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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

नीरव साधना || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 27 Feb 2025

प्रार्थना

ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है निरव साधना कल हमने देखा कि मां जब ध्यान करने के बारे में क्या कहती है आध्यात्मिक जीवन यदि हम आध्यात्मिक जीवन जीने के बारे में सीरियस है तो साधन भजन जप ध्यान ये आध्यात्मिक मेथड्स जो कि हमको सिखाई गई है हमारे शास्त्रों में उसको फॉलो करना बड़ा ही आवश्यक है बहुत बार लोग कहते तो हैं कि हां मैं धार्मिक हूं किंतु देखेंगे कि उनके जीवन में धर्म के नाम पर तीर्थ यात्रा करने का या तो फिर उत्सवों का पालन करने का और मंदिर में जाना इसके अलावा आपको ज्यादा कुछ दिखेगा नहीं किंतु यदि हम ठाकुर मा स्वामी जी की बात सुने ठाकुर मा स्वामी जी के जीवन में देखें तो देखिए कि यह जो साधन भजन है उसका डेफिनेशन सही सही हमको क्या मिलता है तो वह है जप और आखिर में ध्यान तो मां कहती थी कल हमने देखा कि मैं व नलिनी दीदी को कहती है मां कि मैं जब तुम्हारी उम्र की थी तो मैं रोज एक लाख जप करती थी तो देखिए कि हम लोग भी जद एक लाख जप करें एक लाख तो होगा नहीं हमसे किंतु मान लीजिए कि उसका 10 पर भी हो 10000 भी हो उसका % भी हो 1008 इतना भी जदी हो तो भी हमारे जीवन में इतना नियमित करने से किस तरह की एक शांति एक पवित्रता और एक ईश्वर के प्रति प्रेम जागृत होगा तो इसी के बारे में मां आज फिर से कहती है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं पहले तो कि ध्याना

प्रसंग: माँ नियमित रूप से चांदनी रात में प्रातः 3 बजे जप करती थीं

भ्यान स्वभाव तो अंतर्मुखी मन सेही प्रथमा बस्था ती एके बारे तन्मय होईया जाए तो महाराज जी कहते हैं कि ध्यान के अभ्यास के परिणाम से मां का जो स्वभाव अंतर्मुखी मन है मां का मन देखिए कि पहले से ही अत मुखी था वह पहले ही प्रथम से ही संपूर्ण रूप से तन्मय हो जाता देखिए यहां पर क्या कहना चाहते हैं मां का मन अंतर्मुखी क्यों था इसका भी हमको इतिहास पता है बैकग्राउंड हमको पता है कि मां जब जयराम बाटी में थी तो उनकी उम्र की जो उनकी सहेलियां वगैरह हुआ करती थी वह क्या है कि अपने पति के बारे में बात करेगी कोई उत्सव वगैरह है वहां पर इधर उधर जाएगी वो उनका एक एक्सट्रोवर्ट लाइफ था किंतु मां शारदा देवी को सब समय वह एक तरह का क्रिटिसिजम सुनना पड़ता था कि एक पागल के साथ में उनका विवाह हुआ है और इस तरह से हमने देखा है कि लोगों का मन भी ऐसा है कि दूसरों को कष्ट देकर के उनको आनंद आता है यह साइकोलॉजी इस तरह की क्यों है वह बताना मुश्किल है क्योंकि मुझे लगता है पर्सनली मेरा जो ऐसा विचार है कि जब मन में आध्यात्मिकता नहीं रहेगी ईश्वर या आत्म निष्ठा नहीं रहेगी ईश्वर के प्रति प्रेम या आत्म निष्ठा इन दोनों में से कुछ भी नहीं रहेगा तब मनुष्य का मन हमेशा एंटरटेनमेंट के साधन खोजते रहता है तो यह अभी आजकल तो जिस तरह से मोबाइल वगैरह हमारा मन खाए जा रहे हैं उस समय यह सब था गॉसिप था यह सोशल मीडिया आज जिसको कहते हैं उस समय वह गॉसिप मीडिया था वो बैठे-बैठे गोसीप करते रहेंगे इसके बारे में बात करेंगे उसके बारे में बात करेंगे तो अभी गोसीप का तो एक कोई पात्र भी तो मिलना चाहिए जिसके बारे में सबसे ज्यादा इस तरह की जो कहानियां है वह घूमती रहती है तो मां शारदा अच्छा टारगेट थी क्यों क्योंकि हर कुछ ना कुछ दिनों पे दक्षिणेश्वर से कलकाता से ठाकुर के कोई ना कोई पागलपन का समाचार आता था और वह समाचार पूरे गांव में फैल जाता था और लोगों को भी गो के लिए एक मसाला मिल जाता था कि हां देखिए यह शारदा का जो जमा पति है या तो फिर यह श्यामा सुंदरी देवी का जो जमाई है वह इस तरह से पागलपन की हरकतें कर रहा है कभी वह दिगंबर होकर घूमता रहता है कभी वह मामा करके रोता रहता है कभी वह मां के लिए मां जगदंबा का जो भोग है वह बिल्ली को खिला देता है ना क्या क्या सब नाटक करता है तो इस तरह की बातें दक्षिणेश्वर से कलकत्ता से आए दिन जयराम बाटी कामर पुकुर गांव में जाती थी वहां के लोगों को गॉसिप करने के लिए गप लगाने के लिए मसाला मिल जाता था तो इसलिए मां के बारे में हमने देखा कि वह भानु पीसी उनकी एक रिलेटिव ना कि एक उनकी हमदर्द थी उनके रांडे में जाकर के वह सोती रहती थी क्यों क्योंकि और कहीं प भी जाएगी तो इस तरह का क्रिटिसिजम सुनना पड़ेगा लोग सिंपैथी का दिखावा करेंगे चेहरे पे तो इस तरह का भाव रखेंगे बातें तो इस तरह से करेंगे कि अरे तुम्हारा यह जो मिसफॉर्चून है उसके प्रति उसके लिए में बड़ा ही मुझे दुख हो रहा है किंतु कोई भी समझ सकता है कि चेहरे पर सिंपैथी है बातों में हमदर्दी है किंतु मन में ही मन में बड़ा आनंद आ रहा है दूसरों का कष्ट देख कर के तो मां वैसे ही तो मां जगदंबा स्वयं अध्याशक्ति का अवतार उनका मन तो वैसे ही ईश्वर की ओर होने वाला है वो तो एक देवी त्व जो एस्पेक्ट है मां का वह तो हो ही गया किंतु यह जो मनुष्य एस्पेक्ट है मानवी एस्पेक्ट है उसमें भी तो कुछ ना कुछ चाहिए मन को यह सांसारिक चीजों से हटा कर के मन को अंतर्मुखी जम जहां पर भी जाएगी मां बेचारी उनको सुनना पड़ता था इसीलिए बहुत ज्यादा किसी के साथ में बातचीत करती ही नहीं थी बस वहीं अपने घर में रहेगी अपना काम करेगी भानु सी के वहां जाएगी एक दो इस तरह के जो हमदर्द थे सही सही उनके साथ में बात करेगी बस बाकी सबके साथ में बात करना अवॉइड करेगी तो ऑलरेडी मां का मन अंतर्मुखी रहा था फिर जब भी ठाकुर दक्षिणेश्वर से कामर पुकुर आते तो जयराम बाटी से मां को बुलाते फिर वह मां को सब उपदेश देते कि किस तरह से साधन भजन करना है जब ध्यान करना है घर का जितना भी काम है कितना निष्ठा पूर्वक करना है यह सब उपदेश तो ठाकुर मां को देते ही रहते थे तो इस तरह से मां का मन पहले से ही अंतर्मुखी जब मां दक्षिणेश्वर आई और जब ठाकुर ने उनको मंत्र दिया पहले ही हमने देखा कि ठाकुर ने मां की जीब पे बीज मंत्र और नाम लिख दिया था कौन सा नाम लिखा था कौन से देवता का मंत्र दिया था वह तो यहां पर नहीं लिखा है बस इतना लिखा था कि जिवा पे जिवा के ऊपर में की लिखिया दिलन ऐसा लिखा है कुछ लिख दिया कुछ लिखा माने कौन से ईश्वर का मंत्र दिया है वो तो यहां नहीं लिखा लक्ष्मी दीदी के बारे में लिखा है कि उनको राधा कृष्ण का बीज दिया था और जब लक्ष्मी दीदी ने कहा कि उन्होंने शक्ति मंत्र लिया है ऑलरेडी पहले तो ठाकुर ने कहा कि भले कोई दिक्कत नहीं मैंने तुमको जो राधाकृष्ण का मंत्र दिया है वो तुम्हारे लिए सटीक है यहां पर मां ने भी शक्ति मंत्र लिया था वही पूर्णानंद बोलकर के एक जो साधु थे उनके पास में से किंतु मां को ठाकुर ने कौन सा मंत्र दिया है वह यहां पर नहीं लिखा है तो जो भी है एक बार जब मंत्र दीक्षा हुई मां की ठाकुर के पास से उसके बाद में देखिए कि मां का ऑलरेडी अंतर्मुखी पवित्र मन किस तरह से साधन भजन के इस जुआर में बहने लगा मां तीनी निजे बोलिया लेन माने अपने से कहा था क्या कहा था टते होए ना खाट ले की किछु होए मेहनत करनी पड़ेगी मेहनत नहीं करने से क्या कुछ होगा संसार एर काज कोमर मध्य एकटी समय करे निते होय संसार के जो जितने भी कार्य है उसके बीच में भी एक समय कर लेना होता है आमार कोथा की बोल बोमा मैं अपनी बात क्या कहूं मां मां और किसी स्त्री के साथ में बात कर रही होगी इसलिए मां उसको संबोधन करके कहती है कि मैं अपनी बात क्या कहूं आमी तो खन दक्षिणेश्वर रात तीन टेर समय उठे जपे बस तुम कोनो हश थकतो ना उस समय में दक्षिणेश्वर में रात को 3:00 बजे उठ करर के जप के लिए बैठती कोई हश रहता नहीं था एक दिन जो छना राते ते सीर पासे बोसे जोप कोर छ चारी दक निस्तब्ध एक दिन ज्योत्सना रात्रि को नबत के पास में सीढ़ी के पास में बैठ कर के जप कर रही थी चारों ओर निस्तब्ध है यहां पर देखिए ज्योत्सना अर्थात की चांद के उजाले वाली रात तो ज्योत्सना शब्द मां अपनी गामठी बोली में अपनी व रूरल डायलेक्ट में क्या प्रोनाउंस करती है जोचना अर्थ जोतना का कर दिया जोचना माने वो प्रवीण का करती थी पीर बीन तो ऐसा ही उनकी बोली भी कितनी मधुर है उनकी डायलेक्ट कितनी सुंदर है एक दिन रात को 3 बजे चांद के उजाले वाली ज्योत्सना रात्रि को बैठ कर के जप कर रही थी चारों ओर निस्तब्ध है कोई आवाज नहीं है आज की तरह वह गाड़ी का होन बज रहा है कहीं पर कोई वो म्यूजिक जोर-जोर से चल रहा है कहीं पे यह जो मतलब आज का जो नोइज पोल्यूशन लाइट पोल्यूशन है आज के जगत में आज के समय में देखिए हम लोग शहर में रहने को अभ्यस्त है तो यह जो एकदम शांति यह एकदम पवित्रता एकदम साइलेंस एकदम डार्कनेस कभी हमने जगत में जीवन में देखा नहीं है मैं जब पहली पहली बार रांची जाना शुरू किया था उस और वहां पे हमारा फार्म है 75 एकड़ के दो फार्म है 150 एकर्स है टोटल अपने पास में गवर्नमेंट ने हमको दिए हैं ये एग्रीकल्चर एग्रोनॉमी वगैरह को डेवलप करने के लिए और वह बच्चों को सिखाने के लिए तो वह सब जो है वो फार्म में मैं रहता था कभी-कभी रात को और वहां पे मैंने जो देखा सही डार्कनेस किसको कहते हैं सही सही साइलेंस किसको कहते हैं सही सही क्वा एटिट्यूड किसको कहते हैं वहां पे अपना जो फार्म है वहां पे क्लासरूम है और एक किचन है और कुछ रेसिडेंशियल एरिया है एक दो घर है रहने के लिए बस इतना ही है तो एक छोटा सा एक कैंपस जैसा है फार्म फार्म तो बहुत बड़ा 75 एकड़ यानी कि फार्म के भीतर में जंगल भी है नदी भी है पहाड़ भी है बड़ी सुंदर जगह है किंतु उसके सेंटर में एक कैंपस जैसा बनाया है तो एक क्लासरूम फिर यह किचन हम लोगों के लिए दो-तीन कमरे रहने के लिए और एक छोटा सा मंदिर तो वोह मंदिर में जाकर के मैं जब भी रात को बैठता था रात को कोई नहीं होता था जब भी क्लास चल रहे होते हैं तब कुछ ट्रेनी स्टूडेंट वहां पर रहते हैं ज्यादातर तो वह दिन के दौरान आकर के दिन में ही चले जाएंगे रात को रहेगा एक चौकीदार एक मैं और वहां पर फार्म का जो मैनेजर है वो बस इत ने कुछ चार-पांच लोग रहेंगे रात को पूरे मतलब 75 एकड़ और आसपास में भी कोई बस्ती जैसा नहीं है बस्ती के लिए आपको दो-तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा 3-4 किलोमीटर जाना पड़ेगा उतने एरिया में और कोई मनुष्य नहीं रहता तो वहां पर मैं रात को 7:00 बजे 8 बजे कभी-कभी वह मंदिर में जाकर के बैठता था मंदिर माने क्या कि वह जो एक टीन का शेड है वो टीन के शेड के नीचे में मां ठाकुर स्वामी जी का फोटो रखा है बस इसको यह लोग मंदिर कहते थे सब कुछ तो ऐसा टेंपररी जैसा ही था किंतु उस शेड़ के नीचे में बैठ कर के मैं अकेला अकेला बैठा रहता था कभी-कभी इतना मेरा मन शांत हो जाता था अभी भी मैं जद याद करता हूं कि रामकृष्ण मिशन में आकर के ऐसी कौन से दिन है कि मंदिर में बैठ करर के मुझे सही में आनंद आया है तो वह एक सर्वप्रथम मुझे रांची के दिन याद आते हैं कि हां वह टीन शेड वा वाले मंदिर में मैं बैठा करता था और वातावरण बड़ा ही ठंडा होता था तो मतलब एकदम खुशनुमा वातावरण रांची तो यानी पूरा हिल के ऊपर में है तो इतना ठंडा वातावरण बिल्कुल आवाज नहीं कोई कुछ नहीं यह जो क्रिकेट्स होते हैं ना तमराज जिसको बोलते हैं उसकी आवाज आती है और बस कहीं-कहीं वह पशुओं की आवाज इधर-उधर आ गई तो आ गई इसके अलावा और कोई शब्द नहीं कोई नोइज नहीं कोई पोल्यूशन नहीं परफेक्ट पीसफुलनेस तो वह जो मैं टीन शेड के मंदिर में बैठने का मुझे आनंद आता था वह अद्भुत था तो वह एक मुझे याद है दूसरा मुझे याद है कि मैं जब पहली बार अपने सेंटर में कदम रखा वह था लीमड़ी में और लीमड़ी में आप देखेंगे कि वहां पर एक दरबार गढ़ है जहां पर स्वामी जी रुके थे तो वह जो दरबारगढ़ आज हमको दे दिया गया है तो वहां पर क्या है फर्स्ट फ्लोर पर हमने श्राइन बनाया है जहां पर स्वामी जी स्वयं रुके थे जिस कमरे में रुके थे बहुत बड़ा होल है और बहुत उसकी हाइट है ऑलमोस्ट 30 फुट के तकरीबन उसकी हाइट होगी इस होल की और 30 फुट 40 फुट जितना वो अक्रॉस होगा साइज इतना बड़ा होल में एक छोटा सा श्राइन बनाया है और मैं पहली बार जब लीमड़ी गया था तो वहां पे एक ब्रह्मचारी महाराज थे वो रिलीफ वगैरह चल रहा था तो यह ब्रह्मचारी महाराज को एक स्कूटर स्कूटी जैसा कुछ दे दिया था उस सम हां और स्कूटी जैसा था उनके पास में और वह स्कूटी पर बैठ के वह साइट जहां पर यह रिलीफ कंस्ट्रक्शन चल रहा है हम लोगों ने कुछ सात आठ स्कूल का रिकंस्ट्रक्शन कर रहे थे तो यह ब्रह्मचारी महाराज स्कूटी पर बैठ के साइट प इंस्पेक्शन के लिए जाते थे तो एक दिन मैं मेरे आने के एक दो दिन के बाद में ही उन्होंने कहा चलो मेरे साथ में हम लोग दरबारगढ़ जाते हैं वहां पर बैठ कर के आरती करेंगे और तो मैंने कहा चलिए मैं तो बिल्कुल नया था रामकृष्ण मिशन के बारे में इतना कुछ पता भी नहीं था तो महाराज के साथ में स्कूटी पर बैठकर गया वह दरबारगढ़ वो फर्स्ट फ्लोर पर गए वहां पर बैठा मैं वो महाराज वो खंडन गा रहे हैं हारमोनियम पे और वह जो दरबारगढ़ है वोह चारों ओर निस्तब्ध कोई नहीं और जो कमरा था वो कमरा इतना सुंदर वहां पर स्वामी जी स्वयं रुके हैं विराट होल है तो वहां पर बैठ कर के जो जो खंडन मैंने सुना था वह अभी भी मुझे याद है कि इतनी गहरी कोई कोई घटनाएं होती है हमारे जीवन में हमारे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ती है तो वह रांची में बैठ कर के वह जो मैं वो टीन शेड वाले मंदिर में बैठता था वो एक और यह जो दरबार घड़ आज आज भी आप वहां पर जाएंगे कोई आता जाता नहीं है बिल्कुल वीरान सा पड़ा है यदि आपको वहां पर जाना है तो महाराज जी वहां के जो बड़े महाराज है वहां पे वो फोन करके किसी केयरटेकर को बोलेंगे कि कमरा खोल दो कोई गेस्ट आ रहे हैं तो वह केयरटेकर जाकर वह होल खोल देगा आपके लिए तो इस तरह से वीरान जगह है वह भी तो इस तरह की जो शांत वीरान जगह है जहां पर लोग आते जाते नहीं है लोगों के मन का जो यह जो रजस है वह वहां पर स्पर्श नहीं करता ऐसी प्राकृतिक जगह पर बैठ कर के आप जद ईश्वर का नाम ले तो ऑटोमेटिक आपका मन शांत हो जाएगा तो यहां पर तो दक्षिणेश्वर है दक्षिणेश्वर उस दिन का दक्षिणेश्वर आज का छोड़ दीजिए उस दिन का दक्षिणेश्वर यानी कि आप देखिए कि वैसे ही कोलकात्ता से दूर है बड़े ही कम लोग वहां पर जाते थे ऊपर में से ठाकुर की साधना का प्रभाव यानी कि कितना पवित्र सुंदर वातावरण यहां पास में से गंगा बह रही है ऊपर में चांद का प्रकाश है आकाश में तारे काली के मंदिर में जगन माता स्वयं जाग्रता मां काली स्वयं विराजमान है और यहां पर अध्याशक्ति स्वयं नबत में बैठ कर के जप कर रही है यदि हम लोग कभी-कभी मैं सोचता हूं कि वो जो ये जो सब साइंस फिक्शन स्टोरीज पढ़ते हैं ना कि वो एक साइंटिस्ट टाइम मशीन बनाता है फिर वो टाइम मशीन बना कर के क्या करता है तो व भूतकाल में इतिहास में जाएगा ज वो उस और कहां पर जाएगा जिस इतिहास के बारे में सबसे ज्यादा उसको जानने की उत्कंठा है तो कोई कहीं मिडिवल इंग्लैंड में जाएगा कोई जहां पर अमेरिकन सिविल वॉर हुई थी वहां पर जाएगा कोई फ्रेंच रेवोल्यूशन देखने को जाएगा कोई भविष्य में जाएगा कोई डायनासोर देखने को जाएगा इतिहास में मेरे पास में यदि टाइम मशीन आ जाए तो मैं पहले तो दक्षिणेश्वर चला जाऊं और फिर वहां जाकर टाइम मशीन को ही तोड़ दूं इसके बाद में वापस आने का कोई प्रश्न नहीं है वहीं पर रहेंगे वहीं पर मरेंगे ठाकुर मा स्वामी जी के साथ में तो वही सुंदर दक्षिणेश्वर में रात तीन के न बजे मां उठ जाती थी ध्यान करती थी जप करती थी चारों ओर निस्तब्ध ठाकुर सेही ठाकुर जे से दिन कोखन झाऊ तलाई सोचे गन किछु ही जानते पारी नहीं अन्य दिन जूतो और शब्द टेर पाई ठाकुर उस दिन कब झाऊ तला में शौच करने को गए हैं मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आया बाकी जो कोई दिन ठाकुर जाते हैं तो ठाकुर के जूतों का शब्द मैं सुन पाती हूं देखिए कि वहां पर तो इंडोर प्लंबिंग था नहीं झावतला यानी कि गंगा के किनारे आप देखेंगे यदि आप नौका लेकर के कलकत्ता या तो बेलूर मठ से दक्षिणेश्वर जाएंगे तो सबसे पहले तो आपको वह द्वादश शिव मंदिर दिखाई देंगे 12 शिव मंदिर है उसके बाद में आपको ठाकुर का क कमरा दिखाई देगा जब नौका में यात्रा करते-करते ही गंगा के किनारे पर ही ठाकुर का कमरा दिखाई देगा उससे थोड़ा सा दूर जाएंगे तो नबत दिखाई देगा उससे और थोड़ा सा दूर जाएंगे तो यह पंचवटी दिखाई देगा और थोड़ा सा जाएंगे तो फिर यह बकुलतला है और फिर बकुलतला के बाद में झावतला है तो इस तरह से वह पूरा नक्शा है वहां का तो ठाकुर जब अपने कमरे में से झाऊ तला जाएंगे वो गंगा के किनारे रास्ते से तो निश्चय मां जिस नबत में निवास करती थी उसके सामने से ही ठाकुर जाएंगे तो मां कहती है कि बाकी सब दिन जब ठाकुर जाते थे झावतला तो उनके जूतों की आवाज मैं सुन पाती थी किंतु उस दिन पार्टिकुलरली मेरा मन ऐसा एकाग्र हो गया कि ठाकुर के जूतों की आवाज भी मैं सुन नहीं पाई खूब ध्यान जमे गछ ध्यान बड़ा ही अच्छे से जम गया था मन बिल्कुल एकाग्र हो गया था तो खन आमार अनन रकम चेहरा छलो उस समय मेरा दूसरी तरह का चेहरा था यह मां क्यों कह रही है गैना पोरा लाल पेड़े साड़ी गहने पहने हुए थे लाल कलर की किनारी वाली मां ने साड़ी पहनी हुई थी यह जो अन्य रकम चेहरा यानी कि दूसरे तरह का चेहरा यह बात मां क्यों कहती है क्योंकि बाद बाद में जब यह स्मृति कथाएं वगैरह सब लिखी गई थी मां जब यह बोल रही थी यह सब उद्बोधन के दिनों की बात है ठाकुर की महासमाधि के 10 12 15 साल के बाद की यह सब बातें हैं उस समय मां जब जयराम बाटी में पहले थी तो बीच-बीच में काला ज्वर होता था तो इसकी मलेरिया ज्वर बुखार यह सब होने की वजह से मां का शरीर बड़ा ही रुग्ण हो गया था बड़ा ही कृष काय हो गया था और भी थोड़ा सा मलीन हो गया था इसलिए मां कहती है कि उस समय जब मां दक्षिणेश्वर में थी तो बड़ी ही सुंदर दिखती थी मां का एक एक बार माने इस तरह से स्वपना देखा था ना कि एक दर्शन देखा था मां ने कहा कि एक स्वप्न में मैंने देखा स्वप्न या दर्शन कि मैं वहां पर बैठी हुई हूं और मेरा बड़ा ही सुंदर रूप है और बहुत सारे लोग मुझे बड़ा ही सन्मान देकर के बात कर रहे हैं मेरे साथ में देखिए कि यह जो कभी-कभी ऐसा होता है ना कि मन की जो सबकॉन्शियस इच्छाएं हैं उसके बारे में हम सपना वगैरह देखते हैं या तो फिर ऐसा कुछ तो यह भी एक कह सकते हैं कि यह जो सौंदर्य है देखिए मां तो शारदा सरस्वती स्वयं सौंदर्य तो उनके साथ में होना ही है किंतु फिर यह बीमारी की वजह से वगैरह की वजह से मां का सौंदर्य आखिरी जीवन में मलिन हो हो गया था और फिर ठाकुर नेने भी कहा था कि वह इस बार सौंदर्य को छुपा कर के आई है क्यों जिससे कि जो दुष्ट लोगों की नजर उनके ऊपर में पड़े तो दुष्ट लोगों को ही पाप का भागीदार होना पड़ेगा तो उनके मन में पाप जागृत ना हो उनको भुगतना ना पड़े पाप से इसकी वजह से मां ने अपना सौंदर्य छुपा कर के आई है तो इसलिए मां ऐसा कहती है यहां पे देखिए कि एक फुटनोट भी है गंभीरानंद जी फुटनोट में क्या लिखते हैं ही संबंध तीनी एक दिन बोलिया लेन इसी सौंदर्य के बारे में ही मां ने एक बार कहा था आगे आमार की ही रकम रंग छीलो आगे क्या मेरा इस तरह का रंग था व बुखार होकर के मलेरिया होकर के मां का शरीर का रंग बड़ा ही मलीन हो गया था इसलिए मां कहती है कि आगे में क्या मेरा इस तरह का रंग था खूब सुंदर लू मैं बड़ी ही सुंदर थी आमी प्र हमें बेशी मोटा लूम ना पहले पहले में इतनी मोटी नहीं थी शेश ठाकुरे देहो त्यागे पर मोटा होए लूम आखिर में ठाकुर की महासमाधि के बाद में मैं थोड़ी मोटी हुई थी थोड़ा सा वेट बड़ा था तो इसीलिए मां यहां पर ऐसा कहती है गा थे के आंचल खोश बाता से उड़े उड़े पड़ छे कोनो होशना शरीर के ऊपर में से उनका आंचल हवा में उड़ उड़ता जा रहा है मां कहती है मेरे मन में कोई भी होश नहीं थी यहां पर ठाकुर आकर के चले गए देह के ऊपर में से आंचल हवा में उड़ रहा है मां कोई भी तरह का कुछ भी मां को कुछ पता नहीं है मन संपूर्ण रूप से निवाद निष्कपट शिखा की तरह मां का मन एकदम एकाग्र हो गया है छले जोगन शेदीन ठाक रेर गाड़ू दते गए अर आमा के वही अवस्थाई देखे छलो ये छले जोगन उस दिन ठाकुर का लोटा लेकर के साथ में गया था उसने मुझे उस अवस्था में देखा था छले जोगन यानी कि हमारे योगेन महाराज स्वामी योगानंद ये दोनों का नाम योगेन यहां पे योगेन महाराज वहां पे योगेन मां तो मां जो योगेन महाराज को छले जोगन करके पुकारती थी छले यानी कि लड़का तो यह लड़का योगेन और वह योगेन मां को मां कहती थी मैं ये योगेन अर्थात कि लड़की योगेन तो यह छले जोगन अर्थात कि अपने योगानंद जी महाराज तो ठाकुर वहां पर शौच के लिए जाएंगे तो शौच को फिर साफ क्लीन करने के लिए व जो पानी चाहिए लोटे में तो यह लोटा भर कर के पानी लेकर के यह योगन महाराज गए थे झावतला उन्होंने मां को उस अवस्था में देखा था शे शब की दिन किए छे मां वो सब क्या दिन गए है मां वो जैसे मां ने कहा स्त्री को उद्देश्य करके कह रहे हैं तो इसलिए मां ऐसा कहती है कि वोह सब क्या दिन गए हैं जो छना राते चांद पाने ताकि जोड़ हाथ कोरे बोले छी जोचना रात अबार वही जोचना शब्द जोचना रात को चांद की ओर देख कर के दोनों हाथ जोड़ कर के मैं कहती थी तोमार ई जोनार मतो आर अंतर निर्मल करे तुम्हारी इस चांद का जो प्रकाश है चांद का जो आलो है वह कितना सुंदर शुभ्र और निर्मल होता है तो यह शुभ्र और निर्मल चांद के प्रकाश की तरह मेरा मन अंतर मन भी निर्मल कर दो आहा तखन की मन छलो अर आहा उस समय क्या मेरा मन था बृंदे जी एक दिन अर सामने एकटी काशी ठेला मेरे दिले आमार बुकर मध जनो ऐसे लागलो वृंद जीी यह वंदे जीी के बारे में हमने कल भी देखा था वैसे तो काफी सेवा करती थी किंतु उसका नेचर थोड़ा सा अग्रेसिव और थोड़ा सा कुट स्वभाव वाली भी थी तो उसने मां के सामने एक कांसी जो होती है कलश जो होता है उसको पैर से धक्का मार के गिरा दिया था तो यह जो जिन लोगों का मन एकदम शांत एकाग्र पवित्र निर्मल हो जाता है उनको इस तरह का जो बड़ा आवाज भी होता है ना तो उनके सीने में जैसे कि बड़ा आघात होता है तो जैसे ही यह वृंदा ने एक अपना पैर का धक्का मार कर के लात मार कर के ये कलश गिरा दिया उससे जो आवाज हुई तो मां कहती है अमार बू केर म जैनो ऐसे लागलो मेरे सीने में जैसे कि इसकी आवाज आक के टकराई ऐसा लगा जैसे मेरे सीने पर किसी ने आघात किया हो तो इस तरह का मां का मन निर्मल और एकाग्र हो गया था दक्षिणेश्वर में श्री मां तो खन संपूर्ण ध्यान मग्न छिले ताई बायरे ई बिकट शब्द तहर प्राण बज्र निर् घोष सदृश बाजिया छीलो तीनी कादिया फेलिया छिले मां ने ऐसा तो और कुछ नहीं कहा कि वृंदा ने जब कलसी को लात मार के गिरा दिया माने तो सिर्फ इतना कहा कि मेरे सीने में आघात हुआ ऐसा मुझे लगा किंतु यहां पर गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि मां उस समय संपूर्ण ध्यान मग्न थी और इसीलिए बाहर का यह जो विकट शब्द उनके प्राण में वज्र निर् घोष सदृश वज्र का जो पड़गा होता है व वज्र की जो गर्जना होती है उसकी तरह उनके सीने में उसकी आघात हुआ था और वह रो पड़ी थी और यहां पर इससे आगे कुछ नहीं लिखा किंतु हमको पता है कि जैसे ही मां रो पड़ी वैसे ही ठाकुर अपने कमरे में थे दौड़े चले आए एक एकदम मतलब कि क्या हुआ मां को ऐसा बड़े ही अधीर होकर के दौड़ के चले आए वहां पर नबत में मां की खबर रखने खबर लेने के लिए तो देखिए कि इन दोनों के बीच में किस तरह का प्रेम है यहां पर ठाकुर जाते हैं तो मां भले ही चाहे वह जप कर रही है ध्यान कर रही है और यहां पर तो मां ने ऐसा लिखा है कि एक दिन के बारे में में कि उस दिन मेरा मन बड़ा ही एकाग्र हो गया था किंतु हमको पता है कि मां जब भी जप करेगी ध्यान करेगी मां के मन को तो एकाग्र होना ही है जगत की ओर से मन मन को वापस आकर के इष्ट के पाद पद्म में उसको तो अर्पित होना ही है इसके बावजूद जब भी ठाकुर जाते हैं तो ठाकुर के जूतों की जो आवाज है वो मां को अवश्य सुनाई देगी जैसे वह ईश्वर के बारे में कहते हैं ना कि चींटी के पायों की जो चींटी के पैरों में जो पायल की आवाज है वह भी ईश्वर को सुनाई देती है यानी कि जो भक्त है भक्त जद बड़े ही कोईकोई लोग कहता है कि मुझे बड़े चिल्ला करके चीख करके प्रार्थना करनी पड़ेगी किंतु यदि आप अपने मन में भी प्रार्थना करें तो वह प्रार्थना भी ईश्वर सुनते हैं तो एकदम मृदु शब्द क्यों ना हो इष्ट का वह भक्त के कान में उसको जाना ही है और भक्त कितने ही मृदु स्वर से इष्ट को प्रार्थना ना क्यों ना करें इष्ट को तो वह सुनना ही है तो यहां पर देखिए कि ठाकुर वहां पर जाते हैं तो उनके जूतों की आवाज भले ही चाहे मां का मन कितना ही जब ध्यान में एकाग्र क्यों ना हो वो जूतों की आवाज तो मां को सुननी ही सुननी है तो वैसे ही रिवर्स भी इतना सत्य है मां जैसे ही चित्कार करके रो उठी साथ-साथ में ही ठाकुर दौड़ कर के आए यह खबर लेने के लिए कि मां को क्या हो गया है देखिए कि दो तन एक प्राण इस तरह से यदि किसी के बारे में कहना है तो यह ठाकुर और मां के बारे में दोनों का जो ट्यूनिंग है दोनों के मन की जो हार्मोनी है वो कितनी परफेक्ट है एक को कुछ होता है तो दूसरों को इमीडिएट उसके मन में आघात जैसा लगता है वह दौड़ कर के आता है कि क्या हुआ तो यहां पर भी इन दोनों का जो दिव्य संबंध है मधुर संबंध है मधुर प्रेम है उसका एक हमको एक अल्प रूप से झांकी हमको मिलती है आगे गंभीरानंद जी कहते हैं ध्यान भजना आदिर फले श्री मायर मन जतोग होइत थाकि लो अच्छा यह जो ध्यान करने के समय यह जो आवाज जो होती है उससे हमारा मन विक्षिप्त हो जाता है व उसके बारे में और एक घटना है हमको पता है बड़ी ही फेमस घटना कि स्वामी जी उस समय दक्षिणेश्वर में ध्यान करने को बैठते थे तो क्या होता था कि दक्षिणेश्वर के पास में ही एक फैक्ट्री है एक मिल है और उसका जो विसल है वह बीच-बीच में बचता रहता था तो स्वामी जी कहते हैं कि मेरा मन येय जितनी भी बार विसल बजेगी यह मिल का यह जो बजेगा वो सायरन उससे मेरा मन विक्षिप्त हो जाता था तो ठाकुर ने क्या कहा था नरन को कि उसी के ऊपर में यह विसल या सायरन है उसी के पर में मन को एकाग्र करो देखो कि यह विक्षेप जो है वह तुम्हारे साधन में सहायता बनकर हो जाएगा खड़ा तो स्वामी जी कहते हैं कि मैंने ऐसा किया और साथ में ही मुझे बड़ा ही अच्छा सुपरिम इस अभ्यास से मिला तो वो एक रिलेटेड घटना है अच्छा आगे

प्रसंग: माँ ठाकुर से ईश्वरीय-भाव मांगती हैं

गंभीरानंद जी कहते हैं ध्यान भजना आदिर फले श्री मायर मोन जोतो ही अंतर्मुखी थाकी लो एवं दक्षिणेश्वर ठाकुरे भक्त देर म तिनी ज तोई विभिन्न भावे विकास देखीते लागी लेन ततो ई तहर निज निज जीवन ओ उहा पाई बार आग्रह बाड़िया चली लो ध्यान और भजन के परिणाम से मां का मन जितना ही अंतर्मुखी देखती थी कि ठाकुर और ठाकुर के भक्त इनमें विभिन्न तरह के भावों का विकास दिख रहा है तो जैसे ही मां मां का मन अपने खुद के साधन भजन की वजह से अंतर्मुखी ओर ठाकुर में और ठाकुर के भक्तों में जो भाव का विकास देखती है आध्यात्मिकता का यह जो प्रोजेक्शन देखती है वो देख कर के मां को भी लगा कि मेरे जीवन में इस तरह का भाव इस तरह का समाधि इस तरह का आनंद वो मुझे भी अपने जीवन में चाहिए तो मां का उसको पाने के लिए आग्रह बढ़ता गया विशेष तो गौरी मार भाव और प्रेम दर्शन है तहारो तहा राओ मने ओरू भाव और प्रेम ला भेर आकांक्षा जागी लो गौरी मां खास करके जो वहां पर आती थी और उनका जो भाव और प्रेम दर्शन मां ने देखा तो देख कर के मां को लगा कि मुझे भी इस तरह से चाहिए अभी देखिए कि गौरी मां है या तो यह लक्ष्मी दीदी है वगैरह के बारे में क्या है कि ठाकुर गौरी मां के बारे में तो नहीं किंतु एटलीस्ट लक्ष्मी दीदी लक्ष्मी दीदी के बारे में ठाकुर ने कहा है कि इन लोगों के मन में ना लज्जा या शर्म इतनी नहीं है तो वह लज्जा और शर्म से आवृत रखना रहना वो ठाकुर ने मां को कहा था बड़ा ही स्पष्ट रूप से और मां का खुद का स्वभाव ऐसा था और किंतु यह भाव वगैरा एक ऐसा चीज है ना वह भाव में जदी आप आ जाएंगे तो ये लज्जा शर्म जैसा कुछ रहेगा नहीं देखिए भाव तो छोड़ ही दीजिए ऊपर वाले प्रसंग में ही देखिए कि मां जैसे ही ध्यान में चली गई तो देह के ऊपर में से आंचल उड़ कर के जा रहा है वह छले योगेन योगेन महाराज उनको देख रहे हैं इस अवस्था में यह बात भी मां को पता नहीं है तो जद भाव जदी होने लगा तो क्या होगा वह तो कहना मुश्किल है तो यहां पे किंतु देखिए कि मन में तो एक ऐसी आशा होती है कि बाकी सबको यदि भाव होता है व ईश्वर के प्रति प्रेम इतना परिस्परों नहीं मिलता तो इसलिए सेही जनन एक दिन लक्षी देवी द्वारा ठाकुर के अनुरोध कोराई लेन किंतु ठाकुर बोली लेन श काली घटेर में ओ सब ओ सज्ज करते पारवे और ठाकुर ने एक दिन माने लक्ष्मी दीदी को कहा कि तुम जाकर के ठाकुर को कहो कि मुझे भी इस तरह का भाव हो तो ठाकुर ने लक्ष्मी दीदी के द्वारा मां को यह कह कर के रिप्लाई दिया कि गौरी मां काली घाट की व काली घाट की वो लड़की है उसको यह सब भाव वगैरह सह सहन कर पाएगी किंतु तार पखे गोपने थाका भालो किंतु मां के लिए छुप कर के रहना गोपन में रहना वो अच्छा है अबला अबला वृद्धि अबला अलाय सिद्धि अबला जो है यानी कि जो स्त्री है उसका उसका जो सार्थक है स्त्री जीवन का व स्त्री जीवन में ही है जो स्त्री है उसको स्त्री होकर के रहने में ही उसकी सिद्धि है स्त्री लोग धीर नम्र भावे थाक बे स्त्री लोग धीर और नम्र भाव में रहे लज्जा ई तार धर्म लज्जा ही उनका धर्म है नले लोके ता के निंदा करब ना होले जद लज्जा वगैरा चली जाएगी तो लोग उनकी निंदा करेंगे देखिए कि मां और ठाकुर इन दोनों के बीच में एक तरह का एक कॉमन थीम है मां खुद लज्जा शीला थी और ठाकुर उनकी लज्जा रक्षा करने के बारे में उनको उपदेश भी देते थे किंतु यही लक्ष्मी दीदी जो कि बाद बाद में देखेंगे कि पुरुष भक्तों के सामने कीर्तन भी करती थी पुरुष भक्तों के साथ में तीर्थ यात्रा भी करती थी और यही जैसे कि गौरी मां वह सन्यास लेकर के वह पहले से ही वह वो अपना घर छोड़ कर के चली गई थी सन्यास कहीं से लिया था बाद में आश्रम की स्थापना की थी वह इधर-उधर जाती भी थी यानी कि उनका एक अग्रेसिव स्वभाव था तो देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि वह सब लोगों की बात छोड़ दो व कालीघाट की स्त्री है यह कालीघाट में जन्म हुआ है कालीघाट की वह लड़की है गौरी मां तो उसके जैसा होने को मत जाओ वहां पर जिनका जन्म होता है जो काली घट के हैं उनको यह भाव वगैरह सहन हो जाता है उनका स्वभाव इस तरह का होता है कि वह जगत के साथ में लड़ कर के रह सकते हैं जबकि मां का जो स्वभाव है मां का जो पूरा जीवन आदर्श है उसको ठाकुर ने मातृ भाव में डायरेक्ट करने के बारे में सोचा था तो यदि भविष्य में मां के जीवन में मातृ भाव का पूर्ण प्रकाश होना है तो यह अगले जीवन में युवावस्था में मां के जीवन में लज्जा ही का सर्वश्रेष्ठ आभूषण होना चाहिए तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि स्त्री लोक धीर और नम्र भाव से रहेगी लज्जा ही उनका धर्म है यदि लज्जा नहीं होगी तो लोग उनकी निंदा करेंगे श्री मायर ध्यान न ध्यान तन्मयता आमरा बहु बार देखिया छी मां की ध्यान तन्मयता हमने बहुत बार देखी है ई संगे अपरे एमन की तहर नि जेरो अगोचर भाभर बही प्रकाश होई तो कीना जाना नाही मां की ध्यान तन्मयता तो हमने बहुत देखी है किंतु साथ-साथ में ही मां के जीवन में क्या भाव का बही प्रकाश होता था कि नहीं उसके बारे में हमको ज्यादा कुछ पता नहीं है मान लीजिए कि लोगों को ना पता हो कि मां के जीवन में इस तरह से भाव का प्रकाश होता है कभी-कभी ऐसा होता है कि मां को खुद को शायद पता ना हो कि उनके मन में या तो उनके आचरण व्यवहार में भाव का प्रकाश हो रहा है क्योंकि वैसे ही मां यह भाव को इस तरह से छुपा कर के रखती थी कि कभी यह भाव प्रकट हो भी गया तो दूसरों को तो हो सकता है ना पता चले हो सकता है कि मां को खुद को पता नहीं चला कि इस तरह से भाव प्रकट हो रहा है देखिए बात-बात का जीवन जब हम देखेंगे तो मां का बालिका भाव बड़ा ही स्पष्ट रूप से हमको कभी-कभी देखने को मिलता था बाद बाद में मां इस तरह से भाव को इतना छुपाने का प्रयास नहीं करती थी वो इस तरह की कितनी ही घटनाएं हमने देखी है जैसे कि जीवन के आखिरी समय में वो शरत महाराज को बुला कर के कहती है कंप्लेन करती है बालिका की तरह कि यह लोग इस तरह का खाना खिलाते हैं थर्मोमीटर बार-बार देते हैं टेंपरेचर वगैरह के लिए मुझे यह सब नहीं करना तब वह शरत महाराज जैसे बिल्कुल एक बच्ची को समझाते हैं उस तरह से मां के साथ में व्यवहार करते हैं वो गौरेश्वर नंद जी महाराज राममय महाराज राममय महाराज के साथ में रोटी वो बेलने की वह घटना वोह रामई महाराज की रोटी अच्छी है ऐसा जैसे ही नलिनी ने कह दिया मां बड़ी नाराज हो गई वह बच्ची की तरह वह रोटी बेलना बंद कर दिया कहा कि यह राममय तो दो दिन का बच्चा है उसका गला दबाओगे तो दूध निकलेगा और मैं अभी रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई और तुम कहती हो कि यह राममय मेरे से अच्छी रोटी बेल रहा है जाओ मुझे रोटी नहीं बेलनी तो यह राममय महाराज वहां पर बाद में लिखते हैं कि मैं आज 80 बरस का हो गया यह जो कहानी राममय महाराज बताते हैं उस समय उनकी उम्र थी 80 साल की और यह सब घटनाएं तब हुई है जब कि राममय महाराज स्कूल में पढ़ते थे तो राममय महाराज आखिर आखिर में कहते हैं कि आज मेरी घटना मेरी उम्र 80 साल की हो गई है और आज मेरे मन में प्रश्न होता है कि मां का इस तरह का बालिका भाव क्यों प्रकाश होता था तब कहीं वह कहते हैं कि मैं शास्त्र पढ़ कर के मुझे भी समझ में आया है कि इसी तरह से जो देवता होते हैं उनके मन में भाव का खेल एक तरह से चलता रहता है जिससे कि उनके जो अनुग होते हैं उनके शिष्य होते हैं उनका जीवन भी इस भाव का दर्शन करके भाव का पान करके निर्मल और पवित्र हो जाए तो हमारे मन को निर्मल और पवित्र करवाने के लिए उनके जीवन में भाव का प्रकाश है किंतु यह जो भाव का प्रकाश मां के जीवन में दिख रहा है वह तो बहुत बाद की बात है जो दक्षिणेश्वर के दिन है मने रेयरली किसी ने देख मां को तो कोई देखता ही नहीं था लोगों की नजर के सामने आती ही नहीं थी और उसमें भी जद यह भाव का प्रकाश यह तो कम मुश्किल देखिए भाव का

प्रसंग: गंगा माई का भाव और ठाकुर के साथ उनका दिव्य-प्रेम

प्रकाश होने से क्या होता है अ ठाकुर उस समय काशी गए थे काशी न के वृंदावन दोनों में एकएक ही घटना है वहां पे एक गंगा माई रहती थी तो गंगा माई को भाव होता था और ठाकुर का भी उनके साथ में बड़ा अच्छा एक रिलेशन बैठ गया मैंने दोनों साधक है साधना के बारे में बात करते हैं तो ठाकुर ने कहा कि मैंने ठीक कर लिया कि बस अभी भी मैं यहीं पर रह जाऊंगा गंगा माई के साथ में अभी मैं दक्षिणेश्वर जाऊंगा नहीं मथुर बाबू के साथ में वहां पर जाना नहीं है कितने दिन यह कै वर्त का अन्न खाएंगे मथुर बाबू कै वर्त तो ठाकुर के मन में देखिए ठाकुर ने सब तरह की साधना कर ली अपने बालों से वो जो है उसका लेटन क्लीन कर लिया जनोई वगैरह सब उठा कर के फ लिया किंतु यह जो संस्कार का जो एक ऐसा होता है ना वोह ठाकुर ने कहा कि यदि रात को एक दुस्वप्न देखा है तो जद नींद खुल गई तो फिर भी हमारा जो हृदय है वो धकधक करता है वो एक संस्कार की एक रेखा जैसा रहता है तो यहां पर भी ठाकुर कहते हैं कि कितने दिन यह तो कै वर्त यानी कि नीची जाती है यह मथुर बाबू की कितने दिन उनका अन्न खाएंगे यहीं पर मैं रह जाता हूं गंगामाई के साथ में और सब ठीक हो गया है कि मेरा जो रहने की मेरा जो सोने की जगह यहां पे होगी गंगा माई सोने की जगह यहां पर होगी यहां से इस तरह से खाना बनाएंगे यह सब करेंगे सब ठीक हो गया है यहां पे किंतु मथुर बाबू और हृदय चिं चिंता में पड़ गए हैं कि ठाकुर सही में यहां पर रह जाएंगे तो कैसे चलेगा मथुर बाबू के इष्ट है और जो हृदय जो उनकी सेवा करता है तो ठाकुर को छोड़ कर के दक्षिणेश्वर वापस जाए ऐसा कैसे हो सकता है तो दोनों बड़े टेंशन में आ गए हैं फिर दोनों ने मिलकर के एक प्लान किया कि ठाकुर को कहा कि आपकी मां चंद्रा मणि देवी तो दक्षिणेश्वर में है उनको छोड़ कर के क्या आप यहां पर रहेंगे तो मातृ प्रेम एक ऐसा है कि गंगामाई का आकर्षण पवित्र तीर्थ यात्रा तीर्थ स्थान का आकर्षण ये ईश्वरीय चर्चा सतत करते रहने का आकर्षण उसको छोड़ कर के ठाकुर ने कहा कि नहीं मां वहां पर है दक्षिणेश्वर में तो मुझे वापस जाना होगा तो यह गंगामाई जो है तो गंगामाई को भाव होता था और एक बार इस तरह का भाव हुआ कि वह भाव में आकर के हृदय की पीठ के ऊपर में चढ़ गई थी तो यह क्या है कि दिव्य भाव का जब यह होता है जब आविर्भाव होता है तो यह सब होता है तो देख लीजिए कि मां के जीवन में जद ऐसा कुछ हुआ होगा तो कितना भयानक एक हो जाता तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि स्त्री के लिए लज्जा ही उनका धर्म

प्रसंग: गोपाल की माँ का भाव और ठाकुर के साथ उनका दिव्य-प्रेम

है ये देखिए कि आश्चर्य की बात है ठाकुर बाकी जो सब स्त्रियां है जैसे कि यह गोपाल की मां है अघोर मणि देवी उनके जीवन में भी देखिए कि गोपाल को लेकर के उनमें कितना भाव होता था कैसे वह दौड़ी-दौड़ी अपने घर से दक्षिणेश्वर आई थी अपनी गोद में बाल गोपाल है देख रही है स्पष्ट अपनी नजरों से देख रही है कि मेरी गोद में यह बाल गोपाल बैठा है ठाकुर के पास में आकर के पागल की तरह ठाकुर के पास में दौड़ी आई और जैसे ही ठाकुर के पास में आई ठाकुर को भी भाव हो गया और भाव में बिल्कुल बाल गोपाल की तरह वो अघोरम देवी की गोद में जाकर के बैठ गए तो यह बाकी जो सब स्त्रियां थी उनके जीवन में भाव का बही प्रकाश उससे ठाकुर संतुष्ट ही होते थे उससे कहीं नाराज नहीं होते थे गंगामाई के जीवन में भाव गौरी मां के जीवन में भाव यह अघोर मणि देवी के जीवन में किंतु जहां जब मां शारदा देवी का प्रश्न आता है ठाकुर बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि नहीं लज्जा ही उनका सर्वश्रेष्ठ आभूषण है तो यहां पर किंतु गंभीरानंद जी महाराज हमको जो कहते हैं प्रसंग उसमें कहते हैं कि क्या वह मां के जीवन में कभी भी भाव नहीं हुआ मने ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों को पता ना चला हो किंतु मां को भी क्या शायद पता ना चला हो ऐसा हुआ है क्या तो इसके बारे में फिर पूरा एक लंबा प्रसंग है जिसको कि अभी हम कल देखते हैं आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ना उसका रीजन यह है ना देखिए वह जो

प्रश्न: हमारे संघ में हम वरिष्ठ साधुओं में भाव बहुत कम देखते हैं। साधु बहुत रेशनल और ज्ञानी होते हैं।

नृत्य गोपाल था ठाकुर का शिष्य वह भाव में आकर के चेहरा लाल हो जाता था नृत्य कीर्तन जब होता था उस समय तो ठाकुर ने उसको क्या कहा था कि साधु सावधान व मने वो क्या है एक स्त्री के चक्कर में पड़ गया था तो अभी स्वामी जी ने खुद ने कहा कि यह जो जो नृत्य कीर्तन के समय जिनको बहुत ज्यादा भाव होता था ना मैंने बाद में उन सबका वो इन्वेस्टिगेशन नरेंद्र तो इन्वेस्टिगेशन वाला आदमी था ना तो वो इन्वेस्टिगेशन करके देखा कि जब भाव में जाते तो बड़े ऊपर में चले जाते हैं किंतु बाद में उतना ही चरित्र का पतन होता है माने चरित्र का पतन वो आध्यात्मिक दृष्टि से इस तरह के लोग जो है समाज में तो बड़े ही वो रिस्पेक्टेड कहे जाएंगे किंतु ये जो ब्रह्मचर्य पालन है वो ब्रह्मचर्य पालन की दृष्टि से उनके जीवन में तकलीफ होती है तो इसके लिए ठाकुर कहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन ही है त्याग त्याग को छोड़ कर के और कुछ भी करोगे तो वह तकलीफ में जाओगे तो मां को जो लज्जा का उपदेश दिया बेसिकली वो त्याग का उपदेश है कि भाव का प्रकाश ज्यादा होने से यदि फिर एकाएक मन उस तरह से कामना वासना में चला गया तो क्या तो इसके लिए सबसे पहले त्याग की चिंता करो भाव की चिंता बाद में करो तो यह अपने संघ में भी देखिए कि ये जो मधुर भाव वगैरह जो भजन वगैरह देखेंगे कि वरा नगर मठ में चलते थे किंतु बाद बाद में स्वामी जी ने सब बंद करवा दिया कहा कि शिव के भाव से अपने मन को भर दो त्याग का भाव अपने मन में वेदांत का भाव लेकर आओ क्यों क्योंकि त्याग फाउंडेशन है ब्रह्मचर्य फाउंडेशन है आध्यात्मिक जीवन का बाकी सब होगा नहीं होगा कोई फर्क नहीं पड़ता वो जैसे वह एक कहां पे जा रहे थे एक साधु को देखा बैठे हुए खाट के ऊपर में तो ठाकुर उसके साथ में गप लगाने को चले गए बाद में जब जा रहे हैं वहां से तो ठाकुर कहते बड़ा ही रुखा सुखा साधु है तो वो राम चंद्र दत्त ऐसा कोई कमेंट करता है उनके बारे में साथ-साथ में ठाकुर कहते हैं किंतु त्यागी किंतु वह त्यागी है गृहस्थ चे अनेक अनेकता एय बेड़े से यानी गृहस्थ लोगों से तो बहुत आगे बढ़ गया है यानी कि त्याग ही है ब्रह्मचर्य ही है फाउंडेशन ये इस्कोन वगैरह की जैसे आपने बात की तो अभी वहां पर तो आप समझ ही सकते हैं कि ब्रह्मचर्य का कोई इतना यह नहीं है इंपोर्टेंस होगा भी तो वो लिप सर्विस देते होंगे तो इसके लिए ब्रह्मचर्य के उसमें भंग ना हो इसके लिए यह सब या तो छुपा के रखना या तो फिर बाह्य प्रकाश नहीं होने देना इसके लिए किंतु ये जो रेशनल की बात करते हैं ठाकुर भी तो कम नहीं थे ना ठाकुर ने कहा भक्त होवी बोका होवी केनो मैंने भक्त होना है मूर्ख क्यों होना है वोह जो बाबूराम महाराज ना कि कोई वो जाकर के वो फूटा हुआ पात्र खरीद के ले आए तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही डांट दिया वो तो कहता है दुकान वाला धर्म करने को थोड़ी ना बैठा है उसने तुम दे दिया कि अच्छा है बोलक तुमने भी बिना टेस्ट किए लेके आए वो वो छाते के बारे में मास्टर महाशय छाता छोड़ के आते हैं वह पंचवटी पर तो ठाकुर कहते हैं मेरा वस्त्र भी नहीं रहता मैं संभाल नहीं पाता हूं दिगंबर होकर रहता हूं फिर भी मैं कभी छाता नहीं भूलूंगा और तुम लोग गृहस्थ और छाता भूल जाते हो तो ये रेशनल का जहां तक प्रश्न है ठाकुर भी कम नहीं थे देखिए भाव को इरेशनल कभी नहीं कहा जाएगा ट इज भाव इज नॉट इरेशनल भाव इज एक्सप्रेशन ऑफ लव भाव इज एक्सप्रेशन ऑफ साधना हायर एक्सप्रेशन ऑफ साधना इट हैज नथिंग टू डू विद इरेशनलिटी जहां तक त्याग है वहां पर रेशनल है और त्याग है तभी सही सही भाव होगा वरना तो जो भाव होगा वो क्षण भंगुर होगा और फिर जैसे नरेंद्र का इन्वेस्टिगेशन था भाव का प्रकाश के बाद में एकदम गड्ढे में गिरता है

प्रश्न: यदि हमारे पास त्याग है तो भाव का होना या न होना कोई मायने नहीं रखता, है न?

आदमी ना बिल्कुल ठीक हैय शरत महाराज मां के पास में जाकर कंप्लेन करते हैं शरत महाराज कहते हैं अच्छा आज सुनता हूं आए दिन सुनता हूं कि भक्तों को दर्शन हो रहा है ठाकुर के मुझे कुछ दर्शन नहीं होता तो मां बाद में कहती है उसको दर्शन की क्या जरूरत है देखे सुने आंल होए बसे आज मने सब देख कर के सुन कर के बढ़िया मस्त हो कर के बैठा है क्या जरूरत है दर्शन की शरद महाराज जैसे शरद महाराज कंप्लेन करेंगे तो हम किस खेत की मूली [हंसी]

प्रश्न: स्वामीजी के जीवन में भाव का प्रकाश

है यह जो आप उस दिन की बात कर रहे हैं इतना तो मुझे इतना याद नहीं आता स्वामी जी रोने लगे थे निश्चय कि जब योगेन महाराज ने जब आर्गुमेंट करना शुरू किया कि यह तुम यह सब क्या कह रहे हो के भाव के अनुसार नहीं है तो स्वामी जी एकदम रो पड़े थे रो कर के छत के ऊपर दौड़ कर के चले गए थे फिर राजा महाराज जाकर के उनको शांत करके लेकर आए किंतु स्वामी जी ने यदि ऐसा कहा है कि मैं अपने भाव को कितना कंट्रोल में रखता हूं तो वह तो मुझे याद नहीं है किंतु यह जो आपने इन जनरल कहा कि स्वामी जी के जीवन में आखिर आखिर में यह भाव प्रकट होने लगा था यह प्रारंभ तब वह अमरनाथ यात्रा से हुआ जो निवेदिता और ओली बूल और जोसेफाइन मैक्लाउड इन तीनों को लेकर के काश्मीर की यात्रा करने को गए थे उसके बाद में निवेदिता को लेकर के अमरनाथ गए अमरनाथ में स्वामी जी को एक दर्शन हुआ और स्वामी जी बाद में आकर कहते हैं मुझे इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ है और फिर वहां से जब वापस आए तो सबको छोड़ कर के स्वामी जी अलग से निकल गए थे उस तपस्या और साधना करने के लिए तो वह जो दिनों का वर्णन है ना निवेदिता बड़ा ही सुंदर रूप से वो लिखते है वांडरिंग स्वामी विवेकानंद व जो जो किताब है उसमें मा मास्टर एज आई सो हिम दो दो में से एक किताब में लिखा है उन दिनों का बड़ा ही सुंदर वर्णन है कहती है कि जब स्वामी जी वापस आए ही वाज ऑल मदर बस मां के ऊपर में संपूर्ण भरोसा करके वह घटना भी हुई थी कि वह खीर भवानी में गए थे मां का भग्न मंदिर देखा मां को कहा कि अरे मैं यदि होता तो यह लूटर को मंदिर तोड़ने ना देता तब मां ने उनको क्या कहा आ कर के कि बेटा तुम मेरी रक्षा करोगे कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी ये मेरी ही इच्छा से मंदिर बना है मेरी इच्छा से मंदिर टूटा है तुम लोगों का क्या है तो फिर वो स्वामी जी का जो भीतर में था कि रामकृष्ण संघ की स्थापना करनी है वेदांत का योग का फैलाव करना है वह सब धीरे-धीरे करके वहां से जाने लगा और जब स्वामी जी इन लोगों के जो तीनों लेडी डिवटी थी उनके पास में जब आए तब निवेदिता लिखती है कि नाउ ही इज ओल मदर उनका पूरा चरित्र जैसे कि परिवर्तन हो गया है पहले जो आर्गुमेंट करते थे डिबेट करते थे अग्रेसिव थे वह सब जैसे कि चला गया है और फिर जब स्वामी जी बेलूरमठ वापस आते हैं तब य शरद चंद्र चक्रवर्ती उठा लेता है इस थ्रेड को व जब एक दिन मठ में जाता है तो राजा महाराज बुलाते हैं बड़े चिंतित दिख रहे हैं राजा महाराज और कहते हैं कि जब से स्वामी जी अमरनाथ से आए हैं बिल्कुल अंतर्मुखी के साथ बात नहीं करते और ठाकुर ने तो हमको कहा है कि ज जिस दिन उनका जो स्व स्वरूप है समझ में आ जाएगा तो शरीर नहीं रखेंगे तो ऐसा ज्यादा होगा तो स्वामी जी चले जाएंगे तुम जाओ जाकर के उनके साथ बात करो मन को जमीन प लेके आओ उनके तो व शरद चंद्र जाता है फिर स्वामी जी के साथ में बच्चों की तरह सब इधर उधर की बातें करता है तो धीरे-धीरे करके स्वामी जी फिर उसके साथ में बात करना शुरू करते हैं फिर यह शरद चंद्र राजा महाराज को आके बोलता है कि हां स्वामी जी ने फिर से बात करना शुरू किया है तो वो जो वो जोने स्वामी जी जो खुद कहते हैं कि एक समय था जब मेरे मन में यह था पूरा वर्ल्ड मिशन दुनिया को परिवर्तन कर देना ठाकुर माहा स्वामी ठाकुर का मैसेज जगत में फैलाना वगैरह किंतु जब आखिर आखिर में जोसेफाइन मैक्लाउड को पत्र लिखते हैं क्या लिखते हैं मैं फिर वही नरेण हो गया हूं जो कि पंचवटी में ठाकुर के श्री चरण के पास में बैठ कर के मंत्र मुग्ध होकर के उनकी वाणी सुन रहा हूं वही नरेण हो गया हूं जो कि भारत की ये जो पहाड़ नदी जंगल एक तपस्वी की तरह घूमता फिरता था साथ में कुछ भी नहीं था तो वो जो स्वामी जी के जीवन का जो आखिरी परिवर्तन आया अभी भाव का प्रकाश तो मुझे पता नहीं स्वामी जी के जीवन में बड़ा ही रेर दिखता है भाव का प्रकाश किंतु ये जो अंतर्मुखी वो सब वो अमरनाथ गुपा से स्टार्ट हुआ है दैट इज अ टर्निंग पॉइंट इन स्वामी जीस

प्रश्न: हमारे लिए कौन से स्वामीजी आदर्श होने चाहिए - प्री अमरनाथ या पोस्ट अमरनाथ?

लाइफ यंग देखिए हमारे जीवन में भी तो टर्निंग पॉइंट आते हैं टर्निंग पॉइंट से बिफोर में प्री अमरनाथ होना चाहिए बाद में पोस्ट अमरनाथ क्योंकि क्या है एक बार यह सब कर लेना होता है ठाकुर ने खुद कहा था कि मेरे मन में वासना थी कि मैं भक्तों का राजा होऊंगा किंतु फिर वो गिर गए हाथ में फैक्चर हो गया तब ठाकुर कहते अभी देखता हूं जैसे इसके भीतर में दो ही है उनके देह के भीतर में एक मां है एक मां का संतान है और अभी कुछ नहीं बचा है तो एक बार यह सब एक एंबिशन रख कर के साधन भजन शिव ज्ञान जीव सेवा एक बार कर लेना है भाई मनुष्य जीवन है रजस से भरा हुआ यदि हम कहेंगे कि रजस भी है तमस भी है और मुझे फिर एक आंतरिक आध्यात्मिक जीवन जीना है तो हम सीधे तमस में जाकर गिरेंगे बेटर है कि रजस को वर्क आउट कर ले फिर ऑटोमेटिक यह अपना मन यह सब चीजों में जाएगा किंतु आपको तो फिर संसार की भी

प्रश्न: आध्यात्मिक प्रवचन सुनकर हम गृहस्थों को भी सब कुछ त्यागने का मन करता है।v

चिंता करनी है यानी कि आपके पास में ऑप्शन नहीं है कर्म करना ही पड़ेगा यह सब ऑप्शन हमारे पास आते हैं वो बात सही है

प्रश्न: हम कर्म करते है मन मारके। किन्तु गृहस्थों का कर्म पूजा के रूप में करे तो हमारा जीवन परिवर्तित हो जाएगा

कि हां मतलब जैसे कि स्वामी जी ने कहा कि यह जो सेकुलर और स्पिरिचुअल इन दोनों में कोई यह नहीं होना चाहिए आपका किंतु वही बात है कि इफ पॉसिबल इफ एट ऑल पॉसिबल यह शिव ज्ञान से जीव सेवा अपने जीवन में होनी चाहिए क्योंकि दिस इज अ यूनिकनेक्ट होने को बोलेंगे आप बोलेंगे कि आप आश्रम में आइए काम कीजिए साधु सेवा कीजिए यह सब आपको बोलेंगे किंतु गरीब लोगों के प्रति दया दृष्टि रखना उनके भीतर में शिव को देख कर के तो यह एस्पेक्ट यदि डेवलप होता है ना तो वह सही सही में साधना हो जाए हमारे लिए किंतु रामकृष्ण मिशन का जेनेसिस ही

प्रश्न: अपने संघ में साधु सेवा या आश्रम सेवा का इतना महत्व नहीं. किन्तु और किसी आश्रम में जाएंगे तो साधु-सेवा या मंदिर में सेवा करना ही सबसे महत्वपूर्ण होता है. अपने यहाँ गरीबो की सेवा का ही प्राधान्य है.

डिफरेंट है वी आर रेडिकली डिफरेंट फिलोसोफी यहां पर गरीब और जो दुर्बल है जो पद दलित है उनकी सेवा पर सबसे ज्यादा भार है आजकल आप देखेंगे एक समय था कि रिलीफ एक्टिविटी होती है या तो फिर यह सोशल सर्विस एक्टिविटी होती है आश्रम की ओर से नियमित चलेगी और बहुत सारे लोग उसमें पार्टिसिपेट भी करेंगे किंतु आजकल मैं देखता हूं कई-कई आश्रमों में कि इस तरह की एक्टिविटी में भक्तो को कभी पार्टिसिपेट हो इस तरह का एक चैनल नहीं बनता है वह जो कर रहे हैं वह कर रहे हैं जो कुछ वॉलंटिज्म चाहिए जद मंदिर में जो भक्त आते हैं उनको अपॉर्चुनिटी देनी चाहिए कि वी विल टेक यू इन दैट विलेज यू टीच सम स्टूडेंट डू समथिंग फॉर देम तो यह जो चैनल है ना एक समय हुआ करती थी कि यह जो डिवोटा मिडल क्लास डिवटी या अपर क्लास डिवटी मंदिर में तो आते हैं किंतु फिर उनको यह कर्मयोग की ओर एक अपॉर्चुनिटी क्योंकि क्या है वैसे इमीडिएट वो लोग तैयार नहीं होंगे आपको उनको इंस्पायर करना पड़ेगा थोड़ा सा ट्रेनिंग देना पड़ेगा एक अपॉर्चुनिटी खड़ी करनी पड़ेगी ओनली देन यह सब होगा तो वो चैनल मुझे लगता है जैसे धीरे-धीरे करके ये खत्म हो रही है हां वो ठीक ही कह रहे हैं आप कि पहले

प्रश्न: अभी पहले की तरह अन्न दान की इतनी जरुरत नहीं. अभी चाहिए विद्या दान या ज्ञान दान

वह अन्नदान की जरूरत थी फिर यह जो जीवन दान या तो स्वास्थ्य दान वो तो अभी चल ही रहा है डिस्पेंसरी वगैरह चल ही रही है यह एजुकेशन यानी कि यह जो विद्यादान है वह भी चल रहा है तो नेचरली कि यह जो समाज जिस तरह से इवॉल्व होता है उसके साथ-साथ में यह सब एक्टिविटीज भी इवॉल्व होगी और स्वामी जी खुद प्रिडिक्ट करके गए हैं कि समाज के इवोल्यूशन के साथ में एक्टिविटीज को किस तरह से यह अपग्रेड करना है सो दैट इज नेचरली मेरा बस इतना ही कहना है कि जो डिवोटा यहां पर आते हैं दे शुड बी डायरेक्टेड टुवर्ड्स दिस एक्टिविटीज आल्सो तो जिससे कि क्या है कि उनकी साधना जो है उस साधना में उनको एक तरह का एक विकास प्राप्त हो क्योंकि दिस इज राम कृष्ण मिशन सेंट्रल आइडियो जीी शिव ज्ञान से जीव सेवा यदि हम कि ऐसा कैसा कुछ होने को जाएंगे कि मंदिर में काम कर रहे हैं 1015 डिवटी इकट्ठा होकर के कोई महिलाएं माला बना रही है कोई झाड़ू लगा रहा है तो वह सब चीजें बुरी नहीं है किंतु दैट इज नॉट अ सेंट्रल आइडियो जीी ऑफ रामकृष्ण मिशन दैट इज द मेन थिंग अभी ज जैसे मैं राजकोट में था तो वह बहुत कम मैंने वॉलंटस को देखा है कि वह डिस्पेंसरी में जाकर के कार्य करते थे सेवा देते थे बाकी जब मंदिर में काम करने की बात होती थी तो 203 लोग इजली मिल जाते थे तो यह सब जो है दैट इज बिट के हमको थोड़ा सोचने की जरूरत है सही बात है

प्रश्न: भक्तों को एक स्ट्रक्टर्ड एप्रोच चाहिए। प्रॉपर ट्रेनिंग हो और ठीक तरह गाइडेंस मिलता रहे की किस तरह सेवा करनी है

बिल्कुल सही कहते हैं इंस्पायर करना ट्रेन करना डिप्लॉयड अच्छे से कर रहा है जो पूरा इंडिया वाइड उनका जो वॉलेटिवृपालेम

प्रश्न: आपने एक्सट्रोवर्ट और इंट्रोवर्ट की बात की. क्या आध्यात्मिक जीवन में इंट्रोवर्ट होना अच्छा है?

श्रवण करेंगे तो मन को सुनेंगे वही अनाहत ध्वनि को सुनेंगे सो यह प्रति आहार यह तो पहला स्टेप है प्रत्याहार के बाद में आता है धारणाधिकार इसको बहिरंग साधना कहते हैं तो अंतरंग और बहिरंग का जो ब्रिज है वह है प्रत्याहार यानी कि मन की इंद्रियों को बाहर में जाने से खींच करके भीतर की ओर मोड़ना है सो वह तो हो गया कि इंट्रोवर्ट होने से ही आपका आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ होगा दूसरी बात देखिए कि संसार में भी देखिए अभी देखिए भारत का इकोनॉमी तो गड्ढे में गिरा है व भारत की इकोनॉमी बारे में बात करने से कोई लाभ नहीं अब विदेश में जाके देखिए जितने भी ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट हैं जिन्होंने यह इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन स्टार्ट किया जिन्होंने यह जो डिजिटल रेवोल्यूशन स्टार्ट किया जिन्होंने आज का ये एआई रेवोल्यूशन स्टार्ट किया भारत की जो टैलेंट है यह सुंदर पिचाई वगैरह उनको कहां पर आश्र मिलता है वह अमेरिका में तो जो जो कटिंग एज इनोवेशन डिस्कवरी करनी है देन यू विल हैव टू बी इंट्रोवर्ट ये आइंस्टाइन न्यूटन यह रुथ फोर्ड यह ये जो फर्मी यह जो मैक्स प्लांक ये हाइजनबर्ग जितने भी टॉप लेवल साइंटिस्ट है जिन्होंने आज को वेस्ट को प्रोस्पेरिटी के चरम शिखर पर बैठाया है सबका लाइफ देख लीजिए विदाउट एक्सेप्शन दे आर ऑल इंट्रोवर्ट यदि इंट्रोवर्ट है तो आप जो आध्यात्मिक जर्नी है या तो फिर यह साइंटिफिक डिस्कवरी की जर्नी है बोथ आप एक्सेल होंगे भारत में यह एक बड़ा ही विचित्र होता है कि हम लोग आध्यात्मिकता को स्वीकार करते हैं कि हां यह इंट्रोवर्ट है तो आध्यात्मिक जगत में बड़ा प्रोग्रेस करेगा किंतु इवन इफ यू आर इंट्रोवर्ट देन यू विल हैव पावर ऑफ क्रिएटिविटी न पावर ऑफ क्रिएटिविटी इफ यू यूज इट यू कैन एक्सेल इन एनी फील्ड दैट यू आर तो प्रॉब्लम यह है कि इकोनॉमी इतनी बेकार है अपनी कि इनोवेशन क्रिएटिविटी डिस्क वरी इस सब का ऐसा कोई स्थान नहीं है वह सब करने के लिए आपको विदेश में जाना पड़ता है दैट इज प्रॉब्लम विथ अवर एक्सटर्नल इकोनॉमिक कॉर्पोरेट सिस्टम नॉट विद दिस नेचर ऑफ ह्यूमन कॉन्शसनेस अभी आप आईआईटी के टॉपर्स जितने भी होंगे देख लीजिए कि विदाउट एक्सेप्शन ये लोग कुछ ना कुछ इंट्रोवर्ट तो होंगे ही होंगे विदाउट बीइंग इंट्रोवर्ट आप उस लेवल पे सक्सेस के एकेडमिक लाइफ में नहीं पहुंच पाएंगे किंतु वही है कि उनको फिर यदि मटेरियल प्रोस्पेरिटी चाहिए तो फिर उनको यह विदेशी मल्टीनेशनल में जाना होगा क्योंकि उनके जैसी जो टैलेंट है इंडिया की कंपनी में काम की ही नहीं है यहां पर जैसे आपने कहा एक तो पॉलिटिक्स बहुत चलता है बैक वाइटिंग बहुत चलता है फिर यह बॉस के साथ में अच्छे रिलेशन हो तो काम उने वो यह होगा आपका वो मने प्रमोशन होगा यह जो मने इंडिया में क्या है कि वो जिसको कहते हैं ना सक्सेस सक्सेस की कोई वैल्यू नहीं है तो यह जो नेपोटिज्म है ना वो भारत की खून में पूरे जैसे डीएनए में घुस गया है आप में लेंट होगी आप बजाज चलाते हैं वहां से आपको सीईओ होना है तो अमेरिका में ही जाना पड़ेगा दैट इज प्रॉब्लम विथ इंडियन इकोनॉमी इंडियन पॉलिटिक्स इंडियन इंडस्ट्री एटस ग्राउंड लेवल से टैलेंट को नर्चर करके

प्रश्न: अपने संघ में ठाकुर के परिवारजनो को भी कोई विशेष सन्मान नहीं मिलता। यह कितना यूनिक है!

टॉप लेवल पर पहुंचाना दिस इज अ साइन ऑफ सक्सेसफुल सिविलाइजेशन अदर वाइ ऐसा नहीं होगा ना जहां पर भी नेपोटिज्म है डायनेस्टिक रूल है ना 200 300 साल में वो सिविलाइजेशन गड्ढे में जाएगी ये इस्लाम और यह वेस्टर्न नेशन यह दोनों में डायवर्जेंस के से हो गया ये इस्लाम वैसे तो 18 एथ सेंचुरी नाइंथ सेंचुरी वगैरह देखिए इमीडिएट आफ्टर द अराइवल ऑफ मोहम्मद आप देखेंगे कि इस्लाम में एक बड़ा जोश था जबकि उस समय यूरोप अंधेर डार्क एजेस में जी रहा था मिडिवल एजेस में जी रहा था जबकि ये जो इस्लामिक लर्निंग सेंटर थे बगदाद था फिर यह जो ईरान था वगैरह जगह पे आप देखिए कितना मतलब प्रोस्पेरिटी है साइंटिफिक डेवलपमेंट चल रहा है आर्ट कल्चर जेनेरोसिटी कितना मतलब जगत का सेंटर बना हुआ है यह बगदाद यह ईरान वगैरह उस समय का बाद में किंतु देखिए कि ये नेपोटिज्म उनके खून में जो घुस गया ना ये एक एशियन सिस्टम है एशिया के जितने भी देश है ना सभी देशों में यह नेपोटिज्म है किंतु यह वेस्टर्न यूरोप में देखिए कि फिर वह वही एक सिस्टम चालू हुआ कि राजाशाही जो है उसको तोड़ कर के यह जो फिर यह डेमोक्रेसी रूल ऑफ लॉ वगैरह कांस्टिट्यूशन वगैरह जो स्टार्ट हुआ तो मर्चेंट क्लास को यह चांस मिला वरना मर्चेंट क्लास के पास में नोबिलिटी के सामने झुकना वह तो आम बात थी यह जो स्वामी जी किसने कहा है कि ये भारत के राजाओं के सामने ये जो ब्रिटेन के मर्चेंट लोग जीत गए मतलब दिस इज अ यूनिक इवेंट इन हिस्ट्री कि राजा राजा का युद्ध हुआ दूसरा राजा जीता ऐसा नहीं वहां के जो मर्चेंट क्लास है दे वन अगेंस्ट इंडियन मुगल्स सो दिस इज अ रेवोल्यूशन इन वर्ल्ड हिस्ट्री और यदि मर्चेंट क्लास के सामने बाद में देखिए कि इनोवेट जीत गए माने वहां पे यह होता ही रहा है स्टेप बाय स्टेप कि यह इनोवेट है जो जो फिलोसोफर है साइंटिस्ट है कौन से हिस्ट्री में है ऐसा कि साइंटिस्ट इनोवेट क्योंकि यह लोग तो सबसे वल्नरेबल लोग हैं इंट्रोवर्ट होने से कोई भी उनके साथ में चीटिंग कर सकता है कोई भी उनका शोषण कर सकता है उनको एक सतत रूप से सम्मान मिलते रहना इनोवेट औरस को डिस्कवरर्स को फिलोसोफर को आर्टिस्ट को ये कल्चरल कंट्रीब्यूटर्स को जिससे कि वह सोसाइटी को एनरिच करें क्योंकि उनका प्रॉब्लम य है कि जो कंट्रीब्यूशन करते हैं वो इमीडिएट आपको नहीं दिखाई देता है यह जो न्यूटन ने जो लॉज ऑफ डायनेमिक्स खोज के गया एज सच उस समय कुछ उसका यह नहीं था किंतु एट द सेम टाइम ही वाज कंसीडर्ड टू बी द ग्रेटेस्ट ब्रिटिश सिटीजन इन हिज लाइफ टाइम इट सेल्फ व्हिच इज सच अ यूनिक थिंग तो वह जो है कि अब ग्राउंड लेवल से टैलेंट नर्चर करके एकदम टॉप पे पहुंच जाता है प्योर टैलेंट के जोर पे व्हिच इज यूनिक मतलब जिस सिविलाइजेशन में ऐसा होता है व सिविलाइजेशन तैर जाती है यह पूरा एशिया नेपोटिज्म में डूबा हुआ है