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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप पिणे अवतार षय राम कृष्णाय ते नमः तो इस सप्ताह से तो दुर्गा पूजा है इस सप्ताह मां की ही बातों को थोड़ा सा आगे बढ़ाएंगे हमने देखा कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर आ रही थी और रास्ते में टाका बाबा के साथ में मुलाकात हुई और इस घटना के बहुत सारे तात्पर्य भी हमने देखे क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं है कि मां और डकेट बाबा इन दोनों के बीच में बात यह है कि आप पूरे विश्व का इतिहास देखिए कि जब भी जिनको कि निम्न वर्ग या निम्न वर्ण या निन जाति कहा जाता है कहा जाता था उस समय में उनको अपना यदि भविष्य बनाना था उनको यदि अपनी परिस्थिति सुधारने थी तो उनको एक ब्लडी रेवोल्यूशन एक रक्तपात वाला एक क्रांति उनको लाना पड़ा यह हमने सभी देशों में देखा है यह रशिया में भी सोवियत यूनियन बना यहां पर हमारे बगल में चाइना कितने ही सारे एशियन कंट्रीज को देखिए अफ्रीकन कंट्री साउथ अमेरिका न कंट्रीज सब जगह पर कुछ ना कुछ वो एक एक रक्तपात और क्रांति राजनीतिक क्रांति उनको आना पड़ा है तभी कहीं जाकर के निम्न वर्णों की निम्न वर्ग की अवस्था कुछ बेहतर हो पाई है जबकि भारत में ऐसा हुआ है कि जिनको कि उच्च वर्ण कहा जाता है हमने अपने हाथों से उनकी परिस्थिति को सुधारने का प्रयास किया है यह बात और कहीं पर भी नहीं हुई जहां पर भी जिन लोगों के पास में पावर है जिन लोगों के पास में जमींदारी है जिन लोगों के पास में यह राजाशाही है उन्होंने अपने से वॉलंटिली अपनी सत्ता अपनी अपना प्रभुत्व अपना आर्थ नैतिक प्रभुत्व कभी उन्होंने त्याग नहीं किया यह त्याग सिर्फ भारत में हुआ है उच्च वर्ण या तो उच्च वर्ग इन लोगों ने सामने से निम्न वर्ण या निम्न वर्गों को ऊपर आने के लिए रा बनाया है यह भारत की एक यूनिक हमारी सिविलाइजेशनल अचीवमेंट है हमारी सांस्कृतिक उपलब्धि है और इसके पीछे में हिंदू धर्म के भीतर में रहे हुए गभीर आध्यात्मिक तत्व ही इसके लिए जवाबदार है हिंदू धर्म के भीतर में जो गंभीर आध्यात्मिकता का गंगा प्रवाह बह रहा है युग युग से इसी की वजह से भारत में रक्तपात भाई भाई में वर्ण वर्ण में वर्ग वर्ग में नहीं हुआ जिस तरह से दूसरे देशों में हुआ है अपना लास्ट सिविल वॉर यदि कहा जाए तो वह महाभारत में हुआ था भाई भाई के बीच में युद्ध उसके बाद से देखे कि हम लोग बाहर के लोगों से पराजित हुए हैं हमने आपस में हो सकता है कि एक दूसरे की शायद इतनी सहाय ना की हो किंतु हम लोग आपस में मिलकर के लड़े नहीं है जिस तरह से बाकी सब देशों में होता आया है तो यह अपना स्पिरिचुअल एक उपलब्धि और उसी का एक उदाहरण स्वरूप है मां और यह डकेट बाबा की यह मुलाकात और इसी न्यू के ऊपर में ही आधुनिक भारत का घडतर हुआ है स्वामी जी जब पूरे भारत में घूम कर के उन्होंने देखा कि भारत के एक बहुत बड़े मेजॉरिटी ऑफ इंडियंस की परिस्थिति ऐसी है कि उनको बेचारे को दो वक्त की रोटी भी नहीं मिलती पहनने के लिए कपड़ा नहीं है वस्त्र नहीं है रहने के लिए घर नहीं है जब यह सब उन्होंने देखा तभी जाकर के उन्होंने अपना जो वैदिक महामंत्र है अहम ब्रह्मास्मि उसी का जो दूसरा स्वरूप है शिव ज्ञान से जीव सेवा आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च यह अहम ब्रह्मास्मि का ही दूसरा स्वरूप है जैसे कि एक सिक्के की दो दो साइड होती है ना तो एक यही यह अद्वैत ब्रह्म ज्ञान की दो पहलू है एक पहलू में कहते हैं अहम ब्रह्मास्मि दूसरे पहलू में कहते हैं आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च तो यह हो गया उस घटना का तात्पर्य और उसके बारे में हमने की हुई चर्चा आज थोड़ा सा आगे देखते हैं इस चैप्टर वह चैप्टर समाप्त हो गया आज से नया चैप्टर प्रारंभ हो रहा है बिंदु वासिनी इस चैप्टर का प्रारंभ करते हैं गंभीरा नंद जी महाराज क्या लिखते हैं श्री मां के आमरा पूर्वे जोखन कामर पुकुर एवं दक्षिणेश्वर श्री रामकृष्ण सका से देखिया छी तखन तहर शसुर भैरवी ब्राह्मणी मध्यम जा अथवा भागने हृदय प्रवृति तहर गतिविधि अनेकांत कोरीते जब भी हमने श्री मां को अभी तक ठाकुर के साथ में देखा है तो या तो फिर जयराम बाटी में हो ना कि कामर पुकुर में हो ना कि फिर दक्षिणेश्वर में देखा है कि हमेशा दूसरे लोगों ने ठाकुर की सेवा का प्रथम भाग प्रथम हिस्सा उनके हाथ में आता था जो चाहे वह भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर के साथ में सबसे ज्यादा रहती हो या तो फिर ठाकुर की माताजी चंद्रा मणि देवी हो या तो फिर भागने उनका जो भांजा हृदय है वह हो ना कि फिर जैसे कि रामलाल की मां वह वगैरह सब बाकी सब स्त्रियां या तो फिर सेवक जो थे वह ठाकुर के साथ में उतना ही समय बिताया करते थे तो मां का जो कार्य है वह हमेशा एक तरह से देखा जाए तो थोड़ा सा यह हो जाता था कि इन लोगों को पहले प्राधान्य पहली प्राथमिकता बाद में प्राथमिकता मां की और मां की गतिविधि अनेकांत नियंत्रित करी तेन मां क्या करेगी मां कैसे ठाकुर के साथ में समय बिताए गी ठाकुर की किस तरह से सेवा करेगी यह लोग बहुत हद तक इस बात को नियंत्रित करते थे सतन श्री रामकृष्ण सही तहर संबंध ज तोई निबी होकना केनो इसी वजह से ठाकुर के साथ में मां का संबंध कितना ही घनिष्ट हो ना क्यों उहा बही प्रकाश एकटा अश्व छंद छलो मां के साथ में ठाकुर का संबंध जितना भी घनिष्ठ हो इस संबंध के साथ में उसका जो बही प्रकाश है उस बही प्रकाश में हमेशा एक तरह से एक नियंत्रण रहता था अस्वा छंद स्वच्छंद अर्थात कि मुक्त मन से जो आप कार्य कर सकते हैं अस्वा छंद अर्थात कि मुक्त मन से ना कर सके इस तरह का कार्य तो ठाकुर के साथ में मां का व्यवहार मां की बातें ठाकुर की मां की सेवा ठाकुर को यह सभी चीजों के ऊपर में एक तरह का नियंत्रण रहता था वर्तमान आमरा से दैव संपर्क के पाइबो ता दृश संकोच होते मुक्तो अभी किंतु क्या हुआ देखिए हृदय का तो दक्षिणेश्वर से विदाई हो चुकी उसने अपने ही घमंड में अपनी पीठ में छुरी मारी ऐसा कह सकते हैं तो हृदय का तो वहां से विदाय हो गया भैरवी ब्राह्मणी की भी विदाई हो गई मां की जो सास थी चंद्रा मणि देवी उनका तो निधन हो गया महासमाधि हो गई और फिर यह जो रामलाल की मां वगैरा जो थे वे तो रहते थे कमार पुकुर में तो यहां पर दक्षिणेश्वर में सर्वप्रथम हम पाएंगे कि मां की सेवा का प्राधान्य हमको अभी पहली बार देख रहा है वर्तमान से दैव संपर्क के पाइबो ता ष संकोच ईते मुक्तो वर्तमान में अभी हम इस देव संपर्क जो है वो जो पहले का संकोच था उससे मुक्त हुआ पाएंगे अभी मां और ठाकुर के बीच में ना ही भैरवी ब्राह्मणी है ना ही चंद्रा मणि देवी है ना ही हृदय है ना ही और कोई मां का ही प्रधान प्रधान कार्य है मां का ही प्राधान्य अभी ठाकुर की सेवा में सबसे ज्यादा है बाद बाद में यह त्यागी संतान आना शुरू हुए किंतु इन त्यागी संतान और यह हृदय या भैरवी ब्राह्मणी इन सब में फर्क क्या है जितने भी त्यागी संतान थे वह मां को भी इतने अनुग थे जितने कि वह ठाकुर के थे तो ऑन दी अदर हैंड य भैरवी ब्राह्मणी वगैरह तो मां के सीनियर थे तो मां को उनकी बात सुननी पड़ती थी जबकि त्यागी संतानों को तो मां स्वयं आदेश कर सकती थी ठाकुर ने यह जो बूढ़ो को महाराज अर्थात की अद्वैतानंद जी महाराज और लाटू अर्थात की अदभुता आनंद जी महाराज इन दोनों को मां को कहा था कि इन दोनों के पास से कोई भी कार्य करवाना हो करवा सकते हैं और नरेण है बाकी जो नरेण है राखल है वे लोग मां के साथ में सीधे संपर्क में शायद नहीं आते थे मां के साथ में बात नहीं होती थी किंतु मां के ऊपर में इनकी श्रद्धा भक्ति थी वो अत थी अर्थात कि मां का ही अभी ठाकुर के जीवन में सबसे ज्यादा प्राधान्य था स्वाधीन सौंदर्य विलास मध्य अर्थात कि स्वाधीन सौंदर्य विलास देखिए कि कितना सुंदर शब्द प्रयोग किया है अभी ठाकुर और मां के बीच में और कोई नहीं है स्वाधीन सौंदर्य विलास इन दोनों के बीच का जो संबंध है उसका जो सौंदर्य है अभी वह स्वाधीन ता पूर्ण पूर्वक वह खिल रहा है वह ब्लसम हो रहा है अथ च से स्वातंत्र मध्य कोनो फेनी लता नाई हालांकि इस स्वतंत्रता जो मिली है मां को मां को ठाकुर की सेवा करने की इसमें किसी भी तरह का कोई भी एक छिछराना है कोनो उलता नाई किसी भी तरह का ये नोइज नहीं है किसी भी तरह का यह डिस्टरबेंस नहीं है एक डीप शांत उस स्वभाव का मां और ठाकुर का यह नाता है तहर प्रति गति स्थिर धीर स्वच्छ नया विराम नयनाभिराम चाको चिको मोए मां की प्रत्येक कार्य गति यथी धीर स्थिर स्वच्छ नयनाभिराम अर्थात की सौंदर्य मण और चाक चिक्य मय एकदम स्वच्छ और एकदम जिसको कहेंगे एफिशिएंट किसी भी तरह का इसमें वोह यह नहीं था डिस्टरबेंस नहीं था किसी भी तरह का कोई एक वेस्ट नहीं था सब कुछ बड़ा ही एफिशिएंटली चल रहा था ई स्वाधीनता मध्य लज्जा पटा ब्रता पवित्रता स्वरूपिणी श्री मायर सात्विक क्रिया बली की अपूर्व रूप धारण करिया छलो ताहा प्रण दन योग्य यह स्वाधीनता के बीच में भी लज्जा पटा वृता हमेशा लज्जा रूपी पट से आवृत्ता पवित्रता स्वरूपिणी मां की सात्विक क्रिया वली मां के सात्विक कार्य क्या अपूर्व रूप उसने धारण किया था ताहा प्रण दन योग्य उसको अभी हम चिंतन कर सकते हैं वह प्रधान के योग्य है दक्षिणेश्वर शंभू मल्लिक के निर्मितो गृहे श्री मायर अवस्न कालेर कथा छड़िया दिले दक्षिणेश्वर में शंभू मल्लिक के द्वारा जो निर्मित गृह था उसमें जो कुछ समय मां रही थी उस समय को यदि बाद दे देते हैं उस समय को फिलहाल छोड़ देते हैं ता होले ताहर तथा का अवशिष्ट जीवन सल्पा अतन नहते काटिया छलो माका जो दक्षिणेश्वर में बाकी का जीवन था वह अल्प परिसर स्वल्पा आयतन अर्थात कि अल्प आयतन अर्थात की आकार स्वल्प अर्थात की छोटा छोटे आकार का यानी कि छोटा घर जो नबत था उसी में बीता था व्यवहारिक दृष्टि से श बड़ो कोस्टर जीवन व्यवहारिक दृष्टि से यह बड़ा ही कष्ट का जीवन था श्री मायर विभिन्न समर उक्ति ईते ताहा स्पष्ट प्रतीत होए मां के विभिन्न समय की बातों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है तिनी बोलिया लेन उन्होंने कहा था ठाकुरर से बार जनने जखन नबत खाना छिल तखन की कोस्ट ना छोटो रटी ते थकते होतो ठाकुर की सेवा के लिए जब मैं नबत में थी तब कितने कष्ट में ही ना मुझे दिन निकालना पड़ता उ छोटे घर में रहना पड़ता तार भीतर कतो शब जिनिस पत्र उसी छोटे घर के भीतर में ही कितनी सब चीजें थी कोखोनो कोखोनो ए काओ छिन कभी-कभी मुझे वहां पर अकेली भी रहना पड़ता था मध्य म गुलाप गौरी दसी एरा शब थाक तो तो बीच-बीच में गुलाप मां गौर दसी वगैरा वहां पर रहते गुलाप मा योगिन मा गौर दसी यह सब ठाकुर के प्रधान महिला भक्त उसमें भी बाद में गोलाप मां और योगेन मां मां के उन्होंने मां की सेवा में ही अपने जीवन को समर्पित किया था जया और विजया की तरह दुर्गा रूपी मां की उन्होंने सेवा की थी टक घर ही म राना थाका खावा श इतना सा घर उसी के भीतर में खाना बनाना रहना सब करना है ठाकुरे रानना हो तो ठाकुर का खाना बनता था प्राय पेटे अशुभ छलो कि ना प्रायः नियमित रूप से ठाकुर को पेट का रोग तो लगा ही रहता था काली भोग सहज होतो ना मां काली के लिए जो भोग अर्पित होता था जिसको कि बाद में ठाकुर के घर में लाया जाता था ठाकुर उसको नहीं खा पाते थे काली का भोग सहन नहीं कर पाते थे अपर शभ भक्तो दे राना होतो और जो काली का भोग नहीं खा पाते थे इसीलिए फिर ठाकुर के लिए उनके लिए सुपाच्य खाना सहज से डाइजेस्ट हो जाए इस तरह की सब चीजें मां बनाया करती थी और इसी उपलक्ष में ठाकुर की वह जो बात है कथा में ठाकुर कहते हैं कि एक मां के कितने संतान है उसमें से कोईकोई संतान के लिए मां यह मसाले वाली तरकारी बनाते हैं बनाती है किसी बच्चों के लिए जिसका कि डाइजेशन अच्छा है उनके लिए तेल में तल तर तेर करके मने फ्राई करके मछली बनाती है और जिसका डाइजेशन अच्छा नहीं है उनके लिए मां इस तरह से सुपाच्य खाने का बंदोबस्त करती है और यही बात देखिए कि हम ठाकुर और स्वामी जी के जीवन में पाते हैं एक बार जब स्वामी जी अर्थात कि उस समय के नरेन नरन जब नबत में आया ठाकुर ने मां को कहा था कि नरेण के लिए खाना बनाना फिर बाद में ठाकुर ने नरेद को पूछा कि अच्छा खाना कैसा हुआ बताओ तो नरेद ने उत्तर दिया कि बहुत अच्छा ऐसा लगा जैसे कि मैंने रोगी का पथ्य खाया हो रोगी का डायट खाया हो इसके बाद में फिर ठाकुर ने मां को समझाया कि उनके लिए जिस तरह का खाना बनाती है मां ठाकुर के लिए उस तरह का नहीं जब नरेण आता है तो मोटी मोटी रोटी और फिर यह वो मटर की दाल ऐसा कुछ उसके लिए गाड़ी मटर की दाल यह सब नरन के लिए छोला डाल छोला डाल यस छोला डाल चने की दाल अच्छा अच्छा अच्छा हां तो वो चने की दाल गाड़ी चने की दाल वो नरन के लिए बनाए तो ठाकुर जो उदाहरण देते हैं देखिए कि जीवन के साथ में भी उसका इस सब उदाहरण का कितना सीधा संपर्क है तो यहां पर ठाकुर के लिए भी खाना होता था फिर बाकी जो सब भक्त आते थे उनके लिए भी खाना होता था लाटू छलो राम दत्ते संगे रागा रागी कोरे लो लाटू था रामदत्त के साथ में झगड़ा करके चला आया ठाकुर बोलले ए छले टी बेश व तो मदा ठसे देवे ठाकुर ने आकर के कहा मां को यह लड़का बहुत अच्छा है तुम्हारे लिए रोटी हो ना कि पूरी हो यह बनाने के लिए आटा जब बनाना पड़ता है तो यह लड़का आटा बना देगा उसके लिए दिन रात राना हो दिन रात खाना ही बन रहा है य होई तो राम दत्तो लो गाड़ी थे के ने मेंही बोल से यह अभी हुआ तो राम दत्त आया गाड़ी में से निकल करके ही उसने कहा आज छोला और डाल और रोटी खाओ आज मैं छोला की डाल छोला अर्थात की मटर ठीक तो मटर की दाल और रोटी खाऊंगा आमी सुनते पे नहीं आमी सुनते पे एक खाने राना चाप दत मैं सुन कर के ही यहां पर खाने के लिए रसोई तैयार करने लगती तीन चार शेर मैदा रोटी हो तो तीन चार शेर मैदे की रोटी होती राखल थक तो तार जन्नो प्राय खिचड़ी होतो राखल रहता राखल के लिए नियमित रूप से खिचड़ी होती अभी राखल महाराज का हो सकता है राजा महाराज का उनका भी डाइजेशन ठीक नहीं होगा तो उनके लिए खिचड़ी बनती थी सुरेन मिति मासे मासे तो सेवाय दोष टा का कोरे दी तो सुरेश मित्र बीच बीच में भक्तों की सेवा के लिए रुप करके देता था महीने महीने ₹1 देता था बूढ़ो गोपाल बाजार करतो बूढ़ो गोपाल अर्थात की भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज वह मां के लिए बाजार में से जो कुछ भी लाना होता था वह लेकर के आते थे प्रथम प्रथम नबत घरे डुकटर में प्रवेश करती थी तो सिर पर लग जाता था क्यों क्योंकि वहां का दरवाजा था उसकी जो ऊंचाई थी उसकी जो हाइट थी वह थोड़ी सी छोटी थी छोटी थी क्या अभी भी वही पे है अभी भी वैसा ही है आप जद नबत में जाएंगे दक्षिणेश्वर में देखेंगे कि हाइट कम है आप जल्दी से भीतर में प्रवेश करने का प्रयास करें और यदि थोड़ा सा भी आप असावधानी रहे तो सर के ऊपर में लग जाएगा तो ये तो एक दिन कटे गलो एक बार तो सही सही में लग गया शेषे अभ्यास होए गी छलो आखिर में अभ्यास हो गया था और यहां पर देखिए कि मां जो शब्द व्यवहार करते हैं अभिस अभ्यास नहीं अभिस मां के बारे में गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं एक दो जगह पे कि मां की जो भाषा थी वह वैसे तो मां तो गांव में बड़ी हुई थी तो गांव की जो भाषा होती है उस तरह की मां की भाषा थी और फिर बाद में बहुत साल तक मां कलकाता में रही तो अभी कलकत्ता की भाषा भी धीरे-धीरे करके स ख रही है तो किंतु मां की भाषा में यह दोनों बातों का गांव का भी और शहर का भी इन दोनों का एक प्रवेश हो जाता था दोनों का हमको प्रकाश दिखता था जैसे वह ठाकुर ने मां को कहा था ना कि मैं बूढ़ा नहीं होने वाला हूं मैं पहले ही मैं मर जाऊंगा तो मां ने ठाकुर को समझाते हुए कहा केनो लोकेरा बोलबे ज कालीवाड़ा दू आछ अभी शब्द है प्र किंतु गांव की गांव के जो ढंग से मां कहती है पिर बिन तो ठाकुर ने फिर सामने क्या कहा था क्या आमी तो और पिर बन टरबीन होते जाओ ना मैं तुम्हारा पिर बन टरबीन होने वाला नहीं हूं तो ये ठाकुर और मां दोनों की भाषा बड़ी ही मधुर थी ठाकुर ऊपर से थोड़े से तोतला दे भी थे हालांकि अभी तोतला ठाकुर कैसे बोलते होंगे उसका स्पष्ट आभास हमको इतना नहीं मिलता है क्योंकि लिखे हुए शब्द है तो तो लिखे हुए शब्दों में वो तोतला तो आप ला नहीं पाएंगे किंतु जो भाषा जब इकट्ठी होती है ये जैसे गांव की या शहर की तब यह वो ये लिखी हुई किताब में उसका हमको एक आभास मिलता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अपने लाटू महाराज लाटू महाराज वो जो गांव जो उनकी एक तो देहाती हिंदी वह जानते थे वो वो वहां पे थे तो फिर वहां से ये यहां पे आए कोलकात्ता में तो कोलकात्ता में जब आए तो वहां की बांगला सीखी तो एक तो देहाती हिंदी और बांगला इन दोनों का जो एक मिश्रण होकर के लाटू महाराज की भाषा बड़ी ही सुमधुर हो जाती थी इसके कई सारे उदाहरण है श्री श्री लाटू महाराज स्मृति कथा बोले एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट एक ग्रंथ है अभी इस ग्रंथ को आप पढ़ेंगे देखिए कि उसके जो लेखक है उन्होंने लाटू महाराज की जो हिंदी मिश्रित बंगाली है हुबहू उन्होंने इसका यह दिया है लिपिबद्ध किया है अभी प्रॉब्लम यही है कि इस किताब का आप हिंदी ट्रांसलेशन इंग्लिश ट्रांसलेशन यह सब पढ़ेंगे तो उसमें यह जो यूनिकनेक्ट ट्रांसलेशन करना है तो जिनको हिंदी बांगला आती है उन लोगों को लाटू महाराज की जीवनी पढ़ने का बड़ा ही आनंद आएगा दोर्जर सामने गलेई माथा नुए आतो इसीलिए जब अभी धीरे-धीरे मां को अभ्यास हो गया था कि ऊंचाई वाला जो दरवाजा है उसमें प्रवेश करने से पहले ही सर उनका झुक जाता था कोलकाता होते सब मोटा सोटा मे लोकेरा देखते जेतो कोलकात्ता से सब बड़े मोटा सोटा अर्थात की मोटी सब स्त्रियां मां को देखने के लिए जाती आर दोर जार दुई दी के हाथ दिए दाढ़ बोलतो और दरवाजा दर्जा दर्जा जो है उनके दोनों पूरा हाथ फैला करके बोलती की आहा की घोरे माद शती लखन गो जनो बनवास गो आहा कैसे छोटे से घर में हमारी सती लक्ष्मी है अर्थात की मां शारदा है जेनो वनवास गो जैसे कि वनवास में रहती है जो वो अभी क्या है कि शहरों में तो खाना पना थोड़ा सा अच्छा मिलता है तो वह थोड़ा वेट भी बढ़ेगा तो मां तो एकदम दुबली पतली थी पहले बाद में बाद में थोड़ा सा वेट हुआ होगा शायद कि किंतु शुरू में तो बड़ी ही दुबली पतली थी तो वैसे मां को रहने में कोई दिक्कत नहीं होती थी किंतु कलकत्ता से जो स्त्रियां जाती थी वह दरवाजा की साइज दिखा कर के कहती थी कि अरे किस तरह के कमरे में किस तरह के घर में हमारी सती लक्ष्मी रह रही है रात चार टाई नाई तुम रात को चार बजे में स्नान करती नेर बेला बोई काले सड़ते एकट रोध पड़तो ताते चूल शका तु दिन के समय में सीढ़ी के पास में थोड़ा सा धूप गिरता उस समय में अपने बाल सुका तो खन माथा नेक चूल छलो उस समय सर पे अनेक बाल भी थे नबत नीचे एकट खाली घर बा ता आबार जिनिस पत्रे भरा नबत के नीचे में जो एक खाली घर था वह फिर सब चीजों से भरा हुआ था ऊपरे सब सीके झुल से ऊपर में सब सीके अर्थात कि यह रस्सी से जो हांडी वगैरह बांध करके वो छ उसके ऊपर में सीलिंग के ऊपर में लगा देते हैं जैसे कि उसमें कीड़ी वगैरह ना प्रवेश करें चीटी वगैरा इसके लिए उसको कहते हैं सीके तो इसको वह सीके झूलता रहता है रात्रे सुए छी माथार ऊपर माछ हांडी कोल कोल कर से ठाकुरे जन् सिंगी माछ झोल होतो कि ना रात को सोई है मां और सर के ऊपर में जो रस्सी से टांगी हुई जो सब हांडी वगैरह है बर्तन है उसमें मछली को रखा हुआ है पानी के भीतर में जिंदा मछली को तो वह मछली पानी में तैरे गी तो कलकल करके आवाज होगा और यह मछली क्यों रखी है ठाकुर के लिए शिंगी मांच का शिंगी नाम की मछली का झोल अर्थात की सूप बनता इसके लिए इस तरह से मां सोई है सर के ऊपर में वो टंग रहा है सब बर्तन इसमें मछलियां तैरती है और कलकल आवाज होता है शौ चर आर ना बार जन्नई जा कष्ट हो तो शोच के लिए और स्नान करने के लिए जाने में जो कष्ट होता वेग धारण करे कोरे शेश पेटे रोग धरे गीय छीलो वेग धारण करके करके आखिर में पेट का रोग लग गया था दिनर बेलाई दोर अभी यह देखिए कि यह बात जो है कि सोच के लिए व्यवस्था गांव में भी और शहरों में भी बहुत जगह पर नहीं है तो अभी कहीं जाकर के इतने सालों के बाद में हमारी गवर्नमेंट ने जो स्वच्छ भारत व जो अभियान चालू किया है उसमें इतने सारे टॉयलेट बने हैं और वह भी ऐसा भी मैंने एक दो जगह प पढ़ा था कि बहुत सारे लोगों को टॉयलेट वहां पे इनडोर टॉयलेट में फिर वो क्लीन करने का हैबिट नहीं है तो वैसे टॉयलेट वैसा ही पड़ा रहता है वो जैसी हैबिट है बाहर जाने की वैसी हैबिट बना के रखते है तो यह सब चीजें क्या है कि स्त्रियों के लिए है बड़ी उपकारी यदि हम अपना कल्चर चेंज कर पाए तो क्योंकि सिर्फ सुविधा उपलब्ध होने से नहीं होगा कल्चर भी इसके लिए चेंज करना पड़ेगा तो खैर मां की बात तो बिल्कुल अलग ही है और यह सब में वैसे ही न बाय द वे वेग धारण करे करे शेषे पेटे रोग धरे गए छलो वेग धारण करके करके आखिर में पेट का रोग लग गया था दिनर बेलाई दरकार होले रात्रे जते पार तु दिन को जरूरत पड़ती थी जद शौच जाने की तो वैसे तो व ठाकुर ने कहा था ना कि वह गांव की स्त्री है गांव की लड़की है पता नहीं यहां पर वह नबत में काली मंदिर में आकर के वह कैसे रहेगी जहां तहां जब चाहे वह बाहर में निकलेगी फिर लोग देखेंगे तो फिर मुझे लज्जित होना पड़ेगा तो यह बात सुनकर के मान ने मां काली को प्रार्थना की थी कि मां ठाकुर तो जो चाहते हैं वोह मैं फिर इसके बाद में ठाकुर ने प्रशंसा भी की कि देखो किंतु इतनी वो अपने को छुपा कर के रखती है कि अभी तक किसी की भी कंप्लेन नहीं आई किसी ने मां के ऊपर में दृष्टि नहीं डाली मुझे ही वो कभी नहीं दिखती है कालीवाड़ा ची अर्थात कि वो चीफ एडमिनिस्ट्रेटर वह भी कहता है कि मैंने सुना है कि मां यहां पे है किंतु कभी देखा नहीं तो यह बात जब भी ठाकुर ने कहा कि मैंने उसको कभी भी बाहर जाते नहीं देखा तो मां ने मां काली को प्रार्थना की थी कि मां ठाकुर तो जो चाहते हैं वह आप दिखा देती है तो आप मेरी लज्जा रक्षा करना तो मां ने कहा था कि इस तरह से मां काली ने मुझे सुरक्षित रखा था कि कभी भी वह घर के बाहर आएगी ठाकुर के दर्शन करने के लिए ठाकुर के लिए खाना लेकर के आएगी वह एक बात है किंतु इस तरह से शौच जाना स्नान के लिए जाना वस्त्र धोने के लिए इस ये सब चीजों के लिए जब मां वो नबत से बाहर आती थी तो कभी भी ठाकुर ने मां को नहीं देखा था तो यह सुनकर के आनंद तो बड़ा आता है कि देखिए कि सही सही में लज्जा पटा वृता लज्जा रूपी पट से आवृत्ता मां शारदा किंतु इसका वह जो दूसरा पहलू क्या है कि दिन में जद सोच जाने की जरूरत पड़ेगी तो मां तो नबत से बाहर नहीं आ पाएगी तो फिर वेग धारण करके करके पेट मां का जो खराब हुआ डाइजेस्टिव सिस्टम जो खराब हुई तो हमेशा के लिए फिर पेट का रोग वो लग ही गया दिनर बेलाई दरकार होले रात्रे जेते पार तुम गंगार धारे अंधकारे दिन के समय आवश्यक होने पर भी रात को जाना पड़ता गंगा के किनारे अंधेरे में केबल बोल तुम हरि हरि एक बार सोचे जते पार तुम सिर्फ कहती हे हरि हे हरी जदी एक बार में सोच के लिए जा सकती और ही मछु निरा छलो हमार संगी और वह जो मछवा वगैरह थी वह थी हमेरी संगी निया तारा गोंगा नाते ऐसे ओई बारां चुबी रेखे सब नाते नाप तो वे लोग गंगा में स्नान करने के लिए आती फिर यही मां के नबत के रांदे में उनकी वह जो मछली पकड़ने की यह जो वगैरह रहती है बास्केट वगैरह वह रख कर के स्नान करने के लिए गंगा में प्रवेश करती अमार संग कोतुल करतो मेरे साथ में कितनी बातें करती आबार जा बार समय चुबी गोली निए जेतो और जाने के समय बास्केट वगैरा लेके जाती राते लेरा सब माछ धर तो और गान गाई तो सुनत रात को मछुआरे मछली पकड़ते और मछली पकड़ते पकड़ते गान गाते वो मैं सुनती यह जो पूरा वर्णन श्री मा ने अपने ही श्री मुख से अपने ही बारे में उस दक्षिणेश्वर के दिनों का किया है बाहर से लगता है कि जैसे कितने कष्ट में रह रही है शौच को जाने के लिए सा दिन में नहीं जा सकती स्नान बड़े ही अंधेरे में सुबह को करना पड़ेगा एक बार तो मगरमच्छ के ऊपर में पैर पड़ गया उसके बाद में मां हमेशा दिया साथ में लेकर के जाती थी छोटी सी जगह है कलकत्ता से सब भक्त स्त्रियां आकर के वह कहती थी कि अरे कितनी किस तरह की जगह में हमारी मां रहती है जनो बन गो जैसे कि वनवास में मां सीता रहती है इस तरह से मैंने व भगवान राम के साथ में मां सीता ने जब वनवास एक्सेप्ट किया वनवास वन में जाना तय किया तो वहां पर कहां वह महल में वह बड़ी हुई है कहां यह वन में रह रही है तो यहां पर भी मां का भी जयराम बाटी था मां का महल सती लक्ष्मी का और वहां पर जिस तरह से मुक्त स्वच्छंदता पूर्णक वहां पर रहती थी और कहां यह दक्षिणेश्वर में वनवास में रह रही है किसी के सामने नहीं जाना गंगा के किनारे नहीं य शंभू मल्लिक ने मां के लिए जो घर बना कर के रखा था दक्षिणेश्वर गांव में वह इसीलिए बनाया था कि मां थोड़ा सा स्वच्छंदता से रह पाए घर से बाहर निकल पाए पड़ोसियों के वहां जा पाए किंतु फिर भी वहां पर मां का रहना नहीं हुआ किंतु देखिए कि ठाकुर की भी इस सब चीजों के ऊपर में नजर थी ठाकुर ने ही मां को कहा था कि तुम ज जनो बुनो पाखी खाचा थाक ले बेहते जाए ऐसा कुछ कि पंखी को जब सब समय पिंजरे में रखेंगे तो वह उसका स्वास्थ्य खराब हो जाएगा तो तुम एक काम करना शाम को शाम को दोपहर को दक्षिणेश्वर गांव में जाना और वहां के स्त्रियों के साथ में बातें करना थोड़ा सा घूम करके फिर आखिर में वापस आना तो मां भी ऐसा दोपहर को जाती थी दक्षिणेश्वर गांव में स्त्रियों के साथ में बात करती थी उनकी सहेलियों के साथ में और फिर रात को जब संध आरती हो जाती थी तब दक्षिणेश्वर में नबत में वापस आती थी काली मंदिर में तो इस तरह से ठाकुर तो ठाकुर भी यह सब चिंता किया करते थे मां के लिए किंतु फिर भी अब ज्यादातर समय तो आपको नबत में ही रहना है और नबत में इस तरह के कष्ट में ही रहना है श्री मा नबत नीचे घोरे थाकी तेन एवं सीढ़ी नीचे राना कोरीते नबत दो मंजिला एक मां ग्राउंड फ्लोर पर पहली मंजिल पर रहती थी और सीढ़ी के नीचे सीढ़ी अर्थात की स्टेयर केस उसके नीचे में खाना पकाती थी तीनी दबा भागे बाहर आशीते ना दिन के समय मां नबत के बाहर नहीं आती नहते ताहर दैनिक कार्ज धारा श्री जुक्ता जोगिन मा रूप वर्णना कोरिया च लेन नबत में मां का दैनिक जीवन योगिन मां ने इस तरह से वर्णित किया है श्री मां भोर चारो टार आगे शौच और स्नानादि शेरे ध्यान बसते श्री मां सुबह को 4 बजे के पहले ही शौच और स्नान दोनों समाप्त करके ध्यान के लिए बैठती ठाकुर ध्यान करते बोलते कि ना ठाकुर कहते थे कि ध्यान करना इसलिए मां ध्यान करने के लिए बैठती थी एर परे बाकी काज करमो शेरे पूजाई बोस्टन इसके बाद में बाकी जो कार्य वगैरह है समाप्त करके पूजा कर ने के लिए बैठती पूजा जप ध्यान ते प्राय डेढ़ घंटा केटे जेतो पूजा जब ध्यान यह सब करते करते ऑलमोस्ट डेढ़ घंटा समाप्त हो जाता तार पर सिर नीचे राना कोते बोसते उसके बाद में सीढ़ी के नीचे में खाना बनाने के लिए बैठती रानना होले ज दिन सुजो घट तो सेही दिन मा निजो हाते ठाकुर के नानेर जन्नो तेल माखी दते खाना बनाने के बाद में जब यदि सुयोग मिलता सब समय तो ठाकुर के साथ में कितने ही लोग रहते थे किंतु ऐसा कोई सुयोग मिला कि ठाकुर अकेले है ठाकुर ने मां को पुकारा है तो मां ठाकुर को स्नान के पहले उनके शरीर पर तेल लगा देती साढे ए टार म ठाकुर आहार करते हैं 10:30 11 के आसपास में ठाकुर आहार करने के लिए बैठते तिनी नाने जते मां ए ताड़ा तड़ी ठाकुर पान सेजे नजर रखते ठाकुर स्नान करे फिरे एलेन की नाथ उसके बाद में वह स्नान करने के लिए जाते तो मां जल्दी जल्दी से ठाकुर का पान बना करके पान तैयार करके नजर रखती कि ठाकुर स्नान करके वापस आए हैं कि नहीं तीनी तार रे एले मा एसे जोल आसन दिए तार परे ारे ला निए ऐसे ताके आहारे बसीए नाना कथ मध्य दिए चेष्टा करतन जाते खा बार समय भाव समाधि उपस्थित हुए आहारे बग्नो ना कोटाए स्नान करने के लिए व खाने के पहले ही जाते और जब स्नान करने के लिए जाते उस समय मां ठाकुर के लिए पान तैयार रखती और फिर जैसे ही ठाकुर स्नान करके आ गए मां क्या करती जल और आसन और उसके बाद में खाने का थाला यह सब ले आकर के उनके कमरे में उनको आहार करने के लिए बैठती और बातों बातों में ही ठाकुर का मन भुलाने का प्रयास करती जैसे कि ठाकुर खाने के समय कहीं भाव या समाधि में ना चले जाए एक मात्र माई खबार समय तार भाव समाधि आशा नेक टा ठेकी रखते पतन मां ही थी मां की बातें ही थी जो कि ठाकुर को ठीक से खाने देती जिस जिसकी वजह से मां की बातों की वजह से ठाकुर बिना भाव या समाधि के खाना आहार संपूर्ण कर पाते आर कारों से साध्य छलो ना और किसी का यह साध्य नहीं था और किसी के बस की यह बात नहीं थी कि ठाकुर के मन को पृथ्वी पर संसार में रख पाए उनका जो उर्ध्व गति मन था सहज उर्ध्व गति मन वो हमेशा ईश्वर के पास में भा समाधि में लीन होना चाहता था माही खाने के समय सब बातें करती जिससे कि ठाकुर को भी कुछ ना कुछ हो सकता है उत्तर देना पड़ता या तो फिर ध्यान से सुनना पड़ता और इसी वजह से बिना किसी समाधि या ध्यान की व विघ्न के वो आहार कर पाते हैं वाह ये ध्यान और समाधि प्राप्त करने के लिए ऋषि मुनि गण हमारे जैसे साधक लोग जन्म जन्मांतर तक कोटि कोटि सालों तक तपस करते हैं और ठाकुर के जीवन में है कि ध्यान और समाधि बाधा स्वरूप हो जाते हैं आहार करने के लिए दैनंदिन कार्य समाप्त करने के लिए मने कितना डिफरेंस है हमारे में और अवतार में ठाकुरे खावा होले मां एकट किछु मुखे दिए जोल खेनी तेन ठाकुर का खाना आहार हो जाने के बाद में मां कुछ ना कुछ मुंह में डाल कर के फिर पानी पी लेती किछ एक टू की छु मु खे दी है मने कुछ ना कुछ कुछ थोड़ा सा बहुत कुछ मुंह में डाल कर के पानी पी लेती अर्थात कि मां को खुद के खाने की इतनी चिंता नहीं थी ठाकुर को बैठ कर के शांति से पानी का लोटा और आहार का थाला वगैरह सब सजा करके मां ठाकुर को खिलाएगी किंतु अपने खुद के बारे में जब ने की बात आती है तो जल्दी-जल्दी जो कुछ भी बचा है थोड़ा सा आहार वह कर लेती परे पान शते बोस्टन उसके बाद में पान सजाने के लिए बैठती पान साजा होए गेले गुनगुन कोरे गान गाई तेन पान सजा लेने के बाद में धीरे-धीरे करके गुनगुन करके मां गान करती ता खूब सावधान है किंतु वह बड़े ही सावधानी पूर्वक जेन क्यों ना सुनते पाए जिससे कि कोई सुन ना पाए र पोरे कोलेर स एकटर बासी बेजे उठ तो जाके ठाकुरे मा वृंदावन कृष्णेर मांसी बोलते हैं उसके बाद में ही पास में ही कल अर्थात की एक फैक्ट्री थी कारखाना था उसमें यह जो ये होती है ना विसल होती है वह बड़ी सी वह बज उठती 1 बजे की जिसको की ठाकुर की मां वृंदावन की वृंदावन में कृष्ण की बांसी बल द ताई सुने तीनी खेते बोसते वो एक बजे की विसल सुनकर के मां खाने के लिए बैठती यहां पर देखिए कि चंद्रा मणि देवी के बारे में बात की गई है कि चंद्रा मणि देवी कहती थी कि यह फैक्ट्री जो है यह कारखाना जो है उसकी यह विसल है यह वृंदावन में कृष्ण की बांसी है और इसका अर्थ है कि भगवान कृष्णा का भोग जो है वह हो गया है और इसको सुनने के बाद में ही वह आहार करने को बैठती अभी ऐसा होता कभी-कभी कि संडे है तो छुट्टी होगी तो फैक्ट्री में तो वह विसल तो बजेगी नहीं तो छुट्टी के दिन है या तो फिर जब चंद्रा मणि देवी बीमार होती थी तब यह सब लोग आग्रह करते थे ठाकुर और हृदय उस समय हृदय भी था कि आप थोड़ा सा आगे आहार कर लीजिए 1 बजे आपके लिए देरी हो जाएगी इतना कष्ट आप नहीं सहन कर पाएंगे और आजकल जो यह ब्रेकफास्ट की प्रथा जो हमारे यहां पे है उसकी ब्रेकफास्ट रूपी जो कि सुबह को उठकर के ही आहार करना कुछ ना कुछ नाश्ता करना चाय पीना वह सब तो उस समय में इतना नहीं था सुबह दोपहर का जो खाना है वो खाया वही उनका मुख्य आहार उठने से बाद में रहता था इसीलिए तो हमने देखा कि ठाकुर 10:30 11 के आसपास में आहार करने के लिए बैठ जाते बहुत ज्यादा उपवास करेंगे 1 बजे तक तो कुछ भी खाना नहीं खाया 1 बजे तक रहना तो बड़ा ही मुश्किल है तो जब चंद्रा मणि देवी को अपनी मां को ठाकुर और हृदय कहते कि आप खाना खा लीजिए तो बड़ी ही वह जिद करती कि नहीं यह जो फैक्ट्री यह जो कृष्ण की वांसी है यह जो वृंदावन का वह जो यह शंख है वो जब बजेगा तभी मैं खाऊंगी तो अभी इसलिए अभी कभी-कभी यह हृदय क्या करता कि व पीछे में नबत के पीछे में जाकर के अपने से वह शंख वगैरह कुछ बजाता तो ये जिससे कि हो सकता है कि चंद्रा मणि देवी यह मान ले कि यह जो शंख हृदय ने बिजया है वही वह वृंदावन का शंख है या भगवान कृष्ण की मंसूरी है तो यह सुनकर के किंतु चंद्रावली देवी भी इतनी आसानी से भूलने वाली नहीं थी वोह हंसते हंसते कहती हद को कि ये तुमने ही बजाया है तुम इस तरह से मुझे मूर्ख नहीं बना सकते तो देखिए कि लोगों का जीवन कितना सरल होता था और एक बार मथुर बाबू ने चंद्रा मणि देवी को कहा बड़े ही आग्रह पूर्वक कि आप तो यहां पर रहती है इतने दिनों से ठाकुर के तो ठाकुर तो मेरे गुरु स्वयं है ठाकुर को ईश्वर मने ठाकुर के भीतर में मथुर बाबू को शिव और काली दोनों का दर्शन हुआ था तो आप एक कुछ मेरे से आप कुछ मांगिए मैं आपको कुछ देना चाहता हूं धनपति होते हैं ना उनको ऐसा लगता है धन ही है कि जीवन में सब कुछ है हालांकि बिना धन के भी रहना मुश्किल है किंतु एटलीस्ट धन सब कुछ है जीवन सर्वस्व है ऐसा धनपति लोग ही मानते हैं तो बार-बार चंद्रा मणि देवी को कहता है कि आप कुछ ना कुछ मेरे से मांग लीजिए मैं आपको कुछ देना चाहता हूं तो चंद्रा मणि देवी पहले तो बड़ी ही मना करती रही मेरे पास में तो तुमने सब कुछ दिया ही है आहार मिल जाता है रहने के लिए एक जगह है बीच-बीच में वस्त्र भी मिल जाते हैं तो फिर इससे ज्यादा और क्या चाहिए तो फिर भी मथुर बड़ा ही जीत करके बैठा उनके पीछे में लगा तो फिर चंद्रा मणि देवी ने आखिर में कहा मैं तमाकू खाती हूं तो वह तंबाकू थोड़ा सा खलास हो गया है समाप्त हो गया है एक काम करो थोड़े से तमाकू के ये जो पत्ते जो है वो पत्ते लेकर मुझे दे दो तो यह सुनकर के मथुर बाबू की आंखों में आंसू आ गए उन्होंने कहा कि इतनी त्यागी जननी नहीं होगी तो इतने त्यागी शवर संतान का जन्म भी उनकी कोख से होना कैसे संभव है तो यह थी चंद्रा मणि देवी तो वह फैक्ट्री की वह जो यह ससल बजती थी वह बोलती थी य कृष्ण के व वृंदावन में कृष्णा की बासी बज रही है तो मां मां शारदा भी ऐसा ही करती थी हालांकि मां को तो पता था कि वह फैक्ट्री की विसल है किंतु वो सुनने के बाद में एक बजे के बाद में ही मां आहार के लिए बैठती थी शतरा देता दटर आगे कोनो दिन मायर खाबा होतो ना इसी वजह से ढ़ दो के पहले दोपहर में डेढ़ या दो बजे से पहले मां का आहार कभी भी समाप्त नहीं होता था आहारे पोरे नाम मात्र एकट विश्राम करे सड़ते चूल सुखाते बसते तीन टे नागा आहार के बाद में नाम मात्र विश्राम करके थोड़ा सा विश्राम करके सीढ़ी के पास में अपने बालों को सुखाने के लिए बैठती तार पर आलो टलो ठीक करे तोला झोले नमो नमो करे मुख हाथ धुए पापड़ केचे संधार जनन प्रस्तुत होते उसके बाद में संध्या के लिए जो प्रदीप दिया वगैरह जो जलाना है वह सबकी व्यवस्था तैयार करके वह जो गंगा में से पानी निकाला गया है उसमें नमो नमो करके मुख हाथ धो कर के कपड़े धो कर के संध्या के लिए तैयार होती संध ने आलो दिए ठाकुर देवता ने धुनो देखिए मां ध्यानेश देन संध्या होने से प्रकाश का दिया लेकर के दिया जला कर के ठाकुर देवता के सामने ठाकुर देवता अर्थात की मां के घर में जो भगवान के जो फोटो रखे होंगे जो पट रखे होंगे उसकी बात उनके सामने धुनो देखिए अर्थात की यह अगरबत्ती वगैरा कुछ दिखा करके मां फिर ध्यान के लिए बैठती र पोरे रात्रे राना शकल खावा नो मां आहार करते इसके बाद में रात का खाना बनाना है खाना बना कर के सबको खिला करके मां खाने को बैठती तार पर एकट विश्राम करे सुए पड़ते इसके बाद में अल्प विश्राम करके मां सो पड़ तो यह था यह योगिन मां का विवरण बस आज यही तक कल अभी फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु