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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन जिसमें से हम देख रहे थे कि वो पीरियड ठाकुर के साथ में मां का विवाह तो हुआ है किंतु अभी भी मां ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में जाकर के मिलित नहीं हुई है वह 13 साल का पीरियड 18592 18720 का इस चैप्टर में है गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी हुई पुस्तक श्री मां शारदा देवी का जीवन और चैप्टर का नाम है वधु कल हमने जहां तक पढ़ा वहां से मैं थोड़ा सा आगे पढ़ता हूं पुकुरे आगत श्री माके श्री ठाकुर नाना भावे शिखा दते अग्रो शोर होया छले जब ठाकुर कामर पुकुर में थे उस समय मां जब कामर पुकुर आती मां का जन्मस्थान है जयराम बाटी ठाकुर का जन्मस्थान कामर पुकुर तो जयराम बाटी से कामर पुकुर जब मां आती तो ठाकुर उनको विभिन्न रूपों से शिक्षा देने के लिए प्रस्तुत होते किस तरह से तहा रही मुखो पे खिनी मुखा पक्षिणी किशोरी हृदय भालोबासर द्वारा जोय कोरिया तिनी उ हाते आपन अभिज्ञता लब्ध ज्ञान राशि ढलिया दते लागले देखिए यह इतना सुंदर गंभीरानंद जी महाराज का जो विवरण है मुखो पख अर्थात कि उन्हीं के सामने देख कर के अपने को धन्य समझने वाली किशोरी अर्थात की मां शारदा इनका हृदय ठाकुर ने भालोबासा अर्थात कि प्रेम से जय कर लिया है और इस तरह से मां का हृदय प्रेम से जय कर लेने के बाद में मां को प्रेम के बंधन में आबद्ध करके ठाकुर उनको विभिन्न रूपों से अभिज्ञता लब्ध ज्ञान राशि अभिज्ञता अर्थात की अनुभूति ठाकुर का तो सिर्फ एक्सपीरियंस नहीं था अनुभव और अनुभूति ये दोनों डिफरेंट वर्ड्स है अनुभव अर्थात कि हम जो एक्सपीरियंस करते हैं है वो और अनुभूति अर्थात कि ये दिव्य दिव्य दर्शन जो होते हैं यह जो अपनी यह जो चारों सीमा है कॉन्शसनेस की वो जो बाउंड्री है ये बाउंड्री के बियोंड वहां से कुछ नॉलेज आता है जो कि क्रिएटिविटी का कोई स्पार्क होता है कोई डिवाइन विजन होता है इस सबको अनुभूति कहते हैं तो ये अनुभूति लब्ध ज्ञान ठाकुर ने जो अर्जन किया था वो यही मां शारदा को वो देना शुरू कर दिए ज्ञान राशि ढलिया दते लागले ढलिया देवा अर्थात की एक पात्र में से दूसरे पात्र में किसी पानी को डालना इसको ढालना कहते हैं तो ठाकुर अपना ज्ञान इस तरह से मां के मन में इसको ढालने लगे तीनी एक दि के जेमन शय त्याग उज्जवल जीवना आदर्श श्री मायर सम्मुख तुल दरी लन जिस तरह से सर्व प्रंथ प्रथम तो ठाकुर ने अपना त्यागो ज्वल जीवन इस तरह का जीवन जो कि त्याग के आदर्श से उज्जवल हुआ है इस तरह का अपना त्याग उज्जवल जीवन मां के सामने एक एग्जांपल के रूप में प्रस्तुत करने लगे ऑन वन हैंड दूसरा उच्च धर्म जीवन लाभे जनन की रूपे चरित्र गठन करते होए ताहा शिखा दिलन उच्च धर्म जीवन लाभ के लिए किस तरह से चरित्र गठन करना पड़ेगा उसके बारे में शिक्षा देने लगे अपोर दिके तमनी दैनंदिन गृहस्था कर्मों देव द्वीज अतिथि सेवा जिस तरह से पहले तो क्या किया ठाकुर ने अपना त्यागो ज्वल जीवन है वो एग्जांपल के रूप में एक आदर्श के रूप में मां के सामने प्रस्तुत किया दूसरा कि उच्च आध्यात्मिक आदर्श प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए साधना किस तरह से करनी चाहिए आध्यात्मिक जीवन क्या है संयम क्या है त्याग क्या है तपस्या क्या है यह सब बताने लगे मां को औरन वन हैंड एंड ऑन द अदर कि संसार भी तो चलाना है मां को ठाकुर की तरह तो नहीं कि एक बार किसी महिला भक्त ने लेडी डिवोटा ने आक के मां उस समय दक्षिणेश्वर में थी तो ठाकुर का तो स्वभाव ऐसा था कि बिल्कुल अपने भाव राज्य में रहते थे तो कभी-कभी अभी ठाकुर भाव में रहते थे तो ठाकुर के अभी उनको उनकी केयर तो मां को ही करनी है अभी वह कब कहां पर चले जाए कब क्या हो जाए एक बार ऐसा हुआ था कि ठाकुर पता नहीं वो रात को चलते चलते जहां पर कांटे वगैरह है एक ऐसे जगह पर चले गए जहां पे बहुत सारे कांटे हैं अभी भाव में है ठाकुर दक्षिणेश्वर की ही बात है भाव में है तो अभी कांटे लग रहे हैं शरीर के ऊपर में पता नहीं चल रहा है कपड़े फट जा रहे हैं अभी मां ने देखा तो मां तो एकदम चिल्ला लगी चिल्लाने लगी कि अरे अरे यह देखो ठाकुर को क्या हो रहा है सभी लोगों ने आकर के ठाकुर को फिर कैसे भी करके कांटों में से निकाला एक बार देखा कि ठाकुर भाव में आते-आते गंगा के किनारे की ओर जा रहे हैं मां ने देख लिया अरे ठाकुर यदि गंगा में गिरेंगे तो पता नहीं उनका कैसे बच पाएंगे अभी वोह तो सबके सामने आती भी नहीं थी कि एकदम दौड़ कर के जाकर के ठाकुर को बचा ले वो तो नबत के एक छोटे से कमरे में रहती थी वहां से बाहर भी निकलना पुरुषों के साथ हमने जाना वो मां ऐसा नहीं करती थी तो क्या करें बेचारी मां फिर जाकर के वह जो हृदय था उसको बोला तो कहीं हृदय आकर के दौड़ कर के ठाकुर को वहां से गंगा के किनारे से निकाल कर के ले आया वरना ठाकुर भाव में चलते चलते गंगा में गिर ही जाते तो ऐसे सब इतना सब कुछ होता था बेचारी मां के सामने तो एक बार एक कोई लेडी डिवटी आई दक्षिणेश्वर में और मां को पूछने लगी कि मां ठाकुर कहां है अपने कमरे में तो नहीं दिख रहे तो मां ने ऐसा वो बीच बीच में वो ये हो जाते हैं ना परेशान हो जाते हैं जैसे छोटा बच्चा होता है मां की बात नहीं सुनता है वैसे मां बच्चे को प्रेम बहुत करती है किंतु बच्चा क्या करता है कुछ ना कुछ वो मिश्चीफ करता रहता है कुछ ना कुछ बदमाशी करता रहता है तो मां बीच-बीच में बड़ी नाराज हो जाती है तो ऐसे ही कुछ नाराजगी के सुर में कुछ परेशानी के सुर में मां ने कह दिया कि देखो जाओ कहीं गंगा के किनारे भाव में आकर के बैठे होंगे वो भी दिगंबर होकर के जाओ देख लो तो वैसे ही अभी देखिए कि ठाकुर को तो इस तरह से भाव में रहना है उनको तो संसार की चिंता नहीं मां को तो सब चिंता करनी है ठाकुर के लिए खाना बनाना है ठाकुर की सेवा करनी है और सिर्फ ठाकुर ही नहीं जितने भी भक्त आएंगे अभी वहां पर दक्षिणेश्वर में थे तो कोई भी कभी भी आ जाएगा कोई गाड़ी से उतरेगा और जोर से चिल्लाएगा वह नहब की ओर देख कर के ठाकुर जबी आप दक्षिणेश्वर गए होंगे तो देखा होगा कि गंगा के किनारे पहले ठाकुर का कमरा है फिर 20-30 फुट के अंतर पर नौबत है जहां पर मां रहती थी और फिर उसके फिर कुछ आगे जाएंगे तो पंचवटी है जहां पर ठाकुर साधना करते थे तो यही यह व ठाकुर का कमरा यह नबत जहां मां रहती थी ये पंचवटी यही और उससे इस ओर जाएंगे आगे की ओर तो यह काली मंदिर है शिव मंदिर है यह विष्णु मंदिर है तो यह था पूरा काली मंदिर का सेटअप तो अभी कोई भी डिवटी बाहर कोलकात्ता से आएगा तो वहां से वो गाड़ी में गाड़ी में से उतरने के समय ठाकुर के कमरे में जाने से पहले नबत की ओर चिल्ला करके बोलेगा कि आज मैं छोले का डाल खा दाल खाऊंगा अभी छोला अर्थात चना चने की दाल में आज खाऊंगा अभी मां अपने नौबत में बैठी है अभी जैसे ही सुना कि कोई डिवोटा इस तरह से बोल रहा है इमीडिएट वो रंधन के लिए दाल बनाने के लिए उन्होंने तैयारी प्रस्तुत कर दी ऐसा तो दक्षिणेश्वर में कितने ही लोग आते थे ठाकुर के लिए अलग से पतला वो झोल भात जिसको बंगोली में कहते हैं पतली दाल पतला सब्जी का रस और थोड़ा सा राइस इसको ठाकुर के लिए बनाना है फिर नरेण और यदि लड़के आएंगे तो गाढ़ी दाल मोटी मोटी रोटियां उनके लिए बनानी है तो सब समय दक्षिणेश्वर में नबत में रहते-रहते मां को खाना बनाते ही रहना है ठाकुर की चिंता करनी है फिर ये लेडी डिवटी जितने भी आते हैं यह गोलाप मा है फिर यह अघोर मणि गोपालेर मा घरमणि देवी है योगिन मां है फिर ये लक्ष्मी दीदी है मास्टर महाशय की पत्नी है ऐसे कितने ही लेडी डिवोटा आकर के वहीं नबत में मां के सामने बैठे रहते थे अभी ठाकुर की भी चिंता करनी है खाना भी बनाना है यह सब लेडी डिवोटा आकर के कोई किसी के मन में कुछ सुकृति आ गई तो चलो मां के कार्य में हाथ बटा लगे वरना कोई कोई लोग ऐसे भी थे कि मां का काम बढ़ा करके रख देते थे तो सब कुछ चिंता मां को करनी है तो इसीलिए ठाकुर जिस तरह से मां को एक आध्यात्मिक जीवन उच्च आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए उपदेश देते थे जिस तरह से अपना खुद का त्याग उ ज्वल जीवन मां के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते थे वैसे ही घर संसार में कैसे रहा जाए किस तरह से निपुणता पूर्वक अर्थात की दक्षता पूर्वक घर का पूरा काम किया जाए यह भी ठाकुर मां को बताते थे किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं और दिके तमनी दैनंदिन गृहस्था कर्म दूसरी ओर इसी तरह से दैनंदिन प्रतिदिन प्रतिदिन का घर का क्राम गृहस्थ का कर्म देव द्वीज अतिथि सेवा देव अर्थात की ईश्वर द्वीज अर्थात ब्राह्मण अतिथि अर्थात की जो भी मेहमान गेस्ट आते हैं जो भक्त आते हैं देव द्वीज अतिथि इन तीनों की सेवा गुरु जनेर प्रति श्रद्धा जो गुरुजन है उम्र में बड़े हैं वडील है उनके प्रति श्रद्धा जैसे कि मां मां की सासू थी चंद्रमण देवी उनके ससुर थे खुद राम फिर वैसे भी ठाकुर तो स्वयं थे ठाकुर के बड़े भाई थे रामेश्वर रामेश्वर तो था तो इस तरह से जो भी थे उन सबकी सेवा उनके प्रति श्रद्धा यह दिखाना सिखाना कनिष्ठ देर प्रति शने हो परायणता जो छोटे उनके प्रति स्नेह परायणता जैसे कि लक्ष्मी दीदी है जैसे कि यह भवता जिणी देवी थी भवता आरिनी एक कन्या थी छोटी सी कन्या ठाकुर ने उनको नौबत में रहने के लिए कहा था और बाद में फिर उन्हीं का विवाह यह वसुमति प्रेस के जो उपेन थे उनके साथ में हुआ था तो वह भी वहां पर रहती थी और वैसे ही तो यह त्यागी संतान सब लाटू महाराज है नरेण है राजा महाराज है योगेन महाराज है वो सब तो आते ही रहते थे तो जो छोटे हैं उनके प्रति स्नेह परायणता परिवार सेवाय आत्मसमर्पण परिवार की सेवा में आत्मसमर्पण बिना किसी विधा बिना किसी कंप्लेन किए हुए जो घर की सेवा करनी है उसमें अपना जीवन ढाल दो यह सब इत्यादि बहु विषय ताहा के उपदेश दते लागले इस तरह से बहुत सारे विषयों के ऊपर में उनको उपदेश देने लगे अच्छा जब इस तरह से हम पढ़ते हैं तो हमारे मन में एक प्रश्न अवश्य होगा कि ठाकुर ने मां को जिस तरह से घर संसार करने के बारे में सिखाया इस शिक्षा का आज के जीवन में आज की स्त्रियों के जीवन में कहां तक रिलेवेंट है देखिए कि यह वर्ल्ड बैंक वगैरह जो भी इकोनॉमिक ये बड़े-बड़े इंस्टिट्यूशन से वे लोग हमेशा इंडिया के बारे में कहते रहते हैं कि कंपेयर टू अदर कंट्रीज भारत में स्त्रियों का वर्क प्लेस पार्टिसिपेशन बहुत ही कम है 20 पर के आसपास शायद होगा यह डिफरेंट डिफरेंट फिगर मिलते हैं अलग-अलग समय के लिए पडेम के समय जितनी भी स्त्रियां थी वह कार्य करती थी नौकरी करती थी उसका परसेंटेज बहुत कम हो गया था आज शायद 20 के आसपास होगा तो इनका कहना है कि इवन सऊदी अरेबिया में भी जो कि इतनी कंजरवेटिव सोसाइटी चाइना व वगैरह की बात ही छोड़ दीजिए वहां पे ऑलमोस्ट 40 पर यानी कि मान लीजिए कि 100 लोग है जो कि जॉब करते हैं उसमें से ऑलमोस्ट 40 पर स्त्रियां है इस तरह से चाइना का स्टेटिस्टिक्स है जबकि भारत में यदि 100 लोग जॉब करते हैं तो 80 प्र पुरुष है और प्राय 20 के आसपास स्त्रियां होंगी यहां तक कि इतनी कंजरवेटिव सोसाइटी सऊदी अरेबिया वहां पर भी स्त्रियों का वर्क प्लेस पार्टिसिपेशन भारत से ज्यादा है तो इन लोगों का कहना है कि यदि भारत में स्त्रियों का वर्क प्लेस पार्टिसिपेशन बढ़े तो अपना जीडीपी इमीडिएट 2 3 पर बढ़ जाएगा तो अभी यहां पे इस तरह से एक मॉडर्न आइडियाज हमको दिए जा रहे हैं जो 20 पर स्त्रियां जो जॉब करती है बिजनेस करती है उनके सामने देख कर के हमको गर्व भी होता है जैसे कि मैं एक उदाहरण बार-बार देता हूं इसरो में देखेंगे कि वह जितनी भी लेडी साइंटिस्ट है और जब वो चंद्रयान वहां पर लैंड हो रहा था और उन लोगों का फुटेज सब हमको देखने को मिल रहा था तो हमको लगता है देखिए कि भारत की नारी शक्ति किस तरह से जागृत हो रही है अभी मान लीजिए कि वो उन इसरों की साइंटिस्ट्स को हमको यदि मां का जीवन के बारे में कुछ बात करने का मौका मिले तो हम उनको क्या कहेंगे कि आप भी मां की तरह छोटे से नबत में रहिए पूरा जीवन अपने पति की अपने गुरुजनों की सेवा करने में भी दीजिए अपने परिवार की सेवा करने में पूरा आत्मसमर्पण कर दीजिए आपका यह जो नॉलेज की स्पृहा है मुमुक्षु है विज्ञान के प्रति यह जो आपकी कैरियर है यह जो बड़े-बड़े इंस्टीट्यूशंस में जाकर के आप इस तरह से ग्राउंड ब्रेकिंग कंट्रीब्यूशन करते हैं वह सब छोड़ दीजिए क्या हम ऐसा कहेंगे यह प्रश्न अपने सामने होता है यह मैंने खुद इसके बारे में सोचा भी है इसका कोई देखिए कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है है आज भी भारत बहुत ही ज्यादा कंजरवेटिव है स्त्रियों को सबसे पहले ऐसा ही कहा जाएगा कि यदि बच्चा होता है तो अभी घर में ही रहो तो अभी ऐसा कि हम इसी मैसेज को मां के मैसेज को यदि इस तरह से कहे कि ओके चलो आपको कैरियर बनानी है आपको इस तरह से बड़े इंस्टिट्यूशन में जाकर के भारत के निर्माण के लिए कंट्रीब्यूशन करना है जैसे बहुत सारी स्त्रियां जो कि विलेज लेवल पर यह मिडवाइफ वगैरह होती है तो डॉक्टर होती है गायनेकोलॉजिस्ट होती है तो जिससे कि बाकी सब स्त्रियों को ट्रीटमेंट करने में बहुत सुविधा होती है तो इस तरह से समाज की सेवा में समाज के आप बेटरमेंट के लिए कंट्रीब्यूशन कर रहे हैं तो उसमें आप करते रहिए किंतु यहां पे मां का जो बेसिक आदर्श है भले ही चाहे आप अभी देखिए कि परिवार गुरुजनों के प्रति श्रद्धा अभी इसको आप मां ने जिस तरह से गुरुजनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की कि उनके साथ रह करके और उनकी सेवा करके यह भी एक रास्ता है और मान लीजिए कि आपकी कैरियर है तो आप उस रास्ते से भले ही हृदय में आपका प्रति उनके प्रति एक स्नेह निष्ठा हो और साथ-साथ में आप फिजिकली यदि कुछ उनकी सेवा ना कर पाए किंतु यह जो प्रेम का संबंध बना रहे तो ऐसा भी हम इन लोगों को कह सकते हैं कि भले ही चाहे आप फिजिकली घर में ना रहो फिजिकली सबकी सेवा ना ना करो आप अपनी करियर में व्यस्त रहो किंतु एक इमोशनल एक रिलेशनशिप होता है वो बना रहे मां के आदर्श आपके जीवन में रहे एक चीज कह सकते हैं दूसरा कि यह वर्क प्लेस जो है वो भी एक तरह से एक फैमिली है वह भी एक तरह से एक परिवार है तो वहां पे किस तरह चीटिंग करके ना कि दूसरों को नुकसान पहुंचा करके अपनी कैरियर आगे बढ़े इस तरह का प्रयास नहीं करके सबको साथ में लेकर के रहकर के कार्य करने का प्रयास करें एक आदर्श वर्क पलेस का निर्माण करें ऐसा भी हम कह सकते हैं किंतु जैसे देखिए कि उनको मां का आदर्श एक्चुअली किस तरह से लेना है वह वही ठीक करें हम लोगों को इस तरह का उपदेश देने की जरूरत नहीं एक बार स्वामी जी ने कहा था कि अच्छा किसी ने जाकर के बोला कि स्वामी जी जब भारत आए थे अमेरिका से तो यह सब बाकी रिफॉर्म सोसाइटी थी ना यह ब्रह्म समाज ये थियोसोफिकल सोसाइटी कहते हैं विधवा का विवाह करना चाहिए कहते हैं कि बाल्य विवाह बंद कर देना चाहिए तो व सब अच्छी-अच्छी बातें हैं अभी जाकर के किसी ने स्वामी जी को बोला जब स्वामी जी वापस आए थे अमेरिका से किसी ने जाकर के बोला कि अच्छा स्वामी जी आपका क्या मानना है आप यह सब रिफॉर्म में मानते हैं कि नहीं विधवा विवाह बंद होना चाहिए कि नहीं आप क्या मानते हैं बाल्य विवाह बंद होना चाहिए कि नहीं तो स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया पता है मैं क्या औरत हूं कि तुम यह सब मुझे पूछते हो हैंड्स ऑफ स्वामी जी का जो कहना था हैंड्स ऑफ अर्थात कि उन इनका जो डिसीजन मेकिंग है इनके ऊपर में छोड़ दो भाई पुरुष लोग कौन होते हैं स्त्रियों को कहने वाले कि तुम लोगों का आदर्श जीवन किस तरह से घटित हो देखिए हम लोगों का तो एक ही कार्य है कि मां का जीवन इनके सामने रख देना फिर इस जीवन को मां के जीवन आदर्श और शिक्षा को अपने जीवन में कैसे डालना उस स्त्रियों के ऊपर में ही छोड़ दो उनमें इतनी तो अकल है कि व अपना जीवन अपनी कैरियर अपने हाथों से बना सकते हैं उन लोगों को हमारे से कोई उपदेश लेने की जरूरत नहीं है तो स्वामी जी का जो डिक्टम था स्वामी जी का जो प्रिंसिपल था कि हैंड्स ऑफ अर्थात कि यह कार्य हम स्त्रियों के ऊपर में ही छोड़ दे कि किस तरह से बाहर से विरोधाभासी दिखने वाले दो प्रिंसिपल्स एक तो है कि फैमिली लाइफ जिसमें आप जैसे एगजैक्टली जैसे महाराज जी ने कहा है कि परिवार की सेवा के लिए आत्मसमर्पण यह एक आदर्श है और दूसरा आदर्श है राष्ट्र की सेवा एक हायर आइडियल एक कैरियर बनाना वो इस दोनों के ब बीच में किस तरह से सामंजस्य बनाना इस जीवन के आदर्श मां के आदर्श इस जीवन में किस तरह से रखना वह हम स्त्रियों के ऊपर में ही छोड़ दे उन्हीं को सोचने दे और वही इस बात को वर्कआउट करें अपना काम है सिर्फ उनके सामने यह सब बातें रख देनी तो यह जो ठाकुर ने ने मां को बताया कि ऑन वन हैंड एक बार मैंने एक तरह तो किस तरह से आध्यात्मिक जीवन का गठन करना और दूसरी ओर किस तरह से परिवार में रहना गुरुजनों के प्रति स्नेह श्रद्धा भक्ति मने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जो बच्चे हैं उनके प्रति स्नेह परिवार लोगों की सेवा और बाकी दिन प्रतिदिन देव द्वी और अतिथि देव द्वीज और अतिथि इन तीनों की सेवा किस तरह से कर चाहिए यह ठाकुर ने मां को सिखाया आगे ठाकुर कहते हैं गंभीरानंद जी लिखते हैं जखन जेमन तखन ते मन जिस परिस्थिति में जब है उसी परिस्थिति में उस तरह से वर्तन करना यह बड़ा ही फेमस स्टेटमेंट है मा का जखन जेमन तखन ते मन जब जिस तरह से है तब उस तरह से वर्तन करना है जेखाने जेमोन शेखाने ते मोन जिस जगह पर जिस तरह से रह रहे हैं उस जगह पर उसी तरह का वर्तन करना है जहा के जेमोन तहा के तमोन जिस व्यक्ति के साथ में जिस तरह का हमारा संबंध है उस संबंध के साथ में उसी तरह से वर्तन करना है ए नीति के भित्ति कोरिया लोको व्यवहार परिवार प्रत्येक रुचि स्वभाव और प्रयोजन अनुयाई तहर सहित आदान प्रदान इस नीति को आधारभूत करके लोक व्यवहार करना परिवार में सभी का रुचि अर्थात की टेस्ट क्या है परिवार में सभी का किस तरह से मन चलता है उसके अनुसार स्वभाव और प्रयोजन अर्थात की आवश्यकता अनुसार किसके साथ में क्या आदान प्रदान करना है किस तरह से व्यवहार करना है वह सब ठाकुर ने सिखाया नौका बा गाड़ी ते जाय बार समय द्रव यादि संबंध सतर्कता देखिए कहां तक कह रहा है नौका या गाड़ी में आप सफर करेंगे तो आपके पास में पैसा या अन्य सब चीजें होगी तो उसको किस तरह से संभाल करके रखनी है एमन की प्रदीप पोलिता केमोन कोरिया राखी दे होए प्रदीप की ये जो वाट है जो शीखा है वो वाट वो जो कोटन की जो बनती है व वाट किस तरह से बनाना है प्रदीप की वो वहां तक ठाकुर ने मां को सिखाया है इत्यादि किछुई से अपूर्व शिखा हुई ते बाद पड़ी लोना यह सब कुछ इस अपूर्व शिक्षा में से छूटा नहीं यहां तक कि किस तरह से हमको किस तरह से जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति में हमको सबके साथ में व्यवहार करना है हमको जद यह जो जखन जेमन तखन तमन यह जो बात है ना उसके कुछ-कुछ उदाहरण अपने ऑर्डर में बहुत ही प्रसिद्ध है हमको कभी-कभी ऐसा लगता है कि अरे यह मेरा स्टेटस है तो मुझे अपने स्टेटस के अनुसार सम्मान मिलना चाहिए ऐसा कभी-कभी हम सोचते हैं किंतु जखन जमन खन ते मन अर्थात कि जब जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति में उसी तरह का व्यवहार करना है जैसे कि बेलूर मठ में ही एक बार यह वाइस रोय का आगमन हुआ अभी वाइस रोय अर्थात की तो क्या ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च अधिकारी आज का राजा महाराजा ही गिन लीजिए वो जैसे पुराने जमाने में मुगल थे तो आज के जमाने में र वाइस रोय है पूरे भारत पर शासन करता है जब जिसको चाहे जेल में डाल दे कोई कानूनी प्रोसीजर नहीं जब जिसको चाहे वह अंदमान निकोबार वहां पर भेज दे और वहां की जेल में जो जो सब होता था हमने तो पढ़ा है विवरा तो इसका प्रचंड पावर इस तरह का यह वाइस रोय बेलूर मठ में आया और बेलूर मठ में आकर के जैसे नेचुरली शरत महाराज उस समय जनरल सेक्रेटरी थे उस समय जनरल सेक्रेटरी शब्द नहीं था सिर्फ सेक्रेटरी शब्द था किंतु आज के कांटेक्ट में उनको जनरल सेक्रेटरी कहा जा तो सेक्रेटरी थे पूरे मठ मिशन के और वो वाइस रोई को लेकर के बेलूर मठ दिखा रहे हैं अभी वो जाने बारी आई कि यहां पर जाने की ठाकुर के मंदिर में तो अभी यह तो वाइस रॉय है जूते बूते पहन कर के सीधा मंदिर में जाने को तैयार हो गया वो थोड़ी ना जूता खोलेगा उस वो माने ये लोग वैसे आते हैं बेलूर मठ में वैसे ठाकुर के मंदिर में जाएंगे किंतु भीतर में से तो कोई इनका रिस्पेक्ट नहीं है वो लोग तो यही देखेंगे कि ये सब नेटिव वो हमको नेटिव बोलते थे तो ता पूर्वक तो ये नेटिव किस तरह से रहते हैं चलो जाकर के देखते हैं जो थोड़ा एंटरटेनमेंट मिलता है कि ये गुलाम लोग किस तरह से रहते हैं उन लोग हमको मजा आएगा उनका जीवन देख कर के ऐसा एंटरटेनमेंट के रूप में वो तो इस तरह से हमारे प्रति एक तुच्छ भाव रख कर के वो आया था अभी जब उनको आप ठाकुर के मंदिर में ले जाएंगे तो ठाकुर कौन ठाकुर का मंदिर कौन बेलूरमठ कौन ये शरत महाराज कौन इसके सामने तो कोई किसी वैल्यू ही नहीं है तो वो थोड़ी ना जूते निकाल कर के ठाकुर के मंदिर में जाएगा यहां पर देखिए शरद महाराज किस तरह की विडंबना में है वहां मंदिर में ठाकुर के अस्थि है प्रति नित्य पूजा होती है ठाकुर तो अवतार वरिष्ठ पूरे संसार के वो राजा है और यह छोटा सा एक दो दिन का राजा वो उनको उसको जद जूते पहन के ठाकुर के सामने जाने दे वोह तो कितना बड़ा पाप होगा तो देखिए शरद महाराज ने क्या किया अब वो खुद ये वाइस रोय के जूते उन्होंने कहा उसके सामने बैठ कर के अपने हाथों से वाइस रोय के जूते निकाले और कहा कि अभी आप चलिए मंदिर में तो अभी देखिए कि वाइस रोय वैसे तो है इतना बड़ा शक्तिशाली और हमारे प्रति तुच्छ होता तो रखता है किंतु एक जो छोटा सा एक किरण होता है ना ह्यूमैनिटी का एक छोटा सा एक जो मने सात्विक जो एक प्रकाश किसी मने कोई जंगली आदमी भी होगा कोई राक्षस भी होगा तो उसके हृदय में एक छोटा सा सत्व का एक प्रकाश का किरण होगा तो वाइस रोई को भी लगा कि चलो यहां के को कोंटेक्स्ट में तो यह शरद महाराज इतने बड़े हैं शारदानंद जी महाराज इन लोगों के सेक्रेटरी है वह खुद जब मेरे सामने बैठ कर के मेरे जूते निकालते हैं और मेरे सामने बिल्कुल नौकर जैसा वर्तन करते हैं तो चलो मैं उनको जूते निकालने देता हूं बाद में मैं मंदिर में जाता हूं तो ऐसा करके वो बिना जूतो के शरद महाराज उनको मंदिर में ले आए अभी यदि उन्होंने ऐसा इंसिस्ट किया होता कि ठाकुर के मंदिर में जूते पहन के कोई नहीं जाएगा और मैं सेक्रेटरी हूं यहां का आप जूते निकालिए तो उसके बाद पता नहीं क्या हो जाता तो यह जो शरत महाराज की ये जिस परिस्थिति में जब आप है उस परिस्थिति के अनुसार वर्तन करने की कैपेसिटी कैसी है अभी यह तो वाइस रय है पूरा भारत का एक छोटा सा एक अधिकारी यह एक बार यहां पे क्वाल पाड़ा में एक ऐसा हुआ मोस्ट प्रोबेबली एक घटना क्वाल पाड़ा की ही है कि इनको बुलाया गया अभी मां के लिए नई जमीन नया गर वगैरह जो लिया था काम जयराम बाटी में तो उसका रजिस्ट्रेशन करवाना था तो अभी रजिस्ट्रेशन करने के लिए वोह जो रजिस्ट्रेशन जमीन लैंड रजिस्ट्रेशन ऑफिसर वगैरह जो होता है लोकल म्युनिसिपालिटी ऑफिस का वो आएगा वो आकर के थोड़ा सा आकलन वगैरह करके व जो कागज के में दस्तावेज के ऊपर में वह साइन करना है सिक्का करना है वह सब करके ऑफिशियल दस्तावेज बना कर के डॉक्यूमेंट बना कर के चला जाएगा तो अभी सब कुछ ठीक हुआ है शरद महाराज कोलकात्ता से गए हैं छोटा सा गांव है साथ में और भी बहुत सारे भक्त हैं और अभी देखिए अभी परिस्थिति किंतु रिवर्स हो गई है अभी शरत महाराज कोलकात्ता से गए बड़े-बड़े इंपोर्टेंट डिवोर्स के साथ में और वहां पर छोटी सी म्युनिसिपालिटी ऑफिस का एक छोटा सा अधिकारी वह आने वाला है मां के वहां पे उनको मां के सही करने के लिए अभी इसके सामने तो शरत महाराज अपना गर्व वगैरह दिखा सकते हैं अपना पो मैंने दिखा सकते हैं किंतु देखिए यहां पर शरत महाराज यहां पर भी कैसे बिहेव करते हैं वह पालखी में यह ऑफिसर आया मुस्लिम था अर्थात कि यह हिंदुओं के प्रति वैसे भी एक तुच्छ होता होती है और यह हिंदू साधु अर्थात कि ये बिल्कुल निकम में है ऐसा उसके मन में घर कर दिया था तो यह साधु जब आते हैं और बड़े ही विनम्रता पूर्वक वो सामने से आकर के उनको रिसीव करते हैं फिर वो जब पालखी में उतरता है यह ऑफिसर तो ये शरद महाराज बड़े ही मैंने रिस्पेक्टफुली उसको वो जहां पर छोटा सा यह प्रांगण है वहां पर ले जाकर के उसको बिठाते हैं फिर अपने हाथों से उसको हुक्का है अपने हाथों से उसको पान सर्व करते हैं तो यह गांव का ये मुस्लिम ऑफिसर वो क्या सोचेगा अरे इन लोगों का वैसे भी कोई विसात नहीं है मैं इतना इंपॉर्टेंट गवर्नमेंट ऑफिसर हूं तो गांव में जाकर के गवर्नमेंट ऑफिसर तो किस तरह के अत्याचार करते हैं तो ये लोग भी ऐसे कोई गंवार आदमी है गवार लोग है और इनके ऊपर मैं जो चाहूं मैं कर सकता हूं ऐसा सोच कर के वो बैठ रहा है किंतु कुछ देर के बाद में उसने देखा कि इतने इंपोर्टेंट इंपोर्टेंट सब लोग लब्ध प्रतिष्ठित लोग कोलकात्ता से जो आए हैं शरत महाराज को इतना रिस्पेक्ट दे रहे हैं और वही शरद महाराज उनको इतना रिस्पेक्ट दे रहे हैं तो थोड़ी देर के बाद में उसको अनजी फील होने लगा अनकंफर्ट बल फील होने लगा कि अरे ये शरत महाराज निश्चय कोई बहुत ही इंपोर्टेंट पर्सन होंगे वरना तो इतने धनी लोग शरद महाराज को रिस्पेक्ट दे ऐसा कैसे हो सकता है अब शरत महाराज खुद जाकर के उसको वोह ये पान देंगे यह हुक्का देंगे पूछेंगे कि अच्छा और कुछ चाहिए कि नहीं पानी देंगे अपने हाथों से अदर वाइज तो पानी देने के लिए पान देने के लिए कितने लोग वहां पर खड़े हैं शरत महाराज किसी को भी आदेश कर सकते हैं कि जाओ तुम इसको यह कर दो वो कर दो अच्छा जिस तरह से यह गवर्नमेंट ऑफिसर अनकंफर्ट बल फील करने लगा साथ-साथ में यह त्यागी संतान जितने भी थे वर्धा महाराज वगैरह जिन्होंने ये स्मृति कथा लिखी है वे लोग बोलते हैं हम लोग अनकंफर्ट टेबल फील करने लगे कि अरे शरत महाराज इस दो टके के गवर्नमेंट सर्वंट को इतना रिस्पेक्ट क्यों दे रहे हैं भाई अपने हाथों से उसको सर्व कर रहे हैं हमको दो इसको सर्व करने का काम आप शांति से बैठिए अपनी गरिमा अपनी मर्यादा अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार आप बिहेव कीजिए आपको खुद को इतना झुकने की क्या जरूरत है किंतु देखिए कि जिन्होंने ये स्मृति कथा लिखी है उन्होंने ही लिखा कि उस दिन हम सबकी एक शिक्षा हो गई हम सबको एक बड़ा लेसन जानने को मिला क्या कि कि जब आप मां का काम करते हैं तो सब तरह का आपका भीतर में जो ग गर्व है जो गरूर है आपकी प्रतिष्ठा है आपका अहंकार है सब छोड़ कर के बिल्कुल विनम्र होकर के आपको मां का काम करना है और इसके लिए यदि ये मने बिल्कुल छोटे से गांव के ये छोटे से वो कचहरी के एक छोटा सा एक क्लार्क उसके सामने भी यदि आपको नतमस्तक होना पड़े तो फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप जगदंबा का कार्य कर रहे हैं तो ये एक्चुअली उन्होंने अपनी स्मृति कथा में लिखा है और तो देखिए कि ये शरत उसके बाद में तो जो हुआ वो क्लर्क जो था उसने सोचा वो पान बान खा लिया हुक्का पी लिया पानी बानी पी लिया और फिर वो दस्तावेज बना कर के वो जाने के लिए रवाना हुआ तो शरत महाराज स्वयं उसकी पालखी के साथ में चलते-चलते कहीं दूर तक उसको छोड़ कर के वापस आए फिर वहां रामदे में बैठे वरांडा में और शांति की चैन की सांस ली कि हां एक बहुत बड़ा कार्य समाप्त हुआ मां का ये नया घर जमीन इसका रजिस्ट्रेशन हो गया तो देखिए किय जब जहां पर रहते जखन जेमन खन तमन जेखाने जेमन सेखाने ते मोन जर जेमन जर संगे जेमन तार संगे तेम अर्थात कि जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति के अनुसार वर्तन करना जिस जगह पर रह रहे हैं उस जगह के अनुसार रहना जिस व्यक्ति के साथ में आप बात कर रहे हैं उस व्यक्ति ति को देख कर के आपको जो भी उसके साथ में व्यवहार है वह करना ये एकदम प्रैक्टिकल बात यह हमको इनके जीवन में कितनी जानने को मिलती है तो यह है मां की तो बात ही नहीं है माने मां के जीवन में तो ऐसी कितनी ही घटनाएं है कि अपने को कितना छुपा करके रखती है अभी देखिए कि चेतनानंद जी महाराज एक बड़ी ही सुंदर बात करते हैं जब ठाकुर की महासमाधि हुई उसके बा अभी ठाकुर जब थे उन्होंने मां को कहा था कि देखो तुम कामर पुकुर में जो अपना घर है उसको बेचना मत किसी के सामने तुम हाथ मत फैलाना अभी ऐसा कलकत्ता करके रहोगी भक्तों के साथ में रहोगी और फिर उनके सामने हाथ फैलाओ गी खाने के लिए ये तो ठीक नहीं है ठाकुर ने कुछ पैसा ठाकुर कितने प्रैक्टिकल थे मां को जिस तरह से प्रैक्टिकल चीजें सिखाई थी उतने ही प्रैक्टिकल ठाकुर ने कुछ पूंजी कुछ पैसा बलराम बाबू के पास में जमा करके रख दिया था क्योंकि उनको पता था कि एक्चुअली जो परिवार में जो मुखिया तो अभी ठाकुर है उनकी समाधि के बाद में महासमाधि के बाद में परिवार के मुखिया होंगे वो ये पुरुष जो होता है वो मुखिया होता है परिवार का तो वो परिवार के जो कर्ता होंगे बंगोली शब्द है करता तो वो होगा रामलाल उनका भतीजा किंतु एक बार ठाकुर ने रामलाल को बोला कि देखो कि मैं जाने के बाद में मां शारदा यहां पे कामर पुकुर में रहेगी तुम उनकी संभाल रखना तो रामलाल दादा ने कह दिया कि अच्छा उनकी जहां पर इच्छा हो वो रहे तो ठाकुर इमीडिएट समझ लिए कि उनकी इच्छा नहीं है कि मां की केयर करने का तु उस समय तो ठाकुर ने उनको डांट दिया कि अरे तुम किस तरह के पुरुष हो अपने परिवार की स्त्रियों की संभाल नहीं रख सकते ऐसा बोलके उनको डांट तो दिया किंतु ठाकुर को मन में मन में सब पता था कि जब मां जाएगी तो उनके परिवार जन मां की कोई भी संभाल नहीं रखने वाले तो चाहे तो पहले तो मां को बोल दिया कि हां तुम कामर कुकुर में अपना घर बेचना मत कामर कुकुर मेंही रहना वहां पर सब्जी वगैरह उगाना और फिर वो थोड़ा सा वहां जमीन भी है जमीन में वो जो धान वगैरह होता है तो उसके आधार पर अपना जीवन निर्वाह करना और साथ-साथ में ही बलराम बाबू के पास में कुछ पैसा रख कर के गए थे तो उसका जो इंटरेस्ट आता था उसमें से महीने महीने चार पाच रुपया बलराम बाबू मां को देते थे तो यहां तक ठाकुर ने सब व्यवस्था करके गए थे किंतु जैसे प्रैक्टिकल में होता है उस समय विधवाओं की जो परिस्थिति थी विधवाओं की दशा इतनी दयनीय थी कि सही सही में आप बिल्कुल नौकरानी की तरह उनको घर में रखा जाएगा उनका कोई ह्यूमन राइट्स नहीं रहेगा बाद बात-बात में उनका अपमान होगा उनकी अवगणना होगी ठीक से खाने को भी जदी मिले तो बहुत बड़ी बात है तो इस तरह से विधवाओं की परिस्थिति थी तो मां भी विधवा होकर के कामर पुकुर में रह रही है ऊपर में से ये गहने नहीं निकाले मस्तक मुंडन नहीं किया अभी भी साड़ी ऐसी पहनी है कि जहां पर लाल कलर की किनार हो तो गांव में सभी लोग परेशान हो गए भाई यह किस तरह की विधवा है विधवाओं को तो मस्तक मुंडन करना चाहिए गहने नहीं पहनने चाहिए साड़ी बिल्कुल सफेद पहननी चाहिए खाना पना एकदम सा सीधा सिंपल होना चाहिए और यह मां तो ऐसा नहीं करती तो चारों ओर से सोशल प्रेशर के भीतर में मां रहती थी तो इस तरह से मां ने एक साल ऑलमोस्ट ठाकुर की महासमाधि के बाद में कामर पुकुर में बिताया था तो यह इतना मां के जीवन में कष्ट भरा समय था कि उसकी तो कल्पना भी कोई नहीं कर सकता जब धीरे-धीरे करके कलकाता से कुछ-कुछ डिवोटा कामर पुकुर गए और जाकर के देखा कि मां जब भात खाती है तो भात रुखा सूखा खाती है उसमें देने के लिए एक चपटी नमक भी नहीं है तो यह सब देख कर के कुछ जो डिवोटा वहां पर गए थे आकर के कोलकात्ता में सब भक्तों को बोला सभी भक्त बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए के वराह नगर में ये सब ये त्यागी लड़के सब रहते थे त्यागी संतान मां के वे लोग उसमें से किसी ने लिखा है कि अरे हमको तो पता भी नहीं था कि मां को भात खाने के लिए एक चपटी नमक भी नहीं मिलता हमको इस बात का अंदाजा नहीं था क्योंकि क्या है ठाकुर की महासमाधि के बाद में ये भक्त लोग बिखर गए थे तो कुछ समय के लिए बाद बाद में फिर वो सब इकट्ठा होना शुरू हुए फिर से संघ बद्ध होकर के किंतु शुरू शुरू में कोई वृंदावन चला गया त्यागी संतानों में से देखिए कोई वृंदावन चला गया है कोई कहां पे चला गया है स्वामी जी तो निकल ही गए थे अखंडानंद जी महाराज तिबेट वगैरह की यात्रा करने के लिए चले गए थे तो कौन कहां था क्यों कोई कहां बैठ कर के तपस्या कर रहा है लाटू महाराज वो उपेन जिसकी बात हमने की अभी यह बसुति प्रेस वहां प जाकर के बैठे रहते थे वो उपेन उनको एक रो पूरी और यह आलू की सब्जी इनको देते थे ठाकुर लाटू महाराज ने कहा था ठाकुर को कि मुझे यह डाइजेस्टिव पावर ये हजम हजम करने की शक्ति अच्छी देना जिससे कि मैं त्याग तपस्या में जीवन जी सकू आप तपस्या करते हैं और जाकर बोलेंगे कि मुझे अच्छा सा खाना दो तो कहां से मिलने वाला है सामने वाला जो देगा पूरी कचोरी वही तो खा लेना पड़ेगा जो कि हेल्दी नहीं है तो लाटू महाराज ने कहा था तपस्या करनी है मैं ठाकुर को प्रार्थना की थी कि हजम करने की शक्ति अच्छी दो तो इस तरह से कौन कहां पर बिखरा पड़ा हुआ है उस समय मां वहां पर तपस्या कर रही थी तो चेतनानंद जी महाराज वो मां की बायोग्राफी है डिवाइन प्ले उसमें लिखते हैं कि मां की इस तपस्या का तात्पर्य क्या है मां को क्यों इस तरह से मने ठाकुर के साथ में रही जगदंबा स्वयं है तो इस तरह से उनको एक साल के आसपास इस तरह की तपस्या क्यों करनी पड़ी बाद बाद में तो मां कलकत्ता आनी शुरू हुई और फिर यह श्यामा सुंदरी देवी मां की मां जयराम बाटी में थी उनको पता चला कि अरे मां शारदा तो फटे हुए कपड़े पहनती है तो जाकर के फिर जोर करके मां को जयराम बाटी ले आई तो वो फिर तपस्या के दवन धीरे दिन से धीरे-धीरे करके समाप्त हुए कोलकात्ता आती थी जयराम बाटी रहती थी और बाद में तो तो स्वामी जी आ गए तो फिर तो कोई चिंता ही नहीं थी शरद महाराज ने मां की सेवा का भार ले लिया फिर उद्बोधन भवन का निर्माण किया मां जब कलकत्ता आती है तो रहने के लिए कितने ही भक्त ब्रह्मचारी साधु वगैरह जाकर मां को प्रणाम करते थे तो वो तो बाद की बात है ये एक साल का एक साल के आसपास का जो कामर पुकुर का तपस्या मय जीवन ठाकुर की महासमाधि के बाद में चेतनानंद जी महाराज पूछते हैं कि इसका तात्पर्य क्या है तो वो कहते हैं कि देखिए कि महापुरुष की अवतार की कोई इच्छा होती है ना वो बिना पूरी हुए नहीं रह सकते तो वह क्या कहते हैं कि ठाकुर ने एक बार कहा था कि मैं किस तरह का जीवन जीना चाहता हूं आदर्श जीवन मेरे लिए क्या होगा जैसे कि स्वामी जी ने एक बार कहा था ना कि यदि मेरी शिक्षा मेरे हाथ में होती तो मैं ये सब रटता नहीं विभिन्न तरह की इंफॉर्मेशन मैं क्या करता कि मैं सबसे पहले तो अपने मन को एकाग्र करना सीखता फिर इस एकाग्रता की शक्ति से मैं मेरे सामने जो भी विद्या आएगी फटाफट करके उसको ग्रहण कर लेता तो ठाकुर के पास में ठाकुर खुद कहते हैं कि मेरा जीवन यदि मेरे हाथ में होता साधक जीवन तो मैं किस तरह से जीता तो ठाकुर कहते हैं कि मैं एक छोटी सी एक किशोरी के रूप में एक लंबे वाल वाली किशोरी जो कि अभी विधवा हुई है और इस तरह से एक छोटे से गांव में मैं रहता ठाकुर खुद कहते हैं फिर मेरे पास में एक गाय होती एक छोटा सा बागान होता गाय की सेवा करता बागान में से ये सब्जी वगैरह जो है वो थोड़ा बहुत मैं उसमें से बनाता माने खेती वगैरह करता और और फिर साथ-साथ में ही यह जो गाय का दूध है उसमें से मेवा मिठाई वगैरह बना कर के भगवान कृष्ण को में भोग चढ़ाता और मैंने एकांत में चुपके चुपके सीक्रेट में ठाकुर भगवान कृष्ण के सामने बैठ कर के रोता कि कहता कि भगवान आप आकर के मेरा यह भोग आपको ऑफर किया है उसको ग्रहण कीजिए और भगवान कृष्ण गोप बालक के रूप में आकर के प्रकट होते मेरे सामने बते और इस भोग को ग्रहण करते तो ठाकुर कहते हैं कि मुझे इस तरह का जीवन जीना है आदर्श जीवन मेरे लिए यह है तो चेतनानंद जी महाराज कहते हैं कि देखिए महापुरुष की इच्छा कभी भी माने वो ये अन फुलफिल नहीं होती तो माने कामर पुकुर में एक्जेक्टली इसी तरह का जीवन जिया है कि उसी तरह छोटे से बागान में से वह सब्जी वगैरह बनती थी ठाकुर को भोग दिया करती थी प्रार्थना करती थी अकेली अकेली रोती थी और जगत के साथ में मां का कोई लेना देना नहीं था उस गांव में कौन जाएगा तो शारदा महाराज जी चेतनानंद जी महाराज इस तरह से लिखते हैं तो देखिए कि इन लोगों के जीवन में कितने प्रसंग और कितने प्रसंगों की कितनी व्याख्या अपने सामने है तो यह जखन जमन तखन ते मन ये उसके बारे में हम जितना चाहे उतना चिंतन कम है किंतु आज यही तक कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण
Question Answer
मस्तु यह जो पब्लिकेशन में बहुत सालों तक एक मनसुख भाई मेहता बोलकर के एक वॉलंटिली थे और प्रिंसिपल भी हुए थे राणी स्कूल है यहां पर पास में ही है उस समय की बड़ी एक नाम की हुई स्कूल मानी जाती थी तो राणी के जितने भी आज स्टूडेंट उस समय आते थे अभी तो सब लोग तो बहुत बड़े-बड़े हो गए कोई विदेश में है कोई डॉक्टर है कोई क्या है और जितने भी स्टूडेंट आएंगे सब लोग ये मनसुख साहेब बाद में तो रिटायर होकर के प्राय डेली यहां पर आते थे पब्लिकेशन में जितने भी उनके आएंगे एक स्टूडेंट आकर के उतनी प्रशंसा करेंगे कि अरे हमारे मनसुख साहेब थे तो उनकी मने उनकी वजह से हमारा जीवन घडतर हुआ है माने सिर्फ ये नहीं कि उनका जो सब्जेक्ट मैटर है वो उन्होंने सिखाया है किंतु उनके प्रति रिस्पेक्ट इतनी थी उनका जो कंडक्ट इतना डिग्निफाइड था कि उनके प्रति रिस्पेक्ट की वजह से वह गुण उनके जो थे उनमें आते हैं तो यह एक एस्पेक्ट है यदि हम इसको प्रैक्टिकल यदि बोलेंगे कि मा ठाकुर ने मां का हृदय जीत कर के मां को शिक्षा दी अभी यदि इसका प्रैक्टिकल देखा जाए तो एक तो है कि बच्चा मां अपने बच्चे को किस तरह से सिखाती है बच्चा मां को प्रेम करता है तो मां बच्चे को सिखाती है किंतु एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन लेवल पे जद देखें तो इंडिविजुअल के बीच में इस तरह से रिलेशन ना हो पाए एक क्लास में एक टीचर के सामने प्राय 50 60 बच्चे होते हैं तो इंडिविजुअली सबके ऊपर में अटेंशन देना संभव नहीं होता तो इन दैट केस क्या हो कि टीचर का कंडक्ट इतना डिग्निफाइड हो उतना उसका इंटीग्रिटी ऑनेस्टी उसकी विद्या सपहा इतनी हो कि स्टूडेंट्स को ऑटोमेटिक उनके ऊपर रिस्पेक्ट आए और फिर वो धीरे-धीरे ग्रहण करना सीखेंगे जिस टीचर के ऊपर रिस्पेक्ट ही नहीं है उनके ऊपर में आप फिर उससे ज्यादा कुछ ग्रहण नहीं कर पाएंगे कोई टीचर आता है तो सभी लोग उनकी मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं या तो फिर उनके ऊपर में शक करते हैं व्हाट एवर आजकल तो जो सब कुछ हो रहा है तो दिस इज प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ दैट कि टीचर का कंडक्ट ऐसा होना चाहिए कि बच्चों का रिस्पेक्ट हो और फिर रिस्पेक्ट में से वे लोग बाकी सब जीवन का घडतर उनसे करें ये गुरुकुल सिस्टम अपना जो ट्रेडिशनल गुरुकुल सिस्टम है वही वही बात है कि अभी आज अपनी जनसंख्या ही इतनी बढ़ गई है क्या करेंगे वो पहले गुरुकुल में एक गुरु है सामने 10 शिष्य बैठे हैं तो सभी का पूरा चरित्र पूरा लाइफ वो गुरु के सामने है आज एक गुरु के सामने एक टीचर के सामने 50 लड़के बैठे हैं तो अभी तो मैंने किंतु है वही कि आपको जद इंडिविजुअल अटेंशन भी ना दे पाए तो किंतु खुद का लाइफ ऐसा प्योर हो कि जिससे बाकी सब सीखे वो मैंने देखिए हमने वो जो डिस्कस किया था ना कि एक फैमिली सिस्टम है एक गुरुकुल सिस्टम है तो ठाकुर फैमिली सिस्टम में मां को एक तरह से देते थे उपदेश और गुरुकुल सिस्टम अपने त्यागी संतानों को एक तरह से उपदेश देते थे बेसिक प्रिंसिपल वही है ठाकुर के प्रति सबकी श्रद्धा इतनी थी कि ठाकुर जो कहते थे वो सुनते थे तो दैट इज द कॉमन प्रिंसिपल किंतु देखिए कि दोनों का स्वरूप अलग-अलग है ठाकुर और मां का जो है वह रिलेशन वो एक फैमिली लेवल पर प्रैक्टिकल होगा मां और बच्चे के बीच में हस्बैंड और वाइफ के बीच में और ठाकुर और त्यागी संतानों का वो गुरुकुल के लेवल पर प्रैक्टिकल होगा इसमें यह आजकल ये मोदी गवर्नमेंट ने कहा भी है जिसको कि यह अन ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर बोलते हैं ना उसका कंट्रीब्यूशन भी जीडीपी में गिनना चाहिए अभी जैसे कि फैमिली में महिला क्या करती अपना खेत है उसमें काम करती है तो एक्चुअली उसका वो जीडीपी में कंट्रीब्यूशन नहीं गिना जाएगा क्योंकि शी इज नॉट एंप्लॉयड अ तो एक्चुअली इनका कहना है कि अन ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर है ये डोमेस्टिक वर्क है उसके उसको भी आकलन करके जीडीपी में ऐड करना चाहिए ऐसा यह नीति आयोग का यह प्लान है अभी यह कहां तक आगे बढ़ा है मुझे पता नहीं अभी इतना आप प्रॉपर्ली एक्सेस नहीं कर पाएंगे उसको मैंने एनालिस नहीं कर पाएंगे क्योंकि अन ऑर्गेनाइज्ड है तो तो एक मैंने एक आप अंदाजी करके एक फिगर डाल दे सकते हैं आई डोंट नो कि क्या काम हुआ है किंतु आपने जैसा कहा कि ये नीति आयोग वगैरह इसके बारे में ऑलरेडी सोच रहे हैं और मैंने पढ़ा भी था इनके बारे में कि किस तरह से इनका जो डोमेस्टिक कंट्रीब्यूशन उसको जीडीपी फिगर में ऐड किया जाए यह चल रहा है आई डोंट नो कि कहां तक पहुंचा किंतु ऑफकोर्स होना ही चाहिए हमाने महिलाओं के लिए दोनों ऑप्शन है वो कॉर्पोरेट सेक्टर में जाकर के कंट्रीब्यूशन करें ना कि डोमेस्टिक सेक्टर में कंट्रीब्यूशन करें कंट्रीब्यूशन इज वैलिड इन ऑल द पॉइंट्स ये अमेरिका में जैसे है कि मैं मेरे कुछ कुछ रिलेटिव्स वहां पे है तो उनसे मैं सुनता हूं कि बच्चा थोड़ा सा पाच छ महीने का ना कि एक साल का हो जाता है उसको डे केयर में रख कर के मां चली जाती है जॉब करने के लिए तो अभी पता नहीं है भी उन लोगों की सिविलाइजेशन इतनी एडवांस है कि डे केयर वगैरह काम करेगा छोटा बच्चा इस तरह से मार्कस से अलग होकर रहेगा मैं इमेजिन नहीं कर सकता कि अपने बच्चे या तो फिर ये मैंने लॉन्ग टर्म ये जो सिविलाइजेशनल प्रोजेक्ट जो है उसमें मां और बच्चे का सेपरेशन इतनी कम उम्र में कहां तक डिजायरेबल है ये मुझे ठीक नहीं लग रहा है और वे लोग भी देखिए अभी स्कूल शूटिंग ये वो माने ये डोमेस्टिक ये जो मैंने बात-बात में डाइवोर्स सिंगल पेरेंट फैमिली ये जो सब वहां पर चल रहा है इवन दे शुड रियलाइफ फिगर्स आर नॉट एवरीथिंग हर दूसरे दिन सुनने को मिलता है किसी ना किसी स्कूल में शूटिंग हुआ अभी स्कूल के माने अमेरिकन स्कूल्स आर मोर डेंजरस देन द अफगानिस्तान स्कूल्स माने सोच करके देख