मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित उसका हम पाठ कर रहे थे। चीर सिमतीनी चीर सधवा इस चैप्टर तक हम पहुंचे हैं।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "घर घर मेरी पूजा होगी"
हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि की ओर ले जाने वाली जो साइंस जो है जो लक्षण है वह किस तरह से है। हमने चार लक्षणों को देखा और पांचवा ठाकुर का एक महावाक्य भी सुना। तो यह जो पांच महालक्षण है वह सिर्फ यह नहीं है जो पहले के चार प्लस एक पांचवा तो यह पांच मिलकर के सिर्फ यह नहीं सूचित करते कि ठाकुर की लीला का अवसान हो रहा है पृथ्वी के ऊपर में किंतु साथ में यह भी सूचित करते हैं कि देह के अवसान के बाद में स्थूल देह से पृथ्वी से विदाई लेने के बाद में ठाकुर भक्तों के हृदय में तो लीला करते ही रहेंगे और फिर इस लीला की कंटिन्यूटी किस तरह से है? दो तरह से लीला की कंटिन्यूटी बनी रहेगी। एक तो भक्तों के हृदय में ठाकुर का निवास होगा। दूसरा कि गुरु परंपरा जो श्री रामकृष्ण प्रारंभ करके गए हैं। इस गुरु परंपरा के माध्यम से ठाकुर हमको मार्गदर्शन देते रहेंगे। आशीर्वाद देते रहेंगे। तो इसमें खास करके यह जो पांचवी बात ठाकुर ने कही प्रथम पुरुष फर्स्ट पर्सन में अपने को एड्रेस करके कि तुम लोग चिंता मत करना देखना कि घरघर मेरी पूजा होगी। यह जो मेरी पूजा होगी, घरघर होगी। यह ठाकुर का आत्म प्रकाश से अभयदान काशीपुर की जो घटना है जो कि ठाकुर ने जाहिर में सबको स्पर्श करके उनके इष्ट देवता का दर्शन करवाया। यह तो देखिए कि जो वो कुछ फॉर्चूनेट डिवोटीज थे जो कि उस समय वहां पर उपस्थित थे और इस डिवोटी में वह कुक भी शामिल था। रसोया और राम राम बाबू सबको पकड़ पकड़ करके ले आते हैं कि ठाकुर कल्पतरु हुए हैं। तो जो वहां पर खाना बनाने वाला जो रसोइया था उसका भी उसमें नंबर लग गया था। रामबाबू ने उसको भी ठाकुर के चरणों में फेंक दिया था और ठाकुर ने उसको भी स्पर्श कर दिया था। तो वह तो है देखिए कि जो भी आया उस दिन ठाकुर के सामने सब ने अपने इष्ट देवता का दर्शन किया। ठाकुर का सही स्वरूप क्या है वह पहचाना। किंतु अभी देखिए कि हम लोग तो उन फॉर्चूनेट लोगों में नहीं है कि फर्स्ट जनवरी 1886 को वहां पर काशीपुर में ना ही तो हम उपस्थित थे ना ही तो ठाकुर का स्पर्श हमको प्राप्त हुआ है। तो हमारे लिए क्या करणीय है? ठाकुर ने जो कहा कि घरघर मेरी पूजा होगी तो अपने घर में भी ठाकुर का फोटो स्थापित करके उसकी नियमित फोटोग्राफ की पूजा करनी है। किंतु यहां पर देखिए एक बात हमको ख्याल में रखना है थोड़ा सा कि बहुत ज्यादा विधिवादीय पूजा में नहीं चले जाना है क्योंकि फिर क्या है ना कि बहुत सारे हम लोग जो भक्त होते हैं प्रारंभ में तो हम लोग बड़े ही शूरवीर होते हैं कि हां पूजा फोटो की स्थापना करेंगे उसके बाद में प्रतिदिन माला पहनाएंगे धूप दीप चंदन वगैरह देंगे कुछ कुछ ना कुछ नैवेद्य अर्पण करेंगे। वस्त्र प्रतिदिन नए पहनाएंगे वगैरह वगैरह। उसमें भी यदि आप थोड़े से वैष्णव भावधारा से हैं तो फिर पूजा और सेवा में घटा करना यानी कि भाड़ा बांग्ला बोले तो बाड़ाभाड़ी करना माने और ज्यादा ज्यादा उसको पूजा को बढ़ाते जाना वो कभी-कभी हमारा एक हो जाता है नेचर। किंतु यह सब चीजों में फिर प्रॉब्लम कहां पर है कि जिस दिन हमको थोड़ा सा यह सब चीजें बोरिंग लगने लगी जिस दिन हमको यह सब थोड़ा सा इसमें अभी बाहर भी तो जाना है। दूसरे भी तो 10 काम है। फिर एक मन में आएगा कि अरे कल तक तो मैं इतना सब कुछ करता था। आज मुझे बाहर जाना है। यह सब काम है। तो मैं किस तरह से ठाकुर की सेवा कर पाऊंगा। तो एक तरह का गिल्ट फीलिंग आ जाता है। मन के भीतर में एक स्ट्रगल चालू हो जाता है। यहां पर ठाकुर की सेवा प्रारंभ तो कर दी है किंतु अभी हम उसको नियमित रूप से नहीं कर पा रहे हैं। ठाकुर की सेवा तो छोड़ ही दीजिए। यह गुरु महाराज से हमने मंत्र ले लिया है। हमारे गुरु ने कहा है परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज ने या वाइस प्रेसिडेंट महाराज ने कि प्रतिदिन एटलीस्ट 108 जप करना है। तो वह भी हमको कभी-कभी टाइम नहीं मिलता है। तो यह क्या है कि यह सब एक बार प्रारंभ करना उसके बाद में उसको छोड़ देना या तो फिर बीच-बीच में लंबा लंबा गैप लगे तो हमको एक गिल्ट फीलिंग जैसा हो जाता है। तो मेरे मत अनुसार आप फोटो की स्थापना कीजिए। ठाकुर की स्थापना कीजिए। ठाकुर, मां, स्वामी जी तीनों की। जैसे कल भी हमने देखा था कि यह पूर्व बंग के कुछ भक्त आए मां के पास में कहते हैं कि मां आपके और ठाकुर के फोटो को तो रखा है स्वामी जी को नहीं रखा और वे लोग सोच रहे थे मां अभी शाबाशी देगी किंतु मां इतनी गंभीर हो गई और गंभीर होकर के कहा कि जहां पर स्वामी जी पूजा नहीं पाते हैं वहां पर ठाकुर भी सेवा ग्रहण नहीं करेंगे। तो फिर उन लोगों में अकल आई कि ना ठाकुर मां स्वामी जी एक तीन तीन एक यह अपने संघ का मूल मंत्र है तो फिर देखिए कि ठाकुर मां स्वामी जी तीनों के फोटो रखने हैं स्थापना करनी है और फिर करना क्या है पता है जो गुरु प्रदत्त मंत्र जो है उसका जो 108 जप है वह एक तो कर लेना है फिर यह कथामृत है मां की जो बातें हैं मां मां का जीवन है और स्वामी जी के कोई भी एक पत्र है या तो स्वामी जी का जीवन है या तो फिर यह इंस्पायर्ड टॉक है कर्म योग राजयोग कोई भी एक किताब उसमें से प्रतिदिन कुछ कुछ पाठ करना है। कैसे यह आपको थोड़ा स्तोत्र पाठ जैसा कुछ कर लेना है। किस तरह से आप अपना यह पूरे मॉड्यूल्स डेवलप करेंगे वह आपको देखना है। उसमें बहुत ज्यादा कोई नियम कानून बनाने की जरूरत नहीं है। थोड़ा सा 510 मिनट पाठ कर लिया। थोड़ा सा जप कर दिया। थोड़ा स्तोत्र पाठ कर दिया। थोड़ा सा फोटो को साफ करके थोड़ा क्लीन करके थोड़ा यदि पुष्प सामने रख दिए और यदि समय होता है तो धूप और दीप दे दिया। तो इतना यदि 101 मिनट में जितना हो इतना मिनिमम आपको रेगुलर करना है और फिर टाइम होने से आप जितना बढ़ाते जाए बढ़ाते जाइए उसमें तो कोई आपत्ति नहीं किंतु मिनिमम जो है आपका वह 10 मिनट से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। इससे क्या होगा कि बाहर जाना है, घर में और कोई काम है, आपको फटाफट सब कुछ खत्म कर देना है। तो उस दिन आपको गिल्ट फीलिंग ना हो जाए कि मैंने तो मिनिमम जो था प्रोग्रा पूजा और पाठ और जप आधे घंटे का रखा था। किंतु आज मैं सिर्फ 10 ही मिनट दे पा रहा हूं। तो ऐसा ना हो जाए। मिनिमम जो है आपको 10 मिनट रखना है। उसके बाद में जितना बढ़ाना चाहे बढ़ा सकते हैं। जिस दिन आपके पास में समय है। तो घरघर में ठाकुर की स्थापना करके ठाकुर मां स्वामी जी तीनों की यह बात भी हमको एकदम स्पष्ट रूप से याद रखनी है। ठाकुर ने कहा है वैसे फर्स्ट पर्सन में कि घर-घर मेरी पूजा होगी। किंतु हमको मां ने खुद ने कहा तो कि जहां पर स्वामी जी की पूजा नहीं होगी वहां पर ठाकुर भी पूजा ग्रहण नहीं करेंगे और मां और ठाकुर तो शिव और शक्ति दोनों तो साथ में ही है कोवालपाड़ा की वह घटना कि कोवालपाड़ा मां गई है और वहां पर ठाकुर को स्थापित करने की बात है तो वहां के सेवक महाराज लिखते हैं कि हमको तो पता ही है कि शिव और शक्ति सशक्तिक अवतार की पूजा पूजा करना ही भारत की यह परंपरा है। तो ठाकुर के फोटो के साथ में मां का फोटो भी तैयार रखा था। मां ने स्वहस्त दोनों फोटो की स्थापना की थी। तो ठाकुर मां स्वामी जी रखने हैं। तीनों के फोटो मिनिमम 10 मिनट की रेग दैनिक सेवा आपको करनी है और फिर जिस दिन समय होता है तो पाठ बढ़ाइए, जप बढ़ाइए, ठाकुर को नैवेद्य ऑफर कीजिए। किंतु वह सब ऑप्शनल रखिएगा। तो यह जो कल्पतरु दिन को वह जो कुक जो था जो रसोइया जो था उसको भी जो पुण्य मिल गया ठाकुर के स्पर्श का ठाकुर के आशीर्वाद का आत्म प्रकाश से अभयदान का वो पुण्य हमको भी मिलेगा। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि लीला अवसान सदेह जो स्थूल देह से जो लीला अवसान है वह किंतु सूक्ष्म देह से लीला की कंटिन्यूटी है। और यह लीला की कंटिन्यूटी सूक्ष्म देह से किस तरह से है? तो प्रत्येक भक्त के घर में ठाकुर मां स्वामी जी की स्थापना होनी ही चाहिए। जो मिनिमम 5 टू 10 मिनट दैनिक हम सेवा करते हैं, वह हमको करनी ही करनी है। और फिर समय मिलने से मेरा तो ओपिनियन यह है कि बहुत ज्यादा भोग, आरती, वस्त्र पहनाना उस सब चीजों में बहुत ज्यादा नहीं जाकर के मुख्यत्व पाठ करने पे आप थोड़ा सा एफेसाइज कीजिए। एफेसिस दीजिए क्योंकि क्या है कि पाठ यानी कि ठाकुर को कथामृत सुनाना मां की बातें सुनाना यह जो स्वामी जी के पत्रावली वगैरह है सुनाना मेरी दृष्टि से तो वह सर्वोत्तम पूजा है वह सर्वोत्तम ठाकुर की सेवा है सुंदर रूप से सजा करके ठाकुर के सामने वह पुस्तक रखिए आप भी बैठिए और जैसे एक पाठक किस तरह से पाठ करता है वैसे ही ठाकुर के सामने पाठ पाठ कीजिए। 15 मिनट, 20 मिनट, आधा घंटा पाठ कीजिए। बीच-बीच में जप करते जाइए। 10 मिनट पाठ किया फिर 108 जप कर लिए। फिर 10 मिनट फिर 108। तो ऐसा करके करके यदि एक घंटा निकल जाता है ठाकुर की पूजा में, सेवा में, आराधना में, उपासना में तो इससे अच्छा हमारे लिए और कुछ नहीं है। तो यह मेरी दृष्टि से ठाकुर हमारे लिए कल्पतरु हुए हैं। ठाकुर को कल्पतरु ठाकुर को अपने हृदय में अपने घर में लाकर के विराजमान करने का मेरी दृष्टि से यह सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ उपाय है। तो देखिए कि ठाकुर
महाप्रयाण की ओर बढ़ते कदम: श्रीरामकृष्ण के अंतिम दिन
के यह जो पंच महालक्षण है यह हमने देखे और फिर हमने यह भी देखा कि मां को अभी यह समझने में और ज्यादा देरी नहीं लगी कि सिर्फ देवता ने ही मुंह मोड़ नहीं लिया है। ठाकुर भी अभी देह त्याग करने की ओर उन्मुख हुए हैं। तो ठाकुर की ओर से भी विश्वास से हृदय को भरोसा देने का और तो कुछ उपाय नहीं था। किंतु विश्वास टूटने से भी आशा तो नहीं टूटती है। मनुष्य यदि आशाहीन हो जाए तो जीवन तो जैसे कि पूरा काले अंधेरे घने डिप्रेशन में डूब जाएगा। तो विश्वास टूटे किंतु आशा कभी ना टूटे और आशा देखिए टूटने वाली भी नहीं है। ठाकुर की महासमाधि के ही दिन को नेक्स्ट डे ही उसी दिन को एक्चुअली 16 अगस्त को सुबह को 1:00 बजे तो ठाकुर का देह गया है ना एक 1 बज के दो मिनट ना ऐसा कुछ तो ठाकुर का जो देह गया तो 16 दिसंबर तो 16 अगस्त तो स्टार्ट हो ही गया है तो उसी दिन 16 अगस्त की शाम को ही ठाकुर ने जब मां अपनी चूड़ियां निकाल रही थी ठाकुर ने उनका हाथ हाथ पकड़ के कहा था कि अरे मैं गया कहां हूं? यह तो जैसे कि एक घर छोड़ एक कमरा छोड़कर के दूसरे कमरे में। तो मां का जो विश्वास था, आशा थी वह बनी रही। उसके पीछे में भी यह तो जैसे कि देखिए कि एक डिवाइन डिस्पेंसेशन ही है। एक डिवाइन साइन ही है। और फिर अकुल के कांडारी को यह अनंत महासागर पार कराने वाले ईश्वर को न पुकार करके हम चुपचाप भी तो नहीं रह सकते हैं। ठाकुर तिरोधान काल अप्रतिहतो बेगे अग्रसर होइते छे ठाकुर के तिरोधान का समय सतत नजदीक आता जा रहा है उहार अनथा करो मानबेर शद्धायत तो है उसको टालना मनुष्य के साध्य के बाहर है मनुष्य के क्षमता के बाहर है इहार आभास श्री मां अन्न भावे पया छ इस बात का अंदाजा मां को इस बात का आभास यानी कि एक अस्फूट साइन मां को अन्य रूप से भी मिली थी। त बोलिया छ मां ने कहा था ठाकुर स्वप्न देख औषध आते हाथी गो ठाकुर ने स्वप्न में देखा यह जो गले का रोग हुआ है उसका औषध उसका मेडिसिन लाने के लिए हाथी गया हाथी माटी खुचे हाथी माटी मिट्टी काट रहा है वो मिट्टी में गड्ढा बना रहा है ओशुधेर जन औषध शायद यह मेडिसिन शायद मिट्टी में कहीं पे वो गाड़ी हुई है। उसके नीचे में छुपी हुई है। हाथी जो है माटी खोद रहा है। ऐन समय गोपाल ऐसे स्वप्न भेंगे दिल। किंतु उसी समय गोपाल आकर के उसने स्वप्न को तोड़ दिया। यह गोपाल मोस्ट प्रोबेबबली हमारे गोपाल दादा ही म गोपाल अपने अद्वैतानंद महाराज ही होंगे। या तो फिर यह हुटको गोपाल होगा। जो कोई भी होगा कि गोपाल ने आकर के स्वप्न तोड़ दिया। तो देखिए कि हाथी जा रहा है। हाथी गया है वो मिट्टी को काट रहा है। मिट्टी को यह कर रहा है। डिग कर रहा है कि भीतर में से औषध मिलेगा। अनफॉर्चूनेटली औषध मिलने से पहले ही स्वप्न टूट गया। आमा के जिज्ञासा
भक्त और भगवान की एकता: ठाकुर के कैंसर का घाव माँ काली के गले में
कोरलैंड ठाकुर ने मां को पूछा था। मुझे पूछा था तुम स्वप्न टपन देखो। तुम क्या स्वप्न टपन देखती हो? मां ने भी स्वप्न देखा था। देखिए मां क्या कहती है। देख लूं मां काली घाड़ कात कोरे रोए छे। देखा कि मां काली टेढ़ी गर्तन करके खड़ी है। बोल लूं मां तुम केनो ऐन कोरे आो। मैंने मां को कहा मां शारदा ने मां काली को कहा कि मां तुम क्यों इस तरह से खड़ी हो? तुम्हारी गर्दन टेढ़ी क्यों हो गई है? झुक क्यों गई है? मां काली बोल और ओर जो उस मां काली ने कहा उसके उसकी वजह से और ओटेर जो उसके उसकी वजह से ये उसके अर्थात कि ठाकुर के उसकी वजह से यानी कि ठाकुर को गले में घाव हुआ है तो मां काली को भी गले में व्यथा है। गले में पीड़ा है। इसलिए मां काली की गर्दन भी झुक गई है। टेढ़ी हो गई है। ठाकुर गोलार घा देखिए माने और ओर जोो ठाकुर गोलार घा देखिए उसके उसकी वजह से ठाकुर के गले के घाव की वजह से हमारो होए छ देखिए मां काली कहती है कि मुझे भी हुआ है देखिए कि दिस इज सच एन इंटरेस्टिंग टर्न ऑफ इवेंट क्रिश्चियनिटी में आप यदि देखेंगे तो ऐसे संत हुए हैं जिनके हाथ में और पैर में स्टिग्मा माटा हुआ। अभी स्टिग्माटा क्या है कि जीसस को तो क्रुसिफाई कर दिया था। तो जिस तरह से हमको पता है कि क्रुसिफाई करने के समय में दो हाथ ऐसे रखे थे और दोनों हाथों में खिले भोंक दिए थे। पैरों में भी इस तरह से खिले भोंके गए थे। तो अभी जो क्रिश्चियन संत जीसस की इतनी आराधना करता है, उपासना करता है, जीसस के साथ में आइडेंटिफाई हो जाता है, तो उनके देह में भी यह हाथों में घाव के निशान बन जाते हैं। इसको कहते हैं स्टिगमाटा। अर्थात कि जीसस को हाथ में जो खिले मारे गए थे जो घाव हुए थे तो इन संतों को भी उनके हाथ में वही घाव होते हैं। यानी कि वे लोग जीसस के साथ में इस तरह से आइडेंटिफाइड हो गए हैं। जीसस की जो सद्गुण राशि है इस तरह से उनके भीतर में आ गई है कि जैसे कि सिर्फ उनकी सद्गुण राशि ही नहीं उनके देह के जो घाव है वो भी उनके हाथों में आ गए। इंटरेस्टिंगली टुडे इज क्रिसमस। अह कि वही स्टिग्माटा यहां पे देखिए ठाकुर के जो घाव हुआ है वह मां काली में रिफ्लेक्ट हो रहा है। दिस इज रिवर्स स्टिग्माटा कि मां काली और ठाकुर का आइडेंटिफिकेशन इस हद तक है कि जब भक्त को इस तरह से घाव होता है तो वो ईश्वर के ऊपर में रिफ्लेक्ट होता है। देखिए वही ठाकुर ही वो कहानी कहते हैं कि एक बार भगवान गणेश तो बच्चे थे तो एक बिल्ली को मार रहे थे तो बिल्ली को इंजरी हुई अभी अभी तो बच्चे हैं ना भगवान गणेश जी तो बच्चे हैं। उनको पता नहीं कि इस तरह से दूसरे लोगों को व्यथा देना वह गलत है। इनके भीतर में भी तो वही ईश्वर है। तो जो भी है बाल गणेश ऐसा कुछ करके अपनी बालक बुद्धि से फिर मां अपनी पार्वती के पास में गए। देखा कि मां पार्वती के शुभ्र पवित्र अंग पे भी घाव के निशान है। इंजरी के निशान है। तो यह बालक गणेश जो है बड़े ही क्रोधित हो गए। वो चिल्ला करके बोले कि अरे मां किसने आपको इस तरह से आपके देह पर इंजरी की? आपको मारा है। किसने आपके पवित्र देह पे आघात किया है? बताइए मुझे अभी मैं अभी जाकर के उसका वध कर देता हूं। तो जैसे ही भगवान गणेश ने ऐसा कहा तो फिर मां ने क्या कहा कि बेटा तुम जो उस बिल्ली को मार रहे थे उसी की वजह से मेरे देह पे इस तरह से इंजरी के निशान हुए हैं। क्यों? उस बिल्ली के भीतर में भी तो मैं ही हूं। तो इस तरह से जैसे मां ने कहा मां पार्वती ने उस समय यह बालक गणेश को ऐसा ज्ञान हुआ कि सर्वभूत के भीतर में यह मां विराजमान है और किसी को भी इजा करने से किसी को भी हत्या करने से किसी को भी हानि करने से अल्टीमेटली तो आप ईश्वर को ही हानि कर रहे हैं। मां की एक कहानी है। मां मां जयराम बाटी में मां ने एक बिल्ली को रखा था पोशा था वो बिल्ली को दूध पिलाएगी बीच-बीच में खाना देगी भात वगैरह देगी और बिल्ली पर मां का बड़ा स्नेह भी था। तो एक दिन की घटना है कि यह मां की एक मां के घर में ही एक लड़की रहा करती थी। उसका नाम है वासना बाला। तो यह वासना बाला बाल विधवा थी और मां के घर में रहकर के मां का सब कार्य किया करती थी। उसकी उम्र आई थिंक 10 साल के आसपास की ही होगी उस समय। तो बर्तन मांझने है वगैरह जो छोटा-मोटा काम है घर का वो किया करती थी। एक बार दोनों खाने को बैठे तो मां ने अपने जो जो यह था खाने का थाला उसमें भी भात रखा और यह जो वासना बाला है उनके उसमें भी भात रखा अभी वासना बाला का ध्यान इधर-उधर हुआ होगा 10 साल की तो बच्ची ही तो है तो बिल्ली ने आकर के भात खा लिया तो अभी मां कहती है देखिए मां का बिल्ली पे स्नेह कितना है मां ने वासना बाला को कहा कि अच्छा देखो तुम्हारा हमारा भात तो बिल्ली ने खा लिया तो भले उसको खाने दो चिंता मत करो मेरा भात हम लोग दोनों बांट के खा लेते हैं। तो देखिए कि इस तरह का स्नेह मां का बिल्ली के ऊपर में था। तो यही बिल्ली अभी प्रॉब्लम क्या था वहां पे एक ज्ञान महाराज वहां पर रहते थे। ब्रह्मचारी ज्ञान तो उनका क्या था कि बिल्ली पर बड़ा क्रोध था। तो बीच-बीच में बिल्ली को भगा देंगे वहां से। बिल्ली को मारेंगे भी सही। क्योंकि क्या है कि बिल्ली को तो यह इतनी अकल नहीं होती है। अभी ठाकुर का नैवेद्य रखा है उसमें यदि जाकर के मुंह दे देगी तो फिर क्या है कि नैवेद्य भोग फिर से बनाना पड़ेगा। मां के खाने में भी मुंह मार देगी। तो यह सब जो उत्पात करती थी बोलकर के कभी-कभी ज्ञान महाराज जो है लाठी से बिल्ली को मारते। कभी-कभी उसको उठा के पटकते हैं। इतना उस पर अत्याचार करते हैं जिससे कि बिल्ली वहां से भागे। किंतु बिल्ली को भी ठीक-ठीक पता था कि देखिए मां का स्नेह जब तक मैं मां की शरण में हूं। ज्ञान महाराज भले ही चाहे मुझे जितना भी मारे मुझे कोई इतना टेंशन लेने की जरूरत नहीं, चिंता नहीं क्योंकि मां का आशीर्वाद मेरे पे है। तो यह बिल्ली को इतना तो ठीक से पता था। मीनवाइल ऐसा हुआ कि मां जा रही है कोलकाता। तो मां ने ज्ञान महाराज को कहा। अभी मां को तो पता था कि वह एक बार जय राम बाटी छोड़कर कोलकाता गई कि यहां पर बिल्ली का बेचारी का 12 बजा देंगे। ज्ञान महाराज तो फिर मां ज्ञान महाराज को बुलाकर के कहती है देखो ज्ञान यह बिल्ली जो है उसको तुम मारना नहीं। मैं आखिर में मैं तो उसके भीतर में भी तो हूं। मां जैसे कि सर्वभूत में विराजमान है तो मां कहती है कि उसके भीतर में तो मैं ही हूं। तुम उसको मारना मत। अभी ज्ञान महाराज का देखिए बिल्ली पर वैसे तो काफी क्रोध था। किंतु जिस क्षण यह सुना कि हां यही बिल्ली उसके भीतर में वही मां है तो साथ-साथ में ही ज्ञान महाराज का जितना क्रोध जितना यह था बिल्ली के प्रति सब गायब हो गया। और मां तो गई उद्बोधन कोलकाता किंतु यहां पर बिल्ली को एक नया एक रसददार मिल गया। ज्ञान महाराज अपना खाना खाने से पहले भात वगैरह है वो बिल्ली को खिलाते थे और इतना ही नहीं। वैसे तो ज्ञान महाराज थे वेजिटेरियन किंतु बिल्ली के लिए स्पेशल मछली बना के बिल्ली को खाने को देते थे। तो देखिए कि क्रिश्चियनिटी में जिस तरह से है कि जीसस के जो इंजरीज है, जीसस के जो घाव है, जिस तरह से उनके संत में प्रकट होते हैं। अपने यहां पे तो रिवर्स है। भक्त और भगवान का जो आइडेंटिफिकेशन है, वह इतना गहरा है, इतना घना है और इतना संपूर्ण है कि भक्त की जो इंजरी है, वह भगवान के भीतर में प्रकट होती है। यानी कि हमारे यहां तो टू वे स्ट्रीट है। यदि भक्त को ईजा होगी तो भगवान स्वयं इसके लिए सफर करते हैं। भगवान को स्वयं को इसकी वजह से कष्ट होता है। तो यहां पर भी मां ने यह स्वप्न में देखा कि मां काली स्वयं अपनी गर्दन टेढ़ी करके खड़ी है। और मां शारदा ने पूछा कि अरे मां आपको क्या हुआ? क्यों आप इस तरह से खड़ी है? तो मां काली ने ठाकुर की ओर ठाकुर के गले के कैंसर की ओर इशारा करके कहा कि उनको जो यह हुआ है उसको जो यह कैंसर हुआ है गले में घाव हुआ है उसी की वजह से मुझे भी हुआ है बोल के मैं अपनी गर्दन टेढ़ी करके खड़ी हूं तो देखिए श्री मां तखनोई बुझ लेन मां को मां शारदा देवी को तभी समझ में आ गया जे स्वयं मां महाकाली ठाकुर गोलार व्यथा व्यथित होया ओ जहां के निराम कोते ना पारे बा ना चाहे तबे मानुष आर की कथा स्वयं मां काली ठाकुर की व्यथा से व्यथित होकर के भी यदि ठाकुर का आरोग्य रक्षा नहीं कर पाती है। ठाकुर को निरामय नहीं कर पाती है। ठाकुर का रोग शांत नहीं कर पाती है या तो फिर नहीं करना चाहती है ना पारन बाना चाहे नहीं कर पाती है या नहीं करना चाहती है देखिए मां का लॉजिक भी बड़ा स्पष्ट चलता है ईश्वरी के हाथ में तो सब कुछ है मां काली के हाथ में तो सब कुछ है घड़ी लखेर एकटा दुटो केटे ऐसे दाव मा हाथ चापड़ी माने जो लाखों पतंग चगाती है उसमें से कौन सी पतंग को काट के मुक्त आकाश में मुक्त गगन में विचरण करने देना और बाकी पतंग कौन-कौन सी पतंगों को पकड़ के रखना तो वह सब तो मां काली ठीक करती है तो ठाकुर के गले का कैंसर मिटा देना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी तो इसलिए मां कहती है कि यदि ठाकुर के गले का रोग उसको ठीक करना यदि नहीं कर पाती है या तो नहीं करना चाहती है तो वे मनुष्यकी को था तो फिर मनुष्य क्या कर सकता है ये ठाकुर में गले में जो इंजरी हुई है, गले में जो कैंसर हुआ है, जो अत्यंत पीड़ा जो हो रही है, वह पीड़ा सहन करने के बाद में भी मां काली यदि ठाकुर को निरामय नहीं कर पा सकती है, नहीं करना चाहती है, तो मनुष्य तो उसमें कुछ कर ही नहीं सकता है। तो देखिए कि यह जो धीरे-धीरे करके लीला अवसान सदेह लीला अवसान और सूक्ष्म रूप से दिव्य रूप से भक्तों के हृदय में लीला प्रारंभ यह जो ट्रांजिशन पीरियड है इसकी यह सब साइन यह सब घटनावली हमारी नजर के सामने शुद्ध ताहा
श्री रामकृष्ण के कैंसर का आध्यात्मिक रहस्य: जगत के पापों का बोझ अपने ऊपर लेना
नो है सिर्फ इतना ही नहीं श्री श्री ठाकुर ताहा रोग जंत्रणाार एकटा सुगभीर तात्पर्य जो दिखाइया श्री माय मन के व्यक्तिगत शोक दुख अतीत एक अनुपम करुणा भूमि ते उन्नितो कोलेन सिर्फ इतना ही नहीं श्री श्री ठाकुर ने भी उनकी रोग यंत्रणा का एक सुगंभीर तात्पर्य दिखा के श्री मां के मन को व्यक्तिगत शोक दुख के अतीत एक अनुपम म करुणा भूमि पे उन्नत कर लेन अभी ऐसा मां के मन में यदि होता है कि ठाकुर तो शुद्ध पवित्र है उनके देह में उनके गले में इस तरह का रोग क्यों ठाकुर को इस तरह की पीड़ा क्यों तो यह क्या है कि इस तरह का भाव यदि मां के मन में प्रकट ना हो दूसरा कि देखिए कि प्रिय पात्र जो है प्रिय पात्र जब पीड़ित है तो फिर उनकी उनकी पीड़ा तो हमारे हृदय में व्यथा पहुंचाएगी ही पहुंचाएगी। किंतु यदि एक महत उद्देश्य के लिए जब यह प्रिय पात्र सैक्रिफाइस कर रहा है। देखिए कोई भी मां है उसके बच्चे की मृत्यु होगी। संतान की मृत्यु होगी तो मां को तो पीड़ा होने ही वाली है। मां को तो व्यथा होने ही वाली है। ग्रीफ या तो शोक मां के मन में लगने ही वाला है। किंतु यही मां को कहिए कि आपका जो बेटा था आपका जो पुत्र था वह तो सैनिक था और वह सरहद पे बॉर्डर पर दुश्मनों के साथ में लड़ते लड़ते वह मारा गया है। तो मां को व्यथा तो होगी साथ में प्राइड भी होगा। साथ में गर्व भी होगा कि चलो एक महत उद्देश्य के लिए मेरे लड़के ने बलिदान दिया। तो यहां पर मां सिर्फ यह सोच के ना बैठी रहे कि अरे ठाकुर को जो योग यंत्रणा हो रही है रोग यंत्रणा हो रही है तो इसका फिर माने मां के हृदय में जो व्यथा है उसके साथ में थोड़ा सा गर्व भी प्रकट हो या तो फिर एक महत उद्देश्य भी प्रकट हो जिससे कि मां के हृदय की व्यथा थोड़ी सी कट जाए इसके लिए ठाकुर ने और भी एक रीजन दिखाया है। तनी बोली ले ठाकुर ने कहा जा भोग हमार ऊपर दिए ही होए गैो जितना भी भोग था जितना भी यह भोग अर्थात कि फल कर्म का फल यह कर्म के फल का जो भोग है जितना भी था वह मेरे ऊपर में ही सब हो गया तो मादे आर काऊ के कष्ट भोग करते हो बेना तुम लोगों को और किसी को कष्ट भोग करने की जरूरत नहीं है। जगते शकले जन भोग करे ग जगत में सभी के लिए मैं भोग करके गया। देखिए ये इवोल्यूशन इवोल्यूशन क्या है? हम लोग क्या समझते हैं कि एक स्पीशीज से दूसरी स्पीशीज में हमारा जो कन्वर्जन या तो फिर एडवांसमेंट होता है वो कैसे होता है? मॉडर्न साइंस क्या कहता है? मॉडर्न साइंस कहता है कि जेनेटिक म्यूटेशन की वजह से इवोल्यूशन होता है। अभी जैसे कि जेनेटिक म्यूटेशन तो है वह तो कंटीन्यूअस चलते ही रहते हैं। ऐसा कभी होगा ही नहीं कि मां और पिता के जो जीन है डीएनए है उसका एग्जैक्ट कॉपी उनके बच्चों के भीतर में आएगा। ऐसा तो होने ही नहीं वाला है। प्रत्येक जनरेशन पर, प्रत्येक रिप्रोडक्टिव साइकिल पर थोड़ा बहुत तो जेनेटिक वेरिएशन आता ही है। म्यूटेशन आता ही है। अभी यह म्यूटेशन होते हैं दो तरह के होते हैं। एक तो है कि नुकसानदायक म्यूटेशन होते हैं। जैसे कि हमारे यहां पे ये सेरेब्रल पालसी क्लीनिक है। हम लोग देखते हैं यह जो बच्चों का जन्म होता है। तभी से उनके कुछ ना कुछ मेंटल डिसऑर्डर, फिजिकल डिसेबिलिटीज, लर्निंग डिसेबिलिटीज, यह डोन सिंड्रोम, यह ऑटिज्म वगैरह लगा है। तो क्या है कि उनके भीतर में जो जेनेटिक वेरिएशन या तो जेनेटिक म्यूटेशन आया वो नेगेटिव टाइप का था। इस जेनेटिक नेगेटिव म्यूटेशन ने उनको संपूर्ण रूप से एक तरह से कहे तो अपाहिज करके रख दिया। आजकल जिसको कहेंगे दिव्यांग तो अल्टीमेटली तो यही है कि जिस तरह से एक नॉर्मल हेल्दी पर्सन अपने हाथ पैर मन बुद्धि को यूज करके एक नॉर्मल लाइफ लीड कर सकता है। यह बच्चे इस तरह से नहीं कर पाएंगे। सतत उनको किसी ना किसी पे डिपेंड रहना होगा। तो अब क्या है कि यह नेगेटिव म्यूटेशन हो गए। फिर पॉजिटिव म्यूटेशन भी होते हैं कि कोईकोई बच्चे बचपन से ही प्रोडगल उनके भीतर में टैलेंट होती है। अभी ये प्रोडगल टैलेंट्स जो है पिछले जन्म के संस्कार का परिणाम है कि यह पॉजिटिव जेनेटिक म्यूटेशन है। उसको हम डिबेट कर सकते हैं। किंतु एक स्थूल व्यू यदि ले एक स्थूल दृष्टि से यदि देखें तो फिजिकल फिटनेस मेंटल फिटनेस कोई भी एक कला में पारदर्शिता या तो फिर एक कोई भी एक टैलेंट स्किल में एक्सट्रीम टैलेंट प्राप्त करना छोटे-छोटे बच्चे कभी-कभी तबला बजाते हैं। इस तरह से बजाते हैं देख के लगेगा जैसे ये बड़े-बड़े मास्टर्स को हरा देंगे। छोटी-छोटी उम्र के बच्चे कोई-कोई क्रिकेट ऐसा खेलते हैं कि उनको हमको लगेगा कि यह सचिन तेंदुलकर वगैरह जो महारथी है उनको भी हरा देंगे। गाना गाते हैं तो ऐसा गाते हैं कि जैसे बड़े-बड़े गायक उनके सामने फीके पड़ जाए। तो यह जो टैलेंट जो होती है प्रोडगल टैलेंट्स जो होती है जीनियस लेवल की टैलेंट किसी किसी में बचपन से होती है। तो क्या है कि ये पॉजिटिव म्यूटेशन भी है। फिजिकल फिटनेस होती है। मेंटल फिटनेस होती है। इंक्रेडिबल स्किल्स होती है। जीनियस होते हैं। तो यह है मॉडर्न साइंस का एक व्यू पॉइंट कि म्यूटेशन होते हैं प्रत्येक रिप्रोडक्टिव साइकिल में। प्रत्येक बार एक जन्म बच्चा जन्म लेगा। म्यूटेशन होगा ही होगा। वह चाहे मनुष्य का बच्चा हो कि बंदर का बच्चा हो कि मछली का बच्चा हो। जब भी बच्चा प्रकट होता है वो पेरेंट्स के साथ में जेनेटिक वेरिएशन तो रहेगा ही रहेगा। और यह वेरिएशन पॉजिटिव होते हैं, नेगेटिव होते हैं। नेगेटिव वेरियंस यदि होता है, अभी यह सेरेब्रल पालसी जैसा कुछ हो गया, ऑटिज्म जैसा कुछ हो गया तो जीवन की रेस में यह लोग हार जाएंगे। किंतु जब यह जीनियस या तो प्रोडगल लेवल का टैलेंट आ गया तो फिर क्या है कि जीवन की रेस में जीत जाएंगे और फिर इनकी संतति है उनके बच्चे हैं उन लोगों में यह ट्रेट जो है पॉजिटिव जेनेटिक ट्रेट वो प्रोपगेट होना शुरू होगी। तो यह हो गया मॉडर्न साइंस का थिंकिंग। अभी देखिए किंतु कि हमारा भारतीय थिंकिंग क्या कहता है? हम लोग कहते हैं कि हां म्यूटेशन है। जेनेटिकल म्यूटेशन है जो कि आपको आगे या पीछे ले जा सकते हैं। किंतु साथ-साथ में ही संस्कार भी है। यह संस्कार जो है जन्म जन्मांतर से हम वहन करते आते हैं। जितने बुरे कर्म किए उनके बुरे संस्कार जितने अच्छे कर्म किए अच्छे संस्कार। तो अभी कभी-कभी क्या होता है कि एक कलेक्टिव जो कुसंस्कार है कुसंस्कार है इसका बोझा इतना बढ़ जाता है कि वह सिविलाइजेशन वहीं पर स्टक हो जाती है। भारत के साथ में जैसे हुआ पिछले 1000 साल का पता नहीं यह कुसंस्कार कहो ना कि फिर हमने अपनी प्राण शक्ति आध्यात्मिकता में डाल दी। ऐसा कहो जैसा स्वामी जी का थिंकिंग है कि हमने अपनी जितनी भी प्राणशक्ति है जितनी भी टैलेंट है सब स्पिरिचुअल फील्ड में डाल दी बोल के यह पॉलिटिकल इकोनॉमिकल सिविलाइजेशनल फील्ड में हम पीछे रह गए तो जैसे भी आप इंटरप्रेट कीजिए एक ऐसी परिस्थिति 18th सेंचुरी में आकर के खड़ी हुई थी कि भारत जैसे कि गुलाम देश बन गया था जिसकी भी इच्छा हुई हमारे पे आके अत्याचार गुजारता था और हम कुछ नहीं कर पाते थे। और फिर देखिए कि जगत को भी तो एक लेवल से परे जाना है। यह 18th सेंचुरी का जगत और यह आज 20थ सेंचुरी का जगत यह पिछले 200 सालों में देखिए कि हम कहां थे, कहां आ गए? तो यह जो इनक्रेडिबल लीप जो है इवोल्यूशन का यह कैसे लिया गया? तो हमारे संस्कार जो है संस्कार शुद्ध हो गए हैं। यह नई जितनी भी संतति है यह नई जितनी भी रिप्रोडक्टिव साइकिल है उसमें टैलेंट का उन्नत किस्म की टैलेंट का हायर लेवल एडवांस टैलेंट का प्रादुर्भाव हुआ है। बोल करके ही तो आज हमने यह मॉडर्न एआई है, क्वांटम डायनेमिक्स है, स्पेस साइंस है, एडवांस मटेरियल है, इलेक्ट्रॉनिक्स है, जेनेटिक्स है। यह सब तो हमने खोजा है, डेवलप किया है। तो, यह सब कैसे होगा? हमारे कलेक्टिव संस्कारों को धो दिया गया है। यह धोने का काम किसने किया है? ठाकुर ने किया है। ठाकुर कहते हैं जगत के जितने भी कुसंस्कार थे उसका जितना भी पाप या तो फिर यह जो उसको भोग करना था वह सब मेरे ऊपर में ही हो गया। आपके संस्कार धू गए हैं। आपके संस्कार क्लीन हो गए हैं। अभी आपको ब्लैंक स्लेट आपको मिला है। आपके भीतर में टैलेंट है। विद्या है। ठाकुर ने आपको आशीर्वाद दिए हैं। अभी इस आशीर्वाद का उपयोग करके आप अपनी सिविलाइजेशन को और ज्यादा एडवांस कीजिए। देखिए कि आज हम यह कहते हैं कि सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग है अपना। वह स्वामी जी ने डेवलप किया है। या तो फिर स्वामी जी के यह जो वचन है, प्रवचन वगैरह है, उनको सुनकर के समझ के हमको पता चलता है कि किस तरह से सिविलाइजेशन कार्य करता है। राइज कैसे होता है, डेवलपमेंट कैसे होता है, डिटेरेशन कैसे होता है? और फिर डिस्ट्रक्शन कैसे होता है? सृष्टि, स्थिति, प्रलय, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि सिविलाइजेशन के साथ में कैसे होता है? है। स्वामी जी को पढ़ के समझ में आता है। किंतु इसी सिविलाइजेशन को एक जंप देना, एक इवोल्यूशनरी लिप प्रदान करवाना यह कार्य तो किया है ठाकुर ने। हमारे कलेक्टिव संस्कारों को क्लीन करके वाश करके ठाकुर ने यह हमको आशीर्वाद दिया है। और इसीलिए देखिए कि आज हमारा जो एडवांसमेंट है पिछले 200 सालों में साइंस, टेक्नोलॉजी, आर्ट्स, कल्चर, सिविलाइजेशन, पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक्स, फाइनेंस, लर्निंग जो भी क्षेत्र में आप देखिए, इस सबके पीछे में मूल तो ठाकुर का आशीर्वाद छिपा है। क्योंकि यह जो हाईली टैलेंटेड एक के बाद एक जो साइंटिस्ट है, आर्टिस्ट है, इन लोगों का स्टेट्समैन है, इन लोगों का जो जन्म हुआ है, वह इसीलिए हुआ है कि ठाकुर ने हमको एक पॉजिटिव ट्रेट प्रदान की है। ठाकुर की वजह से हमारे ये जो जेनेटिक म्यूटेशन है वो कलेक्टिवली पॉजिटिव डायरेक्शन में गए हैं। बोलकर कि ये जो सडन लिप इन इवोल्यूशन है हमारी सिविलाइजेशन में वो आया है। ठाकुर नहीं होते तो देखिए कि सिर्फ टैलेंट होती तो यह देखिए टैलेंट का इन्होंने क्या किया। यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर ये सेकंड वर्ल्ड वॉर ये फिर कोल्ड वॉर रशिया के साथ में फिर इसमें भी यह न्यूक्लियर वेपंस यदि यह ठाकुर के आशीर्वाद नहीं होते। यदि यह ठाकुर ने हमारे संस्कारों को धोकर के साफ नहीं किया होता। यह जो बुरे कर्म है खा नहीं गए होते तो पता नहीं यही न्यूक्लियर वेपन हम एक दूसरे पर फेंकते और आखिर में पूरी पृथ्वी को तबाह कर देते तो इसीलिए आज का जो हमारा इवोल्यूशन है इसके पीछे में ठाकुर का आशीर्वाद है श्री माय शक्त उपलब्धि होो जे जगत कल्याण अवतीर्ण श्री ठाकुर व्याधीर उहाई प्रकृत व्याख्या मां को सच सच में ये उपलब्धि हुई कि जगत कल्याण के लिए अवतीर्ण श्री श्री ठाकुर के रोग का यही है सही व्याख्या नतुबा तदृश्य अपाप वि देह इ रूप जंत्रण आर की कारण थाकीते पारे वरना तो फिर ठाकुर की तरह तादृश्य ठाकुर की तरह अपापविद्ध पाप के द्वारा जो विद्ध नहीं हुआ है इस तरह के देह में इस तरह की यंत्रणा का और क्या कारण हो सकता है? इसके बाद में अभी जो नया टॉपिक स्टार्ट होता है, अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। ओम