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ओ स्थापक य च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय तेम कल हम लोग बात कर रहे थे कि अपने ऑर्डर में कैसे तीन मॉडल है एक तो है कि दक्षिणेश्वर मॉडल कि जसे ठाकुर अपने आध्यात्मिक ऐश्वर्य से बार-बार समाधि में चले जाते हैं विध्या की देवी सरस्वती स्वयं उनकी जिवा पर विराज होकर के सबको उपदेश देती है और फिर यह सतत एक कीर्तन भजन एक दिव्य आनंद का प्रवाह बहता है जैसे कि दक्षिणेश्वर में देर इज अ मार्ट ऑफ जॉय एक आनंद की हार्ट बसी हुई है तो वह एक मॉडल है कि सभी लोग वहां पर अट्रैक्ट हो कर के आते हैं इस ठाकुर के आध्यात्मिक ऐश्वर्य से दूसरा मॉडल देखा कि शिकागो मॉडल कि कैसे स्वामी जी की यह जो फिलोसॉफिकल अंडरस्टैंडिंग थी ईस्टर्न एंड वेस्टर्न फिलोसोफी दोनों की इन दोनों को उन्होंने इतना परफेक्टली ब्लेंड किया कि ऐसा नहीं है कि अमेरिका जाकर के कहा कि तुम लोग जो कर रहे हो सब गलत है हम लोगों की जो भारतीय विद्या है इसको स्वीकार कर लो और भारत में आकर के ऐसा नहीं कहा कि अमेरिका की यह जो काला पानी क्रॉस करके जो हम वहां की जो विद्या लेकर के आएंगे तो भारत देश पूरा करप्ट हो जाएगा ऐसा नहीं अमेरिका का जो कुछ अच्छा है साइंस और टेक्नोलॉजी उसको लेकर के भारतीय वेदांत को उसके आधार पर एक नई सिविलाइजेशन गड़नी है तो स्वामी जी का दिस ब्लैंड परफेक्ट ब्लैंड ऑफ मॉडर्निटी एंड दिस एंट विजडम ये दैट इज अ शिकागो मॉडल कि जब स्वामीजी ने ये चार योगों का समन्वय और यह सब कहा तो उससे अट्रैक्ट होकर के सब यंग लड़के आने लगे और फिर मां का एक मॉडल है जयराम बाटी मॉडल कि मां का हृदय इतना सहज सरल था वहां पर ना ही आपको दिखेगा विद्या का ऐश्वर्य ना ही दिखेगा कोई आध्यात्मिक ऐश्वर्य ठाकुर की तरह ऐसा नहीं है कि मां को इतनी कोई फिलोसोफी आती थी कि मां से अट्रैक्ट इस फिलोसोफी से लोग अट्रैक्ट होते ना कि ऐसा भी तो नहीं था कि जै मां को मां बार-बार समाधि में चली जाती थी तो इस तरह से लोग कोई उसको मां को मां के पास आते था तो सिर्फ एक सरल मातृ हृदय वो भी एक था और साथ में एक था मां का कि इतनी सरल थाने इतनी सरलता बच्ची की तरह मां कभी-कभी सरल होकर के व्यवहार करती थी तो इसके बारे में एक कहानी मुझे याद आ गई कि एक बार मां वहां पर रह रही है कोवाल पाड़ा में और हमको तो पता है कि यह जयराम बाटी मॉडल इससे अट्रैक्ट होकर के मां के पास कौन आए थे सबसे बड़ा जो वहां पे योगदान था यह कोवाल पाड़ा के लड़कों का मां ने एक बार कहा था कि इस जयराम बाटी जैसे इतने सुदूर ग्राम में मैं क्वाल पाड़ा के लड़के हैं उन्हीं के भरोसे में जी रही हूं उन्हीं के भरोसे मैं यहां पर रह रही हूं वरना कहां दूर गांव से शहर से कुछ चीजें लानी है सब्जी तरकारी यह वो नाज पाती वह सब आसपास के गांव में कहां मिलेगा वहां की दुकान में थोड़ा सा कुछ मिलेगा तीन-चार भक्त आ गए उन उनके लिए खाना बनाना है तो दुकान में जाएंगे जयराम बटी की दुकान में तो वह दुकानदार कहेगा कि आप इतना सब कुछ ले लेंगे तीन-चार लोगों के लिए तो मेरी दुकान बंद हो जाएगी दुकान में कुछ बचेगा ही नहीं और कुछ बेचने के लिए छोटी-छोटी दुकानें हैं वो छोटा-छोटा सामान बहुत ही अल्प परिमाण सामान रहता है तो यह क्वाल पाड़ा के लड़के थे जिनके भरोसे मां वहां पर रहती थी तो वहां के एक लड़के नाम वरदा महाराज बाद में उन्होंने सन्यास लिया हमको पता है कि केदार बाबू थे वो टीचर थे और केदार बाबू के कुछ स्टूडेंट उनमें ये वरदा महाराज एक थे उन्होंने मिलकर के कोआलपाड़ा आश्रमम बनाया था तो ये वर्धा महाराज की एक स्मृति कथा है मां का ये जो सहज स्वभाव जो है मनुष्य चित मातृ हृदय और एक बालिका की तरह वो कितना वो सुंदर कि क्वाल पाड़ा में रह रही है वो राधु को बच्चा होने वाला है और राधु का पगलापुर फिर अफीम खाने की प्रैक्टिस बना ली है मैंने वो ऐसा होता था कि बहुत दर्द होने से थोड़ा सा अफीम खिलाते थे उस समय तो यह पेन किलर वगैरह अवेलेबल नहीं थी ठाकुर को भी हमने कथामृत में देखा है कि वह वहां पर गए थे तो किसी ने कहा कि वोह पेट में दर्द हो जाए है तो थोड़ा सा अफीम खा लो तो ठाकुर भी थोड़ा-थोड़ा अफीम खाते थे तो एक्चुअली थोड़ा सा जदी मेडिकल दवाई के औषध के रूप में तो तो ठीक है किंतु उसको ज्यादा खाने से वह हैबिटेड हो जाता है आजकल भी देखिए कि लोग किस तरह से पेन किलर के हैबिट्युएट हो जाते हैं उसकी हैबिट पड़ जाती है यह सब जो दवाई है बड़ी डेंजरस तरह की होती है तो राधू ने भी यह अफीम खाने का अभ्यास कर लिया था और उसको भी यह हैबिटेड हो गई थी तो क्या उसका सब पागलपन दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है तो यह जो जिस तरह से राधू थी मां के भाई की लड़की वैसे ही नलिनी थी तो मा तो पूरा अपना संसार साथ में लेकर के घूमती थी तो जब भी कलकाता जाएगी तोय नलिनी जाएगी माकू जाएगी वो पागली मामी जाएगी ये राधू जाएगी सब मां के साथ में चलेंगे तो यहां पे भी क्वाल पाड़ा में पड़े हैं थे कोलकाता में राधू का कंप्लेन करना शुरू कर दिया कि यहां पर बहुत हल्ला होता है मैं रह नहीं पाऊंगी मुझे शांत जगह ले जाओ शांत जगह कहां पे खोजें तो आए क्वाल पाड़ा में व क्वाल पाड़ा में भी वो जो जगदंबा आश्रम आज जहां पे है मेन आश्रम में नहीं वहां पर तो फिर भी रहने से 10 लोग देखने वाले हैं हेल्प करने वाले हैं राधू कहती है कि मुझे तो अकेले में रहना है एकांत में थोड़ा सा भी आवाज मेरे से सहन नहीं होता तो ठीक है उसको लेकर के पागल को लेकर के गए वहां पर जगदंबा आश्रम में अभी तो क्या है कि हमारी पॉपुलेशन भी इतनी बढ़ती है और यह रास्ता आने जाने का कम्युनिकेशन इतना बढ़ गया है रास्ते सब इतने अच्छे हो गए हैं कि फट करके आप वो यदि आप आज का कोवाल पाड़ा दर्शन करेंगे तो जगदंबा आश्रम जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है बड़ा आसानी से जा सकते हैं रास्ता वगैरह बड़ा ठीक-ठाक हो गया है तो उस समय जबकि रास्ता भी बड़ा वैरान और गांव के लोगों की संख्या भी बड़ी कम उस उस समय तो यह जगदंबा आश्रम बिल्कुल इस तरह से था कि जैसे कि एक जंगल में था पूरा बाहर गांव से बाहर में था तो अभी वहां पर रह रही है और ये नलिनी एक दिन मां को कहती है कि अच्छा मां यह जो इस को दवाई वगैरह इसको खिलाते हैं इसके से कोई लाभ नहीं होने वाला राधु को एक काम कीजिए कि वो राधु की मां जो थी वो भी पगली थी तो उसका पागलपन अभी राधू के भीतर में आया है तो एक काम करो राधू की मां का पागलपन थोड़ा सा कम हुआ था क्यों क्योंकि पास में ही एक तिरोल गांव है वहां पे खेपा काली है खेपा काली अर्थात पागल लोगों की काली तो वो पागल लोगों की काली वहां पर जाकर के वहां के जो पुजारी वगैरह है ना तो किसी को इस तरह से पागलपन का दौरा पड़ता है तो वो लोग चूड़ी पहनाने को देते हैं या कड़ा देते हैं पहनाने को तो वो कड़ा ले आओ वो कड़ा पहनाए इस राधु को तो उसको कुछ ठीक होगा तो अभी मां तो बिल्कुल बच्ची की तरह कोई भी कुछ भी बोलेगा तो स्वीकार कर लेगी बोला अच्छा हां यह बात तो सही है कि राधू की मां को इस तरह से कड़ा पहनाया था खेपा काली का वो उसका पगलापुर द मामा को वरदा महाराज को कहती है जाओ जाओ तुम तिरोल जाओ और वहां से एक कड़ा लेकर के आओ अभी यह 32 किमी रास्ता अभी व साइकिल पर जाना साइकिल प आना और साइकिल भी वर्धा महाराज की बिगड़ गई थी तो आधा तो साइकिल चला के जाएंगे पैदल जाएंगे आधा साइकिल पर जाएंगे इतना कष्ट तो वरदा महाराज बोलते हैं अच्छा ठीक है चलो मां ने बोला है तो जाता हूं 32 किलोमीटर जाना 32 किलोमीटर आना वो कड़ा लेके आए और कड़ा राधू को पहनाया अभी कड़ा राधू को पहनाने से राधू का पागलपन तो कम नहीं हुआ राधू की मां का पागलपन बढ़ गया क्यों क्योंकि वो कहती है कि नलिनी क्या कहती है क्या बोलना चाहती है कि मेरी बच्ची पागल हो गई है इसलिए खेपा काली की चूड़ी उसको पहनाई है बोल कर के राधू की मां पागली मामी और नलिनी दोनों के बीच में झगड़ा बढ़ गया यानी कि ये कड़ा पहनाने से कहां यह राधु का पागलपन कम होता वो तो नहीं उसका तो पागलपन बरकरार रहा ऊपर से पागली मामी और नलिनी का झगड़ा लग गया अच्छा अभी कुछ दिनों के बाद में ये पागली मामी कहती है कि देखिए आपने यह सब जो मेरी बच्ची के साथ कर रहे हैं उसको खेपा काली का यह चूड़ी पहनाना यह तो बिल्कुल गलत है वह पागल नहीं है आप कलकाता से इसको यहां प लेके आई य यही आपने सबसे बड़ी गलती की है और राधू राधु की मां पागली मामी मां को कह रही है आप क्यों कलकता से उसको कुवाल पड़ाई से जंगल में लेके आई कोलकाता में तो इतने सारे डॉक्टर थे उसकी ट्रीटमेंट करते हैं अभी बिना मतलब यहां पर जंगल में पड़े हुए हैं आप एक काम कीजिए इसके सर प बर्फ लगाइए जब सर पे बर्फ लगाएंगे तो थोड़ा सा उसका सर थोड़ा ठंडा होगा अभी मां बिल्कुल बच्चे की तरह नहीं इधर सोचेगी नहीं उधर सोचेगी राधू प्रेग्नेंट है प्रेग्नेंट औरत के सर पर क्या किसी के सर पर क्या वो बर्फ लगाया जाता है तो मां ने ही इधर सोचा नहीं उधर सोचा तो बोला वरदा महाराज को कि जाओ तुम बर्फ लेके आओ विष्णुपुर 40 किलोमीटर दूर वहां से बर्फ लेके आओ अभी वरदा महाराज बेचारे मां का आदेश है तो क्या करेंगे पहले तो थोड़ी देर बोला कि नहीं कि मां बहुत दूर है इतना दूर से प दल जाना ये वो मां ने कहा नहीं नहीं तुम जाओ जाओ जाकर के बलफ लेके आओ मैं कहती हूं कुछ नहीं होगा तो फिर वरदा महाराज क्या बोलेंगे दूसरे दिन जाने को तैयार हुए मां ने उनके सर पे और सीने प थोड़ा सा जप कर लिया हाथ रख कर के और यह वरदा महाराज निकले साइकिल तो चल नहीं रही है तो साइकिल साथ में लेकर के पैदल चल रहे हैं फिर विष्णु पूर्ण की ही आधे रास्ते पे फिर वहां से ट्रेन में बैठे फिर वहां पर पहुंचे एक बर्फ लिया बर्फ को अच्छे से पैक किया क्रेट के भीतर में फिर आधा रास्ता ट्रेन में आधा साइकिल पे आधा पैदल वो आए और मां को दिया कि मां यह बर्फ तो मां और यह पागली मामी दोनों बड़े ही खुशी-खुशी राधू के सर पे बर्फ लगा रहा है कुछ सोच नहीं रहे हैं कि इसका क्या परिणाम होगा तो ठाकुर की कृपा से वो काली मामा आ गए उस समय अभी पता है कि काली मामा तो रहते थे जयराम बाटी में और बीच-बीच में मां के पास आते थे कोवाल पाड़ा क्या कि वोह कुछ खर्च का पैसा मिल जाएगा मां मां के पास में तो पैसा उनको लेने का बड़ा इच्छा रहता था कि मां के पास से कैसे भी करके पैसे पढ़ाए तो आ गए काली मामा मन में था कि मां के पास में से कैसे भी थोड़ा सा रुपया निकाले आ कर के देखा कि मां और पागली मामी दोनों बड़े खुशी-खुशी राधू के राधू प्रेग्नेंट है सोई हुई है उसके सर पर बर्फ लगा रहा है वो काली मामा बोलते हैं अरे दीदी यह क्या कर रही हो वो पागल के सर पर बर्फ लगाओगी तो बुखार हो जाएगा समझ में नहीं आ रहा है यह सब क्या चल रहा है तो मां तो बेचारी बड़ी डर गई बिल्कुल बच्ची की तरह तो डर करके कहती अरे अरे तो फिर क्या करें क्या करें बताओ देखो राधू पागलपन तो बढ़ता ही जा रहा है तो काली मामा फिर अभी मौका मिल गया है मां को डर दिखा कर के पैसा निकालने का तो काली मामा कहते हैं कि अच्छा एक काम करो ये जो राधू जो है ना उसको कोई ये मेडिकल प्रॉब्लम नहीं है वरना तो कोलकात्ता के डॉक्टर इसको कपक अच्छे से ट्रीट कर देते हैं इसका मेडिकल प्रॉब्लम नहीं है इसको भूत की हवा लगी है उसके सर पे कोई भूत सवार हो गया है एक काम करो यहां पे सुषण गेड़े बोलकर के एक जगह है वो जगह पे जाओ वहां पर एक तांत्रिक रहता है वो तांत्रिक क्या है यह सब विधि वगैरह करता है उसको बुला कर के लाओ वो तांत्रिक आएगा कुछ विधि करेगा तब राधू का सर ठीक होगा मां बिल्कुल बच्चे की तरह बच्ची की तरह सरल मां ने बोला अच्छा ठीक है ठीक है फिर वही वरदा महाराज को पकड़ा जाओ तो जाकर के व वो तांत्रिक को पकड़ कर के ले आओ तो वरदा महाराज बोले ठीक है मां अभी आप आदेश करते हैं तो वो वही टूटी हुई साइकिल पे वो कहीं प बेलगाड़ी में ऐसा रास्ते प गए वो तांत्रिक को जाकर के मिले और यह तांत्रिक लोग लोग भी बड़े मजे से रहते हैं वो कहते हैं ना कि जहां भी ये मूर्ख लोग रहते हैं ना वहां पर धुता रे भूखे नहीं मरते ऐसा गुजराती में कहत है मूर्खा हो जहां रहे त्या धुता रा भूखे न मरे एक्चुअली लोबिया किंतु लोबिया और मूर्खा वो एक ही तरह के है तो मूर्ख लोग जहां पर रहते हैं वहां पर ये ठग लोग कभी भी भूखे नहीं रहते तो अभी वोह जैसे ही उसने देखा कि हां यह साधु के कपड़े पहन के आ रहा है उसने ठीक कर लिया कि एक नया मूर्ख मिला है वो तो उसने जैसे ही वरदा महाराज उसके सामने आए वो नाटक करना शुरू कर दिया सर घुमा कर के और उसके सर सीने के ऊपर में वो काले तिल डाले और फिर बोला कि हां मुझे पता है कि आप आने वाले थे पहले ही मुझे आदेश मिल गया है और यह आदेश के अनुसार मुझे आपके साथ जाना होगा मुझे सब पहले से ही पता है वरदा महाराज को तो पता है कि ये नाटक कर रहा है किंतु क्या करें मां का आदेश है तो बोला कि ठीक है आप जयराम बाटी आइए अगले दिन तो बोला ठीक है मैं आता हूं दूसरे दिन ये तांत्रिक गया जयराम बाटी और मां का भी देखिए कहां जगत जननी आध्या शक्ति जगदंबा स्वयं वो ऐसा अपना वस्त्र साड़ी का वो वस्त्र अपने सर पर ढक कर के अपना सर वस्त्र से ढक कर के भूमि होकर के इस तांत्रिक को इस ठग को प्रणाम करती है और फिर उसके सामने हाथ जोड़ कर के खड़ी रहती है और आंखों में आंसू और बड़े ही करुण स्वर से अपनी सब कहानी अपनी दुख की कथा सुनाती है कि देखिए मेरी बच्ची है बेचारी बीमार हो गई है उसको इतनी सारी ट्रीटमेंट करवाई इतने सारे डॉक्टर दिखाए सर पर बर्फ लगाया वो खेपा काली का वो चूड़ी पहनाई कुछ फर्क नहीं पड़ा अभी आप जदी कुछ कर देंगे इसके लिए तो मेरी बच्ची बच जाएगी तो तांत्रिक ने सोचा अरे यह तो अच्छे मूर्ख मिल गए तो पहले तो उसने सब वो नाटक जो ये लोग करते हैं गरीब वो मूर्ख गांव वालों को पटाने के लिए सब तरह के नाटक किए आखिर में ₹ रुपए पड़ाए ने पा रुपया माने उस समय बहुत बड़ी रकम उसको इतना रुपया लिया और फिर क्या विधि विधान क्या किया पता है दुर्गम स्थानों से जड़ी बुटिया ले आओ अभी दुर्गम स्थान कौन जाएगा कौन जड़ीबूटी वहां पर खोजे हनुमान महावीर तो नहीं है कि वह कहा कि वह वैद्यराज ने कि लक्ष्मण के लिए वहां पर वो पर्वत प जाकर के जड़ीबूटी लेकर आनी है तो महावीर गए पर्वत खोज के देखा जड़ीबूटी ने नहीं मिली तो सीधा पर्वत ही उठा के ले आए ऐसा यहां पर कौन है बेचारे वरदा महाराज और उनकी टूटी हुई साइकिल इतना ही है मां के पास में तो अभी ये तांत्रिक ने बड़ा ही उटपटांग सब वो उपाय दिखा कर के ₹ लेकर के चला गया यहां पे मां सर के ऊपर हाथ रख के बैठी हुई है वरदा महाराज को कहती है अरे उस दुर्गम स्थान से यह जड़ीबूटी लानी है उस दुर्गम स्थान से यह तेल लाना है उस दुर्गम स्थान से यह लोहा इकट्ठा करना है कहां से होगा वरदा महाराज बेचारे कुछ दिनों तो इधर उधर गए अपनी टूटी साइकिल पर आधे पैदल चल के आधे साइकिल पर आखिर में कुछ इकट्ठा नहीं हुआ और मां भी थक गई और मां ने ठाकुर को हाथ जोड़ कर के कहा ठाकुर मैंने तो इसके लिए सब कुछ करके देखा किंतु फिर भी इसका कुछ उपाय नहीं हो रहा है अभी आप देखेंगे तो होगा और कुछ होने वाला नहीं ये वरदा महाराज यह पूरा यह जो राधु का जो इंसिडेंट वर्णन करते हैं मैंने जब पहली बार पढ़ा था उस समय में ट्रेनिंग सेंटर में था और ट्रेनिंग सेंटर अर्थात कि जॉइन किए हुए मुझे दो ही साल हुए थे दो साल के बाद में मुझे ट्रेनिंग सेंटर में भेजा गया था तो उस समय मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं इस तात्पर्य क्या है एक तो हंसी तो बहुत आती है क्योंकि वरदा महाराज ने वर्णन ही इतना मने हास्य हास्य जनक ऐसा कटाक्ष के रूप में नहीं किंतु ऐसे डिवाइन प्ले जिसको कहते हैं ना कि जगदंबा का किस तरह की कार्यावटम होती है तो बड़े ही सुंदर डब से वरदा महाराज ने यह जो सब वर्णन किया है मैं पढ़ कर के किंतु मेरे मन में एक ही एक बात आ रही है कहां स्वामी विवेकानंद कहां वो मतलब स्वामी विवेकानंद को कोई मूर्ख बनाने का प्रयास करेगा इस तरह से तांत्रिक त्रिक आकर ग तो साले को ऐसा झापड़ मारेंगे कि वो भाग जाएगा वो कहां स्वामी जी और कहां मां और कहां ठाकुर इन तीनों का जो संगम है कैसा मधुर संगम है कि जिसको जो चाहिए वो यहां पर मिलता है यदि आप में तीव्र मेधा शक्ति है तो आप स्वामी जी को फॉलो कीजिए आपके भीतर में एक गहन आध्यात्मिक पिपासा है तो आप ठाकुर को फॉलो कीजिए और यदि आपका एक बिल्कुल सरल हृदय है किसी भी तरह के दांव पेच आपके मन में नहीं है बिल्कुल श्रद्धा और शरणागति से भरपूर है तो आप मां को फॉलो कीजिए जिसके पास में जिस तरह की कैपेसिटी है उस तरह के आदर्श अपने यहां पे ठाकुर मां स्वामी जी के रूप में है तो यह तीन मॉडल है अपने ऑर्डर में तो यही मां की बात है तो इस किताब गंभीरानंद जी महाराज की श्री मां शारदा देवी इसका हम पाठ कर रहे थे चैप्टर है देवा धीना देव के आधीन सड़सी पूजा के बाद का समय है मां बीच-बीच में जयराम बांटी जाती है तो बीच-बीच में कलकत्ता वापस आती है उस दिनों की यह सब घटनाएं हैं कल हमने देखा कि जयराम बाटी मां गई तो थी किंतु किस तरह से जयराम बाटी में इतना घर में दारिद्र्य था इतना गरीबा आई थी कि मां वहां पर ज्यादा दिन नहीं रह पाई और मां को वापस कलकाता आना पड़ा तो वह जो मां के संसार का जो दारिद्र्य है हृदय में लक्ष्मी विराजमान है किंतु संसार है शिव का तो वह वर्णन हम कल देख रहे थे तो गंभीरानंद जी महाराज थोड़ा सा आगे लिखते हैं कल हमने देखा कि किस तरह से श्यामा सुंदरी देवी काक परिश्रम कर कर के परिवार का रोज गुजरान चलाती है तो उसमें वह जो बांडोज परिवार था जयराम बाटी का उनके पास में फिर भी थोड़ी बहुत जमीन जायदाद थी तो उनके वहां से धान बुनने के लिए वह लेकर आती थी धान का चावल करना वगैरह श्यामा सुंदरी देवी अपने मुंह से जो वर्णन करती है 161 चलों के ऊपर में खाना भात बन रहा है इतना काम किया है माने 16 चूलो के ऊपर में 16 ी चढ़ी हुई है उसमें भात बनाना मने वो कितना कष्ट करर है व तो वो उसके और किस चीज के लिए सिर्फ एक हांडी भात के लिए श्यामा सुंदरी देवी को यह सब करना पड़ा था अभी गंभीरानंद जी महाराज आगे लिखते हैं य तो करिया तहर पखे पुत्र कन्या देर अन्न संस्थान और विद्याभ्यासम तो करा संभव लोना इतना करने के बाद में भी श्यामा सुंदरी देवी के लिए अपने बच्चे और बच्चियों के लिए खाने का जुगाड़ करना संभव नहीं था खाने का खाने की व्यवस्था और विद्या अभ्यास ब्राह्मण के लड़के हैं तो यह सब काली मामा वरदा मामा वगैरह यदि थोड़ा बहुत भी यह शास्त्र पाठ नहीं करेंगे परंपरागत यह सब विधि विधान नहीं सीखेंगे तो बड़े होकर के करेंगे क्या यह तो ब्राह्मण के लड़के हैं यजन याज अध्यापन यही तो उनका कार्य है थोड़ा कुछ तो सीखना पड़ेगा तो श्यामा सुंदरी देवी इतना परिश्रम करने के बाद में भी अपने लड़कों के लिए और अपनी बच्ची मां शारदा के लिए फिर भी खाने का जुगाड़ नहीं कर पा रही थी ना ही उनके विद्याभ्यासम पार्श्व वर्ती ग्राम श कोले आति गृहे चोलिया गले इसीलिए यह बच्चे सब मां के जितने भी लड़के थे अपने आसपास में जितने सगे संबंधी रहते थे उनके घर पर रहने के लिए चले गए ज्येष्ठ पुत्रो प्रसन्न जाइलेनॉल था प्रसन्न वह पास का एक गांव था जिब वहां पर जो उनके रिलेटिव्स रहते थे उनके घर पर रहने के लिए उसको जाना पड़ा वरदा प्रसाद दूसरे भाई उनको जाना पड़ा शि होड़ में श्री हरेराम भट्टाचार्य बोलकर के मां के जो रिलेटिव थे उनके घर पे एवं कनिष्ठ अभय ओई ग्रामे मातुल गृहे थाक अध्ययन करते लागि लेन वो सबसे छोटा बच्चा था सबसे छोटा लड़का अभय वो जयराम बाटी में ही अपने मामा के घर रह कर के अभ्यास अध्ययन करने लगा अभी देखिए यह पढ़कर के हमको हम श्यामा सुंदरी देवी के हृदय की व्यथा समझ सकते हैं कि अपने खुद के लड़कों का लालन पालन नहीं करवा रही और अपने हाथों से अपने खुद के लड़कों को दूसरों के वहां रख कर के आती है अभी दूसरों के वहां पर रहना यानी कि पता है ना किस तरह से एक सेकंड क्लास सिटीजन की तरह रहना वो अपने खुद के मां-बाप जितना स्नेह प्रेम करेंगे उतना तो कोई अपने रिलेटिव करने नहीं वाला है श्यामा सुंदरी देवी को पता है कि उनके लड़के वहां पर जाकर रहेंगे तो कि कैसा कैसा अपमान दिन प्रतिदिन सहन करना पड़ेगा किंतु फिर भी हृदय के ऊपर में पत्थर रख कर के अपने लड़के को वहां पर रख के आई क्यों क्योंकि अपमान भले ही चाहे सहन करना पड़े एटलीस्ट खाने को अन्न तो मिलेगा व बड़े होकर के कुछ कार्य तो कर पाएंगे विद्या अभ्यास तो करने को मिलेगा तो देखिए कि उस समय की यह कैसी कहानी है और आज भी गरीब घर में देखेंगे कि मां-बाप को किस तरह के कठिन निर्णय अपने बच्चों के बारे में लेने पड़ते हैं तो हम सहज ही अनु मान कर सकते हैं कि श्यामा सुंदरी देवी के हृदय पर क्या बीति होगी और मां के हृदय पर भी मां ने तो यही लड़कों को अपने भाइयों को छोटे थे तो उनको बड़ा किया था मां ने अपनी नजर के सामने अपने भाइयों को बिछड़ते हुए देखा तो मां के हृदय पर भी क्या बीती होगी वह सोच करके देखिए श्री माओ हो तो जननी र क्लेश भार लाघव और पति शवार जन्नो दक्षिणेश्वर चली लेन मां ने भी देखा कि यहां पर रह कर के श्यामा सुंदरी देवी को कष्ट ही मिल रहा है श्यामा सुंदरी देवी बेचारी सब समय यही सोच रही है कि मेरी बच्ची को व क्या खिलाऊंगी तो यह देख कर के मां भी दक्षिणेश्वर चली आई वह भी और पति सेवा के लिए दक्षिणेश्वर चली आई एवं तथा उपस्थित होया शासुर सहित अल्प परिसर नहते आश्रय लेने दक्षिणेश्वर में आई और चंद्रा मणि देवी उनकी सास रह रही थी नबत में तो नबत की छोटी जगह में माने आश्रय लिया दक्षिणेश्वर स्वास्थ्य तकन खूब खराब दक्षिणेश्वर का स्वास्थ्य वहां की आबोहवा उस समय बहुत ही खराब थी बर्षा ते प्राय आमाशय होई तो वर्षा काल में लगभग सब समय ब्लड डा जेंटर य आमाशय अर्थात की ब्लड डेंटरी होता श्री मा चीरे ई रोगे आक्रांत होलेन मा ज आई कुछ ही समय में मां को भी यह ब्लड डा जेंटर हो गया शंभू बाबू तहा के निरोग करि बर जन्नो विशेष जत्न करले व शंभू बाबू ठाकुर के एक नए रसदार मथुर बाबू के जाने के बाद में तो शंभू बाबू ने मां के चिकित्सा के लिए प्रयत्न तो किया किंतु कोनो फल होलो ना किंतु चिकित्सा के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हुआ श्रीमा तथा प शाशूरी व पती शेबा छड़िया अन्नत जायते चाहिले ना डाज हो गया है बार-बार इस तरह से जो डिहाइड्रेशन हो जाता है हमको तो आज तो पता है मेडिकल आज का साइंस हमारे सामने बड़ा ही क्लियर है डिहाइड्रेशन डिहाइड्रेशन हो जाने से आपको बहुत ज्यादा पानी पीना पड़ता है वो जो ओआरएस सॉल्यूशन वो सब लेना पड़ता है उस समय में किंतु ना ही यह समझ थी ना ही यह सब चीजें अवेलेबल थी तो हालांकि शंभू बा ने मां की चिकित्सा के लिए प्रयास तो किया किंतु यही जो राधू की चिकित्सा के लिए इतना सब प्रयास किया किंतु क्या है ना यह शरीर तो शरीर का कार्य करता है और उस समय का मेडिकल साइंस भी इतना डेवलप नहीं था एक समय था अपना सत्य युग में कि अपना मेडिकल साइंस बहुत ही एडवांस आयुर्वेद किंतु अभी तो यह जो हजार साल के पतन के बाद में फिर से हम जो उठ खड़े हो रहे हैं तो अभी तो इतना अंडरस्टैंडिंग नहीं था तो क्या करें कुछ परिणाम नहीं आया किंतु फिर भी मां ने यही रुग्ण शरीर लेकर के यही रोग वाला शरीर लेकर के अपने पति की और सास की सेवा की एक साल तक अवशेष किंचित आरोग्य लाभ करिया तिनी पितरा लोय चलिया गले किंतु आखिर में थोड़ा सा जब आरोग्य प्राप्ति हुई आरोग्य लाभ हुआ तब उन्होंने सोचा कि अभी इन लोगों को ज्यादा कष्ट नहीं देने की बजाय बेटर है कि मैं जयराम बाटी जाऊं देखिए मां की भी कैसी परिस्थिति है जयराम बाटी जाती है तो बेचारी श्यामा सुंदरी देवी को कष्ट होता है कि वह मां को क्या खिलाएगी और फिर वहां से दक्षिणेश्वर आती है तो बीमार हो जाती है क्योंकि वहां पर वह वर्षा के समय बारिश के समय में मानसून सीजन में डेंटरी हो जाता है तो अभी ठाकुर को कष्ट होता है कि मां का यह अवस्था देख कर के मां की ट्रीटमेंट करवानी तो कहां वो ईश्वर में ध्यान लगाएंगे कि मां के पीछे में लगेंगे तो मां भी देखिए कि मां का हृदय कैसा है अपने लिए किसी को कष्ट ना हो इसलिए बार-बार जयराम बाटी जाती है बार-बार दक्षिणेश्वर आती है कैसा अपने को संपूर्ण रूप से उन्होंने विलय कर दिया है जिनकी वह अ श्रद्धा करती थी उनकी सुविधा के लिए कभी अपने बारे में नहीं सोचा ठाकुर को जाकर के ऐसा नहीं कहा कि आपको मेरे पति है आपका यह धर्म है मेरी ट्रीटमेंट करवाने का मां को जाकर के श्यामा सुंदरी को जयराम बाटी जाकर के ऐसा नहीं कहती कि मैं तो आपकी लड़की हूं मुझे खिलाने का आपका धर्म है सब समय अपनी मां की चिंता करती अपने पति की और अपनी सास की चिंता करती है अपने बारे में कभी नहीं सोचती यह है कि जगदंबा का सही ऐश्वर्य क्या है तो यह निस्वार्थ जिनकी सेवा करती है जिनके ऊपर में श्रद्धा है उन्हीं के बारे में सोचना अपने को पूरा विलीन कर देना शून्य में यह है आध्या शक्ति जगदंबा का सही ऐश्वर्य किंतु तथा उपस्थित होई बार अल्प पोरे पुनरा ई रोगर आक्रमण तीनी शुजा शही होलेन जयराम बाटी आई तो सही थोड़ा बहुत आरोग्य लाभ करके किंतु जैसे ही जयराम बाटी आई फिर से वही डाइटरी की भोग बन गई फिर भी वही डाइस सेंट्री का रोग व उसका आक्रमण फिर से हुआ एमन की रोग एतो वृद्धि पाइलो ज जीवन रखा संशय विषय होया उठ लो यहां तक की यह रोग इतना बलवती हो गया कि शरीर टिकेगा कि नहीं यह संशय खड़ा हो गया ठाकुर ए निदु पीड़ा संवाद पाइया भागने हृदय के बोली लेन ताई तोरे हृदय व केवल आश बे आर जाबे मनुष्य ज मनुष्य जन्मेर किछुई करा होए बेना जब ठाकुर को पता चला कि मां की यह परिस्थिति है तो ठाकुर ने हृदय को कहा अरे हृदय देखो तो वो अर्थात कि मां सिर्फ आएगी और जाएगी मनुष्य जन्म में कुछ भी कर नहीं सकते मनुष्य जन्म से आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते तो अभी ये इस तरह से ठाकुर ने क्या हाथ उठा दिए ना कि क्या वो पता नहीं किंतु ठाकुर ने तो ऐसा कह दिया अच्छा इसके बाद में मां जयराम बाटी में है और यह डाइजेंस मां को हुई है प्राण का संशय है इस प्राण के संशय से की रक्षा कैसे हुई इसके बारे में बड़ी ही सुंदर कहानी है जो कि गंभीरानंद जी महाराज हमको बताते हैं इसको हम कल देखेंगे आज तक ओ शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण
Questions & Answers
मस् जैसे देखिए गंभीरानंद जी की जब किताब स्टार्ट होती है सबसे पहला ही है अवतरण का माने कि पूर्व भूमिका तो पूर्व भूमिका में महाराज जी लिखते हैं कि जैसे देखिए पहले पहले युग में पौराणिक युग में आध्या शक्ति पृथ्वी पर आती थी तो अष्ट बाहु या इस तरह से अवतरण होता था और यह शुंभ निशुंभ रूपी असुरों का संहार करने के लिए तो आज जो मां का अवतरण हुआ है सिर्फ द्वि बाहु से और कहां पर असुर कहां पर है इतना बड़ा ब्रिटिश साम्राज्य जो कि भारत का खून चूस रहा था उसके सामने तो माने उसके सामने तो माने फाइट नहीं किया तो मां ने मां का क्या अवदान था मां का ऐश्वर्य क्या था जद ये युद्ध समर संग्राम यह जद मां का ऐश्वर्य नहीं तो मां का ऐश्वर्य क्या था तो यही है मां का आद्याशक्ति का ऐश्वर्य अपने को अपने प्रेमी जनों की सेवा में इतना विलीन कर दिया कि अपने खुद की बात भूल गई तो देखिए की आध्या शक्ति जब दुर्गा रूप में अवतरण होती है तो कैसे अष्ट बाहु प्रत्येक बाहु में एक अस्त्र शस्त्र और असुरों का संहार करती है और अभी है सिर्फ द्वि बाहु और हृदय में है सिर्फ प्रेम एक भी अस्त्र शस्त्र मां के पास नहीं है तो यह जो आध्या शक्ति का वह ऐश्वर्य पौराणिक युग में और यह कलयुग में यह ऐश्वर्य तो एक कंट्रास्ट है कितना बड़ा दिखता है तो यह मैं बताना चाहता था आप ने ये बिल्कुल ठीक कहा कि ये जो कंट्रास्ट कि ये बड़े अमीर लोग हैं सब समय वो टेंशन में रहते हैं स्ट्रेस व्हाट इज द बिगेस्ट किलर ऑफ मॉडर्न एज इ इ स्ट्रेस माने ये एक्सीडेंट नहीं ये कैंसर नहीं यह बड़ी बीमारियां नहीं पडेम नहीं स्ट्रेस सबसे ज्यादा लोगों को मार देता है आज तो ये स्ट्रेस जितना पैसा बढ़ेगा उतना स्ट्रेस बढ़ेगा तो यह भी एक है और दूसरा है कि कुछ नहीं है वैसे घर में वो आराम से रह किंतु फिर भी मन बड़ा आनंद से भरपूर है तो यह दोनों कंट्रास्ट हमको देखने को मिलता ही है और क्या है ना कि अल्टीमेटली डिपेंड करता है कि व्हाट डू यू वांट इन योर लाइफ यदि आपको इंद्रियों के सुख के विषय चाहिए तो आप उसके पीछे दौड़ेंगे यदि आपका मन यदि भौतिक चीजों में ही बंधा हुआ है और यदि भीतर से आनंद चाहिए तो आप उस डायरेक्शन में जाएंगे यहां पर इतने सारे वॉलंटिली आते हैं बोले कि महाराज हमने अर्ली रिटायरमेंट ले लिया और अभी बढ़िया मजे से आश्रम में आकर सेवा करते हैं अभी अर्ली रिटायरमेंट लिया तो ऐसा नहीं है कि घर में बहुत ज्यादा पैसा हो गया है किंतु बस थोड़ा बहुत जो है सो उसमें हम शांति से जीते हैं तो ये जो कुछ ठाकुर ने दिया है उसमें शांति से जीना और फिर मंदिर में आकर के एज ए वॉलंटस ए डिवोटा नियमित आना यही जीवन का आनंद हो गया है अभी तो यह भी एक लाइफ है डिपेंड करता है कि मैं क्या चाहता हूं अपने जीवन में मेरी एंबिशन भौतिक चीजों के प्रति ऐसी है कि मैं खरबों पति अरबों पति बन गया फिर भी मुझे संतोष नहीं है और ज्यादा धन चाहिए और ज्यादा चाहिए और साथ में इतना ही टेंशन भी वो आता है साथ में तो इ डिपेंड्स ऑन अवर वर्ल्ड व्यू क्या करेंगे बहुत बार आदमी लोग सोचते हैं हां कि मुझे वह मानसिक शांति चाहिए मुझे यह सब नहीं चाहिए किंतु यह सब मुंह से बोलने की बातें हैं जो उसके लिए मानसिक शांति के लिए जो करना चाहिए वो तो किसी को करना नहीं है तो इसलिए ये जो जो आज के मॉडर्न गुरु जो है ना इनका ये जो बड़ा क्यों नाम है आज वो श्री श्री फिर नाम दे कर के मैं नहीं बोलना चाहता बोलना उचित नहीं है किंतु ये जितने भी मॉडर्न गुरु है वे लोग कैसे वो एक लाख रुपए का रिट्रीट करो एक सप्ताह दो सप्ताह वहां पर रहेंगे एक लाख रुपया दो रिट्रीट के और बस एक एक सप्ताह में आपको मानसिक शांति मिल जाएगी पीस ऑफ माइंड मिल जाएगा वो लोग लाखों रुपया देकर के क्यों जाते हैं वहां प किंतु स्वामी जी य एक बात क्या कहते हैं पता है कि देखिए यह सब वर्कआउट कर देना उचित है अ अब झूठ मूठ का सन्यास क्या लेना माने मैं जिसके भीतर में रजस भरा हुआ है एक राजा को एक ऋषि ने बोला कि तुम राज्य छोड़ कर के यहां पे वन में आश्रम में आकर के रहो तो राजा ने क्या कहा मैं जद यहां पे आऊंगा तो यहां पे एक दूसरा राज्य खड़ा हो जाएगा ठ भगवान कृष्णा ने अर्जुन को क्या कहा तुम्हारी हड्डियां तुमसे युद्ध कराएगी युद्ध से तुमको बचना नहीं है तुम युद्ध करके खत्म उसको खत्म कर दो भाई जो भी है कर्म का उसको खत्म कर दो युद्ध कर करके तो युद्ध से भाग जाना वो अपने हिंदू धर्म का वो उ नहीं है मतलब उपदेश वो सब क्रिश्चियनिटी का है कि सब छोड़ कर के वन में चले जाओ अपने तो भगवान कहते हैं युद्ध करो युद्ध में एक बार हारो कि जीतो किंतु उसको खत्म करके छोड़ दो जो कर्म का भंडार है उसको खत्म कर दो फिर कम टू द पाथ ऑफ त्याग क्योंकि सभी तो ऐसा नहीं है कि आपकी टेंडेंसी त्याग के रास्ते पे आप त्याग के रास्ते प जाएंगे स्वामी जी ने क्या कहा बुद्धिज्म ने हर किसी को पकड़ कर के साधु बनाना शुरू कर दिया आखिर में क्या हुआ मोनेस्ट्री में भयानक करप्शन क्यों क्योंकि अरे भाई तुम्हारा ट त्याग का टेंडेंसी ही नहीं है तो जबरदस्ती साधु के भिक्खू के कपड़े पहन के बैठे हो तो तो करप्शन आना ही आना है माने यह संसार जीवन तो खत्म हो ही गया सन्यास जीवन को भी बर्बाद कर दिया तो बेटर है हिंदू धर्म भगवान कृष्णा अपना जो बेसिक गीता जो कहता है कि युद्ध के मैदान में जाकर के युद्ध कर लो और बात खत्म कर हारो जीतो ट इज अनदर मैटर अपने कर्म को खत्म कर दो वर्क आउट कर दो फिर ऑटोमेटिक य त्याग का भाव भतर में से प्रकट होगा सो ट इज अवर हिंदू धर्म का मेन जो उपदेश लाटू महाराज जब ठाकुर ने कहा काशीपुर में है कैंसर से अभी देह क्षीण हो रहा है एक दिन ठाकुर ने कहा कि अभी इस खाट से खड़े होकर मैं सोच के लिए नहीं जा पाऊंगा तो लाटू महाराज ने क्या कहा महाशय आमी तो अी अपना मेथर मैं तो यहां पर उपस्थित आपका स्वीपर है ना तो भले ही आप बिस्तर पर ही शोच वगैरह करें मैं सब क्लीन कर दूंगा तो गुरु भाइयों में भी पूरा स्पेक्ट्रम दिखता है ऑन वन हैंड अभेदानंद जी स्वामी जी राजा महाराज कहां विद्या और आध्यात्मिकता का ऐश्वर्य और कहां प यह कर्मी शशि महाराज है लाटू महाराज है खोका फिर यह सरलता जैसे मां की सरलता तो वही यह खोका महाराज यही है अद्वैतानंद जी अद्वैतानंद जी को अभी ये हसी मजाक भी ऐसा होता था वरा नगर मठ में तो अद्वैतानंद जी को अफीम खाने की हैबिट थी वो उनको भी ऐसी हैबिट थी तो अभी जो अफीम खाता है रात को कंटीन्यूअस सो नहीं पाएगा वो रात को बीच-बीच में उठ कर के वो बाथरूम जाना पड़ेगा तो अभी सब वरा नगर मठ में सोए हुए हैं और गंगाधर महाराज अपना गंजे अखंडानंद जी महाराज स्वामी जी कहते थे गंजे तो वही गंगाधर अखंडानंद जी भी पास में सोए हुए हैं अद्वैतानंद जी रात को उठे शोज जाने के लिए ना कि ऐसा कुछ तो अखंडानंद जी ने क्या किया उनके सर के नीचे में जो बालिस था पिलो वो हटा लिया और वहां पर एक ईट रख दी और रख कर के चुपचाप सो गए फिर से जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है अभी अद्वैतानंद जी आए वापस अंधेरा है इलेक्ट्रिक लाइट तो थी नहीं कि स्विच ऑन करके लाइट कर देना ऐसा कुछ अंधेरे अंधेरे में ही अपनी जगह सो खोजी सोने के लिए और फिर सो गए जैसे ही सोए ईट के ऊपर में सर टकराया तो अच्छा अभी गंगाधर महाराज वो राह देख रहे थे कि अभी बूढ़े आदमी है अभी जोर-जोर से चिल्लाए और हम सब लोग मजा करेंगे तो ऐसा सर टकराया फिर भी कुछ बोले नहीं फिर उसी ईट के ऊपर में सर रख कर के सोए हुए हैं लेटे हुए हैं तो अखंडानंद जी अभी राह देख रहे हैं कि अभी चिल्लाए अभी चिल्लाए अभी हम सब लोग जोर-जोर से ऐसी मजा करेंगे कि कुछ नहीं अद्वैतानंद जी महाराज वैसे ही ईट के ऊपर में सर रख के सोई हुए सोई हुए उसके बाद में अखंडानंद जी टेंशन में आ गया अरे देखो देख कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है वो वो खड़े हो गए और वो जो मोमबत्ती जलाई और कहा अरे देखिए देखिए गोपाल दा आपका बालिस तो यहां पे है ये ईट हटा दीजिए बालिस के ऊपर में सो जाइए तो अद्वेता नंद जी ने बैठ कर के कहा भाई तुमने जो मुझे दिया है वो ईश्वर का प्रसाद समझ कर के उसी के ऊपर मैं मैं सर रख के सोऊंगा मुझे मालिश नहीं चाहिए तो कहां ये लोग सोचते थे बूढ़े आदमी को परेशान करके थोड़ा हंसी मजाक कर ले पूरा स्पेक्ट्रम अपने गुरु भाइयों में भी मिलता है