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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी की जीवनी और प्रसंग स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका हम पाठ कर रहे थे अभी तक हमने देखा कि किस तरह से मां के जीवन में दवव और मनुष्यवकाशा हो जाती है तो कभी-कभी जब अपने छोटे भाइयों की केयर करती है उनको खिलाती है नहला है अपने हाथों से खाना बनाती है और जब वह हांडी या तो पात्र खाने का जब स्ट के ऊपर से नीचे उतरना होता है तो अपने पिताजी को पुकारती है कि पिताजी आइए और यह पात्र को नीचे उतारिए क्योंकि हृदय तो जगन माता का है हाथ है छोटी बालिका का तो यह सुमधुर संगम मां के जीवन में हम देख रहे थे थोड़ा सा आगे पाठ करते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं श्री मायर सहज अकृति अनब भाषा ज मनोरम चित्र खानी फूटिया उठिया छ ताहा ते देखी ते पाई भविष्य ते जिनी मातृत्व महिम मं तो दाब लया प्रति हृदय विराजित होई बेन बाल्य तीनी सुकुमार हस्ते बीजन ग्रहण पूर्वक बखूर अन्न भोजन उपयोगी करते कतो व्यस्त मां के माने इससे पहले जो एक प्रसंग का वर्णन किया कि जयराम बाटी विस्तार में जब अकाल पड़ा था तब उनके पिताजी ने ठीक किया कि उनका थोड़ा सा धन्य बचा हुआ है पिछले साल का तो वह धन्य से वह अन्न भंडार खोलेंगे मां तो अन्नपूर्णा स्वयं मां के ही घर में कहां वह काशी में भी एक अन्नपूर्णा मैया है यहां जयराम बाटी में भी एक अन्नपूर्णा मैया है देखिए कि रामकृष्ण मिशन के जितने भी सेंटर होंगे आप डाइनिंग हॉल में जाएंगे मां का एक चित्र अवश्य आपको देखने को मिलेगा दो पैर लंबे करके मां जो बैठी हुई है मां को आर्थराइटिस था तो पैरों को मुड़ करके ज्यादा लंबे समय तक नहीं बैठ पाती थी तो पैर सीधे करके मां बैठी है वो चित्र हमारे डाइनिंग हॉल में रामकृष्ण संघ के रामकृष्ण संघ के बहुत सारे भक्तों के डाइनिंग हॉल में आपको देखने को मिलेगा ये क्या दर्शाता है कि जहां पे मां का ये चित्र है वहां पे भक्तों के लिए साधुओं के लिए खाने का कभी भी कोई भी अभाव नहीं रहेगा वो मां की वो बात है ना वो ठाकुर के महासमाधि के बाद में मां गया गई थी बौद्ध गया देखा कि वहां पर बौद्ध भिक्खू बहुत अच्छे मठ में रहते हैं और मठ में उनके लिए खाने पीने की सुंदर व्यवस्था है तो मां ने ठाकुर को हाथ जोड़ कर के प्रार्थना की थी कि ठाकुर तुम्हारे नाम पर इन लड़कों ने घर छोड़ा नरेण राखल लाटू इन सब लोगों ने बेचारे भिक्षा करते कहां-कहां घूम रहे हैं देखो कि उनको मोटा अन्न बोत्रे अभाव होईना अर्थात कि सादे कापड़ी ना हो यह तुम देखो तो मां वैसे ही यहां पे देखिए कि मां का कभी दिखाती है कुछ और है और कुछ ठाकुर को प्रार्थना करती है खुद स्वयं अन्नपूर्णा है उनके ही आशीर्वाद से सब संभव है किंतु फिर भी हमको दिखाने के लिए ठाकुर को प्रार्थना करती है तो वही अन्नपूर्णा मां के घर में बचपन से ही उनके पिताजी उन्होंने अन्न भंडार खोला था सभी जितने भी भूखे अकाल ग्रस्त थे सभी को अन्न वहां से प्राप्त था तो सब आते थे और मां उनको इतनी भूख लगी है कि गरम गरम खिचड़ी उनके पात्र में डाली गई है तो वो खिचड़ी ठंडी हो उस बात की भी वह धैर्य राह नहीं देख सकते तो मां अपने ने छोटे हाथों से हवा देती थी हवा करती थी जिससे कि खिचड़ी थोड़ी ठंडी हो जाए खाने को उपयुक्त हो जाए तो मां यह सब अपने बचपन के प्रसंग कभी-कभी भक्तों के सामने वर्णित करती थी तो यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि मां की सहज अकृति और अनवकेनेड ते पाई उससे हम देख सकते हैं कि भविष्य में जो मातृत्व के महिम मंडित मातृत्व की महिमा जिनके चारों ओर घिरी है मातृत्व की महिमा से जो प्रतिभास है मातृत्व की महिमा से जो उद्भाव है वह सभी के हृदय में अपने भक्तों के हृदय में विराजित होंगे और जो भक्तों के हृदय में विराजित होंगे भविष्य में बचपन में वही मां अपने छोटे-छोटे हाथों से हवा करते हुए भूखे लोगों के अन्न को भोजन के उपयोगी किया करती थी भोजन के उपयोगी करने में कितनी व्यस्त थी आर से कोमल प्राणा दुहिता लाल ने दरिद्र ब्राह्मण सस्नेह हृदय कतो खानी आकुल होता यह कोमल प्राण बालिके बालिका के लालन पालन में में उनके पिताजी दरिद्र ब्राह्मण की कितनी आकुल होता है कितनी उत्कंठा है कितना स्नेह और प्रेम है श्री मां खन बालिका मां तब बालिका थी ए बालो लीला नेक अपोरा पोर पुली बाला रई अनुरूप मां की बाल्य लीला बहुत सारी ग्राम्य की बालिकाएं होती है उन्हीं के जैसी थी बहुत हद तक किंतु इ हारों म म अकस्मात जनो अलौकिक दैव ज्योति बिछु तो होया चोख जलसा इया दे किंतु इसी के भीतर में ही मां का बचपन का जीवन जनरली देखे तो सामान्य रूप से देखे तो बहुत हद तक ग्राम की अन्य बालिकाओं के जैसा ही था किंतु इस जन साधारण सामान्य जीवन के बीच में भी एकाएक दिव्यता का प्रकाश प्रकट हो जाता और हमारी आंखों को उज्जवल कर देता हमारी आंखों को जैसे कि एक शीतल स्निग्ध ज्योति प्रदान करता खुद्रो भगिनी और खुद्रो तोरा तोन यार जीवने ई आलो अंधारे खेला संभव तो तहर भ्राता देर ओ जनक जननी दृष्टि अतिक्रम्य पारे नाई छोटी बहना और छोटी सी बालिका इस के जीवन में माने उनके भाइयों की बहन और उनके पिताजी और माताजी की प्यारी बच्ची इनके जीवन में यह जो दिव्यता का प्रकाश बीच-बीच में सडन दिखाई पड़ता था वह अपने माता-पिता और भाइयों की नजर में से शायद वो ओझल नहीं रहा होगा बहुत बार ऐसा होता है आप अवतार के साथ में रहते हैं तो अवतार को तो आपको मानव के रूप में देखना ही पड़ेगा अदर वाइज आप उनकी सेवा कैसे करेंगे हमेशा यदि अवतार की मैं सेवा कर रहा हूं यह भाव जद मन में रहेगा तो एक डर प्रवेश करके रहेगा हम लोग ठीक-ठीक हो तो सेवा ना कर पाए इसीलिए हो हमेशा एक मनुष्यवकाशा रेयरली होता था कि मां और पिताजी समझ रहे हैं कि हां अरे यह तो हमारी बेटी शारदा जिनको कि हम बाकी सब गांव की लड़कियां की तरह ही वह भी खेल रही है हंसी मजाक कर रही है अपने भाइयों की केयर कर रही है उनके भीतर में पता नहीं यह कौन सी दिव्य शक्ति विराजमान है कभी-कभी वह सहसा चौक जाते होंगे कभी-कभी वह विस्मित हो जाते होंगे कभी-कभी वह सोच में गिर जाते होंगे कि अरे यह छोटी बालिका जिनको की कि हम अपनी गोद में उठा कर के घूमते हैं वह कभी-कभी रोती है कभी हंसती है कभी हमारे से अदार करती है बांग्लाते शब्द अदार कोरा अर्थात कि अपने माताजी और पिताजी का स्नेह अर्जन करने के लिए वो कभी-कभी वो ऐसी नटखट हरकतें शायद किया करती होगी तो ऐसी बालिका के भीतर में कौन सी शक्ति विराजमान है वो क्षण भर के लिए उनकी नजरों में इस तरह से उनके मन में विचार आते होंगे किंतु क्षण भर के बाद में ही मां अपने मानवत्वम की यह धारणा को वो भुला देंगी वो धारणा को विस्मृत करा देगी फिर से एक बालिका का जीवन वो यापन करेगी किंतु जनक जननी और उनके भाई ये उनके मन के भीतर में यह बात हमेशा के लिए किंतु विराजमान थी स्थित थी कि हां उनकी बहना या तो उनकी बच्ची कोई सामान्य बालिका की तरह नहीं है जद हो तरा मानवीय भावे परिचालित हुया ई छोटो मेटी के स्नेहो शिला भगिनी और साधारण दुहिता रूपे ग्रहण कोरीते चाहिया लेन बीच-बीच में इस तरह से वह चौक जाते थे कि अरे मां के भीतर में यह तो कौन सी शक्ति विराजमान है किंतु पर क्ण ही दूसरे ही क्षण यह बात भूल कर के मां को अपनी प्यारी बहना अपनी लाडली बालिका अपनी लाडली पुत्री के रूप में ही वे लोग देखना चाहते थे यह जद सोच में आ जाए अरे मां काली स्वयं हमारे घर में बच्ची का स्वरूप धारण करके घूम रही है तो हमको तो कितना डर लग जाएगा कि अरे मां नाराज ना हो जाए हमारी कोई क्रिया से हमारी कोई बात से यह सेवा अपराध बड़ा ही भयानक है आप किसी की सेवा करते हैं सेवा करने में हमारी तो त्रुटि तो होगी ही होगी हम तो कोई परफेक्ट नहीं है तो सेवा करते-करते कोई अपराध हो गया वह नाराज हो जाएंगे शराब दे देंगे तो क्या पता हमारे साथ में क्या होगा तो मां यह मानवत्वम करती थी कि सब लोग उनको बच्ची के रूप में देखे बहना के रूप में देखें और सहज सरल व्यवहार करें क्योंकि यह सहज सरल व्यवहार से ही दिव्यता उनके जीवन में प्रकाशित होती है देखिए साधना का बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि साधना करना यानी सतत जब ध्यान करते रहना या तो फिर शास्त्र ग्रंथ का पाठ करते रहना किंतु साधना देखिए कि जिसको कि एक्चुअल हम साधना कहते हैं साधन भजन मेडिटेशन या तो जप ध्यान या तो शास्त्र पाठ या तो प्रार्थना या तो भजन गान या तो पूजा पाठ यह सब चीजें हमारे जीवन का बहुत ही अल्प समय वो लेती है बहुत ही अल्प समय ही हम यह सब कर पाते हैं मैं बेलूर मठ में जवाइन करने के लिए गया था बिल्कुल पहली बार तो उसके पहले मैं मैं रांची में था और रांची में रूरल डेवलपमेंट का कार्य किया करता था तो ट्राइबल डेवलपमेंट का तो अभी क्या था एक समय ऐसा आया मेरे मन में कि अभी मुझे यह सब कार्य करके भीतर में क्या है एक तो चित्त शुद्धि होती है ना थोड़ी बहुत तो यह थोड़ा एक विवेक जागृत हो जाता है तो मेरा भी ऐसा हुआ बहुत साल काम किया इस तरह से ट्राइबल लोगों के बीच में फिर मुझे लगा कि अरे इसके परे भी तो एक जीवन है निस्वार्थ सेवा के बाद में भी तो ऊपर में भी तो ऐसा कुछ है जिसको कि मैं मिस कर रहा हूं और चारों और बाकी सब साधुओं को देखता हूं तो उनका जीवन जिस तरह से संतुष्टि से भरा हुआ है तो मैं तो सिर्फ सेवा कर रहा हूं तो इसके बाद में भी इसके ऊपर में भी मुझे कुछ सोचना होगा ऐसा करके मैं एक महीने की छुट्टी लेकर के वहां पर एक सुंदर फार्म है अपने आश्रम का वहां पर एक महीना रुका था एक महीना मैंने कुछ नहीं किया लीला प्रसंग पढ़ा कथामृत पढ़ा और वहां पर बहुत सुंदर जगह है सुबह शाम में वॉकिंग किया करता था वो जंगल में ग्राम्य विस्तार में फिर उसके बाद में मुझे बुलाया गया बेलूरमठ जवाइन करने के लिए मैं बेलूरमठ गया वहां के बड़े महाराज जो कि हमारे इंचार्ज थे उन्होंने पूछा कि अच्छा तुम क्या कर रहे थे यहां पर आने से पहले मब जिस तरह से पूछते हैं तो मैंने कहा ये इस तरह से महाराज को सब पता था वैसे उन्होंने ही मुझे वहां पर भेजा था और उन्होंने ही वापस बुलाया था तो तो सब पता ही होता है किंतु क्या एक कन्वर्सेशन आइस ब्रेकिंग होता है ना कि मने और सीरियस बातें करने से पहले कुछ लाइट बातें की जाती है जिससे कि एक रेपो एक कनेक्शन एस्टेब्लिश हो तो जैसे कि हम बात करते डरे नहीं तो ऐसे ही पूछा बात-बात में क्या कर रहे थे तो मैंने वो सब रूरल डेवलपमेंट की बातें की और फिर कहा कि एक महीना में छुट्टी लेकर रहा था प्रयत्न ऐसा किया कि जितना हो सके इतना साधन भजन करूं जब ध्यान करूं और किताबें पढ़ो तो उन्होंने कहा कि कितना टाइम ऐसा किया एकदम चौक करके मैंने कहा एक महीना तो अरे अच्छा किया उन्होंने कहा कि एक ही महीना किया और ज्यादा करते तो तुम्हारा दिमाग बिगड़ जाता और साधु बनने के लायक नहीं रहते मैंने कहा महाराज आप ऐसी बातें क्यों करते हैं हम लोग तो सोचते हैं भगवान बुद्ध के जीवन में कि दिन रात जब ध्यान कर रहे हैं मेडिटेशन कर रहे हैं फिर पूरी रात वो बोधि वृक्ष के नीचे में उन्होंने मेडिटेशन किया सुबह को उनको निर्वाण प्राप्ति हुई तो आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं ठाकुर सब समय भाव में रहते थे समाधि में रहते थे तो उन्होंने कहा देखो कि अपना मन तो अभी इतना मैच्योर नहीं है इतना स्ट्रांग नहीं है कि साधना का एक अविर प्रवाह वह धारण करने को सक्षम हो सतत जद साधना की जाए प्रारंभिक अवस्था में तो मन में विकृति आ सकती है तो मैं तो बड़ा ही चौक गया मैंने कहा अच्छा भाई अच्छा व एक ही महीने में मैं चला आया तो देखिए कि सब समय साधन भजन करना संभव नहीं होता हम लोगों को तो दिन प्रतिदिन का कर्म करना पड़ता है राम कृष्ण संग की स्थापना ही इसलिए हुई है कि दिन भर सेवा कार्य करो और सुबह शाम एक घंटा डेढ़ घंटा इतना आप जो जिस को कि इनर साधना कहते हैं आंतरिक साधना वह करो और दिन के दौरान बाह्य साधना या तो फिर कर्म साधना करो यह दोनों का संगम से ही हमारा आध्यात्मिक जीवन गठित होगा हां फिर एक मैच्योरिटी के एक लेवल पर हम चले जाएंगे फिर धीरे-धीरे करके जैसे ठाकुर कहते हैं कि कर्मनाशा एकटा नदिया छ तार भीतर झा पलाले होलो अर्थात की कर्मनाशा बोलकर के एक नदी है उसमें डुबकी देने से ही हो गया सब कर्म चले जाएंगे तो वो कब जबकि हमारी मैच्योरिटी का स्पिरिचुअल मैच्योरिटी का एक लेवल आ जाए उसके बाद उससे पहले नहीं तो यह बाह्य कर्म और आंतरिक साधना दोनों साथ-साथ चलने चाहिए किंतु फिर बाह्य कर्म कैसा हो तो वह कर्म निस्वार्थ हो अभी हम लोग बहुत बार सोचते हैं निस्वार्थ कर्म का क्या अर्थ है क्या मैं अपनी जॉब है या अपना बिजनेस है वो मैं क्या सब बंद कर दूं मास्टर महाशय ने ठाकुर को पूछा था कि मैं मैं क्या नौकरी करने जो मैं नौकरी कर रहा हूं वो क्या ठीक है तो ठाकुर ने कहा हां अरे तुम्हारा तो परिवार है तुमको तो धन अर्जन करना ही पड़ेगा ये तो तुम्हारा रिस्पांसिबिलिटी है धर्म है तुम्हारा फिर मास्टर महाशय ने पूछा क्या मैं ऐसी कोई चेष्टा कर सकता हूं जिससे कि मैं मैं पैसा और ज्यादा मुझे मिले मैंने मास्टर महाशय चालाक थे हम सब लोगों के लिए हम हम सबके लिए उन्होंने यह सब प्रश्न उनको ठाकुर को पूछ लिए थे जॉब में प्रमोशन मिले सैलरी ज्यादा हो यह सबके लिए मैं प्रयत्न कर सकता हूं तो ठाकुर ने क्या कहा हां कर सकते हैं यदि सत मार्ग से करें सही रास्ते से करें झूठ बोल कर के वह ठाकुर ने कहा ना एक डेप्युटी यहां पर आता है व नहीं वो एक एक आदमी यहां पर आता है उसका इतना सैलरी है फिर झूठा झूठ मुठ का वो वाउचर बना कर के और इतना रुपया उसको मिलता है तो इस ऐसे लोगों के धन को ठाकुर स्पर्श नहीं कर पाते थे तो क्या है कि सत मार्ग से जितना धन अर्जन कर सकते हैं वो करना है सत मार्ग पर चलना है निस्वार्थ सेवा अर्थात यह नहीं कि मैं अपने लिए कुछ ना करूं सिर्फ समाज के लिए करूं ऐसा तो सब समय संभव नहीं है क्या संभव है कि सत मार्ग से चलकर के कर्म करें एथिक्स और मोरालिटी बाह्य जीवन में एथिक्स और मोरालिटी हो और भीतर में जब भी समय मिले ठाकुर के प्रति शरणागति हो यह है आध्यात्मिक जीवन तो मां भी यहां पर जद अपना दिव्यत्वाची करते ठाकुर ने कहा है ना कि काली मंदिर एक हॉस्पिटल जैसा बन जाता कितने ही लोग यहां पर आते मिन्नत मानते कहते कि मेरा यह रोग ठीक कर दो मुझे यह समस्या है इसको ठीक कर दो वो ठीक कर दो ऐसा मिन्नत मार के वो मुझे परेशान कर देता एक्चुअली अवतार के पास में ऐसा नहीं है कि हम उनके पास में कुछ नहीं मांगेंगे उनके पास में मांगने का हमको तो अधिकार है वो हमारे पिताजी है माताजी है उनके पास में नहीं मांगेंगे तो किसके पास मांगने को जाएंगे ठाकुर कहते हैं ना वो प्रताप का भाई आया था वो अपने उसके बीवी बच्चों को अपने पड़ोसी के घर रख दिया है तो मैंने अपने बीवी बच्चों की संभाल वो नहीं करेगा तो क्या वो पड़ोसी के घर पड़ोसी के वो जो है पड़ोसी करेंगे क्या तो हम लोग और किससे मांगेंगे ठाकुर और मां से ही तो मांगेंगे प्रार्थना करेंगे कुछ भी समस्या है तो उन्हीं से तो हम समाधान की अपेक्षा करेंगे किंतु सिर्फ एक ट्रांजैक्शनल रिलेशन ना हो जाए बाजार में जाते हैं 50 दिया एक किलो लेकर के चले आए तो फिर इस तरह से उनको बोला कि आप यह ठीक कर दीजिए मैं वहां पर जाकर इतना श्रीफल दे दूंगा इतना ऑफि दे दूंगा बस और फिर घर आकर के जैसे थे वैसे के वैसे वो दुर्गुण द दुश्चिंता है ठाकुर के प्रति एक सतत शरणागति श्रद्धा और भक्ति का अविरत प्रवाह बहता रहे और अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करना है यह रियल रिलेशनशिप है हमको ठाकुर के पास से मांगना है क्यों नहीं मांगेंगे भाई ऐसा कोई निष्काम साधना निस्वार्थ भक्ति कि ठाकुर मेरा सब ले लो सब तुम्हारे चरणों में शरणागत दे दिया है और किंतु तुमसे कोई अपेक्षा नहीं है ऐसा हम क्यों कहेंगे उनसे अपेक्षा नहीं रखेंगे तो किनसे अपेक्षा रखेंगे उनसे तो अपेक्षा रखेंगे ही किंतु ट्रांजैक्शनल रिलेशन नहीं रखेंगे ये कुछ दे दिया फिर मेरा जीवन के साथ में मैं जो करूं ठाकुर क्या अपेक्षा रखते हैं यदि हमको वो आशीर्वाद देंगे हमारा बाह्य जीवन हमारा कर्म जीवन हमारा सांसारिक जीवन हमारा आर्थिक जीवन वो यदि आशीर्वाद देकर के मधुमय करना चाहते हैं तो सामने अपेक्षा क्या रखते हैं अपेक्षा रखते हैं कि हम अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करें हम अपना पूरा लाइफ धीरे-धीरे करके सत मार्ग की ओर दावित करें ऐसा नहीं कि मैं बाहर जाकर के झूठ बोल कर के निंदा कर कर के कुछ भी गलत काम करके पैसा अर्जन कर रहा हूं फिर इस पैसों से बहुत बड़ा मंदिर बना बनाया वहां पर प्रतिदिन पूजा होती है कितने ही भक्त आते हैं मुझे आशीर्वाद देते हैं गलत नहीं है उसमें ऐसा कुछ किंतु फिर हम साधना के रास्ते पर इस तरह से बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे हमको अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करना होगा पहले ही क्षण नहीं देखिए बहुत बार लोग बोलते हैं कि अरे हमने तो ऐसा कोई बुरा कार्य तो किया नहीं है जीवन ट्रांसफॉर्म क्या करना हमको जिसको हम हिंदू मिडल क्लास फैमिली कहते हैं हिंदू मिडिल क्लास फैमिली में आप देखेंगे कि बहुत रेयरली आपको कोई दुश्चिंता या लड़की मिलेगा जो कि बद नियत हो दुष्टता हो शैतानिया या हैवानियत उसके भीतर हो हम सबके भीतर में अच्छे संस्कार है ही है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है तो फिर ट्रांसफॉर्म क्या करना है ट्रांसफॉर्म अपनी जो लेजनेवा को उठ कर के एक दो ऑप्शन रहते हैं कि चलो बैठ कर के जब ध्यान करूं कोई अच्छी किताब पढ़ूं ना कि फिर से मैं थोड़ा सो जाऊं आरती से आकर के कोई कोई लोगों की ऐसी हैबिट हो जाती है मेरी ही बीच में हो गई थी कि जाओ फिर से थोड़ा सो जाओ आरती में तो जाना ही है किंतु फिर तो समय है ऑफिस में आने के लिए ऑफिस तो 9:30 10 बजे स्टार्ट होता है तो फिर थोड़ा सा लेते हैं थोड़ा फिर से विश्राम कर लेते हैं यह भीतर से जो आलस जो है तमस जो है हमको इसके साथ में झुज है इसको हमको एलिवेटर है ट्रांसफॉर्म करना है तमस में से सत्व में जाना है ऐसा अभी रजस में हम सभी लोग आ ही गए हैं जैसा स्वामी जी के समय था निवेदिता पूछती है कि स्वामी जी देखिए कि भारत में तो कोई चोरी भी नहीं करता कितना सुंदर देश है तो स्वामी जी कहते थे काश कोई चोरी करता एक आदमी स्वामी जी के पास में आया बोलता है मुझे साधु होना है तो स्वामी जी ने कहा क्या तुम झूठ बोल सकते हो तुम डाका डाल सकते हो तुम क्या मारपीट कर सकते हो तो वो बेचारा एकदम डर गया अरे क्या बोल रहे है साधु होने को आया है और पूछ रहे है कि झूठ बोल सकते हो कि नहीं स्वामी जी ने कहा यदि तुम वो नहीं कर पाओगे तो जब ध्यान क्या करोगे एक भीतर में से तो एक स्ट्रेंथ चाहिए एक वो ठाकुर ने कहा ना मारो काटो वो वाला भाव भक्ति का एक रजस होता है जो लोग भक्ति दिखाते हैं वो पीतांबरी वाली चादर पहनते हैं वो रुद्राक्ष की माला पहनते हैं उसमें बीच-बीच में सोने के दाने होंगे फिर पाल के ऊपर में वो तिलक टानेनबाउम जिस डिजायर को हम एक शारीरिक कंफर्ट की ओर ले जाते हैं वहां से उठा कर के मारपीट करके ईश्वर की ओर ले जाए ये तमस से हम सबको छुटकारा पाना है यानी ये ट्रांजैक्शनल रिलेशन फिर भी है ठाकुर से हम मांगेंगे हम क्यों नहीं मांगेंगे हमारे पिताजी है अपने ही मां है सब कुछ मांगेंगे जीवन में कंफर्ट भी चाहिए अच्छा स्वास्थ्य भी चाहिए अच्छा धन भी चाहिए अच्छा नौकरी भी चाहिए अच्छा मकान भी चाहिए अच्छा परिवार भी चाहिए यह सब होगा तो ठाकुर के चरणों में सबको अर्पित करेंगे एक बार मैं रंगनाथ आनंद जी की एक रेमसंस पढ़ रहा था तो रंगनाथ आनंद जी तो पता है कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया उनको अपने कल्चरल एंबेसडर बना कर के पूरे विश्व में भेजती थी विभिन्न विभिन्न देशों में तो एक बार वहां पर जाएंगे रंग नाथा आनंद जी अपनी वह इंडियन एंबेसी के थ्रू वो सब प्रोग्राम होगा फिर रंगनाथ आनंद जी प्रवचन देंगे फिर वोह इंटरव्यू देंगे सब करेंगे फिर भारत वापस आएंगे तो इस तरह के एक वि वि देश के दौरे से एक फॉरेन टूर से रंगनाथ आनंद जी वापस आए तो सब आश्रम के सब बाकी साधु ब्रह्मचारी उनके सामने बैठे हुए हैं पूछ रहे हैं कि महाराज जी आपने वहां पर क्या किया कुछ अच्छी बातें बताई है तो महाराज जी तो नेचुरली सबको बताएंगे कि उन्होंने क्या किया तो अभी उन लोगों के एक महाराज बैठे थे वो महाराज बोल रहे हैं कि रेस्टर रंगनाथन जी बता रहे हैं ना कि मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा किया मैं वहां पर गया था मैंने यह प्रवचन दिया मैंने उनके साथ में यह बात की मैंने यह इंटर दिया मैं इंटरव्यू में यह बात की तो सडन उनके मन में एक संशय जागृत हुआ वो बोलते हैं वो अपनी रेमसंस में लिखते हैं जो रेमसंस में पढ़ रहा था लिखते हैं कि मेरे मन में यह प्रश्न हुआ कि रंगनाथन जी बार-बार मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा किया ऐसा क्यों कह रहे हैं वो तो एक्चुअली ठाकुर की संतान है और ठाकुर की कृपा से ही उनके भीतर में यह वाचना मने वाचन शक्ति प्रकट हुई है यह वाणी की जो दिव्य प्रकाश है उनकी जिवा पे वो तो ठाकुर की कृपा से हुई है वरना तो रंग नाथा आनंद जी जब जवाइन करने को आए थे पूछा कि क्या क्या पढ़ाई लिखाई कि है बोले मैट्रिक पास हू उस समय का 11 स्टैंडर्ड तो फिर उनको किचन में ड्यूटी दी गई खाना पकाते थे और कंप्लीट वर्क्स पढ़ते थे तो ये रंग नाथा नंद जी तो उनके पास में तो जो कुछ भी आ 50 बार कंप्लीट वर्क पढ़ दिया कप जाकर के वो वो विद्या का अरुणोदय उनके हृदय में हुआ तो ठाकुर की कृपा से ही तो स्वामी जी की कृपा से सब उन्होंने प्राप्त किया है तो बार-बार ऐसा क्यों कह रहे हैं कि मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा किया ऐसा नहीं कहना चाहिए बीच बीच में क्या ठाकुर की कृपा से ऐसा हुआ स्वामी जी की कृपा से ऐसा हुआ तो माने सेंटेंस स्ट्रक्चर जिस तरह से कर रहे थे तो उन्होंने साहस करके व महाराज को पूछ ही दिया कि महाराज आप ये बार-बार मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा किया ऐसा आप क्यों कह रहे हैं तो महाराज जी ने इमीडिएट उत्तर दिया कितना सुंदर उत्तर कि मेक योर ईगो एज हाई एस स्काई एंड देन ऑफर इट टू द होली फीट ऑफ श्री राम कृष्ण अपना अहंकार अपना ईगो आकाश के जितना ब बढ़ाओ उसको और फिर आखिर में भगवान प्रभु श्री राम कृष्ण के श्री चरणों में उसको अर्पित कर दो उनको शरणागत हो जाओ तो अभी इतना बड़ा ईगो है तो आप ठाकुर के चरणों में देंगे कुछ नहीं है तो ठाकुर के चरणों में क्या देंगे एक बार स्वामी जी के पास में एक लड़का आया तो स्वामी जी ने साधु बनने के लिए तो स्वामी जी ने पूछा तुम्हारे पास में क्या है भगवान बुद्ध के पास में तो एक राज्य था त्याग करने के लिए तुम्हारे पास त्याग करने के लिए कुछ है कुछ त्याग करने के लिए हो गया तो तुम त्याग होगे है ही नहीं कुछ तो मैंने तो ऐसा हम ठाकुर के पास से क्यों नहीं मांगेंगे मुझे धन दो ऐश्वर्य दो सब मांगेंगे किंतु साथ-साथ में ठाकुर की जो अपेक्षा है हमारे पास से वो है कि हम अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करें ये आलस है ये दुर्गुण है उसको हम सेल्फ एनालाइज करें और उसको हम धीरे-धीरे करके दूर करें और साधन भजन और नैतिकता के पथ पे हम आगे बढ़े यह ठाकुर की हमसे अपेक्षा है एक बहुत ही सीनियर स्वामी जी हमारे ट्रेनिंग सेंटर में क्लास ले रहे थे तो वो एक बार कह रहे थे कि देखो कि एक ब्रह्मचारी आया उनके पास में और पूछा कि महाराज जी आपकी मेरे से मैं यहां पर जो आया हूं मैं अपना पूरा जीवन आपको दे रहा हूं रामकृष्ण संघ को दे रहा हूं मेरे पास में तो बहुत अच्छा करियर प्रोस्पेक्ट है मैं चाहूं तो बाहर में बहुत ही सक्सेसफुल हो सकता हूं पढ़ा लिखा हूं घर भी अच्छा है तो मैं तो बाहर में बहुत ही अच्छा एक परिवार बसा कर के एक अच्छा जीवन बिता सकता हूं किंतु फिर भी ठाकुर से प्रेरित होकर के मैं यहां पर आया हूं तो अभी यहां पर आकर के ठाकुर से प्रेरित होना ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति रखना एक चीज है अ ये राम कृष्ण संघ जो है वह तो किंतु हमारे जैसे मनुष्य ही चलाते हैं तो मैं आपसे क्या अपेक्षा कर सकता हूं और आपकी मेरे से क्या अपेक्षा है सुंदर प्रश्न किया तो महाराज जी ने इमीडिएट उत्तर दिया बहुत ही सीनियर महाराज हमारे इंचार्ज थे उस समय उतर दिया कि देखो तुम हमसे जो अपेक्षा रखोगे वह है सेफ्टी सिक्योरिटी एंड ट्रेनिंग हम तुमको सेफ एनवायरमेंट में रखेंगे सिक्योर रखेंगे खाने पीने की कर्म करने की सब तरह की सुविधा रहेगी और तुमको बहुत ही सुंदर यहां पे स्वाध्याय के लिए स्टडी के लिए जब ध्यान के लिए साधन भजन के लिए बहुत ही सुंदर एक अपॉर्चुनिटी हम तुमको देंगे किंतु इन रिटर्न हम तुमसे क्या अपेक्षा है डिसिप्लिन और वासनाओं का त्याग यह दो अपेक्षा हमारी तुमसे है एक आदेश पालन की एक तुम में कैपेसिटी होनी चाहिए कल कहीं जाकर बोले कि ऐसे सेंटर में चले जाओ वहां पर शायद तुमको ना अच्छा लगे वहां का क्लाइमेट शायद ना अच्छा लगे वहां का कार्य तुमको अच्छा ना लगे फिर भी तुमको जाना है डिसिप्लिन से वहां पर रहना है संघ ने तुमको जो आदेश दिया है उस आदेश का पालन करना है तो तो ये ट्रांजैक्शन तो सब जगह प है ऐसा नहीं है कि संन्यास जीवन में नहीं है हम यहां पर डिसिप्लिन में रहते हैं हम यहां पर आदेश पालन करते हैं हम यहां पर अपनी वासनाओं को कंट्रोल में रखते हैं हम यहां पर साधन भजन करते हैं और इन रिटर्न हम अपेक्षा करते हैं कि जो सीनियर साधु है जो पदाधिकारी है वह हमको सेफ सिक्योर रखें हमको उपदेश दे बीच-बीच में मन में हताशा निराशा आ जाती है तो उसका कोई अच्छे शब्दों से निराकरण करना तो संभव नहीं कि तू कोई दो अच्छी बातें भी बोलता है तो मन को बड़ा सध्या मिलता है तो दो अच्छी बातें करें यह हमारी अपेक्षा रहती है तो ठाकुर से मां से अवश्य सब कुछ मांगना है तो यहां पे भी मां किंतु क्या है कि मां जद अपना दिव्यत्वाची तो किस तरह का हो जाता पता है लोग आते मिन्नत मानते कहते इतना रुपया ले लो यह श्रीफल ले लो ये मिठाई ले लो यह वस्त्र ले लो और सामने हमको यह दैहिक सौंदर्य दैहिक स्वास्थ्य ये धन यह सब हमको दे दो इस तरह का बहुत ही निम्न कक्षा का ट्रांजैक्शन चालू हो जाता हमको ट्रांजैक्शन करना तो बड़ा ही उच्च कक्षा का हमको ठाकुर को अपना डिसिप्लिन देना है अपनी आज्ञा वहता देनी है और ठाकुर से फिर हम जो चाहे वो मांग सकते हैं मांगने में हम क्यों शर्माए भाई अपने ही पिताजी माताजी है तो ये लोगों का जीवन देखिए कि कितना सोच समझ करके कभी दिव्यता का प्रकाश करते हैं कभी मानवत्वम महाराज जी आगे लिखते हैं मायर मा संभव तो ई सबब रहस्य अनु धावन कोरियाई शेष बोयो से एक दिन तहा के बोलिया लेन मां की मां श्यामा सुंदरी देवी ने मां के जीवन का यह रहस्य देखा था यह सीक्रेट समझ गई थी इसीलिए आखिरी जीवन में मां श्यामा सुंदरी देवी ने मां को कहा था क्या कहा मागो ई अमार के मा मां तुम मेरी कौन हो मां अभी क्या है कि बच्चे को भी मां मां करके पुकारती है यह बांगला में इस तरह से सहज है कि स्त्रियों को मां करके पुकारना भले ही चाहे अपनी बेटी भी क्यों ना हो तो इसलिए श्यामा सुंदरी कहती है मागो अरे तई ज हमार के मा अरे मां तुम मेरी कौन हो अरे बिटिया तुम मेरी कौन हो आमी की तो के चिंते पछी मैं क्या तुमको पहचान सकी हूं आमी की तो के चिंते पछी मा बेटी बिटिया मैं क्या तुमको पहचान पाई हूं कन्या अवश्य तोख बजिक विरक्ति सहकार बोलिया लेन कन्या ने अर्थात की उनकी बिटिया ने थोड़ा सा नाराजगी के साथ में बाहर से नाराजगी भीतर में से किंतु आशीर्वाद बाहर से नाराजगी के साथ में मां ने कहा था के आ बार कौन के आ बार दो बार बोलती है अभी कौन कौन आमार की चार टे हाथ हुए छ मेरे क्या चार हाथ हुए हैं ता हले तुम्हार काछ आशो केनो यदि मेरे चार हाथ हुए हैं तो मैं तुम्हारे पास में क्यों आऊंगी मां के चार हाथ थे ही कभी-कभी श्यामा सुंदरी देवी को दिख जाते थे कभी-कभी वो विस्मृत हो जाती थी किंतु मां के चार हाथ अवश्य थे तो जगदंबा मा काली अवश्य थी किंतु जब देखिए ता हले तुम्हार काछ केन आश यदि मेरे चार हाथ होते मैं काली होती मां काली तो मैं तुम्हारे घर में बिटिया होकर के क्यों जन्म लेती किंतु यही माने आगे कहा है कि यदि इनका सत पवित्र जीवन ना होता तो क्या अवतार इनके घर जन्म ग्रहण करते तो मां बाहर से तो यह नाराज की सह बोल रही है किंतु भीतर में कोई दूसरी ही लीला चल रही है भगिनी रूपे शारदा देवी की कोरिया छिले ताहा माता पुत्री एक दिने कोथा ते प्रकाश पाए भगिनी रूप अर्थात की बहना के रूप में मां ने क्या किया था वह मां और पुत्री के एक दिन के संवाद से ही पता चलता है गर्भधारिणी बोली लेन जननी मां श्यामा सुंदरी देवी ने कहा शारदा तोर मत अमार जेनो जन्मा तरे एकटी में होए मा माने म श्यामा सुंदरी देवी ने कहा मां बिटिया तुम्हारे जैसी और एक बिटिया दूसरे जन्म में भी हो मेरी स्वामीर धोन थाक बे देखिए स्वामी का धन हो स्वामी का धन होगा अपने पति के पास में धन होगा तभी तो यह देव बालिका का ठीक से लालन पालन कर पाएंगे तो माने क्या कहा श्यामा सुंदरी देवी ने शारदा बिटिया तुम्हारे जैसी ही और एक बिटिया मेरा दूसरे जन्म में भी मेरी कोख से मेरे गर्भ से जन्म धारण करें और जैसे कि स्वामी का धन हो स्वामी का धन होने से ही तो उनकी मैं सेवा कर पाऊं छले पुले निए बड़ो ज्वाला तन बच्चों को लेकर के बड़ा ही कष्ट होता है कोन्या तहते कृत्रिम क्रोध दिखाया बोली लेन कन्या उससे कृत्रिम क्रोधित हो गई कृत्रिम क्रोधित बाहर से क्रोधित भीतर से नहीं कृत्रिम क्रोधित होकर के बोली आबार आमा के टान छो फिर से मुझे पुकार रही हो तुम्हार छले पुले आमी आबार से मानुष करी तुम्हारे लड़के बच्चे आकर के फिर से क्या उनका मुझे लालन पालन करना होगा तथापि स्ने होमोई कोर्म चंचला सुशीला कन्या शांति प्रतो अतीत स्मरण पूर्वक श्यामा सुंदरी स्वीय कथाई दरद ढलिया बोली लेन जब मां शारदा ने कहा उनकी बिटिया ने कहा फिर से मैं क्यों भाई तुम्हारे घर में जन्म ग्रहण कर बाहर से क्रोध कर र है भीतर से नहीं बाहर से झुठ मुठ का क्रोध करके नाराजगी दिखा करके पूछ रही है मैं क्यों फिर से तुम्हारे संसार में आऊं क्यों तुम्हारे बच्चों को मैं बड़ा करूं देखो मां के भाई ऐसे थे मां को पूरे परेशान करके रख देते थे बड़े बाद बात की ये स्मृति कथाओं में हमको जानने को मिलेगा तो यह परेशान करने वाले तुम्हारे बच्चों को मेरे भाइयों का लालन पालन किया मुझे फिर से करना होगा किंतु फिर भी जब मां ने ऐसा कहा मां शारदा ने तब मां श्यामा सुंदरी देवी ने क्या कहा क्या सोचा क्या याद किया यही तो छोटी बच्ची होकर के कितने स्नेह भर से कितने दर्द पूर्वक अपने छोटे भाइयों की केयर किया करती थी स्नेह मोई और कर्म चंचला सुशीला कन्या शांति प्रदो अतीत स्मरण पूर्वक स्नेहमयी और कर्म चंचल अर्थात कि कर्म दक्ष सुशीला कन्या का शांति प्रद अतीत को स्मरण कर शांति प्रद बचपन स्मरण करके श्यामा सुंदरी देवी ने कहा था तोके जनो आभार पाई मा तुमको ही फिर से मैं प्राप्त करूं अपनी बच्ची के रूप में काली मामा एक समय थार समर्थन कोरिया बोलिया लेन काली मामा ने भी इसी बात का समर्थन करके एक बार कहा था दीदी आमा देर साक्षत लोखी हमारी दीदी बड़ी बहना साक्षात लक्ष्मी है आमा देर बांच राख बार जन्नो दीदी कीना कोरे छन हमको बचा के रखने के लिए हमारे लालन पालन करने के लिए दीदी ने क्या नहीं किया धान भाना अर्थात की यह धान भना अर्थात की वही वो खेत में जो धान होता है उसके ऊपर में जो कोई प्रोसेस करनी होगी वो है पैता काटा अर्थात की जनेऊ यज्ञो पवित को बनाना सतो से व चरखा से वह यज्ञ पवित्र बनाना गरुर जाब ना देवा गरु के लिए खाना का खाने का जुगाड़ करना राना बन्ना करना माने खाना पना बनाना बोलते गले संसारे बेसी काज तो दीदी कोरे छ जद ठीक ठीक कहा जाए तो संसार का परिवार का घर का ज्यादातर काम तो दीदी ही करती थी तो यहां पर यह आविर्भाव च प्रकरण समाप्त हुआ इसके बाद का प्रकरण है वधु अर्थात की श्री राम कृष्ण देव के साथ में विवाह का प्रसंग उसका हम कल से पाठ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओमत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु