प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित आज दो घटनाएं हैं दो प्रसंग है उसका का पाठ करेंगे। यदि समय इतना रहता है कि दोनों प्रसंग हम कर पाए। एटलीस्ट एक तो करेंगे। ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह
कहानी: श्रीरामकृष्ण ने माँ सारदा से विश्व के आध्यात्मिक कल्याण की जिम्मेदारी लेने का अनुरोध किया
से ठाकुर मां को अपने भक्तों का आध्यात्मिक भार आध्यात्मिक जिम्मा स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहे हैं। किस तरह से धीरे-धीरे करके श्री मां शारदा देवी गुरु और इष्ट का जो वो सिंहासन है रामकृष्ण मिशन रूपी उसके शीर्ष स्थान पर आकर के विराजित होने के लिए तैयार हो रही है। तो वही आखिरी दिनों की एक घटना है। काशीपुर की ही है। ठाकुर को कैंसर हुआ है। उनके भक्त ठाकुर को काशीपुर ले आए हैं क्योंकि दक्षिणेश्वर कोलकाता से थोड़ा सा दूर है और वहां पर आना जाना करना नियमित रूप से वह थोड़ा सा असुविधाजनक था इसलिए ठाकुर को काशीपुर लाया गया है। कोलकाता में ही वहां पर डॉक्टर को भी आना जाना करने में सुविधा होगी और भक्तगण भी इजीली वहां पर ठाकुर की प्रतिदिन मुलाकात ले सकते हैं। दर्शन करने के लिए आ सकते हैं। उनकी सेवा कर सकते हैं। तो वही काशीपुर की घटना है। काशीपुर एक दिन ठाकुर मायर दिखे ताकया अ देखिया तीन बोली ले की बोलबे बोलो ही ना एक दिन काशीपुर में ठाकुर मां की ओर देख रहे हैं तो देख रहे हैं कुछ बोल नहीं रहे हैं तो फिर आखिर में मां को कहना पड़ा क्या बोलोगे बोलो ना अनुजोगे सुरे ठाकुर बोली कंप्लेन के स्वर में ठाकुर ने कहा अनुयोग के स्वर में कंप्लेन के स्वर में ठाकुर ने कहा हैगा तुम ही कीु करबे ना क्या तुम क्या कुछ नहीं करोगी निजे देह दिखाइया ए सब कोबे ठाकुर ने अपनी ओर उंगली निर्देश करके अपनी ओर इशारा करके कहा क्या इसी को सब करना होगा श्री मां निजेर अबोष्ठाय निजे असहाय अबोष्ठार कथा भाबिया बोली लेन मां ने अपनी असहाय अवस्था की बात समझ करके जान करके ठाकुर को कहा आमी मैं मानुष आमी की कोरते पारी मैं तो स्त्री हूं मैं क्या कर पाऊंगी ठाकुर तख नहीं उत्तर दिलन ठाकुर ने साथ-साथ में ही उत्तर दिया नाना तो के अनेक किछु करते होवे नाना तुमको और भी बहुत कुछ करना होगा। देखिए प्रसंग छोटा सा है किंतु इसके भीतर में कितना सब कुछ है। ठाकुर सबसे पहले तो मां की ओर देख रहे हैं। देख रहे हैं कि मां अपना जीवन सर्वस्व जैसे कि ठाकुर के श्री चरणों में अर्पण करके मन प्राण तन से ठाकुर की सेवा कर रही है। किंतु ठाकुर को यह भी पता है कि अपनी खुद की सेवा करने के लिए तो मतलब ठाकुर की खुद की सेवा करने के लिए तो जगत जननी का आगमन पृथ्वी पर नहीं हुआ। हां नारायण की सेवा करेगी नारायणी। किंतु इसके परे भी तो नारायणी का एक रोल है इस जगत में। वो है कि हम जो साधारण मनुष्य हैं, हम लोग जो कि अंधकार में चारों ओर मारे-मारे घूम रहे हैं। हमारी नजर के सामने यह अज्ञान और सफरिंग का यह दुख कष्ट का जो पर्दा लगा हुआ है उसको तोड़ करके उसको भेद करके उसको चीर करके यह अनंत के पार जो अनंत क्षर सागर है उसका संधान देना उसका एक उनका इसका इंफॉर्मेशन देना यह काम तो कौन करने वाला है यह काम तो श्री मां को ही करना होगा तो इसलिए ठाकुर मां को कहते हैं क्या मुझे ही सब कुछ करना होगा? तुम कुछ नहीं करोगी। अभी यह जो ठाकुर की वह जो क्रिप्टोग्राफिक लैंग्वेज है ठाकुर ऐसा सब डिटेल में नहीं कहेंगे कि लोक कल्याण जो है मुझे ही क्या सब करना होगा। किंतु मां को तो पता है मां और ठाकुर का मन जो है वह इस उच्च आध्यात्मिक भूमि पर मिलित हुआ था कि ठाकुर को सब कुछ कहने की जरूरत नहीं है। मां बहुत सारी बातें ठाकुर के अल्प शब्दों में ही समझ जाती थी और भी बहुत सारी बातें बिना कहे ही समझ जाती थी। तो मां ने साथ-साथ में ही कहा कि मैं तो स्त्री हूं। मैं क्या कर पाऊंगी? देखिए उस समय की जो स्त्रियों की अवस्था थी वह तो हमको पता है। इवन आज भी देखिए सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे विश्व में स्त्रियों के ऊपर में जितने अत्याचार होते हैं उतना पुरुषों के ऊपर में कभी नहीं होते। तो यह तो जग जाहिर बात है कि स्त्रियों की जो शारीरिक जो दुर्बलता है उसका बेनिफिट उठा के पुरुष लोग उनको सब तरह के बंधन में रखते हैं। पहले पर्दा प्रथा थी। अभी आजकल भी देखिए कि कंपनी में आप कोई भी कंपनी में जाएंगे उसका टॉप लेयर ऑफ मैनेजमेंट होगा। वह जनरली पुरुष लोगों का ही बना होगा। तो यह तो है कि उस समय भी तो पर्दा प्रथा पुरुषों के सामने नहीं जाना है। घर से बाहर नहीं निकलना है। वगैरह वगैरह सब था। तो ठाकुर जिस तरह से घरघर जाकर के आनंद और दिव्यता का संदेश फैलाते थे। मां ऐसा कैसे करने वाली है? और जैसे ठाकुर ने तो पहले ही कह दिया था माने यह कहते हैं ना तैरना है किंतु गले में पत्थर बांध दिया है और कहते हैं अभी तैरो तो पत्थर का वैसे तो तैरना मुश्किल है ऊपर में से गले में पत्थर बांधा है तो कितना दूर आप जाएंगे तो वैसे ही ठाकुर ने पहले से ही सब प्री कंडीशन बना करके रखा था कहा था कि यह जो लक्ष्मी दीदी है ठाकुर की भतीजी और मां का मां के साथ में नहबत में रहती थी। उनको जिस तरह से यह वैष्णव भाव है उनका उनके भीतर में भक्तों जब भक्तों के प्रति जो उनका स्नेह है और भक्त लोग जब इकट्ठा होते हैं तो यह वैष्णव पदावली का कीर्तन करतेकरते वह जो नृत्य करती है तो यह सब तुमको नहीं करना है। लक्ष्मी के ताल में ताल मिला करके तुम अपनी लज्जा भांगना मत तोड़ना मत। यह बात ठाकुर ने मां को स्पष्ट रूप से कही थी। लज्जा पटावृता तो हमारी श्री मां है। तो एक तरह से मां को लज्जा में पर्दा प्रथा में भी रहना है। पुरुषों के साथ में किसी भी तरह का व्यवहार नहीं करना है। वार्तालाप नहीं करना है। और यहां पे जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि मैंने जितना किया उससे और कहीं ज्यादा तुमको करना है तो मां नेचुरली वह तो मां मां के मन में एक तरह का कंफ्यूजन तो खड़ा होगा ही होगा कि यह बात कैसे संभव है? क्या मां ठाकुर की तरह कोलकाता में वो घोड़ा गाड़ी लेकर के वो घोड़ा गाड़ी में बैठकर के कोलकाता जाना जैसे ठाकुर का था। बीच-बीच में ठाकुर के लंबे-लंबे प्रोग्राम बनते थे और वह सब कुछ पहले से सेट रहता था। घोड़ा गाड़ी आएगी सुबह को फिर वह जो सुबह को एक के बाद एक घर गिनना शुरू करेंगे। पहले से ही ठीक है कि पहले यह घर फिर बाद में दूसरा घर कभी-कभी यह जो ब्रह्म समाज का उनको निमंत्रण आता था तो वहां पर जाते थे। वहां पर नृत्य कीर्तन एक बड़ा ही सुंदर दृश्य शरद महाराज हम हमारे सामने वर्णित करते हैं। कहते हैं वो लीला प्रसंग में है कि एक तर एक दिन उनको पता चला कि ठाकुर एक जगह पर किसी के गार्डन हाउस में ब्रह्मो समाज का ही एक डिवोटी था। उसके गार्डन हाउस में ठाकुर आ रहे हैं। तो शरद महाराज भी उस समय तो स्टूडेंट थे। तो शारदानंद जी भविष्य के तो वह भी गए दर्शन करने के लिए देखा कि घर उस समय बाय दैट टाइम ऑलरेडी ये संकीर्तन और नृत्य प्रारंभ हो गया था और चार जिस कमरे में जिस हॉल में यह कीर्तन और नृत्य हो रहा था उसको चारों ओर से घिर करके कितने सारे लोग खड़े थे भीतर में तो जाने की जगह ही नहीं थी यह होल तो ऑलरेडी भरा हुआ था कितने इतने लोग ठाकुर के साथ में कीर्तन भी कर रहे थे और भीड़ बनाकर के चारों ओर खड़े भी थे। तो भीतर में तो जाने की जगह नहीं है। किंतु साथ-साथ में ही हॉल के बाहर में खिड़की में से दरवाजे में से लोग भीड़ बनाकर के भीतर में देखने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु फिर भी उनको जगह नहीं मिल रही है। शरद महाराज ने प्रयास किया। भीतर में जाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। यदि नजर पड़ जाए सिर्फ दर्शन हो जाए ठाकुर के इस दिव्य भाव का दिव्य उल्लास का तो किंतु जगह कहीं पर नहीं मिल रही है। इवन दर्शन करने की फिर आखिर में कहां से वह पीछे से गए कहीं से इस तरह से खुली जगह थी उस वहां से जैसे ही भीतर में देखा तो क्या दिव्य दृश्य ठाकुर जैसे कि भाव में मत्त होकर के सिंह विक्रम से नृत्य कर रहे हैं। ये जो देह की कोमलता और साथ-साथ में इस तरह से एक रुद्र भाव का प्रदर्शन देखिए कभी-कभी जो नृत्य होता है वो एक फेमिनाइन एस्पेक्ट उसको कहा जाता है कि नृत्य करना स्त्रियां ही नृत्य करती है और उसमें एक फेमिनाइन हमको एक स्टाइल हमको दिखने में आता है। किंतु ठाकुर का जो नृत्य था वह ऐसा नहीं था जैसे कि यह भगवान शंकर स्वयं एक रुद्र भाव में आकर के कैसे नृत्य करते हैं। एक ओर भीतर में से दिव्यता मधुर दिव्यता वो छलक रही है दूसरी ओर किंतु जो उनकी ये जो एक्शंस है जो स्टाइल है नृत्य करने की वो जैसे कि पौरुषमय है पुरुषत्व से भरी हुई है। इसीलिए आप देखेंगे कि लीला लीला प्रसंग में या तो फिर कथामृत में ठाकुर के जो नृत्य है उसको किस तरह से डिस्क्राइब किया है। सिंह विक्रम से ठाकुर नृत्य कर रहे हैं। यानी कि भीतर में स्त्री सुलभ कोमलता भी है, भी है और पुरुषोचित एक तरह का पुरुषत्व भी है, सिंह विक्रम भी है। तो जैसे यह भगवान शिव अर्ध नारीश्वर एक और तांडव नृत्य करते हैं तो पूरे ब्रह्मांड का प्रलय कर देते हैं। और यहां पे जैसे कि सती या तो फिर जो उनकी शक्ति है वह उनका जो यह चरित्र है या तो फिर उनकी यह जो लाक्षणिकता है वह भी वह कोमल मधुरता भी उनके भीतर में विराजमान है। तो श्री रामकृष्ण का भी इतना सुंदर नृत्य और कीर्तन तो शरद महाराज कहते थे कि वह हम लोग उसको देख कर के जैसे कि अभिभूत हो गए। जैसे कि जन्म जन्मांतर के यह जो संस्कार है हमारे मन के ऊपर में यह कुसंस्कार कुकर्म जो कुछ भी कहो सब जैसे कि इससे धूल जा रहा है तो यह थे ठाकुर का मिनिस्ट्री ठाकुर का गुरु भाव कंपेयर टू दैट आप मदर के साथ में मां शारदा देवी के साथ में कंपेयर करके देखिए कहां वो नहबत में रहेगी कहां पर किस स्त्री भक्तों के अलावा और किसी के साथ में वार्तालाप नहीं करना है। बिल्कुल मां है बोलकर के बहुत सारे लोगों को नहीं पता था। यहां तक कि मास्टर महाशय स्वयं जैसे कि हमने गंभीरानंद जी द्वारा लिखित एक विवरण में पढ़ा कि ठाकुर कभी-कभी कहते थे रामलाल को कि वो पिंजरा है। वहां पर तोता मेना रहते हैं। उनके लिए यह प्रसाद ले जाओ। ऐसा कभी-कभी कुछ कहते थे। तो मास्टर महाशय कथामृत के लेखक स्वयं ठाकुर के इतने अंतरंग भक्त थे। शुरू शुरू में यही समझते थे कि ठाकुर ने सही-सही में पिंजरे में एक तोता और मेना को पाल करके रखा है। किंतु वह तोता और मेना कौन? तो मां शारदा देवी और उनकी ठाकुर की भतीजी लक्ष्मी दीदी। यह दोनों नहबत में रहते थे। तो ठाकुर रामलाल को कहते थे कि यह प्रसाद है तो तुम्हारी चाची अर्थात कि मां शारदा देवी और तुम्हारी बहन लक्ष्मी दीदी रामलाल दादा की बहन होती थी तो उनके लिए ले जाओ तो देखिए कि इतना जैसे कि अपने को छुपा करके रखना है और फिर कैसे यह लोक कल्याण संभव है तो मां ने साथ-साथ में ही उत्तर दिया कि मैं तो स्त्री हूं। स्त्रियों के लिए जो एक रूढ़िवादी व्यवस्था है, एक ऑर्थोडॉक्स सिस्टम है, उसमें मुझे रहना है। इसके बाद में फिर मैं किस तरह से आपकी तरह लोक कल्याण कर पाऊंगी। किंतु ठाकुर ने साथ-साथ में ही क्या उत्तर दिया? नाना तो मां के अनेक किछू करते होवे। नहीं, नहीं, तुमको और भी बहुत कुछ करना होगा, कि यह बहुत कुछ कैसे होगा? देखिए एक सुंदर उदाहरण हमारी
कहानी: उद्बोधन के कर्मचारी चंद्रमोहन की माँ के प्रति भक्ति और श्रद्धा
नजर के सामने है। चंद्रमोहन बोलकर के उद्बोधन में एक वर्कर था। एक कर्मचारी था तो उसने अपनी एक रेमिनेशंस में लिखा है कि वह तो था वैसे आज का जो बांग्लादेश है वहां से कोलकाता आया था नौकरी के लिए। उस समय तो पॉवर्टी इतनी थी, गरीबाई इतनी थी कि वह शहर से गांव से शहर माइग्रेट करना पड़ता था। आज भी करना पड़ता है बहुत सारे लोगों को। तो वह वहां पर आया हुआ है। अभी वहां पर वह रह रहा है। अपने बड़े भाई के साथ में एक छोटी सी उसने दुकान बनाई है और दुकान से तो ज्यादा कुछ आएगा नहीं। उसको मिलेगा नहीं। छोटा सा ग्रोसरी स्टोर है तो फिर वह उसमें से तो इतना पैसा नहीं मिलता था। तो उसके बड़े भाई के साथ में रह रहा था। उसके बड़े भाई रेलवे में नौकरी कर रहे थे। तो वह नौकरी कर रहा था। उनके वो नौकरी करते थे। गवर्नमेंट इंडियन गवर्नमेंट का जॉब होता है। वो जनरली अच्छा पैसा मिलता है। तो बड़े भाई का ही खाना खा रहा था। अभी हुआ ऐसा बड़े भाई को एक दिन लगा कि उसका यह छोटा भाई बिना मतलब का उसका खाना खा जा रहा है। तो उसने कहा कि देखो तुम तुम्हारी दुकान से तो तुमको ज्यादा कुछ मिलता नहीं है। तुम एक काम करो नौकरी खोजना शुरू कर दो। कितने दिनों तक तुम मेरा अन्न खाओगे? तो जैसे ही बड़े भाई ने इस तरह से वो इस टोंट करके कहा इसको बड़ा ही बुरा लग गया चंद्र को और उसने ठीक किया कि आज के दिन में कैसे भी करके मुझे नौकरी प्राप्त करनी है। यदि नौकरी नहीं मिलेगी तो मैं पश्चिम में कहीं पर चला जाऊंगा। किंतु आज के दिन के बाद वो जो आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है तो आज के दिन के बाद एक दिन भी मैं बड़े भाई का अन्न नहीं ग्रहण करूंगा बोलकर के घर से तो निकल गया किंतु अभी कौन इस तरह से नौकरी देने वाला है अनइंप्लॉयमेंट आज भी प्रॉब्लम है उस समय भी प्रॉब्लम था इधर-उधर 10-15 जगह पर गया तो सब जगह से बोल दिया गया कि नौकरी तो यहां पे नहीं मिलेगी आखिर में उसको ऐसा याद आया कि रामकृष्ण कृष्ण मिशन की ओर से काफी रिलीफ हो रहा है। तो क्यों नहीं वहां पर जाकर के प्रयास किया जाए? तो वह आया बलराम भवन में। उसको पता था कि यहां पे ऐसे साधु लोग रहते हैं। तो अभी वहां पर एक हिंदुस्तानी अर्थात कि नॉर्थ इंडियन चौकीदार खड़ा था। वो गेट के सामने में और माने मोटा तगड़ा उसका था शरीर और चौकीदार लोग होते हैं ना मूछे बड़ी-बड़ी होती है। वो लाठी ले खड़ा था। तो यह चंद्र ने जाकर के कहा कि अच्छा मुझे साधुओं से मिलना है किसी के साथ में मेरी मुलाकात करवा दीजिए। तो यह चौकीदार ने गुस्से से पूछा उसको माने उसका तो मिजाज भी तो ऐसा रहता है चौकीदार का। कौन सा साधु से मिलोगे? तो अभी तो चंद्र को तो किसी के साथ में वार्तालाप नहीं था। किसी को नहीं पहचानता था। क्या करेगा? तो उसने कहा कि वैसे ही जो भी साधु है उसके साथ में मिला दो। अभी यह चौकीदार को आ गया गुस्सा क्योंकि वैसे ही तो उसके जो कपड़े थे अभी पूरा दिन भर वह घूम रहा था। खाना भी नहीं खाया था। झुलस गया था। चेहरा कपड़े भी थोड़े से यह हो गए थे। वो गंदे हो गए थे। तो ये चौकीदार ने गुस्से से उसने सोचा यह भिखारी होगा। भीख मांगने के लिए आया होगा। तो उसने गुस्से से कहा भागो यहां से। किसी के साथ में मुलाकात नहीं होगी। तो अभी ऐसा कहा तो फिर यह चंद्र बेचारा क्या करेगा? वो वहां से निकल कर के वो जा रखा था कहीं पे तो कहीं से पता चला कि पास में ही उद्बोधन भवन है और वहां पे वहां पे भी साधु लोग रहते हैं। तो वो उद्बोधन भवन गया। ऊपर में लिखा है उद्बोधन कार्यालय। किंतु देखिए अभी ऑलरेडी एक भयानक एक्सपीरियंस उसको हो चुका था। डर लग गया था कि इस तरह के चौकीदार यहां पर रहते हैं। तो अभी भीतर कैसे जाएगा? किसके साथ बात करेगा? ऐसा सोच के बाहर में खड़ा था तो वहां से एक आदमी कोई भीतर में जा रहा था। उसकी उसके ऊपर में नजर पड़ी चंद्र के ऊपर में तो इसको दया आ गई। इस आदमी का नाम था मोहन। तो मोहन ने चंद्र को पूछा कि भाई तुम यहां पर क्यों खड़े हो? तुम्हारा क्या काम है? तो उसने कहा कि इस या इस भवन के भीतर में कार्यालय के भीतर में जो सबसे बड़ा है उसके साथ में मेरी मुलाकात करवा दीजिए। अभी ऐसा तो थोड़ी ना अनजाने आदमी को कहेगा कि मुझे पैसों की जरूरत है। बड़े भाई के साथ में झगड़ा हुआ है। आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा है। बोल के मैं घर से निकल गया हूं। और अब तो घर जाना नहीं है। जब तक नौकरी नहीं मिलेगा। तो यह सब अनजाने आदमी को कैसे कहेगा? तो यह चंद्र तो उसने कहा कि आप इसमें जो सबसे बड़े हैं यहां पर रहते हैं उसके पास में मुझे ले जाइए। तो उसका यह प्लान होगा कि उनके पास में जाकर के वह अपने मन की व्यथा कहेगा या तो नौकरी मांगेगा। तो ठीक है यह जो डिवोटी था वो भीतर में गया। कुछ देर के बाद में बाहर आकर कहता है चलिए आपको मां बुला रही है। तो चंद्र तो बड़ा आश्चर्यचकित हो गया कि यह मां कौन है? उसने तो सोचा था कि यहां पर साधु लोग ही रहते हैं। स्त्री लोग भी रहती है साधुओं के साथ में। ऐसा तो कभी सुना नहीं उसने। तो बड़ा आश्चर्यचकित होकर के भीतर में गया। फर्स्ट फ्लोर पे यह डिवोटी सीधा मां के सामने यह चंद्र को ले हाजिर हुआ। अभी देखिए चंद्र के कपड़े भी थोड़े इधर-उधर हो अस्त-व्यस्त हो गए हैं। चेहरा भी पूरा काला पड़ गया है। धूप में पूरा दौड़ रहा था। खाया भी नहीं है। उसकी अवस्था, चेहरे की अवस्था, मन की अवस्था इतनी दयनीय थी, किंतु जैसे ही मां का दर्शन हुआ, सीधा मां के चरणों में गिर गया। मां जैसे कि कितनी अपने से भी अपने लगने लगी। एक सेकंड का जो दर्शन इसमें ऐसा लगने लगा कि जन्म जन्मांतर की यह मेरी मां है। और फिर मां ने बड़े ही स्नेह पूर्वक पूछा क्या भाई तुम यहां पर क्यों आए हो? तो अभी देखिए कि चंद्र की वैसी कोई इच्छा नहीं थी कि अपनी पूरे दुख की कहानी किसी अनजाने व्यक्ति को कहे। किंतु मां तो अनजानी नहीं थी। कि एक ही सेकंड में जैसे जन्म जन्मांतर की मां तो उसके हृदय में जो कुछ भी था सब कुछ उसने बोल दिया कि किस तरह से उसको बार-बार अपमान का सामना करना पड़ता है और किस तरह से अपने भाई का घर छोड़कर के वह निकल गया है। अभी घर नहीं जाएगा। जब तक नौकरी नहीं मिलती है तब तक कुछ करने का उपाय नहीं है। तो मां ने बड़े शांति से कहा अच्छा देखो हम लोगों को भी यहां पर एक वर्कर की जरूरत है। कोई यहां बाजार में जाकर के सब्जी वगैरह खरीदना है। शॉपिंग कुछ भी करना है उसके लिए तो तुम एक काम करो। वहां पर शरद रहता है ग्राउंड फ्लोर पे उसके साथ में जाकर के बात करो। तो देखो कि शरद की इच्छा है तो तुमको नौकरी पर रख लेगा। ऐसा जैसे मां ने कहा तो यह चंद्र के हृदय में जैसे कि आशा और भरोसा का एक जैसे कि वो एक उदय हुआ जन्म हुआ और बड़ी आशा लेकर के जो डिवोटी आया था उसको मां के पास में ले आया था वही डिवोटी आखिर में उसको शरद महाराज के पास में लेकर गया और यह डिवोटी ने शरद महाराज को कहा कि मां ने इनको भेजा है। मां कहती है कि यदि आपको आवश्यकता है और यदि देखें कि इसमें वह लाइकात है, एलिजिबिलिटी है तो इसको आप यह जो परचेसिंग वगैरह करना है बाजार में जाकर के उसके लिए इसको रख सकते हैं। तो अभी देखिए कि शरद महाराज ने हंसते-हंसते कहा कि मां ने तो आदेश दे ही दिया है। अभी उसमें और क्या मुझे बोलना है। देखिए मां ने तो मां और शरद महाराज का रिश्ता देखिए। मां ने आदेश नहीं दिया एक्चुअली शरद महाराज को कि तुम इसको रख लो। मां ने कहा कि यदि आवश्यकता है तो रखिए। किंतु यह तो शरद महाराज है ना। मां की छोटी से छोटी भी इच्छा भी इनके लिए जैसे कि आदेश के समान है। तो मां ने उसके हृदय में देखा होगा चंद्र के लगा होगा कि वह उद्बोधन में कार्य करने के लिए उसमें इतनी तो पवित्रता है। यह लड़का साधु होने को नहीं आया। वो नौकरी खोजने के लिए ही आया है। पैसा मांगने के लिए ही आया है। वो जो चीज ठाकुर त्याग करने को कहते थे काम और कांचन वो वही यह जो सांसारिक जो उपलब्धि प्राप्त करने के लिए भी यह यहां पर आया है। यह साधुओं की तरह अन्य लड़कों की तरह उनके हृदय में वैराग्य है। इस तरह से तो यह नहीं आया। उसको खाने को नहीं मिल रहा है। घर में अपमान हुआ है। नौकरी नहीं मिल रही है। इसलिए आया है। किंतु इसके भीतर में भी मां ने सार देखा है। इसके भीतर में भी जैसे कि मां ने दिव्यता का प्रकाश देखा है। तो शरद महाराज ने कहा अच्छा ठीक है। तुम एक काम करो और एक किसी साधु को ना किसी को दिखा करके कह दिया कि तुम चंद्र को कि तुम इनके पास में से काम सीख लो। क्या-क्या करना है यहां पे। तो चंद्र तो बड़ा खुश हो गया। देखिए कि नौकरी भी मिली और वह भी इस तरह से साधुओं का संग भी प्राप्त हुआ। हालांकि देखिए कि ऐसा नहीं है कि उसके संस्कार कोई इस तरह के थे। अब जैसे कि देखिए यहां पे जो ठाकुर ने कहा ना कि मैंने क्या किया है? तुमको ही तो सबसे ज्यादा करना है। ठाकुर किनको लेते थे? ये शरद महाराज वही निरंजन महाराज लाटू महाराज राजा महाराज शशि महाराज ऐसे लोगों को बा खोका महाराज सुबोधानंद जी महाराज बूढ़ो गोपाल यानी कि अद्वैतानंद जी महाराज काली महाराज ऐसे ऐसे लोगों को ठाकुर पसंद करते थे। ऐसा कोई नौकरी मांगने के लिए ठाकुर के पास में आया और ठाकुर ने मथुर बाबू को बोलकर के नौकरी दिलवा दी और यह सब मुझे तो याद नहीं आ रहा है कि कहीं पर पड़ा है। हां कालीवाड़ी के जो कर्मचारी थे उनके प्रति ठाकुर की अपार करुणा थी। वह रसिक की कहानी वह तो जग जाहिर है। अभी तो मेरे ख्याल से जो रसिक का जो घर है वह भी तो शारदा मठ के पास में है। उनको मिला है यह घर। तो देखिए कि ऐसा नहीं है कि ठाकुर की कर्मचारियों पर या तो इस तरह के लोग जो कि कामना वासना से ग्रसित है उनके ऊपर में कृपा नहीं है ऐसा नहीं है। किंतु क्या है कि ठाकुर की जो प्राण शक्ति थी वह तो ऐसे लड़कों के लिए ठाकुर को व्यय करनी थी जो लोग की जगत में पूरी आध्यात्मिकता का प्रचार करें। किंतु यहां पर मां है। मां के पास में इस तरह के लड़के जिनके भीतर में अभी भी कामना वासना है। ऐसे कितने ही लड़के मां के पास में आते थे और मां के उनका कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं यह सेटिंग करवा देती थी। अभी यही चंद्र अभी एक दिन ऐसा हुआ कि उसके अभी नौकरी कर रहा है उद्बोधन में और एकाएक एक दिन समाचार आया कि उसके गांव में उसका जो एनसेेस्ट्रल होम है जहां पर मां-पिताजी वगैरह रहते थे वहां पर फ्लड हुआ है और उसका पूरा घर बह गया है। तो अभी मां-पिताजी का कष्ट देख के वह बेचारा उसको भी तो कष्ट होगा। किंतु उद्बोधन में जो ₹10 ना कि इतना पर मंथ मिलता था उस यह तो कोई इतनी बड़ी रकम नहीं है। उसका खुद का खानेपीने का काम चल जाएगा। वो अपने खुद के बीवी बच्चों को घर से लेकर के कोलकाता लाकर के भाड़े के घर में रह रहा है। तो इतना तो वह कर लेगा। किंतु गांव में घर उसका टूट गया है। नया घर बनाना मां-पिताजी को हेल्प करना इतना तो पैसा है नहीं। तो उसको इतना कष्ट हुआ कि बिना खाए पिए दिन भर बैठा रहता था क्योंकि वो ऐसा जब क्राइसिस आता है तो आदमी तो यह हो जाता है ना शोक हो जाता है उसको माने वो ग्रीफ से इस तरह से उसके हाथ पैर बुद्धि दिमाग काम करना बंद कर देता है पैरालाइज हो जाता है तो फिर मां को पता चला कि चंद्र काम नहीं कर रहा बिना खाए पिए भूखे सूखे बैठा है तो मां ने फिर उसको बुलाया पूछा कि बेटा क्या हुआ तुम बताओ तो सही तो फिर उसने उसने एकदम रोते-रोते मां के सामने सब कुछ बताया कि गांव है, गांव में घर है। घर धंस गया है। अभी मैं क्या करूं? उन लोगों के लिए मेरे पास में तो पैसे नहीं है। तो मां ने कहा अच्छा ठीक है। तुम एक काम करो। इतना कोई टेंशन मत लो। मेरे पास में कुछ रुपए पड़े हैं। मैं तुमको देती हूं। बोलकर के मां ने अपने खुद के आंचल में कुछ रुपए बांध करके रखे थे। वह इस चंद्र को दिए। कहा कि देखो इससे तुम प्रारंभ करो। जाओ गांव में जाकर के उनको हेल्प करो और देखो कि मां ने खुद ने लक्ष्मी ने स्वयं लक्ष्मी इसके हाथ में दी है तो फिर वह कैसे भी करके बाकी के रुपयों का जुगाड़ करके घर गया घर गांव गया गांव में जो भी कुछ मरम्मत करनी थी घर फिर से बनाना था सब ठीक-ठाक करके फिर से कोलकाता आया। देखिए कि मां यहां पर सिर्फ हमको यह आध्यात्मिकता ही नहीं देती। किंतु साथ-साथ में हमारा जो यह संसार चक्र है उस संसार चक्र में जो पीस रहे हैं उनको भी तो मां सहाय करती है। अभी यह जो नरेंद्र है, राखाल है, लाटू महाराज है इस तरह के यंग लड़के उन लोगों की संख्या कितनी होगी जगत में? वो मुश्किल से 1% होगी, 0.5% होगी। हम जैसे जो साधु हैं वो सेकंड थर्ड कैटेगरी में आएंगे। हम लोगों की संख्या कितनी होगी? ज्यादा से ज्यादा 2 टू 3% होगी विश्व की इस पपुलेशन में ज्यादा से किंतु ये जो अप टू 90 टू 95% है वो तो संसार में ही रहते हैं। गृहस्थ ही है और उनके जो गृहस्थ की जो समस्या है वही तो उनके लिए सबसे बड़ा चिंता का कारण है। तो उसमें यदि अवतार तो आप ठाकुर के पास जाएंगे तो ठाकुर तो कहेंगे कि ज्ञान भक्ति वैराग्य जैसे स्वामी जी का अनुभव हो चुका था। स्वामी जी पिताजी के देहांत के बाद में ठाकुर के पास गए कहा कि कुछ कर देना होगा आपको तो ठाकुर ने कहा मेरे पास में क्यों आते हो तुम मां काली के पास जाओ तो मां काली के पास में जाकर के स्वामी जी मांग रहे हैं रोटी कपड़ा मकान बोलने को गए और मुंह से आ गया ज्ञान भक्ति वैराग्य तो स्वामी जी समझ गए कि ठाकुर की ही कुछ चालाकी है कुछ करामती है तो गए ठाकुर के पास में कहा महाशय आप ही ने कुछ गड़बड़ कर दी है मां काली के पास जाकर के मांग रहा था रोटी कपड़ा मकान निकल गया ज्ञान भक्ति वैराग्य तो ठाकुर ने कहा अरे भाई तुम्हारे संस्कार ही ऐसे हैं तुम मुझे क्यों दोष दे रहे हो जाओ फिर से तो फिर से स्वामी जी गए कितनी बार गए किंतु सब समय ज्ञान भक्ति वैराग्य आखिर में ठाकुर ने इतना तो आशीर्वाद दिया कि ठीक है तुम्हारे मां को तुम्हारे भाई बहनों को मोटा भात का पड़े अभाव होवे ना अर्थात कि यह जो थोड़ा म पेट भरने के लिए जो खाना है देह रक्षा करने के लिए जो कपड़े हैं उसका का अभाव नहीं होगा। किंतु इवन अपने जीवन के आखिरी तक स्वामी जी को अपनी मां और भाइयों की चिंता थी। वो कहानी भी हमको पता है कि किस तरह से वो बेलूर मठ का अमेरिका से जो प्रणामी या तो फिर यह डोनेशन वगैरह मिला था वो लेकर के उन्होंने बेलूर मठ की रचना तो की किंतु अपनी मां का घर बनाने के लिए उन्होंने बेलूर मठ में से ही ऋण लिया था। वो 1000 ने 5000 ऐसा कुछ रकम था वो अभी वो मां का घर तो उसमें से बना दिया किंतु बेलूर मठ को पैसा तो रिटर्न करना होगा ना और यह तो स्वामी जी है आदर्श के स्तंभ पैसा उन्होंने खुद इकट्ठा किया है। वो विदेश में कौन ठाकुर को पहचानता है? विदेश में तो लोग स्वामी जी को ही पहचानते हैं। तो स्वामी जी ने अपनी ही मेहनत से रुपया इकट्ठा किया है और वही मेहनत से बेलूर मठ बनाया है। किंतु स्वामी जी का जो आदर्श था कि किया तो सब ठाकुर के नाम से है। यानी कि पैसा तो सब ठाकुर का हो गया। तो अभी जब ठाकुर के पास में से पैसा लिया है या तो फिर ठाकुर के संघ से जो पैसा लिया है वह तो ठाकुर के संघ को वापस देना है। तो इसलिए स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका गए यह जो कैलिफोर्निया में जो लेक्चर कर रहे हैं उसमें से जो पैसा इकट्ठा हो रहा है उसको बार-बार काउंट कर रहे हैं। देख रहे हैं कि क्या मैं अपना ऋण जो है बेलूर मठ को वो मैं वापस दे पाऊंगा कि नहीं। किंतु नहीं हो रहा है ऋण वापिस तो काम किए ही जा रहे हैं, किए ही जा रहे हैं। लेक्चर दिए ही जा रहा है। हेल्थ उनका बिगड़ता ही जा रहा है। किंतु आखिर में तब तक नहीं वह रुके जब तक कि वह ऋण वापस करने के लिए उनके पास में पैसा आ गया था। जैसे ही ऋण चुकाने के लिए पैसा आ गया। फिर उन्होंने कहा कि बस अभी हो गया। अभी तो सेहत बिल्कुल हद से गई है। अभी भारत जाकर के आखिरी कुछ दिन बिताता हूं। बोल के भारत वापस आए और अपना ऋण उन्होंने चुका वो बेलूर मठ को वापस दे दिया। तो यह था कि ठाकुर और स्वामी जी का आदर्श और यहां पे है मां यही चंद्र एक बार ऐसा हुआ कि वो जो भाड़े के घर में रहता था कोलकाता अपने बीवी बच्चों को ले आया था। तो भाड़ा का घर का जो मालिक था उसका नेचर था बड़ा ही खतरनाक था। बड़ा ही दुष्ट चरित्र था। तो यह जो चंद्र के जो छोटे बच्चे लड़का और लड़की बाहर में खेलते थे तो उसको अच्छा नहीं लग रहा था। तो यह जो घर मालिक है उनके ऊपर चिल्लाएगा। क्या करेगा? किसी को भेज के नौकर-पोकर को भेज के इनके खेलने के खिलौने हैं उसको तोड़ देगा। तो अभी तो छोटे बच्चे हैं। वैसे ही तो आसानी से भयभीत हो जाएंगे। उसमें भी इस तरह का कोई एक बड़ा आदमी आकर के उनको धमकाएगा। उनके खिलौने तोड़ देगा। तो बेचारे कितने ट्रोमेटाइज हो जाएंगे। सब समय यह उसके बच्चे बच्ची भय भय के मारे रहते थे। डर के डर के रहते थे। यहां तक कि जैसे ही घर मालिक को देखते थे वो दौड़कर के घर में चले जाते थे शुरू में और बाद में तो घर से निकलना ही बंद कर दिया। इतना डर उनके हृदय में बैठ गया था। तो यह चंद्र बेचारा सोचता है कि मेरा बेटा और बेटी किस तरह से ऐसे डर में रह गया। हम लोग खुद सोच लीजिए मेरा खुद का लड़का या लड़की होता और इस तरह से भय के मारे रहते तो मुझे तो कितना क्रोध आता कितना गुस्सा आता किंतु चंद्र तो बेचारा गरीब है वो घर मालिक के साथ में झगड़ा करने को जाएगा तो वह तो कहेगा निकलो यहां से भाड़े के घर में रह रहे हो और दादागिरी दिखा रहे हो और उस समय तो चंद्र के पास कोई इतना रुपया नहीं था कि कोई अच्छी जगह देखकर के अच्छा भाड़े का घर ले तो वह भी बेचारा मायूस उसका चेहरा उसका बर्तन सब में इस तरह से निराशा अगेन मां को लगा कि पूछना चाहिए तो फिर पता चला कि अच्छा कि इस तरह से हो रहा है। फिर से मां ने अभयदान दिया कहा कि एक काम करो तुम शरद को जाकर के बोलो शरद सब व्यवस्था करेगा। अभी मां के पास में से यह हाई कोर्ट में से यह ऑर्डर आ चुका है सुप्रीम कोर्ट में से तो वह गया चंद्र शरद महाराज के पास में तो शरद महाराज ने सब प्रयास किया उसके लिए एक जमीन 700 भी कि वो कितना कुछ जमीन था वह खरीद कर लिया और जमीन के ऊपर में एक मकान भी बना दिया और मकान के बाहर में एक गार्डन भी था वो गार्डन में यह वेजिटेबल भी वह बना कर सकता था और सब कुछ इतना सुंदर मकान बना करके उसको दिया। सब कहीं पैसा इकट्ठा किया है शरद महाराज ने। चंद्र के पास में तो था ही नहीं कुछ। तो इस तरह से शरद महाराज मां के आशीर्वाद से मां के आदेश से शरद महाराज ने उसके लिए घर बनाया। और जब यह घर बना तब यह वीरानंद जी महाराज वहां पर जाकर के शोडोशोपचार पूजा करके आए थे। देखिए इतना उसको नसीब कि मां के आदेश से उसका घर सुद्धा बन गया। एक दिन की बात है। उसके पिताजी बड़े बीमार थे तो कोलकाता ले आया था। तो अभी क्या करेंगे? पिताजी को तो रखा है। एक बस्ती के भीतर में शरद महाराज को पता चला कि उसके पिताजी यहां पे है। तो उस शरद महाराज ने कहा चलो मुझे उनका उनको मिलाने के लिए ले जाओ। तो मुझे मैं उनके साथ में मिलना चाहता हूं। तो यह चंद्र बेचारा कुछ बोल नहीं पा रहा है। क्यों? एक दो बात है। एक तो कि वह गाड़ी भाड़ा करनी होगी शरद महाराज को ले जाने के लिए तो उसका पैसा नहीं है। दूसरा कि यह बस्ती की यह जो गलियां है इतनी पतली थी और शरद महाराज थे मोटे-सोटे तो शरद महाराज भीतर में घुस ही नहीं पाएंगे। माने उस समय के लोग जो थे वह दुबले पतले होते थे। यहां तक कि जयराम बाटी में मां का जो मकान था, मां का घर था, उसका दरवाजा था, वह इतना पतला था कि शरद महाराज सीधा होकर के प्रवेश ही नहीं कर पाएंगे। उनको टेढ़ा होकर के प्रवेश करना पड़ेगा। तो यह गली भी ऐसी पतली थी शरद महाराज सीधा होकर के चल ही नहीं पाएंगे। तो चंद्र बड़ा भयभीत होकर के कुछ बोल नहीं पा रहा है। तो शरद महाराज तीनचार बार उसको पूछे कि अरे तुम ले जाओ मुझे अपने पिताजी का मुलाकात करवाने के लिए बीमार है तो मैं भी देखूं यदि थोड़ा बहुत सहाय हो सकता है तो करते हैं तो कैसे फिर आखिर में चंद्र को बोलना पड़ा ना ही मेरे पास में गाड़ी का पैसा देने के लिए रुपया है और ना ही आप उस गली में चल पाएंगे। इतनी पतली गली है तो शरद महाराज ने गंभीर होकर कहा कि अरे पहले तुम गाड़ी ले तो आओ फिर बाद में सब देखते हैं तो ठीक है वह बेचारा गाड़ी लेकर के आया पैसा का जुगाड़ तो शरद महाराज ने कर ही दिया किंतु जब वो गली में गए तो गली इतनी पतली कि शरद महाराज चल ही नहीं पाएंगे सीधा होकर तो शरद महाराज को मां के घर में प्रवेश करने का जो वो था एक्सपीरियंस वो टेढ़े होकर के चलना शुरू किया और ऐसा करके उसके घर गए पिताजी को सांत्वना दी कुछ फल वगैरह कुछ दिए तो देखिए कि यह जो ठाकुर के पास में जो आते थे प्राइमरीली आध्यात्म जगत के वो पथिक थे। आध्यात्मिकता प्राप्त करने के लिए वह ठाकुर के पास में आते थे। किंतु कोलकाता में इवन इस विश्व में देखिए 90 टू 95% लोगों की तो जो संसार की चक्की में जो पीस रहे हैं उसी में जो दुरावस्था है कि इसका सॉल्यूशन वह बेचारे कहां पर प्राप्त करने को जाएंगे। तो उसके लिए श्री मां शारदा देवी है। देखिए आप मां को अपने अंतर्मन से प्रार्थना कीजिए। मां ने जिस तरह से चंद्र को पैसा दिया था कि यह लो अपने आंचल में बांधा हुआ रुपया इसको लो गांव जाओ और अपना घर फिर से बनाओ। तो हो सकता है मां हमारे पर भी कृपा करे। किसको पता? मां की कृपा का तो यह कंडीशन नहीं है कि यह सिर्फ उसके नौकर के ऊपर में ही कृपा की और किसी के ऊपर में नहीं। यह चंद्र क्या करता था कि वह अपने कंधे पर किताबें डाल के बेचने के लिए जाता था उद्बोधन की। तो अभी रखना चाहिए किसी नौकर को या किसी मजदूर को किताब उठाने के लिए किंतु ऐसा नहीं करके वो क्या करता था कि उद्बोधन का पैसा खर्च ना हो अननेसेसरी किसी मजदूर को रखने से बोल के अपने ही कंधे पर वो किताबों का भारी बक्सा ले जाता था अभी क्या है इस तरह से बक्सा उठाने का तो कोई हैबिट है नहीं उसको कभी ऐसा किया नहीं है तो कंधे के ऊपर में घाव हो गया तो वह छुपा छुपा के रखता था किसी को पता ना चले। इतना डेडीिकेशन था उद्बोधन के प्रति कि पैसा भी नहीं खर्च करने देना है। अपने को जो असुविधा हो रही है उसको भी प्रकट नहीं करना है। किंतु मां का दर्शन करने के लिए मां का कार्य करने के लिए तो बार-बार मां के पास जाना है। तो मां की नजरों से तू यह सब कैसे छुपा पाएगा? तो मां ने देख लिया कि अरे चंद्र यह क्या हुआ तुम्हारे कंधे पे? यह घाव क्यों हुआ है? तो फिर चंद्र को बताना पड़ा कि मां यह जो बक्सा मैं हैवी उठाता हूं किताबें बेचने के लिए इसकी वजह से हो सकता है कि घाव हुआ हो। तो मां ने कहा तुम मजदूर क्यों नहीं रखते? तो चंद्रा कहता है कि अब मैं नहीं चाहता कि अननेसेसरी इस तरह का पैसा खर्च हो। तो फिर मां ने कहा अच्छा ठीक है। फिर एक कटोरी में सरसों का ना कि ऐसा तेल लिया। उसके ऊपर में कुछ मंत्र पाठ किया और फिर चंद्र को देकर कहा कि तेल को अपने कंधे पर लगाना। तो फिर चंद्र ऐसा लगाने लगा और कुछ ही दिन में देखा घाव जो है पूरा सूख गया था। संपूर्ण रूप से वो आरोग्य प्राप्त हो गया और फिर कभी इस तरह का प्रॉब्लम उसको कंधे पर हुआ नहीं। उद्बोधन की किताब उठाते उठाते तो यह देखिए कि आरोग्य दिलवाती है मां। कैसे कितनी ही इतनी सारी कहानियां है मां के बारे में। तो देखिए कि यहां पर जो ठाकुर का जो ऐसा नहीं है कि ठाकुर की करुणा सीमित थी या तो फिर ठाकुर का प्रेम सीमित था। प्राइमरीली ठाकुर उन लोगों को ज्यादा से ज्यादा बात किए थे। उन लोगों के साथ में सबसे ज्यादा उपदेश बांटे थे ठाकुर ने जो लोग की आध्यात्मिकता चाहते थे। किंतु मां के पास में तो सब तरह के लोग आते थे। यह विधवा बच्ची आई है। पति का मृत्यु हो गया है। छोटी उम्र में अभी वह खाने खानेपीने की सब तरह की कठोरता कर रही है। बोलकर के मां कहती है अरे इतनी कठोरता करने की क्या जरूरत है? तो यह जो मां का जो संसारी लोगों के प्रति संसार में जो कष्ट हो रहा है और सांसारिक कष्ट को उस कष्ट से मुक्ति दिलवाने के लिए मां की जो कृपा थी दैट इज रियली यूनिक। तो इसलिए यहां पर ठाकुर मां को कहते हैं कि नाना तुमको और भी बहुत कुछ करना होगा। देखिए और भी कुछ-कुछ कहानियां है वैसे यही एजुकेशन के बारे में लड़कियों को जो एजुकेशन प्राप्त करना चाहिए। अह यही चंद्र अह उसकी लड़की थी। वह निवेदिता स्कूल में पढ़ती थी। तो 15 साल की हो गई है। और जैसे उस समय तो बाल्य विवाह की प्रथा थी। वो चंद्र के जितने पिताजी, माताजी, भाई, बहन जो भी कुछ है उसके रिलेटिव वह सब कह रहे उसका विवाह करवा दो। फिर उस समय लड़की के लिए एक अच्छा पात्र भी मिल गया था। अच्छे घर का लड़का तो सब ने आकर के चंद्र पे प्रेशर डालना शुरू किया कि ये बूढ़ी लड़की मतलब अभी 15 साल की तो बूढ़ी ही हो गई उनकी नजर में वो लड़की है 15 साल की जवान अभी उसकी शादी नहीं करवाओगे उसके साथ में कुछ होगा गड़बड़ तो फिर कौन उसका जिम्मा लेगा समाज में नाक कटेगा वगैरह-वगैरह तो फिर यह चंद्र गया मां के पास में मां को कहता है कि मां देखिए मेरी बच्ची की शादी करवाने के लिए लोग सब कह रहे हैं किंतु आप ही ने तो कहा उसको एजुकेट करना करना है निवेदिता स्कूल में रख के तो मां ने कहा देखो बेटा तुम उसको शादी मत करवाओ उसकी पढ़ाई लिखाई करने दो उसको करवाने दो इतनी अच्छे से तो स्टडी करती है क्यों झूठमठ की तुम इसकी शादी करवाते हो बोलकर के मां ने कहा और यह भी कहा साथ-साथ में यदि इसकी शादी होगी तो इसके साथ में अहित होगा तो चंद्र गया फिर से अपने घर वापस सभी के साथ में बात कर रहा है रिलेटिव्स के साथ में कि मां ने मना किया है उसकी शादी नहीं करवानी को शादी करेगी तो इसके साथ में अहित होगा। तो फिर सभी लोग उल्टा पुल्टा सिखाने लगे कि हित और अहित अच्छा या बुरा यह तो सब भाग्य विधाता के हाथ में है। हम लोग कौन होते हैं यह ठीक करने वाले वो लड़की की शादी करोगे और अहित होगा और फिर शादी नहीं करोगे तो अहित नहीं होगा। यह सब कौन कह सकता है? जो समाज का नियम है उसके साथ में चलना है। बाकी सब भाग्य विधाता को दे देना है। अब यह मूर्खों को पता नहीं है। वही भाग्य विधाता स्वयं मां शारदा देवी का रूप धारण करके वहां पर बैठे हैं। और वही भाग्य विधाता कह रहे हैं कि शादी मत करवाओ। किंतु फिर क्या है यह सोशल कन्वेंशन है। फिर से यह चंद्रमा के पास आया। फिर से कहा कि मां देखिए ये लोग इस तरह से प्रेशर कर रहे हैं। फिर से मां ने मना किया। किंतु अभी क्या है कि संसार तो संसार है। संसार में रहना है तो सभी की बातें सुननी पड़ेगी। तो लड़की की शादी करवा दी और शादी करवाने के कुछ ही समय के बाद में उसके हस्बैंड का मृत्यु हो गया और अपने वह दो बच्चों को लेकर के वह लड़की पिताजी के घर में आकर के रह रही है। तो अभी उसको भी कष्ट विधवा का जीवन है और पिताजी को भी कष्ट पैसा नहीं है। वैसे ही ज्यादा बहुत कुछ और लड़की को खिलाना है। उसके दो लड़कों को खिलाना है। तो देखिए कि मां सिर्फ यह नहीं देखती थी कि आध्यात्मिक कल्याण ही हो साथ में यह किस तरह से यह आर्थिक कल्याण हो वह भी देखती थी और यह जो सामाजिक प्रथाएं थी उसके सामने उसके अगेंस्ट में जाकर के भी मां इस तरह के उपदेश देती थी कि यह जो लड़की है उसकी शादी मत करवाओ। उसको निवेदिता स्कूल में स्टडी करने दो। तो यह जो था यह माने यह तो
ठाकुर की प्रचंड तपस्या और माँ की अपार करुणा
सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे तो और कितने उदाहरण है कि मां ने लोगों का इस तरह से कल्याण किया है और वह तो सिर्फ प्रारंभ था। आज के युग में देखिए आज हम लोग जितने भी साधक हैं हम लोग सब वह रेगुलर कैटेगरी में ही आते हैं। एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कैटेगरी में कोई नहीं आता है। हमारे लिए तो मां ही एकमात्र भरोसा है। निश्चय हम ठाकुर और स्वामी जी का स्टडी करेंगे। फिलॉसोफी स्वामी जी की समझने का प्रयास करेंगे। ठाकुर की साधनाओं को समझने का प्रयास करेंगे। किंतु हम सबको पता है कि कोई ठाकुर की तरह साधना नहीं करने वाले हैं। ठाकुर हनुमान भाव में साधना करते हैं तो इवोल्यूशन पूरा उनका साथ देता है। पूंछ आना शुरू हो जाता है। ठाकुर जब वो पंचवटी में वह पेड़ के नीचे में बैठकर के तपस्या कर रहे हैं तो जो गर्मी उत्पन्न होती है पेड़ के पत्ते झुलस जाते हैं। ठाकुर जब ध्यान करने को बैठते हैं तो अपने मन को कहते हैं वह भैरव की मूर्ति याद करवा करके देखो वह भैरव की तरह पत्थर के भैरव की जो मूर्ति वो जो नाट मंदिर के ऊपर में है जिसको ठाकुर प्रणाम करते थे मां के मंदिर में प्रवेश करने से पहले तो अपने मन को वो याद करवा के कहेंगे पत्थर के भैरव की मूर्ति की तरह स्थिर होकर के ध्यान करना है तो जैसे ही ध्यान करने को बैठते हैं तो जैसे कि उनके जितने भी जॉइंट्स वो खटखट करके ताले लगने की तरह वो लोक हो जाते हैं और जब तक ध्यान समाप्त नहीं होता तब तक वो ताले खुलते नहीं। उस आसन से खड़े होने का सामर्थ्य नहीं था। कभी-कभी उन्हीं की जैसा एक सन्यासी उनके सामने त्रिशूल लेकर बैठेगा। कहेगा मां के ऊपर में जगत जननी के ऊपर में यदि तुम्हारा ध्यान एकाग्र नहीं हुआ। तुम्हारे सीने में यह त्रिशूल मार दूंगा। तो वह ठाकुर की तपस्या कहां हम लोग वह सब करने वाले हैं? हम लोग तो सुबह उठेंगे। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? मंगल आरती अटेंड करेंगे। फिर आधा एक घंटा यदि थोड़ा बहुत जप वगैरह हुआ तो हुआ। वरना किताबें पढ़ी वरना तो थोड़ा बहुत एक्सरसाइज कर लिया। नाश्ता किया और फिर अपने काम में लग गए सभी लोग। यह तो है हमारा जीवन। तो फिर हम कहां ठाकुर कहां? स्वामी जी की यह जो इंटेलेक्चुअल अंडरस्टैंडिंग थी फिलॉसोफिकल उनका यह जो शार्पनेस था वो थोड़ा बहुत एक अंश हम समझने का प्रयास कर सकते हैं। किंतु उससे ज्यादा तो कुछ नहीं। कर्म योग में हम लोग क्या कर लेते हैं? वही जो आश्रम से हमको जो बोला जाता है वही तो थोड़ा बहुत कुछ करते हैं। इससे ज्यादा तो कुछ नहीं। तो फिर देखिए कि हम लोगों के पास में क्या हो सकता है? हमारे हाथ में क्या है? हमारे हाथ में है कि मां को प्रार्थना करना और मां के पास में से यह जो जितने भी हमारे शारीरिक बंधन भी तो होते हैं, मानसिक बंधन भी तो होते हैं साधना करने में हमको आगे नहीं बढ़ने देते। तो मां से यह बार-बार प्रार्थना करनी है कि मां यह जो सब बंधन है उसको तुम तोड़ दो और इतना तो करो कि थोड़ा बहुत साधना कर पाऊं। इतना तो करना कि यह जीवन जो है थोड़ा बहुत निकल जाए और फिर अगले जन्म में फिर से तुम्हारा संतान बनकर के जन्म लेने का मौका मिले। इससे ज्यादा हम लोग क्या कर सकते हैं? इसलिए ठाकुर ने कहा है। मां ने जब कंप्लेन की कि मैं तो स्त्री हूं। मैं क्या कर पाऊंगी? तब ठाकुर कहते हैं नहीं नहीं मैंने क्या किया है? तुमको इससे भी अनेक कुछ ज्यादा करना होगा। ठीक है। अभी दूसरा प्रसंग चालू करेंगे तो और लंबा टाइम लग जाएगा। तो इसको रखते हैं कल आज यही तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
चंद्र की कहानी के बारे में मेरे विचार
एक्चुअली मैं सीक्रेट बताऊं। मैंने मायर पद प्रांत जो किताब है वह पढ़ा था बहुत पहले माने टिसी जाने से पहले और यह स्मृति कथा मुझे पता थी किंतु जिस तरह से चंद्र अपनी यह जो सब वर्णन करता है ना कि मुझे खाना नहीं मिल रहा था और यह वो तो मेरा क्या उसके प्रति एक तरह का प्रजुडाइस हो गया था। उस समय लगता था मां के पास में ठाकुर के पास में सब आध्यात्मिक चीजें मांगनी है ना। यह कहां नौकरी मांगने चला गया। बोल के ज्यादा कुछ मुझे उसके ऊपर इतना रिस्पेक्ट नहीं था। फिर एक अमेरिकन साधु के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। तो हुआ ऐसा उस समय मैं ट्रेनिंग सेंटर में था और मुझे किस कारण से एक हमारा ब्रह्मचारी वो महाराज वो थोड़े बीमार हो गए तो क्या है कि उद्बोध सेवा प्रतिष्ठान जाना है जिसको भी ट्रीटमेंट सीरियस लेना है तो वैसे तो डॉक्टर महाराज उपस्थित है बेरुमठ में किंतु छोटी-मोटी ट्रीटमेंट चल जाएगी आपको सीरियस कुछ है तो फिर आपको सेवा प्रतिष्ठान जाना है तो जो बीमार है उनके साथ में एक दूसरा ब्रह्मचारी हेल्प करने के लिए जाएगा तो अभी क्या है कि सेवा प्रतिष्ठान के लिए रेगुलर बेलूर मठ से गाड़ी जाएगी। इतने सारे साधु हैं ना तो सीनियर साधु इतने सारे हैं तो कुछ ना कुछ लगा ही रहता है। तो एक दिन बोल दिया गया हमको कि तुम लोग दोनों लोग जाना वहां पे उस गाड़ी जा रही है ये टाइम पे तू गाड़ी में बैठ जाना सेवा प्रतिष्ठान जाकर के मुझे बोला कि तुम ये ब्रह्मचारी को लेकर ट्रीटमेंट करवा के वापस आना। तो मैंने कहा ठीक है तो हम दोनों लोग गाड़ी में बैठे सामने में एक अमेरिकन महाराज आकर के बैठे हैं। वह भी जा रहे हैं उद्बोध सेवा प्रतिष्ठान तो अभी क्या है वो जो बीमार था वो तो बेचारा बात करने के ये मूड में नहीं था किंतु मैं और यह अमेरिकन महाराज बात कर रहा है। तो बातोंब बातों में उन्होंने कहा कि अच्छा तुमको पता है यह चंद्रमोहन कौन है? मैंने उसके रेमिनेशंस पढ़ा मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा अरे वो कहां वो आदमी पैसा मांगने के लिए नौकरी मांगने के लिए गए। आपको अच्छा कैसे लगा उसका रेमिनेशंस? बोला मुझे आई आई फील लाइक अ कनेक्टेड विद हिम। मैंने कहा आप साधु हो के कैसा कनेक्ट कर सकते हो उसके साथ में। वो नौकर था वो। बोला नहीं आई फील वेरी कनेक्टेड विथ हिम। तो मैंने सोचा यार कुछ ना तो सीक्रेट है इसमें जो मैं मिस कर दे रहा हूं। फिर से पढ़ा मैंने। उस समय तो देखिए मुझे इतना ये बात सुनने के बाद में भी मुझे इतना कोई ये नहीं हुआ था। किंतु राइट नाउ अभी ये जो उम्र है ना वो साधु की उम्र भी ऐसे 50 60 के आसपास में ही थी। तो अभी हम भी तो बड़े हो रहे हैं ना। अभी पता चल रहा है कि अपनी साधुगिरी कहां तक जाती है।
चंद्र माँ के पास मुक्ति मांगने के लिए जाता है
शोडशोपचार पूजा कर दी। इतना ही नहीं और भी उसका कंक्लूजन में देना भूल गया। मैंने सोचा अभी टाइम खत्म हो गया बोल के। आखिर में क्या हुआ पता है? एक बार वो कहीं बाहर में जा रहे थे तो वह अपने शुद्धानंद जी महाराज अपने संघ के प्रेसिडेंट महाराज वो विज्ञानानंद जी के बाद में तो उस समय शुद्धानंद जी वहां पे थे उद्बोधन में वो सब एडिटर का कार्य कर रहे थे तो उन्होंने चंद्र को कहा अरे चंद्र तुम तो मां के पास सब समय आते जाते रहते हो तो जाओ ना मां के पास में तुम जाकर के मां के पास में मुक्ति मांग के देखो तुम तो सब मांग लेते हो जाओ मुक्ति मांग के देखो मां के पास में तो चंद्र ने सोचा मैंने तो मां के पास में सब मांग लिया है तो मुक्ति मांगने में कौन सी बड़ी बात है तो वह तो गया सीधा ऊपर में मां के पास में मां पूजा करने को बैठी है तो चंद्र अभी लिखता है बोलता है कि ये मां को पूजा करते हुए देखना उस समय मां के पास जाना ये तो मैंने प्रतिदिन अपने जीवन में किया है तो यह नया कुछ नहीं है किंतु जैसे पूजा घर में पूजा कक्ष में प्रवेश किया ना सडनली एक इस तरह का भय मेरे ऊपर में सवार हो गया मेरा हृदय धग-धग कर रहा है। मेरे मुंह से आवाज नहीं निकल रही। मेरा गला सूख जा रहा है। पसीना पसीना हो जा रहा हूं। ऐसा लग रहा है पता नहीं कौन सी महाशक्ति के सामने मैं जाकर खड़ा हुआ हूं। प्रतिदिन तो ऐसा लग रहा है तो अपनी ही मां है। मां खाना देती है। प्रसाद देती है, पैसा देती है, सांत्वना देती है, वो तेल देती है, कंधे पर लगाने के लिए। किंतु आज पता नहीं क्या, मां के सामने जाकर ऐसा भय मेरे हृदय में सवार हो गया, वो मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा हूं। अभी मां पूजा कर रही है। पूजा करते-करते आप बोल नहीं सकते कुछ भी। तो मां इशारा करके पूछती है क्या? क्या चाहिए? तो चंद्र कुछ बोल ही नहीं पा रहा है। गला जैसे कि बिल्कुल सूख गया है। तो मां दूसरी बार पूछती है क्या हुआ? क्या चाहिए बेटा? तो फिर आखिर में उसके मुंह से एक शब्द निकला प्रसाद। तो मां ने वो इशारा करके दिखा दिया कि वहां पर प्रसाद का है तुम ले लो प्रसाद। तो उसने वहां से प्रसाद लिया और दौड़े-दौड़े नीचे आ गया। तब कहीं जाकर के हृदय फिर से चलना शुरू हुआ। शुद्धानंद जी पूछते हैं सुधीर महाराज क्या रे क्या हुआ? अम्मा के पास में मुक्ति मांगी तो तो कहता है भाई आपने कैसी मुसीबत में डाल दिया मुझे
प्रश्न: चंद्र माँ के पास मुक्ति मांगने के लिए जाता है तो प्रसाद ले के आ जाता है. स्वामीजी ठाकुर के पास रोटी-कपड़ा-मकान मांगने गए थे, ज्ञान-भक्ति-वैराग्य लेकर आ गए
या ये अच्छी बात कही आपने दूसरी ऐसी एक दूसरी घटना है एग्जजेक्टली ऐसी घटना है अ एक बार वो मां चंद्र के पास में कुछ काम करवा रही है इधर-उधर छोटा-मोटा तो चंद्र सब काम कर रहा है एकदम माने भक्ति भाव से कर रहा है तो आखिर में मां ने पूछा उसी दिन कि अच्छा तुमको पता है तुम समझ पा रहे हो कि मैं तुम्हारे तुम्हारे पास में इतना सारा काम क्यों करवाती हूं? तो चंद्र सोच रहा है कि मैं तो मैं तो काम करने के लिए यहां पे आया हूं इसलिए तो काम करवा रही है ना। तो मां ने कहा नहीं देखो बेटा मैं जब नहीं रहूंगी तब तुम यह मैं तुम्हारे पास में जो काम करवा रही थी यह सब याद रख के तुम फिर मुझे याद कर पाओगे। तो चंद्र तो बड़ा अभिभूत हो गया। बोलता है बहुत अच्छी बात है। ठीक है। अभी वो नीचे आ रहा है। अभी देखा सीढ़ी के पास में शरद महाराज खड़ा है। तो शरद महाराज ने शायद हो सकता है यह पूरा वार्तालाप सुन लिया होगा। तो उसके सामने हंसते-हंसते बोल रहे हैं कि अरे बेटा जो ऋषि मुनि हजारों हजारों साल तपस्या करके नहीं पाते हैं तुमने मां का काम करके पा लिया जाओ तुम्हारी हो गई मुक्ति
माँ ने चन्द्र को दिखाया अपना दिव्य रूप
अभी देखिए चमत्कार की कैटेगरी में आ जाएगा इसलिए मैं अवॉइड कर रहा था किंतु अभी बात निकल ही गई है वो चंद्र मां को ले जा रहा है काम जयराम बाटी तो रास्ते में कहीं पर रुक के है तो चंद्र ने मां को रिक्वेस्ट किया मां तुमको अपना सही स्वरूप मुझे दिखाना करना ही होगा। तो मां ने कहा अरे बेटा तुम तो रोज मेरी सेवा करते हो इससे ज्यादा और तुमको क्या चाहिए? तो बार-बार रिक्वेस्ट कर रहा है नहीं मां आपको मुझे अपना स्वरूप दिखाना ही होगा। तो मां ने कहा अच्छा ठीक है अभी तुम इतनी रिक्वेस्ट कर रहे हो। मां ने जो दूसरे सब साथी थे उनको कहा कि आप लोग थोड़ा सा दूर जाइए। मैं चंद्र के साथ में बात करना चाहती हूं। तो वे लोग सब निकल गए वहां से और फिर मां चंद्र के सामने बैठकर के मां कहती है अच्छा देखो अभी मेरे सामने। तो जैसे ही चंद्र ने मां के सामने देखा कि पूरा देह जैसे कि कांत उसमें से प्रकाश निकल रहा है। मां का स्वरूप जैसे कि पूरा बदल गया है। जगत धात्री को के रूप में मां दिख रही है। और चंद्र डर गया तो मां ने कहा डरो मत। देखो मेरे सामने तुम स्वरूप देखना चाहते थे। तो वही जगत धात्री वाला भव्य स्वरूप वो दर्शन करके कोई थकेगा नहीं। इस तरह का स्वरूप का दर्शन चंद्र को हुआ था। अभी वह यह बात लिखता है किंतु मैं बोला इसलिए नहीं कि फिर हम लोग यह सब अवार्ड करते हैं तो बोलना है
प्रश्न: माँ शरत महाराज से चंद्र को नौकरी देने का अनुरोध करती हैं, लेकिन स्वामीजी को एक नौकर को पुनः नौकरी पर रखने का आदेश देती हैं, जिसे चोर होने के कारण बेलूर मठ से निकाल दिया गया था।
नहीं मां को पता है ना नरेंद्र के साथ में कैसे डीएल करना है माने दिस इज अनदर ऑफ एग्जांपल कि नियम कानून से सब चलना चाहिए उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु सांसारिक आदमी है वो कहां नियम कानून का पालन करेगा जिस विष चक्र में फंसा है बेचारा हम सभी ना पंचमहाभूत का देह लेकर के सबके साथ में तो ट्रबल हम कितना नियम पालन करने को सकेंगे? यह पंचतपा मां करती है तो चारों ओर से धू- धू करके अग्नि ज्वल रही है और उसके भीतर में जाकर बैठना है। ऐसा कोई हमको बोलेगा हम थोड़ी ना करने वाले हैं। हमारे लिए तो शरणागति के अलावा उपाय ही नहीं है।
प्रश्न: माँ बेरोजगार चंद्र को नौकरी देती है लेकिन जब कोई ठाकुर से भौतिक लाभ के बारे में पूछता है तो वह मना कर देते है। उत्तर: एक संसारी आदमी के प्रति माँ की करुणा की कहानी
एक एक उस समय ठाकुर अपने कमरे के बाहर में खड़े हैं। देखा घोड़ा गाड़ी में बैठकर के कोई एक धनी आदमी उनके कमरे की ओर आ रहा है। तो ठाकुर ने साथ-साथ में अभी तो हृदय देख पाते हैं ना। तो देखा कि उसके चेहरे के ऊपर में ना एक तरह का काला आवरण पड़ा हुआ है। महातमस से यह आदमी घिरा हुआ है। तो ठाकुर जैसे कि डर गए और कमरे के भीतर में चले गए और राजा महाराज को कहा जाओ उसके साथ में डीएल करो। तो वो आदमी आया घोड़ा गाड़ी में से उतर कर के राजा महाराज के साथ बात कर रहा है। बोलते हैं कि वो मुझे थोड़ी समस्या है। थोड़ा कुछ विधि करवाना होगा। तो राजा महाराज कहते हैं वह यहां पे नहीं वह तो वह एक तांत्रिक है। वह करता है। उसके पास जाओ। तो वह बोल करके उसको वहां से हटा दिया। अभी सेम देखिए मां के पास में एक आदमी आया नफरचंद्र कोले वह मां के गांव का ही आदमी है और किंतु धनवान है तो घमंड होता है ना मां के साथ में बात नहीं करेगा ऐसा एक था तो वो किंतु एक दिन उद्बोधन में आया रात को आया देरी से शरद महाराज को कह रहा है मां का दर्शन करना है तो शरद महाराज ने सोचा कि मां के गांव से आया है तो हो सकता है कि कोई रिश्तेदार ना कि जो कुछ भी है भेज दिया मां के पास में तो अभी मां बैठी है वो चादर वगैरह ओढ़ के जैसे मां का था। वो आकर सीधा मां के चरणों में गिर गया। रोते-रोते कहता है मां मेरे बेटे को एक बीमारी हो गई है। आपको कैसे भी करके उसका इलाज करना होगा। वरना तो मैं कहां जाऊंगा? बुढ़ापे में मृत्यु पुत्र मृत्यु का शोक मैं कहां कैसे ले पाऊंगा? ऐसा रो रहा है। रो रहा है। तो फिर मां कहती है अच्छा ठीक है। तुम चिंता मत करो। मां ने उसको थोड़ा बहुत प्रसाद दिया और कहा जाओ शरद महाराज के पास में जाकर बैठो। ऐसा मां ने जैसे सांत्वना दी तो उसका हृदय थोड़ा सा हल्का हुआ। वो शरद महाराज के पास में जाकर के बैठा और फिर मां ने उस समय जो दूसरी संगिनियां थी उन्होंने पूछा होगा मां यह कौन है आदमी कहते तो है कि आपके गांव का है किंतु लग नहीं रहा है कि आपके साथ में उसने पहले कभी बात किया होगा। तो मां ने फिर कहा अरे धनी आदमी है ना वो तो थोड़ी ना बात करेगा ऐसे और फिर मां ने कहा कि उसके घर की जो बहू है ना वो शायद मां की वो भक्त थी तो बहू ने कहा होगा कि आपके लड़के को बचाना है तो जाइए मां के पास में तो बोलकर के अभी और कोई उपाय नहीं है तो मां के पास में आया तो देखिए कि ऐसे लोगों को भी मां सांत्वना देती थी जैसे आपने कहा कंट्रास्ट
प्रश्न: ठाकुर, माँ और स्वामीजी में इतना विरोधाभास!
क्योंकि तीनों का एक-एक एक मिशन है ना स्वामी जी इज़ रिगार्डिंग सिविलाइजेशन। इफ यू वांट टू अंडरस्टैंड सिविलाइजेशन स्वामी जी को समझना होगा। नेचर एंड सिविलाइजेशन इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी मेरा ईश्वर के साथ में संबंध क्या है समझने के लिए ठाकुर को पढ़ना होगा। और ये संसार चक्र में जब पीस रहे हैं तो फिर मां को याद करना पड़ेगा। बिल्कुल बिल्कुल क्योंकि क्या है कि ठाकुर का था कि जो कि एक आध्यात्मिक उन्नति लोगों की होनी चाहिए। तभी तो यह संघ बनेगा ना ठाकुर और स्वामी जी का देखिए पर्पस अभी मैं जितना दिन जाता है ऐसा लग रहा है कि यह संघ की रचना करना उनका पर्पस था और संघ के शीर्ष स्थान पे मां को विराजित करने का यह उनका पर्पस था। कैसे भी करके मां एक बार संघ के सिंहासन पर विराजित हो गई तो उनका पर्पस समाप्त हो गया और मां का स्टार्ट हो गया। ऐसा लग रहा है अभी जितना दिन जा रहा है। ये अवतार और ये संत पुरुष उसमें यही फर्क है ना। संत पुरुष का महिमा जो है उनकी महासमाधि के पात्र में वहीं समाप्त हो जाता है। जबकि अवतार पुरुष होते हैं वो एक गुरु परंपरा प्रारंभ करके जाते हैं। तो वो गुरु परंपरा फिर हजारों हजारों साल तक वो कितने लोगों को वो अपने ये जो छांव में आश्रय देगा स्वामी जी ने लेटर में लिखा था पहले मां और मां की संगिनियों के लिए मठ बनेगा बाद में पुरुषों के लिए किंतु क्या है कि वह जो सामाजिक प्रथा थी उसके अनुसार थोड़ा सा इवन जब यह शारदा मठ बनने का प्रारंभ हो रहा था। उस समय भी देखेंगे कि इवन 1953 भारत इंडिपेंडेंट हो गया है। इसके बावजूद वो शारदा मठ बनेगा तो स्त्रियां वहां पर रहेगी। लोग क्या कहेंगे बोल के काफी कुछ चल रहा था। वह भी तो शारदा मठ का इतिहास भी सहज नहीं है। वह आशा देवी जो बाद में वह मुक्ति प्राणा माता जी प्रथम जनरल सेक्रेटरी उन्होंने जो प्रयास किया तभी तो यह सब हुआ। माने ये लोन का भी दूसरा उदाहरण लोन पे भेजे मायावती उसमें हमको मां का जीवन मिल गया। घटना बिल्कुल सही है। अभी ये चेतनानंद जी की है अभी। किंतु मतलब चेतनानंद जी ने अभी लिखी है किंतु आप वैसे ना वैसे मां के बारे में मटेरियल इनफ था। अक्षय चैतन्य फिर यह मायर कथा मायर कथा जो थी अर्थात कि मां के स्मृति कथा वो तो शरद महाराज ने खुद ने उसको कंपाइल किया था। फिर मां के ये जो सेवक थे वर्दा महाराज वगैरह उन्होंने भी यह श्री मां और जयराम भाटी वो ये किताबें सब लिख के गए हैं। माने इनफ मटेरियल था। किंतु जैसा आपने कहा एक सिंथेसाइज जो होना चाहिए एक ऑफिशियल वे में क्योंकि ये अभी देखिए यह जो रेमिनेशंस मैंने कहा आपको कि मां मां ने अपना सही स्वरूप दिखाया गंभीरानंद जी महाराज अपनी किताब में इस तरह की स्मृति कथा को कभी स्थान नहीं देंगे क्योंकि अपना पॉलिसी बड़ा क्लियर है। यह सब चीजें नहीं होनी चाहिए। तो क्या है कि ये जो रेमिनेशंस जो है उसमें सब तरह से सब कुछ मिला हुआ है। आप कितना स्वीकार करेंगे नहीं करेंगे दैट इज अप टू योर डिवोशन। किंतु गंभीरानंद जी ही फॉलोस आवर ऑफिशियल जो पॉलिसी है कि हृदय की पवित्रता और यह साधना इसको महत्व देना है। शरणागति को महत्व देना है। नहीं कि इस तरह के दर्शन को। सो इट इज द मोस्ट ऑथेंटिक बायोग्राफी एज ऑफ नाउ। किंतु मटेरियल जो है वह ऑलरेडी प्रकाशित हो चुका था।