर जा संशय बताओ तुम लोगों का क्या संशय है आमी शो बोल छ मैं सब बताता हूं गोविंदो और अन्नानो भक्तरा भाभी ते लागी गोविंद और अन्य भक्तगण सोचने लगे गोविंदो आज्ञा श्यामा ए रूटी हो केो गोविंद प्रश्न करते हैं अच्छा जी श्यामा इस तरह की क्यों हुई श्री राम कृष्ण से श्री दूर बोले वह दूर है इसलिए काछे गले कोनो रंग नहीं पास जाएंगे तो कोई रंग नहीं है। दीर झोल दूर थे के कालो देखा है। तालाब का पानी दूर से काला दिखता है। काछे गिए हाथ करे तो लो कोनो रंग नहीं। पास जाकर के हाथ में उठा के देखिए कोई रंग नहीं आकाश दूर थे के जेनो नील वर्ण आकाश दूर से जैसे कि नील वर्ण काछेर आकाश देखो कोनो रंग नहीं पास का आकाश देखिए कोई रंग नहीं ईश्वर जतो का जाबे ततो ही धारणा होवे तार नाम रूप नाई ईश्वर के जितने पास जाएंगे उतनी ही धारणा होगी उनका नाम रूप नहीं है पेचिए एकू दूर एले आार अमार श्यामा माु घास फूले रंग थोड़ा सा आप पीछे आकर के देखेंगे फिर से वही मेरी मां श्यामा जैसे कि घास फूल के रंग की श्यामा पुरुष ना प्रकृति श्यामा पुरुष है कि प्रकृति है एक जो भक्त पूजा करे छिलो एक भक्त पूजा कर रहा था एक दर्शन करते ऐसे देखे ठाकुर गोलाई पोते एक व्यक्ति ने दर्शन करने के आकर के समय देखा ठाकुर के गले में जनेऊ है से बोलले तुम मार गलाई पते पर छो उसने कहा तुमने मां के गले में जनेऊ पहनाया है भक्त बोलले भक्त ने कहा भाई तुम ही मां के चने छो भाई तुमने ही मां को पहचाना है आमी एकनो चिंते पारी नहीं मुझे तो अभी भी समझ में नहीं आई त पुरुष की प्रकृति वह पुरुष एक ही प्रकृति है ताई पते पोरिए छ इसीलिए जनेऊ पहनाया है जिनी श्यामा तनी ब्रह्म जो श्यामा है वही ब्रह्म है ज रूप त अरूप जिनका रूप है वही अरूप है जिन सगुण तिन्ही निर्गुण जो सगुण है वही निर्गुण है ब्रह्म शक्ति शक्ति ब्रह्म अभेद सच्चिदानंदमय आर सच्चिदानंदमय सच्चिदानंदमय और सच्चिदानंदमय। तो आज का ध्यान का सेशन यहीं पर समाप्त करते हैं। मैं आपको रिक्वेस्ट करूंगा कि यदि आप थोड़ा समय और भी ध्यान कर सकते हैं यदि आपके पास समय है तो कीजिए। अभी हम मिलेंगे मंडे मॉर्निंग को। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु राम