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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय नम मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित एक बार मां उद्बोधन में हमको तो पता है कि कभी कभी जयराम बाटी में रहती थी तो कभी-कभी उद्बोधन में और खास करके यह उन दिनों की बात है जबकि स्वामी जी अमेरिका से लौट कर के भारत वापस आए थे तब कहीं जाकर के उन्होंने सभी मां के लिए उन्होंने पूरे जो बेलर मठ की रचना की और फिर बेलर मठ की स्थापना के बाद में फिर शरत महाराज ने उद्बोधन भवन की मातृ मंदिर की वहां पर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया तो उद्बोधन में मा वाड़ी मेरवाड़ा करर के रहती थी तो एक बार मां वहां पर थी और सब साधु ब्रह्मचारी सब डिवटी सब लड़के लड़कियां कितने लोगों से वह उद्बोधन हरा भरा रहता था तो एक बार एक महिला वहां पर मां का मां को मिलने के लिए आई अभी मिलने के लिए आई ऐसा क्यों कह रहा हूं कि मां के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था तो जनरली लोग दर्शन के लिए आते हैं यहां पर मां के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था मां कौन है मां का क्या महात्म है वगैरह कुछ इतना उसको पता नहीं था तो उद्बोधन में आ गई कहीं से सुना होगा कुछ तो एक क्यूरियोसिटी होती है ना कि चलो जा करर के देखते हैं तो आई तो सही फिर आक के क्या हुआ कि उसने देखा कि पूरे बहुत सारे कच्चे बच्चों से वोह पूरा दो मंजिला तीन मंजिला मकान जो था वो पूरा भरा हुआ है मां है फिर ये लड़के हैं लड़कियां है तो वो फिर एक डिवटी को यह महिला क्या पूछती है पता है कि मां के पति अभी जिंदा है कि नहीं मां के गोसाई मायर गोसाई आछ की ना और फिर क्या पूछती है कि राश बुझी मायर छले में आर पुत्र बधु ना की के अर्थात की ये जो सब लड़के लड़कियां दिख रहे हैं यहां पर वो मां के पुत्र पुत्रियां पुत्र वधु यह सब है ना कि क्या तो जब जिस महिला को यह प्रश्न पूछा गया वो महिला थोड़ी सी नाराज होकर के बोली कि अरे आपको मां के बारे में कुछ पता नहीं है क्या ठाकुर तो त्यागी थे मां इन लोगों के तो संतान वगैरह कैसे हो सकते हैं यह तो उनके डिवटी है भक्त है ऐसा बोलकर के कुछ डांट के ऐसा सुना दिया तो वह जो महिला ने जिसने प्रश्न किया था वह थोड़ी शांत हो गई और बाद में चली गई अभी कुछ समय के बाद में जब जिस डिवोटा ने उस जो बताया था उत्तर दिया था वह जाकर के मां को बता रही है कि मां देखा सुना आपने कि एक वो एक औरत आई थी यहां पे और ऐसा पूछ रही है कि कि आपकी हम लोग जो है सब यहां पर आपके पुत्र पुत्रियां पुत्र वधु वगैरह है ना कि क्या उसको कुछ पता ही नहीं है आपके बारे में तो मैंने हंसते-हंसते कहा कि अरे उसमें क्या है तुम बोल ही देती कि हां हम लोग तो सब उनके संतान है हम सब उनके पुत्र पुत्रियां है पुत्र वधु हैं उसमें बोलने में क्या हर्ज है तो अभी देखिए कि माने तो हंस कर के ये बात को उड़ा दिया किंतु हम लोग जो कि यह सब स्टडी करते हैं तो हम लोगों में पता है घटना इतनी छोटी सी है किंतु इसमें से क्या तात्पर्य मिलता है क्या जानने को मिलता है जनरली एक मैं खुद आई बिलोंग टू अ जॉइंट फैमिली संयुक्त कुटुंब में मैं बड़ा हुआ हूं मैं बहुत सारे लोग संयुक्त कुटुंब में रहते हैं भाई तीन चार मने भाई रहते हैं फिर उनके उनकी पत्नियां रहती है फिर उनके लड़के लड़कियां रहते हैं तो 10 12 15 20 लोग एक साथ में जॉइंट फैमिली में रहते हैं तो कोई भी जद एक जॉइंट फैमिली में आएगा कोई भी आगंतुक कोई भी व्यक्ति नया व्यक्ति तो इन सभी के भीतर में जो स्नेह है इन सभी के भीतर में जो प्रेम और आपस में यह जो संबंध है वह स देख कर के ही समझ जाएगा कि हां ये एक सिंगल फैमिली है यह सब आपस में रिलेटेड है इन सब आपस में इन सभी का नाता है तो अभी यहां पर भी देखिए कि यहां पे यह जो उद्बोधन मायरवार्ड्स वो भी एक हरा भरा हंसी खुशी से भरा हुआ एक जॉइंट फैमिली जैसा था कि कोई भी यदि एक नया व्यक्ति वहां पर आता है जिसको शायद मां के बारे में या तो फिर शायद ठाकुर के बारे में कुछ भी ना पता हो तो उसके मन में सबसे पहला अनुमान यही आएगा कि यह सब लोग एक ही फैमिली के हैं एक ही परिवार के हैं और सब मां के ही सब संतान है मां ही इनकी जननी है सही सही अर्थ में तो ये एक एक कहते है ना कि फ्रेश पर्सपेक्टिव से यदि हम देखें बहुत बार ऐसा होता है कि मां के बारे में मैं ऐसा कह रहा हूं तो मैं तो ऐसा कहूंगा मैं तो मां की महिमा का गुणगान करूंगा कौन सी बड़ी बात है हम लोग तो सब छोड़ कर के सब संसार त्याग करके मां की शरण में आए हैं अभी साधु हो ना कि गृहस्थ भक्त हो हम सभी ने ठाकुर मां स्वामी जी को अपने जीवन के तारणहार के रूप में स्वीकार किया है हम लोग यदि मां की महिमा का गुणगान करेंगे तो जो एक थर्ड पर्सन है जिसको कि रामकृष्ण भावधारानी है वह सोचेगा अरे ठीक है यह लोग तो आपस आपस में प्रशंसा करेंगे ही उसमें कौन सी बड़ी बात है किंतु एक थर्ड पर्सन जिसको कि हमारी भावधारानी है वह आकर के जद ऐसा एक दृश्य देखता है तो उसकी टेस्टिमोनी है ना एक बहुत एक उसकी एक यूनिक वैल्यू हो जाती है कि हां यह सही सही में ऐसा कुछ था हम लोगों ने अपनी इमेजिनेशन में से यह खड़ा नहीं किया मास्टर महाशय के बारे में कुछ-कुछ लोग उस समय कहते थे कि अरे वो तो दक्षिणेश्वर के वो जो गंवार ब्राह्मण जो थे अनपढ उ उनके मुंह से इतनी सब वेद वेदांत की यह सब आध्यात्मिक विजडम की बातें कहां से निकलने वाली है यह तो मास्टर महाशय एमए किए हैं वो सब ये बाइबल से बड़े ही परिचित है बाइबल का अध्ययन किया है तो उन्होंने उसी में से सब बातें उठा कर के ठाकुर के मुंह में उठा दी है यह नरेंद्र जो है नरेंद्र तो बड़ा विद्वान था तो अपने गुरु को बड़ा करने के लिए उन्होंने यह सब किया है ऐसा कुछ-कुछ लोग बोलते थे उस समय अभी भी शायद बोलते होंगे तो यह जो थर्ड पर्सन टेस्टिमोनी जो होती है ना कभी-कभी सब बहुत ही वो एक इंपोर्टेंट कार्य करती है ठाकुर के बारे में थर्ड पर्सन टेस्टिमोनी कहेंगे या तो फिर एक इंडिपेंडेंट विटनेस कहेंगे तो वो कौन है यह सब ब्रह्म समाजी ब्रह्म समाजी जब भी ठाकुर के पास जाते थे तो ऐसे आश्चर्य चकित हो जाते थे मंत्र मुग्ध हो जाते थे ठाकुर की वाणी से ठाकुर की ये जो स्पिरिचुअल विजडम है उससे कि बिना किसी प्रॉन्प्टिंग के उन्होंने अपने पत्र-पत्रिकाओं में ठाकुर की प्रशंसा करके लिखना शुरू कर दिया था अभी उनके बारे में तो हम ऐसा नहीं कहेंगे कि भाई वे लोग ठाकुर के चेले थे और ठाकुर को बड़ा करने के लिए या तो फिर ठाकुर के नाम पर अपने को बड़ा करने के लिए यह सब लिख रहे हैं ऐसा तो उनके साथ में नहीं था एक्चुअली रामकृष्ण मिशन के साथ में तो बाद में उनका कंपटीशन जैसा हो गया था अब जैसे कि उस समय ऐसा था कि लाटू महाराज कहते हैं कि अरे वहां पर तो इतने सारे लोग जो उत्सव होता है तो किस तरह सा आप मेजर करेंगे तो घोड़ा गाड़ी इतनी पड़ी हुई है वहां पे जितने विजिटर आएंगे वो जितनी घोड़ा गाड़ी पड़ी होगी उसके बेस पे आप अनुमान करेंगे कि यहां पे इतनी घोड़ा गाड़ी पार्किंग लोट में पड़ी है वहां पे उतनी है तो कम ज्यादा यह आपको पता चलेगा तो लाटू महाराज कहते हैं अपने यहां प इतने कम उनके वहां प इतने ज्यादा तो वो एक समय था आज एक समय है कि अपने में हजारों लाखों डिवटी आते हैं और ब्रह्म समाज का नाम इसीलिए फेमस है क्योंकि हमारे साहित्य में उसका उल्लेख है अदर वाइज मैं कई ब्रह्म समाज के बारे में कभी भी जानने वाला नहीं था यदि अपने साहित्य में ना लिखा होता तो तो वो एक इंडिपेंडेंट टेस्टिमोनी का ये एक इंपॉर्टेंस है तो हम लोग कहते तो है कि हां मां का स्नेह मां का प्रेम इतना था कि मां के संपर्क में जो कोई भी आते थे सभी लोग मां से एकदम चीर परिचित अपनी खुद की मां है उस तरह से व्यवहार करना शुरू कर देते ऐसा नहीं कि मां जाकर के उनको कोई उपदेश देगी फिर उपदेश से इंटेलेक्चुअली प्रभावित होकर के मां को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया जैसे कभी-कभी ठाकुर के साथ में होता था मां के साथ में ऐसा नहीं था मां का प्रेम ही ता ऐसा एक स्निग्ध ज्योति की तरह उनके हृदय में प्रवेश करता था कि वह उससे बिल्कुल अभिभूत हो जाते थे खुद अपनी मां को जितना वो एक उसके प्रति उनकी एक आदर श्रद्धा एक निष्ठा होती थी वही आदर श्रद्धा और निष्ठा मां के प्रति प्रकट हो जाती थी उसमें मां को कोई बहुत बड़ा उपदेश नहीं देना था मां को बार-बार समाधि में नहीं चले जाना था मां को बड़े ही सुमधुर कंठ से ठाकुर की तरह भजन कीर्तन नहीं करना था कुछ नहीं करना था मां को सिर्फ बैठना था और पूछना था कि आओ बेटे तुमने खाना खाया कि नहीं खाना खा लो और कैसे हो बस इतना ही कुछ दो-तीन बातें करती थी और यदि कोई जब ध्यान के बारे में पूछेगा तो मां कह देती थी कि बस यह घड़ी का कांटे की तरह घड़ी का कांटा कैसे टिक टिक टिक करके चलता है तो वैसे ही उस घड़ी की तरह ही आपको प्रति क्षण जप करते रहना है इससे ज्यादा तो मां और ज्यादा कुछ कहती नहीं थी तो इतने में भी लोग कितने मां के परिचर परिचित हो जाते थे तो यह एक छोटा सा एक उदाहरण एक इंडिपेंडेंट टेस्टिमोनी यह घटना मैंने बहुत समय पहले पढ़ी थी कि तो कभी-कभी क्या होता है जैसे-जैसे अपना चिंतन मनन और विश्लेषण बढ़ता जाता है उसकी कैपेसिटी बढ़ती जाती है उतना ही यह सब चीजों का महात्म्य पता चलता है ये इंडिपेंडेंट टेस्टिमोनी क्या है जैसे कि मोहम्मद के बारे में और किसी अवतार के बारे में इस तरह का कोई इंडिपेंडेंट टेस्टिमोनी हो एक थर्ड पर्सन विटनेस हो ऐसा मुझे नहीं पता शायद जीसस के बारे में कह सकते हैं कि वह तीन जो वाइज मैन थे जो कि पूर्व में से गए थे उनको मिलने के लिए किंतु उनका कोई रिटर्न टेस्टिमोनी नहीं है एक मात्र किसी अवतार का है तो मोहम्मद का है पैगंबर का कि एक बार क्या हुआ कि एक सिरिया नाथ किसी देश का एंबेसडर राजदूत उनके साथ में मुलाकात करने के लिए गया अभी मुलाकात करने के लिए गया तो देखा कि वह बहुत सारे लोगों से घिरे हुए थे उनके वो जो यह रहते हैं ना कंपेनिया उनसे घिरे हुए थे तो अभी उस समय की प्रथा के अनुसार यह लोग क्या करते हैं पता है कि दाढ़ी रखते हैं और यदि किसी के साथ में बहुत ही क्लोजल मित्रता पूर्वक बातें करनी है तो उसकी दाढी पकड़ कर के बात करते थे माने आज हमको यह बात सुनकर के हंसी आती है किंतु उस समय की वह प्रथा थी कि किसी के साथ में बहुत अच्छा आपको इक्वल इक्वलिटी का संबंध स्थापित करना है जैसे यह जो प्रेसिडेंट और प्राइम मिनिस्टर होते हैं ना एक दूसरे को मिलते हैं आजकल तो व एक दूसरे को फर्स्ट नेम से पुकारते हैं तो वो नरेंद्र मोदी जदी जो बाइड से मिलेगा तो उनको बोलेगा जो करके बुलाएगा और जो बाइड नरेंद्र मोदी को नरेंद्र करके पुकारेंगे फर्स्ट नेम बेसिस अर्थात कि एक इक्वलिटी का संबंध स्थापित होता है जैसे वो उस लेवल पर होता है यह सब कन्वेंशन है स्टेट्समैनशिप के तो यह जो सिरिया ना की कहां का एंबेसडर आकर के उसने सोचा कि पैगंबर साहब के साथ में वो इक्वलिटी का संबंध स्थापित करने के लिए वो अपने को एंबेसडर यानी कि अपने को बहुत बड़ी तो अब समझता है बोला पैगंबर साहिब भी अपने इक्वल है ऐसा बोल के उनकी दाढ़ी लेकर बात करना शुरू किया तो किसी ने उनके जो कंपेनिया थे नाराज हो कर के तलवार निकाला और तलवार का धार वाला भाग नहीं साइड वाला भाग फट करके उसके हाथ पे मारा इतना जोर से उसे फट करके वोह एंबेसडर ने वो हाथ वापस ले लिया तब उसको पता चला कि एक सेकंड के भीतर में उनके जो कंपेनिया थे उनकी ये पैगंबर साहिब के ऊपर में जो श्रद्धा थी उसके ऊपर में ये एक रिस्पेक्ट था कित इतना प्रचंड था और कोई भी राजा इतनी रिस्पेक्ट अपने प्रति अपने जो दरबारी है वो दरबारियों की किसी भी राजा के प्रति इतनी रिस्पेक्ट नहीं होगी राजा को वो लोग रिस्पेक्ट क्यों करेंगे क्योंकि राजा उनको धन देता है उनको जमींदारी देता है और कुछ उल्टा-पुल्टा करेंगे या तो फिर राजा के विरुद्ध में कुछ बोलेंगे तो उनको पनिश करता है इसके लिए बाहर बाहर से ये लोग रिस्पेक्ट दिखाते हैं भीतर में कुछ रिस्पेक्ट नहीं होती भीतर में तो शायद राजा को गाली ही देते होंगे ज्यादातर दरबारी एसा ई करते हैं किंतु यहां पर यह एंबेसडर अपने हाथ से लिखता है कि यह मैंने अपनी नजरों से देखा और अनुभव किया कि पैगंबर साहिब के जितने भी कंपेनिया थे उनकी उनके हृदय में इनके प्रति प्रचंड रिस्पेक्ट थी यह हृदय से रिस्पेक्ट आना यह एक नई चीज मैंने देखी है तो वो एक इंडिपेंडेंट टेस्टिमोनी कहो ना कि एक थर्ड पर्सन विटनेस इतिहास में इस तरह से लिखा हुआ है तो यहां पे भी यह सब घटनाएं मैंने बाद में पढ़ी फिर अभी इस दृष्टि से फिर इसी घटना को देखिए कि यह जो महिला मां को मिलने के लिए आई है उसको यह नहीं पता कि ठाकुर कौन थे मां का क्या महात्म है और मां इन लोगों का जीवन क्या था कुछ नहीं आउट ऑफ क्यूरियोसिटी आई है और सबको देख कर के बोल रही है कि मां के पति जिंदा है कि नहीं है और यह लोग जो सब दिख रहे हैं वो उनके पुत्र पुत्रियां पुत्र वधु पोते पोतिया ये सब है ना कि क्या है वो आउट ऑफ क सिटी यह पूछती है तो यह क्यों पूछती है क्योंकि उसने देखा कि जननली यह जितने भी डिवटी वहां पर हैं त्यागी हो ना कि गृहस्थ हो मां के प्रति इनकी कितनी निष्ठा है कितनी आदर और श्रद्धा है जिनन आदर श्रद्धा है ऐसा नहीं कि कोई कोई लोग ऐसे आएंगे कि अरे चलो मां के पास में जाएंगे संसार के कुछ दुख दूर कर देंगे ऐसे लोग भी आते थे ऐसे लोग भी आते थे एक बार ऐसे कुछ लोग आए मां को मिलने के लिए कहा कि उनकी पुत्र वधु ना कि कोई है वोह बड़ी ही बीमार है उसके ऊपर में अस्त्रोतेल सरन की वगैरह कुछ हो गया है तो आप उसको आशीर्वाद दीजिए तो अभी जनरली मां तो क्या है कि सबके मन की यह जो बात है उनका क्या संस्कार है उनकी क्या सब पकड़ लेती थी तो इन जनरली तो मां सबको खुले हाथों से वो वेलकम करती थी खुले हाथों से वो सबको ग्रहण करती थी सबको को आशीर्वाद देती थी बिना किसी द्विधा के किंतु ये एक फैमिली एक ऐसा आया कि मां ने पहले तो अपने कमरे में आने ही नहीं दिया बोला कि वहां पे चौखट पे से ही प्रणाम करके चले जाओ और दूसरा कि जब बार-बार ये लोग कहने लगे आप आशीर्वाद दीजिए आप कहिए कि ये ठीक हो जाए यह सर्जरी करनी है तो उसको डर लग रहा है तो मां बड़ी ही जैसे कि ये हो गई अति होकर के बड़ी ही नाराज होकर के कहा कि अच्छा ठीक है ठीक है वो जाओ जाओ अभी जाओ यहां से तो ऐसे भी लोग आते थे तो ऐसा नहीं है कि वहां पर उद्बोधन में या तो जयराम बाटी में जो लोग जाते थे उनका सबका उनके हृदय में एक विशुद्ध भक्ति एक आध्यात्मिक यात्रा में सक्सेस आध्यात्मिक यात्रा में वह एक आगे बढ़ने का उनका एक यह था मंसूबा था ऐसा नहीं है सब तरह के लोग आते थे बीमारी ठीक करवा दो ऐसे लोग भी आते थे एक नफर चंद्र कोले बोलकर के जयराम बाटी एक धनी व्यक्ति थे तो यह धनी व्यक्ति तो क्या है कि इन लोगों का एक घमंड रहता है ना तो मां कौन है मां के पास में इतने सब भक्त आते हैं तो यह सब चीजों के प्रति उनकी एक कटाक्ष दृष्टि थी कभी अपने से मां को मिलने को नहीं जाएंगे कभी मां को आमंत्रण नहीं देंगे अपने यहां पे तो ठीक है जैसे लोग होते हैं तो होते हैं एक बार उद्बोधन में सडन रात को क्या हुआ किसी एक सा सन्यासी एक लड़के ने आकर के बच्चे ने आकर के के मां को बताया कि जयराम बाटी से एक भाई आए हैं उनका नाम है नफर चंद्र कोले तो मां तो एकदम आश्चर्य चकित हो गई यह तो बड़ा धनी व्यक्ति है जयराम बाटी में ही कभी मुझसे मिलने के लिए नहीं आया तो यहां पर क्या कर रहा है तो ठीक है मां ने कहा बुलाओ उसको तो वोह ये ऊपर में आए खोले और आकर के मां के पेर में पड़कर के एकदम रोना शुरू कर दिए तो मां ने कहा कि अरे क्या हो गया क्या हो गया आप इतनी बड़ी उम्र है आप कि आप इस तरह से रो रहे हैं य तो अच्छा नहीं लगता बैठिए बैठिए खड़े हो जाइए तो बड़ी ही कुछ समय के बाद में अपने हृदय में जो कुछ भी वो रोना भरा था वो निकाल करके फिर वो नफर चंद्र बैठे और मां को बड़े हाथ जोड़ कर के बड़े ही दनता पूर्वक विनती की कि मेरा लड़का वो मृत प्राय अवस्था में है उसको इस तरह की कोई बीमारी हो गई है कि इसका कोई इलाज नहीं है तो आप कृपा करके आप उसका कुछ समाधान निकालिए तो मां ने कहा मैं क्या उसमें कर सकती हूं माने ये तो डॉक्टर के पास जाना है कोई बीमार हो गया तो इसका इलाज यहां पर थोड़ी ना है तो ऐसा करके माने टालने की तो प्रयास किया किंतु वह तो रोते ही जा रहे हैं विनंती करते ही जा रहे हैं तो फिर आखिर में माने थोड़ा सा क्या करेंगे अभी इस सब केसेस में अच्छा ठीक है मैं ठाकुर के पास में प्रार्थना करती हूं ऐसा करके उनको वापस भेज दिया और किसी को बोला जाओ ठाकुर का प्रसाद थोड़ा सा इनको देके आओ शरद महाराज के पास में नीचे में बैठे होंगे वो जब गए तब मां ने कहा कि यह जो है जह ं बाटी में कभी भी उसकी मेरे प्रति कोई ऐसी कोई श्रद्धा वगैरह नहीं थी और ना ही कभी वो उनको मिलने के लिए आया है किंतु आज यह जो आया इसके पीछे कारण क्या हो सकता है पता है इनकी जो पुत्र वधु है उसको मेरे बारे में पता है माने वो शायद मां के पास में आती होगी तो उस पुत्र पुत्र वधु ने इनको जाकर के बताया होगा कि यदि आज उनके पुत्र की यह अवस्था है तो रास्ता दिखाने वाली या तो फिर उसको बचाने वाली सिर्फ एक मां ही है उसके अलावा कोई नहीं बचा सकता तब कहीं जाकर के दौड़े दौड़े रोते-रोते मां के पास में आए तो ऐसे भी केसेस थे कि जो कि चाहते हैं कि हमारे भवर रोग का उपाय मां कर दे संसार रोग का उपाय भी कर दे वे लोग भी आते थे और भवर रोग अर्थात कि यह जो माया का आवरण लगा हुआ है इस आत्मन के ऊपर में जिनको यह पता चल गया है वे लोग कहते हैं कि यह माया का आवरण है वो है भवगीत पाने के लिए भी आते थे और संसार रूपी रोग जो है उससे मुक्ति पाने के लिए दोनों तरह के लोग मां के पास में आते थे और यह जो थर्ड पर्सन जो कि इंडिपेंडेंट विटनेस व भी आते थे मां के पास में और आकर के देखते थे जो कोई भी आएगा भवर रोग से मुक्ति पाने के लिए ना कि संसार रोग से मुक्ति पाने के लिए सभी लोग मां के प्रति इतने भक्तिमार्ग सब हमको छोटी-छोटी दिखती है कि अरे हां ठीक है मां के बारे में तो पूरे जगत को पता है यह एक थर्ड पर्सन टेस्टिमोनी की हमको क्या जरूरत है किंतु यह जो इतिहास के पन्ने जैसे-जैसे उलट जाते हैं ना वैसे-वैसे ही एक पता नहीं एक एक भ्रम खड़ा होता जाता है ओरिजिनल घटनाओं के ऊपर में इतना सारा मसाला डाल कर के लोगों को परोसा जाता है पॉजिटिव हो ना कि नेगेटिव हो दुश्मन लोग है उसका बिल्कुल उस घटना को विकृत करके दिखाएंगे और जो उस भावधारानी पेट्स है वह हमको काम में लगते हैं जैसे कि जीसस के बारे में बाइबल में या तो फिर बाइबल के बाद कैथोलिक चर्च ने जीसस के बारे में जो एक खड़ा किया है उनके जीवन को सेंसर करके कुछ-कुछ घटनाओं को बहुत बड़ा किया है कुछ-कुछ घटनाओं को बिल्कुल ही दबा दिया है या तो फिर बिल्कुल ही सेंसर कर दिया है तो इस घटना के 2000 साल के बाद में यह जो सब हायर क्रिटिसिजम बोलकर के थिंकिंग प्रोसेस यूरोप में शुरू हुआ य लोग फिलोसॉफिकली देखना शुरू किए कि सही सही जीसस बोलकर के कोई था कि नहीं तो उन्होंने इतना सारा कंट्रा इक्स पकड़ना शुरू किया जीसस के जीवन के बारे में जो कि कैथोलिक चर्च प्रोजेक्ट कर रहा था कि आखिर में ऐसी परिस्थिति आ गई कंट्रक्शन आफ्टर कंट्रा शक् यह विरोधाभास के बाद में दूसरा विरोधाभास कुछ-कुछ पंडित लोगों ने यह बोलना शुरू कर दिया जीसस बोलक कोई था ही नहीं चर्च ने ही उसको बना कर के अपना महात्म प्रचार करने के लिए उसको बना दिया है लोगों को मूर्ख बनाने के लिए तो यह हज साल 2000 साल के बाद में यह सब घटनाओं का महात्म हमको पता चलता है मां के बारे में अभी देखिए कि हम मां के बारे में सोचेंगे कि मां का जीवन इतना ट्रेडिशनल था इतना मतलब इस तरह से था कि जैसे कि आधुनिक जीवन के साथ में कोई संपर्क ही नहीं था ऐसा कभी हो सकता है ना तो एक दूसरा एक छोटा सा इंसिडेंट बिल्कुल छोटा सा कि किसी के घर मा गई है किसी डिवटी के वहां प तो डिवटी के वहां पर गई है रात हो गई है अभी वहां से उद्बोधन जाना है वापस तो उद्बोधन का रास्ता तो बड़ा लंबा है तो अभी रात हो गई मां अभी सब लोग आहार वगैरह करके भोजन वगैरह करके मां ने ठीक किया कि चलो हम चलते हैं चलना शुरू किया अभी उनके घर में से जैसे ही बाहर आए देखा कि अंधेरा हो गया है और मोटर गाड़ी की व्यवस्था करके रखी है अभी मोटर गाड़ी तो उस समय इन्वेंट हो गई थी इंडिया में भारत में आ ही गई थी यह कोलकात्ता वगैरह जो महानगर थे वहां पर यह मोटर गाड़ी चलना शुरू हो गई थी तो अभी जनरली मा मां को तो यह यह था कि अभ्यास क्या था मा मां का जो एक्सपीरियंस क्या था तब तक का कि हां चलो बेलगाड़ी में मां ने मुसाफिर की है पालखी में मां ने मुसाफिर की है हो सकता है ये जो बगी या तो फिर कलकाता में ये जो घोड़ा गाड़ी चलती है उसमें माने मुसाफिर की है ये मोटर गाड़ी फिर ये कौन सी चीज है भाई तो सब भक्तों ने कहा मां चलो मोटर गाड़ी में बैठ जाइए चलो घर जाना है उद्बोधन जाना है तो मां ने कहा नहीं बेटा देखो ये मोटर गाड़ी के नीचे मां ने देखा था कि एक एक कुत्ता आकर के उसके पेर उसके पहिए के नीचे आकर के मर गया था तो अभी ये एक था ना मां का एक मधुर एक ग्राम्य स्वभाव कि यह सब चीजें क्या है वह जो नल में से पानी आ रहा है तो गांव में तो कहां नल में से पानी आने वाला है कोलकात्ता की तरह वे लोग तो कुएं में से या तो तालाब में से घ व घड़ा भर भर करके पानी लाते थे उसी को यूज़ करते थे वह कलकाता में देखा नल में से पानी आ रहा है और नल में नल खोलेंगे तो पानी आने से पहले जो सूसू करके जो आवाज आएगी ना वो हवा जो उसमें एयर बबल्स जो भरे होंगे पाइप के भीतर में प्लंबिंग के भीतर में वो एयर बबल्स पहले निकलेंगे तो वो आवाज आएगी तो मां ने पहली बार ऐसा वो जो पाइप देखा ना वो प्लंबिंग का जिसमें से पानी निकलता है तो मां एकदम चौक कर के दौड़ कर के बाहर आई बोला कि देखो देखो पाइप के भीतर में वो सांप आया है तो सब लोग हंसने लगे कि अरे वो सांप नहीं है वो एयर बबल है तो एक ऐसा मां का एक सुमधुर एक ग्राम्य स्वभाव था तो मां के मन में अभी ये फिट बैठ गया कि ये मोटर गाड़ी जो है उसके पहिए के नीचे कुत्ता मर गया था तो पता नहीं यह कौन सा एक राक्षसी एक यंत्र है इसके भीतर में मैं नहीं बैठूंगी ऐसा बोल कर के मां ने कहा कि या तो पैदल चलते या और कोई व्यवस्था करो तो अभी ये रात हो गई है उद्बोधन इतना दूर है कहां पे और सब चीजों की व्यवस्था होगी व सभी लोगों ने मां को समझाना शुरू किया मां ऐसा तो ठीक है कभी-कभी एकद बार दो बार होता है कि वो उसके पहिए के नीचे में कोई कुत्ता आ करके मर गया होगा ऐसा कोई रोज-रोज नहीं होता आदमी भी नहीं मरता आप आ बैठिए इसके भीतर में कोई दिक्कत नहीं होगी सब ने कहीं इतना मनाया मां को समझाया तब कहीं जाकर के मां ने कहा अच्छा ठीक है सब लोग बोलते हैं तो मैं बैठती हूं ऐसा बोल कर के मां मोटर गाड़ी में बैठ कर के वो उद्बोधन वापस आई तो ऐसा एक ट्रेडिशनल और यह आधुनिक ये अर्वाचीन और आधुनिक इन दोनों के बीच के जो ये जो सेतु है ब्रिज है उसके रूप में हम मां को पाते हैं कि कहां अपनी वो पुरानी सनातन संस्कृति थी वह धीरे-धीरे लुप्त हो रही है एक आधुनिक भारत का एक नए भारत का सूर्योदय हो रहा है किंतु वह जो अर्वाचीन संस्कृति के यह जो हमारे सनातन धर्म और सनातन साधन पद्धति सनातन विचारधारा उसको तो कैरी फॉरवर्ड करना है नए भारत में तो वह कार्य ये सेतु के रूप में ठाकुर मां और स्वामी जी ने किए हैं स्वामी जी तो खैर अल्ट्रा माने वो मॉडर्न थे ही थे इस अर्थ में कि वह आधुनिक युग को बड़ा अच्छे से समझते थे किंतु ठाकुर और मां को खास करके देखिए कि कैसे वो पूरे पक्के अपनी ग्राम्य ट्रेडिशनल हुए हैं और उन्होंने किस तरह से कलकत्ता को अपने खुद के अ अपना खुद का समझ कर के स्वीकार कर लिया वरना ऐसा हो सकता है कि ग्राम्य यह जो हाजरा वगैरह थे वो एक माइंड सेट लेकर के वो कलकाता में आए थे आजरा का कुछ देना था वहां पे ऋण था अभी एक दो लाख का ना कि कितना वह ऋण था उसका तो वह ऋण चुकाना है तो कैसे चुकाए तो वह कोलकात्ता आकर के वह ठाकुर के कमरे के सामने बैठ कर के वो पीतांबरी पहन के तिलक और माला पहन के जप करता रहता था वो माला के ऊपर में और जितने भी ये लड़के आते थे ठाकुर के पास में ये राजा महाराज है नरेण है ना कि कोई भी है उनके प्रति एक बड़ी ही वक्र दृष्टि रखता था क्या कहता था ये लोग बस हल्लागुल्ला करके इधर-उधर घूमते रहते हैं कहां कोई ठीक बैठ कर के जब ध्यान करता है जब ध्यान तो मैं करता हूं अरे कहने का अर्थ यह है कि यदि कोई धनी डिवोटा आ जाए धनी व्यक्ति आ जाए तो उसको मैंने उसको पटा करके कुछ पैसा निकाल ले जैसे कि उसका जो ऋण है वह ये कर सके तो ऐसे लोग भी एक थे कि ग्राम्य समाज में रहने करके वो लोग जब भी कोलकात्ता आते थे तो बड़ी ही वक्र दृष्टि से सब कुछ देखते थे अरे यह आधुनिक जगत है पूरा गड़बड़ वाला है हमारी सनातन संस्कृति ही ठीक थी तो ऐसे भी लोग थे किंतु ठाकुर और और मां दोनों ने बड़े भले ही चाहे गांव में बड़े गांव में उनका जन्म हुआ गांव गांव में उनका लालन पालन हुआ बड़े हुए किंतु जब कलकत्ता आए तो आधुनिकता को उन्होंने अपने दोनों हाथों से ग्रहण कर लिया क्यों क्योंकि अब हम यदि ऐसा सोचते हैं कि एक अर्वाचीन संस्कृति और यह आधुनिक संस्कृति तो ये संस्कृति तो बदलती रहेगी यह जो मनुष्य जो है मनुष्य तो एक ही है वही मनुष्य उस समय वैदिक युग में रहते थे वही मनुष्य आजकल वह जो मिडिल एजेस जो था हमारा भारत का उसमें रहते थे और वही मनुष्य तो आज के आधुनिक भारत में रहते हैं और उसी मनुष्य के कल्याण के लिए यह लोग आए हैं वह मनुष्य ने चाहे वह अर्वाचीन होता के कपड़े पहने हो वस्त्र पहने हो ना कि आधुनिकता के वस्त्र पहने हो है तो वही मनुष्य और वही मनुष्य का कल्याण करने के लिए यह लोग आए हैं तो इसीलिए इनका जीवन देखिए कि कितना सुमधुर था कुछ कुछ चीजें ऐसी उनके जीवन में होती थी कि जैसे कि उसको पढ़ कर के हमको मने जैसे जैसे पढ़ते जाएंगे जैसे-जैसे इसके बारे में स्टडी करते जाएंगे विश्लेषण करते जाएंगे नए नए चीजें नया-नया एक दृष्टिकोण हमारा एक इसके बारे में वो डेवलप होता रहेगा अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण
Questions & Answers
मस्तु ठाकुर के पास में जितने भी लड़के आते थे लाटू महाराज को छोड़ कर के सभी लोग इस तरह से एक आधुनिकता के रंग से रंगे हुए थे इस अर्थ में कि आधुनिक शिक्षण प्राप्त किया था और यह मॉडर्न एजुकेशन का एक एक क्वालिटी है कि एक स्केप्टिसिजम आपको सिखाया जाता है कोई एक बड़ा दावा कर दे कि मेरे पास में इस तरह का जादू है ना कि मेरे पास में इस तरह का एक विद्या है कि जिससे मैं पीतल को सोना बना सकता हूं या बीमार व्यक्ति को मैं सुस्त कर सकता हूं तो ऐसी चीजों पर सहजता से विश्वास मत कीजिए क्योंकि इस तरह से लोगों को मूर्ख बना वाने लोगों की कोई कमी नहीं है तो एक स्केप्टिसिजम सब में था उनको एक ये स्केप्टिसिजम का बैरियर क्रॉस करके ठाकुर को स्वीकार करना था तो ठाकुर के पास में ये जो आध्यात्मिकता का जो ऐश्वर्य था विद्या का जो ऐश्वर्य था वह ठाकुर को दिखाना पड़ा स्वामी जी को तो अमेरिका जाकर के प्रचार करना था अमेरिका माने ये महा स्केप्टिसिजम कहो ना कि ये माने नास्तिक वाद की चरम सीमा पर बैठा था भौतिकवाद की सुख उपभोग की चरम सीमा पर बैठा था भारत को तो एक तुच्छ गुलाम देश वे लोग समझते थे काली चमड़ी वाले जैसे उनके काली चमड़ी वाले निग्रो गुलाम थे वैसे ही एक भारत देश गुलाम था तो वहां पर जाकर के स्वामी जी को एक विद्या का ऐश्वर्य दिखाना पड़ा स्वामी जी ने एक लेटर में लिखा है यहां पर वह साधु होता नहीं चलेगी त्याग नहीं चलेगा वह एक अंतर्मुखी वन नहीं चलेगा यहां पर जद चलेगा तो यह विद्या का तोड़ और यह क वक्त होता की धूम यह यहां पर चलाना पड़ेगा तब कहीं जाकर के ये लोग आपको स्वीकार करेंगे तो यह विद्या का तोड़ और यह वक्त होता की धूम न किय ठाकुर का यह जो समाधि ऐश्वर्य बार-बार समाधि में चले जाते हैं भजन कीर्तन करते हैं ये क्या था कि इनिशियल स्केप्टिसिजम की बैरियर को तोड़ने का एक तरीका अभी मां के पास में देखिए कि मां के पास में जब कलकाता या वहां के विदेशी लोग आना शुरू किए इंक्लूडिंग ये निवेदिता है ओली बुल है या तो फिर कलकाता के लोग हैं उनका ये जो स्केप्टिसिजम का बैरियर था ना ये ऑलरेडी ठाकुर और स्वामी जी ने तोड़ दिया था अभी जैसे निवेदिता कहां वो निवेदिता शी सच्चे मने वो फाइटर शी इज अ फाइटर ब्रिटिश एंपायर के साथ में डट कर के फाइट करना उसका एक नेचर था तो उसने आकर के मां को फट करके स्वीकार कर लिया तो उनका एक ट्रेजे क्ट है कि एक इनिशियल स्केप्टिसिजम एक इंटेलेक्चुअल एक उनका एक रहता है एक ईगो भी रहता है उसको तोड़ना है बाद में मां को स्वीकृत करना है किंतु अब ज देखिए कि मां के पास में एक अन्य तरह के लड़के भी आते थे वो कौन थे क्वाल पाड़ा के ये क्वाल पाड़ा की कहानी आप जितनी ही पढ़ते जाएंगे ना उतना ही एक नया-नया पर्सपेक्टिव मिलता जाएगा अभी यह जो सन्यासी संतान है या तो यह निवेदिता वगैरह जो फॉरेन डिवटी है वे लोग मां के पास में आते हैं उनका क्या था कि उन लोगों ठाकुर और स्वामी जी ऑलरेडी खींच के ले आए थे मां को फिर उनको गाइड करना था जबकि क्वाल पाड़ा था कि उस दक्षिणेश्वर के दिन सर्वप्रथम दिन जबकि सर्वप्रथम यह लड़के लोग ठाकुर के पास आना शुरू हुए एगजैक्टली यही एक जो लीला वहां पर जयराम बाटी कोआलपाड़ा में वो उसका अभिनय हो रहा था यह लड़के बिल बिल्कुल फ्रेश थे कुछ पता नहीं था वैसे मां के बारे में व जो केदार बाबू थे उन्होंने सुना कि श्री रामकृष्ण देव की सहधर्मिणी अभी भी जीवित है और जयराम बाटी में है तो चलो जाकर के मिलते हैं जाकर के मिले कहा मां हमने एक स्कूल के कुछ लड़कों ने मिलकर के और केदार बाबू टीचर थे तो हम कुछ लड़कों ने और टीचर ने मिलकर के एक छोटा सा आश्रम चालू किया है स्वदेशी सब आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तो मां ने उनको कहा कि अच्छा ठीक है मैं एक बार वहां पे आती हूं ठाकुर को बिठा कर के जाऊंगी क्योंकि सिर्फ स्वदेशी करने से नहीं चलेगा एक आध्यात्मिक जीवन चाहिए तो फिर मां आई क्वाल पाड़ा मां ने उन लोगों ने मंदिर बना दिया था मंदिर के भीतर में मां ने अब ठाकुर का फोटो और अपना फोटो दोनों ही स्थापित किया एक्चुअली मां को स्थापित करना था ठाकुर का फोटो किंतु जिस महाराज ने यह स्मृति कथा लिखी है उन्होंने लिखा है कि हमको पता है कि स शक्तिक अवतार की आराधना ही शास्त्रीय विधि है इसलिए ठाकुर का फोटो तो तैयार रखा था मां का फोटो भी तैयार रखा और मां ने बिना किसी द्विधा के अपने फोटो को स्थापित कर दिया ये मेरे ख्याल से इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि किसी अवतार ने अपने स्वयं अपने हाथों से अपने फोटो की स्थापना की हो जो भी है तो माने और फिर सतत नियमित रूप से मां कोवाल पाड़ा आती रही और यह कोवाल पाड़ा के लड़कों ने मां के प्रति ये जो एकदम आत्मसमर्पण किया ये एक बिल्कुल नई स्टोरी है ये जो लाटू महाराज और ठाकुर की एक जो यूनिक कहानी जो मिलती है कि बिल्कुल हृदय की प्रेरणा से जो आत्मसमर्पण यही आपको यहां पर मिलता है कोई स्केप्टिसिजम नहीं था कुछ नहीं था और ऐसा नहीं था कि ये लड़के मूर्ख थे गंवार थे अनपढ़ थे ये लोग तो स्कूल के पढ़े हुए लड़के थे ग्रेजुएशन वगैरह इन्होंने सब किया था किंतु फिर भी क्या है गांव में रहते हैं ना तो ये सिटी का स्केप्टिसिजम उन लोगों में इतना शायद नहीं था तो वो एक हृदय के आवेग से आत्मसमर्पण करना तो ये जो क्वाल पाड़ा जयराम बाटी की एक स्टोरी है और यह कोलकात्ता शिकागो की एक सेकंड स्टोरी है दक्षिणेश्वर शिकागो की तो अपने ऑर्डर में देखिए कि इसका भी एक एग्जांपल है कि कैसे आपको पहले स्वामी जी को पढ़िए या तो फिर पहले स्वामी जी से इंस्पायर होइए बाद में ठाकुर पर श्रद्धा हो ठाकुर के पास जाइए बाद में मां के पास आइए ऐसा हम लोग जो बोलते रहते हैं यह दक्षिणेश्वर शिकागो वाला मत है और एक दूसरा मत भी है यह जयराम बाटी क्वाल पाड़ा वाला एक दूसरा पथ भी है कि यहां पे सीधा आप अपने हृदय के आवेग से सीधा मां के पास पहुंच जाते हैं और ठाकुर और स्वामी जी को रखो बाद में तो दोनों रास्ते अपने यहां पे है अभी जैसे देखिए आप पहाड़ चढ़ते हैं जैसे तो जैसे-जैसे आप ऊपर जाएंगे ना वैसे-वैसे ही ऑक्सीजन कम होता जाएगा अभी छोटे-मोटे पहाड़ जैसे गिरनार वगैरह तो ठीक है किंतु एवरेस्ट वगैरह पे जाएंगे एकदम ऊपर में जाएंगे तो आपको ऑक्सीजन का टैंक का वह ऑक्सीजन एक्स्ट्रा लेने की जरूरत पड़ेगी अदर वाइज तो वहां पर सर्वाइवल मुश्किल है राइट तो मान लीजिए कि यह ऑक्सीजन को हम लव के रूप में देखते हैं तो एक्चुअली क्या है ना और यह पहाड़ जो है ना इसको अपनी एक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखते हैं तो एक्चुअली जैसे हम ये जो जब सतह के पास में जब होते हैं हजार 2000 फुट की ये जो एक अपना डिस्टेंस है पहाड़ चढ़ने का वो क्या है ना कि हम लोग संसार से जड़ित होते हैं और वहां पर हमको एक एक्स्ट्रा ऑक्सीजन की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि हमारा माइंड भी एक संसार के भीतर में रहा है तो एक संसार यों के ज हमारा वर्तन जो है वह एक कॉमन वर्तन होता है किंतु जैसे-जैसे पहाड़ चढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे संसार हम छोड़ते जाएंगे सांसारिक रिस्पांसिबिलिटीज को हम पीछे रखते जाएंगे और हमको उस समय यह ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती जाएगी अर्थात कि अपना लाइफ संसार को पीछे छोड़ के एक त्याग के रास्ते पर जाएगा और उसी समय यह लव जो है डिवाइन लव वह मेनिफेस्ट होगा अभी हम यदि यह कहे कि डिवाइन लव संसार में कैसे मेनिफेस्ट होगा तो ये कंट्रा क्शन है क्योंकि जब तक हम संसार में रहते हैं हम लोग सभी तरह की इमोशन से घिरे हुए हैं इसलिए तो हम संसार में है अदर वाइज तो संसार में होते ही क्यों एक तरह का एक काम और कांचन के प्रति एक अट्रैक्शन है मन के भीतर में छुपी हुई वासना एं हैं भले ही चाहे हम मुंह से कुछ भी बोलते हो मन के भीतर में तो सब होता ही है एक सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी होती है तो जब तक यह रहता है तब तक हम डिवाइन लव जो है वो मेनिफेस्ट होगा ही नहीं क्योंकि यह संसार का स्वरूप ही ऐसा है जैसे-जैसे आपका त्याग के रास्ते पर बढ़ते जाएंगे जो संसार है उसको आप छोड़ते जाएंगे एक रिस्पांसिबिलिटी तब कहीं जाकर के ये डिवाइन लव मेनिफेस्ट होना शुरू होगा जैसे कि वो ठाकुर की कहानी है ना कि एक पत्नी ने अपने पति को कहा कि देखिए उनकी एक दूसरे एक परिवार का उदाहरण देकर के उनकी 10 बीवियां है वो एक-एक करके सभी बीवी का त्याग करते हैं तो यह पति ने क्या कहा अरे इस तरह से त्याग नहीं होता त्याग देखो मैं करता हूं एक गमछा कंधे पर डाला और निकल गया जब तक आप त्याग के रास्ते पर नहीं चलते तब तक य डिवाइन लव मेनिफेस्ट होना शुरू नहीं होगा ये कंट्रक्शन हो जाएगा संसार में रहकर यह सब करना एक संसार का अपना एक आध्यात्मिक यह है एक कहेंगे कि आध्यात्मिक प्लेटफार्म है उसके अनुसार उसको आपको करना है और एक त्याग का अपना एक स्पिरिचुअल प्लेटफॉर्म है उसके अनुसार वह उस नियम के अनुसार चलता है जैसे-जैसे यात्रा करते जाएंगे वैसे-वैसे त्याग की ओर बढ़ेंगे जैसे अपने वेद में कहा है ऐसा नहीं है कि आप पहले से सन्यास ले ले तो वेद में जैसा था कि गृहस्थाश्रम फिर वानप्रस्थाश्रम फिर सन्यास आश्रम रहते तो हैं घर में किंतु मन से जवाबदार को छोड़ना शुरू करते हैं तब कहीं जाकर के यह डिवाइन ल मेनिफेस्ट होगा वरना वो जो एक वो जो है ना कि मृत्यु शया पर एक वृद्ध व्यक्ति पड़ा हुआ है उसके बीवी बच्चे वगैरह आसपास में उसको घेर के बैठे हुए तब यह वृद्ध क्या कहता है अरे ये दिए की बाठ थोड़ा कम करो बहुत ज्यादा तेल उसमें जलता है जब तक ये कितना तेल जलता है दिए के भीतर में वह सेंस होगा तो व कैसे डिवाइन लव आप उस कंडीशन में मेनिफेस्ट करेंगे आपको अपने मन को धीरे-धीरे करके यह सब सेपरेट करते जाना पड़ेगा देन ट लव विल स्टार्ट मेनिफेस्टिंग सो ट इज द थिंग अदर वाइज जब तक हम गृहस्थाश्रम में है तो जैसे वह ठाकुर ने कहा कि वो साप को दृष्टांत देकर के फोस तो करना है अपने स्व बचाव में क्या कहा कि सन्यासी को तो फोस भी नहीं करना है तो यहां पर ऐसा नहीं है कि गिरवा दारी है ना कि संसारी है आप अपनी यात्रा पर कहां पर है वो ये है भीतर थे कि हमरा बुते प ज हमरा कोथा जखन दिव्य गुनाव तो देवी संपद जाके बोले य देवी संपत जब मेनिफेस्ट होना शुरू होती है ऑटोमेटिक हमको समझ में आता है कि हां अभी ये हम लोग यह सब चीजों से दूर होकर के एक नए रास्ते पर जा रहे हैं ये ऑटोमेटिक होता है अपने खुद के घर में देखेंगे कि मैं जब छोटा था तो मामा के घर जाता था मसाल जाता था तो मसाल में मेरी नानी थी तो अभी जैसे ही वेकेशन पड़ा हमको चिल्लाना शुरू कर देते चलो वहां पर चलते हैं गांव चलते हैं नानी को मिलते हैं चलो चलो अब मेरी मां थोड़ी परेशान हो जाए अरे भाई अभी तो थोड़ा ठहरो घर में इतना सारा काम है किंतु नहीं वो मसाल जाना ही है नानी को मिलना ही है तो जैसे ही छुट्टी हुई वेकेशन हुआ समर वेकेशन वो मां लेकर जाएगी मसाल और दौड़े दौड़े जाएंगे नानी के हाथों में जाकर के उनके उनको एकदम पकड़ लेंगे और उनके आसपास में घूमेंगे खेलेंगे डिमांड करेंगे ये खाना दो वो खाना दो तो अट्रैक्शन कहां से आता है क्योंकि जैसे ये वृद्धावस्था आती है ना तो ज्यादातर घरों में देखेंगे कि अभी बच्चे बच्चियां है पुत्र पुत्र वधु है उन्होंने अभी धीरे-धीरे करके डे टू डे जिम्मा उन्होंने संभाल लिया है अभी यह बिजनेस करना है नौकरी करना है अभी आपको यह टैक्स देना है ना कि ये बिजली का बिल भरना है आजकल तो सब डिजिटल हो गया है उस समय वो सब बड़े टेंशन रहते थे ये लाइट का बिल आया तो जाकर के मेरी मां मेरे हाथ में तमा देती थी जाओ जाके लाइन में खड़े रहो मैं भी बड़ा परेशान होकर के अरे भाई जाके लंबी लाइन में खड़ा रहना पड़ेगा तो ये सब छोटे-मोटे दुनिया भर के जो टेंशन थे तो अभी वृद्ध होने के बाद में यह सब यंग लोगों ने ले लिए हैं तो मन ऑलरेडी ये सब चीजों से धीरे-धीरे करके सेपरेट होता जाता है और बच्चे भी लड़के भी क्या करेंगे जब अपने बिजनेस में कोई टेंशन आया लाइफ में तो जाकर मां को बताएंगे नहीं क्यों बिना मतलब वो टेंशन करेगी उसको यह सब बताने से क्या है डे टू डे टेंशन है वो हम ही लोग लेते हैं मां को यह सब नहीं बताना है तो ऐसा मां को क्या बचा करके रखते हैं तो ऑटोमेटिक धीरे-धीरे देखेंगे नानी के भीतर में नाना के भीतर में दादा दादी के भीतर में एक त्याग ऑलरेडी आ जाता है एक सबके प्रति करुणा स्नेह ऑलरेडी आ जाता है तो यह जो छोटे-छोटे बच्चे होते हैं ना उनको यह समझ लेते हैं और दौड़ के उनके पास में जाके चले जाते हैं हो सकता है कभी माताजी पिताजी के प्रति इतना प्रेम ना हो किंतु दादा दादी नाना नानी के प्रति इतना और ज्यादा आकर्षण होता है तो यह कैसे होता है तो क्योंकि संसार की ओर से मन धीरे-धीरे सेपरेट होकर के यह दूसरे राज्य में जाना शुरू हो जाता है तो ये एक नेचुरल प्रोसेस है ये