मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
माँ सारदा का सरला बालिका भाव : रोटी बेलते बेलते नाराज हो जाती है
अब जैसे कल भी हमने जिस तरह से डिस्कस किया था मां के जीवन में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आन उपस्थित हुआ है। ठाकुर की महासमाधि यह एक ऐसी घटना है कि मां का जीवन हम ईजीली दो भाग में बांट सकते हैं। ठाकुर के साथ में बिताए हुए दिन दक्षिणेश्वर में, कामार पुकुर में, जय रामबाटी में और आखिर में श्याम पुकुर और काशीपुर में। तो वह एक पीरियड है और फिर दूसरा पीरियड है कि मां ठाकुर की महासमाधि के बाद में का ये जो तीर्थ यात्रा के लिए जाती है कामारपुकुर रहने को जाती है और फिर बाद में वहां से जय राम भाटी और फिर जय राम भाटी से यह भक्तगण जो है मां को बीच-बीच में कोलकाता आह्वान करते हैं आकर के भक्तों के साथ में रहने के लिए तो जब तक उद्बोधन का निर्माण नहीं हुआ था। मां जब भी आती थी तो पहले पहले तो यह बलराम भवन वगैरह में रुकती थी। किंतु फिर बाद में जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए रामकृष्ण संघ की विधिवत स्थापना हुई। इसके बाद में फिर मां जब भी आती है तो या फिर भाड़े के घर रहती है। जैसे कि यह नीलांबर मुखर्जी का गार्डन या तो फिर बाद में शरद महाराज ने मां के लिए उद्बोधन मायरवाड़ी का निर्माण किया। तो यह एक पूरी घटनावली हम देखते हैं कि ठाकुर की महासमाधि एक ट्रांसफॉर्मेटिव इवेंट है और फिर बाद में जैसे हमने देखा था कि किस तरह से जब तक ठाकुर थे तब तक तो क्या है मां को एक रिस्पांसिबल एडल्ट की भूमिका वहां पे वो करनी थी क्योंकि ठाकुर का जो बचपना था वह कभी-कभी हद से बढ़ जाता था तो मां को फिर धीरे-धीरे करके ठाकुर को समझा बुझा करके पटा करके फुसला करके ठाकुर को मैनेज करना था। ठाकुर की केयर करनी थी। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में देखते हैं मां का भी बचपना जो है बाली का भाव है धीरे-धीरे करके प्रकट होता है। एक घटना है राममई महाराज तो मां के सेवक थे और वहीं पे जयराम भाटी के पास में ही उनका ग्राम था। तो एक बार पता चला कि मां है यहां पे। एक बार दर्शन किया। फिर वो क्या करते थे कि उनकी स्कूल में छुट्टी सैटरडे को यदि जल्दी से छुट्टी होती है हाफ डे होता था तो सैटरडे को ही जब घर से निकलेंगे स्कूल जाने के लिए तो वह जो स्कूल बैग है उसमें थोड़े से कपड़े रख देंगे और फिर जैसे ही स्कूल में छुट्टी हुई सीधा दौड़ के जय राम बाटी आ जाएंगे तो फिर सैटरडे संडे दो दिन मां के साथ में रह के जय राम बाटी में मां की सेवा करेंगे और मां की प्रदर्शित विधि के अनुसार जब ध्यान साधन भजन करेंगे और फिर जब मंडे मॉर्निंग को स्कूल चालू होगी तो फिर जय राम बाटी से ही सीधे स्कूल चले जाएंगे और फिर सप्ताह के दौरान तो उनको घर में ही रहना है यानी कि वीकेंड रहना है मां के साथ में जय राम बाटी में और फिर बाकी का सप्ताह रहना है घर में तो इस तरह से वह रहते थे और फिर मां का भी राम रामई महाराज के प्रति स्नेह इतना हो गया था कि यदि राममई महाराज किसी वीकेंड को ना आ पाए सैटरडे को संडे को तो फिर मां फिर बोलती थी सबके सामने कि अरे मेरा बेटा अभी क्यों नहीं आया इस बार लगता है कि उसको परीक्षा की तैयारी करनी होगी लगता है कि वह अपने काम में इतना बिजी हो गया है कि वह बेचारी अपनी मां को भी भूल गया है। ऐसा करके मां अफसोस जताती थी कि राममई क्यों नहीं आ रहा। तो यही राममई महाराज एक दिन उन्होंने देखा जयराम बाटी में कि एक लेडी डिवोटी आई है तो वो रोटी बना रही है। अभी तो क्या है कि कोई भी लेडी डिवोटी मां के घर आती है तो वह तो कहीं कोई गेस्ट होकर के तो नहीं आती। पुत्री जैसे कि मां के घर आई है, अपने मायके आई है, उसी तरह से वह सभी लेडीज जो डिवोटी थी, वह इस तरह से व्यवहार करती थी। मां का स्नेह प्राप्त होता है। ऐसा ही लगता है जैसे अपने मां की घर आई है ससुराल से। तो यह लेडी डिवोटी भी मां के सामने वह रोटी बनाना है। जो कोई भी छोटा-मोटा काम है घर का वह भी करती थी। मां से दीक्षा भी प्राप्त हुई थी और वहां पर जो कुछ भी साधन भजन करना है सब कुछ करना है। अ किसी का दूसरे टाइप का मत होता था। एक लेडी डिवोटी वहां पर आई है तो वहां पर बैठकर के जप कर रही है। तो यहां पे मां झाड़ू लगा रही है। तो मां ने देखा कि वह हेल्प करने की बजाय आंख बंद करके जप कर रही है। तो मां ने कहा अरे बहु मां तुम जिसका ध्यान कर रही हो वह यहां पर झाड़ू लगा रही है। वो रोटी बना रही है। तो वो बेचारी लेडी डिवोटी शर्मिंदा हो गई और फिर इमीडिएटली खड़ी होकर मां को हेल्प कर रही है। किंतु इस तरह के लोग बहुत कम थे। ज्यादातर जो कोई भी जय राम बाटी में आता मां को सहाय करता। तो यह लेडी डिवोटी भी तो मां ने कहा होगा एक दिन रोटी बनाने को। तो यह रोटी बना रही है। तो अभी देखा रामई महाराज ने आश्चर्यचकित होके कि वह तीन-तीन रोटी एक के ऊपर में एक रखकर के बनाती थी। वो जो आटा होता है ना आटे का यह जो पहले तो आटा का टुकड़ा कर देना होता है। वो बॉल बना देने होते हैं। फिर उसको उसके ऊपर में रख के आपको उसको रोटी को बनाना है। पहले तो यह करना पड़ेगा। उसको सब राउंड शेप देना पड़ेगा। तो यह राउंड शेप किस तरह से साथ में तीन-तीन रोटी को देती थी। पहले एक जो आटे का बॉल है उसको रखा। फिर उसके ऊपर में पाउडर आटे का पाउडर रखा और फिर उसके ऊपर में दूसरा बॉल रखा फिर उसके ऊपर में फिर से आटे का पाउडर रखा फिर उसके ऊपर में तीसरा बॉल रखा फिर ये तीनों को एक साथ में वो राउंड रोटी बनाती है और और क्या है ज्यादा लोग खाने को होते हैं तो आप एक-एक रोटी इस तरह से बनाते जाएंगे सेक और फिर सेकने सेकना तो फिर एक-एक ही है आपको उसमें तो कुछ आप कुछ कर नहीं सकते किंतु एटलीस्ट बनाना जब है तो आप तीन एक साथ बना सकते हैं। तो राममई महाराज ने देखा तो बड़े इंप्रेस हो गए। तो उन्होंने इस डिवोटी को कहा कि आप भी मुझे बता दीजिए सिखा दीजिए। एक साथ में तीन-तीन रोटी बेल रही है। तो मैं भी यहां पे बहुत बार डिवोटी की संख्या बढ़ जाने से हमको बहुत मेहनत करना पड़ा। टाइम कम है। रोटी ज्यादा बनानी है। तो अल्प टाइम में ज्यादा रोटी कैसे बने? इस एक साथ में तीन-तीन मुझे सिखा दीजिए। तो यह लेडी डिवोटी ने रामई महाराज को सिखा दिया। अभी हुआ ऐसा एक दिन की बात है। अभी वह तो चली गई। फिर एक दिन की बात है। इसी तरह से डिवोटी की संख्या ज्यादा हो गई थी जय राम भाटी में और ठीक हुआ कि मां और राममई महाराज दोनों ही रोटी को बनाएंगे बेलेंगे और जो नलिनी है मां के भाई की बच्ची लड़की तो वो नलिनी है रोटी को सेकेगी। तो ऐसा हुआ। ठीक। यहां पर राम महाराज बैठे हैं। वो बड़ा सा उनके पास में वह रखने के लिए है। आटा रखने के लिए उसके ऊपर में यह तीन-तीन रोटी एक साथ में बेल रहे हैं। और मां भी है। अभी मां को तो आती है एक ही रोटी बेलना। तो मां तो एक-एक रोटी बेल रही है और यह दोनों अपनी-अपनी रोटी जो है एक थाले में रखकर के नलिनी के सामने रख रहे हैं और नलिनी उसमें से एक-एक रोटी सेक रही है। अभी थोड़ी देर हुई नलिनी ने कहा कि मां तुम्हारे से तो राममाई की रोटी अच्छी होती है। तो माने वह अच्छे से बेलता है। इस तरह से बेलता है कि उसकी रेट उसकी रोटी मैं सेकती हूं तो पूरी गोल हो जाती है। वो फुलका जिसको गुजराती में कहते हैं। यानी रोटी को आप अच्छे से बनाएंगे बेलेंगे और फिर उसको तवे पर रखेंगे तो क्या होगा? ऐसा फूल करके एक बॉल की तरह हो जाएगा। पूरा राउंड शेप हो जाएगा। तो नलिनी ने बातबात में ऐसा कह दिया कि मां तुमसे तो यह राममय अच्छी रोटी बेल रहा है। उसकी रोटी जैसे तवे पर रखती हूं साथ में ही वह फुलका की तरह फूल जाती है। तो मां ने जैसे ही यह सुना तो बिल्कुल एक बालिका की तरह बिल्कुल एक बच्चे की तरह नाराज हो गई। नाराज होकर के कहती है कि मैं रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई। और यह राममय तो अभी बच्चा है। उसका गला दबाएंगे तो दूध बाहर निकलेगा। यह बेंगली कहावत है। यानी छोटा बच्चा तो दूध पीता है। तो यहां तक उसके दूध होता है। तो गला थोड़ा दबाएंगे तो दूध बाहर निकलेगा। तो मां कहती है ये तो छोटा बच्चा है। अभी तो यह माने वो मेरे से अच्छा रोटी कैसे बना सकता है? वो मां भी तो ठीक ही बोलती है। वो इतना जन्म पूरा गया तपस्या करके रोटी बना के ठाकुर को खिला के भक्तों को खिला के और दो दिन का बच्चा मां से अच्छी रोटी बेल दे। यह कैसे मां से सहन होगा? तो मां ने बिल्कुल नाराज होकर के वो जो रोटी बनाने का सर अंजाम था उसको सरका दिया साइड पे और नाराज होकर मुंह फुला के बैठ गई। बोली अभी मैं रोटी नहीं बनाऊंगी। जाओ तुम दोनों लोग बनाओ। तुमको बनानी है तो। तो म [हंसी] राममई महाराज कहते हैं कि मैं तो किंग कर्तव्य विमूढ़ हो गया। मां का यह बाली का स्वरूप इस तरह से नाराज हो जाना रोटी नहीं और फिर क्या है कि इतने सारे डिवोटी इकट्ठा हो गए थे कि यदि आप रोटी नहीं बनाएंगे तो फिर उनको खाने में दिक्कत होगी। समय पर यदि नहीं परोसेंगे तो तो फिर राम महाराज ने नलिनी को डांट के कहा कि अरे हम दोनों लोग तुमको एक साथ में रोटी बेल करके दे रहे हैं। तुमको कैसे पता चला कि कौन सी मां की है कौन सी मेरी है? थाले में यह जो दो तरह की रोटियां पड़ी है। तुमको कैसे पता चला? यह झूठ-मुठ की ये सब फालतू की बातें करती हो। चलो मां से क्षमा मांगो। फिर वो नलिनी और रामई महाराज ने दोनों ने कहा मां आपकी रोटी भी अच्छी हो रही है और यह उसको पता नहीं ये कुछ बेतुकी सब बातें करती है तो फिर मां को ऐसा बोल के ठंडा किया तो फिर मां फिर थोड़ी सी वो जैसे बालिका होती है ना उसको आप मनाने को जाएंगे पहले तो वो मुंह छुड़ा लेगी मुंह घुमा लेगी किंतु मन के भीतर में है कि नहीं अभी तो स्वीकार कर लेना है कि वो लोग जो कहते हैं तो थोड़ी देर के बाद में स्वीकार करके फिर से वह मां रोटी बनाने को बैठ बैठ गए। तो देखिए यह जो बालिका भाव और मातृ भाव यह दोनों का एक सुमधुर संगम मां के जीवन में अभी प्रारंभ हो रहा है। और यह जो कहानी है अभी हमारी कहां तक पहुंची है गंभीरानंद जी की मां की जीवनी उसमें चिर सीमंतनी अध्याय का अंतिम पर्व प्रारंभ हो चुका है। कल हमने जिस तरह से देखा योगिन महाराज को दीक्षा देकर के फिर गंभीरानंद जी ने वृंदावन की कहानी समाप्त की है। इसके बाद में महाराज क्या कहते हैं कि मां
विश्वास और विज्ञान : क्या अपनाएं : कुछ कहानियां
अभी गई है हरिद्वार और फिर वहां से जयपुर और फिर वहां से प्रयागराज। तो बस छोटे-छोटे तीनचार पैराग्राफ में यह तीन-तीन क्षेत्रों की जो तीर्थ क्षेत्रों की कहानी है वह यहां पे हो जाती है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज? शेषाश श्री मां एक बार हरिद्वार घुरिया आशिया छिलेन आखिर आखिर में एक बार श्री मां हरिद्वार भ्रमण करके आई थी। शंगे छिले जोगिन महाराज जोगिन मां गोलाप मा और लखी दीदी साथ में थे योगिन महाराज योगिन मा गुलाब मा और लक्ष्मी दीदी हरिद्वार पथे रेलगाड़ी ते जोगिन महाराज भीषण ज्वर होए हरिद्वार में हरिद्वार के रास्ते में रेलगाड़ी में योगिन महाराज को भयानक ज्वर हुआ बुखार हुआ भीषण बुखार हुआ योगिन मा ताहा के जोखन बेदाना खावते छिले तोखन श्री मा देखी ते पान जेनु श्री ठाकुर के ही खावानो होते छ योगिन मा जब ये बेदाना अर्थात कि वो जो मैं भूल गया उसका क्या कहते हैं जो जो भी है वो छोटे-छोटे रेड कलर के वो जो आते हैं ना सो जो बेदाना जब उनको खिला रही थी योगिन मां योगिन महाराज को तब श्री मां ने देखा कि जैसे कि श्री ठाकुर को ही खिलाना हो रहा है अनार अच्छा ठीक है तो मां ने देखा कि उस समय जैसे कि ठाकुर को ही खिलाया जा रहा है ज्वरे अज्ञान अवस्थाए जोगिन महाराज देखिया छिले एक भीषण मूर्ति सम्मुखे आशिया बोलते छे वे वही बुखार की अज्ञान अवस्था में ही यह योगिन महाराज ने देखा कि एक भीषण मूर्ति एक भयावह एक व्यक्ति उनके सामने आकर के कह रहा है तो के देखे नहीं तुमको मैं देख लेता ये हिंदी पिक्चर में जिस तरह से धमकी देते हैं ना तुमको देख लूंगा अर्थात कि मारपीट करना या तो मर्डर करना मैं तुमको देख लेता किंतु की कोरीबो की कोरबो किंतु क्या करूं परमहंस देव आदेश आमा के एक ही चले जेते होवे परमहंस देव का आदेश है मुझे अभी यहां से चले जाना पड़ेगा जा बार समय मूर्ति रक्त वस्त्र परिहिता एक देवी के दिखाइया तहां के किु रसगुल्ला खाव बार निर्देश दिल जाने के समय इस भीषण भयानक व्यक्ति या राक्षस या दानव जो जो भी हो उसने एक देवी को दिखा के उनको कुछ रसगुल्ला खिलाने का निर्देश दिया। ओई दर्शनेर पर ज्वर शारिया जाए। इसी दर्शन के बाद में ही ज्वर यानी कि बुखार ठीक हो गया। देखिए यह जो बीमारी जो है एक इस तरह की एक कहेंगे कि एक एंथ्रोपोमॉर्फिक स्वरूप धारण करके आना। एंथ्रोपोमॉर्फिक अर्थात कि ह्यूमन लाइक एक इंसान की तरह का तो यह एक इंसान की तरह का एक शरीर माने इंसान के राक्षस अल्टीमेटली देखिए हमारे ही जैसे होते हैं। दो हाथ दो पैर वगैरह एक सर यहां पे हार्ट है। यहां पे पेट है। तो एक एंथ्रोपोमॉर्फिक स्वरूप ही यह सब अल्टीमेटली धारण करते हैं। ठाकुर की साधना की समय में पंचवटी के नीचे बैठकर के साधना कर रहे थे। एक दिन इसी तरह से ध्यान में मग्न थे। एकाएक देखा उनके देह में से एक भीषण काले कलर का पुरुष लाल लाल आंखें हैं। उसकी विकृत चेहरा है। उनके देह में से आकर के बाहर निकला और फिर चला गया कहीं पे। तो ठाकुर ने कहा था देखो यह मेरे देह में से यह पाप पुरुष जो है वो बाहर निकल गया है। हालांकि ठाकुर के देह में पाप पुरुष कैसे हो सकता है? किंतु फिर भी देखिए मनुष्य देह धारण किया है तो यह तमस, रजस और सत्व तीनों गुण तो हमारे भीतर में इवन अवतार के भीतर में भी रहेंगे। ठाकुर ने खुद ने कहा ना कि सोना यदि प्योर होता है तो उसमें से गहने बनेंगे ही नहीं। उसमें आपको थोड़ा सा अशुद्धि डालना पड़ेगा। तभी उसमें से आप गहने बना सकते हैं। तो वैसे ही यहां पे यदि पूर्ण सत्वगुण है तो फिर यह देह धारण करना असंभव हो जाएगा। इसलिए थोड़ा सा एटलीस्ट 1% तमस और रजस जो है वो उस रूपी अशुद्धि को रहना है। किंतु फिर साधना करके वह भी चला गया। फिर साधना में पूर्णता प्राप्त करते हैं तब की बात अलग है। किंतु साधना तक का जो सफर है उसमें तो थोड़ा बहुत शायद अशुद्धि चाहिए होगा। अब यह तो हम क्या है यह सब थ्यरी हमको अनुमान करके ही कहनी है। ठाकुर ने तो सिर्फ इतना कहा था कि वह पाप पुरुष जो है वह देह में से निकल गया। ये तो अपनी व्याख्या है बाकी सब कि जब तक पूर्णता प्राप्त नहीं होती है साधना करके तब तक हो सकता है कि01% इंप्योरिटी या तमस जो है रहना चाहिए तभी यह साधन कर पाएंगे। तो व्हाटएवर राजा महाराज की एक कहानी है। वहां पे बलराम भवन में थे। तो बलराम भवन के फर्स्ट फ्लोर पर रह रहे हैं। उस समय एक दिन उन्होंने देखा कि एक काले कलर की स्त्री उसका कलर जो है देह का वर्ण जो है भयानक काले कलर का है। चेहरा जो है विकृत है और बाल जो है केश जो है वो खुले बाल है। वह हंसती-हंसती वह सीढ़ी चढ़कर के ऊपर आई और फिर जहां पे यह अंदर महल है, जहां पे स्त्रियों के रहने की जगह है, उस साइड में चली गई। तो जैसे ही राजा महाराज ने यह देखा इमीडिएटली वह अपने सेवक को लेकर के बेलुरुर मठ चले गए। और फिर बाद में समाचार आया था कि यह बलराम भवन में ही यह टाइफोड ना ऐसा कोई रोग हो गया है स्त्रियों के भीतर में ही और उसमें से किसी का मृत्यु भी हो गया है। तो देखिए कि बीमारी जो है एक मनुष्य का यह दानव का या तो फिर देवी का इस तरह का स्वरूप धारण करती है। शरद महाराज की भी ऐसी कहानी है। एक दिन वहां पर बैठे हैं बेलूर मठ में और यदि आप बेलूर मठ गए होंगे तो वह कोर्ट यारार्ड है। कोर्ट यारार्ड में आप देखेंगे कि एक साइड तो है मठ ऑफिस और फर्स्ट फ्लोर पे है स्वामी जी का कमरा और उसके साइड में ही है अपना पुराना मंदिर ओल्ड शाइन जिसको कहते हैं। तो यह कोर्ट यारार्ड है। तो कोर्टयार्ड में उस समय एक बेंच था। वो स्वामी जी का जो आम का पेड़ है उसी के नीचे और उसके ऊपर में संध्या के बाद का समय है। मोस्ट प्रोबेबबली इवनिंग आरती समाप्त हो चुकी थी। तो यह कहीं-कहीं पे ये प्रकाश का जो मशाल वगैरह होती है ना वो कहीं-कहीं पर जल रही थी। तो अंधेरा मिश्रित उजाला ऐसा कुछ था। एकाएक शरद महाराज ने देखा कि वह मठ के गेट से ऐसी ही एक भयावह विकृत स्त्री वो निवस्त्रास्त्री पूरा देह का वर्ण भयानक काले कलर का है। वो हंसती हंसती यह उस समय आज जहां पर मठ ऑफिस वगैरह है उस समय था साधु निवास। सो उसकी ओर जा रही है। तो शरद महाराज ने खड़े होकर के ऐसा दो हाथ फैला के कहा कि मैं तुमको यहां पर नहीं जाने दूंगा। तो यह स्त्री हंसती हंसती फिर वहां से चली गई और फिर आज जो अभी यह वहां पर जो अन्न सत्र बना है और जहां पर ये ट्रेनिंग सेंटर है ब्रह्मचारियों का उस समय गंगा के किनारे ईंटा भट्ठा था और यह जो माइग्रेंट लेबर जो है वह गंगा के किनारे ईंटा भट्टा में काम करेंगे उनका एक वस्ती था वहां पे झोपड़पट्टी जैसा तो उस ओर चले गए और फिर दूसरे दिन सुबह को ऐसा ही खबर आया कि वहां पे ऐसा ही कोई चेपी रोग फैल गया है। वही टाइफाइड ना कि ऐसा ही कुछ और किसी किसी की मृत्यु हो गई है। तो देखिए कि यह सब कहानियां है। रामकृष्ण संघ में ही इस सब तरह की कहानियां कितना इसके ऊपर में विश्वास करना मेरा एक समय था कि बड़ा ही स्क्रिप्टिकल नेचर था। मैं तो ये सब चीजों में बिल्कुल विश्वास नहीं करता था। किंतु फिर जब अपने ही साहित्य में इस तरह की कहानियां पढ़ते हैं तो फिर क्या है कि डाउट तो होता है कि अपना स्केप्टिसिज्म यह अपना रैशनलिटी कहां तक सही और यह कहानियां कहां तक सही। देखिए इंटरेस्टिंगली स्वामी जी जैसे स्वामी जी बेलूर मठ का बेलूर मठ बन चुका है। स्वामी जी स्वयं वहां पर रह रहे हैं। एक साधु बीमार था। तो स्वामी जी ने एक दूसरे साधु को कहा कि एक काम करो ठाकुर का चरणामृत उस साधु को खिला के आओ। पिला के आओ। बेंगली में पढ़ा है तो यह सब इसलिए खिलाना। बेंगली में पीने को बोलते हैं खाना। अभी जल खा मैं पानी खा रहा हूं तो एनीवे तो चरणामृत तो लिक्विड है पीना होता है तो स्वामी जी ने कहा एक साधु को कि देखो वो बीमार साधु पड़ा है थोड़ा सा चरणामृत ठाकुर का ले जाकर के उसको पिला के ले आओ तो जिस साधु को स्वामी जी ने यह बात कही वो कटाक्ष में हंस दिया और यह नेचुरल भी है कि स्वामी जी जैसे स्वामी जी अल्ट्रा रेशनालिस्ट अल्ट्राॉजिकल अद्वैतवादी यह सब पुरानी सुपरस्टिशन में क्यों विश्वास करेंगे और फिर क्या है उस समय तो पूरा यह जवाहर आया था ना भारत में स्वतंत्रता चाहिए और यह हजारों साल की ये जो सुपरस्टिशन है उसी ने हमको पीछे करके रखा है तो यह सुपरस्टिशन से मुक्त हो और ये भारत को आजादी प्राप्त कराओ और धर्म धर्म जिस तरह से उस समय का चल रहा था कि हिंदू हिंदू धर्म अर्थात नाती जाति सुपरस्टिशन यह वो तो उससे मुक्त होने के लिए तो लोग रामकृष्ण मिशन के साथ में संलग्न होते थे कि हां चलो हमको धर्म भी करना है और भारत को एक महासत्ता एक फ्रीडम भी दिलवाना है। तो यह दोनों आपकी ये जो मनोवांछा है एक आपका रैशनलिस्टिक आउटलुक है। वेस्टर्न एजुकेटेड है। सुपरस्टिशन से मुक्त होना है। भारत का पुनरुत्थान करना है। ब्रिटेन, जर्मनी जैसे उस समय की जो महासत्ताएं थी उनके समकक्ष भारत को ले जाना है। वह सब मनोवांछाएं ये जो नवयुवक थे बंगाल के और भारत के वो सब मनोवांछाएं रामकृष्ण मिशन एक ऐसा इंस्टट्यूट है कि सब तरह की ये जो मॉडर्न एस्पिरेशन है होप्स है ये यंग जनरेशन की वो वहां पर फुलफिल होती थी। और उनके ये जो गुरु कहे ना आचार्य कहे ना युगनायक कहे वही स्वामी जी ऐसा आदेश देते हैं कि बीमार साधु को चरणामृत पिलाओ यह क्या नौटंकी कर रहे हैं दवाई खिलाओ उसको उसके लिए प्रॉपर ट्रीटमेंट करो न्यूट्रिशियस फूड उसको डाइट उसको प्रोवाइड करो एक हेल्दी एक माने यह जो आजकल जिसको हम हेल्थ और सैनिटेशन हाइजीन और सैनिटेशन कहते हैं उस समय इस तरह का सेंस ना बहुत कम लोगों को था। वह जो ठाकुर कहते हैं ना कि हलदार पुकुर जहां पे कि लोग स्नान करते हैं उसी के किनारे लोग जाकर के शौच करेंगे। उनको यह अकल नहीं है कि भाई जहां पर यह स्नान करना है या फिर यह सब जो कार्य करने हैं वहां पर शौच करने से फिर होगा क्या कि ये बीमारी फैलती है। तो अब जैसे वो पानी है गांव का ये तालाब का पानी है तो तालाब के पानी के ऊपर में पूरा यह लील जैसा यह फैल जाता है। फिर उसी को हटा करके थोड़ा सा यह लोग भीतर में से यह पानी लेंगे। अब पानी पिएंगे तो फिर मलेरिया तो फैलेगा ही फैलेगा। कितने लोग वहां पर मर जाते थे। इस तरह से अनहेल्दी वो एटमॉस्फियर में रह के। तो स्वामी जी जब अमेरिका से लेटर लिखते हैं मठ में बाय दैट टाइम मठ आलम बाजार में आ गया था तो स्वामी जी ने कहा कि सुना है कि तुम लोगों का अड्डा जो है बड़ा मलेरियस अड्डा है अर्थात कि वहां पे मलेरिया का प्रकोप बार-बार होता है। ऐसा सुना है। उसके बाद में यह जो आज को जिसको हम कॉमन सेंस हेल्थ एंड हाइजीन या सैनिटेशन के रूल्स कहते हैं। स्वामी जी एक लेटर में लिख के भेजते हैं कि फिल्टर करके पानी पीना है। ये जो बेडशीट है, कपड़े हैं, रिपीट फ्रीक्वेंटली उसको धोना है। एक साथ में सभी को एक कमरे में नहीं रहना। थोड़ा सा सोशल डिस्टेंसिंग चाहिए। मॉडर्न वर्ड है। किंतु स्वामी जी कांसेप्ट उसी टाइम दे देते हैं। तो क्या है कि ये हेल्थ, हाइजीन, सैनिटेशन ये कांसेप्ट स्वामी जी के बड़े क्लियर थे। फिर ऊपर से देखिए कि निवेदिता को स्वामी जी ने कहा था कि मठ के साधुओं के लिए मॉडर्न साइंस के ऊपर में क्लास लें। बायोलॉजी है या तो फिर यह फिजिक्स है या केमिस्ट्री है वगैरह बॉटेनी है इस तरह के मॉडर्न सब्जेक्ट के ऊपर में तो यह स्वामी जी आखिर में ऐसा कहते हैं एक साधु के लिए कि ठाकुर का चरणामृत इसको पिलाओ तो यह सामने वाला साधु थोड़ा कटाक्ष पूर्ण हास्य उसने कर दिया साथ-साथ में ही स्वामी जी कहते हैं कि तुमको चरणामृत पिलाने की जरूरत नहीं ठहरो मैं मैं ही जाकर के पिला देता हूं अर्थात कि यदि इस बात पर विश्वास स नहीं कि ठाकुर का चरण चरणामृत पीने से बीमारी ठीक होगी तो फिर आप इसको करिए ही मत यदि विश्वास है तो आप इस तरह से विश्वास रूपी औषध विश्वास रूपी मंत्र उसका आप अनुष्ठान कीजिए तो यहां पे अल्टीमेटली अपने विश्वास पे ही आ जाता है। इसको कितना स्वीकार करना नहीं करना। देखिए आजकल रामकृष्ण मिशन में कोई आपको ऐसा नहीं कहेगा कि आप बीमार है तो ठाकुर का चरणामृत पिए। सबसे पहले तो आपको डॉक्टर के पास ही ले जाएंगे। यदि एडमिट करना है डिस्पेंस हो हॉस्पिटल में तो वही करवाएंगे। चरणामृत पीजिए किंतु एज ए पैरेलल पैरेलल मेडिसिन या तो साथ-साथ में उसको पीना है नहीं कि उसको मेन ट्रीटमेंट के रूप में फिर अभी इंडिविजुअल साधु का अलग-अलग हो सकता है किंतु ऑफिशियल पॉलिसी तो अभी यही है कि सभी साधु की प्रॉपर ट्रीटमेंट करवानी है। तो देखिए यहां पे दो तरह से योगेंद्र महाराज की ट्रीटमेंट होती है। एक तो है कि ठाकुर ने आकर के धमक दी तो यह जो बीमारी रूपी यह जो राक्षस था वह वहां से भागा और फिर जाकर के यह जो देवी है जयपुर में फिर उनका दर्शन होगा योगेंद्र महाराज कहेंगे कि अच्छा इसी देवी है जिसको कि ऑफर करना है तो फिर उनको रसगुल्ला ऑफर किया गया है। तो इस तरह से योगेंद्र महाराज ठीक हुए हैं। हमने यह पहले भी एक बार डिस्कस किया था कि जितना देखिए लाइफ में हम सभी को सेफ्टी सिक्योरिटी हेल्थ एक तरह का सोशल सिक्योरिटी वगैरह चाहिए और जितना हमारा सिविलाइजेशन एडवांस होता है, सोफिस्टिकेटेड होता है उतना ही यह सेफ्टी एंड सिक्योरिटी लाइफ में आता जाता है। आप देखिए एवरेज लाइफ स्पान है। भारत जब इंडिपेंडेंट हुआ तो 33 साल ना कि इतना कुछ था। अभी हमारा एवरेज लाइफ स्पान भारतीयों का 70 प्लस ऑलमोस्ट हो चुका है। 75 के इतना कुछ हो चुका है। जो कि एडवांस कंट्रीज जो है उसी की कैटेगरी में हम मोर और लेस आ गए हैं। यानी कि यह जो प्राइमरी हेल्थ है, हाइजीन, सैनिटेशन, न्यूट्रिशियस फूड है, उसका काफी पेनिट्रेशन भारत में हुआ है। इवन जो इकोनॉमिकली डिसएडवांटेज क्लास है, उसमें भी काफी पेनिट्रेशन हो चुका है। यह वैक्सीन वगैरह लेना वगैरह का तो इस हद माने इस तरह से देखें तो हम कहेंगे कि हमारा डेवलपमेंट हुआ है पॉजिटिव डायरेक्शन में किंतु फिर क्या है पता है एक युग था कि औषधम जाहनवी तुल्यम जानवी तोयंम वैद्य नारायणो हरिह बीमार होते हैं तो औषध है जावी अर्थात गंगा का जल और वैद्य है नारायण हरि स्वयं यह उनके ऊपर पर भरोसा करके पड़े रहना। तब कहीं जाकर के यह शरणागति कैसे आती है? जब तक मुझे यह भरोसा है कि मैं भले चाहे मंदिर में जाकर के बैठता हूं। किंतु एट द एंड ऑफ द डे क्राइसिस आ गई तो मेरे पास में बैंक बैलेंस है। मेरे पास में यह सोशल सिक्योरिटी है। मेरे पास में यह गवर्नमेंट स्कीम से सब बेनिफिट मिलते हैं। एट द एंड ऑफ द डे। माने पुश कम टू शो। इंग्लिश में कहते हैं [हंसी] म क्राइसिस की घड़ी आ गई तो यह सब मेरे लिए बैकअप है। उस समय हम यह नहीं सोचते कि एट द एंड ऑफ द डे अल्टीमेट सीरियस क्राइसिस जब आती है मेरी नजर के सामने तो ईश्वर मेरे भरोसा है। इस तरह से हम नहीं सोचते। और इसीलिए देखिए कि मां को जब अह इस तरह से बीमारी हुई और मां ने सिंह वाहिनी देवी के सामने जाकर के हत्या दी तो सिंह वाहिनी ने आकर के मां को दर्शन दिया था। औषध भी दिया था, मेडिसिन भी दिया था। जबकि यही मां के एक चाचा है। उन्होंने जब सिंह वाहिनी के सामने हत्या दी तो सिंह वाहिनी देवी नाराज होकर के श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा की मां को जाकर कहती है कि मैं वहां पर विश्राम कर रही हूं। शयन कर रही हूं। और क्यों झूठमठ का वो आकर के मेरे सामने हत्या दे रहा है। ब्राह्मण का लड़का है। वह समझ में नहीं आता क्या कि देवी के शयन में इस तरह से डिस्टरबेंस नहीं खड़ा करना चाहिए। उसको बोलो भागे वहां से वरना फिर उसको मजा दिखाऊंगी कि मजा दिखाऊंगी वाला मेरा है किंतु इतना कह दिया कि उसको बोलो जाए वहां से तो ये श्यामा सुंदरी देवी कहती भी है कि देवी ने आकर के इतना सब यदि बोला देवी के पास में इतना टाइम है विश्राम से खड़े होकर के वहां पर जाकर के मंदिर में तो वह तो बेचारे चाचा थे वह तो मंदिर में पड़े थे वो श्यामा सुंदरी देवी तो अपने घर में थी तो घर जाकर के इतना सब कह के आए इतने से अल्प समय में तो जाकर उनको औषध दे देते मेडिसिन दे देते तो काम चल जाता किंतु देखिए ये भीतर का जो विश्वास नहीं होगा तो फिर देवी हमको दर्शन क्यों देगी ईश्वर हमको दर्शन क्यों देंगे यानी ये एक आज की मॉडर्न सिविलाइजेशन में यह सब कंट्राडिक्शन है। देखिए इवन साधु का जीवन है। आज हम अपना जीवन जिस सेफ्टी और सिक्योरिटी में रह रहे हैं हम रामकृष्ण मिशन के साधु हमको पक्का पता है कि बीमारी होने से ट्रीटमेंट होना ही है। खानेपीने का तो मिलना ही है। जो देह धारण करने के लिए जो मिनिमम चाहिए रोटी कपड़ा मकान वो तो हमारे पास में है ही है। माने उससे तो हम कभी वंचित नहीं होने वाले। तो फिर क्या है कि ईश्वर के ऊपर में जो हमारा भरोसा है वह एक हद तक जाकर के फिर एक तरह से धुआसा में परिवर्तित हो जाता है। एक तरह के आप कहेंगे कि डिफ्यूज हो जाता है। अब जो एक आखिरी घड़ी तक एक लास्ट माइल तक जो अपना भरोसा जाना चाहिए कि हम सभी चीजों के ऊपर में ईश्वर के ऊपर में विश्वास करके बैठे हैं। यहां तक कि यह प्रवृजिया क्या है? क्यों गुरु भाइयों ने मठ का जो थोड़ा मठ में भी तो खाने पीने का नहीं था किंतु एटलीस्ट सर के ऊपर में छत तो थी रोटी नहीं था किंतु कपड़ा और मकान तो था तो ये जो ये जो लास्ट जो उनका ये सध्यारा था उसको छोड़ छोड़कर के त्याग करके संपूर्ण अननोन में जंप क्यों लगाया रोटी तो नहीं ही मिलेगी अभी उसका कोई ठिकाना नहीं जो कपड़ा और मकान थे उसका भी अभी कोई ठिकाना नहीं रहा। यदि कोई सोने को दे कहीं पे छोटा सा जगह करके तो सोना है। वरना फिर आपको वहीं रास्ते के ऊपर में खुले आसमान के नीचे ठंड हो ना कि बारिश हो ना कि धूप हो पेड़ की छांव में या तो खुले रास्ते पर पड़े रहना है। तो यह जो संपूर्ण रूप से अपने को ईश्वर पर फेंक दिया। दैट प्रवरज्या जो है जिन्होंने जिन्होंने की है सबका हृदय जो है विश्वास और श्रद्धा से भरपूर हो गया था। प्रवरज्या के लिए नहीं गए थे एक शशि महाराज और शशि महाराज को ऐसी श्रद्धा की एक्स्ट्रा डोस की आवश्यकता नहीं थी। ऑलरेडी वह ठाकुर के ऊपर इतनी श्रद्धा थी कि एक जगह बैठकर के एक धारी उन्होंने तपस्या की है। कब तक? जब तक कि स्वामी जी ने स्वयं नहीं कहा कि तुमको मद्रास जाकर के वहां का चार्ज लेना होगा। तब तक यह जो 1886 से लेकर के यह ऑलमोस्ट 19 98 तक शशि महाराज एक जगह पर बैठकर के एक हरि ठाकुर की सेवा की है। उनको यह एक्स्ट्रा डोज़ की आवश्यकता नहीं थी कि श्रद्धा प्रवृति करेंगे तो भक्ति जागृत होगी। उनकी भक्ति ऑलरेडी इतनी जागृत थी कि ऐसी कोई जरूरत नहीं। बाकी सभी लोगों ने स्वामी जी का एक मिशन था। वर्ल्ड मिशन था के बाकी सभी ने यह प्रवरज्या करके सभी के भीतर में जो एक श्रद्धा का प्रदीप जो है इतना तेज रूप से जागृत हुआ है। तो आज का जो युग है मैं खुद कभी-कभी सोचता हूं कि हमारी ईश्वर के ऊपर में उस हद तक श्रद्धा नहीं बोलकर के बेसिक नेसेसिटी तो सब पूर्ण हो रही है। किंतु यह जो ईश्वर दर्शन वगैरह अभी हमारे सामने एक हास्यास्पद बात ही है। यदि कोई ऐसा क्लेम करता है हमारे में से कि मुझे दर्शन हुआ है या तो मुझे समाधि हुई है तो हम उसकी मजाक ही उड़ाएंगे। उसके ऊपर में कटाक्ष ही करेंगे। क्यों? क्योंकि हम सबको एक दूसरे का लाइफ दिखता है। काफी कंफर्टेबल है। आपको लगेगा कि बड़ी तपस्या है। अर्ली मॉर्निंग को उठकर के मंगल आरती में जाना है। रूल्स रेगुलेशन डिसिप्लिन फॉलो करना है। सभी चीजों में मॉडरेशन चाहिए। ड्यूटी है तो ड्यूटी करना है। ओबिडिएंट रहना है। सोशल लाइफ है। उसके अपने डायनेमिक्स है। तो बाहर से लगता है कि हां ऑस्टेरिटी है। किंतु हम लोगों को बखूबी पता है कि हमारी प्रीवियस जनरेशन ने जो किया उसके सामने तो हम इन 10% 1% भी नहीं कर रहे हैं। सो दैट इज देयर कि जितना अपना सिविलाइजेशन जितना ये सिक्योरिटी वगैरह बढ़ता जाता है उससे यह सब एक प्रॉब्लम खड़ा होता है। इसीलिए देखिए कोई-कोई साधु यह नर्मदा परिक्रमा वगैरह करते हैं। मैं सन्यास से पहले मेरा सन्यास 2015 में हुआ तो उससे पहले दो महीने जाकर के मैं वहां पर रहा था। अमर ये जो ये है क्या वो जगह भूल गया उसका नाम नर्मदा के वो सफेद कुटिया जो है हमारी अ जो भी है तो वहां पर मैं जाकर के रहा था फिर क्या ओमकारेश्वर यस यस तो ओमकारेश्वर जाकर के मैं रहा था दो महीना में रहा था फिर वहां से एक महीना तो मैं कुटिया में रहा सफेद कुटिया में और फिर मैंने सोचा एक महीना भ्रमण करते हैं तो फिर एक महीना वह मैंने स्टार्ट किया। एक महीने तक एग्जजेक्टली जो परिक्रमा के नियम होते हैं, उसी तरह से मां नर्मदा के किनारे-किनारे चलना है। जहां रात होने से जहां पर सोने की जगह मिले सो जाना है। भिक्षा मांग के खाना है। तो एक महीना मैंने किया था। और दैट वाज़ अ वंडरफुल एक्सपीरियंस। और फिर उस समय मेरे मन में आ गया था कि अभी तो सन्यास सामने है तो मैं एक काम करता हूं। अह एक्चुअली पता है मेरी ऐसी इच्छा हो गई थी एक महीना भ्रमण करके कि मैं अभी पूरा भ्रमण कर ही दूं सन्यास भले इस साल नहीं लेना है बाद में लेंगे डज नॉट मैटर कोई फर्क नहीं पड़ता एकद साल डिले होने से क्या फर्क पड़ता है तो उस समय ना मैं कुटिया में रह रहा था वहां पे एक साधु थे अभी इज़ अ वन ऑफ द स्ट्रेंजेस्ट एक्सपीरियंस एंड वन ऑफ द वंडरफुल एक्सपीरियंस ऑफ माय लाइफ इस साधु ने ऐसा ठीक किया था कि वह खड़े ही रहेंगे सोएंगे नहीं तो देखिए कि मैं एक सप्ताह वह जिस कमरे में थे छोटा सा कमरा है से फुट बाय 7 फुट इससे ज्यादा बड़ा नहीं होगा बाहर में एक छत जैसा था बस इतना ही यह था उनका पास में जो रहने का जगह मैं सात दिन उनके साथ में एक ही कमरे में रहा हूं मैंने देखा कि कंटीन्यूअस उनका जो व्रत है खड़े रहने का पूरा दिन खड़ा रहेंगे छत छत के ऊपर में से एक झूला टांग करके रखा था। विश्राम करना होता है। रात के समय में झूले पे ऐसा दो हाथ रख के वो अपना हाथ के ऊपर में थोड़ा सा अपना सर जो है उसको रेस्ट देंगे। खड़े-खड़े बैठेंगे बिल्कुल नहीं। सो इट्स अ वेरी वंडरफुल एक्सपीरियंस। और साधु के भीतर में ना तपस्या का तेज हमको तो कोई मूर्ख नहीं बना सकता। रामकृष्ण मिशन के साधुओं को। हमने साधु देखे हैं। अच्छे से अच्छे साधु देखे हैं। बुरे से बुरे भी कैसे होते हैं पता है। पर ठाकुर मास्वामी जी को पढ़ा है। हमको कोई मूर्ख नहीं बना सकता। किंतु उन साधु में मैंने देखा सही में तपस्या का तेज है और उनकी कहानी भी बायोग्राफी भी वह बता रहे थे। बहुत छोटी उम्र में छोटे गांव में जन्म हुआ था। पढ़ाई लिखाई ऐसा कुछ खास किया नहीं। छोटी उम्र में ही 8 10 साल की उम्र में ही यह वैराग्य का दौरा पड़ा। ईश्वर दर्शन करने हैं। ऐसा एक आया भीतर में से घर छोड़कर के भाग खड़े हुए और जितने तीर्थ क्षेत्र है, जितने साधु महात्मा है सबके पास में जाकर के तीर्थ क्षेत्र निवास करते थे। साधु संतों के पास से सीखते थे। साधना कैसे करनी है, शास्त्र क्या है, पुराण क्या है? वगैरह। उनका एग्जजेक्टली कौन सा ट्रेडिशन है? वह मैं बता नहीं पाऊंगा क्योंकि उन्होंने कोई सिस्टमेटिक वेदांत ट्रेडिशन या वैष्णव ट्रेडिशन या शक्ति साधना ऐसा कुछ नहीं। सबके पास में से थोड़ा-थोड़ा सीखा है और सबकी बातें करते हैं। वैष्णव जो परंपरा है उसमें से इतनी सुंदर कहानियां निकाल के कहेंगे। वेदांत की बातें करेंगे तो ऐसा लगेगा जैसे ठाकुर के कथामृत में से ही सब डायरेक्ट कोट कर रहे हैं। किंतु मैं श्योर कह सकता हूं कि उनको पढ़ाई लिखाई नहीं आती। तो वंडरफुल माने जितना अनुभूति है उतना ही ये बातें करने का स्टाइल भी उनका बड़ा अच्छा था। आई डू नॉट नो कि अभी वो फेमस हुए हैं कि नहीं। खड़े वसारी बाबा उनका नाम था। तो एनीवे उनका हरिद्वार में एक आश्रम उन्होंने किया था और ठंडी के दिनों में वो ओमकारेश्वर आ जाते थे। तो उस समय मेरा उनसे मुलाकात हुआ था। तो उन्होंने मुझे कहा मैंने उनको कहा मैंने अपना पूरा केस उनके सामने रखा। मैं काफी इंप्रेस हो गया था। मैंने कहा कि देखिए मेरी इच्छा है कि परिक्रमा करने की किंतु और मैंने उनको समझाना पड़ा रामकृष्ण मिशन क्या है? उनको नहीं पता था। मैंने कहा कि हमारा ऐसा नियम है कि एक सिस्टमेटिकली सबको एक फिक्स टाइम पर सन्यास वगैरह देते हैं। किंतु मेरी इच्छा नहीं इस बार सन्यास के लिए जाने की। मैं चाहता हूं कि अभी एक महीना किया ही है तो अभी पूरा कर ही दूं। तो उन्होंने मुझे समझाया कि नहीं नहीं ऐसा मत करो सन्यास का प्रोटेक्शन लेकर के तुम परिक्रमा करो क्योंकि क्या है यहां पर खतरे भी तो ऐसे हैं खुले में आप घूम रहे हैं आप आश्रम में रहेंगे तो आपके सामने एक प्रोटेक्शन है आप एकदम निश्चिंत होकर के भ्रमण करते हैं तो ईश्वर पर भरोसा जितना भी आएगा ना टेंप्टेशन भी इतने आते हैं तो बेटर है कि ये सन्यास का प्रोटेक्शन धारण करके तुम परिक्रमा करो विच विल बी बेटर फॉर यू तो मुझे उनकी बात बहुत अच्छी लगी। तो उनकी बात सुनकर के फिर मैं आया वापस राजकोट और वहां से गया बेलूर मठ। तो बेलूर मठ में जैसे ही मैं प्रवेश किया तो वहां पर वो आत्मूपानंद जी मिल गए। मुझे पहले से ही पहचानते थे। तो उन्होंने कहा कि मुझे यह कंप्लीट वर्ष के लिए असिस्टेंट चाहिए। तुम यदि हां कहते हो तो मैं तुम्हारा नाम सजेस्ट करूं। तो फिर मैंने कहा नेकी और पुछप पुछ नर्मदा परिक्रमा तो फिर भी कभी होती रहेगी। इतने सारे लोगों ने परिक्रमा की है। कितने लोगों ने स्वामी जी का कंप्लीट वर्क एडिट किया है। सो दैट वो मैंने हां बोल दिया तो फिर वो फिर हो भी गया ठाकुर की कृपा से स्वामी जी की कृपा से किंतु ये परिक्रमा वाला कांसेप्ट फिर रह ही गया फिर जैसे इसमें प्रवेश करने के बाद में सो एनीवे ये जो किंतु ये जो एक महीना मैंने किया था भ्रमण और फिर इस तरह के महात्मा से मेरी मुलाकात हुई मुझे सही में ना इस तरह की ये जो मुक्त जीवन च्या है कि किसी रूटीन में नहीं बंधना है किसी ऑर्गेनाइजेशन के डिसिप्लिन स्ट्रक्चर में नहीं रहना जो मन में आए करना है माने जिस तरह से मन में आए उस तरह से साधना करना है यह तो कोई स्वच्छंदी या स्वेच्छाचारी जीवन नहीं है भिक्षा मांग के आप खाते हैं और फिर जहां पे भी समय मिला नर्मदा के किनारे तो सुंदर की जगह है वह प्राकृतिक रमणीयता है वहां पे तो वहां पर बैठकर के आपको जब ध्यान प्रारंभ कर देना है और फिर वो जगह ही ऐसी पवित्र है आप चल भी रहे हैं तो भी आपके मन में सतत जप चलता रहेगा। कभी-कभी मैं आश्चर्यचकित हो जाता था। मैं थोड़ा सा भी इंट्रोस्पेक्शन करता मुझे देखता स्पष्ट दिखता कि भीतर में जप चल रहा है। हालांकि मैंने ऐसा कोई कॉन्शियस प्रयास नहीं किया। मैं राजकोट में था या उससे पहले बेलूर मठ में था तो मुझे ऐसा सोचता था कि ये अजपा जप भीतर में चलना चाहिए। कंटीन्यूसली एफर्टलेस जब भीतर में सांस की तरह सांस के साथ में ही जप चलना चाहिए। किंतु यह जो एफर्ट था इतना वो खा जाता था मेरी शक्ति को कि फिर मैंने छोड़ दिया। मैं सोचा कि ऐसा करने को जाऊंगा कहीं माथा खराब ना हो जाए। तो फिर मैंने यह सब एफर्ट छोड़ दिए थे कि हां सांस के साथ में जप चलना चाहिए। अजपा जप चलना चाहिए। ये एफर्टलेसली मन के भीतर में एक बैकग्राउंड पे ईश्वर का नाम गुण कीर्तन चलना चाहिए। वो सब एफर्ट मैंने बंद कर दिए थे। मुझे लगा कि करने को जाऊंगा तो भयानक एक परिणाम आएगा। किंतु नर्मदा किनारे मुझे कोई एफर्ट लगाना नहीं है। जैसे शास्त्र में कहा है कि सहज रूप से सांसों के साथ में ईश्वर का नाम चलता है। एग्जजेक्टली ऐसा होता था। कभी-कभी मैं सूर्योदय सूर्यास्त खुला मैदान है। मैं अकेला खड़ा हूं। नर्मदा मैया के किनारे जो प्राकृतिक रमणीयता है अद्भुत उसका मैं दर्शन कर रहा हूं और एक सेकंड के लिए मैंने अपने मन को भीतर में रीडायरेक्ट किया। तभी मुझे पता चला भीतर में जप चल रहा है। अरे मैंने कहा कि यह कैसे हो गया। माने इतने साल में जिसके लिए प्रयास करता था। प्रयास करके हार करके थक करके मैंने छोड़ दिया और अभी यह ऑटोमेटिक होता है। सो किंतु यह नर्मदा मैया का प्रभाव है। भारतीय तीर्थक्षेत्र जो भी है उसका यह सब प्रभाव है। तो यह जो ईश्वर के ऊपर में निर्भरता तीर्थक्षेत्र जाएंगे तो वहां का तो एक आध्यात्मिक प्रभाव है ही है। किंतु ईश्वर के ऊपर में ये जो निर्भरता है दैट इज वंडरफुल कि यह दोनों मिलती है तब अपना मन कैसा फट फट फट करके ऊपर में उठता है। और अभी यहां पे क्या आश्रम में बैठे हैं सब तरह की सिक्योरिटी है। सेफ्टी है। एक स्ट्रक्चरर्ड लाइफ है। खाने के समय घंटा पड़ता है। आप खाने को जाते हैं। एवरीथिंग इज प्रीडटरमाइंड। कुछ भी अनएक्सेक्टेड सरप्राइजिंग नहीं है आजकल। तो इस तरह की एनवायरमेंट में रहकर के किंतु ऐसा हो सके कि भीतर में ऑटोमेटिक नाम जब चले ऐसा तो मुझे अनुभव नहीं हुआ अभी तक। सो दीज़ आर ऑल ट्रेड ऑफ आप कुछ लेते हैं तो कुछ गवाते हैं। अच्छा इसके बाद की कहानी अभी हम कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
एक भक्त: हमने भी नर्मदा परिक्रमा की थी. हमें बहोत ही अच्छा अनुभव हुआ
ये हिमालय है, नर्मदा है। यह अपने साउथ इंडिया के तीर्थ क्षेत्र है। कन्याकुमारी, मीनाक्षी, मदुराई ये सब भारत की बात ही अलग है। स्वामी जी ने कहा ना पुण्य भूमि यह ऐसा क्यों कहा? यह तीर्थ क्षेत्र भारत की शोभा है। किसी ने कहा था किसने मैं स्वामी जी ने कहा ना कि किसने भारत का राजधानी होना चाहिए वाराणसी नहीं कि दिल्ली।
एक भक्त: हमारे व्यक्तिगत जीवन में हमें कई बार ईश्वर की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। जैसे कोई गंभीर बीमारी ठीक हो जाए तो हमें लगता है कि यह ईश्वर की कृपा से हुआ। लेकिन यदि पूरे देश की औसत आयु, शिशु मृत्यु दर या जनस्वास्थ्य जैसे आँकड़ों को बेहतर बनाना हो, तो उसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, टीकाकरण, मिड-डे मील जैसी वैज्ञानिक और प्रभावी सार्वजनिक नीतियाँ आवश्यक होती हैं। तो क्या एक भक्त की व्यक्तिगत आस्था और राष्ट्र-स्तर पर वैज्ञानिक नीतियों के बीच कोई विरोधाभास है?
देखिए फिजिक्स में भी ऐसा है कि इंडिविजुअल पार्टिकल का मोशन और उसका पोजीशन वगैरह डिटरमाइन करना मुश्किल है। किंतु यदि मल्टीपल एक मास हो जाता है पार्टिकल्स का तो फिर उसको प्रेडिक्ट करना उसका बिहेवियर प्रेडिक्ट करना आसान है। सो इंडिविजुअल एंड मास यह जो है डिफरेंस इन प्रेडिक्शन वो फिजिक्स में तो बड़ा स्पष्ट है। और यहां पे भी देखिए कि अपना तो फ्रेमवर्क यही है कि इवन विद इन अ सिंगल पर्सन देयर आर थ्री एस्पेक्ट। ये थ्री एस्पेक्ट नहीं होते तो ये उसको मल्टीप्लाई नहीं होता। विद इन अ सिंगल पर्सन थ्री एस्पेक्ट्स आर देयर कि स्पिरिचुअल एस्पेक्ट इज़ देयर, कम्युनिटी एस्पेक्ट इज़ देयर ना सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट इज़ देयर। ये जो होलिस्टिक डेवलपमेंट कहते हैं, हम तीनों एस्पेक्ट को डेवलप करेंगे तो हमारा होलिस्टिक डेवलपमेंट होगा। एंड साथ में वह सोसाइटी का भी डेवलपमेंट होगा। सो दैट इज दैट वे पुरुषार्थ और परमार्थ राइट गीता में भी इस तरह से है कि आप पुरुषार्थ भी करें परमार्थ भी कीजिए। सो दैट श्री ठाकुर ने कहा ना कि ईश्वर की कृपा का पवन तो बह ही रहा है। आपको वो सड़ खोल देना है। वो जो सेल है उसको ओपन करना है। सो उतना तो मेहनत करना पड़ेगा एटलीस्ट।
एक भक्त: एक ओर स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी कल्याणानन्द जी को कनखल में अस्पताल चलाने का आदेश दिया, और दूसरी ओर यहाँ वे स्वयं एक बीमार साधु को चरणामृत पिला रहे हैं। यह कितना अद्भुत दिव्य विरोधाभास है!
स्वामी जी की गंगा भक्ति पर हमने क्लास किया था ना [हंसी] वो साथ में गंगा का जल वहां पर अमेरिका साथ में ले गए थे और कहते हैं कि यह जो म वहां की ये जो एक्सट्रीमली डायनेमिक ये केओटिक जो जगह है वहां पर गंगा का एक जल पान करता तो फिर से वह हिमालय में हर हर करके वो जो गंगा बहती है वो नाद सुनाई देता। [हंसी] किंतु स्वामी जी ये सब छुपा के रखते हैं। [हंसी] ईजीली बाहर नहीं आने देते। हालांकि वो मां के पास गए थे रोटी कपड़ा मकान मांगने के लिए। [हंसी] तो फल उल्टा आ गया। एक्चुअली स्वामी जी की इच्छा थी कि वे लोग मरानगर छोड़ के ना जाए। किंतु फिर तो बलराम बाबू का देहांत हुआ, सुरेंद्र बाबू का देहांत हुआ, मठ की आर्थिक परिस्थिति इतनी खराब हो गई कि स्वामी जी ने प्रमदादास मित्र को लेटर लिखा कि हमारी इच्छा है कि यहां पर गंगा के किनारे ठाकुर का एक मेमोरियल बने। आप जितनी अर्थ सहाय कर सकते हैं, कीजिए। किंतु परमदास ने उस पूरे आईडिया पे पानी-ठंडा पानी डाल दिया। तो फिर स्वामी जी ने कहा कि अच्छा ठीक है हम लोग ने ठीक किया है। धीरे-धीरे एक-ए दो को दो-द की पैर में मठ छोड़कर के हम प्रवरज्या करेंगे। सो दैट फाइनशियल स्ट्रेन वाज़ अ मेजर पार्ट बिहाइंड दिस डिसीजन। किंतु क्या है ये सब लेयर्स बहुत सारे होते हैं। ऐसा कहना कि फाइनेंशियल स्ट्रेन है बोल के प्रवर जा कि दैट विल बी डिमिनिशिंग देयर अचीवमेंट्स। से भीतर में से जो आत्मन की पुकार जो ये खुला समुंदर है, खुला आकाश है, यह खुला मैदान है, वहां भ्रमण करते-करते भीतर में जप ऑटोमेटिक चालू हो जाए। यह सन्यासी का एक सहज एक भाव है। तो वह भी एक खींच रहा है उस डायरेक्शन में और यहां पे एक बहाना भी मिल गया। तो सब मिलकर के फिर वो प्रवृजजा का पीरियड स्टार्ट हो गया।
स्वामी अखंडानंदजी के भ्रमण के बारे में
हां वो इमीडिएटली चले गए थे। अरे वो तो उनका तो प्लान था बाद में जब वापस आए सेंट्रल एशिया जाना था उनको। [हंसी] स्वामी जी ने लेटर लिख लिख करके उनको खींच के वापस बुलाया। तुमने हिमालय भ्रमण किया है। तुम मुझे ले चलो। मैं जाना चाहता हूं। वरना पहले तो तिबेट हो गया। फिर सेंट्रल एशिया। पामीर माउंटेन वगैरह सब देखना था उनको। बोला कि आर्य लोगों का आदि निवास कहां है वो देख के आऊंगा ना लाटू महाराज ने प्रवृजजा तो किया ना वो काशी में तो हां म बेलूर मठ में घंटा लगने से ध्यान करना है तो लाटू महाराज मठ छोड़ के जा रहे हैं मेरे से ऐसा नहीं होगा घंटा लगा तो ध्यान करो जब इच्छा होगी तब ध्यान करूंगा तो स्वामी जी उनको खींच के ले आए अचार नियम व कानून दूसरों लोगों के लिए तुम्हारे लिए नहीं आ जाओ वापस
एक भक्त: ठाकुर का जीवन कितना audio visual वाला है. उन्हें सब दिखता है. जैसे पाप पुरुष का वध. बाकि साधको के बारे में तो ऐसा नहीं है. philosophical सब चलता है उनके जीवन में पर साधना के प्रत्येक सोपान पे ऐसा साक्षात् दर्शन नहीं होता।
वो जो शशधर पंडित ना कि कौन वो कोलकाता में धर्म के विषय पर लेक्चर दे रहा है। तो ठाकुर ने उनको पूछा क्या तुमको आदेश हुआ है? तो वो तो कुछ नहीं बोले किंतु उनके संगीत है। तो उन्होंने कहा कि आदेश ऐसा तो कुछ नहीं किंतु कर्तव्य बोध से कर रहे हैं सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी से। तो ठाकुर कहते हैं देखो आदेश होता है और फिर यह आदेश सिर्फ मन में मन में नहीं वो ईश्वर स्वयं प्रकट होकर के आदेश करेंगे तब कहीं जाके ये सब स्टार्ट करना है। सो यू आर राइट के हम लोग अब जैसे ये काम कांचन त्याग वगैरह अष्टपाश राइट काम कांचन तो बड़े दूर की बात है। किंतु ये अष्टपास जो है लज्जा घृणा भय जाति कुल शील मान अभिमान तो हम लोग सोचते हैं कि चलो मन में से ये लज्जा घृणा भय निकाल दिया जाति कुल निकाल दिया किंतु ठाकुर का ऐसा नहीं वो एक्चुअली अपने बाल लंबे है उसको लेकर के वो उसका रसिक मेहतर का टॉयलेट क्लीन किया माने इट ही हैज़ टू एक्ट इट आउट माने नॉट जस्ट कि उसको इमेजिन करना है कि मन में से निकल गया है। इट नीड्स टू बी एक्टेड आउट ओनली देन इट विल बी प्रॉपर्ली रिमूव्ड। सो इज इट कनेक्टेड विद दिस ट्रेट के उन्होंने एक्ट आउट प्रत्येक साधना को किया। सिर्फ मन में ही मन में नहीं। दैट वाज़ व्हाई हिज माइंड वाज़ मोर विजुअली ओरिएंटेड। ठाकुर ने खुद ने कहा कि ये शुभंकारी आंख अर्थात कि मैथमेटिक्स जो है वो मुझे बड़ा ही डिफिकल्ट लगता था। किंतु मैं चित्र वगैरह बहुत ही सुंदर दौड़ सकता था। और ठाकुर का यह जो सिंगिंग स्किल जो है वह तो जग जाहिर है। तो आजकल यह जो कहते हैं ना एक तो एनालिटिकल ब्रेन है फिर एक वन हाफ ऑफ ब्रेन इज अ क्रिएटिव ब्रेन मोर ऑफ अ विजुअल ब्रेन। सो हम कह सकते हैं कि ठाकुर का ये जो विजुअल ब्रेन इज़ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरीली डेवलप्ड। तो वी कैन से दैट एंड दैट इज व्हाई कि वी कैन आल्सो कनेक्ट इट विद दिस के सब कुछ उन्होंने एक्ट आउट किया है म सिर्फ मन में ही मन में नहीं आज मैं कहूंगा कि चलो मन में से काम कांचन को निकाल दिया काम कांचन को निकाल दिया ठाकुर ने एक्चुअली जो भैरवी ब्राह्मणी एक यंग लड़की को ले आई थी फिर ठाकुर को कहा उसकी गोद में बैठो राइट सो म फिजिकल लेवल पे मटेरियल लेवल पे एवरीथिंग थिंग नीड्स टू बी एक्टेड आउट इन और फिर ब्राह्मणी ने कहा कि बाबा आप वीरासन में सिद्ध हो चुके हैं। वीर भावना में आप सिद्ध हो चुके हैं। आज कोई हम लोग में से कोई ऐसा साहस नहीं करेगा ऐसा कुछ करने का। हम लोग मन में मन में सोचेंगे। बट वी विल नेवर एक्ट इट आउट। दैट इज व्हाई कि आवर हम कहेंगे कि हमारा एनालिटिकल ब्रेन ज्यादा डेवलप है। जबकि ठाकुर का यह जो क्रिएटिव विजुअल ब्रेन था दैट वास फार एक्स्ट्रा ऑर्डिनरीली डेवलप्ड।
एक भक्त: वेदांत में साधना के रूप में श्रवण मनन निदिध्यासन कहा गया है परन्तु ठाकुर तो सब act out करते थे, कार्य में परिणत करते थे. तो हमें क्या करना चाहिए? क्या ठाकुर की तरह अहंकार नाश करने के लिए अपने बालो से किसी का टॉयलेट क्लीन करे या सिर्फ मन में ही मन में ठाकुर का लीला चिंतन करके अहंकार का नाश करे?
नहीं ये बहुत अच्छा आपने फ्रेमवर्क कहा कि वेदांत को फॉलो करने से श्रवण मनन निध्यासन किंतु ठाकुर का लाइफ जितना स्टडी करेंगे उन्होंने सब कुछ एक्ट आउट किया है माने एव्री एक्शन ये जो जनेऊ है उसको फेंक करके दिगंबर होकर के साधना करना सो ऑल ऑफ दैट ठाकुर के जीवन में देखेंगे सिर्फ वो आइडियाज से उस शांत नहीं होते उनको वो तृप्ति नहीं होती ही हैड टू वर्क इट आउट इन अ फिजिकल लेवल ओनली देन ही विल बी सेटिस्फाइड सो दैट गोस फार बिय्ड श्रवण मनन निधिसन इसलिए तो ठाकुर ने कहा है ना एकानकार अनुभूति तो वेद वेदांत के छाड़िए दिए छ यहां की अनुभूति है तुम्हारे वेद और वेदांत के परे चली गई है सो साधना भी उनसे परे जाके की है अनुभूति भी परे चक्कर के [हंसी] सो यू आर राइट कि देखिए हम लोगों के सामने हमने वैसे जैसे आपने ठीक ही कहा कि हम लोग तो स्मरण मनन निधि्यासन से ही संतुष्ट है। एक हाथ में जप माला है, दूसरे हाथ में कथामृत है। लिटरली नहीं तो फिगरेटिवली तो है कि हम ठाकुर मास्वामी जी का लिटरेचर पढ़ते हैं और फिर जप करने का प्रयास करते हैं। बट दैट इज देखिए अपने पास में यह ऑप्शन तो है टू मेक इट मोर यू कैन से इनवॉल्व आवरसेल्फ इनू एक्टिव साधना। राइट? और इसके लिए लज्जा, घृणा भय त्याग करना होगा। ठाकुर ने एक डिवोटी को कहा ना कि तुम हरि नाम लेकर के ताली बजाते बजाते नृत्य करो। लोगों को पता चलने दो कि ये हरि नाम में मत हुआ है। पागल हुआ है। लोगों को पता चलने दो कि अभी इसके पास ये व्यवहार लेकर का काम लेकर के आने से वो नहीं होने वाला है। सो लेट पीपल नो दैट आई एम मेड विद द डिवाइन लव ऑफ गॉड। सो दैट ऑप्शन इज देयर। माने जो 1 लाख जन्म की साधना थी हो सकता है 100 जन्म में समाप्त हो जाए। दैट ऑप्शन वी हैव अपना मुमुक्षुत्व कितना है उसके ऊपर में है ना एस लॉन्ग एस कि मैं यहां पर बैठकर के यह डिसाइड करता हूं कि यह करना है कि नहीं करना है तब तक तो मंद मुमुक्ष मुमुक्षत्व है कुछ होने वाला नहीं उस लेवल का मुमुक्षत्व जब आएगा ये चिंतन भी नहीं रहेगा फिर वो पागल की तरह ठाकुर ने खुद ने कहा ना एक जड़ की तरह आया मेरे जीवन में यह मेरी सेनिटी है ये एक व्यवहार है यह प्रैक्टिकिटी है कब कहां उड़ा के चढ़ा चला गया अपना प्रॉब्लम है वो मुमुक्षत्व नहीं आता इसलिए हम लोग एक सेफ्टी सिक्योरिटी में बैठे हैं।
एक भक्त: ठाकुर की प्रैक्टिकल सेंस बड़ी तगड़ी थी
माने ठाकुर खुद कहते हैं ना मैं जमीन पर गिर कर के मां का नाम लेते लेते रो-रो करके मिट्टी में अपना चेहरा रगड़ रहा हूं। मेरे चारों ओर लोग इकट्ठा हो गए हैं। तो मुझे ऐसा लगता है धुएं की तरह जैसे कि वो अब स्पष्ट दिखते हैं। उनका कोई रियल एकिस्टेंस नहीं। उसमें से कोई कहता भी है कि अरे उसको पेट में वेदना चालू हुई है इसलिए इस तरह से रो रहा है। ठाकुर कहते हैं मुझे स्पष्ट दिखाई देता है। स्पष्ट सुनाई देता है। एट द सेम टाइम उनका एग्जिस्टेंस जो है ना वो रियल नहीं लग रहा। हां माने वो सिर्फ विचार की बात नहीं उनको एक्चुअली दिखता था ये सब। किंतु इस सब के पीछे में मुमुक्षत्व है। देखिए ये जो अपनी अघोरमणि देवी का जो कहानी मैं पढ़ रहा था लीला प्रसंग में उस समय शरद महाराज लिखते हैं मैंने कहा था ना कि अघोरमणि देवी आई बलराम मंदिर में तो आने से कुछ ही समय पहले एकाएक ठाकुर वो बाल गोपाल भाव उनके भीतर में आया और जैसे वो बाल गोपाल की मूर्ति होती है ना वो घुटनों के बल चलता है और ऐसा हाथ एक रखता है जैसे लड्डू उस हाथ में लड्डू गोपाल एग्जजेक्टली वही आकार वही पोज़ ठाकुर ने धारण किया तो सब लोग सोच रहे हैं कि एकाएक ठाकुर के भीतर में बाल गोपाल का क्यों यह भाव प्रकट हुआ किंतु कुछ ही समय के बाद में यह अगोरमणि देवी कमरे में प्रवेश की तो दैट इज वेरी सरप्राइजिंग सभी लोग समझ गए कि ठाकुर को पहले ही अंदाजा हो गया था वगैरह वगैरह तो यह तो एक हुआ किंतु बाद में ना फिर शरद महाराज लिखते हैं कि देखिए आपको ऐसा लगेगा यह 50 साल का बूढ़ा ऑलमोस्ट उस समय ठाकुर की उम्र थी। वो इस तरह से बाल गोपाल भाव धारण करेगा। बाल गोपाल का मुद्रा धारण करेगा तो आपको क्या ये थोड़ा सा म हास्यास्पद विचित्र एक एबनॉर्मल ऐसा नहीं दिखेगा। किंतु नहीं ठाकुर के चेहरे पर जो भाव प्रकट होता था ना बिल्कुल सुमधुर भाव ऐसा ही लगेगा। का एक छोटा सा शिशु संतान ही है। एक दिव्य शिशु संतान ही है। भले ही चाहे उनकी उम्र जो है वो बूढ़े की है किंतु भाव पूरे चेहरे पे, अंग में, मुद्रा में बिल्कुल बाल गोपाल के हैं। वि इज वेरी सरप्राइजिंग। ये शरद महाराज एक्चुअल ऑब्जरवेशन करते हैं।
एक भक्त: इतिहास में कभी और किसी अवतार या संत के जीवन में ठाकुर के जितना प्रचंड मुमुक्षुत्व, साधन प्रवाह, या सिद्धि के बारे में नहीं सुना जाता।
ना यहां पे ऐसा भी हो सकता है कि जैसे शरद महाराज ने खुद ने कहा ना लीला प्रसंग के साधक भाव के प्रारंभ में कि भगवान राम भगवान कृष्ण उन सब की साधन पद्धति के बारे में साधना के दिनों के बारे में लिखा नहीं गया। क्यों? क्योंकि भक्त जो है अपने इष्ट को पूर्ण ही देखना चाहता है। सो इन दैट वे देयर इज अ ग्रेट डिसर्विस टू इंडियन रिलीजियस लिटरेचर कि अदरवाइज उनकी साधना का वर्णन होता महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु की साधना का जो अल्प वर्णन है उसमें जो पता ठाकुर खुद कहते हैं ना कि उनकी जीहवा के ऊपर में वो सार्वभौम ने चीनी रखी तो चीनी पाउडर की तरह ही रही और हवा में उड़ गई। थोड़ी सी भी गीली नहीं हुई। जस्ट इमेजिन चीनी जीभ पर रखेंगे तो गीली तो होगी ही होगी किंतु त्याग की शक्ति ऐसी है कि चीनी वो ड्राई ही रही। हवा में उड़ गई। भगवान बुद्ध की तपस्या का जो सब वर्णन है अद्भुत वर्णन है। सो दैट वे अपना लिटरेचर एक तरह से अधूरा है कि मुक्ति प्राप्त होने के बाद में जो ईश्वर के गुणगान कीर्तन करते स्तोत्र दोहा पदावली भजन जो लिखे गए हैं अद्भुत है। किंतु वो स्थिति प्राप्त करने के लिए उन्होंने क्या किया है? बहुत ही अल्प उसका विवरण अवेलेबल है।
एक भक्त: जैसे शंकराचार्य के जीवन में आता है वो पानी में गिरकर मगरमच्छ की कहानी। वो जैसे की बचपन से ही दिव्यता से भरपूर थे.
एंड शंकराचार्य सपोज टू बी अल्ट्रा रशनलिस्ट अद्वैतिक [हंसी] मने अब वैष्णव भावधारा में यदि ये सब देखे तो चलो एक्सक्यूजेसेबल है किंतु फिर अद्वैत भाव में ऐसा [हंसी]
रामकृष्ण संध के बारे में
वो केशव सेन को कहा केशव सेन ने कंप्लेन किया कि महाशय मेरे दल में से अपने से तो निकल गया दल वालों को लेके गया मेरे बहुत सारे मेरे फॉलोअर्स को ऊपर से न्यूज़पेपर में मेरे विरोध में आर्टिकल लिखता है और वक्तता देता है तो ठाकुर ने कहा तुम देख सोच समझ करके चेले नहीं बना तो इसलिए ऐसा हुआ और फिर ये लोग क्या कहते हैं कि परमहंस देव को सेंस ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है फैकल्टी ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है वो वो जो मां के कहानी मां की लाइफ में हमने देखा ना ठाकुर की महासमाधि के बाद में जैसे ही ठाकुर ने दर्शन दिया मां को साथ में ही सभी गुरु गुरु भाइयों ने कहा कि सेवा जैसे चल रही थी वैसे ऐसे ही चलेगी। तो यह जो ठाकुर की सेवा है दैट इज आवर यूनिकनेस ना। अदरवाइज आपको साधना करनी है या तो शास्त्रों का स्टडी करना है उसके लिए बहुत सारी जगह है। आवर यूनिकनेस इज ठाकुर सेवा। उसी को लेकर के फिर बाकी सब कुछ है। बट सेंटर इज ठाकुर सेवा। इसलिए तो वो कम्युनिटी का एक एस्पेक्ट है व्हिच इज वेरी एसेंशियल। देखिए शक्ति इज यूनिक टू हिंदूइज़्म ना। बाकी आप बुद्ध अवतार या जीसस अवतार वगैरह देखिए शक्ति नहीं है। सो व्हिच इज ट्रूली यूनिक टू हिंदूइज़्म। हां देखिए हमारे में ये तीन ट्रेडिशन इकट्ठा होती है ना और कितना ये वेदांतिक ट्रेडिशन, वैष्णव ट्रेडिशन एंड शक्ति साधना तीन ट्रेडिशन अपने यहां पे इकट्ठा होती है। इसका जो इंप्लिकेशन है हम लोग अभी भी नहीं समझ पाए। हम लोग प्रचार करते हैं या तो बात करते हैं सिर्फ वेदांतिक एस्पेक्ट की। अवतार तत्व थोड़ा सा लेते हैं। शक्ति तत्व सेपरेटली लेते हैं। किंतु देयर इज अ जो एक एक ब्लेंड जो है ब्लेंड ऑफ थ्री ट्रेडिशंस थ्री स्ट्रीम्स हाउ दे आर ब्लेंड इंटरवन टुगेदर दैट वी येट नीड टू वर्क आउट।
एक भक्त: जैसे की एलोन मस्क ने इतनी सारी कम्पनिया अलग अलग स्टार्ट की किन्तु अभी सभी को इकट्ठी कर रहा है. वैसे ही लगता है ठाकुर माँ स्वामीजी अलग अलग दिशाओ में जा रहे है परन्तु आखिर में हमें समझ में आएगा की एक ही मास्टर प्लान था इन लोगो का.
और उसका एप्लीकेशन भी देखिए। यूनिक एप्लीकेशन किस तरह से कि डेटा सेंटर इन स्पेस तो माने सिर्फ ये नहीं कि वो कंबाइन कर रहा है उसके बाद में जो आउटपुट आएगा दैट विल बी अ हार्मोनी ऑफ़ ऑल थ्री स्पेस एक्स है तो फिर आप स्पेस में जा सकते हैं। यदि एक्स एआई नहीं है तो डेटा सेंटर बोल के कोई मीनिंग नहीं है। सो एप्लीकेशनेशंस आल्सो नाउ ब्लेंड एवरीथिंग टुगेदर। इट टू टाइम टूक [नाक से की जाने वाली आवाज़] टाइम बट विज़ शायद पहले से ही होगा। यह जैसेजैसे अपना यह तीन क्लास है ना ठाकुर मा स्वामी जी का जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाएगा वैसे वैसे यह आइडियाज भी ओपन होते जाएंगे। ऐसा नहीं है कि मैं खुद ऐसा कोई प्लान करके चल रहा हूं। यह जो अभी का जो स्ट्रक्चर है इट इज इवॉल्वड ओवर ए टाइम। आई आई नेवर प्लान दिस वे बट इट इवॉल्व नेचुरली। और जितने भी आइडियाज अभी मैं डेवलप कर रहा हूं, क्लास में बोल रहा हूं, दे आर नॉट प्रीडेवलप आइडियाज। करते-करते सब आ रहे हैं। सो दैट वे आई आल्सो फील दैट आई एम इन प्रेजेंस ऑफ सम सॉर्ट ऑफ स्टेडी ड्रिप ऑफ रिवोलेशन। डेली डेली कुछ ना कुछ रिव रिवील हो रहा है। राम