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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्राणों की पुकार || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 8 Jan 2025

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः ठाकुर के जीवन के मैंने जीवन पढ़कर के ठाकुर का वैसे तो एक लाइफ जो होता है वो तो एक सतत प्रवाह में ही बहती रहती है किंतु हम लोग अपनी अंडरस्टैंडिंग के लिए उसको कभी किसी किसी डिवीजन में डिवाइड करते हैं जिससे कि क्या होता है कि हमको वो जीवन को उस जीवन के रिलेटेड प्रसंग को उस समय के रिलेटेड प्रसंग को समझने में सुविधा हो तो ठाकुर के जीवन को मैंने मेजर तीन डिवीजन में चार डिवीजन में डिवाइड किया है उसमें सर्वप्रथम तो है बाल्य पर्व ठाकुर का कमार पुकुर में जन्म हुआ भूमि पर अवती हुए 1800 36 में और फिर जो कमार पुकुर में बाल्य लीला हुई और तब से लेकर के जब तक वह कलकत्ता न आ गए 18544 के आसपास में वह कोलकात्ता आए थे तो यह 1836 से यह 18544 के आसपास का यह जो समय है जब ठाकुर कलकाता आए इस पीरियड को मैंने अपने मेरी जो स्कीम ऑफ डिवीजन है उसमें मैंने नाम दिया है बाल्य पर्व फिर र जब कलकत्ता आए और फिर साधना में डूब गए एक के बाद एक पहले तो अपने ही मन से उन्होंने अपने ही अंतर के आकर्षण से मां जगदंबा का नाम लेना शुरू किया ईश्वर के आक ईश्वर के दर्शन के लिए वह व्याकुल होने लगे और फिर बाद में एक के बाद एक गुरु आते गए और उनको और उस साधना में उन्होंने सिद्धि प्राप्त की तो यह जो सेकंड पर्व है कलकत्ता आने के बाद का कलकत्ता में दक्षिणेश्वर काली मंदिर में उन्होंने युगवतार की और साधना हों में सिद्धि प्राप्त करना शुरू किया उस पीरियड का मैंने नाम दिया है साधन पर्व तो पहला हो गया बाल्य पर्व दूसरा है साधन पर्व उसके बाद में देखिए कि का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ मां के आगमन के बाद में ठाकुर ने अपनी साधना की परि समाप्ति मां की सड़सी पूजा करके की और अपनी जो जपमाला थी मां को अर्पण कर दी उन्होंने तो यहां पर ठाकुर के साधन पर्व का अंत आता है और एक नया पर्व प्रारंभ होता है इस पर्व में जैसे कि ठाकुर उनके भीतर का यह जो साधन लब्ध यह जो आध्यात्मिक आनंद है वह आनंद उन्होंने जैसे कि चारों ओर शेयर करना शुरू किया चारों ओर उसका प्रवाह बहाना शुरू किया और जैसे कि ठाकुर कहती है जब फूल खिलता है तो उसकी सुवास से मधुमक्खी अपने से ही आकर के फूल के ऊपर में मंडराने लगती है तो यहां पर भी ठाकुर की साधना की सिद्धि की सुवास से उसकी फरम से यह कलकत्ता के जितने भी जो अपना की डेमोग्राफी है मिडल क्लास एजुकेटेड यूथ वो ठाकुर के प्रति आकर्षित हुए ठाकुर के चरणों में उन्होंने पदार्पण किया और फिर दक्षिणेश्वर में जैसे कि आनंद की हाट ठाकुर ने बहा दी थी मुहूर मुह भाव और समाधि फिर कीर्तन भजन और ठाकुर का कथामृत ये एक के बाद एक चलता ही रहता था और जितने भी अध्यात्म पिपासु भक्तगण थे ठाकुर के समीप बैठ कर के ठाकुर के कथामृत का भजन कीर्तन नृत्य जनित भाव प्रवाह का वह आनंद उठा रहे थे अपने को आध्यात्मिक रूप से परिपट्स आहार या तो आध्यात्मिक आहार करके यह लोग अपने मन को पुष्ट बनाते रहे तो वह पीरियड उसका नाम मैंने दि दिया है आनंद पर्व और फिर आखिर में 1885 के ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के सीजन में ठाकुर के गले में वेदना प्रथम शुरू हुई जिसका कि बाद में निदान किया गया कि यह कैंसर है तो यह कैंसर का प्रारंभ से लेकर के ठाकुर की महासमाधि तक का जो पीरियड है वह एक बड़ा ही विशिष्ट पीरियड है हमारे पूरे संघ के लिए यदि हम आनंद पर को अपने संघ का सुवर्ण युग कहेंगे तो यह जो 2 साल के आसपास का समय है डेढ़ साल ना कि एक साल के आसपास का समय ग्रीष्म ऋतु से चालू करके 1885 अगस्ट 18864 महीने का यह जो पीरियड है अंदाजी गिन कर के कहता हूं ये यह पीरियड इस तरह से इंपॉर्टेंट है कि ठाकुर ने अपना जो सही स्वरूप है वो भक्तों के सामने प्रकट किया क्योंकि अब तक तो ठाकुर को कोई जद कहता ठाकुर खुद कहते थे कि गुरु बाबा और कर्ता यह तीन यदि कोई मुझे कहता है तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरे देह में कोई कांटे मार रहा है कांटे चुभा रहा है ऐसा मुझे प्रतीत होता है यानी कि ठाकुर हमेशा चाहते थे कि वह काली के भक्त है बालक है ऐसे ही लोग उनको ट्रीट करें और उनकी श्रद्धा और भक्ति मां काली की ओर ही हो को किंतु यह जो आखिरी पर्व है ऑलमोस्ट 12 13 14 महीने का उस पर्व में ठाकुर ने अपना जो पृथ्वी पे आने का सही कारण है उसको प्रकट करना शुरू किया और उन्होंने धीरे-धीरे करके अपने मुंह से नहीं मुंह से यदि बताएंगे कि हां मैं अवतार हूं तुम मेरी आराधना करोगे तो तुम मुक्त हो जाओगे ऐसा नहीं कह कर के पहले तो एक तरह का फिल्टरेशन किया लो बाछा यर जन्नो ठाकुर कहते हैं कैंसर क्यों हुआ लोक बाछा यर जन्नो अर्थात कि लोगों को फिल्टर करने के लिए जो लोग ठाकुर को एक गुरु के रूप में ही आचार्य के रूप में ही जानते थे ठाकुर के पास से आध्यात्मिक साधना सिख करके खुद मेहनत करके साधना करेंगे ऐसा समझने वाले लोग थे वो लोग धीरे-धीरे करके ठाकुर से दूर चलते गए और ठाकुर ही जैसे कि राम और कृष्ण जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण जो राम थे जो कृष्ण थे वही इस राम कृष्ण देह में फिर से व सनातन नारायण युग पुरुष फिर से इसी देह में अवतरित हुए हैं यह मानने वालों का एक छोटा सा सर्कल ठाकुर के साथ में रह गया जिनको कि ठाकुर अपने अंतरंग शिष्यों के रूप में गिनते थे और इ इन अंतरंग शिष्यों को भी देखिए यदि ठाकुर ने आनंद पर्व में लोगों को सबसे म महत्त्वपूर्ण शिक्षा दी हो तो जैसे कि मां की खुद की वाणी के हिसाब से हम मान लेते हैं जो केदार बाबू ने मां को पूछा था कि क्या सर्व धर्मों का समन्वय करने के लिए ही तो ठाकुर का आगमन हुआ था इस बार तो माने कहा नहीं त्याग का आदर्श फिर से प्रतिष्ठित करने के लिए ठाकुर का इस बार आना हुआ था तो आनंद पर्व में ठाकुर का जद सबसे महत्त्वपूर्ण उपदेश जद त्याग है त्याग था तो यह जो आखिरी पीरियड है ठाकुर के जीवन का इस पीरियड में ठाकुर का सबसे महत्त्वपूर्ण उपदेश था कि हम जो अपनी मुक्ति कामना करते हैं उससे भी परे जाइए उसके लिए मैं मेहनत करके त्याग करूंगा तपस्या करूंगा साधना करूंगा यह सब आप मत सोचिए कि त्याग तपस्या साधना करने की क्षमता हम लोगों में है यह क्षमता तो ईश्वर ही देते हैं और ईश्वर को शरणागत होना या तो फिर ईश्वर के प्रतिनिधि श्री राम कृष्ण को शरणागत होना वही साधक के राम कृष्ण देव के जो भक्त है उनके जीवन का सर्वप्रथम कर्तव्य है तो यह संपूर्ण शरणागति या तो फिर जैसे नरेद के केस में इंडिविजुअल के केस में ठाकुर ने कहा था कि निस्वार्थ ही और खुद की मुक्ति के ऊपर जैसे ज्यादा बड़ी है तो ये संपूर्ण शरणागत और संपूर्ण निस्वार्थ होता यह दो टॉपिक या दो उपदेश ठाकुर ने अपने आखिरी समय में दिए थे देखिए कि यदि यह आखिरी पीरियड है उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण घटना कौन सी कही जाएगी तो 1 जनवरी 18864 चैतन्य होग तुम सबको चैतन्य प्राप्ति हो आध्यात्मिक उपलब्धि हो यही मैं आशीर्वाद करता हूं इसके अलावा मैं और क्या कहूं तो यह जो ठाकुर ने सबको स्पर्श करके आध्यात्मिक अनुभूति करवाई इसके पीछे का हिस्ट्री क्या है व भी हमने एक बार डिस्कस किया था कि गिरीश घोष देखिए ठाकुर के पास में दो तरह के भक्त तो आते थे यह तो हमको पता है कि एक तो थे त्यागी संतान जिसको कि ठाकुर ने तपस्या करने को कहा यदि ईश्वर प्राप्ति करनी है तो तुम लोग तपस्या करो साधन भजन करो कठोरता करो यह इंद्रिय संयम करो यह बात ठाकुर ने अपने त्यागी संतानों को कही थी और जो गृहस्थ संतान थे उनको ठाकुर ने कहा था कि ताली बजाते बजाते हरि नाम करो इसीलिए जब काकड़ काछी जहां पे रामचंद्र दत्त का जो उद्यान था काकुर्गाची जहां पे उन्होंने ठाकुर के अस्थियों की स्थापना की और वो वहां प एक आश्रम चालू किया तो उनका एक महत्त्वपूर्ण कार्य था किय नगर कीर्तन करना चैतन्य देव की तरह खोल करतार लेकर के भक्तों का दल नगर में कीर्तन करता करता घूमेगा तो यह हरि नाम करना ताली बजाते बजाते जिससे कि यह पाप रूपी पंखी उड़ जाए तो यह ठाकुर ने गृहस्थ को कहा था गृहस्थ के लिए भक्ति और त्यागी संतानों के लिए ज्ञान ज्ञान और भक्ति ये दो पथ ठाकुर ने अपने वो आनंद पर्व में बताए थे किंतु देखिए कि यह गिरीश घोष इज अ यूनिक कैटेगरी है यह दो कैटेगरी यदि आप देखेंगे त्यागियो की कैटेगरी भक्तों की कैटेगरी गृहस्थ भक्तों की तो उसमें जब गिरीश घोष का जो आगमन हुआ इज यूनिक इन हिमसेल्फ ठाकुर ने जब गिरीश को गिरीश ने जब ठाकुर को पूछा पहले तो बहुत सारा झगड़ा किया ठाकुर के साथ में फिर ठाकुर पर विश्वास हो गया तब ठाकुर को पूछा कि महा मेरे लिए उपाय क्या है तो ठाकुर ने क्या कहा कि देखो सुबह शाम एक बार हरि नाम करना एक बार ईश्वर का नाम लेना तो फिर गिरीश घोष चिंतन में पड़ गया कि अरे सुबह शाम कब उठता हूं कब सोता हूं लाइफस्टाइल तो पूरा उसका आउट ऑफ डिसिप्लिन है किस तरह से सुबह शाम में ईश्वर का नाम लूंगा तो वो सोच रहा है ठाकुर उसके चेहरे का भाव समझ गए तो कहा कि अच्छा चलो सुबह शाम नहीं हो तो खाने के पहले एक बार नाम ले लेना खाना तो प्रतिदिन खाना ही है तो उसमें भी गिरीश बेचारा चिंता में पड़ गया अन्य मनस्त यानी कि एब्सेंट माइंडेड होकर के खाता है खाता खाना अधूरा छोड़ कर के हो सकता है कि कहीं पर चले जाना पड़े ये कोर्ट के केसेस चल रहे हैं नाटक वगैरह नए बनाने हैं तो खाने में भी तो उसका यह कुछ ठीक नहीं है तो कैसे मैं यह वचन दे दूं कि खाने से पहले मैं हरि नाम करूंगा तो ठाकुर ने अगेन चेहरे का भाव समझ कर के ठाकुर ने कहा तो फिर मुझे बकल मा दे दो पावर ऑफ एटर्नी दे दो तुम्हारा भार मैं लूंगा तो य गिरीश ने यह भार तो दे तो दिया ठाकुर को किंतु फिर आखिर आखिर में कहता है गिरीश कि देखो कि मैं ठाकुर का पहले कहा अनुसार हरि नाम लेकर के सुबह शाम खाने के पहले मैं यदि मैंने स्वीकार कर लिया होता तो वहीं पर वो मामला समाप्त हो जाता हरि नाम लिया बात खत्म हो गई किंतु ठाकुर को अपने जीवन की चाबी दे देना अपने जीवन का सर्वस्व समर्पण कर देना इस अभी यह प्रॉब्लम है कि अभी ठाकुर से पीछा छुड़ाना असंभव है प्रत्येक क्षण प्रत्येक सांस के साथ में प्रत्येक कार्य के साथ में ठाकुर जैसे बुने हुए हैं जैसे ठाकुर कहेंगे वैसे ही मुझे करना है पत्नी की पुत्रों की संतानों की मृत्यु होने पर भी शौक नहीं कर सकते ठाकुर की आज्ञा लेकर के शौक करना है कोई भी कार्य प्रारंभ करना है तो ऐसा नहीं सोच सकते कि मैं कर रहा हूं कहना पड़ेगा कि ठाकुर की क्या इच्छा है ठाकुर आज्ञा देते हैं कि नहीं उनकी सहमति है कि नहीं तो यह संपूर्ण शरणागति अभी देखिए यही बात किस तरह से ये आखिरी पर्व में प्रतिफल होती है जब ठाकुर को एक दिन काशीपुर में थोड़ा सा अच्छा महसूस हो रहा था पहली जनवरी को वह अपने कमरे में से जमीन बागान में टहल रहे हैं सामने गिरीश बैठा है तो गिरीश को ठाकुर ने पूछा कि क्या रे तुम यह सब क्या कहते घूमते हो लोगों को मेरे बारे में अभी देखिए कि गिरीश को ही पूछा यह रामचंद्र दत्त को नहीं पूछा वो भी तो अवतार बोलकर के सबसे पहले प्रचार करना शुरू किया था उसको नहीं पूछ कर के गिरीश को पूछा कि तुम मेरे बारे में यह किस तरह का प्रचार करते हो अवतार वगैरह वगैरह साथ-साथ में ही गिरीश ठाकुर के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम करके प्राणतल जिसकी महत्ता का गुणगान करते थक जाते हैं नहीं कर पाते हैं उनकी मह का गुण मैं कैसे गाऊंगा तो वैसे ही ठाकुर यह ट्रिगर ठाकुर इमीडिएट भाव में जाकर के कहे कि आमी आशीर्वाद करी तो मादर सकल चैतन्य होक तो यह जो घटना है जिसको कि बाद में रामचंद्र दत्त ने कल्पतरू बोलकर के एक घोषित किया और उसका सेलिब्रेशन करना स्टार्ट किया और आज भी अभी रामकृष्ण संघ में इस घटना को कल्पतरु के रूप में ही पहचाना जाता है ठाकुर इस तरह के एक कल्पतरु हो गए कि जो वां छा है अपनी जो इच्छा है ठाकुर हमको देंगे किंतु इस घटना का शरत महाराज लीला प्रसंग में किस तरह से अर्थ घटन कहते करते हैं शरत महाराज कहते हैं कि इस घटना को कल्पतरु उत्सव नहीं कह के ठाकुर कल्पतरु हुए हैं ऐसा कहना उचित नहीं है क्योंकि कल्पतरु के पास में आप जो भी मांगेंगे अच्छा या बुरा वो दोनों आपको मिल जाएगा यदि कोई कल्पतरु वृक्ष के पास में जाकर के कहता है मुझे बहुत सारा धन चाहिए बहुत सारा पावर चाहिए बहुत सारे मेरे दुश्मन है उनका मैं व विनाश करना चाहता हूं जो भी मांगेगा वोह मिल जाएगा ठाकुर तो इस अर्थ में कल्पतरु नहीं हुए ठाकुर तो आध्यात्मिक आशीर्वाद देने वाले हुए हैं यहां पर तो उस अर्थ में कल्पतरु नहीं कहके इनका इस घटना का सही सही नाम होना चाहिए आत्म प्रकाश अभय आत्मप्रकाश पूर्वक ठाकुर ने हमको अभयदान दिया किस तरह से ठाकुर ने आत्मप्रकाश किया देखो गिरीश को किस तरह से गिरीश के सामने ठाकुर ने अपना स्वरूप किस तरह से प्रकट किया और नरेंद्र के सामने अपना स्वरूप किस तरह से प्रकट किया वही आखिरी समय की ही घटना ठाकुर अपनी मृत्यु शैया पर है जीवन धीरे-धीरे जीवन दीप धीरे-धीरे बुझ रहा है उस समय नरेंद्र पास में बैठ करके सोचता है कि यदि इस समय इस अवस्था में वह कहे कि वह अवतार है तो मैं मानू इमीडिएट ठाकुर ने नरेंद्र के मन का भाव समझ कर के कहा जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिए नाई जो राम थे जो कृष्ण थे आज वही राम कृष्ण रूप में अवती हुए हैं किंतु वेदांत की दृष्टि से नहीं वेदांत कहता है कि हम सबके भीतर में वही आत्मन वही ब्रह्मण है जो कि भगवान राम भगवान कृष्ण के भीतर था इस दृष्टि से सभी ब्रह्मण की ही एक एक किरण है वो चाहे भगवान राम हो हम हो ना कि एक पत्थर हो तो सभी के भीतर में ब्रह्मण की किरण वही है किंतु वही है कि शक्ति का तारतम्य है कहीं पर ब्रह्मण का मेनिफेस्टेशन ज्यादा है कहीं पर कम है तो यह वेधांत की दृष्टि से नहीं सही सही में जो राम थे जो कृष्ण थे वो अवती हुए हैं तो इस तरह से उन्होंने नरेंद्र को बताया अपना सही स्वरूप और गिरीश को इस तरह से बताया गिरीश ने जैसे ही कहा कि व्यास और वाल्मीकि जिसकी महत्ता का गुणगान करते थक जाते हैं उसका अंत नहीं पाते हैं उसके सामने मैं कौन हूं व्यास और वाल्मीकि ने किनका गुणगान गाया है तो वही भगवान राम और भगवान कृष्ण का तो जैसे ही ठाकुर ने यह बात सुनी वैसे ही भाव में जाकर के वही व्यास और वाल्मीकि के पूजनीय देवता से राम और कृष्णा उनका यह जो आविर्भाव भाव उनमें हुआ और उन्होंने सबको स्पर्श करके चैतन्य देना शुरू किया तो देखिए कि आत्मप्रकाश से अभयदान गिरीश को भी उन गिरीश के भी सामने उन्होंने अपना आत्मप्रकाश किया और नरेंद्र के सामने भी आत्मप्रकाश किया और कहा कि आनंद पर्व में जो ठाकुर का मुख्य उपदेश था कि त्यागी भक्तों के लिए ज्ञान और गृहस्थ भक्तों के लिए भक्ति तो ज्ञान और भक्ति ये जो दो मुख्य उपदेश थे आनंद पर्व में तो ये जो आखिरी पर्व है उसको यदि मैं नाम देता हूं आत्म प्रकाश पर्व तो ये आत्म प्रकाश पर्व में ठाकुर ने कहा कि आपकी खुद की क्षमता कितनी है साधन भजन करने की जैसे ही आपके मन में यह भाव आएगा कि मैं साधना कर रहा हूं मैं भजन कर रहा हूं मैं यहां पर जब ध्यान कर रहा हूं मैं अपनी इंद्रियों को संयमित कर रहा हूं मैं त्यागी हूं और साथ-साथ में ही यह एक दूसरा भी भाव आएगा कि मैं यदि त्यागी हूं तो दूसरे लोग काम कामक है लोभी है इस संसार में फंसे हुए हैं उनसे मैं श्रेष्ठ हूं ये इमीडिएट ये सुपीरियोर कॉम्प्लेक्शन और इनफीरियर कॉम्प्लेक्शन भाव ये दोनों एक दूसरे के साथ में जुड़े हुए हैं और साधन के राज्य में यह सुपीरियोर इनफीरियर कॉम्प्लेक्शन लेते हैं जैसे कि हमारा गला पकड़ लेते हैं हम साधन भजन में थोड़ा सा सक्सेसफुल होना शुरू हुए वैसे ही यह सुपीरियोर भाव अपने में आ गया किसी भी तरह का मुझ पर आक्रमण हो तो उसका मुझे कोई भी उत्तर नहीं देना है बिल्कुल मुझे बेचारे की तरह रहना है तो यह एक हीन भाव या तो फिर यह इनफीरियर कॉम्प्लेक्शन करना कि मैं सुपीरियर हूं उनसे तो यह इफरिट कॉम्प्लेक्शन ज जतन करना ईर्षा का पालन करना यह मैं अच्छा वो मेरे से ज्यादा आगे बढ़ जा रहा है वो क्या मेरे से ज्यादा बड़ा है तो इमीडिएट उसका उसको पीछे उसका पैर खींच करके जमीन पर लाने कि वो एक भावना ईर्षा मन में खड़ी हो जाती है ईर्षा के बारे में स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि देखो कि भारतवर्ष की क्या अवस्था है कि जैसे वोह जो कुछ ककड़े होते हैं उनको एक काच की बोतल में रख दिया जाए तो उसमें से एक केकड़ा यदि ऊपर आने को प्रयास करता है तो बाकी सब उसके पैर खींच करके उसको जमीन पे पटक देते हैं क्यों वो हमसे ऊपर जाएगा हम यदि हीन अवस्था में जी रहे हैं तो हमारी तरह सभी को हीन अवस्था में जीना होगा तो ये सुपीरियोर कॉम्प्लेक्शन ये घमंड या तो फिर ये हीन भाव ये दोनों फटाफट करके आ कर के हमारे हृदय को जैसे कि पकड़ लेते हैं हमारे गले को जैसे की पकड़ लेते हैं और हमको समझ में ही नहीं आता कि इससे कैसे बचा जाए इससे कैसे दूर हुआ जाए तो ये प्रॉब्लम हमारे साथ में ना हो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि यह कताप भी मत रखो कि हां मैं साधन भजन कर रहा हूं मैं त्याग कर रहा हूं मैं तपस्या कर रहा हूं मैं प्रतिदिन सुबह को यह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर के मंदिर में जाकर के और यदि मंदिर में ना जा सकूं तो एटलीस्ट अपने घर में जो न है उसके सामने बैठ कर के मैं ठाकुर का नाम लेता हूं प्रतिदिन में यह सत ग्रंथ का पाठ करता हूं यह घमंड कहीं अपने में ना आ जाए और यदि मैंने ठीक किया कि नहीं मुझे साधना करनी है और मैं किसी तरह का प्रतिकार नहीं करूंगा संपूर्ण रूप से अहिंसा का पालन करूंगा या तो फिर संपूर्ण रूप से मैं निर्विकार होकर के रहूंगा उस समय यदि दूसरे लोग अपने पर घमंड करना शुरू कर दे दूसरे लोग आकर के हमारे पर ये हुकम चलाना शुरू करें तो भीत र से बड़ा भयानक रिएक्शन आता है और सिर्फ यही नहीं दूसरों को यदि हम अपने से आगे जाते देखना शुरू करें तो उनके प्रति ईर्षा का उदय होता है ये दोनों ना आए इसके लिए यह कताप भी हमको छोड़ देना है कि मैं जब ध्यान कर रहा हूं और करके मैं ईश्वर प्राप्ति करूंगा वो ईश्वर प्राप्ति कोई ऐसा नहीं है कि बाजार में गए 50 ना कि जितना आजकल का रेट है वो देकर के एक किलो टमाटर खरीद के ले आए तो ऐसा वो भावता करने से ईश्वर नहीं मिलने वाले हो सकता है कि किसी किसी को कोटि कोटि जन्म की तपस्या करनी पड़े तब कहीं जाकर के कुछ उनको आध्यात्मिक उपलब्धि हो और हो सकता है कि किसी किसी को क्षण भर में यह हो जाए यह दोनों कहानियां ठाकुर कहते हैं कि कुछ ऋषि मुनि वहां पर पेड़ के नीचे बैठ कर के तपस्या कर रहे थे नारद मुनि वहां से जा रहे हैं तो उसमें से एक ऋषि ने पूछा कि अच्छा नारायण के दरबार में जा रहे हैं उनको पूछिए हम इतने सालों से कर रहे हैं तपस्या तो अभी और हमको कितना करना है तो नारद मुनि जाकर के वापस आए और फिर वो साधुओं को कहा कि अच्छा देखिए नारायण का कहना है भगवान का कहना है कि इस पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते दिखते हैं उतने जन्म आपको तपस्या करनी पड़ेगी तब कहीं जाकर के आपको मुक्ति होगी तो उसमें से एक साधक था तो बड़ा ही बेचारा डिप्रेशन में चला गया अरे इतनी तो तपस्या की और इतने कोट कोटि जन्म तपस्या करनी है पता नहीं पेड़ प कितने ये वो पत्ते हैं इतने जन्म तपस्या करनी है हाय रे और दूसरा साधु वहीं पर बैठा था किंतु देखिए उसका क्या एटीट्यूड था ग्लास हाफ फुल ग्लास हाफ एमटी तो उसने कहा कि अरे इतने जन्मों के बाद में तो किंतु मुझे ईश्वर प्राप्ति होगी तो मतलब गारंटी है कि ईश्वर प्राप्ति इतने जन्मों के बाद में तो होगी ही होगी तो वो खड़ा होकर के नाचने लगा तो देखिए कि किसी-किसी के साथ ऐसा भी होता है और एक दूसरी कहानी ठाकुर कहते हैं कि एक आदमी जा रहा था रास्ते में स्मशान दिखा देखा कि श साधना करने के लिए एक साधक ने सब तैयारियां कर दी है शब पड़ा हुआ है पूजा के सभी उपकरण पड़े हुए हैं वो जैसे ही शब पर बैठ कर के जप करने का प्रारंभ कर रहा था शेर आया उसको लेकर के खा गया तो उस इस आदमी जो रास्ते से जा रहा था उसने देखा कि अरे सब कुछ साधन सामग्री तैयार पड़ी है तो मैं जाकर के साधन कर लेता हूं जप कर लेता हूं वो जैसे ही शब पर जाकर के बैठा और जप करने का प्रारंभ किया वो मां जगदंबा प्रकट हुई कहती है कि बेटा जो वरदान चाहे मांग लो तो ये साधक पहले पूछता है कि अच्छा मां यह बताओ कि जो वो था जिसने कि ये सब मेहनत करके यह सब तैयार किया उसको शेर आ कर के ले गया और मैंने कुछ नहीं किया जस्ट मैं अभी बैठा हूं और अभी मुझे वो आशीर्वाद दे रही हो माजरा क्या है इसके पीछे में व्हाट इज द इनर स्टोरी इसके पीछे में सीक्रेट क्या है तो मां ने क्या कहा कि बादशाह तही जन्मांतर कथा जानिश ना अर्थात कि पूर्व पूर्व जन्मों की बात अभी तुमको पता नहीं है पहले तुमने बहुत बहुत तपस्या कर ली थी अभी तुमको बस थोड़ा सा बाकी था तो इससे तुम्हारा हो गया तो देखिए कि ये तपस्या साधना साधन भजन पता नहीं कितने जन्मों के बाद में मिलेगा नहीं भी मिलेगा यह तो कोई आपको बाजार में जाकर के खरीद लेना है ऐसा तो है नहीं तो बेटर है कि मैं तपस्या कर रहा हूं मैं साधन भजन कर रहा हूं यह घमंड भी ना रख है बेटर है कि संपूर्ण रूप से शरणागत हो यदि हमारा भक्त का एटीट्यूड है और यदि ज्ञानी का एटीट्यूड है तो संपूर्ण रूप से निस्वार्थ हो जाए स्वार्थ रहित हो जाए मुझे साधन भजन करके तपस्या करके ईश्वर प्राप्ति करनी है यह मेरा स्वार्थ भी छोड़ देना है जगत कल्याण के लिए जो करना है वो मैं करूंगा मेरे इस क्षुद्र जीव से जीवन से ये दोनों हाथों से मुझसे जो सेवा होगी बन पड़ेगी वो मैं करूंगा मेरा जीवन मैं दूसरों के लिए अर्पण करता हूं यह जीवन प्रदीप जो है मेरा उससे मैं दूसरों को उजाला दूंगा भले ही चाहे मेरे खुद के जीवन में अंधेरा क्यों ना हो तो यह संपूर्ण रूप से निस्वार्थ का यह हमको ठाकुर ने यह आत्मप्रकाश पर्व में सिखाया है तो देखिए कि ये आत्म प्रकाश पर्व इसका प्रारंभ अभी यहां पर हो रहा है हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर को वहां पर चिकित्सा के लिए कलकत्ता लाया गया मां को भी आखिर में बुलाना प पड़ा और मां और ठाकुर अभी वहीं पर रह रहे हैं और मां ठाकुर की सेवा कर रही है इसके बारे में अभी गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं वह थोड़ा सा हम आगे देखते हैं कल का जो पैराग्राफ था उसका लास्ट लाइन में फिर से एक बार पढ़ लेता हूं पुस्तक का नाम है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित श्री मां की जीवनी चैप्टर है प्राण टान और उसका ये जो कल का जो पाठ किया हुआ पैराग्राफ उसका आखिरी लाइन है कार्यत देखा गेलो जे आह्वान आशीवाद संगे संगे तीनी बिंदु मात्र तस्त तो ना करिया श्याम पुकुरे आगमन पूर्वक निर्दिष्ट कर्तव्य रोतो होलेन मां दक्षिणेश्वर में थी सोच रही थी कि ठाकुर की सेवा करने का यह जो एक मेरे पास में आखिरी जो संबल था जीवन का साधना का वह भी चला गया किंतु ठाकुर को श्याम पुकुर लाने के बाद में भक्तों को पता चला कि यदि उनके आहार के लिए बंदोबस्त करना है तो मां को बुलाना पड़ेगा मां को कहा गया और वो फिर हमने काफी डिस्कस किया था ठाकुर को सबसे पहले पूछा गया कि मां यहां पर आके रहेगी कि नहीं तो ठाकुर ने क्या कहा कि उस उसको सब कुछ बताओ और फिर देखो यदि उसकी इच्छा है तो आकर के यहां पर रहे तो यह भी हमने देखा कि किस तरह से पाणी हाटी वाले महोत्सव के साथ में इसका कंट्रास्ट वहां पे ठाकुर ने जैसे इस तरह से ऐसे कहा कि क्योंकि उनकी इच्छा नहीं थी कि मां वहां पर आए यहां पर ठाकुर का खुद का स्वार्थ नहीं था मां के ही भविष्य के कल्याण के लिए और संघ के कल्याण के लिए उन्होंने यह सोचा था तो वहां पर ठाकुर ने निस्वार्थ होकर के सोचा था कि मां की जद इच्छा है तो आए यहां पे क्योंकि ठाकुर का खुद का स्वार्थ है ठाकुर की खुद की सेवा करने के लिए मां को बुलाया जा जा रहा है इसलिए ठाकुर ने एकदम आग्रह पूर्वक नहीं कहा कि हां हां उसको बुलाओ यहां पर भी ठाकुर अपना स्वार्थ सिद्धि ना हो इस के लिए ठाकुर कहते हैं कि यदि उसकी इच्छा है तो आए और दोनों केसेस में मां ने किस तरह से डिसाइड किया था वहां पर मां का खुद का स्वार्थ था पाणी हाटी जाने का इसलिए मां नहीं गई ठाकुर की आज्ञा का पालन किया जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि मत आओ एक दूसरे शब्दों में और यहां पे श्याम पुकुर में ठाकुर के जो कहने का जो तात्पर्य है उसको दूसरे अर्थ में लेकर के मां यहां पे आई क्योंकि यहां पर मां का खुद का स्वार्थ नहीं था वहां पे मां का स्वार्थ था ठाकुर का स्वार्थ नहीं था यहां पर ठाकुर का स्वार्थ था मां का स्वार्थ नहीं था मतलब बात एक ही तरह की की है किंतु इन दोनों में जो कंट्रास्ट है वो कितना गंभीर है ये दोनों का एनालिसिस करते जाएंगे अपने पास में शब्द कम पड़ जाएंगे अपने पास में यह बुद्धि काम करना बंद कर देगी इतना इसमें डेप्थ है और भविष्य में भी जभी जभी इस तरह का कोई प्रसंग आएगा उसको हम और ज्यादा डिटेल में डिस्कस करें अभी थोड़ा सा मैं आगे पढ़ता हूं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं अभी ये श्याम पुकुर का जो मकान है श्याम पुकुर का जो घर जहां पर ठाकुर रह रहे थे उसका एक पूरा वर्णन है तो मैं क्या करूंगा कि पहले यह वर्णन पूरा में बंगाली में पढ़ लूंगा फिर उसी वर्णन का मैं हिंदी भी पढ़ लूंगा क्योंकि यह सब वर्णन ही है इसमें और अभी कुछ नहीं है तो गंभीरानंद जी महाराज घर का जो पूरा नक्शा किस तरह से कौन से चीज कहां पर थी कौन सा कमरा कहां पर था यह सब बताते हैं श्याम पुकुरे ई 55 नंबर बाड़ी पूर्व पश्चिम में दीर्घ श्यामपुकुर स्ट्रीट उत्तर पार्श्व अवस्थित उत्तर मुखे बाटी ते प्रवेश करिया उभ द के बसी बार ताल और स्वल्प परिसर रोया देखा जातो उहा छाड़ इया अग्रसर होलेई दक्षिण तले उठी बार सीढी और समुख के उठान उठाने पूर्व दखे दुई तीन खानी खुद्रो कोर ऊपरे उठ दक्षिण भागे उत्तर दक्षिणे बस्त तो एक खानी लंबा घर साधारण जनने निर्दिष्ट छलो बाम भागे पूर्व पश्चिम बस्त तो घर गुली ते जाई बार पथ उक्त पथे अग्रसर होया प्रथमे जे द्वार पावा जाय उहाई श्री रामकृष्ण सु प्रशस्त कोखे प्रवेश पथ उ हार उत्तरे ओ दक्षिणे बरांडा एवं पश्चिम में छोटो छोटो दुई खानी घर एक खानी ते भक्तो एवं अपर खानी ते श्रीमा रात्रे बास करी तेन ठाकुरे घरे जाई बार पथे पूर्व पार्श्व छाते उठे बार सीडी एवं छदेई बार दोर जार गाए चारी हाथ आंदा चतुष्कोण एकटी आच्छादन युक्त चाता तली श्री मायर सारा दिन काटी तो एवं एखानी ठाकुरे पथ्यादि रंतन होई तो एक पूरा घर का वर्णन यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने किया है और उसका जो हिंदी है वो मैं साथ में ही पढ़ लेता हूं श्यामपुकुर का वह 55 नंबर का मकान श्यामपुकुर स्ट्रीट के उत्तर की ओर स्थित है उत्तर की ओर मुह कर के घर में प्रवेश कर आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर दो तले पर जाने के लिए सीढ़ी और सामने आंगन है आंगन के पूर्व दो-तीन छोटे-छोटे कमरे हैं ऊपर जाने पर दाहिनी ओर एक लंबा कमरा है जो दर्शकों के लिए निर्दिष्ट था बाई ओर पूर्व पश्चिम स्थित बरामद से कमरों में जाने का मार्ग है उक्त रास्ते से आगे बढ़ने पर पहले जो दरवाजा पाया जाता है वही श्री राम कृष्ण के बड़े कमरे का प्रवेश द्वार था उसके उत्तर और दक्षिण में बरामदे है और पश्चिम की ओर दो छोटे-छोटे कमरे हैं एक कमरे में रात्रि को भक्तगण रहते थे और दूसरों में श्री मां सोती थी श्री रामकृष्ण के कमरे में जाने वाले रास्ते के पूर्व की ओर छत पर जाने के लिए सीढ़ी है और छत के दरवा दरवाजे के पास लगभग चार हाथ की चौकोनी छत वाली बैठक है इसी बैठक में श्री मां का सारा दिन कटता था और यहीं श्री रामकृष्ण के पथ्यादि भी पकाए जाते थे अभी यह वर्णन को समझना इससे बेटर है कि मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि आप सभी लोग कलकाता में जदी दर्शन का मौका मिले जाइए और वह श्याम पुकुर घर जो है उसका दर्शन कीजिए इमीडिएट सब समझ में आ जाएगा कि कौन सा घर कहां पर है कौन सा कमरा कहां पे है वर्णन का ज्यादा उसमें ये चिंतन करना ऐसा कोई आवश्यक नहीं है इसके लिए अभी हम यहां से आगे बढ़ते हैं देखिए हमने जब यह सोचा कि यहां पर आने का मां का स्वार्थ नहीं था ठाकुर का स्वार्थ था मां सेवा के लिए आई है यह कष्ट कितना था मां का रात को 11 बजे को सोने को मिलता था सुबह को 2 बजे उठ जाना है कितना घंटा नींद हुआ 11 से 12 एक दो न घंटा रात को नींद होती थी दोपहर को थोड़ा सा विश्राम का समय मिलता था इस तरह के घर में और जैसे यहां पर अभी पूरा ये अभी तो वर्णन आया घर का अभी ये यहां पर मां किस तरह से रह रही थी मां की तपस्या कैसी थी इसके बारे में अभी गंभीरानंद जी बताते हैं महाराज जी क्या कहते हैं ई बाटी दे एकटी मात्र स्थान शकल स्नानादि जनन निर्दिष्ट थाका श्री मां अपर सकलर पूर्वे रात्रि टार समय नीचे नामिया स्नानादि सारिया ते तला छादेयान करने के लिए शौच वगैरह करने के लिए सिर्फ एक ही जगह थी एक ही बाथरूम थी तो फिर मां को क्या करना पड़ता था कि जब ये पुरुष लोग सब उठ कर के वहां उसका व्यवहार करें उससे पहले 3 बजे ही सुबह को रात को 2 बजे उठ जाएगी 3 बजे वो स्नान शौच वगैरह समाप्त करके जहां पर वह छत थी वहां पर छोटी सी जगह थी खाना पकाने के लिए वहां पर वह चली जाती शेखाने जथा काले पथ्यादि प्रस्तुत होया गेले वृद्ध गोपाल दादा बा लाटर द्वारा नीचे संबाद पठाई देन इतना सुबह उठ कर के ठाकुर के लिए पथ्य प्रस्तुत करना है डायट आहार प्रस्तुत करना है करके या तो फिर ये बूढ़ो गोपाल अर्थात कि अपने स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज या तो फिर लाटू यानी कि स्वामी अदभुता अंद जी महाराज भविष्य के उनको पुकारेगी और वे उन दोनों में से कोई एक आकर के ठाकुर के पास में खाना लेकर के जाएंगे ये अद्वैतानंद जी महाराज की और कुछ कुछ कहानियां बड़ी मने प्रसिद्ध है अपने ऑर्डर में एक बार उनका नेचर ऐसा था थोड़ा सा वृद्ध थे अफिन वगैरह अफीम वगैरह खाते थे और ये खाने के बाद में फिर रात को उनको बात बार-बार वो प्रश्र के लिए जाना पड़ता था वो पेशाब के लिए तो अभी वो एक दिन ऐसा हुआ वराह नगर मठ की घटना है कि ये अद्वैतानंद जी महाराज बुढो गोपाल महाराज वो रात को उठे बाथरूम जाने के लिए और फिर यहां पे उनके बगल में ही यह अपने अखंडानंद जी सोए हुए थे अपने गंगाधर महाराज वो तो बड़े उनके उम्र से छोटे थे और उनका एक फनी नेचर था वो वरा नगर मठ में आनंद का प्रवाह बहता रहता था तो एक प्रैक्टिकल जोक ऐसा जो होता है यह लोग भी ऐसा करते रहते थे तो यह अखंडानंद जी ने क्या किया गंगाधर महाराज ने किव जिस बालिस के ऊपर में जिस पिलो के ऊपर में सर रख कर के ये बूढ़ो गोपाल महाराज सो रहे थे वो पिलो हटा कर के उन्होंने एक पत्थर का ईंट रख दिया ईंट रख दिया पत्थर का नहीं होता है ईट ईट होती है तो ईंट रख दी तो अभी जैसे ये बुढो गोपाल महाराज अद्वैतानंद जी महाराज वापस आए और सोए तो जैसा उन्होंने सर रखा तो फट करके वो ईंट के साथ में वोह सर टकराया तो अभी ये अखंडानंद जी सोचते थे अपने गंगाधर महाराज कि अभी वो चिल्लाना शुरू करेंगे बूढ़े लोग जिस तरह से कंप्लेन करते हैं ऐसा कंप्लेन करेंगे और हम लोग आनंद लेंगे तो ऐसा नहीं ये बूढ़ो गोपाल महाराज सोए हैं तो लेटे ही है पत्थर की ईट के ऊपर में सर रख कर के तो अभी गंगाधर महाराज सोच रहे हैं कि शायद उनको अभी तक पता नहीं चला है कि वो बालिस की जगह पे पिलो की जगह पे ईंट आ गई है तो उन्होंने सोचा कि थोड़ा सा समय जाने दो थोड़ा सर पर लगेगा तो वो अभी चिल्लाए देखा कि कोई आवाज नहीं वो चुपचाप वैसे ही लेटे हैं ईट के ऊपर सर रख के तो ये अखंडानंद जी महाराज तो थोड़े से डर गए क्या वो मर तो नहीं गए मतलब क्या कुछ पता नहीं ये तो इन बूढ़े लोगों का तो कुछ कह नहीं सकते तो वो खड़े होकर के वो उनको पुकारने लगे बूढ़ो गोपाल महाराज को कि अच्छा दादा दादा क्या आप सोए हैं आपको पता चला कि मैंने वो हटा कर के वो पिलो हटा कर के ईट रख दी है तो बूढ़ो महाराज बड़े शांति से कहते हैं कि भाई तुमने यह जो मुझे दिया है ईंट जो दी है वो तुम्हारे ही आशीर्वाद समझ कर के तुम्हारा ही आशीर्वाद समझ के पिलो है वैसा ही समझ करके मैं उसके ऊपर में सोया हूं तब वो बेचारे अखंडानंद जी बड़े दुखित हो गए सोचा कि कहां ये बूढ़े आदमी के साथ में प्रैक्टिकल जोक करने को गए हैं यदि ऐसा कुछ करना है तो लाटू महाराज के साथ करना है स्वामी जी के साथ करना है कहां बूढ़े को परेशान कर रहा है तो वही वृद्ध गोपाल दादा बूढ़ो गोपाल महाराज या तो फिर लाटू इन दोनों में से कोई भी एक आकर के यह जो मां आहार प्रस्तुत करती थी ठाकुर के लिए वो लेकर के जाएंगे तखन सुविधा होले ठाकुरर घोर ईते लोक सराइया दिया श्री मां के पथ्य लिया आशीते बोली दे हुई तो अच्छा वो पथ्य लेकर के जाते नहीं थे उनको उनके द्वारा संवाद भेजते थे मैसेज भेजती थी मां कि हां खाना हो गया है अब जैसे ही यह आहार य र हो गया है यह मैसेज ठाकुर के पास में आया वैसे ही वहां पर ठाकुर के साथ में जो भक्तगण बैठे थे उनको वहां से जाने को कह कर के ठाकुर अकेले हैं और फिर उस समय मां आएगी आहार लेकर के नतबा सेवक गण तहर निकट ईते उलिया सते ने दोनों होता था पहले तो था कि वो मां इन दोनों के द्वारा मैसेज पहुंचाएगी और सब लोग चले जाएंगे तो मां खाना लेकर आएगी और या तो फिर कोई अभी बड़ा कोई ज्यादा गेस्ट बैठे हैं और उनको वहां से निकालना संभव नहीं है तो फिर यह भक्तगण ही यह त्यागी संतान ही वो खाना लेकर के मां के पास में से आ जाते थे मध्यान श्री मां ई चाता ली विश्राम करी ते दोपहर को मां वहीं पर छत के ऊपर में जो उठान था वहीं पे वो विश्राम करती थी एवम रात्रे सकले निद तो होले आंदाज ए टार समय नामिया आशिया निर्दिष्ट घर है रात्रि दई पर जंतो नित्रा जाते और वहीं पर दोपहर को थोड़ा बहुत विश्राम किया और रात को देखिए परिस्थिति क्या है कि बहुत सारे पुरुष लोग है घर में तो छत पे ही मां को वहां प रहना पड़ता था सबकी नजरों से अलग और जब रात को सभी लोग चले जाएंगे तो रात को 11 बजे के बाद मां अपने कमरे में वापस आक के विश्राम करती थी अपना कमरा भी क्या वहां पे मां के लिए घर रखा गया था जिसका दिन के दौरान और कोई लोग आकर के कुछ ना कुछ कार्य करते होंगे वहां पर रात को मां आकर के उन को नींद करना सोने का मौका मिलता है ठाकर अभी देखिए ये मां का वहां पर लिखा है कि वो रात को 2 बजे उठ जाती थी यहां पर लिखा है कि रात को 11 बजे सोती थी तो 11 से दो तीन घंटा मां को सोने को मिलता था दोपर को थोड़ा सा विश्राम ठाकुर के रोग मुक्त करि बार आशा बुक बांध तिनी दिने पर दन अमलानंद ई कठिन सेवा ब्रतो पालन करी ते लागी ले बड़ा ही सुंदर है ठाकुर को रोग मुक्त करने की आशा में उन्होंने जैसे कि अपने हृदय में आशा भर के बुक बांध दिया अभी इसका कैसे करेंगे ट्रांसलेशन अपने हृदय में एक आशा का एक बल पा कर के उन्होंने दिन के बाद दिन अमलानंद दन अर्थात की चेहरे पर किसी भी तरह का नाराजगी नहीं मुंह पे किसी तरह की कंप्लेन नहीं अमलानंद दने ए कठिन शेवा ब्रतो पालन करते लागी लेन यह कठिन सेवा व्रत का पालन करने लगी हृदय में आशा है कि ठाकुर ठीक हो जाएंगे हृदय में यह भरोसा है कि ठाकुर जल्दी से यह दक्षिणेश्वर वापस आएंगे और फिर वही आनंद की हार्ट आनंद आनंद की बाजार फिर से खुल जाएगी यह आशा लेकर के मां दिन के बाद दिन इस कठिन सेवा व्रत का पालन करने लगी अथ च शेवा सर्व प्रधान कार्य निजु तो थाकी लेओ ताहर कर्तव्य लोक चुर अंतराले मने निरब अनुष्ठा होतो ज जहारा प्रत्य शेखाने जाता जात करते तहरा तहर उपस्थिति कथा जानते पारी देना अभी ठाकुर की सेवा का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य मां के पास में है किंतु मां इतने नीरवता से इतने छुपे से एकदम सीक्रेट इसका पालन करती थी इस व्रत का सेवा व्रत का कि यहां पर इस श्याम पुकुर वाले घर में नियमित आने जाने वाले भक्तों को भी पता नहीं कि मां यहां पर रह रही है और ठाकुर की सेवा कर रही है वह सुबह को 2 बजे उठ कर के 3:00 बजे स्नान शौच समाप्त करके वो छत पे जहां पर वो ठाकुर के खाने का आहार का व्यवस्था है वहां पर चली जाती सीधी रात को 11 बजे सब भक्तगण चले जाएंगे तब वो वापिस आती वहां पर एक दो त्यागी संतान शायद शयन करते होंगे इनके अलावा शायद और कोई रहता नहीं होगा तो मां वहां पर है जैसे दक्षिणेश्वर में खजान जी कहता था कि हमने सुना है कि मां है किंतु कभी नजरों से देखा नहीं तो जैसे दक्षिणेश्वर में रहती थी किंतु दक्षिणेश्वर में आसान था इस तरह से करना कंपैरेटिव क्योंकि जद दक्षिणेश्वर गए होंगे तो पता होगा कि खजांची की ऑफिस कहां और मां का नबत कहां इतना डिस्टेंस है बीच में ठाकुर का कमरा भी है तो इतना आसान नहीं था मां को देखना वगैरह तो यह तो थोड़ा सा कंपेरटिवली थोड़ा सा आसान था किंतु एक ही घर जिसमें कि सबको आना जाना करना है वहां पर छुप के रहना वो कितना कठिन है वो कल्पना करके हम देख सकते हैं तो मां सेवा का सर्व प्रधान कार्य मां के पास में था फिर भी इतना शांति से इतनी नीरवता से सेवा करती थी किसी को पता नहीं चलता था कि मां वहां पे है अच्छा इसके बाद में फिर वो श्यामपुकुर जाते हैं क्योंकि ठाकुर का ये जो गले का रोग है वह उपशम नहीं हो रहा है फिर डॉक्टर ने कहा कि अभी यह शहर के रहने की बजाय शहर में रहने की बजाय थोड़ा सा उन्मुक्त वातावरण में जाया जाए हवा फेर होगी तो हो सकता है कि रोग का उपशम हो तो अभी की घटनाएं श्याम पुकुर की उसकी वजह अभी ये व काशीपुर में वो ले जाते हैं वहां की घटना स्टार्ट होगी तो उसको हम अभी कल देखेंगे आज ही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा पस्तु