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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 20 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र पाठ कर रहे हैं। चीर सीमंतिनी इस अध्याय तक हम पहुंचे हैं। ठाकुर की महासमाधि के बाद में

वृन्दावन में विरह-विह्वला श्री माँ

मां तीर्थ दर्शन कर रही है। कल एक हमने प्रसंग पढ़ा प्रसंग का पाठ किया कि किस तरह से श्री रामकृष्ण के अदर्शन से जो विरह मां के मन में प्रकट हुआ वो एक किस तरह से प्रकाशित हो रहा है। सर्वप्रथम तो मां बहुत रोई थी। जैसे ही वृंदावन आई साथ में ही योगिन मां के साथ में मुलाकात हुई साक्षात्कार हुआ और वह फिर दोनों ही नियमित रूप से रोना धोना कर रहे थे तो फिर ठाकुर ने आकर के उनको दर्शन देकर के कहा कि अरे तुम दोनों लोग इतना रोते क्यों हो? मैं गया कहां पर हूं? बस यही तो इस घर से दूसरे घर में तो यह दर्शन जब प्राप्त हुआ तो अभी रोना तो कम हुआ। किंतु साथ में ही यह विरह अन्य एक रूप से प्रकाशित होने लगा। कल हमने जैसे देखा कि गंभीरानंद जी कहते हैं कि वृंदावन में भगवान कृष्ण रास लीला में से जब अदृश्य हो गए। रास मंडल में से जब अदृश्य हो गए तब सभी गोपियां इस तरह से अनुकरण करने लगी। इस तरह से वर्तन करने लगी। कि जैसे कि वह स्वयं श्री कृष्ण हो। तो इसके रिलेटेड हमने कुछ डिस्कशन भी किया था। देखिए यूजुअली हम लोग एक वेदांतिक लॉजिक लेकर के चलते हैं। भक्ति शास्त्र में वह वेदांतिक लॉजिक काम नहीं करता है। वो एक अवतार तत्व जो होता है वह अपने आप में एक स्वतंत्र दर्शन शास्त्र है। ठाकुर के जीवन में हम देखेंगे कि तीन दर्शन या तीन तत्व का एक सुंदर संगम हुआ है। यहां पर है आत्म तत्व। दूसरा है अवतार तत्व और फिर तीसरा है शक्ति तत्व। यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की यह तीन सबसे बड़ी नदियां है या तीन सबसे बड़े आप कहेंगे कि स्ट्रीम्स हैं। वो तीनों स्ट्रीम आप देखेंगे आदिल से अनादि काल से भारत में चली आ रही है। ये तीनों का एकदम एक परफेक्ट संगम हमको श्री रामकृष्ण के जीवन में देखने को मिलता है। तो जिस तरह से यहां पर वह जो एक लीला चल रही है मां के जीवन की अभी कि ठाकुर के अदर्शन से उनके मन में किस तरह के भाव किस तरह के यह सब इमोशंस प्रकट हो रहे हैं। तो उसमें यह एक था कि जैसे कि श्री रामकृष्ण देव का उनके ऊपर में आवेश हो रहा है। तो एक हमने देखा कि मां समाधि में थी उस समय इस तरह से उनका जो अह बाह्य स्वरूप दिखने लगा जैसे कि ठाकुर स्वयं समाधि में मग्न होते थे तो उनको देखकर के उनका जो बाह्य स्वरूप कैसा था वैसा ही मां का स्वरूप दिखने लगा और फिर योगिन मां ने बहुत बार नाम सुनाया उनको फिर भी जब समाधि नहीं टूटी तो फिर योगिन मां महाराज ने थोड़ा सा नाम सुनाया। मां का मन सर्वोच्च भूमि से थोड़ा सा अर्धबाह्य दशा में वापस आया। जब वापस आया तो बिल्कुल ठाकुर का ही अनुकरण करके मां ने कहा खाबो अर्थात कि खाऊंगी। तो जैसे ठाकुर अपने मन को जमीन पर पृथ्वी पर बांध के रखना चाहते थे। भक्तों के साथ में लीला विलास करना चाहते थे। तो वैसे ही मां ने इस स्वर से कहा कि कुछ खाऊंगी। फिर मां के सामने जैसे ही यह पान रखा गया तो पान को ठीक उसी तरीके से मां ने खाया जिस तरीके से ठाकुर खा रहे थे। खाते थे। और फिर जब योगिन महाराज ने उस अवस्था में मां को जब एक दो प्रश्न किए धर्म तत्व के ईश्वर तत्व के तो मां ने जिस तरह से उत्तर दिया वैसे ठीक ऐसा प्रतीत हुआ कि ठाकुर ही जैसे कि मां के मुंह से मां के देह के द्वारा फिर से अवतरित हुए हैं। तो यह सब हमने देखा और फिर उसी समय की एक बात है कि किसी एक भक्त ने मां को प्रश्न किया था। उस प्रश्न के उत्तर में मां ने कहा था आमी राधा मैं ही राधा हूं। तो देखिए कि कितना उच्च भाव अवस्था में कितनी उच्च आध्यात्मिक अवस्था में मां का मन इस समय विराजित था। विचरण कर रहा था। इसके बाद में और थोड़ा सा हम आगे पढ़ते हैं। अ क्या कहते हैं

विरहविदग्धा सरला बालिका श्री माँ

गंभीरानंद जी? बिरह विदधा श्री माय शखानी हृदय ए काले श्री रामकृष्ण केंद्रीभूत होइया वास्तव जीवन एक अपरिशम वैराग को आन्या देवाए जागतिक व्यापार सहित ताहार जेनो कोनो सुनियंत्रितो संबंध छिलोना विरह विदगदा श्री मां का संपूर्ण हृदय इस समय श्री रामकृष्ण पे केंद्रीभूत होकर के वास्तव जीवन में उनके भीतर में एक अपरिसिम वैराग्य लाकर के प्रकट किया था। बोलकर के इसकी वजह से यह जो सांसारिक जगत है इसके साथ में उनका कोई सुनियंत्रित संबंध नहीं था। देखिए सुनियंत्रित संबंध ना होना। इसका अर्थ क्या है? पता है एक बालक जो होता है, एक शिशु जो होता है, वह है ना कार्य कारण को समझ नहीं पाता है। हम बड़े लोग हम यदि ऐसा मान लीजिए रास्ता रास्ते पर जा रहे हैं तो आंख बंद करके दौड़ नहीं लगाएंगे। क्यों? क्योंकि हमको पता है रास्ते पर जा रहे हैं और आंख बंद करके दौड़ लगाई तो हो सकता है पूरी संभावना है कि कोई भी एक कार ना कि कोई एक ट्रक आकर के हम हमारे साथ में टकराएगी और हड्डी पसलियां तोड़ करके रख देगी। यह हो गया कार्य कारण संबंध। हमको पता है कि इस तरह का कार्य करने से इस तरह का परिणाम आएगा। किंतु जब शिशु होता है ना उसके मन में यह कार्य कारण संबंध फिट नहीं बैठा होता है। वो आंख बंद करके रास्ते पर दौड़ेगा भी सही यदि उसकी मां उसको पकड़ने के लिए उपस्थित नहीं है या तो मां का एक सेकंड के लिए भी ध्यान भंग हुआ। यह शिशु सीधा जहां पे उसकी इच्छा हो वह दौड़ लगाएगा। यह जगह खतरा खतरा क्या है? डेंजर क्या है? इस तरह का कार्य करने से हानि हो सकती है। यह बात शिशु के मन में होती ही नहीं। अग्नि प्रज्वलित हो रहा है। हम उससे दूर ही रहेंगे। क्योंकि पता है कि उसके उसका स्पर्श हुआ तो बहुत ही पीड़ा होगी। शिशु है उसको बेचारे को पता नहीं। सीधा हाथ मारने को जाएगा और फिर जब हाथ जल जाएगा तो जोर-जोर से रोएगा। तो क्या है कि कार्य कारण संबंध यह करना उचित है। यह नहीं करना उचित है। यह शिशु का होता नहीं है। क्योंकि उसके बेचारा अभी मन जो है अभी तो विकसित ही हो रहा है। तो यहां पे जो है अह ठाकुर क्या कहते हैं कि विरह विदग्धा श्री मां का संपूर्ण हृदय इस समय श्री रामकृष्ण के ऊपर में इस तरह से केंद्रित हो गया था। मां का मन जो है इस तरह से श्री रामकृष्ण के अह चरण समीप वो आ गया था कि बाह्य जगत के साथ में उनका कोई सुनियंत्रित संबंध नहीं था। संबंध नहीं था। एक अपरिसीम वैराग्य उनकी प्राण शक्ति को जैसे कि संपूर्ण रूप से खा जा रहा था। इस जगत के साथ में कोई सुनियंत्रित संबंध सुनियंत्रित संबंध अर्थात कि कार्य कारण कार्य कारण का ज्ञान होना। कार्य कारण की एक समझ होनी। जब यह समझ चली जाती है तभी कोई भी व्यक्ति जो है शिशु की तरह वर्तन करता है और यह समझ कब चली जाएगी एक तो है कि जब परमहंस अवस्था में अपना मन इस तरह से उच्च आध्यात्मिक तत्व में वो मग्न रहता है। यदि ईश्वर का दर्शन हुआ तो ईश्वर ही सत्य है। यह जगत जैसे कि धुएं की तरह यह जगत जैसे कि एक मिथ्यावत हमको लगने लगेगा। यदि आत्म साक्षात्कार हुआ है तो आत्मन ही सत्य है। जगत जैसे कि उसके सामने कुछ भी नहीं है। ठाकुर ने कहा ना कि मैं जब दक्षिणेश्वर में ईश्वर के विरह में जब जमीन पर गिर कर के रोते-रोते चिल्लाता था। मां दर्शन दो मां दर्शन दो और अपना चेहरा मिट्टी में रगड़ता था। उस समय सभी लोग इकट्ठा हो जाते थे। वह चारों ओर उनको घेर के खड़े रह जाते थे और सोचते थे कि कोई आदमी इतना जोर-जोर से चिल्ला रहा है। मिट्टी में अपना चेहरा रगड़ रहा है। उसका एक ही अर्थ है कि उसके पेट में शूल वेदना हुई है। उसके पेट में तीव्र वेदना हो रही है। तो वह वेदना सहन नहीं कर पा रहा है। बोलकर के वह इस तरह का आचरण कर रहा है। पागल जैसा यह बालकवत, जड़वत, पिशाचवत यह सब परमहंसों की परमहंस के लक्षण है। क्योंकि उनका मन इस हद तक ईश्वर के प्रेम में आपुत हो चुका है। इस हद तक ईश्वर में निमग्न हो चुका है कि ये जगत जैसे कि ये जगत जगत के नियम कानून ये कार्य कारण संबंध ये सब कुछ उनके सामने तुच्छ सा प्रतीत होता है। तो ये ठाकुर के साथ में तो इस तरह की कितनी ही घटनाएं हैं। एक दिन की बात है कि ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं सामने में। अब ठाकुर को क्या है? जलेबी तो बहुत पसंद है खाना। तो किसी ने एक बास्केट में ठाकुर के सामने जलेबी रख दी थी। तो ठाकुर बड़े ही आनंद से जलेबी खा रहे हैं। एकाएक देखा कि एक पांच साल का बच्चा उसने कमरे में प्रवेश किया। जैसे ही इस बच्चे को ठाकुर ने देखा वैसे ही अभी कहां वह उच्च आध्यात्मिक तत्वों की बात कर रहे हैं। ईश्वर जीव जगत आत्मन ब्राह्मण त्याग वैराग्य ये कहां पे यह सब बातें चल रही है और एकाएक ये पांच साल के बच्चे को देखा ठाकुर के ऊपर में भी यह शिशु भाव का आवेश हुआ। कल मां ने कहा था ना कि उनके ऊपर में ठाकुर का आवेश हुआ था। तो ठाकुर के ऊपर में यह बालक भाव का आवेश हुआ और जैसे एक बालक दूसरा जब मिठाई खा रहा है और उसका मित्र आ जाता है तो कैसे वह कतराता है कि अरे मुझे क्या अपनी मिठाई उसके साथ में शेयर करनी पड़ेगी तो ईर्ष्या के मारे लोभ के मारे यह बच्चा क्या करता है मिठाई को छुपा देता है कि उसके साथ में शेयर नहीं करना है तो बिल्कुल ही ऐसा सुमधुर बालक भाव ठाकुर के ऊपर में आविष्ट हुआ और ठाकुर ने जैसे ही पांच साल के बच्चे को देखा यह जो बास्केट थी जलेबी की उसको उठाकर के अपने पीछे में छुपा दिया और छुपा के सीधे ही समाधि में मग्न हो गए। तो क्या है कि यह उच्च भाव में जब हमारा मन प्रविष्ट होता है तब भी यह कार्य कारण संबंध जो है जगत के साथ में वह टूट जाता है। शिशु भाव का आरोप होता है। हमारे पे बालक भाव का आरोप होता है और साथ में ही यह जब बहुत बड़ा कष्ट जीवन में आता है तब भी ऐसा ही होता है। देखिए मां के जीवन में आखिर आखिर में मां को मां ने भुगत भुगत करके मां की ऐसी अवस्था हुई थी। बहुत रोग काला ज्वर है। मलेरिया है। वो सब इतना मां को लग गया था कि वो उद्बोधन में जब आखिरी बार रहने को आई थी। मां का देह बिल्कुल ही जीर्ण हो गया था। मां का देह बिल्कुल ही कंकाल सार जैसा हो गया था। तो बहुत ही भुगता था मलेरिया की वजह से इस सब चीजों की वजह से। तो मां का मन उस समय बालिका की तरह हो गया था। एक दिन उनका कोई सेवक संतान वहां पर काम कर रहा है। मां की सेवा कर रहा है। मां कहती है कि अभी ना मैं पूरे दिन भर वो बिस्तर पर ही लेटे रहना पड़ता है क्योंकि वह बीमार इतनी है कि खड़ी भी नहीं हो पाती। तो मां ने कहा बेटा तुम मुझे अपनी गोद में लेकर के बैठो। मैं बिस्तर पर लेटे रहना नहीं चाहती। बिल्कुल जैसे एक छोटी बालिका अपने पिताजी के साथ में जिस तरह की जििद करती है वैसे ही तो यह सेवक संतान तो बेचारा थोड़ा यह हो गया कि किस तरह से मां को इस तरह से उनकी इच्छा पूर्ण करें। फिर उन्होंने उन मां की जो सेविका थी उनको बुलाया कि मां कहती है कि आप उनको गोद में लेकर बैठिए। किंतु सेविका की भी ऐसी हिम्मत नहीं हुई। तो फिर उन्होंने क्या किया कि वो पिलो रख के एक थोड़ा सा बैठने जैसा बनाया और फिर वहां पर उसके सहारे मां को बिस्तर में बिठाया। तो क्या है मां के आखिरी आखिरी दिनों की इस तरह की बालिका भाव की बहुत सारी कहानियां है वो फेमस कहानी कि वो जब वो सरला दीदी भविष्य की भारतीय प्राणा माता जी शारदा मठ की प्रथम अध्यक्षा तो वो तो मां की सेवा कर रही थी तो बीच-बीच में वह थर्मामीटर से उनका टेंपरेचर मेजर करना है। फिर उनको यह वह जो खाना है वह पथ्य खिलाना है जिसका कोई टेस्ट नहीं है। तो यह सब चीजों से मां नाराज हो गई। बोला कि बस अभी मैं यह कुछ नहीं करोगी। तो पहले जब मां ऐसा करती थी जिद करती थी बालिका की तरह तो सरला दीदी कहेगी कि क्या मैं शरद महाराज को बुलाऊं तो मां अब जैसे शरद महाराज का नाम पड़ेगा तो बिल्कुल बालिका को जैसे भय दिखाएंगे कि मैं पिताजी को बताती हूं। यदि उसकी मां उसको भय दिखाएगी कि पिताजी को बता दूंगी तो छोटी बालिका कैसे वो नाराज थी किंतु अभी शांत हो जाती है तो अब तक तो मां ऐसा करती थी किंतु अभी जब कहा कि मैं बुलाती हूं शरद महाराज को सरला दीदी ऐसा कहती है तो मां कहती है अच्छा बुलाओ शरद को बुलाओ बुलाओ उसको बुलाओ तो सरला दीदी जाकर के शरद महाराज को बुला के लाई शरद महाराज ऐसे मोटे-छोटे धीरे-धीरे करके मां तो फर्स्ट फ्लोर पे उद्बोधन किया तो धीरे-धीरे करके के सीढ़ी उठ के मां के पास में बैठते हैं और बड़ा ही स्नेह पूर्ण मां को पूछते हैं कि मां यह यह सरला जो कहती है टेंपरेचर लेना और यह जो पथ्य ग्रहण करना वगैरह तो आप खाइए मैं आपको खिला देता हूं। यदि वो नहीं आपके उसके हाथ से नहीं खाना चाहती तो मैं खिला देता हूं। ऐसा करके वो जो मां को जैसे ही खिलाना प्रारंभ किया कहा माइक टू जीरिए खान तो मां थोड़ा आप शांति से खाइए जीए खान का क्या अर्थ है पता नहीं भूल गया मैं सो एनीवे मां मां इतना खुश हो गई मां कहती देखो बेटा तुमने इतना स्नेहपूर्ण मुझे कहा कि ऐसा तुम खाओ और यह लोग है सब समय मुझे परेशान करते रहते हैं तो माने क्या है कि बिल्कुल एक बालिका अपने पिताजी के साथ में व्यवहार करती है। वैसे ही मां शरद महाराज के साथ में व्यवहार कर रही है और घुमटा नहीं टाना है। अब तक माने बिल्कुल अपने आखिरी दिनों तक कि धीरे-धीरे खान। अच्छा अच्छा तो धीरे-धीरे खाइए। हां। तो देखिए कि अब तक ऐसा था कि मां शरद महाराज के सामने घुमटा टानती थी और शरद महाराज भी थोड़े से उनको तो दुख माने ये तो होगा ना कष्ट तो होगा कि संतान की तरह है फिर भी मेरे सामने घुमटा टानती है तो शरद महाराज बोलते भी थे आमीज जनो बेटी शसुर मैं जैसे कि ना उनका शसुर हूं ससुरा हूं इस तरह से मेरे सामने वो घुमटा टानती है तो जो भी है यह पहली बार ऐसा हुआ अपने आखिरी दिनों की बात की मां ने शरद महाराज के सामने घुमटा नहीं टाना है। तो देखिए कि शरद महाराज के मन की वह जो एक एक कष्ट रह गया था उनके मन में वो भी जैसे कि माने आखिरी दिनों में वो उसको शांत कर दिया। सो देखिए कि यदि मन एक बहुत ही उच्च आध्यात्मिक भाव में मग्न हो जाता है या इस तरह से विरह का शोक है ना कि यह बीमारी का कष्ट है। यह सब परिस्थिति जब हमारे सामने आती है तब मनुष्य का संसार के साथ में जो एक सुनियंत्रित संबंध होता है वह टूट जाता है और फिर यह मनुष्य बालक या बालिकावत आचरण करता है। तो यहां पे भी यह गंभीरानंद जी कहते हैं कि विरह विदग्धा श्री मां का संपूर्ण हृदय इस समय श्री रामकृष्ण के ऊपर में इस तरह से केंद्रीभूत हो गया था कि उनका जीवन एक अपरिम वैराग्य से परिपूर्ण हो गया था और जागतिक जगत के साथ में व्यवहारिक जगत के साथ में उनका कोई सुनियंत्रित संबंध नहीं था उस तखताहार आचार व्यवहार देखले ओ आलादी सुनी ले मोने हो तो जेनो तनी अति शरोला बालिका उस समय उनका आचार और व्यवहार देखेंगे और वार्तालाप सुनेंगे तो लगेगा जैसे कि वह अति सरल बालिका है। एक दिन पत्र पुष्प

शवदेह को देखकर विरहविदग्धा श्री माँ के मन में प्रगटि वैराग्य की ज्वाला

सज्जित एक शब्द एक दिन पत्र पुष्प सज्जितो एक शबोदे के कीर्तन सोहोशने लया जते देखिया तीन बोलिया छले एक दिन पत्र पुष्प सज्जित एक शब्द देह को कीर्तन सह कीर्तन के साथ शशान में लेते हुए ले जाते हुए देखकर के उन्होंने कहा था देखो देखो मानुष्ट केमन वृंदावन प्राप्त होए छ देखो देखो यह व्यक्ति है कैसा वृंदावन प्राप्त हुआ है वृंदावन में मृत्यु हुआ है तो तो वृंदावन प्राप्ति हुई है तो बहुत सारे लोग काशी में जाकर के अपने आखिरी दिन वहां पर बिताना चाहते हैं जैसे काशी प्राप्ति हो तो ठाकुर कहते भी है एक जगह पे एक जगह पे कि वह जो बूढ़ी औरतें हैं वो काशी प्राप्ति के लिए काशी जाती तो किंतु फिर मृत्यु नहीं होकर के उनका जीवन बढ़ता ही जाता है। लंबा ही होता जाता है। तो यहां पे मां कहती है कि देखो यह व्यक्ति है कैसा वृंदावन प्राप्त हुआ है। आमरा एकने मोरते एलुम एक दिन एक जोरो होलो ना हम लोग यहां पर मरने को आए तो एक दिन एक ज्वर भी हुआ नहीं। थोड़ा सा बुखार भी हुआ नहीं। देखिए मां इस तरह की बात करती है कि हम लोग यहां पर मरने को आए हैं तो एक दिन थोड़ा सा बुखार भी नहीं हुआ। आप इसी एक सेंटेंस से समझ लीजिए कि यह जो विरह व्यथा थी मां के मन में कितनी गंभीर रूप से प्रविष्ट कर गई थी। वरना जगत जननी जगदंबा क्या इस तरह की बात करेगी? ठाकुर के जीवन में है कि हृदय जब ठाकुर को बहुत कष्ट देता है। ठाकुर ने सोचा कि बस अभी मैं गंगा में गिर करके देह त्याग कर दूंगा। किंतु वह ठाकुर है। ठाकुर सब समय बालक अवस्था में रहते थे। और बालक अवस्था में जैसे एक शिशु का मन कभी-कभी बहुत ही एशियस हो जाता है। कभी-कभी बहुत ही एक्साइटेड हो जाता है। कभी-कभी रुष्ट हो जाता है। तो वह सब भाव तरंगे आप देखेंगे। एक्सट्रीम भाव तरंग वो ठाकुर के जीवन में तो दिखाई देती है किंतु मां का जीवन जो है वह जैसे कि प्रशांत महासागर की तरह है। वो जो ठाकुर ने कहा ना एक छोटा सा जलाशय है उसमें जब हाथी प्रवेश करता है तो जलाशय पूरा ऊपर नीचे हो जाता है। पानी जो है छलक छलक करके एक किनारे पर आकर के टकराता है। किंतु एक महासमुंदर के भीतर में हाथी प्रविष्ट होता है। हाथी प्रवेश करता है तो मुश्किल से थोड़ी सी तरंग आपको दिखाई देगी। तो मां का हृदय भी इस तरह से विराट महासागर की तरह था। कितना ही भाव रूपी हस्ती उसमें प्रवेश कर जाते थे। बाहर से कुछ पता नहीं चलता था। किंतु यह शोक रूपी एक ऐसा भाव अभी उनके मन में प्रकट हुआ है कि इवन यह प्रशांत महासागर जैसा मां का जो हृदय है उसमें भी अभी इतनी बड़ी-बड़ी तरंगे दिखाई देती है कि मां ने कहा कि हम तो यहां पर मरने को आए हैं। एक दिन थोड़ा सा बुखार भी नहीं हुआ। क तो बयश हो ग बोलो देखी देखो तो हमारी उम्र कितनी हो गई है हमरा बाप के देखे छ भासुर के देखे छ हम लोगों ने बाप को देखा है भासुर को देखा है भासुर अर्थात मोस्ट प्रोबेबबली पति का भाई जो भी है तो इनको देखा है हमने तो योगिन मां प्रभुति शून्या सोहास्य बोललेन योगिन मां वगैरह ने सुनकर के साहस्य कहा बलो की मां मां क्या बोल बोल रही हो बाप के देखे छो बाप को देखा है बाप के आ के ना देखे बाप को और कौन नहीं देखता अर्थात देखिए पिताजी का मृत्यु यदि हम छोटी उम्र में भी हो जाता है हमारी छोटी उम्र में तो भी तो एक बार तो उनका दर्शन तो होगा ही होगा तो यहां पे मां की उम्र कोई इतनी ज्यादा भी नहीं है किंतु जिस तरह से बात करती है बालिका की तरह बात करती है तो फिर यह योगिन मां वगैरह यह सुनकर के हास्य करके कहते हैं कि बाप को कौन नहीं देखेगा। अपने खुद के पिताजी को तो सभी लोग मिले होंगे। भले चाहे उनका हम छोटे रहते रहते मृत्यु यदि हो भी गया हो तो भी तो एक बार तो उनका साक्षात्कार हुआ ही होगा। जनरली तो ये मां का बालिका स्वरूप

लाटू महाराज की श्री रामकृष्ण पे भक्ति

श्री मां वृंदावन प्राय एक वर्ष और बास कोरेन श्री मां ने वृंदावन में लगभग एक बरस एक साल निवास किया था मास्टर महाशय स्त्री एक मास परे प्रबल मलेरिया आक्रांत होया पूजनीय काली महाराज शहीद कोलकाता फिरिया आश मास्टर महाशय की स्त्री एक महीने के बाद में ही उनको प्रबल मलेरिया हो गया था। तो प्रबल मलेरिया से आक्रांत हो गई थी। बोलकर के पूजनीय काली महाराज के साथ में कोलकाता वापस चली आई थी। माने एक साल जो निवास किया उसमें फिर यह काली महाराज और यह मास्टर महाशय की स्त्री वे दोनों एक ही महीने के बाद में वापस लौट आए थे। और बाकी जो थे उनमें से लाटू महाराजो पांच छ मास पोरे रामबाबू और बाड़ी कोनो दुर्घटना संवाद पया कोलकाता आ लाटू महाराज भी पांच छ महीने के बाद में रामबाबू के घर में कोई दुर्घटना का संवाद प्राप्त करके कोलकाता वापस आ गए थे। लाटू महाराज तो रामबाबू के ही घर में नौकर थे। रामबाबू यह मिठाई वगैरह लेकर के उनको दक्षिणेश्वर भेजते थे। लाटू महाराज को उसी में जो परमहंस देव का साक्षात्कार हुआ ठाकुर ने उनका ब्रेन वाश कर दिया। इसके बाद में लाटू महाराज कहते हैं कि महाशय मैं अभी यहां पे ही रहूंगा। रामबाबू के घर नहीं जाऊंगा। तो एक दिन रामबाबू आए ठाकुर का दर्शन करने के लिए। तो ठाकुर उन्हीं के सामने रामबाबू के सामने ही लाटू को कहते हैं कि अरे लेटो तुम बीच-बीच में रामबाबू के घर जाया करो। तो तुम तो वहां पे काम करते हो, नौकरी करते हो, पड़े रहते हो यहां पे तो लाटू नाराज होकर कहता है नहीं महाशय मैं वहां पर नहीं जाऊंगा। अभी मैं यहां पे ही रहूंगा। तो ठाकुर नाराज होकर कहते हैं कि अरे तुम पैसा ले रहे हो उनका और पड़े रहते हो यहां पे। देखो ऐसा कैसा चलेगा? फिर वो ठाकुर जैसे की कंप्लेन करके रामबाबू को कहते हैं कि देखा राम यह मेरी बात नहीं सुन रहा है। रामबाबू हंस रहा है। वो देख रहे हैं कि सब वो कह रहे हैं कि महाशय सब तो आप ही की लीला है। आप ही ने उसका ब्रेन वाश करके रखा है। आप क्यों कंप्लेन कर रहे हैं? और फिर मैंने तो अनुमति दे दी है कि यदि वो यहां पर खुश रहता है। आपकी सेवा करता है तो उससे मैं संतुष्ट ही हूं। उससे मुझे कोई आपत्ति नहीं। तो वही किंतु रामबाबू की जो पत्नी थी उनको लाटू महाराज मां करके ही पुकारते थे और उनके उन ये पत्नी का रामबाबू की वाइफ का लाटू महाराज पे काफी स्नेह था। तो उनके घर में यदि कोई दुर्घटना हुई है तो लाटू महाराज अवश्य स्वाभाविक रूप से सोचेंगे कि जाकर के वहां पर भी थोड़ा सा यदि सहाय की आवश्यकता है तो की जाए। बोल के वह पांच छ महीने के बाद में वह भी चले आए

वृन्दावन में वियोग-वेदना से मुक्त हो श्री माँ का मन हुआ आनंद से भरपूर

दीर्घकाल तीर्थ बाश पर श्री माय मौन ओनेटा स्वाभाविक भूमिते नाम या आशीलो लंबे समय तक तीर्थवास के बाद में श्री मां का मन स्वाभाविक बहुत हद तक स्वाभाविक जगत में स्वाभाविक स्वाभाविक भूमि पे वापस लौट आया ऑलमोस्ट एक साल वृंदावन वास किया है तो फिर वहां पे सतत यह जो एक आध्यात्मिक परबल है सतत वहां पर मां ने तो साधना चालू ही रखी थी तो यह जो भाव परंपरा यह जो साधन परंपरा साधन का प्रवाह इसकी वजह से मां का यह जो विरह था बहुत हद तक उसका उपशम हुआ था तनी प्रथमेन धग विरोह वियोग वेदना तापित होया छिले पर ठाकुर ता के तेमनी आनंदे भरपूर कोरिया राखिया छिले प्रथमे मां जिस तरह से दुस वियोग वेदना से तापित हुई थी दुसह वियोग वेदना से तापित हुई थी बाद में ठाकुर उनको उतना ही आनंद से भरपूर करके रखा था त नित्य घुरिया घुरिया नाना मंदिरे विग्रह दर्शन को ते मां नित्य भ्रमण करते करते विभिन्न मंदिरों में विग्रह अर्थात कि भगवान के दर्शन करती एवं कियतकाल तथा बोश्या ध्यान जप करते और कुछ समय वहां पर निवास करके ध्यान जप करती शोल समय निश्चय बहु अती्द्रिय दर्शन पाया छिलेन किंतु ताहा प्रकाश कोरे ना उस समय मां ने निश्चय बहुत सारे अती्द्रिय दर्शन प्राप्त किए होंगे किंतु मां ने उनको प्रकाश नहीं किया था।

श्री रामकृष्ण की भक्त निस्तारिणी देवी की शुद्ध पवित्रता

बस एक दर्शन की बात यहां पर गंभीरानंद जी लिखते हैं। एक दिन घटना सुजुक्ता जोगिन मां के बोलिया छिले सिर्फ एक दिन की घटना माने श्रीजुक्ता योगिन मां को कही थी से दिन राधा रमण मंदिर जायातिनी देखिया छिलेन जेनो भक्तबर श्रीजुक्त तो नमो गोपाल बाबू स्त्री विग्रह पारश्व दणया तहां के बीजन कोते छ जैसे कि वहां पे उस दिन राधा रमण के मंदिर में जाकर के मां ने देखा था दर्शन हुआ था कि भक्तवर श्रीयुक्त नवगोपाल बाबू की स्त्री अर्थात कि उनकी पत्नी विग्रह के सामने खड़ी रहकर के विग्रह के पास में खड़ी रहकर के विग्रह को चामर व्यजन कर रही है। गहे फिरिया ताई बोलिया छिले तो मां जब घर वापस आई निवास स्थान पर जब वापस आई तो उन्होंने योगिन मां को यह बात कही योगेन नवगोपाले परिवार बो शुद्धो योगेन नवगोपाल का परिवार अर्थात कि नवगोपाल की पत्नी बहुत ही शुद्ध है आमी ए रकम देख लूं मैंने ऐसा ही देखा जो नवगोपाल बाबू की पत्नी उनके बारे में काफी रेमिनेशंस है। काफी उनकी यह सब घटनाएं है अपने ऑर्डर में। उनका जो पुत्र संतान था नीरद महाराज वो उस समय राजा महाराज का राजा महाराज के साथ में स्वामी अंबिकानंद उनका नाम और राजा महाराज के साथ में उन्होंने काफी भ्रमण किया था। राजा महाराज के सेवक भी थे और बहुत ही अच्छे गायक थे। तो यही अपने संघ में नीरद महाराज की मां या तो फिर उनका नाम था निस्तारिणी देवी। तो यह निस्तारिणी देवी के काफी सब घटनाएं हैं। ठाकुर का दर्शन उन्होंने ठाकुर का दर्शन किया था। ठाकुर के बहुत बड़ी भक्त थी। तो एक दिन ठाकुर उनके घर आने वाले थे। तो वो सब तैयारी करके कि हां ठाकुर आएंगे तो भक्त परिवार है तो ठाकुर का आगमन होना कितनी बड़ी घटना है उत्सव वगैरह तो जैसे कि लगा ही रहता है तो और क्या था उत्सव आयोजन करने वालों में भी यह रामबाबू है यह सुरेश बाबू है उन लोगों का बड़ा नाम था तो कोई भी भक्त परिवार में ठाकुर आने वाले हैं तो यह लोग क्या करेंगे कि रामबाबू को बुलाएंगे और कॉन्ट्रैक्ट दे देंगे क्योंकि क्या है उनको पता था और वह लोग बार-बार उत्सव करके ठाकुर को बुलाते थे, निमंत्रण देते थे और सब व्यवस्था करते थे। तो ठाकुर भी बड़े उनसे प्रसन्न रहते थे। तो काफी भक्त परिवारों में ऐसा होता था। तो अभी इनके घर भी ठाकुर पधारे हैं। रामबाबू को कॉन्ट्रैक्ट दिया है कि नहीं यह तो नहीं पता किंतु उस दिन बड़ा ही उत्सव का वातावरण था। प्रॉब्लम यही है कि उत्सव का दिन जब ठाकुर पधारते हैं तो पुरुष भक्त ही उनको घिर करके रहते हैं। स्त्रियों को क्या है अंदर महल में रहना पड़ता है। फिर जब यह नृत्य कीर्तन वार्तालाप ये वो सब आप कथामृत में जैसे कि पढ़ते हैं वो समाप्त होने के बाद में ठाकुर को थोड़ा सा रिफ्रेशमेंट के लिए जब घर के भीतर में ले जाया जाएगा। वह एक मौका मिलता है सभी स्त्रियों को ठाकुर का दर्शन करने का, चरण स्पर्श करने का और कुछ अल्प समय तक उनके साथ में वार्तालाप करने का। तो यह दुख जो है स्त्रियों के मन में तो रहता ही है कि पूरा टाइम ठाकुर पुरुष भक्तों के साथ में ही बिताते हैं। तो जो भी है उस दिन ऐसा हुआ निस्तारिणी देवी के घर नवगोपाल बाबू के घर ठाकुर आए हैं और जैसे एक यूजुअली होता है कि बैठकखाना में भक्तों के साथ में घिर करके बैठेंगे वो नहीं करके सीधा जो अंदर महल है जहां पर स्त्रियां रहती है सीधा ठाकुर वहां पे चले आए और सीधा निस्तारिणी देवी के साथ में वार्तालाप कर रहा है। दिस इज वेरी अनयूजुअल। ठाकुर का यह सब जो कार्यक्रम होता है बड़ा पक्का होता है। वह कथामृत में वर्णन है कि एक दिन ठाकुर कोलकाता जा रहा है तो पहले इस भक्त के घर फिर इस भक्त के घर फिर इस भक्त के घर तो वो घोड़ा गाड़ी भी जो है वो घोड़ा गाड़ी को पहले से ही वो बोल दिया गया है कि तुमको निश्चित समय आ जाना है। तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि ठाकुर आज बड़ा बहुत व्यस्त है। उनका प्रोग्राम जो है एकदम टाइट है। आज की लैंग्वेज में जब हम खाएंगे उनका स्ेड्यूल जो है वो पूरा एकदम एकदम टाइट स्ेड्यूल है। सब जगह पे उनको जाना है। तो ठाकुर का ये सब फिक्स रहता था। तो सरप्राइजिंगली उस दिन निस्तारिणी देवी के घर गए सीधा अंदर महल जाकर के उनके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। और फिर वार्तालाप करतेकरते उन्होंने देखा कि वहां पे भगवान कृष्ण की एक छवि थी निस्तारिणी देवी के वहां पे। तो उनको पूछा कि अच्छा तुम क्या चाहती हो? तो निस्तारिणी देवी ने कहा कि मैं आपको श्री कृष्ण के रूप में दर्शन करना चाहती हूं। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है। इसके बाद में वो वहां पर वो बैठक खाने में चले आए और जैसे होता है दक्षिणेश्वर में भी कि वैसे तो मां को नहबत में ही रहना है। नृत्य कीर्तन चल रहा है। भजन गान चल रहा है। उपदेश परंपरा चल रही है। उपदेश प्रवाह चल रहा है। तो ठाकुर के कमरे में मां रहेगी नहबत में। किंतु क्या है कि वह जो पर्दा है बीच में उसमें छोटे से छेद में से मां सब दर्शन करती थी। तो यहां पर भी भले ही चाहे स्त्रियां अंदर महल में हो भले ही बीच में पर्दा हो किंतु पर्दे के होगा कुछ हाफ ट्रांसपेरेंट होगा ना कि जो भी है स्त्रियां उनका दर्शन कर रही थी तो देखा कि ठाकुर बैठकखाने में बैठे हैं किसी भक्त ने उनको माला पहनाई लंबी माला थी तो इस तरह की माला थी ठाकुर यदि खड़े रहेंगे उनके पैरों तक वो माला झूलती रहेगी और उसी अवस्था में वो वो ठाकुर को जैसे ही यह माला पहनाई साथ में ही ठाकुर समाधस्थ हो गए। अभी आपने यदि देखा होगा कि भगवान कृष्ण के कुछ छवि होती है। कुछ उनके उसमें भगवान कृष्ण को भी इस तरह की लंबी माला पहनाते पहनाई गई है। तो मंदिर में भी जहां पे विग्रह होगा उनको लंबी माला पहनाते हैं। तो ठाकुर को जैसे ही यह माला पहनाई गई ठाकुर साथ में ही समाधिस्थ हो गए। और जब निस्तारिणी देवी उनका दर्शन कर रही है तो एग्जजेक्टली ऐसा लगा कि ठाकुर की जगह भगवान श्री कृष्ण स्वयं साक्षात विराजमान है और वह स्वयं ही वहां पर समाधस्त हुए हैं। तो यह तो हो गया प्रथम दर्शन। इसके बाद में ठाकुर ने निस्तारिणी देवी को फिर से पूछा कि अच्छा तुमको भगवान कृष्ण का दर्शन हुआ तो अभी तो तुम्हारे मन को शांति हुई तो तो निस्तारणी देवी कहती है कि नहीं शांति नहीं हुई। मैं आपको राधा के रूप में देखना चाहती हूं। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है उसके लिए थोड़ा वेट करो। फिर एक दिन और ठाकुर इनके घर आए नवगोपाल बाबू के घर। उस दिन उन्होंने पूरा एक स्त्री का रूप धारण किया था। साड़ी पहनी थी। अलंकार पहने थे। वो मथुर बाबू ने वह जो सब ठाकुर की मधुर भाव की साधना के समय वो जो अलंकार वगैरह बना दिए थे। तो शायद वही वाले अलंकार होंगे। तो वो अलंकार पहन के साड़ी पहन के पूरा स्त्री की तरह वो उनका यह जो बाह्य व्यवहार है वो धारण करके ठाकुर इनके घर आए और फिर इस तरह से वार्तालाप कर रहे हैं जैसे कि एक तरुणी युवती अपने प्रियतम के पास में गहने मांग रही है। अलंकार मांग रही है। वो जैसे वो राधा और कृष्ण का जी भगवान कृष्ण की जो मधुर लीला होती थी श्रीमती राधिका की और भगवान कृष्ण की एग्जैक्टली वही मधुर लीला ठाकुर स्त्री वेश में आचरण कर रहे हैं। ऑलमोस्ट एक घंटे तक उन्होंने इस तरह से लीला की और निस्तारिणी देवी का हृदय उनकी यह राधा लीला देखकर के तृप्त हुआ। तो देखिए कि ठाकुर स्वयं सामने से चलकर के उनके घर जाते हैं। एक बार भगवान कृष्ण के रूप में उनको दर्शन दिया। दूसरी बार श्रीमती राधिका के रूप में उनको दर्शन दिया। मतलब आप समझ लीजिए कि उनकी ये जो आध्यात्मिक सिद्धि होगी मुमुक्षुत्व जो होगा ठाकुर के प्रति उनकी भक्ति होगी वो कितनी तीव्र होगी। तो यह तो हो गया ठाकुर के रहते रहते की घटना। उसके बहुत सालों के बाद में और एक घटना है उद्बोधन की ही घटना है पुजारी महाराज उद्बोधन के तो पूजा बाणेश्वर शिव की पूजा कर रहे हैं। छोटा सा वो एक लिंग होता है भगवान शिव का प्रतीक उस बाणेश्वर की पूजा करते हैं। एकाएक उनके हाथ से यह लिंग जो है वो फिसल गया और जमीन पर गिर गया। तो पुजारी महाराज तो बड़े ही भयभीत हो गए। एकदम दौड़ के वह जो शिवलिंग को फिर से अपने हाथ में लिया फिर से स्वच्छ करके पूजा करके वहां पर गौरी पट के ऊपर में स्थापित किया किंतु भय तो बैठ गया उनके हृदय में कि अरे मेरे से ऐसा क्यों हुआ अच्छा है कि किसी ने देखा नहीं कि कोई डांटेगा नहीं उनको बोलकर के वो थोड़े से आश्वस्त तो हुए किंतु दूसरे ही दिन यह निस्तारिणी देवी यही नवगोपाल बाबू की वाइफ वो वहां पर मां का दर्शन करने को आई और मां मां बातें कर रही थी किसी डिवोटी के साथ में तो उस समय यह निस्तारिणी देवी ने यह पुजारी महाराज को कहा कि अरे तुम्हारे हाथ से क्या बाणेश्वर शिव गिर गए थे क्या तो सुनकर के पुजारी महाराज तो इतने भयभीत हो गए कि अरे जब मैं पूजा कर रहा था उस समय तो वहां पर कोई नहीं था यह बात को तो किसी को पता नहीं है इनको कैसे पता चल गई यह तो उद्बोधन में भी नहीं थी उस समय तो उन्होंने पूछा कि हां मेरे हाथ से ऐसा ऐसा मेरे से यह अपराध हो गया था। मेरे हाथ से भगवान शिव गिर गए थे। तो किंतु आपको कैसे पता चला? तो उनस्तारिणी देवी कहती है कि मुझे स्वप्न में एक छोटा सा शिशु भगवान महादेव स्वयं एक शिशु का रूप धारण करके सर के ऊपर में छोटी-छोटी जटा है। व्याघ्र चर्म पहना हुआ है। एक शिशु की तरह आकर के शिशु जब मां को कंप्लेन करता है ना उसी स्वर में भगवान शिव निस्तारिणी देवी को कंप्लेन करके कहते हैं कि उन्होंने मुझे फेंक दिया। ऐसा करके कंप्लेन करते हैं। तो निस्तारिणी देवी कहती है मैं समझ गई कि वो क्या कहना चाहते हैं। तो अभी यह बात चल रही है। उस समय मां किंतु देखिए और किसी के साथ में बात कर रही थी किंतु मां पूरा सुन रही थी और अभी पुजारी महाराज को तो जो भय लग गया कि अभी मां यह इसके बारे में क्या कहेगी। पहले तो ऐसा हुआ यह अपराध तो अपराध को छुपाया। अभी छुपाने के बाद में और किसी के माध्यम से मां को पता चल रहा है तो वह तो अभी राह देख रहे हैं कि मां डांटेगी मां और किसी को बताएगी तो दूसरे लोग डांटेंगे हो सकता है कि उनको पूजा का काम ना देकर के और कोई काम दे दे उद्बोधन से जाने को कह दे तो पुजारी महाराज तो इतने डर गए हैं उस समय किंतु मां देखिए मां ये जो भगवान शिव के सामने देखकर के कहती है कि देखो बाबा तुम अष्टमूर्ति ते जगत छे रोए छो तुम अष्ट रूप में अपने अष्ट रूप में पूरे जगत को धारण किया है तुमने ए ओतो टुकु छले तो धरे रावे के मन को रे ये इतना तो बेचारा बच्चा है तुमको किस तरह से धारण करके रखेगा जैसे आश्चर्य की बात है ये भगवान शिव के अष्ट रूप की कल्पना यह अभिज्ञान शाकुंतलम में भी है कालिदास ने भी की है तो अष्ट ष्ट रूप में भगवान शिव पूरे जगत को धारण किए हुए हैं। तो यदि इतना विराट जिनका स्वरूप है तो यह पुजारी महाराज तो अभी यंग ही थे। अभी तो ज्वॉइ करने को आए थे। तो मां कहती है कि वो बच्चा बेचारा किस तरह तुम आपको धारण करके रखेगा। तो जब मां ने ऐसा कहा तब पुजारी महाराज को थोड़ा सा सा मिली और फिर उन्होंने मां को प्रणाम किया। तो देखिए कि इस तरह से नीरद महाराज की मां को दर्शन होते थे। एक दिन उनको और एक दर्शन हुआ। उद्बोधन की ही बात है। रात को सपना आया कि मां शारदा स्वयं आकर के उनको कहती है कि उनका दंत मंजन जो है उस समय तो वो पाउडर आता था ना दांत साफ करने के लिए। तो वो दंत मंजन जो है उनका खत्म हो गया है। तो वो ले आओ। वो मां कहती है कि मुझे दंत मंजन चाहिए। तुम ले आओ मेरे लिए। तो दूसरे दिन नीरज ये निस्तारिणी देवी उद्बोधन आई दंत मंजन लेकर के टूथ पाउडर लेकर के और आकर के मां को कहती है कि मां तुमने स्वप्न में आकर के मेरे से यह मांगा था तो मैं ले आई हूं। तो उद्बोधन में बाकी सब जो थे वो हंसना शुरू कर दिए। अभी उद्बोधन की इतनी बुरी अवस्था तो नहीं है कि एटलीस्ट मां के लिए दांत का पाउडर जो है दंत मंजन जो है वो मां को किसी से मांगना पड़े। अभी तो अच्छे से सब व्यवस्था है। मां जो मांगेगी सब मां को मिल जाएगा। तो मां ने स्वप्न में जाकर के समथिंग सो कॉमन प्लेस इतना सामान्य एक चीज है टूथ पाउडर वो मां ने उनसे मांगा। ऐसा बोलकर के सब हंसने लगे। मां भी हंसते-हंसते कहती है हां अरे मैं क्या करूं? मैं सही में दंत मंजन जो है मेरा खत्म हो गया है। तो देखिए कि दिस इज निस्तारिणी देवी जो मां को यह वहां पर इतने दर्शन जो हुए थे वृंदावन में उसमें से यह एक दर्शन था कि वही निस्तारिणी देवी राधा रमण के मंदिर में विग्रह के पास में खड़ी रहकर के चामर व्यंजन कर रही है। और फिर मां योगेन मां को कहती है कि देखो कि नवगोपाल की स्त्री है बड़ी शुद्ध है। मैंने ऐसा ही देखा। इसके बाद की जो घटना है अभी मां के जब नेक्स्ट क्लास करेंगे मां का उसमें देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु