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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

दैवाधीन : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 21 June 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णायन श्री मां शारदा देवी का जीवन और चरित्र हम पाठ कर रहे हैं अभी आज से गंभीरानंद जी महाराज एक नया टॉपिक स्टार्ट कर रहे हैं कि किस तरह से जयराम बाटी में मां के घर में श्यामा सुंदरी देवी श्री मां शारदा देवी की मातृश्री उन्होंने जगद धात्री पूजा का प्रारंभ किया तो यहां पर जब हम यह पाठ करेंगे कि मां के घर में जगद धात्री का आगमन तो हमको यह भी याद रखना है कि जो जो जगत धात्री को आमंत्रण करती है वह खुद जगत धात्री है मां शारदा देवी का जीवन जिस तरह से मनुष्यवकाशा थी जयराम बाटी से जाने की मां का शरीर धीरे-धीरे करके वो असु स्थ हो रहा है और कुछ-कुछ लोगों को इस बात का अंदाज आ गया था कि इस बार जब मां जयराम बाटी से जाएगी तो हो सकता है शायद सदे है माने इस पंचमहाभूत के देह में वापस ना आए वैसे तो मां जयराम बाटी में सनातन रूप से निवास कर रही है नित्य श्याम नित्य ध्यान धाम यह जो कहा जाता है तो मां के बारे में तो वही है कि नित्य जयराम बाटी में मां की नित्य लीला तो चलती रहेगी बच्चों को आशीर्वाद देती रहेगी किंतु पंचमहाभूत के इस शरीर में रहकर के अभी यह लीला का संवरण होने को चला है तो आखिरी यात्रा जयराम बाटी से कलकत्ता तो साथ में वरदा महाराज है अभी हुआ ऐसा देखिए कि मां का यह जो मधुर व है कि दे वत्व और मानवत्वम इस दोनों का कैसा सुंदर संगम है रास्ते में जा रहे हैं कोतल परपुर से अभी देखा कि कोतल आपु पहुंचे अभी वहां पर ऐसा था ना अभी मां तो जा रही है पालखी में और जो साथ-साथ में जो भी थे यह राधू है माकू है नलिनी है और जो भी मां के जो शिष्य वगैरा है वे लोग जा रहे हैं वह बेलगाड़ी में तो वो बेलगाड़ी तो अभी वह दूसरे रास्ते से जाती है पालखी जो है पालखी में मां अपने अकेली दो पालखी में जा रही है और साथ में है वरदा महाराज तो अभी मां का भी स्वभाव ऐसा है कि सभी सब समय अपने बच्चों पर भी नजर रखना और एक बाल सहज बालिका सहज एक क्यूरियोसिटी ठाकुर का एक सुंदर वर्णन है कोलकाता में जा रहे हैं वो घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के और चारों ओर देख रहे हैं घोड़ा गाड़ी में से वो बाहर में कि यह जो कलकाता के अंदर रास्ते व जो फिर यह बड़े-बड़े महल जैसे मकान और यह सब और वहां पर वह जो कुछ लोग दारू पी रहे हैं और नशा कर रहे हैं तो उनको देख कर के ठाकुर को ईश्वरीय नशे का एक व एक ये हो जाता है याद आ जाती है उनके ऊपर में ईश्वरीय नशे का भाव हो जाता है तो मां भी ऐसा कि वह पालखी में बैठी है और पालखी में से वह चारों ओर देख रही है वो जंगल में से जा रहे हैं वन में से जा रहे हैं जिस रास्ते से जा रहे हैं पास में से तालाब जा रहा है तो सब कुछ देखती है और पूछती है बीच-बीच में कि अभी अभी हम कहां पे हैं क्या हुआ कहां तक पहुंचे कोतल आपु पहुंचे तो देखा कि कोतल परपुर में एक चोटी थी अभी एक वैरान रास्ता है वहां पर और तो कुछ होता नहीं है आजकल आप हाईवे से जर्नी करेंगे तो बहुत सारी होटल मिल जाएगी यदि आपको विश्राम करना है यदि आपको भोजन करना है उसके लिए होटल आपको बहुत सारी मिल जाएगी उस समय तो यह होटल वगैरह कुछ था नहीं तो एक चोटी जैसा एक गांव के बाहर में रहता था जैसे वह कामर पुकुर में था ना वहां पर वह सब साधु लोग गंगासागर जाने के लिए या तो पूरी जाने के लिए यात्रा करने के समय कामर बुकुर के बाहर में जो चोटी है वहां पर रुकते थे और यह श्री राम कृष्ण तब तो बालक थे तो बालक गदाधर के रूप में वहां पर जाकर के साधुओं की सेवा करते थे यहां पर श्री रामकृष्ण देव की माताजी श्रीमती चंद्रमणि देवी को यह सर के ऊपर में टेंशन हो गया कि यदि ये साधु लोग मेरे बच्चे को भगा कर के ले जाएंगे तो क्या होगा तो चंद्रमणि देवी ने ठाकुर को वहां पर भेजना बंद कर दिया और जैसे ही वो साधुओं को पता चला कि अरे वोह बच्चा तो बड़ा ही सुंदर बातें करता है इतनी छोटी उम्र में आध्यात्मिकता की इतनी सारी बातें करता है धर्म के बारे में जानना चाहता है और बच्चा एकाएक आ नहीं रहा है तो उन्होंने जाकर के चंद्रमणि देवी को पूछा उसके घर जाकर के ठाकुर के कि आप बच्चे को क्यों नहीं भेजती तो चंद्रमणि देवी कहती है कि आप यदि मेरे बच्चे को उठा कर के भगा के ले जाएंगे उसको साधु कर देंगे तो क्या होगा तो इन्होंने आश्वासन दिया कि नहीं हम आपके बच्चे का अपहरण नहीं करेंगे इसको जोर जबरदस्ती साधु नहीं बनाएंगे देखिए चंद्रमणि देवी को तब से जो चिंता थी कि जयदिश रामकृष्ण उनका बच्चा ज गदाधर यदि साधु हो जाएगा तो क्या होगा यह चिंता गदाधर को भी पता थी ठाकुर को भी पता थी इसीलिए जब तोतापुरी जी ने कहा कि तुम क्या सन लोगे तुम क्या वेदांत की साधना करोगे क्यों क्योंकि तुम वेदांत के लिए उपयुक्त अधिकारी हो उस समय श्री राम कृष्ण ने कहा था कि यदि छुपके छुपके मैं सन्यास ले सकता हूं तो ठीक है क्यों क्योंकि मेरी मां यहीं पर नबत में है और यदि मां को पता चला कि मैंने सन्यास लिया है तो बेचारी को सर पर क्या बीतेगी तो ठाकुर को तभी आखिर तक ठाकुर ने यह अपनी मां को कोई कष्ट न हो इस तरह से उन्होंने अपने सन्यास को छुपा के रखा था तो शुरू में भी जब मां को चिंता थी उस समय भी साधुओं ने आकर के आश्वासन दिया और बाद में भी ठाकुर ने जब सही सही संन्यास लिया तो भी मां से छुपा के रखा तो इसको चोटी कहते हैं गांव के बाहर में एक छोटा सा एक कुटीर जैसा होगा वहां पर यात्रालू लोग रुकेंगे अपने साथ में जो खाद्य सामग्री होगी उसमें से कुछ पका करके कुछ खाएंगे या तो फिर यह मुड़ी वगैरह जो कुछ होगा मुरमुरा वगैरह वो अपने साथ में जो कि लेकर आए होंगे उसको कुछ खाएंगे उसमें से तो वहां कोतल परपुर में पालखी को रोका गया फिर मां ने कहा कि चलो मेरे लिए कुछ खाने को मुड़ी वगैरह कुछ ले आओ वरदा महाराज को कहा कि ये जो पालखी वहन करने वाले हैं उनके लिए कुछ खाने को ले आओ और कहा कि वरदा तुम्हारे लिए तेले भाजा तुम्हारे और राधू के लिए तेले भाजा वगैरह कुछ ले आओ तेले भाजा अर्थात कि ये तली हुई कुछ वानगी कुछ आइटम जो कि आसपास की किसी एक दुकान में रहेगी तो पास में ही एक दुकान थी वहां से वरदा महाराज ये ले आए सब कुछ सब पालखी वाले को मुड़ी खाने को दी मुड़ मुड़ा खाने को दिया उन्होंने अपने से कुछ वह तेल की तेल में बनाई हुई कोई आइटम खाई और फिर वहां से निकले अभी बात ऐसी है कि कुछ थोड़ी देर के बाद में मां ने कहा अभी एक जंगल चालू हो रहा है वहां पर कोतल परपुर से जयपुर और जयपुर से विष्णु यह जो रास्ता है वह वैरान है और खास करके कतलपुर से जयपुर जाएंगे और जयपुर से जो विष्णुपुर जाएंगे वहां पर तकरीबन 8 किलोमीटर तक एक घना जंगल है और वहां पर बिल्कुल वैरान कोई वस्ती वगैरह कुछ नहीं है गांव नहीं है खेत नहीं है कुछ नहीं है और डके का सब समय भय रहता है तो जैसे ही उस रास्ते की ओर जा रहे थे मां ने वरदा महाराज को कहा कि अरे वरदा सुनो यह राधु की पालखी में ना एक बक्से में सब गहने रखे हैं राधू और माकू के तो देखना कि वह चूरी ना हो जाए तो अभी तो एकदम वर्धा महाराज टेंशन में आ गए कि अरे जंगल में से जा रहे हैं पालखी में बैठ कर के वह भी मां है राधू है साथ में और फिर गहने भी है और डकेट लोगों को तो इससे बड़ा प्रलोभन क्या चाहिए तो वरदा महाराज ने जाकर के पालखी वहन करने वाले का जो सरदार था उसका नाम था योगी दूले अभी योगी दूले जो था वो बड़ा ही मां का भक्त था और मां के लिए जान देने के लिए वह तैयार था यहां तक उसकी मां के प्रति भक्ति थी तो उस योगी दुले के पास जाकर के वरदा महाराज ने कहा कि अच्छा देखो मां को थोड़ा सा भय लग रहा है वह तो राधू भी है साथ में और फिर वे पालखी के भीतर में गहने भी है तो देखना कि कोई डकेट वगैरह आ जाए तो फिर बला हमको संभाल के रहना पड़ेगा डकेट का सामना करना पड़ेगा तो योगी दुले कहता है कि अरे आपको डर किस चीज का है हम पालखी बहन करने वाले वहन करने वाले 16 लोग हैं और हम सबके लिए एक मजबूत लाठी यह पालखी के नीचे में सजा करके रखी हुई है और जद हमारे रहते-रहते किसका साहस है किसमें यह दम है कि मां को हानि कर सके मां के ऊपर में कोई नजर उठा के भी देख सके मां के गहने चुरा सके तो जैसे ही योगी दुले ने ऐसा कहा वरदा महाराज थोड़े से आश्वस्त हुए और जंगल में से जाने लगे अभी जंगल 8 किलोमीटर का यह जंगल है जयपुर से विष्णुपुर तक का आध रास्ते में 4 किलोमीटर पार किया देखा कि वहां पे एक तालाब है और तालाब के किनारे एक दुकान है छोटी सी और वहां पर बैठने के लिए विश्राम करने के लिए बड़ी सुंदर व्यवस्था है तो मां ने वरदा महाराज को कहा कि अरे वरदा मैं बहुत लंबे समय से पालखी में बैठी हूं मेरे पैर अकड़ गए हैं एक काम करो पालखी को रोको मैं थोड़ी सी बाहर निकलती हूं थोड़े से मेरे पैरों को राहत मिले और यह जो दुकान है वहां से दो पैसे का तेल लेके आओ मैं थोड़ा सा तेल की मालिश करूंगी तो पैरों को राहत मिलेगी तो यह सुनकर के ही वर्धा महाराज बड़े ही टेंशन में आ गए क्यों क्योंकि वैसे ही घना जंगल है वैसे ही डाकुओं का डर है प्रख्यात है यह जगह की डके होती रहती है और देखा कि जो दुकान जहां पे मां ने ठहरने को बोला था 3032 पुरुष वहां पे गप लगा रहे हैं और कुली मजदूर टाइप के और अभी पता नहीं यह कोल मजदूर है न कि डकेट है न कि क्या पता 3032 लोग हैं यहां पालखी वाले हैं 16 लोग और वे है 30 32 तो ऑलमोस्ट डबल हो गई संख्या उनकी तो वरदा महाराज बड़े ही टेंशन में आकर के अभी मां को तो कह नहीं सकते कि मां ये लोग डके थे वगैरह वगैरह हमला करेंगे तो क्या होगा तो मां को मनाने के लिए कहते हैं कि मां अरे देखो यहां पे तो कुछ मिलेगा नहीं यहां तो यह जगह भी अच्छी नहीं है और चलो हम लोग यहां से आगे चलते हैं कैसे भी करके हम चले जाते हैं यहां से आगे अभी ऐसा कुछ कहते हैं तब तक वो माकू दी कहती है कि अच्छा मुझे बड़ी प्यास लगी है और यहां पे ये जलाशय भी है आप मुझे मुझे वहां प जाकर पानी पीना है तो माने जैसे ही माको दी ने ऐसा कहा तो मां ने भी कहा अच्छा ठीक है अरे जाओ ना जाकर के पानी पी लो ना उसमें क्या है वरदा तुम जाकर के माको को वहां वहां पर जाकर के पानी पिला केर ले आओ अभी वरदा महाराज बेचारे क्या करेंगे व वो 32 लोग में 30 लोग मजदूर बैठे हैं घनघोर जंगल है डकती का डर है उसी के भीतर में पालखी को रोका गया वो माक दी को जाकर के पानी पिलाया वह जलाशय में जाकर के मां के लिए तेल लेकर आए एक शाल पत्र में और मां फिर आराम से पालकी में बैठ कर के तेल मालिश कर रही है और फिर से यह पालकी उठा कर के उन्होंने आगे यात्रा प्रारंभ की अभी देखिए और फिर तो बाद में जयपुर बिना किसी विघ्न के विष्णुपुर बिना किसी विघ्न के पहुंच गए किंतु देखिए कि यहां पर वरदा महाराज को पहले से ही एक चिंता लग रही है कि बड़े ही टेंशन में है कि अरे यह रास्ता ऐसा वैरान है घनघोर वन में से पसार हो रहा है डके का डर है डकेट जैसे दिखते हुए 3032 लोग वहां पर खड़े हैं तो फिर यह लोग हमला करेंगे तो मैं कैसे मां का बचाव करूंगा फिर कैसे राधो दी और यह माको दी को बचा हंगा और फिर कैसे यह गहनों को बचा हंगा तो देखिए कि मानवीय स्वरूप में जदी उनको डरने की जरूरत थी शायद कि मां का ये मानवीय स्वरूप जो दो हमारी दो आंखों से दिख रहा है किंतु मां का देवत्व भी तो है मां का देवी स्वरूप भी तो है और यह जो शुंभ निशुंभ जैसे राक्षस जब भी हमला करते हैं देवता लोग इसी देवी का का आवाहन करते हैं इसी देवी को पुकारते हैं और विनती करते हैं कि आप अवतार ग्रहण कीजिए पृथ्वी पर अवतर ये और राक्षसों का विनाश कीजिए तो एक र है मां का मातृत्व और दूसरी ओर है मां का देवत्व इन दोनों का कैसा सुमधुर संगम किंतु भक्त लोग जो है जो उनकी सेवा करते थे उनको यह मातृ स्वरूप ही सबसे ज्यादा नजर के सामने दिखता था क्योंकि वे लोग तो वही देखेंगे जो कि मां उनको दिखाएगी जो कि मां प्रदर्शित करेगी सबके सामने देवी त्व को छुपा के रखा था मातृत्व को सबके सामने वह दिखाती थी क्यों क्योंकि मानवीय स्वरूप में जन्म धारण किया है मानवीय तपस्या की है मानवीय कष्ट भोगे हैं और इसी के भीतर में एक अखंड तैल धारा वत एक ऐसा प्रदीप कि जिसकी वाट इसकी ये ज्योत बिल्कुल ही स्थिर है स्थिर ज्योत की तरह अखंड तैल धारा वत ईश्वर के प्रति इस संसार में रह कर के भी आप ईश्वर को समर्पित हो सकते हैं ईश्वर के प्रति आप संपूर्ण रूप से आप अपने जीवन को डेडिकेट कर सकते हैं यह उपदेश देने के लिए ही तो मां का जन्म हुआ था आज हम इतने सालों के बाद में जब मां को पढ़ते हैं बहुत सारे लोग मां के देवी त्व या तो मां का देवी स्वरूप ही अपनी नजरों के सामने में लाएंगे जब हम जब ध्यान करते हैं मां को प्रार्थना करते हैं या तो फिर यह मां की बीमारियों के बारे में मां की मां के दारिद्र्य के बारे में मां के कष्ट के बारे में जो बार-बार पढ़ते हैं तो इससे तो मां का मानवीय मातृ स्वरूप ही हमारी नजर के सामने आता है या तो फिर कहेंगे कि देवी स्वरूप ही आएगा ये देवी स्वरूप और यह मानवीय स्वरूप ये दोनों के बीच का जो द्वंद है वह हमेशा हमारे मन में रहेगा हम मां को किस रूप से देखेंगे देवी के रूप में देखेंगे कि मानवी के रूप में देखेंगे वरदा महाराज की तरह वन में जा रहे हैं और डकेट जदी आ गए तो एक्चुअली होना क्या चाहिए डकेट के सामने मां को बचाने के लिए डके तो से जोगी दूले के पास में नहीं जाना है डके तों की हत्या करने के लिए या तो उनका सामना करने के लिए मां के पास ही प्रार्थना करनी है क्योंकि यही मां तो पुराण काल में अवतरित होकर के राक्षसों का दमन किया है राक्षसों की हत्या की है तो वह जोगी दूले कौन होता है पालखी वहन करने वाला मां की रक्षा करने वाला यह तो वैसी बात हो गई कि स्वामी जी ने खीर भवानी में जाकर के मां को कहा मां का भग्न मंदिर देख कर के कहा कि मां यदि मैं वहां पर होता तो किसी भी आक्रमणकारी को तुम्हारा मंदिर भग्न नहीं करने देता तोड़ने नहीं देता तो तो माने प्रकट होकर के हंसते हंसते क्या कहा बेटा तुम मेरी रक्षा करोगे ना कि मैं तुम्हारी रक्षा करूं तो वैसे ही एगजैक्टली यही बात कि पालखी में मां जा रही है वन में डके तो का भय है तो क्या वरदा महाराज और यह योगी दूले मां की रक्षा करेंगे ना कि मां उनकी रक्षा करेगी डके तो से यह कैसा सुंदर मानवीय और दैवी स्वरूप का संगम मां के जीवन में है तो वैसे ही इसी इसी तरह की घटना यह जगत धात्री पूजा की है जगत धात्री पूजा के बारे में आउटलाइन डिटेल हम सबको बड़ा अच्छे से ही पता है कि जब जगद धात्री पूजा की गांव में बात चल रही है उस समय सभी घर से चालल की धान बटोरा जाता है मां को भोग प्रदान करने के लिए अभी इस पूजा के जो आयोजक थे उन्होंने किसी वो उन लोगों का घमंड एक होता है ना बहुत जो धनी लोग होते हैं उनका एक घमंड होता है तो मंड से नाराज होकर के किसी बात से रुष्ट होकर के श्यामा सुंदरी देवी के जो पूजा का जो धान है चावल है वह ग्रहण नहीं किया यह बात से श्यामा सुंदरी देवी बड़ी ही आहत हो गई बड़ा ही कष्ट हुआ यह तो पूजा में मां को ऑफर करने वाला मां को देने के लिए कि ये जो धान है इसको अभी और कौन खाएगा तो मां बेचारी श्यामा सुंदरी बड़ी ही विमर्श होकर के रात को शयन कर रही है उस समय उसी देवी ने प्रकट होकर के मां को स्वपने में आकर के वह दर्शन दिया कि मैं तुम्हारा यह जो चाल है पूजा है वह मैं ग्रहण करूंगी तो यह दर्शन से मां फिर दूसरे दिन सुबह को मां को मा मां शारदा देवी उस समय वहीं प थी मां को बताया और उस समय पूजा की तैयारी उन्होंने की उस समय पहली बार जनरली जगद धात्री पूजा के लिए मां को एक एक दिन में ही पूजा समाप्त होती है जनरली ऐसा ही है डिटेल हम इसमें पढ़ेंगे फर्द किंतु श्यामा सुंदरी देवी ने तीन दिन पूजा की है तीन दिन के बाद में मूर्ति का विसर्जन दिया था तो यह जगद धात्री पूजा का एक आउटलाइन है हम यहां पर उसका संपूर्ण विवरण गंभीरानंद जी महाराज से पढ़ेंगे अच्छा और जगत धात्री पूजा का आयोजन नहीं था गांव में काली पूजा का आयोजन था देखते हैं एक बार ग्रामर काली पूजारी ग्राम्य संकीर्णता बसत आक्रोश करिया पजार जनन संग्रहित श्यामा सुंदरी चाउल प्रवृति लले ना एक बार गांव में काली पूजा के समय नवम खुजे बोलकर के गांव का वह जो वह व्यक्ति जो कि यह सब आयोजन कर रहा था उसने ग्राम्य संकीर्ण णता की वजह से ग्राम्य संकीर्णता यानी कि वह जो दुनिया भर के नियम बनाते हैं गांव वाले और कहेंगे कि इस तरह के नियम का जो पालन नहीं करेंगे इसको हम लोग आउटकास्ट कर देंगे गांव से हमारे सभी यह जो व्यवहार है लेनदेन है उसमें से उनको ब्लॉक कर देंगे तो यह ग्राम्य संकीर्णता की वजह से आक्रोश करके श्यामा सुंदरी देवी ने जो चाल या तो धान जो इकट्ठा किया था उसको ग्रहण नहीं किया श्यामा सुंदरी बहु जत ने एवं अति भक्ति भरे पुजार उपकरण तैयारी कोरिया राख्या चलन श्यामा सुंदरी देवी ने बहुत मेहनत करके बहुत यत्न पूर्वक पूजा के जो उपकरण है उसको तैयार करके रखा था किंतु अपरे निष्ठुर य तिनी अकस्मात देवी के नैवेद्य दाने प जंतो वंचित होलेन यह जय मुख्य नब मु खुजे उसकी यह जो हठ काता उसकी यह संकीर्णता उसके क्रोध की वजह से जो कुछ भी उन्होंने जुगाड़ किया था वह मां काली की पूजा में वह दे नहीं पाई इहा ते मर्म पीढी तो होया तिनी सारा रात्रि कादिया काटा लेन इस बात से बड़ी ही दुखित होकर के श्यामा सुंदरी देवी ने पूरी रात रो कर के निकाली एवम बोली ते लागी लेन व कहने लगी काली र जनने चाल कोरे छ अर चाल नीले ना काली के लिए यह चावल इकट्ठा किया था और यह चावल मेरे लिए नहीं एक चाल अर के खावे मेरे यह चावल और कौन खाएगा ए काली चाल तो के खेते पार बेना काली के लिए मां काली के लिए संग्रहित किया हुआ यह चावल और तो कोई खा नहीं पाएगा तार पर त्रे स्वप्ने एक देवी तहर निकट आशिया गा चापड़ा इया चापड़ा इया तहा के जगाई लेन अभी ऐसे रोते रोते दुख से धीरे-धीरे करके उनको नींद आ गई सोई हुई है उस समय या तो सपना आया या तो फिर दर्शन हुआ एक देवी प्रकट हुई और धीरे से उनको जगाया श्यामा सुंदरी चखू मेलिया देखे रक्तो बणा शी देवी दयारे धारे पाय पर पा दिया बस छन मां श्यामा सुंदरी देवी ने आंख खोल कर के देखा कि घर के दरवाजे के सामने एक रक्त वर्णा देवी लाल कलर का जिनका कलर है वह इस तरह की एक देवी पैर के ऊपर में पैर चढ़ा कर के उठा करके बैठी हुई है दरवाजे के धार के दरवाजे के पास में तीनी बोली ते छन और यह देवी कहती है तुम कां छो केनो तुम रो क्यों रही हो काली चाल आमी खाबो काली का चावल मैं खाऊंगी तुम्हार भावना की तुमको चिंता किस बात की है श्यामा सुंदरी जिज्ञासा कोरी लेन के तुही श्यामा सुंदरी देवी ने पूछा कि तुम कौन हो जगद धात्री उत्तर दिलन जगद धात्री ने उत्तर दिया आमी जगदंबा जगद धात्री रूपे तुमार पूजा ग्रहण करवो उन्होंने उत्तर में कहा कि मैं जगदंबा हूं जगद धात्री के रूप में तुम्हारी पूजा ग्रहण करूंगी पर दिन श्री मायर मां ताहा के जिज्ञासा कोरीते छन दूसरे दिन श्यामा सुंदरी देवी अपनी बच्ची मां शारदा को पूछती है हारे शारदा लाल रंग पाए पाठ शन दिए ओ की ठाकुर हारे शारदा वो लाल रंग जिनका है पैर के ऊपर में पैर वो उठा कर के जो बैठती है वह कौन सी देवी है श्री मां बोली लेन वो तो जगत धात्री मां ने कहा अरे वह तो जगत धात्री है दीदी मा तखन बोली लेन माने तब कहा श्यामा सुनी देवी ने आ जगत धात्री पूजा करबो मैं जगत धात्री पूजा करूंगी ई पूजा कोरार कोथा तिनी जखन खन बोली ते लागी लेन और जब जहां तहां हर समय वह यह बात कहने लगी कि हां मैं यह जगत धात्री की पूजा करूंगी तीन विश्वास देर बाड़ी ईते पांच मोन अंदाज धन अनाई लेन वो विश्वास बोलकर के वहां पर एक कुछ एक घर था विश्वास लोगों का विश्वास एक्चुअली सरनेम है बांगला में तो उनके घर से पांच मण अनाज मंगवाया खमन वृष्टि ज एक दिनों बेराम नहीं उस समय इतनी बारिश हो रही थी कि एक दिन भी बारिश रुक नहीं रही है दीदी मां बोली लेन मां की करे तो मार पूजा होबे दीदी मां अर्थात की श्यामा सुंदरी देवी ने जगत धात्री को प्रार्थना करके पूछा कि मां तुम्हारी पूजा कैसी होगी ध्यान ई सुखाते पारलम ना इस धान अर्थात चावल को मैं सुका ही नहीं पाऊंगी किंतु मां जगद धात्री कृपा एमन होलो जे चारी दिके वृष्टि होई ते छ अथ च दीदी मार चाटा रुद्रो किंतु जगत धात्री की कृपा ऐसी हुई कि चारों ओर बारिश हो रही है किंतु दीदी मां अर्थात की श्यामा सुंदरी देवी की वह झोपड़ी के चारों ओर रौद्र अर्थात की पूरे वो जो सूरज का ताप वहां पर वो चल रहा है उस एरिया में व उतने भाग में वह वृष्टि अर्थात की बारिश रुक गई आगुण ज्वालयायी वा होलो आगन अर्थात की आगल लगा करके प्रतिमा को वो बना कर के उसको रंग करना हुआ प्रसन्न मामा ठाकुर के दक्षिणेश्वर संवाद दते गिलेन प्रसन्न मामा अर्थात की मां के छोटे भाई वह दक्षिणेश्वर में ठाकुर को वह संवाद देने के लिए गए कि हमारे यहां पर जगत धात्री की पूजा हो रही है तो ठाकुर सुन्या बोली लेन ठाकुर ने सुनकर के कहा माश बिन माश बिन बेश बेश माएगी मा आएगी बहुत अच्छा बहुत अच्छा तो देर बड़ो खराब अवस्था छीलो जेरे तुम लोगों की बड़ी खराब अवस्था थी रहे अभी ठाकुर को पता है कि जयराम बाटी में मां के परिवार की अवस्था बड़ी ही खराब है किंतु जो बात उन्होंने हृदय को कही थी कि मैं तुम्हारे कमार पुकुर को सोने से मड़के जा सकता हूं यह बात उन्होंने किंतु प्रसन्न मामा को नहीं कही या तो फिर मां को नहीं कही कि पूरे जयराम बाटी में तुम्हारा घर पूरा में सोने का बना कर के जा सकता हूं क्यों क्योंकि पता है कि इस तरह से अचिंत मने एकाएक धन आ जाने से वह किसी को उसका लाभ नहीं होता यह इस तरह से आया हुआ धन कभी सद व्यवहार में नहीं जाता और आध्यात्मिक जीवन में तो इससे हमेशा बाधा ही पहुंचती है तो ठाकुर ने कहा कि मां आएगी मां आएगी बहुत अच्छी बात है तुम लोगों की बड़ी दरिद्र अवस्था थी हो सकता है मां के आगमन से दारिद्र्य धीरे-धीरे कम होगा हालांकि ठाकुर ने यहां पर कहा नहीं यह बात जगत धात्री पूजा होई लो जगत धात्री पूजा संपन्न हुई चतुष्पथी के गांव के बहुत सारे लोगों को आमंत्रण किया गया किंतु ई चावले सब कुलाया गेलो जो सबको निमंत्रण दिया गया उस निमंत्रण में इतने सारे लोग इकट्ठा हुए किंतु श्यामा सुंदरी देवी ने जो पांच मण ये जो अनाज लिया था उसी अनाज से सब कुछ काम हो गया प्रतिमा विसर्जन समय दीदी मा जगद धात्री मूर्ति काने काने बोलिया दिलन प्रतिमा विसर्जन के समय दीदी मां श्यामा सुंदरी देवी ने प्रतिमा के कान में बता दिया मां जोगाई आबार आर बछ रेशो मां जगाई अगले साल फिर से आना आमी तुम्हार जन्नो समस्त बछर धरे सब जुगाड़ करे राखो मैं पूरा साल भर तुम्हारे लिए जो भी पूजा के उपकरण है एक के बाद एक उसका जुगाड़ करती रहूंगी ये श्यामा सुंदरी देवी ने जैसे कहा कि पूरा साल भर यह सब आयोजन करना पड़ता है हम लोग तो मैं बेलूर मठ में दुर्गा पूजा देखे हमको पता है कि बड़ी पूजा के समय कितना सब कुछ आयोजन करना पड़ता है और मां को भी देखा है मां की स्मृति कथा में बार-बार देखने को मिलता है मां कहती है कि अरे यह कलकाता जाएगी तो यह बर्तन ले लो यह ले लो हमको जगद धात्री पूजा में यह काम में लगेगा इसका जुगाड़ कर दो हमेशा पहले से ही पूजा का जुगाड़ पूजा का आयोजन पूजा के लिए उपकरणों की खरीदी वगैरह चलती रहती है तब कहीं जाकर के इतनी बड़ी पूजा बिना विघ्न के संपन्न होती है पव और दीदी मां श्री मां के बोली लेन उसके अगले साल श्यामा सुंदरी देवी ने मां को कहा देखो तुम किछु दियो अर जोगाई पूजा होवे देखो तुम मुझे कुछ दो क्यों क्योंकि मां जगद धात्री की पूजा होने वाली है मेरी जगाई जग ही अर्थात की जगत धात्री देवी को जो लाड से जो नाम दिया जाता है शारदा को सारू कहते थे वैसे गदाधर को गदाई कहते हैं तो जगत धात्री को कहते हैं लाड़ से प्रेम से जगाई तो मेरी जगाई की पूजा होगी तुम उसके लिए कुछ दो क्योंकि क्या पता है कि मां के जो ठाकुर के पास में तो वैसे बहुत कुछ है तो उसमें से मां कुछ दे सकती है तो श्री मां बोली लेन मां ने कहा अतो लेमी पार्बोना इतना सब अपने सर पर टेंशन लेना मुझे मेरे से होगा नहीं हलो एक बार पूजा होलो आबार लठा केनो एक बार हो गई पूजा तो हो गई अभी दूसरी बार इतना परिश्रम उठाना क्यों दरकार नहीं वो पबोना जरूरत नहीं है मेरे से हो नहीं इ हार पोर तीनी रात्रे स्वप्न देखी लेन इसके बाद में उन्होंने रात को सपना देखा तीन जन आशिया उपस्थित तीन लोग आकर के खड़े हो गए जगद धात्री एवं तहर सखी द्वय जया और विजया जगद धात्री और उनकी दो सखिया जया और विजया तहरा बोली ते छन वे लोग कह रही है आमरा तबे जाबो हम लोग क्या यहां से जाए श्री मां शकत जिज्ञासा कोरी लेन माने ब ही आश्चर्य पूर्वक पूछा के तुमरा तुम लोग कौन हो देवी बोली ले नामी जगद धात्री देवी ने कहा मैं जगत धात्री हूं न्याई श्री मां अति मात्र संत तो होया बोली ले ना तुमरा कोथा जावे श सुनकर के ही श्री मां बड़ी व्यस्त होकर के बड़े ही श्रद्धा पूर्वक बोलने लगी कि नहीं आप लोग कहां जाएगी ना ना तुमरा कोथा जाबे अरे तुम लोग कहां जाओगी तुमरा थाको तो मादर जेते बोली नहीं आप लोग रहिए मैंने आप लोगों को जाने को नहीं कहा है तो खन ईते बराबर जगद धात्री पूजा चली थाके वहां से लेकर के तब से लेकर के प्रतिवर्ष नियमित जयराम बाटी में जगद दात्री पूजा चलती आ रही है श्री श्री माता ठाकुरानीर पित गृहे तखन बेसी लोक जन लोना मा मां के घर में पिताजी के घर में जयराम बाटी में ज्यादा कोई लोग नहीं थे ताई पुजार समय बासन माझी दे और अन्नानोड़ा बाटी आशीते होतो इसीलिए पूजा का काम करने के लिए बर्तन वगैरह धोने के लिए मां को हर साल जयराम बाटी आना पड़ता था देखिए जगत धात्री पूजा का यह वर्णन वर्णन बड़ा ही सरल है किंतु जो भक्त गण है मां के हम सबके मन में जगत धात्री पूजा का एक बड़ा ही एक महात्म्य है मुझे जयराम बाटी जाकर के जगत धात्री पूजा दर्शन करने का सौभाग्य नहीं मिला अ मिलेगा शायद जदी मां की कृपा होगी जगद धात्री देवी की होगी किंतु मुझे हर समय जितना समय में बेलूर मठ में था उस समय शारदा पीठ में जगत धात्री पूजा होती है तो उसका दर्शन करने का सौभाग्य मुझे कई बार मिला है और वह जो वहां पर जाना आरती के समय में फिर यह स्तोत्र पाठ वगैरह होता है उसको सुनना वह जो पूजा देखना आरती देखना यह सब देख कर के मन मेरा बड़ा ही आनंद से भरपूर हो जाता था और ऐसे कहने में शर्म आती है किंतु फिर भी कह ही देता हूं व पूजा देखने का एक बहुत बड़ा प्रलोभन यह था कि शारदा पीठ में संध्या आरती के बाद में साधु लोगों के लिए स्पेशल नाश्ते की व्यवस्था होती थी स्नेक्स की व्यवस्था होती थी तो वो अभी शारदा पीठ का आयोजन है और सिर्फ साधु लोग ही है तो आयोजन बड़ा ही सुंदर रूप से होता था नाश्ता वगैरह बड़ा ही सुंदर मिलता था और हम लोग तो बेलूरमठ में रहते हैं बेलूरमठ में सब कुछ शिव का संसार चाय भी मिलेगी तो उसमें पानी डाला होगा आधा नाश्ता भी मिलेगा तो वह रहड़ा जो रामकृष्ण मिशन है हमारा वहां से वह टोस्ट जैसा बिस्किट आता है जिसको हम साधु लोगों के अलावा कोई खरीदता नहीं तो ऐसे बिस्किट वो जिसको हम रहड़ा बिस्किट कहते थे वो पानी वाली चाय और रहड़ा बिस्किट यह हमको खाने को मिलता था तो जब जगत धात्री पूजा में जाते थे तो ये एक भी यह भी एक बहुत बड़ा प्रलोभन रहता था कि वहां पर पूजा होने के बाद में आरती होने के बाद में बड़ा ही सुंदर पेट भर के नाश्ता मिलने वाला है तो यह जगत धात्री पूजा की मेरे मन में बड़ी ही एक मधुर स्मृतियां शारदा पीठ की है ऑफकोर्स बेलूरमठ में रहकर के दुर्गा पूजा जो होती है उसका तो कोई कंपैरिजन ही नहीं है एक बार में कभी मौका मिल गया तो जयराम बाटी जाऊंगा बहुत सारे साधु ब्रह्मचारी जयराम बाटी जाते हैं जगत दात्री पूजा के समय तो मैं भी शायद जाऊंगा और वहां पर इस पूजा का दर्शन करूंगा वही पूजा जो कि श्यामा सुंदरी देवी ने जिसका प्रारंभ करके गई है और वहां पर जहां पर माने बर्तन मांजे हैं उसी पूजा के मां ने स्वयं बर्तन माजे हैं मुझे नहीं लगता कि बेलूर मठ में मां ने अपने हाथों से पूजा की हो या तो फिर पूजा के बर्तन माजे हो मुझे तो यह याद नहीं आ रहा है तो यह जयराम बाटी की पूजा का महात्म है और जगत धात्री पूजा के बारे में बहुत सारे प्रसंग जो कि मां की पूरे जीवन में एक के बाद एक आने ही वाले हैं जब जब आएंगे तब तब हम इसका पाठ करेंगे तो आज यही त कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ये स्वामी जी स्वामी जी अमेरिका गए तो वैसे तो ना ना इंडिया में यह प्रसंग इंडिया में हुआ है कि स्वामी जी अमेरिका से जब लौटे तो कलकाता में टाउन हॉल में वह प्रवचन है तो अभी लाटू महाराज बड़े टेंशन में है तो बोलते हैं कि हमने तो उस नरेद को देखा है बेचारा वह फटे कपड़े पहन के कलकाता की गलियों में घूमता फिरता था अभी इतने बड़े विद्वान लोग राजा ये वो सब गवर्नमेंट ऑफिसर बाबू लोग इनके बड़ इनके लोगों के सामने नरन वोले चर देने वाला है अरे बाप रे पता नहीं नरेंद्र का क्या होगा कुछ गड़बड़ बोल देगा तो सब लोग उसकी पिटाई ना कर दे कहीं जाकर के ये अमेरिका से वापस आने की बात है तो लाटू महाराज खुद कहते हैं कि मैं एक हुक्का लेकर के एक एक कमरे में बैठ कर के वो नरेण के लिए मैं ठाकुर को बार-बार प्रार्थना कर रहा हूं ठाकुर देखना नरन की रक्षा करना नरेद की लाज रखना पता नहीं यह सब धनी लोग विद्वान लोग बाबू लोग उसके सामने उल्टा पुल्टा उसने कुछ बोल दिया पिटाई ना हो जाए उसकी तो ऐसा बोल कर के बड़े टेंशन में और फिर नरेंद्र ने बोलना शुरू किया लाटू महाराज कहते हैं यह कौन नरेण है यह हम जो नरेण को पहचानते हैं यह नरेण नहीं ये दूसरा ही न जैसे कि देवी शक्ति का आविर्भाव हो रहा है और वो बोल रहा है तो सब बाबू लोग मंत्र मुक्त होकर के बच्चे की तरह एकदम सुनना शुरू कर देते हैं कोई मुंह से एक आवाज तक नहीं निकालता दो-तीन घंटा जो नरेंद्र बोलता है सब लोगों ने एक शब्द बना बोले बोने कहा वो स्वामी जी के लिए टेंशन करते थे उल्टा हो गया स्वामी जी जो अमेरिका गए और स्वामी जी में जो परिवर्तन आया था यह मतलब उनके गुरु भाई खुद इतने आश्चर्य चकित हो गए थे स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि अरे इन लोगों के घर में बाग घुसा है और भी एक सुंदर कहानी है इसके बारे में एक एक गर्ल्स कॉलेज में स्वामी जी को आमंत्रण मिला था बोलने के लिए अमेरिका में तो वहीं पर एक लड़की पढ़ाई कर रही थी उसने यह रेमसंस बाद में लिखा है प्रबुद्ध भारत में प्रकट पब्लिश हुआ था इसी रेमन सेंस में वह क्या कहती है कि हम सबने सुना था कि ये पश्चि पूर्व में से एक कोई एक संत आ रहे हैं और हमको प्रवचन देंगे अभी वह संत कौन है इंडिया क्या है क्या वेदांत है यह सब तो हमको पता नहीं किंतु एक नया ही एक नजारा दे देखने को मिलेगा एक नया ही प्रकार के व्यक्ति को देखने को मिलेगा तो हम सब लोग एकदम चुपचाप ऑडियंस में बैठे हैं स्वामी जी की बात सुनने के लिए और स्वामी जी आए इतना प्रभावशाली व्यक्तित्व हम लोग सब इतने प्रभावित हो गए चुपचाप स्वामी जी की बात सुनी अभी याद नहीं है कि स्वामी जी ने क्या कहा किंतु हम लोग व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हो गए थे उसके दूसरे दिन अभी यह बात तो फैल गई आसपास में कि अरे यह लड़कियां जो है कॉलेज की यह स्वामी जी से बड़ी प्रभावित हो गई है तो यह जो क्रिश्चन वो जो होते हैं ना यह सब पास में ही चर्च था तो चर्च के वो जो दो-तीन बड़े-बड़े वो प्रीचर वो प्रचारक वे लोग बड़े टेंशन में आ गए कि अरे लड़कियों को फिर ये कन्वर्ट कर देगा कहां हम इंडिया में भेजते हैं वो इंडियन को हिंदुओं को क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट करने के लिए यहां उल्टा हो जाएगा स्वामी जी आकर के क्रिश्चियन लड़कियों को हिंदुइज्म में कन्वर्ट ना कर दे कहीं तो उन्होंने ठीक किया स्वामी जी को जाकर के उस कॉलेज में जाकर के इस लड़कियों के सामने डिबेट करेंगे बता देंगे कि वो किस तरह का मूर्ख है किस तरह का धुरता आदमी है और कैसे क्रिश्चियनिटी सबसे पावरफुल रिलीजन है श्रेष्ठ रिलीजन है तो ठीक है इसी लड़कियों के सामने डिबेट हुआ तो यही जो लड़की यह लिखती है वो कहती है कि हम लोग और भी बड़े टेंशन में है यहां पर स्वामी जी का इतना प्रभावशाली व्यक्तित्व यहां पे ये चर्च के बड़े-बड़े धर्म गुरु जिनको कि हम बचपन से पहचानती है और जो अपने को बहुत बड़े समझते हैं और उनसे हम बड़े ही डर के भी रहते हैं तो इन दोनों के बीच में डिबेट हो रहा है और हम लोग चुपचाप बैठ कर के सुन रही है तो वो लिखती है कि जैसे ही डिबेट का प्रारंभ हुआ स्वामी जी हंसते-हंसते सभी बातों का उत्तर देते जा रहे हैं वो जो मंडन मिश्र और शंकराचार्य के बीच में जो डिबेट हुआ था ना वो उभय भारती ने ठीक किया मंडन मिश्र की पत्नी जो कि ये डिबेट को जज करने वाली थी निर्णय देने वाले थी कि कौन जीतेगा तो वो जीत दोनों के गले में पुष्प माला पहना दी जो प्रसन्न रहेगा डिबेट में वो उसकी माला कभी सखे गी नहीं वो उसके पुष्प तरोताजा रहेंगे किंतु जो क्रोधित हो जाएगा उसका अर्थ है कि वो डिबेट में हार रहा है और उसकी पुष्पमाला क्रोध के ताप से सखना शुरू हो जाएगी तो जिसकी पुष्पमाला पहले सुखे गी वो हो गया डिबेट में हार गया जिसकी पुष्पमाला वैसे ही फ्रेश रहेगी जो डिबेट में जीत जाएगा तो वो सनातन अपना वो जो नियम है कि आपकी इमोशन डिबेट करने के समय आपके कंट्रोल में कितनी है प्रसन्न होकर के डिबेट कर रहे हैं ना कि क्रोधित होकर के नाराज होकर के टेंशन में आकर के ना कि ऐसा करके आप डिबेट कर रहे हैं तो वैसे ही एगजैक्टली वही हुआ स्वामी जी प्रसन्न चेहरे से जो कोई भी पॉइंट वो धार्मिक पॉइंट उठाते हैं थियोलॉजिकल पॉइंट एक के बाद एक वो स्वामी जी काटते जाते हैं और यह जो चर्च के धर्म गुरु वो ज्यादा से ज्यादा वो क्रोधित हो होते जाते हैं नाराज होते जाते हैं यह देख कर के कि स्वामी जी का साहस कैसे हुआ इतना सब कुछ विद्वता प्राप्त करने का ऐसे फटाफट करके हमारे पॉइंट्स को काटने का किंतु सही में ऐसा ही हुआ स्वामी जी जीत गए देखता है सबको दिखता है सभी लड़कियों ने एकदम बड़ी खुश हो गई कि स्वामी जी की जीत हो रही है यह देख कर के तो इसने रेमसंस में लिखा है उस समय हमको ऐसा लगा कि जैसे कि मुक्ति की बारिश मुक्ति का पवन मुक्ति की हवा हमारे यहां पे फ्रीडम द एयर ऑफ फ्रीडम जैसे कि उस कॉलेज में बह रही है क्योंकि क्रिश्चियन चर्च तो सबको दबा करके रखना चाहता है सबका शोषण करना चाहता है सबको डर दिखाना चा जाता है वो पाप का नर्क का जबकि यह धर्म एक ऐसा है वह स्वर्ग के बारे में बात करता है स्वर्ग अर्थात या तो कहेंगे मुक्ति के बारे में कहता है कि आप ही तो है अमृत के संतान इतना डर के भय से जीने की क्या जरूरत है तो एक है मुक्ति का धर्म दूसरा है पाप का धर्म नेचरली हमको पता चलेगा कि कौन जीतता है तो देखिए कि वहां पर इतना सुंदर डिस्क्रिप्शन उनके घर में जाकर के उनको स्वामी जी ने हरा दिया