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स्काय च धर्मस्य सर्व कर्मा स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः हमने देखा कल कि मां ने जो कहा आदर्श हिसाबे जा करते हुए तार ढेर बाड़ा करे छ अर्थात कि आदर्श के हिसाब से जो करना होता है वह बहुत ही बड़ा चढ़ा करके किया है और इस यह जैसे मैंने कहा था ना कि जब भी मैं पढ़ता हूं तो मैं जो भी पैसेज मुझे सिग्निफिकेंट लगते हैं उसको मैं मार्क कर देता हूं अंडरलाइन कर देता हूं तो इस सेंटेंस के नीचे में अंडरलाइन कि है यह बड़ा ही एक सिग्निफिकेंट स्टेटमेंट है कि हमको बहुत बार ऐसा लगता है कि इन्होंने जो कोई भी कार्य किया उसको वह इतना लिटरली क्यों लेते हैं ऐसा हम लोग जैसे कि अपने जी खुद के जीवन में ऐसा बहुत बार होता है कि हम लोग अभी जैसे कि मान लीजिए कोई भी एक आदर्श का पालन करना है तो हम अब जैसे कि परीक्षा की तैयारी के बारे में ही सोच लीजिए हमको पता है कि परीक्षा देने से अच्छे मार्क्स आएंगे विद्यार्थी धर्म का जो पालन करना है वह करेंगे और फिर इसकी वजह से हम जब अच्छे मार्ग से उत्तीर्ण होंगे तो अच्छी जॉब प्राप्त होगी या व्हाट एवर एंप्लॉयमेंट प्राप्त होगा और परिवार जनों का भरण पोषण कर पाएंगे तो आदर्श के हिसाब से एक विद्यार्थी को जो करना है वह है पढ़ाई लिखाई और अपने पिताजी और माताजी की आज्ञा का पालन और अपने गुरु की अभी इस आदर्श को आपने बहुत बार ऐसा होता है कि यथाशक्ति हम लोग पालन करते हैं जब अपने टीचर कुछ हमको होमवर्क देते हैं पिताजी हमसे कुछ काम करने को कहते हैं तो हम जितना हो सकता है उतना करते हैं हम लोग उसको एक्सट्रीम में जाकर के अक्षरशः पालन शायद नहीं करेंगे बड़ा ही रेयरली ऐसा होता है भगवान राम को जब ऐसा कहा गया कि वन में जाना है क्योंकि आपके पिताजी ने अपनी पत्नी को एक वचन दिया था उस वचन का पालन करने के लिए तो भगवान राम इस वचन का उत्था पन मने इस वचन को इग्नोर भी कर सकते थे कि अच्छा दशरथ ने जदी उनके पिताजी ने जो वचन दिया है वह तो एक स्पेसिफिक परिस्थिति में एक ऑब्लिगेशन में आकर के दिया है कि युद्ध के मैदान में वो हार होने वाली थी रथ का पहिया टूटने वाला था और कई-कई ने अपनी उंगली डाल दी वहां पर तो रथ बच गया और युद्ध में जीत गए अभी एक स्पेसिफिक कंडीशन में ऑब्लिगेशन में आकर के उन्होंने वचन दिया था अभी भगवान राम कह सकते थे कि इस तरह के ऑब्लिगेशन में आकर के एक तरह से ब्लैकमेल करके एक यदि उनको बताया जाता है कि अभी आपको राज सिंहासन छोड़ना है तो वह तो मना भी कर सकते थे कि इस तरह का ब्लैकमेल नहीं चलेगा वो कह भी सकते थे किंतु फिर भी उन्होंने अपने पिताजी के दिए हुए वचन की रक्षा करने का निर्णय किया और यही निर्णय उनको पुरुषोत्तम बनाता है और कोई भी होता उनकी जगह पर मान लीजिए हम खुद होते मैं खुद होता एक और है राज्य एक और है सन्मान पूरे मने इतने सारे लोग आकर के धन वैभव सीता मैया जैसी पत्नी के साथ में निवास और फिर अपने तो राजकुमार होंगे यानी कि एक मनुष्य को अपने जीवन में जो कुछ भी चाहिए सुख भोग धन विलास मान सम्मान सब कुछ भगवान राम के पास था जदी हम उनकी जगह पर होते यदि यह सब हमारे सामने होता उस समय उस समय उसका एक वचन के लिए त्याग कर देना वह अपने लिए कितना कठिन होता सोच करके देखिए किंतु आदर्श का पालन करना है आदर्श के पालन के लिए अपने शरीर पर कितने ही कष्ट क्यों ना आ जाए बहुत बार ऐसा होता है कि हम लोग कहेंगे कि चलो आदर्श का पालन करते हैं इसका क्या अर्थ है पढ़ाई लिखाई करेंगे आधा घंटा बढ़िया मजे से पढ़ाई लिखाई हुआ इसके बाद में अपना मन भटकने लगा इसके बाद में अपने मन ने कहा कि बहुत हो गया थोड़ा सा टीवी देख लेते हैं थोड़ा सा अपने मित्र के साथ में बाजार में घूम करके आ जाते हैं या तो फिर कोई सात्विक व्यक्ति होगा व बहाना बनाएगा तो कहेगा चलो मां को थोड़ा सा हेल्प कर लेता हूं किचन में खाना बनाने में कोई भी तरह से एक्सक्यूज देकर के पढ़ाई लिखाई से वह खड़ा हो जाएगा क्यों क्योंकि हम लोग ज्यादातर आदर्श का पालन वहीं तक करते हैं जब तक कि हमको उसकी कोई सिग्निफिकेंट कीमत ना चुकानी पड़े जब तक मैं सुख पूर्वक पढ़ाई लिखाई कर पाता हूं तब तक करूंगा किंतु जब मेरे शरीर को कष्ट होने लगा मेरे मन को कष्ट होने लगा एकाग्रता रखने में बड़ा ही दिक्कत हो रहा है बार-बार अपने मन को खींच करके अपने पढ़ाई के सब्जेक्ट में लाना पड़ रहा है उस समय मैं यदि विद्यार्थी धर्म का पालन करता हूं तो वह सही सही विद्यार्थी धर्म का पालन होगा वह सही सही आदेश का आदर्श का पालन होगा मैं अपना खुद का एक उदाहरण बताता हूं मेरे नाना यानी कि मेरे मां के पिता जी व मैं वो गांव में रहते थे मैं भी गांव में जाता था और उनके साथ में मेरा बहुत ही एक वोह मुझे मेरी बहुत मेरी केयर करते थे जब भी हम लोग छुट्टी में गांव में जाएंगे वह मेरी बहुत केयर करेंगे बड़ी संभाल रखेंगे बड़ा प्रेम करेंगे और हम बच्चे लोग भी उनको इतना कि अरे वो चलो अभी गांव में जाना है उनके साथ में खेलना है उनके साथ में बात करनी है वो चॉकलेट देंगे वगैरह जो भी है छोटे बच्चे लोगों को जिस तरह से आनंद आता है अपने वो बुजुर्ग वडील या तो रिलेटिव्स के साथ में बात करके अभी उनकी उम्र हो गई मेरी भी अभी उम्र बढ़ती जा रही है स्कूल ऑलमोस्ट मेरा खत्म हो गया है और फिर अभी एक बार क्या हुआ कि उनको कोई सीरियस बीमारी हो गई हॉस्पिटल में एडमिट करवाना पड़ा शहर में लाकर के तो अभी मुझे बोला गया कि तुम एक काम करो तुम्हारे पास में जब भी समय मिलता है तुम हॉस्पिटल में जाकर के उनके साथ में बैठना तब मुझे लगा अरे भाई मेरा क समय तो इतना कीमती है मुझे इतना सब कुछ करना है मैं कहां दिन भर हॉस्पिटल में बैठा रहूंगा मेरे पास में तो इतना सब सब यह है मेरे सर के ऊपर में सब बोझा है मेरे सर के ऊपर में इतना जिम्मा है हॉस्पिटल में बैठने के लिए कहां मेरे पास में समय है एक चीज दूसरा कि क्या हॉस्पिटल में बैठने की जरूरत भी है कि नहीं है एडमिट किया है तो वहां के लोग उनको देखेंगे उसमें क्या मेरी जरूरत है किंतु दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि देखिए कि मैं जब छोटा था तो मैं उनकी प्रति देख कर के मैं उनको कितना सम्मान देता था उन्होंने मुझे कितना प्रेम दिया है अभी आज उनको मेरी जरूरत है तो मैं ऐसा सीधा ठुकरा दूंगा कि नहीं मेरे पास में बहुत मुझे घूमने के लिए जाना है मुझे स्कूल में जाना है मुझे यह करना है वो करना है ऐसा करके क्योंकि हॉस्पिटल में बैठना जैसे यदि कोई कष्ट नहीं होता तो अभी कोई ऐसा बोलेगा कि चलो कहीं घूमने के लिए चले जाओ उनके साथ में तो बढ़िया मजे से मैं घूमने के लिए चला जाता क्यों क्योंकि वह मुझे आनंद देता है किंतु हॉस्पिटल में बैठना वहां का एक डिप्रेसिंग एटमॉस्फियर होता है वो एक मने एक बहुत ही बेकार चीजें हॉस्पिटल में किसी पेशेंट के साथ में बैठना वो जिसने भी एक्सपीरियंस किया है उन सबको पता है और फिर वह एक टेंशन वाला भी काम है एक डिप्रेशन सिंह भी एक है पूरा एटमॉस्फेयर तो वहां पर बैठना अर्थात कि मुझे एक अपना खुद का सुख और भोग त्याग करके कष्ट सहन करना पड़ता है तो मैं कष्ट सहन करके क्या मैं आदर्श का पालन करूंगा कि नहीं करूंगा वो देखने की बात है अब छोटे हैं आप उनके मैं उनके पास में जाता हूं खेलने के लिए वह मुझे कहीं प घुमाने के लिए ले जाएंगे तो मैं कहूंगा चलिए चलिए मैं हमेशा आपके साथ में जाने को तैयार हूं इसके लिए यदि आप घुमाने को ले जाएंगे तो फिर मैं यह नहीं कहूंगा कि मुझे यह काम है मुझे वो काम है उस समय में ये सब बहाने नहीं निकालूं तो हॉस्पिटल में बैठना है उस समय में 10 बहाने निकालू तो वो मुझे उस समय स्ट्राइक हुआ था जब मुझे बोला गया था और मैं जब बहाने बनाने का शुरू कर रहा था उसी समय मुझे लगा कि अरे मैं जब छोटा था तब तो मैं सब समय उनके साथ में खेला करता था उस समय तो मुझे समय का कोई प्रश्न नहीं लगा उस समय तो मुझे ऐसा नहीं हुआ कि अरे मैं 10 काम छोड़ कर के उनके साथ में बात कर रहा हूं खेल रहा उस समय तो मैं बढ़िया मजे से उनके साथ में समय व्यतीत कर रहा हूं आज उनको जरूरत है और मैं यदि उनके साथ में समय व्यतीत करता हूं और मुझे जो कष्ट हो रहा है तो कष्ट हो रहा है बोलकर के क्या मैं उनको छोड़ दूंगा यह बात जैसे मेरे मन में आई तो मैंने ठीक किया कि अच्छा ना ठीक है मैं रहूंगा हॉस्पिटल में जितना हो सके मेरे से उतना मैं समय वहां पर दूंगा और मैं रहा भी था अभी ऐसा नहीं है कि मैं कोई बहुत बड़ा आदर्श का पालन यहां पर कर दिया है किंतु ये आदर्श पालन का यह एक क्राइटेरिया है जब तक हम सुख पूर्वक आदर्श का पालन कर सकते हैं तब तक हम सभी लोग करेंगे पालन और फिर गांव में जाकर के उसकी बढ़ाई भी मने सबके सामने करेंगे कि मैंने यह कर दिया है मैंने वह कर दिया है देखा आदर्श का पालन मैं किस तरह से कर रहा हूं सब कुछ ठीक है किंतु जैसे ही आदर्श पालन करने में एक के बाद एक विघ्न आना शुरू हो जाएंगे हम को कष्ट उठाना पड़ेगा हमको परिश्रम करना पड़ेगा उस समय क्या हम आदर्श का पालन करेंगे कि नहीं वह एक देखने की बात है यह सत्याग्रह की यह जो हमारी मूवमेंट यह जो गांधी जी ने महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए सत्याग्रह की यह जो मूवमेंट स्टार्ट की थी वहां पे ऐसा था कि हम लोग किसी भी तरह की हिंसा नहीं करेंगे यहां तक कि पुलिस वाले लाठी चार्ज भी करेंगे तो हम लोग चुपचाप उसको सहन करेंगे तो ठीक है जब तक हम आश्रम में बैठे हैं उनके साथ में जब तक वह बढ़िया मजे से 10 लोग इकट्ठा हो कर के हमको फ्रीडम चाहिए और फ्रीडम लेने के बाद में हम इस तरह से देश को आगे बढ़ाएंगे वगैरह वगैरह सब चर्चा विचारणा कर रहे हैं जब वह कांग्रेस का अधिवेशन है वहां पर बड़े-बड़े प्रवचन दे रहे हैं तब तक तो आदर्श का पालन सत्याग्रह का पालन अहिंसा का पालन ठीक है किंतु एक बार जब वह पुलिस वाले आ गए लाठी चार्ज किया और लाठी अपने शरीर पर पड़ने लगी उस समय हाथ नहीं उठाना या तो दौड़ कर के भाग नहीं जाना वह सही सही कसौटी है वह सही सही परीक्षा है कि हम लोग सत्याग्रह का आदर्श कितना पालन करते हैं तो यहीं पर भी मां के जीवन में देखिए मां ने जिस तरह से आदर्श का पालन किया बाद में ही इसी पैराग्राफ के बाद में ही गंभीरानंद जी महाराज लिखेंगे कि देखिए कि मां के जो पति थे श्री रामकृष्ण देव व निर्धन थे ऐसा तो नहीं था एक समय था कि मथुर बाबू ठाकुर की सेवा करते थे उसके बाद में यह शंभू चरण मल्लिक ठाकुर की सेवा करता था ठाकुर के कोई ना कोई रसत दार हमेशा से रहे हैं ठाकुर हमेशा किसी रसत दार को बोल कर के मां के लिए जिस तरह की भी ट्रीटमेंट है जिस तरह की सुख सुविधा है वो उपलब्ध करवा सकते थे इस बात में कोई डाउट हमको नहीं है गंभीरानंद जी महाराज स्वयं इस बात को लिखते हैं इसके बावजूद मां ने अपनी गरिमा को बना कर के रखा मां ने अपनी महत्ता को बना कर के रखा मां ने ऐसा नहीं कहा कि अपने पति को जाकर के कि अरे जी सुनिए आपके तो इतने बड़े-बड़े धनवान सेवक है शिष्य है वह जो मारवाड़ी भी एक आता है वह फिर और भी कितने लोग जद आप पैसा मांगना शुरू कर देंगे तो देने वाले लोगों की कमी नहीं रहेगी आप ठाकुर को तो छोड़ ही दीजिए यहां पर राम कृष्णा मिशन में हमको कोई बिल्डिंग बनाना है कोई सेवा कार्य चालू करना है कोई एक्टिविटी स्टार्ट करनी है उसके लिए हम लोग पैसा मागते हैं तो हमको फटाफट पैसा मिल जाता है तो ठाकुर की तो बात ही कहां है ठाकुर जब मांगेंगे वह उनको आकर के मिल जाता तो मां ने अपने पति के पास जाकर के ऐसा नहीं कहा कि आपके इतने धनी शिष्य है तो आप मेरे परिवार का यह कुछ आप उपाय कर दीजिए क्योंकि श्यामा सुंदरी देवी जयराम बाटी में जिस तरह से निर्धन अवस्था में रहती थी उस अवस्था को देख कर के मां को तो मन में कष्ट होता ही होगा तो यहां पर दो चीज है एक तो मां की खुद की बीमारी जिसकी ट्रीटमेंट बड़ी ही मुश्किल से हो रही थी कलकाता में और गांव में तो कुछ भी नहीं था ट्रीटमेंट के नाम पर और दूसरा कि अपने घर की निर्धनता इन दोनों का उपाय माने अपने पति को बोलकर के करवाया होता श्री श्री राम कृष्ण देव को बोल कर के करवाया होता किंतु फिर भी मां ने ऐसा नहीं किया क्यों क्योंकि मां ने खुद ठाकुर को कहा था कि मैं आपको धर्म के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए सहाय करने के लिए आई हूं नहीं कि मैं आपको धर्म के रास्ते से कर देने के लिए आई हूं धर्म के रास्ते से अलग कर देने के लिए क्यों क्योंकि यदि ठाकुर अपने भक्तों से पैसा मागते तो पूरा ठाकुर का जो सत्व है ठाकुर की गरिमा है सब कुछ खत्म हो जाता वो जैसे दूसरे साधु लोग एक किसी भी तरह का कुछ मने एक ट्रांजैक्शन होता है ना मैं आपको उपदेश दूंगा या आशीर्वाद दूंगा सामने में आप मुझे इतना पैसा दे दीजिए मुझे इतना कुछ कर दीजिए यह तो पूरा ट्र एक पूरा एक यह हो गया दुकानदारी हो गई आप दुकान में जाते हैं बोलेंगे एक किलो आलू दीजिए उसके सामने ये 0 50 जो जो भी उसकी कीमत होती है मैं आपको देता हूं यह तो दुकानदारी हो गई उपदेश देकर के आशीर्वाद देकर के सामने में पैसा मांगना उपदेश और आशीर्वाद हमेशा निशुल्क ही होते हैं हमेशा फ्री ही होते हैं तभी तो वह आशीर्वाद कहे जाएंगे बिना आशी जब भी आशीर्वाद के ऊपर में कोई एक प्राइस टैग लगता है उसी समय आशीर्वाद की कीमत मिट्टी में हो जाती मिट्टी की हो जाती है व मिट्टी में मिल जाता है फिर आपने जितना रुपया दिया उतना ही बेनिफिट आपको होगा उससे ज्यादा और कुछ नहीं होगा ये पूरा ट्रांजैक्शन है गुरु शिष्य का जो कि दुकानदारी से पर्य है जो कि एक सांसारिक संबंध से परे हैं तो इस शुद्ध पवित्र भाव ठ मेंटेन करें इसीलिए मां ने ठाकुर के पास से कभी भी कुछ भी मांगा नहीं भले ही चाहे अपनी मां को शारीरिक परिश्रम करती हुई देख रही थी मां उनके मन को कितना कष्ट होता होगा किंतु फिर भी जो आदर्श है वह आदर्श है आदर्श का सही सही पालन तभी होगा जबकि उस आदर्श के पालन के लिए हमको शारीरिक कष्ट करना पड़े जब तक सब कुछ अच्छा चल रहा रहा है सब कुछ बढ़िया चल रहा है और हम आदर्श का पालन करते हैं उस बात का तो कोई मतलब नहीं है वह आदर्श का पालन हुआ तो हुआ नहीं हुआ तो नहीं हुआ बहुत सारे लोग कहते हैं ना कि दान सही सही दान किसको कहते हैं एक लखपति आदमी है उसने ₹1 दे दिया किसी भिखारी को दया के वजह से और सब लोगों को घूमते फिरते कहता है मैंने उसको ₹1 दे दिया देखो भिखारी को तो ₹1 मुश्किल से भीख में मिलता है आज उसको ₹1 मिल गया ने कितना बड़ा काम कर दिया ठीक है भिखारी को आपने रुपया दिया अच्छी बात है और एक गरीब आदमी है जिसकी आय मुश्किल से ऐसी है कि वह अपने घर में खाने पीने की व्यवस्था नहीं कर पाता किंतु जब भी कोई भी आगंतुक आता है कोई भी दरिद्र व्यक्ति उसकी नजर के सामने आता है तो उसके सामने जो कुछ है सब कुछ उसको दे देगा अभी वह जो दिया है उसकी कीमत शायद वो धनी के 00 रप के डोनेशन से कम होगी किंतु यहां पर उसको तो परिश्रम करना पड़ा है उसको तो खुद को एक कष्ट उठाना पड़ा है अपना दे देने के लिए वह है सही दन वह जो एक प्रख्यात नेवले की कहानी है भगवान युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध के बाद में राजसूय यज्ञ किया फिर वहां पर वह जो होम यानी कि यज्ञ की वह जो राख है वो राख में आकर के देखा कि एक नेवला आकर के उसमें वो ें रहा है उसमें वह आलोट रहा है वो रोल हो रहा है उसके भीतर में और उसका आधा शरीर सोने का है तो द्रुत युधिष्ठिर ने यह देख कर के पूछा कि अरे भाई तुम्हारा यह आधा शरीर जो है वह सोने का कैसे हुआ और फिर यह भी तो बताओ कि यहां की यज्ञ की यह पवित्र राख है उसमें प्रवेश करके तुमको डिसपिटर क्यों हो रही है तुम निराश क्यों हो गए हो बताओ तुम्हारी क्या कहानी है तब इस नेवले ने कहा कि महाराज जी सुनिए मैं एक बहुत ही भूखा था एक गरीब परिवार में एक किसान के परिवार में गया मैंने उनसे रोटी मांगी खाने के लिए देखा कि उनके परिवार में एक ही रोटी थी और उस रोटी उन्होंने क्या किया कि मुझे खाने के लिए दे दी और जैसे ही मैंने खाई मेरी जान तो बच गई किंतु यह जो परिवार था पति पत्नी और उनका पुत्र उनका देहांत हो गया भूख के मारे तो उस समय उनके चूल्हे की जो राख है उसमें मैंने जब प्रवेश किया तो मेरा आधा शरीर सोने का हो गया है और मैंने सोचा कि मेरा जद आधा शरीर सोने का हो गया है तो कैसे हुआ कोई बहुत बड़े दानवीर के यहां पर अग्नि प्रकट जाती है उसकी राख में प्रवेश करके ही तो शरीर सोने का होता है तो आपने तो इतना बड़ा राजस यज्ञ किया इतने हजारों लाखों ब्राह्मण को इतनी सारी दक्षिणा दी इतनी सारी प्रणामी दी तो इसका अर्थ है कि यदि आपके यहां पर यह अग्नि प्रकट गई है होम की पवित्र अग्नि इसकी राख में मैं प्रवेश करूंगा तो मेरा बाकी का आधा शरीर भी तो सोने का हो जाएगा ऐसा करके मैं इस अग्नि में इस राख में प्रवेश तो किया किंतु मेरा आधा शरीर जैसे वो है वैसा ही रह गया वह सोने का नहीं हुआ इस बात को देख कर के मैं निराश हो गया हूं तो देखिए कि इस कहानी के पीछे तात्पर्य क्या है एक बहुत बड़ा महाराजा लाखों करोड़ों सुवर्ण मुद्राएं दान में देता है हजारों ब्राह्मण को ब्राह्मण भोज करवाता है सबको अपने पूरे राज्य को खिलाता है पिलाता है सब कुछ करेगा किंतु उससे जो पुण्य प्राप्त होता है उससे लाखों गुणा पुण्य लाखों गुना पुण्य उनको प्राप्त होता है जिनके पास में एक ही रोटी थी और अपने जीवन की रक्षा करने की वजह आगंतुक को अपने मेहमान को वह रोटी खिला द तो यह आदर्श सही सही किसको कहते हैं यह है आदर्श कि अपने को कष्ट होना चाहिए यदि अपने को कष्ट होता है परिश्रम करना पड़ता है आदर्श का पालन करने के लिए तभी वह सर्वोच्च आदर्श का पालन होगा और इसीलिए मां ने हमको कहा है कि आदर्श पालन करने के लिए जो करना पड़ता है मैंने बढ़ चढ़ करके किया है कुछ भी कमी नहीं रहने दी अपनी मां को अपनी नजरों से देखा है शारीरिक परिश्रम करते हुए दूसरों के घर का कार्य करते हुए उन्होंने खुद अपना खुद का शरीर र्ण शीर्ण हो गया अपने पति देव के पास से कोई सहाय नहीं मांगी कि हां आप मेरी ट्रीटमेंट करवाने के लिए आपका सब कुछ छोड़ दीजिए मेरे पर पूरा ध्यान दीजिए ठाकुर को उनकी ईश्वर साधना में विघ्न ना हो उनको अपने शिष्यों के सामने हाथ ना फैलाना पड़े इसके लिए वह जयराम बाटी आ गई है तो यह है आदर्श का सही सही पालन और इसीलिए माने कहा है कि आदर्श हिसाबे जा करते होए तार ढेर बाड़ा कोरे जीी आदर्श के हिसाब से जो करना होता है वह कहीं बढा चढ़ा करके किया है नाम मात्र का आदर्श पालन नहीं किया सही सही आदर्श पालन किया है अभी महाराज जी आगे लिखते हैं शास्त्र का गणे सिद्धांत तो ही ज शास्त्र का गण अर्थात की शास्त्र के रचयिता है उनका सिद्धांत यही है कि भक्ते भक्ति आकर्षण देवता जागृत होन भक्त की भक्ति के आकर्षण से देवता जागृत होते हैं ठाकुर ने खुद ने कहा है ना यहां पर जो कुछ भी देख रहे हो ही सब किछु और जन्नो नरन की ओर उंगली निर्देश करके इशारा करके ठाकुर ने कहा कि यहां पर जो कोई भी आध्यात्मिक विलास ईश्वरीय विलास ईश्वरीय अवतरण जो देख रहे हो वह सब कुछ तो उसके लिए है अर्थात की नरेण के लिए है नरेण ने ही यह पुकारा था नरेण अर्थात की स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम स्वामी विवेकानंद ने ही वो सप्तऋषि मंडल में थे उन्होंने देख होगा कि अपने देश की या तो फिर पृथ्वी की कहो सिर्फ भारत की क्यों हम लोग ऐसा क्यों कहे कि भारत की दुरावस्था का समाधान करने के लिए स्वामी जी ठाकुर मां आए हैं स्वामी जी अमेरिका गए भारत के लिए धन संग्रह करने के लिए किंतु अमेरिका जाकर के देखा कि भारत को जितनी योग और वेदांत की जरूरत है उससे कहीं ज्यादा अमेरिका को है क्यों क्योंकि वह सुख भोग की ति कवाद की चरम सीमा पर तो यह देश बैठा है किंतु भीतर में शांति नहीं है भीतर में खालीपन महसूस हो रहा है और यदि यह शांति नहीं मिलेगी तो यह पश्चिमी देश पूरे विश्व को बार-बार युद्ध के अग्नि में डूबा देंगे युद्ध में आहुति दे देंगे और शायद हो सकता है कि इससे मनुष्य जाति का भी विनाश हो जाए तो यह बात हमने सही सही में देखी प्रथम तो यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर उसके बाद में यह सेकंड वर्ल्ड वॉर और उसके अंत में यह न्यूक्लियर वेपंस का आविष्कार एटम बम का आविष्कार और यही एटम बम अमेरिका और यह सोवियत यूनियन हजारों हजारों एटम बम बना कर के एक दूसरे के सामने खड़े करके बैठे हुए हैं यदि अमेरिका अमेरिका को शक होगा कि सोवियत यूनियन एटम बम फेंकने वाला है तो पहले ही मैं फेंक दूंगा क्यों क्योंकि मेरे पर पहले एटम बम गिर गया तो फिर सामने काउंटर स्ट्राइक करने का समय ही नहीं मिलेगा वह तो सब कुछ नष्ट कर देगा यानी दोनों लोग यह राह देख कर के बैठे हैं माने फेंकने की बात तो दूर रही यह यदि रूमर भी चली आए यह अफवा भी चली आए कि सामने वाले एटम बम फेंकने की तैयारी कर रहे हैं या कोई मिश्चीफ कर रहे हैं कुछ गड़बड़ करने वाले हैं इमीडिएट हम लोग सर्वप्रथम एटम बम फेंक देंगे जिससे कि सामने वा वाले का पूरा देश खत्म हो जाए विध्वंस हो जाए और हम बच जाए किंतु एटम बम का यही प्रॉब्लम है आपने 10 15 20 25 एटम बम अपने विरोधी अपने दुश्मन के ऊपर में फेंक दिए तो दुश्मन का तो सफाया हो ही जाएगा साथ में अपना भी सफाया हो जाएगा पूरी पृथ्वी का विनाश हो जाएगा आज से 10000 साल पहले सिविलाइजेशन या मानव सभ्यता जहां पर थी मुश्किल में से जंगल में से बाहर निकल कर के हम लोग यह गांव बसा रहे थे खेती की पद्धतियां आविष्कार कर रहे थे वहां पर पहुंच जाएंगे यह आइंस्टाइन को किसी ने पूछा था कि सेकंड वर्ल्ड वॉर में तो इतने सब आधुनिक अस्त्र शस्त्रों का आविष्कार हुआ तो आप यह बताइए कि यदि थर्ड वर्ल्ड वॉर होगी तृतीय विश्वयुद्ध उसमें तो कौन-कौन से बड़े-बड़े एडवांस अस्त्र शस्त्र आविष्कर होंगे तो आइंस्टाइन ने उत्तर दिया कि मुझ यह नहीं पता कि तृतीय विश्वयुद्ध में कितने बड़े वेपन कितने एडवांस कितने अत्याधुनिक अस्त्र शस्त्र इस्तेमाल होंगे किंतु मैं यह आपको निश्चित रूप से कह सकता हूं कि चतुर्थ विश्व युद्ध जब होगा फोर्थ वर्ल्ड वॉर जब होगी वो पत्थर और लकड़ियों से लड़ी जाएगी क्यों क्योंकि थर्ड वर्ल्ड वॉर में जो विनाश होगा पृथ्वी का हम लोग वही स्टोन एज में वापस चले जाएंगे तो देखिए कि यह जो आदर्श का पालन करना है और उसके लिए भगवान का अवतरण होता है वह क्यों होता है पूरी पृथ्वी को शांति देने के लिए सिर्फ बात यह नहीं है कि हमको भारत की रक्षा करने के लिए भारत के उद्धार करने के लिए अवतार का आगमन हुआ है पूरी पृथ्वी के उद्धार के लिए सिंहवाहिनी र जागरण आमरा इ हार प्रमाण पाइया छी सिंहवाहिनी देवी के जागरण से उनकी जागरण से हमने यह प्रमाण पाया है क्या प्रमाण पाया है कि भक्त की भक्ति के आकर्षण से देवता खुद पृथ्वी पर आकर के अवती होते हैं शास्त्र वित संप्रदाय इहा सुविधि तो जे शुद्ध सत्तो मोन जे विषय बा क्रिया के विश्वास पूर्वक लंबन करे उ हाते एमन एक अलौकिक शक्ति आहित होए जहार महिमा रूप तुच्छ विषय बा क्रिया मद दिया अचिंत पूर्व फलेर उत्पत्ति होय शास्त्र विद संप्रदाय अर्थात की वही शास्त्र का गण यह लोग यह भी जानते हैं कि शुद्ध सत्व मन जो विषय या तो फिर क्रिया के ऊपर में विश्वास पूर्वक उसका अनुष्ठान करते हैं उस क्रिया में इतनी एक अलौकिक शक्ति प्रकट होती है कि जिसकी महिमा से उस तरह की सक्ष तुच्छ विषय या तुच्छ क्रिया के भीतर में भी एक अचिंत पूर्व फलेर उपलब्धि होए जब कोई महत व्यक्ति होता है वह यदि कोई सामान्य कार्य भी करता है तो महत व्यक्ति की महत्ता इस सामान्य कार्य या सामान्य अनुष्ठान में प्रविष्ट होकर के उसमें इस तरह का एक देवी प्राण संचार करती है कि उस महत्ता के परिणाम से एक सामान्य तुच्छ कार्य भी एक ऐसी एक ऐसा रिजल्ट देगा एक ऐसा परिणाम देगा कि वह परिणाम देख कर के हम सभी लोग आश्चर्य चकित हो जाएंगे अभी देखिए कि जैसे स्वामी जी भारत में ने आकर के एक छोटे से मठ की शुरुआत की एक छोटे से मठ का प्रारंभ किया बेलूर मठ का अभी बेलूर मठ में कौन है उस समय 1520 साधु थे इतने 30 करोड़ के देश के भीतर में यह 15-20 साधु एक छोटे से मठ में रह रहे हैं उन्होंने ठीक किया कि एक स्कूल यहां पर खोलेंगे एक अनाथ आश्रम वहां पर खोलेंगे यह थोड़ा सा रिलीफ वर्क करेंगे मुट्ठी भर साधु और यह मुट्ठी भ डिवटी और वॉलेटिवृपालेम में पार्टिसिपेट किया उसी की वजह से तो कोई देश कोई भी देश यह उन्नत होता है या तो फिर यह देश आजाद होता है यह चंद साधु मिलकर के चंद जो सेवा कार्य जो कर रहे हैं उससे देश का क्या लाभ होने वाला है यह प्रश्न हमको होता है किंतु देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं एक देवी शक्ति संपन्न महापुरुष एक सामान्य कार्य भी करता है तो उस सामान्य कार्य से जो महाशक्ति प्रकट होती है पूरे विश्व में आ जाती है पूरे विश्व में उसका परिणाम देखने को मिलता है यहां पर भी वही बात है आप जितना हमारी भारत की फ्रीडम मूवमेंट का स्टडी करेंगे जितने सर्वश्रेष्ठ हमारे राजनेता थे ये सुभाष चंद्र बोस भगत सिंह से स्टार्ट करके जितने भी है सभी लोग स्वामी जी से प्रभावित थे स्वामी जी के विचार पढ़ करर के बेलूर मठ की मुलाकात लेकर के साधु का त्याग तपस्या सेवा भाव देख कर के उन्होंने आदर्श वही आदर्श यथाशक्ति अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया उस आदर्श को अपने जीवन में प्रैक्टिकल करने का प्रयास किया और यह सब प्रथम पंक्ति के राजनेताओं की मदद से ही उनके पुरुषार्थ से ही भारत को आजादी मिली है आप लोग सोचेंगे कि कहां यह छोटा सा बेलूरमठ कहां यह 1015 साधु कहां यह चंद रिलीफ वर्क और यह कुछ छोटे-छोटे स्कूल कंपेयर टू इंडिया भारत की जो जनसंख्या है 30 करोड़ की उसकी कंपेयर में इवन आज भी देखिए आज भी देखिए कि वैसे तो हमको लगता है कि रामकृष्ण मिशन के 250 सेंटर ना कि 200 सेंटर इतने सारे सेंटर हैं हमारी स्कूलों में आज लाखों स्टूडेंट पढ़ाई लिखाई करते हैं हमारे हजारों साधु है लाखों को लगता है कि हम लोग पूरे विश्व में छाए हुए हैं किंतु फिर भी भारत की जो जनसंख्या है 150 करोड़ की उसके सामने तो हम गागर में एकने सागर में एक गागर की जैसे है मने सागर में एक बिंदु की तरह है एक छोटा सा हमारा अस्तित्व है किंतु यह जो विचार है ठाकुर मां स्वामी जी के जो आदर्श है जो कि रामकृष्ण मिशन के माध्यम से प्रसारित होते हैं भारत देश के विश्व के प्रत्येक कोने में जाकर के कहां-कहां किसको इन्फ्लुएंस करते हैं कहां-कहां किसी के माध्यम से पता नहीं किस तरह का कार्य करवाते हैं उसी की मदद से ही तो यह भारतीय भारतीय और यह वैश्विक सभ्यता अभी भी टिकी है और अभी भी यह उत्तरोत्तर प्रगति कर रही है तो कार्य भले ही छोटा दिखता हो कार्य भले ही बड़ा सामान्य दिखता हो जयदिश क्ति संपन्न व्यक्ति उसका अनुष्ठान करता है तो उसका फल पूरे विश्व में प्रचारित हो सकता है पूरे विश्व का यह पथ दिशा परिवर्तित कर सकता तो आज हीत कल फिर से मिलते ओ शांति शांति शांति हरि ओ तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु देखिए ऐसा तो हम कैसे कह सकते हैं महाभारत का भी युद्ध हुआ भगवान कृष्ण के पूरे प्रयत्न के बावजूद पांडवों ने यहां तक कहा कि हमको सोय की यह जो एक सोय जहां पर रखते हैं उतना भी मिट्टी दे दो एक कण मात्र मिट्टी भी हमको एक कण मात्र जमीन भी हमको दे दो हमारे अधिकार में से फिर भी हम लोग युद्ध रोक देंगे तो वो पागल मने ये ये जो यह दुर्योधन वगैरह जो है दुशासन और यह शकुनी उन्होंने यह प्रस्ताव भी मना कर दिया कि एक सोए रखने वाली एक कण जैसी जमीन भी आपको नहीं देंगे तो फिर भगवान कृष्ण के सब प्रयत्न विफल गए और महाभारत जैसा युद्ध हुआ तो भविष्य में विश्वयुद्ध नहीं होगा ऐसा कौन कह सकता है किंतु जो बात आइंस्टाइन को नहीं पता थी या तो फिर जिस बात को आइंस्टाइन इमेजिन नहीं कर पाया था वह आज हम इमेजिन कर कर पाते हैं कि हमारे पास में आज स्पेसशिप है स्पेस टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो गई है कि यदि पृथ्वी का विनाश हो तो हम दूसरे ग्रह में जाकर के या तो फिर अवकाश में स्पेस स्टेशन बना करर के नई सभ्यता प्रारंभ कर सकते हैं टेक्नोलॉजी जैसे विष है तो विष का यह जो औषध है वह भी तो टेक्नोलॉजी हमको यह प्रोवाइड करती है तो यानी कि यदि विश्व युद्ध होगा भी तो भी तो एक आशा है कि हम मनुष्य सभ्यता को दूसरे ग्रह पे या तो अवकाश में जाकर के टिका सकते हैं ठाकुर के आने के बाद में फर्स्ट वर्ल्ड वॉर भी हुआ और सेकंड वर्ल्ड वॉर भी हुआ तो ऐसा तो हम कैसे कह सकते हैं और स्वामी जी तो ऑलरेडी अमेरिका में यूरोप में घूम कर के आए थे ऑलरेडी स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि यूरोप आज बहुत बड़े एक यह जो गन पाउडर है गन पाउडर के ऊपर में बैठा हुआ है बहुत बड़े बम के ऊपर में बैठा हुआ है 50 साल में इसमें विस्फोट होने वाला है तो मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि क्या करेंगे आप शांति देखिए कि हम लोग तो भक्त है हम लोग साधक है हम लोग चाहते हैं कि शांति से जिए और जीने दे किंतु ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जिनको शांति नहीं सुख भोग चाहिए और यह लोग सुख भोग के लिए कुछ भी करने को तैयार है तो अवतार के आने से कभी युद्ध टला नहीं ही है तो यह तो हम कोई सोरि नहीं है हम कोई गारंटी देकर के नहीं कह पाएंगे कि सभी साधु ब्रह्मचारी भक्त रामकृष्ण संघ के आज प्रयास करना प्रारंभ कर दे और यह तृतीय विश्व युद्ध टल जाए ऐसा कोई गारंटी नहीं दे सकते टल जा टल भी सकता है और टलेगा तो अच्छा ही है मानव मनुष्य सभ्यता के लिए किन तो कोई गारंटी नहीं देखिए कि यह विश्व तो रंग मंच है यदि ऐसा हो जाए कि वह अपनी ईश्वर जो दिव्य स्वरूप है उसी को प्रकट कर दे तो फिर तो यह जो लीला जो चल रही है वह लीला तो चलेगी नहीं वह जो बुढी छवा यह जो जो रम गेम है बंगाली में जो ठाकुर जिसका कि उल्लेख कर रहे हैं कि बूढ़ी बोलकर के एक पात्र या एक ये है पोस्टर पोस्टर है वो पोस्ट को यदि स्पर्श कर लेंगे तो यह खेल रुक जाएगा तो जब तक स्पर्श नहीं करेंगे तब तक यह खेल चलता रहेगा तो ठाकुर कहते हैं कि यह मां चाहती है कि यह खेल चलता रहे घुड़ी लखेर भीतर एकटा दूट के केटे हेश दाव मा हाथ चापड़ी यह हजारों लाखों पतंग उड़ती रहती है उसमें से एक दो पट पतंग को काट दिया अर्थात कि मुक्त कर दिया बाकी सब पतंग उसकी दौर इसी संसार में पकड़ करके रखे रही एक दो पतंग को काट कर के मुक्त कर दिया और मां हंसती हंसती तालियां बजाती है तो मां चाहती है कि यह संसार का खेल चलता रहे संसार के खेल में कभी-कभी हमको एक झलक दिख जाए दिव्यता की किंतु ऐसा ना हो जाए कि यह संसार ही असार है ऐसा पूरा ऐसा दृढ़ मन में आ जाए बिना किसी कष्ट या बिना किसी तपस्या किए कि फिर यह संसार वहां पर रुक जाए ऐसा ना हो सी के लिए यह पूरा जो खेल है कि दिव्यता की एक झाकी दिखानी है उसके बाद में आपको परिश्रम करके यह दिव्यता को प्राप्त करना है आपको भगवान ने सब कुछ गिफ्ट में दे दिया तो फिर तो हमारे मनुष्य जीवन में तो अर्थ ही क्या रह गया है ना तो हमको झलक दिखा कर के प्रेरणा देनी है आगे बढ़ने के लिए अपना खुद का परिश्रम करने के लिए नहीं कि हमको सब कुछ फ्री में दे देना है