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ओम संस्थापक स्वरूप ने अवतार रामकृष्ण यत नमः मां शारदा देवी का जीवन और उपदेश कल हमने देखा की किस तरह से महाराज एक्सप्लेन करते हैं की इंडिया स्टेंस ऑन थे क्रॉस रोड्स ऑफ सिविलाइजेशन और कलर यह सिविलाइजेशन और कलर का जो चौराहा है उसके ऊपर में भारत खड़ा है और किस तरह से पूर्व में से हो एन की पश्चिम में से हो जो भी शुभ प्रभाव है हम लोगों ने अपने राष्ट्रीय जीवन में अपने धार्मिक जीवन में ग्रहण किया हैं किंतु साथ में ही हमने यह बात का ख्याल रखा है की हमारे उपनिषदों की जो पुरी मर्यादा है उपनिषदों का जो कर टीचिंग है उसको हम कभी ना भोले हमारी संस्कृति का जो आधार स्तंभ है वह ब्राह्मणी प्रज्ञानंम ब्रह्म इस तरह हमारी खुद की हमारे भीतर में अंतर नहीं चेतन की हमारे भीतर में अंतर नहीं जीवात्मा की विश्व ब्रह्मांड के रचयिता कहो ना की विश्व ब्रह्मांड के पीछे छुपी हुई जो रियल सत्ता है वो है ब्राह्मण उसके साथ में तदम मियां ये स्थापित जो करता है वो है महाभारत के और यही महावत के ऊपर निषादों का सर संदेश है तो ये सर संदेश को साथ में रखकर के फिर ठाकुर जैसे कहते हैं की आप वो बुद्धि खेलने गले खूंटी के धरे तार पर जाए इच्छा करो इसका ट्रांसलेशन मुझे नहीं पता की मैंने एक खेल है वो बंगाल में खेल जाता है उसमें वो एक वो किसी चीज को पकड़ लेना होता है सबसे पहले और फिर उसको पकाने के बाद में आप जो चाहे वो कर सकते हैं मुझे पता नहीं कौन सा खेल किंतु यह ठाकुर कहते हैं तो वैसे ही जैसे की साधु का एक उदाहरण दिया है दो साधु एक शहर में जाते हैं और एक साधु क्या करता है पहले ही वह गांव से शायद गए होंगे वन में से तो शहर की वह शोभा है शहर की यह जो भाव उसका जो आर्किटेक्चर है यह सब देखकर के मोहित हो करके गली-गली में घूम रहा है और वो फिर अभी रात हो गई तो अभी कहां वो जाएगा रात को तो कोई किसी को लगा नहीं धर्मशाला वगैरा में देखा दूसरा साधु है तो बोला की अरे भाई तुम भी तो इस तरह से घूम रहे हो तुम्हारा तुमको रहने की जगह मिली क्या की तुमको अभी सड़क पे ही सोना होगा मेरी तरह तो वह बोला की जी नहीं पहले तो मैं आकर के बादशाह पकड़ लिया मैंने अर्थात की पहले तो रहने के लिए धर्मशाला का जुगाड़ कर लिया वहां पर बिस्तर पतला रख करके फिर बाद में मैं शहर देखा हूं तो यह अपना एक महत्वपूर्ण का एक यह इन्हेरिटेंस अपने पास में है उसको बजाएं रखना है और फिर जितना भी ग्रहण करना है नहीं करना है वो फिर आप सोच सकते हैं देखिए हम लोग भारत में कभी-कभी यह इजरायल है या तो फिर जर्मनी है या फिर ये जापान है या तो युवान चिन्ह है फ्रांस से ये सब देश के उदाहरण देते हैं उन्होंने ये अंग्रेजी संस्कृति वैसे आंख बैंड करके नहीं अपने फिर भी वे लोग कितने मॉडर्नाइज है ताइवान में जाएंगे ताइवान ने जो माइक्रोप्रोसेसर बंता है कंप्यूटर की जो चिप बंटी है वह चिप पूरे विश्व के सभी कंप्यूटर में उसका इस्तेमाल होता है 78% चिप प्रोडक्शन हो सकता है शायद ताइवान में ता मेक वो करता होगा अमेरिका में भी जो चिप उसे होती है वह ताइवान में बंटी है तो ग्लोबलाइजेशन की वजह से मैन्युफैक्चरिंग आप कहां पर कर सकते हैं जहां पर की बेस्ट टैलेंट है अभी अमेरिका इतना कर रहा है की माइक्रोप्रोसेसर मैन्युफैक्चरिंग अमेरिका में फिर से आए किंतु उसे चीज के लिए जो मनी पावर इन्वेस्ट करना होगा जो में पावर चाहिए वो कहां से लेंगे स्टीव जॉब्स को एक बार वहां के प्रेसिडेंट बराक ओबामा ना की किसी ने बोला था की तुम लोग ये मिलियंस ऑफ आईफोन चीन में बनाते हो तो उसका हमारा जब जो है हमारी नौकरियां हमारे लड़कों को नहीं मिलने की बजाई चीन में चली जाति है तो तुम आईफोन का मैन्युफैक्चरिंग अमेरिका में करो तो अमेरिकन प्रोडक्ट है चीन में क्यों मैन्युफैक्चरिंग करते हो चीन में क्यों इतनी बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां लगे है वहां पर 30-30 लाख 40 लाख लोगों को लाख लोगों को जब मिलती है आईफोन मैन्युफैक्चरिंग करने के लिए और अमेरिकन लोगों को जब नहीं मिलती यह तो ऐसा उल्टा क्यों कर रहे हो तो स्टीव जॉब्स कहता है आप अमेरिका में मेरे लिए प्रति एवरी एयर 10 15000 कंप्यूटर इंजीनियर या तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर प्रोड्यूस कीजिए तो मैं यहां पर आईफोन प्रोड्यूस करूंगा अर्थात की चीन की जो पापुलेशन है और उसकी पापुलेशन के स्टैटिसटिक्स स्पीकिंग इतने सारे इंजीनियर ये लोग प्रोड्यूस कर सकते हैं जो की आईफोन बनाने के लिए उनको चाहिए जो की अमेरिका में पॉसिबल नहीं है तो आज के जगत में मैन्युफैक्चरिंग कहां जाता है जहां पे भी वो फैसिलिटी अवेलेबल है कोई ऐसा नहीं रहेगा की यह आईफोन अमेरिका की प्रोडक्ट है तो अमेरिका में ही इसका मैन्युफैक्चरिंग करो अभी तो पता होगा की आईफोन अभी इंडिया में भी धीरे-धीरे मैन्युफैक्चरर होने लगा है तो ग्लोबलाइजेशन के इस युग में सभी लोग जितने भी पूंजी पति है जितने भी बिजनेसमैन है इंडस्ट्रियलिस्ट है यह लोग सोचते हैं की कहां पर सबसे ज्यादा सस्ता लेबर मिलता है कहां पर इन फर्स्ट स्ट्रक्चर बटर है कहां पर आपका गवर्नमेंट पॉलिसी हेल्पफुल है की वहां पर जाकर हम मैन्युफैक्चरिंग करें तो यह ताइवान है या तो फिर यह जापान है लेकिन एक कंट्रीज ने अपने यहां पर मैन्युफैक्चरिंग तो ले लिया है चीन है एवं चीन में बहुत सर मैन्युफैक्चरिंग होता है किंतु अपनी संस्कृति को उन्होंने नहीं छोड़ जो की भारत में स्थिति गुलाम जब हम थे तब ए गए थे वह प्रोड्यूस करने की तो बात अलग ही रहेगा ऊपर से हमने अपने खुद का सेल्फ कॉन्फिडेंस गाव दिया सोने लगे की अरे भैया हम लोग ये मैनचेस्टर की मिल की तरह कपड़े नहीं प्रोड्यूस कर सकते उसका अर्थ है की हमारा हिंदू धर्म ही गलत है तो इस तरह से एक विचित्र विचार अपने कुछ-कुछ युवाओं के मां में चला गया और उन्होंने इस तरह से भद्दा आचरण करना शुरू कर दिया अंग्रेजन की कॉपी इस तरह से करने लगे की वो अंग्रेजन को भी वह पीछे छोड़ दे वाह विचार करने में इसीलिए यह नरेंद्र वगैरा लड़के जब ठाकुर के पास में आए तो इन लोगों में यह डिफरेंस था की हां संदेह उत्पन्न हो गया था भारतीय संस्कृति के ऊपर में किंतु साथ-साथ में ही यह रूप क्षत्व उनका बड़ा ही स्ट्रांग था भीतर से जानना चाहते थे की इस जगत का सही क्या है भारतीय संस्कृति एक्चुअली क्या है नहीं की ये कुछ गांव में फैली हुई कुछ प्रथाएं कुछ व्यभिचार ना की कुछ कुछ संस्कार जो की धर्म के नाम पे चलते हैं वो तो सिर्फ एक डोर से ऊपर में वो पानी के ऊपर में थोड़ा सा ये कचरा जाम जाता है तो थोड़ा सा उसको हटाएंगे तो एकदम निर्मल स्वच्छ जल आपको सत्य है के नीचे देखने को मिलेगा तो वैसे ही ऊपर से थोड़ा सा कचरा जाम गया है उसको हटाएंगे वैसे ही ये अमृत मैं गंगा और जो हिमालय से बाटी ए रही है उसका दर्शन होगा उसका हम अमृत्व में पानी पान कर पाएंगे तो उसे इसीलिए महाराज कहते हैं की यह सिल्क रूट है या तो स्पाइस रूट है उसके चौराहे पर भारत खड़ा था अपनी संस्कृति को अकबर रख करके अपने सरस्वती को आगे आईटी इसे रखकर के दूसरे देश की अर्थात पूर्वक की या पश्चिम के जितने भी अच्छे अंश है उसने ग्रहण की है आत्मा संस्था होकर के ये शब्द प्रयोग किया है आत्मा संस्था की अपने ही भाव में स्थित हो करके अभी महाराज आगे कहते वर्तमान युग में हमारे नई समाज को पाश्चात्य के नई समाज के आदर्श से कुछ स्टेज हो जान की जरूर है उसमें से कुछ अच्छी चीज ग्रहण करने की आवश्यकता है क्या है टेमनिया बार पाश्चात्य सभ्यता के बातचीत हीले आमदा मठरुभूमिर खान मातृ भक्तर खाने का और श्रीग्रहण कोरिया करेट हुए वैसे ही जी तरह से भारत को आवश्यकता है की पाश्चात्य नारियों के कुछ अच्छे गन भारत के नई समाज ग्रहण करें वैसे ही पाश्चात्य के नई समाज को यह आवश्यक है की भारत की मंत्र भक्ति जो है उसका थोड़ा सा अंश अवश्य ग्रहण करना होगा हम यहां पर स्त्री को मां के रूप में देखते हैं मां के रूप में उनकी पूजा भी करते हैं जगदंबा के रूप में शक्ति के रूप में उनके आराधना भी करते हैं जबकि विदेश में उनको भोग्य वास्तु के रूप में देखा जाता है जबकि एक बात है की विदेश में स्त्रियों को जो फ्रीडम है वह शायद भारत की सामाजिक स्थिति है उसमें इतना नहीं है देखिए मैंने रिसेंटली एक आर्टिकल लिखा था उसके लिए मैंने सर्च किया तो मेरी मैं थोड़ा आश्चर्य हुआ की अपने इंडिया में जो लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन जो स्त्रियों का है वो मुश्किल से 19-20 परसेंटेज है जबकि जो कंजरवेटिव कंट्री है सऊदी अरब वगैरा भी वहां पर भी लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन इंडिया से ज्यादा है स्त्रियों का चीन वगैरा में तो 50% क्रॉस हो जाता है यानी की जो टोटल लोग जो कम करते हैं बिजनेस करते हैं या तो जब करते हैं उसमें इंडिया में सिर्फ 20% किस तरह होती है जबकि डेवलप्ड कंट्री इसमें स्त्रियों का परसेंटेज इन डी टोटल लेवल फोर्स यानी की कम करने वाले सभी लोगों में वो 40% से लेकर के 50% होता है तो भारत में यह वर्ल्ड बैंक वगैरा लोगों ने कुछ एस्टीमेट निकाला है की यदि लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन स्त्रियों का बड़े तो क्या होगा इंडिया का जीडीपी में ऑलमोस्ट फाइव तू सिक्स परसेंट से लेकर के 10% तक वह बड़ा हुआ हो सकता है बढ़ोतरी हो शक्ति है डिबेट कैलकुलेशन वेरी चेंज होते हैं अलग-अलग जो लोग इसको कैलकुलेट करते हैं तो यह एक्सेप्ट परसेंटेज में भी भूल गया हूं किंतु यह समथिंग लाइक दिस अप तो देखिए जहां पर कंजरवेटिव कंट्रीज भी है वहां पे भी स्त्रियों का पार्टिसिपेशन जो टोटल कम कार्य करने वाले लोग थे वो 34% होता है वो डेवलप कंट्रीज में तो और भी ज्यादा होता है 50% तक हो जाता है किंतु भारत में यह परसेंटेज इस बिल्लू 20 तो जितने भी लोग कार्य करते हैं बिजनेस करते हैं जब करते हैं उसमें स्त्रियों की संख्या 20% से भी कम है अभी यह तो वह देखिए की अभी गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का यह कहना है की हम लोग ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर को इसमें नहीं जिन है इसलिए स्त्रियों की संख्या इसमें कम दिखती है यदि उन ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर को इसमें ले लिया जाए तो स्त्रियों की संख्या बाढ़ जाएगी वरना नंबर ऑफ पार्टी परसेंटेज जो पार्टिसिपेट बाढ़ जाएंगे तो जो भी है ये आर्गुमेंट उसकी जगह पे है किंतु जो बियर इफेक्ट है जो की हम लोग सभी लोग देखते हैं अपनी नजर के सामने बहुत कम स्त्रियां हैं की जो की अपने फैमिली को छोड़ करके स्पेशली आफ्टर मैरिज शादी के बाद में फैमिली को छोड़ करके दे आफ्टर दे दिन प्रतिदिन जब करेगी या बिजनेस करेगी ऐसी स्त्रियों की संख्या बहुत ही कम है भारत में बड़े-बड़े महानगर में होगी गांव में ज्यादातर नहीं होती गांव में स्त्रियां कम करती है किंतु वह क्या होता है की कोई फॉर्मल सेक्टर नहीं होता इनफॉर्मल सेक्टर होता है जैसे घर में ही वो बस के वो बर्तन वगैरा बनाना या फिर वो जो भी है वह स्त्रियां जो करती है खेत में कम करती है किंतु वह ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर नहीं तो जब स्त्रियां घर के बाहर निकलते है कोई रिस्पांसिबिलिटी लेती है तो क्या होता है की उनके पास में एक फ्रीडम आता है एक फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस आता है जिसके से वो एक उनके भीतर में कॉन्फिडेंस भी आता है वरना जल्दी कॉन्फिडेंस नहीं रहेगा फाइनेंशली डिपेंडेंट होंगे तो क्या होगा की कोई भी उनको कुछ भी बोल जाएगा उनके ससुराल में यदि एब्यूज भी होता है यदि उनके प्रति अत्याचार भी होता है तो वे बेचारी कुछ मुंह खोल करके बोल नहीं पाती तो ये जॉइंट फैमिली के बड़े में उसकी अच्छे गुना के बड़े में मैंने बहुत कुछ बोला भी है मैंने बहुत कुछ लिखा भी है इस बार का जो एडिटोरियल है उसमें मैंने लिखा है रामकृष्ण ज्योत के एडिटोरियल में की किस तरह से जॉइंट फैमिली बच्चों को नरेश करता है इमोशनली और यह इमोशनल स्ट्रैंथ जिसको की इमोशनल पोषण या तो फिर यह जिसको की इक कहते हैं इंटेलिजेंट क्वेश्चन यह कितना लड़का बुद्धि शैली है तो वैसे ही आजकल इमोशनल कोटिएंट मेजर होता है इसका अर्थ है की यह उसकी लगती है उसकी फीलिंग से उसकी इमोशंस से वो कितनी स्टेबल है कितनी मैच्योर है कोई कोई लड़के देखेंगे की छोटी-छोटी बटन में नाराज हो जाते हैं माताजी और पिताजी के साथ में झगड़ना शुरू कर देते हैं या तो फिर वह कुछ भी वो उल्टा पुल्टा वह तूफान मस्ती करेंगे और कुछ लड़के होते बड़े ही मैच्योर में छोटे-छोटे उम्र से ही उन लोगों में एक विजडम होता है एक डेथ होती है एक मेच्योरिटी होती है वो मां को भी हेल्प करेंगे पढ़ाई-लिखाई में भी वो लोग फटाफट करके वो आगे चले जाएंगे उनको जो भी कम दिया जाएगा होमवर्क दिया जाएगा स्कूल के जो प्रोजेक्ट होगी वह भी बड़े सिंसियर ली एक निष्ठा होकर केवल कंप्लीट करेंगे तो यह सक्सेस इन स्टडीज और करियर स्कूल में और बाद में बिजनेस में या तो जब में यह जो सक्सेस आई है फाउंडेशन है यह इमोशनल क्वेश्चन या तो फिर यह अपनी इमोशनल स्टेबिलिटी या तो इमोशनल मेच्योरिटी यह इमोशनल मेच्योरिटी कहां से आई है तो यह आई है जॉइंट फैमिली में से जॉइंट फैमिली में जो बच्चे बड़े होते हैं उनको सभी का प्रेम प्राप्त होता है का चाचा चाचा मामा जितने भी अपने रिलेटिव्स होते हैं पिताजी माता जी नाना नानी दादा दादी बड़े भाई छोटे भाई बड़ी बहन छोटी बहन सबका वो लाडला बच्चा वो प्रेम प्रकार के उसका हृदय उसका मां स्ट्रांग होता है उसे स्ट्रांग मां से वो ज्यादा पढ़ाई कर पता है मेरा खुद का यह बड़ा ही पॉजिटिव एक्सपीरियंस रहा है किंतु यही जॉइंट फैमिली में साइलेंट एब्यूज चलते रहते हैं वह स्त्रियों के ऊपर में खास करके जो की उनको उनका कोई वॉइस नहीं राहत उनका एक एक ओपिनियन वो नहीं राहत कभी कभी तो यह एब्यूज जो है उससे बचाने के लिए फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बड़ा ही आवश्यक है यदि आप स्त्रियों को फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस नहीं देंगे तो वे लोग अपना वॉइस एक्सप्रेस नहीं कर पाएंगे अपने कंसर्न्स एक्सप्रेस नहीं कर पाएंगे वो सब समय उनको ढाबा करके रखा जाता है जॉइंट फैमिली में सभी जगह पे नहीं किंतु ऐसा देखने में आता है तो ये स्त्रियों को जो फ्रीडम मिलन चाहिए वो सिर्फ रिलिजियस हम लोग ये कहेंगे की हां यह मातृ स्वरूप है शक्ति स्वरूप है तो उनको आधार देना है उनकी पूजा करनी है उनको सम्मान देना है वो एक चीज है किंतु जब एक्चुअली दे टुडे सोशल लाइफ में हम आकर के देखते हैं जॉइंट फैमिली या तो फिर किसी भी एवं न्यूक्लियर फैमिली भी कहो आजकल वो हसबैंड वाइफ और एक दो बच्चे अकेले रहते हैं बड़े-बड़े महानगरों में न्यूक्लियर फैमिली ना की जॉइंट फैमिली जैसी स्त्रियों के पास में एक फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस नहीं राहत यदि वह अपने से घर के बाहर जाकर के शॉपिंग वगैरा नहीं कर पाती यदि वह व्हीकल ड्राइविंग करता करना नहीं जानती है तब क्या होगा की वे लोग सब समय एक इंफेरियारिटी परिसर वो अनुभव करेगी वो सब समय उनको लगेगा की मेरी बात कोई सुनता नहीं है मेरे कंसर्न को कोई एड्रेस नहीं करता मेरे जो दुख का स्टेप सबका तो दुख कष्ट लोग आकर के मुझे बोलते हैं बच्चे भी बोलते हैं हसबैंड भी बोलना है इन नाना नानी भी बोलेंगे माता जी पिताजी भी बोलेंगे मैं अपनी बात किसको करने को जाऊं तो ऐसा एक अकेलापन भी उनको लगता है तो यह जो फ्री सोशल फ्रीडम का कॉन्सेप्ट जो विदेश में है वह यहां पर उसका एक अंश हमारी स्त्रियों को ग्रहण करने की आवश्यकता है और विदेश में स्त्रियों के प्रति जो दूसरी टाइप के जो अत्याचार होते हैं वह तो जगावेदित है वहां पर स्त्रियों को मातृ स्वरूपिणी या तो शक्ति स्वरूपिणी जिन करके उनको सम्मान देना उनको पूज्य स्थान देना ये भारतीय संस्कृति परंपरा में से उनको ग्रहण करने की जरूर है ये कनफ्लुएंस ऑफ आइडिया ये है क्रॉस रोड्स के ऊपर में खड़ा हुआ भारत सब जगह से जितने भी अच्छे विचार आता है ग्रहण करना है साथ-साथ में ही स्वामी जी जी तरह से कहते हैं की एक सीजर ये वो सिकंदर था की जिसने वो अपनी सी को लेकर के भारत पे युद्ध चढ़ाई करने के लिए आया बाद में ये मुसलमान आक्रमण भी हुए बाद में ये स्टीमबोट में स्वर हो करके अंग्रेज भी आए तो ये जो चैनल ऑफ कम्युनिकेशन जो विदेशी महासक्ताओं ने स्थापित किया भारत पर आक्रमण करने के लिए इस चैनल ऑफ कम्युनिकेशन के थ्रू अपनी भारतीय संस्कृति भारतीय धर्म उन देश में गया है और उन देश में जाकर के साइलेंटली आईटी इस कद लाइक दिउ फॉलिंग जेट लेकर मॉर्निंग यू फॉलिंग जेटली ऑन डी रोज सुबह की जो आस गुलाब के फूल के ऊपर में शांत रूप से निरहुआ रूप से गिरती है और गुलाब को भीतर से पोषित करती है गुलाब को पोषण देती है यह कोई भी ये गार्डनर होगा वो रहेगा की हम सुबह का जो आस है गुलाब के लिए कितना फायदेमंद है तो भारत के विचार उन लोगों के विचार आए युद्ध क्षेत्र के थ्रू उन लोगों के विचार आए यह ब्लू और वार और इस सब के थ्रू जोर जबरदस्ती हमारे पे लड़े गए किंतु हमारे विचार वहां पर गए बिल्कुल निर्वत से बिल्कुल शांतिपूर्वक और इस तरह से विदेशी सोसाइटी को ट्रांसफॉर्म किया है की वे खुद इसका असर नहीं समझ पाते स्वामी जी वहां पर थे कैलिफोर्निया में उसे समय के रिमेंशंस एक उनकी एक डिसीप्ल ने लिखा है मोस्ट प्रोबेबली ब्रो क्या कहती है की वो जब भी स्वामी जी के क्लासेस होते थे तब मैं देखते थी की ये न्यू थॉट या तो फिर ये नए-नए अमेरिका में तो नए-नए ट्रेंड्स चलते रहते हैं ना इतिहास के तो उसे समय न्यू थॉट या तो फिर ट्रांसजेंडलिज्म ये सब बहुत चला था एक होम ऑफ ट्रुथ एक चला था नए-नए इतिहास ले लेने उसका प्रचार करने वाले हैं तो ऐसे न्यू थॉट के कुछ प्रतिनिधि स्वामी जी के जितने भी क्लास हो जा कर के सबसे पहले आकर के फर्स्ट लाइन में बैठ जाते थे और फर्स्ट लाइन में बैठने के बाद में स्वामी जी जो कुछ भी बोलते थे एस आईटी इस नोट अराउंड कर देते थे और फिर वह कहती है जिसने ये रेमनेशंस लिखा है की स्वामी जी के जान के बाद में पूरे कैलिफोर्निया राज्य में जितने भी नए विचारों का प्रकाश हुआ जितने भी नए विचारों का रिवॉल्यूशन आया इतिहास के लेवल पे उन सबके भीतर में स्वामी अंतर निहित थे किंतु यह लोग कोई बोलेंगे नहीं की हमने वह विवेकानंद के पास ही यह सब लिया है वो चोरी कर लिए हैं इतिहास और हमने उन्होंने अपने नाम से चला दिया जबकि भारत में ऐसा उल्टा होता है यदि कोई एक ग्रंथ की रचना भी करेगा तो ऐसा नहीं लिख अपना नाम नहीं लिखेगा वो रहेगा की वो शंकराचार्य के नाम से चलाएगा की शंकराचार्य ने ये लिखा है शंकराचार्य ने वो लिखा है शंकराचार्य ने वो लिखा है अभी हजारों साल के बाद में इटली हम लोगों को लगेगा अरे एक शंकराचार्य ने इतने सारे ग्रंथ कैसे लिख दिए तो पता चलेगा की अरे शंकराचार्य थे पोस्ट है एक पदवी है एक पीट है वो पीठ के ऊपर में जो आश्रित जो पीठाधीश जो है उसने ये किताब लिखी है ग्रंथ की रचना की है प्रकरण ग्रंथ की और शंकराचार्य के नाम से वो पीठ के नाम से वो चला दी है उसने अपना नाम कहानी प्रकट नहीं किया है वो हम लोगों ने हमेशा अपना नाम छुपा के रखा है व्यास है शुष्क है शंकराचार्य है यह सब किसी व्यक्ति के नाम मंत्र नहीं है एक आदि व्यास होंगे एक आदि शंकराचार्य होंगे एक आदि वशिष्ठ होंगे ओरिजन किंतु इसके बाद में वशिष्ठ पोजीशन धरण करने वाले वशिष्ठ पदविध धरण करने वाले बहुत ही ऋषि मनी हो गए की जिन्होंने जो ग्रंथ की रचना की वो वशिष्ठ नाम से ही की तो ऐसा लगेगा की एक ही वशिष्ठ मनी थे जिसने मुझे सब की रचना की एक ही शंकराचार्य है जिन्होंने ये सब प्रकरण ग की रचना की तो हम लोग हमेशा ऐसा करते हैं की यदि हम अपना कोई नया आइडिया हो तो हम वो किसी बड़े व्यक्ति हमारे आगे में गए उनके नाम से ये आइडिया चला देंगे और विदेश में उल्टा होता है की अपना खुद का कुछ नहीं है दूसरे का है चोरी किया है आइडिया और अपने नाम से चलाएंगे अभी ये प्रॉब्लम आज सिर्फ विदेश में नहीं है भारत में भी चलने लगा है किंतु यह पुराने समय की उसे समय की बात थी तो महाराज जी लिखने हैं की जी तरह से हमको उनके पास से कुछ ग्रहण करने की आवश्यकता है उनको भी हमसे कुछ ग्रहण करने के जरूर है गले हाइट विपरीत हो बार संभावना इस तरह से दोनों को दोनों देश को या तो फिर प्रेस प्राची और पाश्चात्य को दोनों को एक दूसरे के पास में से बहुत कुछ लेने के आवश्यकता होने के बाद में बाद में भी मौलिक दृष्टि भेद ना मानिए अर्थात की हमारा खुद का सिविलाइजेशन अंडरस्टैंडिंग क्या है हमारा खुद का सिविलाइजेशन पॉइंट ऑफ व्यू क्या है वो सोच समझ के बिना यदि हमने आंख बैंड करके ले लिया तो क्या करते हैं महाराज संभावना अनेक अच्छे हिट से विपरीत यानी की अनिष्ट होने की संभावना होने की बहुत ज्यादा पॉसिबिलिटीज है यानी की हमको जैसे महाराज ने कहा की आ हमको उनसे क्या ग्रहण करना है हालांकि महाराज ने नहीं कहा मैंने कहा की ये जो सोशल फ्रीडम ग्रहण करने की आवश्यकता है और उनको क्या ग्रहण करने की आवश्यकता है हमसे तो वो महाराज ने ही कहा की वो मातृ शक्ति को पूजनीय जो उनका जो स्थान है वो देने की आवश्यकता वो उनको हमसे ग्रहण करना किंतु फिर भी इन दोनों सिविलाइजेशन का दोनों कलर का अपना अपना एक पॉइंट ऑफ व्यू है वो पॉइंट ऑफ व्यू ना मां करके यहां का वो आंख बैंड करके वहां पे ले लेंगे और वहां का यदि हम लोग आंख बैंड करके यहां पे ले लेंगे तो अनिष्ट होने की संभावना ज्यादा है दोनों देश में नई सम्मानित होने के बावजूद भी प्रतीक्षा में अर्थात की पाश्चात्य में जो सम्मान उनको देते हैं वो पूजा के स्टार पे वो आया नहीं है वहां पर ज्यादातर प्रधानाध यानी की मोस्टली रमेश सौंदर्य रमणीकुलाचित गन राशि प्रशंसाय परिचय सौंदर्य से उत्पन्न जो गन है उसकी प्रशंसा में उन लोगों का रिस्पेक्ट नई जीवन वहां पर क्या होता है नारियों के जीवन का एक बहुत बड़ा अंश पुरुषों के मनोचित्र के मनोहरण को या तो फिर चित को आकर्षित करने में ज्यादा जाता है आमदर उद्देश्य मुख संयम व्यतीरे के तहसंभव नहीं जबकि हमारा उद्देश्य क्या है हमारा उद्देश्य है मोक्ष और बिना संयम के यह उद्देश्य पलीत होना ये उद्देश्य कंप्लीट होना संभव नहीं है तो आधार और इसीलिए भारत में सतीत्व का और मातृत्व का इतना आधार है आमदेशर आदर्श सीता शावित्री दमोहयंती हमारे आदर्श हैं सीता सावित्री और दमयंती शेर तले भाभी विश्व सभ्यता कौन पाठ बादशाह लबे इस दोनों आदर्श के संघर्ष जब होता है तब भावी सभ्यता फ्यूचर सिविलाइजेशन कौन सा रास्ता महाराज ने यहां पर रखा ने प्रबल और सुस्पष्ट कार्य दोनों डिफरेंट कलर है स्त्रियों के बड़े में यह प्रश्न या तो फिर यह प्रॉब्लम या तो फिर यह इशू जितना स्पष्ट रूप से इस समय यह महाराज ने लिखा है इस समय अर्थात की ये किताब 1963 के आसपास में लिखी गई है तो उसे समय और अभी आज भी जितना स्पष्ट आकर से यह प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हुआ है इतना सुस्पष्ट रूप से यह प्रश्न उसे समय अर्थात की मां के अमिर्भव के समय इतना स्पष्ट रूप से या तो फिर स्वामी जी जब अमेरिका में थे उसे समय इतना स्पष्ट रूप से हमारे सामने उपस्थित नहीं हुआ था तब्बू भारत और विद्या बुज्जिते परियों छीलन जो एजुकेशन लंबा है उसे समय जबकि ये प्रश्न किया भारतीय परंपरा है स्त्रियों को पूज्य पूजन उनको उनकी पूजा करने की उनको एक मंत्र रूप से सम्मान देने की और पश्चिम सभ्यता है इस स्त्रियों के सौंदर्य का आधार करने की सौंदर्य को प्रशंसा करने की तो अभी यह दो आइडियल है अभी यह आइडियल देखिए यहां पर महाराज जी ने सिर्फ सौंदर्य के बड़े में लिखा है किंतु स्वामी जी को पढ़कर के हमको पता है स्वामी जी ने खुद कहा है की यहां किस स्त्रियां यह जो सफेद बर्फ गिरता है वहां पे तो स्नोफॉल होता था हमने इंडिया में स्नोफॉल देखा नहीं है हमने तो सिर्फ बारिश ही अच्छी है तो स्वामी जी ने खुद ने लिखा है अपने पत्र में की ये जो सफेद बर्फ जितना गिरता है बर्फ जितना सफेद गिरता है उतना ही सफेद उज्जवल धवल चरित्र यहां किस स्त्रियों का है और उनका क्या फ्रीडम है जितना भी कल्चरल एक्टिविटी है देखेंगे स्त्रियां ही सबसे आगे रहती है पुरुष लोग तो सब जड़ बुद्धि के लोग हैं उनको सिर्फ एक ही चीज दिखता है किस तरह से पैसा कामना किस तरह से बिजनेस चलाना किस तरह से इंडस्ट्री चलाना स्वामी जी के जितने भी क्लास होते थे उसमें मेजॉरिटी पार्टिसिपेंट होते थे स्त्रियां होती थी ऐसा होता था की न्यूयॉर्क में या तो फिर कैलिफोर्निया में स्वामी जी को गरीब विस्तार में का घर भाड़े करके क्लास चलाना पड़ता है क्योंकि उनके पास में इतना पैसा नहीं था अभी वहां की उसे समय के रीति अनुसार जो की बड़े घर की स्त्रियां है वो इस तरह के गरीब विस्तार में नहीं जाएगी गरीब शायरी है गरीब लगता है वहां पर नहीं जाएगी है की वह उनके लिए असम्मानजनक होगा किंतु फिर भी स्वामी जी यदि इस तरह के मकान में भी रहते हैं जो की एक गरीब विस्तार में आया हुआ है ये अच्छे घर की स्थिरियां सब लज्जा जीना बाय ये तीनों को त्याग करके स्वामी जी को सुनने के लिए वहां पे जाति थी उन्होंने निवेदिता मिसेज हॉलीवुड या तो फिर मिसेज हंस ब्रो जिन अब कितने ही नाम ले लीजिए जिन्होंने स्वामी जी को अपना जीवन समर्पित किया है यह कब संभव हुआ जबकि एक सोशल फ्रीडम था उनको अपना पाठ सिलेक्ट करने का उनके हसबैंड है या के फिर उनके फादर है या तो उनके मेल रिलेटिव जितने भी हैं पुरुष संबंधी उन्होंने ऐसा नहीं कहा की आपको यह अजना एक आदमी कहां से चला आया है वो भारत से भारत तो जंगली लोगों का देश है वो इसके साथ में क्यों आप इतना मिलती जलती है इसका चरित्र कैसा होगा किसको पता स्वामी जी जब विदेश में कहानी पे जाते थे तो किसी के घर पर तो यह तो क्रिश्चियन मिशनरी थे ना वह इस तरह से बातें फ्लेट थे की यह स्वामी जी जो आपके घर पर ए रहा है उसका चरित्र खराब है वो आपकी स्त्रियों को साथ में कोई दुराचार करेंगे इसको भाग दीजिए तो किंतु स्वामी जी के जो होश थे जो उनके यजमान थे उनको स्वामी जी पे इतना भरोसा है उनके वहां की स्त्रियों को स्वामी जी पे इतना भरोसा है की बिना दीदा के अपने घर के दरवाजे स्वामी जी के लिए खोल देते थे तो यहां पे महाराज जी ने भले कहा की वहां पे सौंदर्य की पूजा होती है और यहां पे मातृत्व की पूजा होती है किंतु स्वामी जी को पढ़कर के हमको पता है की वहां पे स्त्रियों को एक सोशल फ्रीडम भी था यहां पे यहां पे देखिए की स्वामी जी मां को कितना मां के प्रति कितना श्रद्धा भक्ति है तो स्वामी जी के सामने दोनों आइडिया उनके सामने उनको पता था की भारत में सीता दमयंती सती मां शारदा इनका क्या स्थान है और विदेश में स्त्रियों का क्या स्थान है इसलिए स्वामी जी जब निवेदिता को अमेरिका से लंदन से भारत में ले आए तब उन्होंने कहा की तुम एक गर्ल्स स्कूल शुरू करो जहां पर भी दोनों तरह की शिक्षा दी जाएगी स्त्रियों को लड़कियों को जो विदेशी लड़कियों की तरह एक इंडिपेंडेंस भी होना भी सीखेगी और भारतीय लड़कियों की तरह सीता सावित्री के गन भी उनके भीतर में जाएंगे तो यहां पर जो महाराजपुर पैराग्राफ जैसा सेंटेंस लिखने हैं तब वो उसे समय अभी महाराज जैसा लिखने हैं की उसे समय यह आइडिया इतना क्लियर नहीं था की यह भारतीय संस्कृति भारतीय आइडिया स्त्रियों के बड़े में और विदेशी आइडिया ये कितना डायमीट्रिकली अपोजिट है और किंतु फिर भी यह आइडिया इतना स्पष्ट रूप से लोगों के सामने नहीं रखा गया की दोनों अपोजिट आइडिया में से हमको क्या लेना है तो महाराज जी लिखने हैं यह पता नहीं है इतना स्पष्ट नहीं है भारतीय जनमानस के सामने के दोनों अपोजिट इतिहास है दोनों में कनफ्लिक्ट होने की संभावना है महाराज जी लिखने हैं तब्बू इसके बावजूद भारत और भाग्य स्त्री भारत की भाग्य विधत्री यानी की मां जगदंबा मां शारदा बुझते परी अच्छी लेने समझ पी थी की इस युग के विदेशी भाव के महाप्लावन ये महापुर ये सुनामी जो है उसमें से यदि भारतीय संस्कृति की रक्षा एन कर सके तभी यदि भारतीय संस्कृति की रक्षा एन हुई तो ऐसी कोई मजबूत फाउंडेशन स्ट्रांग फाउंडेशन नहीं रहेगा की जिसके ऊपर में पश्चिम और पूर्वी दोनों सभ्यता के संगम का एक नया महल एक नया सभ्यता निर्माण हो पे इसीलिए उन्होंने भारत में जन्म ग्रहण करके इन गन राशियों को फिर से पुनर्जीवित किया है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति