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सो हम लोग पाठ कर रहे थे मां शारदा देवी का जीवन चरित्र थर है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज महाराज जी क्या लिखते हैं हमने देखा कि अभी तक हमने देखा कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर आई और ठाकुर ने मां का स्वागत किया अपने ही साथ में कमरे में रहने के लिए जगा दी और मां को रास्ते में जो बुखार हुआ था तो बुखार की ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर को बुला कर के सारी व्यवस्था भी करवाई और साथ-साथ में यह भी कहा कि अरे मेरा मथुर बाबू चला गया है मेरा राइट हैंड कट गया है यदि मथुर बाबू होते तो कितना ही तुम्हारा जतन करके तुम्हारी सेवा सुसरूषा करते इस यहां तक हमारी बात हुई अभी हम आगे बढ़ते हैं अच्छा अ हमको तो यह पता है कि मां जब दक्षिणेश्वर आई तो उसके पीछे की पूर्व भूमिका क्या है जब जयराम बाटी में थी तो सब बहुत सारे लोग आकर के मां को कहते थे कि अरे तुम्हारा पति तो पागल हो गया है पता नहीं कैसी सब हरकतें करता है तो वह सब देखने के लिए तो मां दक्ष आखिर में दक्षिणेश्वरा यह सोच कर के कि मैं जाकर के मेरी अपनी नजरों से ठाकुर का दर्शन करती हूं तब मुझे समझ में आएगा ठाकुर की परिस्थिति क्या है उनकी अवस्था क्या है तो अभी दक्षिणेश्वर तो आ गई है तो भीभी ठाकुर का भी दर्शन हो गया तो जयराम बाटी में जो सब ठाकुर के बारे में निंदा कटू शब्द वगैरह मां सुन रही थी उन सबसे उनको मुक्ति मिल गई तो यही महाराज कहते हैं श्री राम कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शने फले श्री मायर चखू कनेर विवाद गुज लो श्री राम कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन के परिणाम से मां की आंख और कान का चखू और कोनेर विवाद घुची लो यह बांगला में में एक कहावत की तरह है इसका अर्थ है कि जिन आंखों से जीन कानों से ठाकुर के बारे में कटकती जो लोग ठाकुर के बारे में कटकती करते हैं उनको देखना यह जो सब हो रहा था उससे आखिर में उनको मुक्ति मिल गई पल्ली ग्रामे हृदय हीन अञ लोकर मध्य कथ कथाई ना रटिया छीलो पल्ली ग्राम अर्थात की मैंने एकदम छोटा सा गांव होता है उस तरह का माने सही सही तरह का गांव आजकल तो बहुत सारे गांव क्या है कि बड़े होकर के टाउन जैसे बन जाते हैं व धन वैभव भी आ जाता है गुजरात में आप देखेंगे कि बहुत सारे गांव में आधी जनसंख्या आधी आबादी उस गांव की कहां लंडन में रह रही है कोई अमेरिका में रह रहा है ना कोई नहीं कहां पे यूरोप में रह रहा है और गांव में कहते हैं वैसे तो किसान किंतु वह सब हमने इंपोर्टेड एसयूवी में घूमते हैं तो अभी क्या है कि अभी ये उस तरह का गांव नहीं है यह अपने प्राचीन परंपरागत जो गांव चले आते थे जो लोग किसान ही थे खेती ही करते थे ऐसे लोगों का गांव तो गांव के हृदय हीन अज्ञ लोग जिन लोगों का हृदय नहीं है इस तरह से अज्ञानी लोगों के बीच में क्या-क्या सब बातें ही चल रही थी ताहर आराध्य देवता शेखाने पड़िया छ पागले पर जाए मां के आराध्य देवता गांव में उनको पागल कहक बुलाया जाता था उनकी गिनती गांव में पागलों की तरह ही होती थी ए मोन की एतो ज विश्वाश मोन श्री मायर बारबार सुनते सुनीत से मने जेनो केमोन एकट संदेह आच लागया छलो यहां तक कि गांव वालों की निंदा सुनते सुनते मां का जो बहुत ही विश्वासु मन था मां को तो पता था कि जिनके साथ में उनका विवाह हुआ है जिनके साथ में उनका परिणय हुआ है वह तो कोई आम आदमी नहीं है ईश्वर स्वयं पंचमहाभूत का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किए हैं मनुष्य सभ्यता के पाप मोचन करने के लिए दुष्कर्म से छुटकारा दिलवाने के लिए तो वो पागल के कैसे हो सकते हैं मां को हृदय में तो यह भरोसा था किंतु वो एक कहानी पता है ना कि एक ब्राह्मण एक गाय लेकर के जा रहा है तो अभी चार चोर उन्होंने देखा कि यह ब्राह्मण के पास में गाय है तो गाय की चोरी करनी है तो कैसे करेंगे अभी छीन के ले जाएंगे तो वह तो चिल्लाना शुरू कर देगा तो 10 लोग इकट्ठा हो जाएंगे चोरों की पिटाई कर देंगे तो उन्होंने एक बड़ा अच्छा सा षड्यंत्र रचा वो चारों रास्ते में खड़े हो गए कुछ कुछ पे अभी ब्राह्मण वह गाय लेकर जा रहा है तो पहला चोर एक जगह पर खड़े रहकर उनको पूछ रहा है अरे पंडित महाशय आप यह बकरी लेकर के कहां जा रहे हैं तो ब्राह्मण तो बड़ा ही नाराज हो गया चिल्ला कर के बोल उठा अरे मूर्ख यह बकरी थोड़ी ना यह तो गाय है तुमको दिखता नहीं है क्या आंखें नहीं है तुम्हारी ऐसा क्याक उसको सुना करके आगे जा रहे फ रास्ते में दूसरा चोर मिला तो दूसरा चोर बोलता है अरे पंडित महाशय आपके पास में बकरी क्यों है तो पंडित अभी दूसरी बार नाराज हो गया किंतु नाराज होने के साथ-साथ में मन में एक संदेह भी हुआ कि ये दूसरे आदमी ने कहा कि ये तो गाय नहीं है बकरी है तो उसने गाय की ओर बड़ा ध्यान से देखा उसको तो गाय ही दिखाई रही है किंतु दोदो लोगों को बकरी कैसे दिखाई दी फिर आगे गया थोड़ा सा तो तीसरा आदमी खड़ा है वो भी कहता है कि आपके पास में बकरी है और आगे गया तो चौथा चोर खड़ा है चौथे ने भी कहा कि पंडित महाशय आपके पास में बकरी क्यों है तो चार-चार लोगों ने जब ऐसा कहा कि आपके पास में बकरी क्यों है तो पंडित को पंडित जी को लगा कि सही में मेरी ही आंख मुझे धोखा दे रही है यह गाय नहीं बकरी ही है बोल कर के उसको छोड़ के चला गया और चारों चोरों ने गाय को उठा लिया तो जब 10 लोग हमको एक एकही बात कहते हैं बार-बार तो हमारा खुद का मन भ्रमित हो जाता है हम अपनी आंखों से जो देखते हैं अपने कान से जो सुनते हैं उसके ऊपर में भी हमको शायद विश्वास नहीं रहता तो जगत जननी स्वयं पृथ्वी पर अवतरण की है पता है कि भगवान शिव साक्षात ठाकुर के भीतर में विराजमान है किंतु फिर भी जब गांव वाले सभी हृदय हीन अज्ञानी लोग बार-बार यह कह रहे हैं कि जो भी कोलकात्ता से जाकर के वापस आएगा वही ई एक बात लेकर के आएगा आज ठाकुर ने इस तरह का एक तमाशा किया आज ठाकुर ने इस तरह का कोई नया नाटक किया इस तरह से इतनी बातें सुन सुन कर के मां के खुद के हृदय में संशय हो गया था कि क्या लोग सही है और मैं ही गलत हूं कि नहीं तो वैसे ही मायर संदेह आंच लागया छीलो संदेह की एक आशा एक काली मा लग गई थी मां के हृदय में किंतु आज किंतु आज आज अर्थात की मां दक्षिणेश्वर आई है ठाकुर का स्नेह देखा तो इतना ही है ठाकुर के भीतर में जब आध्यात्मिक बातें करने की शुरू करते हैं है तो जैसे कि देवता स्वयं प्रकट होते हैं ठाकुर की जगवा के ऊपर में सरस्वती स्वयं विराजमान होती है और ठाकुर अनर गल कंटीन्यूअस इस तरह से आध्यात्मिक बातें करते जाते हैं सभी लोग मंत्र मुग्ध होकर के सुनना शुरू कर देंगे खड़े भी नहीं होंगे अपना सारा काम भूल जाएंगे कामर पुकुर में ठाकुर आते थे तो कामर पुकुर की जितनी भी स्त्रियां थी वे लोग क्या करेगी घर का सब काम समाप्त करके पहले से ही ठाकुर के पास में आ करके बैठ जाएगी फिर ठाकुर बात करते ही जाएंगे करते ही जाएंगे सभी लोग सुनती रहेगी बीच-बीच में ठाकुर को कहना पड़ता था कि अरे भाई आपको घर में कुछ काम दम है कि नहीं तो वो बेचारी एकदम जैसे कि हिप्नोटिज्म में से खड़े हुए हो वैसे व लोग चमक जाती थी अरे घर भी तो है पति भी है बच्चे भी है घर का काम भी है क्या करेंगे तो कोई कोई कहती थी अरे नहीं हम लोग तो सब काम समाप्त करके आए हैं कोई कोई कहती है अरे हां मेरे बच्चे को खिलाना है अरे बाप रे वो दौड़कर खड़ी होकर के दौड़ के चली जाती थी अपने बच्चे को खिलाना तक भूल जाती थी इतनी मंत्र मुक्त करने वाली ठाकुर की वाणी थी तो आज इसलिए महाराज जी लिखते हैं किंतु आज आज क्या आज तिनी देखिले जे देवता देवता ई आछ आज उन्होंने देखा कि देवता देवता ही है शिव शिव ही है भले ही चाहे स्मशान में रहते हो भले ही चाहे गले में साप की माला पहनते हो भले ही चाहे भूत पिशज उन के आसपास में नृत्य कीर्तन करते हो किंतु समाधि मग्न शिव शिव ही है पत्नी के भूलिया जावा तो दुरे कथा तीनी एकन जेनो अधिक तरो कृपा पूर्ण पत्नी को अर्थात की मां शारदा देवी को भूल जाने की बात तो दूर ही रही किंतु आज वो अधिकतर कृपा पूर्ण है अत एव श्री मायर कर्तव्य स्थिर ईते बेशी दिन लागी लोना इसीलिए अभी मां को अपना कर्तव्य स्थिर करने के लिए ज्यादा दिन नहीं लगे तिनी प्राण उल्लासे नोबत था किया ठाकुर उतार जननी र शे बाय आपना के ढलिया दिलन उन्होंने नबत में रह कर के ठाकुर और ठाकुर की मां श्रीमती चंद्रा मणि देवी की सेवा में अपने को ाल दिया अपने हृदय को न्योछावर कर दिया ताहर पिता कन्या आनंदो एवं ठाकुरे सप्रेम और स श्रद्ध व्यवहारे आश्वस्त होया को एक दिन परे रिष्ट चित्ते शगरा में फिरिया गले उनके पिताजी भी अपनी बच्ची का अपनी कन्या का आनंद दर्शन करके और ठाकुर का सप्रेम स श्रद्ध व्यवहार देख कर के बड़े ही संतोष पूर्वक अपने गांव में वापस चले गए देखिए ठाकुर का ऐसा था जिसको जो सम्मान प्राप्त्य है उनको वो सम्मान देना एक बार कालीवाड़ा गया अभी कभी-कभी क्या होता है यह जो सब रमता साधु होते हैं ना कहीं पर स्थिर होकर के नहीं बैठेंगे क्योंकि स्थिर होने से माया लग जाएगी हमेशा तीन दिन एक जगह पर रहना है और फिर निकल लेना है अपनी झोली उठा कर के कमंडल उठा कर के ऐसे रमता साधु जो होते हैं उन्होंने ही हमारी भारतीय परंपरा को यदि एक तरह से देखा जाए तो हमारी वेदांत परंपरा को सजीव रखा है भले ही हजारों सालों के आक्रमण इस भारत की पुण्यभूमि पर होते रहे किंतु यही रमता साधु है जो कि एक गांव से दूसरे गांव तक व अपनी झोली और कमंडल उठा कर के जाएंगे भिक्षा मांगेंगे और जो भी जिज्ञासु होगा जो भी मुमुक्षु होगा उनको धर्म का संदेश सुनाएंगे किंतु क्या होता है वो लोग माया में तो नहीं फसें तो एकदम मन उनका कड़ा रहता है उनके हृदय में त्याग की ज्वाला एकदम प्रज्वलित रहती है तो उनलोगों का कभी-कभी उनका व्यवहार हमको कठोर दिखाई देगा उनका स्वभाव अब कभी-कभी हमको क्रूर दिखेगा क्योंकि हम लोग क्या है कि संसारी लोग हैं माया में बंधे हुए हैं हम लोगों का भी आश्रम में देखिए कि हमारे भाई जो यहां पर रह रहे हैं हम लोग जो यहां पर साधु ब्रह्मचारी भक्त वॉलंटस हमारा जो स्टाफ है जो यहां पर प्रतिदिन आता है तो सभी के साथ में एक स्नेह का संबंध तो बंद ही जाता है मनुष्य का हृदय है क्या करेंगे यदि किसी को कोई भी बीमारी हो गई तो इमीडिएट हम इंक्वायरी करेंगे इमीडिएट पूछेंगे अरे भाई तुमको ट्रीटमेंट ठीक तरह से चले तो उसके लिए क्या आवश्यक है बता दो कभी-कभी किसी के घर जाकर के उनकी खबर ले लेंगे तो हमारा यह जो ठाकुर का संग है किस देह सूत्र में सभी भाइयों को बात के गए हैं वह एक संघ की बात ही अलग है किंतु यह रमता साधु उनका व्यवहार हम लोगों को बड़ा ही कठोर दिखाई देगा जद कोई भी थोड़ी सी भी मित्रता करने को आएगा ऐसा उनको डांट कर के भगा द व दूसरे ही दिन गांव छोड़ कर के चले जाएंगे तो ऐसा एक रमता साधु दक्षिणेश्वर में आया और सभी लोगों ने आकर के ठाकुर के सामने कंप्लेन करना शुरू कर दिया कि देखिए उनका मिजाज तो इतना गर्म है माथा इतना गर्म है क्या करें ठाकुर बोलते हैं जो भी है वैसे ही रहने दीजिए वो ऐसे ऐसे ही साधु है तो एक व एक दिन यह साधु ठाकुर के कमरे में आए वो पता नहीं कुछ चीज के बारे में पूछने के लिए तो जितनी देर तक वह साधु वहां पर खड़े रहे ठाकुर इसी तरह से बिल्कुल दो हाथ जोड़ कर के उनके सामने खड़े रहे क्योंकि उनको वह सम्मान प्राप्य है तो ठाकुर का भी ऐसा था यहां पे रामचंद्र मां के पिताजी अर्थात कि ठाकुर के ससुर हुए तो उन को जो सन्मान प्राप्य था ठाकुर बिल्कुल बिना झिझक के उनको वह सन्मान देते थे वहां पर वह बात नहीं आएगी कि हां मैं अवतार वरिष्ठ आया हूं ना कि फिर मैंने निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर दी है वहां पर वह सबने जिसको जो सन्मान प्राप्य है उनको वह देना है आपकी खुद की हैसियत चाहे कुछ भी हो व सामने वाले की हैसियत देख कर के हमको उनके साथ में बिहेव करना है यह जो गिरीश घोष कहते थे कि ठाकुर ने प्रणाम अस्त्र से जगत को जय किया है जब कृष्णा अवतार में वह सुदर्शन चक्र था राम अवतार में तीर धनुष था राम बाण वो कभी भी मिथ्या नहीं जाएगा कभी भी विफल नहीं जाएगा तो वैसे ही ठाकुर अवतार में गिरीश घोष का जो एनालिसिस है कि प्रणाम अस्त्र जब केशव सेन पहली बार मिलने के लिए आया ठाकुर को या तो फिर ठाकुर जब उनको पहली बार मिले ठाकुर ने खुद ने झुक कर के उनको प्रणाम किया अभी यह लोग तो सब वेस्टर्न एजुकेटेड तो इंक्लूडिंग माइसेल्फ मैं भी जब छोटा था मैं भी ऐसा समझता था अरे लोगों के पैर छू कर के प्रणाम करना यह किस तरह की अंधश्रद्धा है हम सभी लोग तो इक्वल है माने उस तरह से नहीं देखिए वेदांत और आज के ह्यूमन राइट्स वाली जो फिलोसोफी है उसमें डिफरेंस क्या है वेदांत भी कहता है कि हम सबके भीतर में आत्मन है और ये आज का जो मॉडर्न ह्यूमन राइट्स वाला लोग यह लोग भी कहते हैं कि ईच मने ईच एंड एवरीवन आर इक्वल इन द आइज ऑफ द लॉ कायदा और कानून और कॉन्स्टिट्यूशन की नजर में सभी लोग समान है हां समान है किंतु देखिए कि आपके अधिकार जितना आपको समान रूप से मिलते हैं उतना ही समान आपको कर्तव्य पालन करना है एक हाथ से जब लेते हैं तो दूसरे हाथ से देना भी है तो आप अधिकार मांगेंगे कांस्टिट्यूशन में आपको अधिकार दिए गए हैं किंतु कांस्टिट्यूशन में यह नहीं लिखा कि नागरिक का कर्तव्य क्या है हम लोग जब छोटे थे तो वो जो एक प्रतिज्ञा होती है ना वो प्रतिज्ञा हम लोग प्रतिदिन स्कूल में वो उसका पाठ किया करते थे खड़े होकर के आप भारत के नागरिक के रूप में मेरा कर्तव्य क्या है उस तरह से है तो हमेशा एक हाथ से लेना है एक हाथ से देना है वेदांत में ऐसा है कि हम सबके भीतर में वही आत्मन तो है किंतु आत्मन के ऊपर में तमस और रजस का आवरण छाया हुआ है जैसे कि सोने का एक घड़ा हो किंतु उसके ऊपर में मिट्टी लग गई हो जब तक मिट्टी को धोएंगे नहीं तब तक सोने का घड़ा दिखाई नहीं देगा तो वैसे ही सत्कर्म करके अपने के भीतर में ये जो सोना है उसको प्रकट करना है उसका प्रकाश जगत को दिखाना है तो किंतु यहां पे है कि यू हैव टू अर्न योर डिविटो स्पिरिचुअलिटी वैसे ही बैठ कर के कि हां मेरे भीतर में आत्मन है तो मैं सर्वश्रेष्ठ हूं या तो सभी के समान हूं ऐसा बोलने से नहीं चलेगा जब तक माया के भीतर में है तब तक तो तमस और रजेश का एक लेस्ट तो होगा ही होगा हमारे ऊपर में तो उसके अनुसार हमको वर्तन करना है जबकि ये ह्यूमन राइट्स वाले क्या कहेंगे कि यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स है वेदर यू परफॉर्म एनी ड्यूटी और नॉट यू आर बाउंड टू रिसीव योर ह्यूमन राइट्स तो ये एक डिफरेंस है अ इसके बारे में बहुत सारा हम डिस्कशन कर सकते हैं किंतु वो फिर कभी अभी ये सभी ठाकुर की र मां की ओर तो जिनको जो श्रद्धा देनी है जिनको वह सम्मान देना है ठाकुर देते थे और रामचंद्र भी सम्मान और श्रद्धा पा कर के और अपनी कन्या की खुशी देख कर के रुष्ट चित्त से संतोष पूर्वक जयराम बाटी गांव फिर दय श्री रामकृष्ण कामर पुकुरे अस्थान काले तोतापुरी कथा आलोचना पूर्वक निजो साधन लब्ध ब्रह्मज्ञान गीतार परखा एवं पत्नी प्रति कर्तव्य पालने अग्रसर होया चले श्री राम कृष्ण जब कामा पुर में थे तब तोतापुरी ने जो बात कही थी उसको याद करके अपने साधना से प्राप्त ब्रह्मज्ञान की गंभीरता कितनी है उसके परीक्षा करने के लिए पत्नी की र उनका जो कर्तव्य है वह पालन करने के लिए कटिबद्ध हुए हुए थे लंबा सेंटेंस है किंतु इसका मीनिंग बड़ा स्पष्ट है कि हमने इसको पहले भी उस समय डिस्कस किया था कि जब आप सन्यास ग्रहण करते हैं तो संसार की ओर आपकी कोई जवाबदारी नहीं रह जाती या तो फिर मैं इस तरह से कहूंगा कि धर्म अर्थ काम मोक्ष चार पुरुषार्थ है तो धर्म और जो अर्थ और काम है उसको धर्म के आधार पर उसका पालन होना चाहि यह हो गया संसार धर्म और मोक्ष मार्ग है मोक्ष पुरुषार्थ है वह है सन्यास धर्म जब आप सन्यास ग्रहण करते हैं तो जिस तरह से आप अर्थ और काम इसका त्याग करते हैं तो साथ-साथ में ही संसार का जो कर्तव्य होता है उसका भी त्याग हो जाता है तो ठाकुर तो विवाहित थे मां शारदा के साथ में उनका विवाह हुआ था शादी हुई थी तो उनके साथ में क्या करें तो अभी तोतापुरी स्वयं जो कि सिद्ध ब्रह्मज्ञानी गुरु थे भारतीय सन्यास परंपरा जिन्होंने पूरा पी लिया था मैंने उसको पूरा डाइजेस्ट कर लिया था उसमें एकदम वो पारंगत थे वो तोतापुरी स्वयं कहते हैं कि यदि तुमने ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया है तो तुम्हारी ब्रह्मज्ञान की गंभीरता कितनी है उसकी डेप्थ कितनी है उसकी सिद्धि कितनी है उसको टेस्ट करने के लिए उसकी परीक्षा करने के लिए पत्नी के साथ सहवास करो पत्नी के साथ में रहो और उसको धर्म का ज्ञान दो साथ में रहना है किंतु सांसारिक संबंध से नहीं दिव्य संबंध से साथ में रहना है धर्म को अपने जीवन का आधार बनाना है तो यह बात तोतापुरी ने ही स्वयं ठाकुर को बताई थी तो इस बात की परीक्षा ठाकुर ने एक बार तो कमार पुकुर में कर दी अभी फिर से दूसरी बार वही पत्नी के प्रति अपना कर्तव्य पालन करने के लिए ठाकुर कटि बद्ध हुए ठाकुर ने वह कार्य फिर से प्रारंभ किया परे सुदीर को चारी बर तहर मन दैव प्रेरणा तीर्थ दर्शन और विविध साधना दते व्यापत छलो परे अभी यह बात हो गई कामर पुकुर की जब ठाकुर कामर पुकुर गए थे मां को जयराम बाटी से बुलाया था दोनों ने साथ में रह करर के धर्म और दिव्य आनंद आध्यात्मिकता के आधार पर पति और पत्नी का दायित्व निभाया था अभी इस बात को किंतु 4 साल से भी ज्यादा समय बीत गया ठाकुर तो दक्षिणेश्वर आ गए थे एक के बाद एक साधना करते रहते थे और फिर तीर्थ दर्शन भी उन्होंने कितना किया मीन वाइल उस समय के दौरान मां तो जयराम बाटी में थी तो अभी ठाकुर ने क्या किया जयराम बाटी से जब मां आई तो फिर से वही कर्तव्य पालन करने के लिए प्रारब्ध हुए प्रारंभ किया अधुना भगवत इच्छा पत्नी के स्वस निधान समाग तो देखिया तिनी पुनर्वापर कर्तव्य संपादने जत्न परर होलेन इतने दिनों के बाद भगवत इच्छा से पत्नी को अपने पास में फिर से पा कर के अधूरा कार्य पूरा करने के लिए वह फिर से प्रारंभ यत्न वान हुए उन्होंने कमर कसी उन्होंने बीड़ा उठाया गुजराती में जो कहते हैं अर्थात की अधूरा कार्य कौन सा था पत्नी को धर्म शिक्षा देना से कर्तव्य जागतिक क्षेत्रे पति पत्नी चीर आरित व्यवहार मात्रे विशेष तो ना होईया अति जागतिक भूमि ते गुरु शिष्य मंत्र और साधना बा पूज्य पूज के कृपा और उपासना रूपे आत्व प्रकाश कोरिया मानव आध्यात्मिक भांडार एक नवीन संपद आनिया दते उद्यत होलो इस सेंटेंस को मैंने अंडरलाइन किया है और इस सेंटेंस में कितना सब कुछ महाराज ने कहा है दोनों तरीके से उने इस सेंटेंस और इसी तरह से बहुत सारे सेंटेंस मैंने पहले भी एक बार कहा था कि अ बांगला साहित्य की दृष्टि से भी और आध्यात्मिक साहित्य की दृष्टि से भी और फिलोसॉफिकली भी इसमें कितना डेप्थ रहता है तो इस तरह से यह एक है उसको थोड़ा सा विशेष रूप से इसका विश्लेषण करते हैं महाराज जी क्या लिखते हैं श कर्तव्य जागर जागतिक क्षेत्रे मने वो कर्तव्य है वह जागतिक क्षेत्र अर्थात कि बाह्य जो जगत होता है उस क्षेत्र में पति-पत्नी के चीर आच व्यवहार से ही नि विशेषत ना हुईया बाह्य जगत में व्यवहारिक जगत में हम पति और पत्नी के व्यवहार के बारे में कुछ अपेक्षाएं रखते हैं कुछ आशाएं रखते हैं कुछ ऐसा रखते हैं कि इनका व्यवहार इस तरह से होगा किंतु वहां तक ही सीमित नहीं होकर के अति जागतिक भूमित अति जागतिक अर्थात कि व्यवहार से परे ये सुपर कॉन्शियस लेवल जो है आध्यात्मिक जीवन जो है व्यवहारिक और आध्यात्मिक इस तरह से हम कहेंगे तो व्यवहारिक आचरण जो है पति और पत्नी का पति का पत्नी के प्रति कर्तव्य और पत्नी का पति के प्रति कर्तव्य वह व्यवहारिक क्षेत्र में जो है उसके अलावा भी आध्यात्मिक क्षेत्र में जो गुरु और शिष्य की मंत्र और साधना व्यवहारिक क्षेत्र में पति और पत्नी का संबंध आध्यात्मिक क्षेत्र में गुरु और शिष्य का मंत्र प्रदान और साधना में प्रवृत्ति बा पूज्य पूज केर कृपा और उपासना रूपे आत्म प्रकाश करिया पूज्य और पूजक की कृपा और उपासना रूपे आत्म प्रकाश करके मानव की आध्यात्मिक भंडार में एक नई संपद आकर के नई संपद लेने के लिए नई संपद लाने के लिए तैयार देखना पड़ेगा इसके बारे में एक्चुअली क्या कहते हैं देखिए कि पति और पत्नी का एक व्यवहारिक जगत में एक संबंध रहता है पहले तो दोनों के बीच में स्नेह का संबंध होता है फिर एक कर्तव्य होता है पति जैसे कि पत्नी पति के लिए खाना पकाती है उनकी केयर करती है वैसे ही पति भी अपनी पत्नी के लिए जो भी करना जैसे कि ठाकुर ने मां ठाकुर के लिए खाना पकाती थी तो ठाकुर जब मां बीमार हो गई तो मां के लिए जो भी ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी है वह की हम सब लोग अपने घर में माताजी और पिताजी को देखते हैं हमको पता है कि यह जो कर्तव्य क्या होता है किंतु यह तो व्यवहारिक क्षेत्र की बात हो गई व्यवहार से आगे एक आध्यात्मिक जगत है आध्यात्मिक जगत में किस तरह का रिश्ता होता है गुरु और शिष्य का रिश्ता होता है गुरु अपने शिष्य को मंत्र प्रदान करता है और साधन पथ में आगे बढ़ने के लिए उत्साह दे देता है और मार्गदर्शन देता है और फिर एक रिश्ता होता है पूज्य और पूजक का ईश्वर और उनके साधक का उनके भक्त का इस रिश्ते में होता है उपासना और भक्ति जो पुजारी है या तो भक्त है वह अपने ईश्वर की पूजा करेगा उनकी उपासना करेगा तो देखिए यहां पे एक सेंटेंस में महाराज जी हमको तीन रिलेशन के बारे में बताते हैं एक तो व्यवहार क्षेत्र में रिलेशन है पति और पत्नी का संबंध दूसरा है आध्यात्मिक क्षेत्र में गुरु और शिष्य का संबंध पूज्य और पूजक का भक्त और भगवान का संबंध तो तीन संबंध हमको इस एक ही मां और ठाकुर के भीतर में देखने को मिलते हैं यदि मैं व्यवहारिक दृष्टि से देखता हूं कि एक पति और पत्नी को किस तरह से रहना चाहिए तो व्यवहारिक दृष्टि से आप ठाकुर और मां के जीवन और सब प्रसंगों का विश्लेषण कर सकते हैं मैं जदी गुरु और शिष्य परंपरा कैसी होनी चाहिए गुरु का शिष्य के प्रति क्या कर्तव्य है शिष्य का गुरु के प्रति क्या कर्तव्य उस दृष्टि से कुछ भी समझना चाहूं तो भी मैं ठाकुर और मां के जीवन को देख कर के सीख सकता हूं और एक भक्त और भगवान का किस तरह से संबंध होना चाहिए भक्त भगवान की किस तरह से उपासना करेगा और भगवान भी किस तरह से से भक्त के ऊपर में प्रसन्न होकर के उसके ऊपर में आशीर्वाद की वर्षा करते रहेंगे यह संबंध मुझे यदि जानना है तो यह भी मैं ठाकुर और मां के संबंध में देख सकता हूं अर्थात कि तीन संबंध एक साथ में हमको ठाकुर और मां के जीवन में दिखते हैं जागतिक जगत में पति और पत्नी का और अति जागतिक अर्थात की आध्यात्मिक जगत में गुरु और शिष्य भक्त और भगवान का इन तीनों संबंध का जो आदर्श है वह ठाकुर और मां हमको दिखा कर के गए हैं इसमें एक ही जो है पैट्रियोटिज्म और देश के प्रति जो कर्तव्य है नागरिक का और देश का नागरिक के प्रति जो कर्तव्य है वह संबंध एक है हमको स्वामी जी के जीवन में देखने को मिलता है या तो फिर कहेंगे कि स्वामी जी की वाणी और लेखन में दिखने को मिलता है तो वह एक को दे देय एस्पेक्ट तो बाकी के तीन एस्पेक्ट हमको यहां पर ठाकुर और मां के जीवन में दिखते हैं आमरा ठाकुर अनुष सड़सी पूजा वर्णना भूमिका करते देखिए हम लोग यहां पर ठाकुर ने सड़सी पूजा की थी अर्थात मां को जगन माता के रूप में मां की पूजा की थी उसकी भूमिका तैयार कर रहे हैं से अचिंत्य पूर्व घटनाए आशी बार पूर्वे ए देव दंपति अपा विध अापद संबंध आमा दिग के आर एकट आलोचना करिया देखीते होई बे वो मने एक वैश्विक घटना वो एक ऐसी घटना जो कि हमारी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जो सर्वश्रेष्ठ जो प्रसंग होंगे उसमें से यह एक दिव्य प्रसंग उसकी आलोचना करने से पहले उसके बारे में विचार और चिंतन करने से पहले यह जो दिव्य दंपति है उनके बारे में और थोड़ा सा चिंतन हमको करना पड़ेगा अर्थात यह जो पूरा डिस्कशन गंभीरानंद जी महाराज कर रहे हैं इस पुस्तक के लेखक वह क्या है यह पूर्व भूमिका बांध रहे हैं क्योंकि शोशी पूजा क्या थी इसका क्या आध्यात्मिक महत्व है उसको हमको बड़ा ही डिटेल में समझना होगा सिर्फ ठाकुर और मां के जीवन में ही नहीं भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इस घटना का क्या प्राधान्य है रामकृष्ण संघ की दृष्टि से इस घटना का सब क्या तात्पर्य है क्योंकि मेरा खुद का जो एनालिसिस है कि रामकृष्ण संघ की स्थापना क कब हुई कौन सी घटना से हुई क्या वह घटना कि जब ठाकुर ने काशीपुर में ने अपने शिष्यों को गेरवा वस्त्र प्रदान किया था या तो वह घटना कि जबकि वराह नगर मठ में स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों के साथ में विरजा होम करके विधिवत सन्यास ग्रहण किया था या तो फिर वह घटना कि जबकि स्वामी जी ने अमेरिका में वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन के सामने खड़े रह कर के माय अमेरिकन सिस्टर्स एंड ब्रदर्स करके नए देश को नई सभ्यता को उद्बोधन किया था संबोधित किया था ना कि फिर जो पहली में को 18189 7 में बलराम मंदिर में रामकृष्ण संघ की विधिवत स्थापना हुई थी कौन सी घटना है जो कि रामकृष्ण संघ की स्थापना में सबसे महत्त्वपूर्ण है तो मेरी दृष्टि से यह शोड़ी पूजा है वह सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है क्योंकि अभी तक तो ठाकुर अकेले-अकेले साधना कर रहे थे और जो भारतीय परंपरा के अनुसार जो भी धर्म पिपासु धर्म जिज्ञासु उनके पास में आता था उनको आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते थे किंतु ये होलसेल लेवल पे वो रिटेन लेवल प ठाकुर उपदेश देते थे किंतु ये होलसेल लेवल पर उपदेश देना यह पूरे विश्व को संबोधित करना यह पूरे विश्व के जितने भी नर नारी है उनको एक यूनिट के रूप में समग्र रूप में उनको संबोधित करना वो तो तभी हो पाएगा जबकि यह जगत की जिनकी यह जो अधिष्ठात्री है जगत की जो देवी है जगत की ये जो मालकिन है जिनका यह जगत है उनकी सबसे पहले आराधना करेंगे तभी तो यह जगत उनके वश में आएगा यह जगत में जो चारों ओर पाप और यह दुष्कर्म और निराशा हताशा आज तो भारत देश बहुत अच्छी परिस्थिति में है भारत देश ही नहीं पूरा विश्व आज की यह जो टेक्नोलॉजिकल यह जो सब एडवांसमेंट ऐसी है कि थोड़ा सा भी बीमार होने से यह पेनिसिलिन है ना कि ये पैरासिटामोल है लेने से ठीक-ठाक हो जाता है मां को तो देखिए कि मां को इतना बुखार के बाद में बुखार आता था और बेचारी मां को सिंहवाहिनी के सामने हत्या देकर के पड़े रहना पड़ा हत्या देना अर्थात कि ईश्वर के सामने बिना खाए पिए वो आशा करके रहना कि ईश्वर हमारा काम वो ठीक करेंगे हमको आशीर्वाद देंगे और आशीर्वाद नहीं देंगे तो बिना खाए पिए यहीं पे शरीर त्याग कर देंगे इसको हत्या देना कहते हैं तो मां जब सिंहवाहिनी देवी के सामने शरीर त्याग का संकल्प करके पड़ी रही क्योंकि शरीर ही इतना बार-बार उनका बुखार बीमारी हो जाती थी कि क्या करें कोई उपाय ही नहीं था फिर आखिर में माने स्वप्न में आकर के उनको औषध दिया उनको दवाई दी तब ठीक हो गए आजकल हमको इस तरह से दिव्य दर्शन करके वह दवाई खोजने की जरूरत नहीं है आजकल यह फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री फिर यह एआई बेस मने यह जो डीएनए मैनिपुलेशन डीएनए सीक्वेंसिंग इतना पावरफुल है कि ये जो एक बिल्कुल न या कोरोना रूपी पेंडम जैसे ही आया उसके एक ही साल में उसका वैक्सीन भी खोज लिया गया यदि पहले के समय में ऐसा कुछ होता लाखों लोग मर जाते जिससे पहले कि इसकी कोई दवाई मिलती किंतु आज के जमाने में यह मेडिकल टेक्नोलॉजी यह जो डायग्नोसिस यह सब इतना एडवांस हो गया है कि जो कि असाध्य कहे जाने वाले रोग थे कैंसर उसके लिए भी आज हमारे लिए आशा है तो यह तो आज का जगत है ये आज का जगत बना कैसे वो जगत कि जबकि एक सामान्य बुखार भी हमको प्राण संशय हमारे लिए लाकर के रख देता था वहां से लेकर के आज कैंसर की ट्रीटमेंट करना चांद पे मनुष्य को भेजना यह जो एडवांसमेंट है उसके पीछे किनका आशीर्वाद है तो यही शोशी पूजा ही है जो कि नए जगत का जिसने प्रारंभ किया है हालांकि हम लोग कहते हैं कि ठाकुर के जन्म से ही सत युग आरंभ हो गया है कलयुग समाप्त हुआ है किंतु यह सतयुग का जो शंखनाद है सतयुग का जो एक समग्र विश्व के सामने उसकी उद्घोषणा जो है वह शक्ति यह जो शोशी पूजा के बाद में हुई शोड़ी पूजा ही सर्वप्रथम शंखनाद है जो कि इस विश्व को सुनाई दिया इसके बाद में ही ठाकुर ने ये देवेंद्रनाथ टैगोर फिर ये गिरी वो जो केशव सेन ये जो ब्राह्मण समाज के जो अग्रणी नेता थे उनको मिलना शुरू किया और उन्हीं के लेखन और जो वक्तव्य के माध्यम से गिरीश घोष वो बोलता था उनके प्रवचन देता था ठाकुर के बारे में तो कलकत्ता का यह जो एजुकेटेड यंग मेन है वो ठाकुर के पास में आना शुरू हुए ठाकुर ने एक बार अपने ये जो लड़के शिष्य है सब उनको कहा था और सिर्फ यही ने नरेण वगैरह ही नहीं ये जो मास्टर महाशय भी तो यंग ही थे उस समय तो ठाकुर ने कहा था कि तुम लोग आजकल के जो यंग बंगोल हो तुमने यह पाणी हाटी का महोत्सव देखा नहीं है चलो जाकर के देख के आते हैं तो ठाकुर को भी इतना तो अंग्रेजी समझ में आ गया था कि उनका मन लुभाने के लिए थोड़ा-थोड़ा अंग्रेजी फेंक दिया करते थे तो एक बार इसी तरह से वो एक जगह पर बोले थे कि एक मने वो ठाकुर भी देखिए कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ वो धार्मिक बातें ही सब समय करते रहेंगे क्योंकि उनको पता था कि लोगों का मन आकर्षित करना है मन लुभाना है तो सब समय एक उच्च कक्षा की माने उच्च सूर पर बंदी हुई धर्म की ईश्वर की साधना की बातें करते रहेंगे तो लोगों का मन इसको ग्रहण नहीं कर पाएगा तो बीच-बीच में ठाकुर हसी मजाक भी इतनी कर दिया करते थे तो एक आदमी हजाम के पास गया ठाकुर एक जोक कहते हैं एक आदमी अाम के पास गया ऐसा प्रसंग ऐसा है कि ठाकुर के पास में ये जो सब यंग बंगोल बैठे थे ना यंग सब अंग्रेजी पढ़े लिखे तो आपस में कुछ कुछ बात करते हैं अंग्रेजी में किसी ने कुछ बोल दिया तो ठाकुर को तो ऐसे तो ऐसा नहीं है कि परफेक्ट इंग्लिश आता था किंतु इतना तो आता था कि वो बीच में अपना एक पॉइंट रख देते हैं तो उन दोनों को इंग्लिश में बात करते हुए सुन कर के ठाकुर ने अपना एक अंग्रेजी अपना चला दिया एक आदमी हजाम के पास गया तो हजाम वहां पर बैठा उसको हजामत कर रहा है तो एकाएक कुछ कट गया तो मैंने वो आदमी जो आदमी जोर से चिल्ला उठा कि लगेगा ना तो वो जब अस्त्रा जो है वो रेजर जो है लगेगा तो थोड़ा सा तो पुन निकलेगा थोड़ा सा तो हमको वो में कष्ट होगा दुख होगा तो जैसे ही थोड़ा सा कटा थोड़ा सा ही खून निकला वो आदमी कस्टमर जोर से चिल्ला उठा डम अभी डम एक इंग्लिश में दी हुई गाली है तो अभी हजाम भी बड़ा एकदम गांव वाले होते हैं ना उनका एक आत्मसम्मान बड़ा होता है और जिस तरह से अपने कस्टमर ने डम बोला वो समझ तो गया अंग्रेजी नहीं समझ में आता है किंतु इतना तो समझ गया कि कोई बुरा शब्द कहा है तो बोला डम का अर्थ क्या है बताओ यदि डैम का अर्थ अच्छा है तो मैं डैम मेरा पिताजी डैम मेरे वो सभी के ने पूर्व पिताजी भी डम और यदि डम का अर्थ बुरा है तो तुम डम तुम्हारे पूर्व पुरुष भी डम तो ठाकुर देखिए कि किस तरह से व यंग बंगोल को पकड़ने का प्रयास करते थे उनके पास में सभी टेक्निक थी वो तो इसीलिए किंतु ये यंग बेंगोल को पकड़ने का उनको मोहित करने का जो प्रयास प्रारंभ हुआ वो इस शोड़ी पूजा से तो शोड़ी पूजा इसकी पूर्व भूमिका यहां पे महाराज जी बांध रहे हैं और यदि सड़सी पूजा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हमको वैसे तो लगेगा कि हां जभी यहां पर गंभीरानंद जी ने कहा कि गुरु और शिष्य का भी संबंध पूज्य और पूजक का भी संबंध तो हमको लगेगा कि मां ही तो ठाकुर की शिष्या है ठाकुर ही तो मां के गुरु है मां ही तो ठाकुर की आराधना करते हैं ठाकुर ही तो मां के ईश्वर है जैसे कि आगे के ही सेंटेंस में कहा देवता देवता या छन कामर जयराम बाटी में ठाकुर के बारे में जो कटु आलोचना सुनकर के दक्षिणेश्वर मां आई देखा ठाकुर वैसे के वैसे ही है तो गंभीरानंद जी ने क्या लिखा मां के मन में सदरा पहुंचा संतोष हुआ और मां ने क्या सोचा देवता देवता आछ देवता देवता ही है किंतु सड़सी पूजा में ठाकुर पूजक है और मां पूज्य है तो देखिए कि जैसे ये जो मने ये जो स्टेप अप होता है ना प्रत्येक रिलेशन जैसे कि उसकी अ उसकी महत्ता बढ़ती है पति और पत्नी का रिलेशन थोड़ा सा स्टेप वन समझे गुरु और शिष्य का स्टेप टू समझिए और पूज्य और पूजक भक्त और भगवान का इससे भी हायर स्टेप समझिए तो जहां तक पति और पत्नी का है पत्नी हमेशा पति के आधीन रहेगी पति की बातों को मानेगी गुरु और शिष्य में भी ऐसा है किंतु जहां तक पूज्य और पूजक का प्रश्न है यह दोनों रिवर्सिबल रोल कभी मां पूज्य है ठाकुर पूजक है तो कभी ठाकुर पूज्य है मां पूजक है तो किस तरह से यह जो संबंध का ग्रेडेशन है वह भी कैसे वह चेंज होता है जैसे जैसे आध्यात्मिक उच्चता हम चलते जाते हैं तो यह पूरा जो इसका एनालिसिस है रिलेशनशिप है बड़ा सा ही सुंदर रिलेशन इसका बड़ा ही सुंदर एनालिसिस गंभीरानंद जी महाराज आगे में करेंगे तो इसके बारे में फर्द कल देखेंगे ओ शांति शांति शांति हरि सत विरामना पण
Questions & Answers
मस्तु इसका काउंटर पॉइंट ने अपने अपने लिटरेचर में क्या है ना कि व विरोधाभासी सब समय आपको मिल जाएगा तो ऐसे काउंटर पॉइंट भी बहुत सारे है व मा जब दक्षिणेश्वर में नौबत में रह रही है एक वृद्ध महिला मां के पास में आती है तो मा अभी क्या कि वो संताप होता है संसार का तो मां के साथ में बात करके मन को जो सध्या मिलता है एक बार ठाकुर ने उनको देख लिया वह वृद्ध महिला को तो बाद में जाकर के मां को कहते हैं अरे तुम उसके साथ में क्यों बात करती हो उसका तो चरित्र अच्छा नहीं था जब वोह यंग थी तो मैंने उसका असत्य चरित्र था वैश्या थी ऐसी बात ठाकुर ने कही तुम उसके साथ में बात करोगी तो पता नहीं तुमको क्या उटपटांग वो सब बताएगी किंतु मां ने क्या कहा कि देखो कि वो अपने मन की ज्वाला वो मने ठंडी करने के लिए मैं मेरे पास में आती है मैं किस तरह के से उसको कह दूं कि मत आओ फिर ऐसा एक बार हुआ था कि मां खाना ले खाना तो ठाकुर का मां ही बनाती थी अपने ही हाथों से ठाकुर को खिलाने के लिए मां जाती थी तो अभी मां गई ठाकुर के खिलाने के लिए वो थाली लेकर के अब जैसे उनके कमरे में प्रवेश करती है एक महिला आकर के मां के हाथ में से थाली ले लेती है कहती है मां मुझे दो थाली मैं ठाकुर को दूंगी और वो उसने क्या किया थाली लिया ठाकुर के सामने रख दिया और फिर चली गई तो मां बाद में आई पीछे से और ठाकुर के सामने बैठी किंतु ठाकुर अभी खाने को स्पर्श नहीं कर रहा है क्यों ठाकुर ने कहा अरे तुमको पता नहीं है उस महिला का ऐसा चरित्र है वो अपने देवर के साथ में रहती है ऐसा वैसा मैं किस तरह से इस खाने को हाथ लगाऊंगा तो मां ने क्या कहा दोनों हाथ जोड़ कर के कि देखो ठाकुर जो मेरे पास मां कह के आता है उसको मैं किसी भी तरह से ना नहीं कह पाऊंगी तो ठाकुर जो बार-बार कहते हैं फिर से ऐसा मत करना मरना नहीं खाऊंगा मां ने ठाकुर को सुना दिया और भी एक घटना है ठाकुर मां तो ऐसे बहुत सारे लोग वहां पे आते थे ना वो दक्षिणेश्वर में गंगा स्नान करने के लिए गांव की कितनी ही महिलाएं आएगी सब ठाकुर वहां पे और मां के पास में बैठ कर के क्या सब उटपटांग बातें करेंगे तो एक बार ठाकुर ने ऐसा कुछ उनको सुनते हुए बातें करते हुए सुन लिया तो बाद में ठाकुर आते हैं मां के पास में कि देखो तुम यह जो सब महिलाएं तुमको जो कहती है कि ये तो तुम्हारा पति तुम्हा रे साथ में रहता नहीं है वगैरा वगैरा तुम्हारे बच्चे नहीं होते तो देखो भाई मेरा सब कुछ भगवान की कृपा से सब कुछ ठीक ठीक है मुझे कोई शारीरिक पर मने यह नहीं है मने प्रॉब्लम किंतु मैंने मेरा सब कुछ ईश्वर को दे दिया है इसलिए हम लोगों का संतान नहीं होगा किंतु तुम उन लोगों की बात सुन कर के वो दवाई पवाई मुझे मत खिलाना जिससे कि मेरी सब बातों में रुचि हो ठाकुर मां के पास में ऐसे लोग भी आते थे किंतु मां का वो विवेक था कि कभी-कभी वो जयराम बाटी का भी एक प्रसंग है ऐसे भी ऐसे प्रसंग है सभी घटनाओं का काउंटर है य विरोधाभास वो जो है ना ठाकुर ने कहा है ना कि वो बूढ़ी वो रमत है ना वो रमत में क्या करना है वो उस वो जो एक होता है ना जो सेंटर में जो एक रहता है कोई भी उसको छू लेना है उसको एक बार छू लिया फिर आप जो भी करें वो ऐसे ही