प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी के जीवन का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है। स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध मां की जीवनी में चीर सिमंतिनी चीर सधवा नित्य
श्री रामकृष्ण की महासमाधि और चिर-सधवा माँ सारदा
कृष्ण नित्य लीला यह कांसेप्ट जैसे अपने शास्त्र में है तो वैसे ही श्री रामकृष्ण देव की लीला भी नित्य है और श्री रामकृष्ण देव के साथ में मां शारदा देवी का जो संबंध है वह भी नित्य है। तो इसी ठाकुर की जो प्रकट लीला गंभीरानंद जी के शब्द में प्रकट लीला अर्थात कि उनके देह रहते रहते जो लीला हुई थी उसका अभी अवसान हो रहा है। श्री रामकृष्ण देव काशीपुर में है। कैंसर हुआ है। उनके जीवन की अंतिम क्षण चल रही है। इसके बाद में अप्रकट लीला अर्थात कि जाने के बाद में ठाकुर तो भक्तों के हृदय में निवास करने वाले हैं। तो वह जो लीला है वह प्रारंभ होगी। तो यह जो चैप्टर है चीर सिमंतिनी चीर सधवा यह चैप्टर दो पार्ट में विभाजित है। फर्स्ट पार्ट में है कि ठाकुर की महासमाधि और उससे पहले की घटनाओं का विवरण कि किस तरह से घटनावली एक के बाद एक स्टेप बाय स्टेप ठाकुर की महासमाधि की ओर जाती है। तो वह एक पार्ट हो गया ठाकुर की महासमाधि से वह पार्ट समाप्त होता है। और फिर सेकंड पार्ट स्टार्ट होता है। सर्वप्रथम तो वह अस्थि को लेकर के जो सब थोड़ा बहुत आर्गुमेंट वगैरह हुआ था और यह आर्गुमेंट हमने युगनायक स्वामी जी का जो जीवन है अभी अभी देखिए कि मैंने इस तरह से प्लान किया नहीं था किंतु ठाकुर की कृपा से यह हो गया है योगानुयोग कि स्वामी जी और मां का लाइफ ऑलमोस्ट पैरेलल चलने वाला है। ऑलरेडी ठाकुर की महासमाधि के बाद की जो घटनावलियों का विवरण हमने स्वामी जी के जीवन में देख ही लिया है और देखेंगे कि मां और स्वामी जी दोनों के जीवन में घटनावली एक दूसरे के साथ में परस्पर संबंधित होते ही रहने वाली है। अब स्वामी जी मां को मिलने के लिए जाएंगे। मां का दर्शन करने के लिए जाएंगे। वह फिर मां स्वामी जी को आशीर्वाद देती है। वह जो सब घटनाएं हैं एक के बाद एक एक ओर हम स्वामी जी का लाइफ पढ़ते रहेंगे। दूसरी ओर मां का लाइफ तो अच्छे से दोनों का एक कोरिलेशन बनता रहेगा। तो देखिए कि वो हो जाएगा सेकंड पार्ट। सेकंड पार्ट में क्या होगा इस चैप्टर में कि फिर ठाकुर की महासमाधि के बाद में अस्थि वाला मामला तो दो कुछ ही दिनों का था। किंतु इसके बाद में मां जाती है तीर्थ यात्रा के लिए। यह जो नॉर्थ इंडिया के यह जो सब तीर्थ स्थान है वहां पर मां जाती है और साथ में यह योगिन महाराज, लाटू महाराज वगैरह भी जाते थे। तो वह जो घटनाएं हैं वह सब भी इसी चैप्टर का पार्ट है। इसके बाद में मां जब वापस आती है कोलकाता और फिर कामार पुकुर रहने को जाती है। वहां से नया चैप्टर प्रारंभ होगा। तो यह चीर सधवा चीर सिमंतिनी इस चैप्टर का पहला पार्ट जो है ठाकुर अभी भी काशीपुर में है। जीवन का जो अंत्य समय है अंत्य लीला उनकी प्रारंभ हो चुकी है। तो थोड़ा सा पाठ कर लेते हैं। क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी? श्री श्री माता ठाकुरानी ओ
श्रीरामकृष्ण गुरु-भाव का उत्तरदायित्व स्वामीजी और माँ सारदा को देते हैं
त्यागी संतान वृंदे होस्ते जुग धर्म प्रवर्तों ने गुरु दायित्व अर्पण कोरिया काशीपुर उद्यान बाटीते लीला शरणो मुख देवो मानव श्री रामकृष्ण रोगो जीर्ण देो क्रमे शण तो होइते छे इससे भी लंबा सेंटेंस है अभी यहां पर रुकते हैं और थोड़ा देखते हैं कि मा श्री श्री माता ठाकुरानी अर्थात कि श्री श्री मां और त्यागी संतान वृंद के हाथ में युग धर्म प्रवर्तन रूप गुरु दायित्व अर्पण करके काशीपुर की उद्यान वाटी में लीला संवरणोन मुख संस्कृत शब्द पूरा अर्थात कि लीला का संवरण का जो प्रारंभ हो चुका है या तो फिर लीला के संवरण की ओर चलते हुए देव मानव लीला संवरणोन्मुख लीला के संवरण की ओर आगे बढ़ते हुए देव मानव श्री रामकृष्ण का रोग जीर्ण देह क्रमशः शी क्षणतर होता जा रहा है। मां के हाथ में और अपने जो त्यागी संतान वृंद है उसमें भी खास करके स्वामी जी के हाथ में देखिए दो ठाकुर ने अपनी महासमाधि के बाद में जो रामकृष्ण संघ का रामकृष्ण भावधारा से प्रेरित जो साधक गण आएंगे उनके चरित्र का निर्माण करने के लिए साधना में उनको गाइड करने के लिए जो दो मुख्य लोगों को ठाकुर रख के गए थे। उसमें थी एक मां और एक स्वामी विवेकानंद। स्वामी जी का जीवन जग जाहिर है। बहुत लोग हजारों हजारों लोग स्वामी जी से प्रेरित होते हैं। किंतु मां का जो जीवन है बहुत ही आप कहेंगे सीक्रेटिव भी है और पहली दृष्टि से यदि आप देखेंगे तो स्वामी जी के जीवन में जो सब जादू चमत्कार माने एक्चुअल मिरेकल नहीं। किंतु ये जो इंटेलेक्चुअल फ्लशेस ऑफ इंस्पिरेशन वो जो अब देखने को मिलती है स्वामी जी की पोएम्स देखेंगे स्वामी जी के आर्टिकल्स देखेंगे स्वामी जी के प्रवचन देखेंगे कन्वर्सेशंस देखेंगे इंटरव्यू दिए हैं स्वामी जी ने रेमिनीस से स्वामी जी के ऊपर में विदेश में जाकर के इतने सारे डिसाइपल्स जो उनके हुए उन्होंने स्वामी जी के बारे में कितना सब कुछ कहा है और फिर स्वामी जी जिस टॉपिक पर बात करते हैं लगभग ज्यादातर जो यंग मैन जो होते हैं उनके हृदय के प्रिय टॉपिक है पेट्रियोटिज्म यह भारत की अवनति क्यों हुई भारत की उन्नति फिर कैसे होगी किस तरह से समाज के यह जो सब दूषण है उसको दूर किया जाए वह जो सब एक बर्निंग क्वेश्चंस ऑफ द डे ऐसा जिसको कहते हैं यह सब क्वेश्चंस को स्वामी जी एड्रेस करते हैं बोलकर के स्वामी जी को पढ़ना स्वामी जी को समझना यंग लोगों को अच्छा लगता है। यंग भी कहां सभी तरह के लोगों को किंतु मां का जो जीवन है इस तरह से एक लज्जा के पट में आवृत्त होकर के रहा और मां का जो कार्य करने का जो फलक है जो रंगमंच है मां का वो है फैमिली लाइफ। एक और है फैमिली लाइफ। दूसरा है यह संघ जीवन। यानी कि जो साधु सन्यासी ये गही भक्तगण जो रामकृष्ण आश्रम जहां पे भी है मठ मंदिर जहां पे भी है वहां पर आते हैं मन में शांति प्राप्त करने के लिए ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वह जो कम्युनिटीज जहां पर गठित होती है यह कम्युनिटी है मां का रंगमंच तो कभी-कभी लगेगा कि मां के जो उपदेश है वह मुझे किस तरह से रिलेवेंट है तो उसका तो एनालिसिस करना है हमको। किंतु यहां जो गंभीरानंद जी कहना चाहते हैं कि अपनी जो लीला संवरण की ओर जो महाप्रभु श्री रामकृष्ण जो आगे बढ़ रहे थे तो उन्होंने दो जो है महा शक्तियां इनको कि रखकर के गए थे भविष्य के रामकृष्ण संघ की जो बागडोर उसकी यह जो लीडरशिप है अपने हाथ में लेने के लिए युग धर्म प्रवर्तन का गुरु दायित्व जिनके हाथ में श्री राम राम कृष्ण ने दिया था। तो वह कौन थी? मां शारदा देवी और स्वामी विवेकानंद। त्यागी संतान वृंद लिखा है किंतु उनके लीडर तो थे स्वामी विवेकानंद। तो इन दोनों को अपने जो वारसा है आध्यात्मिक वारसा साथ-साथ में ही यह लीडरशिप यह दोनों देकर के श्री
माँ सारदा का अनुभव : असाध्य रोग में ईश्वर कैसे रक्षा करते हैं
रामकृष्ण देव का जो रोग जीर्ण देह था वह धीरे-धीरे करके क्रमशः और भी ज्यादा जीर्ण क्षण होता जा रहा था और उनकी जीवनी शक्ति ध्रुतहाश पते छे देख्या श्रीमा स्थिर थाकी ते पार लेना एक तो उनका जो रोग जीर्ण देह है वह जीर्ण क्षण होता जा रहा है। साथ में ही उनकी जो जीवनी शक्ति है ध्रुत ह्रास ध्रुत अर्थात कि स्पीडीली बहुत ही फास्ट ध्रुत गति से जिसको कहते हैं रास अर्थात कि जिसकी अवनति हो रही है जिसकी बहुत ही गति से बहुत ही फास्ट जिसकी अवनति हो रही है। श्री रामकृष्ण की जीवनी शक्ति की यह देखकर के मां स्थिर रह नहीं पाई। त निज जीवों ने सिंह वाहिनी देवी करुणा उपलब्धि कोरिया छे उन्होंने अपने खुद के जीवन में सिंह वाहिनी देवी की करुणा उपलब्ध की थी करुणा का परिचय प्राप्त किया वही फेमस घटना कि मां वहां पे जयराम भाटी गई है कोलकाता में फिर यह जो ब्लड ब्लड डाइस सेंटरी है वगैरह जो मां को एक के बाद एक रोग हो गए थे तो फिर वो वहां से और क्या है कि यह डैंप एट एटमॉस्फियर है ना ह्यूमिड एटमॉस्फियर गंगा के किनारे का तो मां ने सोचा कि चलो वहां पे चलते हैं जयराम भाटी तो जयराम भाटी गए किंतु जयराम बाटी में थोड़ी ना कोई ट्रीटमेंट करने वाला है वहां पे डॉक्टर वगैरह तो फिर बेचारी की अवस्था और बद से बदतर होती गई हेल्थ और भी बिगड़ता गया आखिर में मां के जो भाई थे उमेश मोस्ट प्रोबेबबली वही नाम था सो उन्होंने मां को कहा कि यह सिंह वाहिनी है वहां पर हत्या दोगी क्या हत्या देना अर्थात कि बिना खाए पिए मां के सामने पड़े रहना देवी के सामने फिर वह जो चाहे करें यदि उनकी इच्छा है कि उनको बचाना है अपने भक्त को तो फिर उनके जो औषध की व्यवस्था मेडिसिन की व्यवस्था है वह करेगी और इच्छा नहीं है बचाने की तो फिर वही बिना खाए पिए वहीं पर भक्त का देह त्याग होगा और भक्त को यह संतोष होगा कि मैंने ईश्वर के सामने हमने देह त्याग किया है। तो इस तरह से मां सिंह वाहिनी के सामने हत्या देकर के पड़ी थी। रात को एकाएक सिंह वाहिनी ने आकर के मां को कहा कि यह जो फूल है उसका रस जो है अपनी आंखों में डालो। क्योंकि मां की जो हेल्थ है इस तरह से बिगड़ना शुरू हुई थी कि इवन आंखों में दिखना भी बंद हो गया था। तो जिस जैसे ही यह सिंह वाहिनी ने दर्शन देकर के मां को कहा साथ में ही मां ने यह जो फूल का रस अपनी आंखों में डाला और जितना भी मेला जमा हुआ था आंखों में सब बह के निकल गया और स्पष्ट रूप से दिखने लगा और शारीरिक जो दुर्बलता बार-बार जो डजेंटरी वगैरह हो रहा है वह भी धीरे-धीरे करके बंद हो गया और मीनवाइल सिंह वाहिनी देवी मां को तो यह एक उपाय उपाय बताती ही है कि इस तरह से फूल का रस आंख में डालना है। किंतु साथ में ही मां की जो मां है श्यामा सुंदरी देवी जो कि अपने घर में थी उनको जाकर के सिंह वाहिनी देवी कहती है कि अरे तुम्हारी बिटिया को वहां मंदिर में रखा है अकेले इस तरह से यह क्या उचित है क्या जाओ उसको ले आओ और फिर यह जो एक मेडिसिन है वह उसको देना बोलकर के सिंह वाहिनी देवी ने श्यामा सुंदरी देवी को एक औषध दिया था और यह जो घटना हम डिस्कस कर रहे थे उस समय भी हमने इसका जो एक एक गहन अर्थ है। इसका एक गहन इंगित है इसके पीछे में। वो भी देखा था कि किस तरह से यह जो मेंटल फिनोमिना है और यह मटेरियल फिनोमिना है। फिजिकल वर्ल्ड और यह वर्ल्ड ऑफ कॉन्शियसनेस, वर्ल्ड ऑफ चेतना और यह वर्ल्ड ऑफ अचेतना। यह दोनों हमेशा एक तरह से सेपरेट ही दिखते हैं। हमको ठाकुर को इतने सारे विज़ंस दर्शंस वगैरह होते हैं। हम लोग उसको मिरेकल की दृष्टि से नहीं देखते। आज वेस्टर्न क्रिश्चियनिटी जो है क्रिश्चियनिटी में जिसको कि मिरेकल कहते हैं। मिरेकल क्या है? तो फिर यह मनन्ना फ्रॉम हेवन एक फिश बास्केट है। तो फिश उसमें से वह सब भक्तों को वह दे रहे हैं मछली। तो इस तरह से अक्षय पात्र की तरह उसमें से मछलियां कम ही नहीं होती है। आकाश में से यह मनना या तो फिर यह फूड स्टफ है वह गिरना शुरू हो जाता है। यानी कि एक्चुअल माने फिजिकल वर्ल्ड में यह मिरेकल होते हैं जो कि क्रिश्चियनिटी में है बहुत उसका प्राधान्य है। रोगियों को ठीक कर देना। फिर यह मटेरियल कोई चीज प्रोड्यूस करना। यह जो यह समुंदर में से ये समुंदर पार करके जो आ रहे थे तो समुंदर के वो दो भाग हो जाना बीच में जाने के लिए रास्ता हो जाना। इसको मिरेकल कहते हैं। अभी हिंदू धर्म में मिरेकल का कोई कमी नहीं है। रामायण, महाभारत वगैरह खोल के देखेंगे अपने पुराण मिरेकल से भरे हुए हैं। किंतु अपने यहां पे एक साइंस भी है आकाश और प्राण का साइंस जो कि स्वामी विवेकानंद हमको राजयोग में सिखाते हैं। तो हम लोग मानते हैं कि यह सिर्फ मिरेकल नहीं है। मिरेकल इलॉजिकल होते हैं। किंतु यह जो पौराणिक कथाओं में जो हमको एक दिव्य शक्तियां देखने को मिलती है, उसके पीछे में प्राण का विज्ञान है। प्राण को नियमन करने से मटेरियल वर्ल्ड में फिजिकल वर्ल्ड में आप कुछ भी कंट्रोल कर सकते हैं। तो वो स्वामी जी का जो कांसेप्ट हमको हमने राजयोग में देखा था। तो अभी क्या है कि ठाकुर तो पहले से ही सब तरह की सिद्धाई जिसको वो कहते हैं सिद्धि जिसको कि ठाकुर कहते हैं कि ये फिजिकल वर्ल्ड में कोई भी मिरेकल करना यह जो प्राण की शक्ति का यूटिलाइजेशन करना वो अपने आध्यात्मिक विकास के लिए बाधा स्वरूप बन सकता है क्योंकि मेरे पास में इस तरह का पावर आ गया तो मेरा घमंड ही बढ़ेगा और जितना घमंड बढ़ेगा जितना ही यह अहंकार बढ़ेगा उतना ही मैं आध्यात्मिक जगत में दूर से दूर होता जाऊंगा। तो यह अपना कांसेप्ट क्लियर है। बोल के रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा साहित्य जो है बहुत ही कम आपको इस तरह के मैजिकल पावर या मिरेकल आपको देखने को मिलेंगे। मानसिक जगत में जो होता है सो होता है। वह तो एक प्योर साइंस है कि आपको दर्शन होते हैं। भूतकाल की बातें सुनाई दे दिखाई देती है। भविष्य दिखाई देता है। सामने जो खड़ा है उसके संस्कार सब पता चल जाते हैं। स्पर्श मात्र करके उसके संस्कारों को कहां उलटपालट कर दे सकते हैं। ठाकुर की तो यह सब शक्तियां हमने देखी थी। तो यह सब विस्तृत विवरण हमने देखा है। किंतु फिजिकल वर्ल्ड में कोई मिरेकल होना वो बड़ा ही रेयरली हमको देखने को आता है। तो यह सिंह वाहिनी देवी ने श्यामा सुंदरी को जो औषध दिया था, मेडिसिन दी थी, वो एक्चुअली एक फिजिकल मेडिसिन थी। माने आप हाथ में पकड़ सकते हैं। आप उसको खा सकते हैं और खा के अपने देह पे कोई अच्छा असर भी होगा। तो यह मिरेकल जो है वह एक मिरेकल यहां पर हमको देखने को मिलता है। सो माने एक गहन एक इशारा है यहां पे कि सिंह वाहिनी की शक्ति सिर्फ आध्यात्मिक क्षेत्र में ही नहीं किंतु यह मटेरियल क्षेत्र में भी भौतिक जगत में भी कार्य करती है। तो यहां पे मां को तो यह सब बातें पता थी कि किस तरह से सिंह वाहिनी की मां के ऊपर में कृपा हुई थी। अपने पर कृपा हुई थी और इतनी जो बीमार थी मां उस बीमारी से मां को रक्षा प्राप्त हुई थी। तो यहां पे गंभीरानंद जी लिखते हैं कि अपने खुद के जीवन में सिंह वाहिनी देवी की करुणा मां ने उपलब्ध की थी। करुणा का मां को प्रूफ मिला था। जगत धात्री देवी कृपाए पितु कुले सुदिन फिरिया आशते देखिया छे जगत धात्री देवी की कृपा से पितु कुल के अच्छे दिन सुदीन फिरत आते हुए देखे हैं आरो कतो दिखे कतो कार्यजे कतो दूर दिन भगवान मंगल हस्ते निदर्शन पया छ और भी कितनी दिशाओं में कितनी और कितने कार्यों में कितने दूर दिन में भगवान के मंगल हस्त का निदर्शन भगवान के मंगल हस्त का प्रूफ उन्होंने प्राप्त किया है। देखिए कि जब नजर के सामने विपद आ जाए, आप विपद आ जाए और भक्त यदि भगवान को सच्चे दिल से पुकारता है तो भगवान अवश्य मदद करते हैं। तो यह जो सब है मां ने अपने खुद के जीवन में बहुत उसके प्रूफ मिले थे। बहुत ही उनको अपनी नजरों से यह सब घटनावली मां ने देखी थी। आज की से अनाथनाथ ए संकट काले
अनाथनाथ ईश्वर की अपार करुणा: परमार्थ या पुरुषार्थ?
मुख तुल्या चाहीबे ना आज क्या वही अनाथनाथ ईश्वर कौन है? अनाथनाथ है। जो अनाथ है उनके नाथ है। अनाथ अर्थात कि ऐसा नहीं कि जिसके मां-पिताजी नहीं है। अनाथ अर्थात कि ऐसा कोई कि जो कि ईश्वर के श्री चरणों में संपूर्ण रूप से वह निर्भर है और उसके सामने जो जिस तरह की जो क्राइसिस खड़ी होती है, उस क्राइसिस में वह संपूर्ण रूप से ईश्वर पे ही भरोसा रख के चलता है। अनाथ किसको कहेंगे कि वही ठाकुर की कहानी कि वह फेमस कहानी कि एक आदमी जा रहा है रास्ते से और देखा कि वहां पर धोबी लोगों ने वहां पे वो रास्ते पर वह जो कपड़े सुखाए थे धो के उसके ऊपर में पैर पड़ गया तो अभी धोबियों को तो गुस्सा आएगा ही आएगा क्रोध होगा ही होगा कि यह तो मेहनत करके कपड़े धोए हैं सुखाने को रखे उसके ऊपर में इस आदमी ने पता नहीं आंख है कि नहीं अंधा ऐसा करके पैर रख दिया उसने तो धोबी लोग तो उसको मारने को जाएंगे ही। अभी यह जो आदमी था वह था भगवान का भक्त। तो जैसे ही अब क्या है धोबी लोग उसको मारने को आते हैं तो क्या भगवान पर भरोसा रखेगा यदि और फिर भगवान सोचेंगे कि अरे मेरे भक्त की मैं रक्षा नहीं करूंगा तो फिर उसकी रक्षा कौन करेगा? तो वही कि भगवान अपने वो वहां पर बैठे थे वैुंठ में ना कि कैलाश में तो वो जाकर खड़े होकर के भक्त की रक्षा करने को जाते हैं। देवी पूछती है भगवान आप कहां जा रहे हैं? तो बोले कि मैं भक्त की रक्षा करने जा रहा हूं। फिर एकाएक वापस आकर के खड़े हो गए अपने सिंहासन पर फिर से बैठ गए। देवी पूछती है क्यों इतना जल्दी वापस आ गए? बोला कि उसने अपनी रक्षा करने के लिए अपने से ही पत्थर उठा लिया था। तो देखिए जब तक पत्थर नहीं उठाता है भक्त तब तक वह अनाथ है तब तक भगवान उनकी रक्षा करेंगे तब तक भगवान अनाथनाथ उनकी रक्षा करेंगे किंतु जिस क्षण हमने पत्थर उठा लिया उसी क्षण जो है भगवान सोचेंगे कि वही तो है खुद की चिंता करने वाला तो मैं क्या क्यों जाकर के यह सब चीजों में हाथ लगाऊं तो वह वापस आ जाएंगे और इसके साथ में म कंट्राडिक्टरी और भी कहानी है कि दो मित्र जा रहे हैं जंगल में सामने शेर आ जाता है तो एक मित्र कहता है चलो भगवान को पुकारे तो दूसरा कहता है कि नहीं नहीं चलो पेड़ पे चढ़ जाते हैं बिना इतनी छोटी-छोटी चीजों में भगवान को क्यों कष्ट देना तो यह भी कहानी है एक और तो है कि ईश्वर पे श्रद्धा शरणागति दूसरी ओर है पुरुषार्थ तो कौन सा रास्ता हमको इस करना माने सहीसही में भगवान अनाथनाथ है तो तो फिर हमको ना ही जिस तरह से धोबी के सामने पत्थर उठाने की जरूरत नहीं थी। तो वैसे ही यह शेर के सामने हमको पेड़ पर चढ़ने की जरूरत नहीं है। ठाकुर के टीचिंग में इस तरह का कंट्राडिक्शन क्यों है? तो एक्चुअली देखिए कि इसकी यदि व्याख्या करनी है तो वही जो अधिकारीवाद माने पुराना और माने जुना ने जानिता गुजराती में कहते हैं कि वो जो पुरानी कोई दुकान होती है फेमस दुकान होती है तो उसमें कहते हैं ये जूना और जानिता जुना अर्थात कि पुराना और जानिता अर्थात कि फेमस ओल्ड एंड फेमस तो यह ओल्ड एंड फेमस डॉक्ट्रिन ऑफ अधिकारीवाद कि जब तक हम तमस में डूबे हैं तब तक अपना मन काम कांचन में पूरा फंसा हुआ है। मन के भीतर में जितनी भी कामना वासनाएं हैं उसके सामने हम एक क्षण भी वो एक धैर्य नहीं रख सकते। जैसे ही काम नजर के सामने आएगा, काम्य चीज नजर के सामने आएगी, साथ-साथ में ही उसका भोग करना है। तो फिर मन के ऊपर में थोड़ा सा भी बांध नहीं बांधा है। अपनी जो इच्छाओं के ऊपर में थोड़ा सा भी कंट्रोल नहीं है। अपना यह जो विल पावर है, संपूर्ण रूप से वह खत्म हो गया है। इस तरह का आदमी घोर तमस में घोर विषयसक्त आदमी यदि यह कहता है कि मैं तो सब भगवान पर भरोसा रख के बैठा हूं तो इसके जैसा निकम्मा आदमी और कोई नहीं है। भगवान कभी भी उसको हेल्प नहीं करने वाले। अगेन वो पुरानी और ओल्ड एंड फेमस स्टोरी कि एक आदमी का गार्डन था। गार्डन में उसने बहुत अच्छे से फूल पौधे लगाए हैं। एक दिन गाय आकर के फूलों को खाने लगी। उसने गाय को लाठी मारी। गाय मर गई। अभी उसको यह डर लग गया कि गौ हत्या का पाप लगेगा। तो फिर उसने यह लॉजिक खोज निकाला। यह हत्या तो मैंने नहीं की है। हाथ ने लाठी उठाई है। मैंने तो नहीं उठाई। और हाथ के देवता है इंद्र यानी कि सही तो हत्यारे है। इंद्र तू हूं तू हूं। हम्मा हम्मा नहीं तू तू हूं। तुम ही सब कुछ हो। इंद्र ही सब कुछ है। मैं तो कुछ नहीं हूं। इंद्र ने ही जिस तरह से मुझे चालित किया है वैसे ही मैंने चलकर के लाठी उठाई। तो ठीक है यमदूतों यमदूत जब आए उसको लेने के लिए तो उसने यह लॉजिक समझा दिया तो यमदूत सोचते हैं तो शास्त्र सम्मत लॉजिक है तो ठीक है चलो इंद्र को पकड़ने को जाते हैं तो इंद्र थोड़ा सोच करके कहता है अच्छा ठीक है थोड़ा समय दो मैं जाकर के देखता हूं फिर इंद्र आया एक ब्राह्मण का रूप धारण करके बगीचे की प्रशंसा कर रहा है कि इतना सुंदर फल किसने लगाया है तो फलों का पौधा तो वही आदमी एकदम गर्व से भरे हुए बोल के यह मैंने लगाया है यह पौधा कह रही इतने सुंदर फूल किसने उगाए? तो वह भी मैंने उगाए हैं। इतना सुंदर ये तालाब उसमें इतने सुंदर पद्म फूल ये वो किसने किया यह सब? तो सब चीजों में मैंने किया मैंने किया। तो फिर ये इंद्र अपना सही स्वरूप धारण करके कहते हैं कि साला जब ये क्रेडिट लेने की बात आती है तब तुम और ये फिर ये जो डिसक्रेडिट लेने की बात आती है तब मैं ऐसा ये किस तरह का लॉजिक है? तो देखिए कि ये कंट्राडिक्टरी जब भी हमको दिखता है कि ईश्वर पे शरणागत होकर के रहना कि यह पुरुषार्थ करके अपना रास्ता अपने से बनाना तो इसका सॉल्यूशन है यह अधिकारीवाद कि हम कहां पे हैं यदि तमस में डूबे हुए हैं यदि विषय आसक्त हमारा मन है इंद्रियों के सुखों के प्रति हम थोड़ा सा भी अपने को रेजिस्ट नहीं कर पाते हैं तो पुरुषार्थ का रास्ता हमारा रास्ता है। किंतु जिस क्षण इंद्रियों के विषय के ऊपर में एक संयम आना प्रारंभ हुआ, अपना विल पावर जो है धीरे-धीरे करके बढ़ना प्रारंभ हुआ। जब नजर के सामने टेंप्टेशन आता है तो मेरा मन इसके पीछे लुभ करके माने टेंपट होकर के दौड़ना नहीं शुरू कर देता। यह जब परिस्थिति आती है तो फिर समझना कि अभी हमारे लिए शरणागति का रास्ता प्रारंभ हो चुका है। वो जो अंधेरी रात फिर अंधेरी रात में से दिन तो फटाक करके होता नहीं। पहले तो वह आकाश में लाली मा छा जाती है। फिर धीरे-धीरे करके यह जो सूर्य देवता है वो होराइजन के ऊपर में धीरे-धीरे करके वो प्रकट होते हैं। तो यह जो आकाश में लालिमा छा जाने वाला तो वो क्या आध्यात्मिक जीवन में कहेंगे? जब तक इंद्रियों के विषयों के आबद्ध जब तक है उनके प्रति प्रलोभन हमारे मन में जड़ जमा के बैठा हुआ है तब तक अंधेरी रात चल रही है। और जैसे ही यह हमारा विल पावर स्ट्रांग होता जाता है, हम इंद्रियों के विषयों को रेजिस्ट कर सकते हैं। हम जब भी एक एक्सपेरिमेंट है डिलेड ग्रेटिफिकेशन। डिलेड ग्रेटिफिकेशन का क्या अर्थ है? यह बच्चा भविष्य में आगे बढ़ेगा कि नहीं बढ़ेगा? उसका फ्यूचर कैसा है? यह टेस्ट मने करने के लिए विल पावर उसका कितना स्ट्रांग होगा? वो कुछ साइकेट्रिस्ट अमेरिका वगैरह वेस्टर्न कंट्रीज में एक एक्सपेरिमेंट करते हैं। एक तीन-चार बच्चों को एक साथ में टेबल पर बिठा देते हैं। फिर उनके सामने उनको जो मिठाई या जो चीज खाने की सबसे अच्छी लगती है। किसी को केक अच्छा लगेगा, किसी को आइसक्रीम अच्छा लगेगा, किसी को यह पिज़्ज़ा अच्छा लगेगा। तो उसके प्रिय जो खाने की चीज है उसके सामने रख देते हैं। और फिर कहते हैं कि एक घंटा ना दो घंटा तक तुम यदि इसको नहीं खाओगे तो इसको मैं तुमको डबल दूंगा। नजर के सामने आइसक्रीम का एक कप रखा है। तुम इसको एक घंटे तक मत खाना। यहीं टेबल पे ही बैठे रहो। आइसक्रीम को देखो। किंतु 1 घंटे तक ना दो घंटे तक आइसक्रीम को मत खाना। यदि नहीं खाओगे तो मैं तुमको आखिर में दो आइसक्रीम के कप दूंगा। तो बच्चा तो वह सोचता है ना कि हां मैं आइसक्रीम खाना तो मुझे बहुत पसंद है। तो एक कप मैं क्यों खाऊंगा? दो कप खाऊंगा। ऐसा बोल करके वो सोचता तो है कि इसको मैं एक घंटे तक नहीं खाता हूं। मैं एक घंटे तक राह देखता हूं। बाद में खाऊंगा। अभी ऐसा सेटअप करके यह बड़े लोग चले जाते हैं। अभी बच्चे हैं टेबल के सामने आइसक्रीम है, पिज़्ज़ा है ना जो भी है उसको देख रहा है। और मन में ही मन में खाने की इच्छा धीरे-धीरे करके स्ट्रांग होती जाती है। मुंह में पानी आता जाता है और सामने प्रलोभन भी है कि यदि थोड़ा रेजिस्ट करेंगे यह टेंप्टेशन को एक घंटा दो घंटा जो भी पीरियड दिया है तो डबल मिलेगा। तो अभी देखिए कि कौन बच्चा क्या करता है। यह लोग सब वीडियो से देख रहे हैं। वीडियोग्राफी कर रहे हैं। एक बच्चा है कि उसका अपने मन पर थोड़ा सा भी कंट्रोल नहीं। यह भविष्य में बड़ा लाभ होने वाला है। यह लॉजिक ही उसकी समझ में नहीं आता। जैसे ही यह बड़े लोग बाहर निकल जाएंगे। वैसे ही उसने हाथ मार करके आइसक्रीम ना पिज़्ज़ा जो भी है फटाक करके खा लिया। और अभी चुपचाप बैठा है। तो वो तो निकल गया। कॉन्टेस्ट से बाहर हो गया। फिर एक बच्चा है प्रलोभन तो है और साथ में यह लॉजिक थोड़ा बहुत माइंड में भी गया है। एक घंटा रहा देख लेते हैं डबल हो जाएगा। किंतु बेचारे का विल पावर इतना स्ट्रांग नहीं है। लॉजिक ने प्रवेश तो किया है मन में किंतु यह विल पावर साथ नहीं दे रहा है। तो 5 मिनट 10 मिनट 15 मिनट ये लोग जो वीडियोग्राफी करते हैं ना आप YouTube पे देखेंगे इस तरह के वीडियो बने। वो लड़के के मुंह पे ये जो सब प्रलोभन के जो भाव है ना इस तरह से एक के बाद एक आते हैं वो सामने देखता है फिर इधर-उधर देखता है रेजिस्ट करता है टेंप्टेशन को किंतु बेचारा रेजिस्ट कर नहीं पाता है और आखिर में उसको खा लेता है तो वो भी आउट हो गया फिर जो कुछ रहते हैं बच्चे कि वो सही में प्रलोभन तो है किंतु उससे भी बड़ा एक दूसरा प्रलोभन है ग्रेटर प्रलोभन ग्रेटर टेंप्टेशन कि यह एक घंटा नहीं खाएंगे तो आखिर में हमको दो आइसक्रीम के कप मिलेंगे। तो यह ग्रेटर प्रलोभन की वजह से यह जो अपना विल पावर जो है वह इतना स्ट्रांग कर लेते हैं कि नहीं खाएंगे तो नहीं ही खाएंगे। आखिर में जब एक घंटे का टाइम खत्म हो जाता है। फिर वह एक्सपेरिमेंट करने वाले दरवाजा खोल के भीतर आते हैं। फिर बच्चे को कांग्रेचुलेट करके उसको दो आइसक्रीम देते हैं। तो वह बड़ा खुश हो जाता है। सो सी कि हम लोगों के साथ में भी इस तरह से कि प्रलोभन जब आ जाता है तब हम पशुवत हो जाते हैं। कोई कोई-कोई लोग हैं। फिर वह लॉजिक फौजिक यह हायर थिंकिंग सब वह खिड़की के बाहर में वह फेंक करके वह प्रलोभन के पीछे उसका भोग करने के लिए वे लोग लग जाते हैं। प्रलोभन करने के बाद में शायद उनको पछतावा होगा कि अरे मैंने यह सब प्रॉमिस वगैरह किया था। उसका क्या हुआ? किंतु गया अभी तो क्या है? वो खा लिया अभी कुछ नहीं कर सकते हैं। तो वह तो एक कैटेगरी है। फिर एक कैटेगरी है बेचारे प्रलोभन को रेजिस्ट करने का प्रयास तो करते हैं। किंतु बेचारों को विल पावर साथ नहीं देता है। कितना ही प्रॉमिस किया है, कितना ही रेजोल्यूशन लिया। न्यू ईयर रेजोल्यूशन अमेरिका में यह चलता है कि न्यू ईयर चालू होता है तो हम लोग रेजोल्यूशन लेंगे कि इस साल में शुगर नहीं खाऊंगा। फिर एक दिन यह रेजोल्यूशन टिकता है फर्स्ट जनवरी तक और सेकंड जनवरी को शुगर खाना चालू कर देते हैं। माने यह कनफेक्शनरी जो भी आइटम है तो ये इसको कहते हैं न्यू ईयर रेजोलशंस। एक दिन टिकते हैं दूसरे दिन खिड़की के बाहर। तो ये बेचारे रेजोल्यूशन तो बहुत लेते हैं किंतु उनका विल पावर जो है वो साथ नहीं देता। और फिर तीसरी कैटेगरी है कि हां टेंप्टेशन से प्रलोभित हो तो जाते हैं किंतु एक बार जो रेजोल्यूशन लिया है कि एक उच्च लक्ष्य की प्राप्ति करनी है। ग्रेटर प्रलोभन माने ऐसा नहीं कि मैं जो ये प्रलोभन है उसको उसी से मैं मुक्त हो जा रहा हूं। प्रलोभन से कोई मुक्त नहीं हो सकता। हमको एक ग्रेटर प्रलोभन अब हमको देना है। यह इंद्रियों के विषय में क्यों दौड़ू? मैं यदि मैं ईश्वर प्राप्ति होगी, ईश्वर साक्षात्कार होगा तो उससे जो सुख मिलेगा, उससे जो आनंद मिलेगा, उस आनंद में कहीं पर भी कमती नहीं है। आज मैं चार कप आइसक्रीम खा लूंगा, तो मैं पेट बिगाड़ करके बैठूंगा। किंतु मैं 40 दिन, चार दिन यदि मैं समाधि के आनंद में रहूंगा, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होने वाला। आनंद उत्तरोत्तर बढ़ता जाएगा। इस आनंद में कहीं पे ज्वार भाटा नहीं है। ठाकुर की लैंग्वेज में यह समुंदर की ये जो लहरें हैं कभी उसमें ज्वार आता है कभी भाटा आता है। एब एंड टाइड यह जो समुंदर की लहरों में होता है। तो किंतु यह जो ब्रह्म आनंद है ब्रह्मंद है। उसमें ज्वार भाटा नहीं है। एब एंड टाइड्स नहीं है। आज आपने खाया आइसक्रीम तो हो गया टाइड। माने बहुत आनंद आ गया। फिर खाने के बाद में पेट में दर्द होने लगा तो हो गया आनंद में भाटा आ गया यानी कि एब आ गया तो ये दैहिक भोग जितने भी है जब तक भोग करेंगे आनंद आएगा फिर आनंद के बाद में रोग ही आने वाला है किंतु ब्रह्मानंद एक ऐसा है जिसमें ज्वार भाटा नहीं है एब्स एंड टाइड्स नहीं है एक कंटिन्यूस सतत धारा में यह आनंद बहने वाला है तो एक बार हमारा रेजोल्यूशन एक स्ट्रांग हो जाए। इसके बाद में हम ईश्वर पे पूरा संपूर्ण निर्भर होकर के बैठेंगे। तो फिर ईश्वर हमारे अनाथ नाथ हम जैसे अनाथों के नाथ होंगे। किंतु जब तक वो पहली कैटेगरी का बच्चा है जैसे ही आइसक्रीम उसके सामने रख के यह एक्सपेरिमेंट करने वाले बाहर निकले सीधा ही उसने आइसक्रीम पर हाथ मारा और फटाफट खाना शुरू कर दिया। तो फिर उसके वह अपने को यदि कहेगा कि मैं अनाथ हूं और अभी मैं जाकर अनाथनाथ के सामने हत्या दे रहा हूं तो यह सब चीजों का ज्यादा कोई परिणाम नहीं आने वाला। यही मां के ही एक रिलेटिव की कहानी है। उनके चाचा ना कि कोई। एक बार मां ने वहां पर हत्या दी। पता चला कि सिंह वाहिनी देवी सब की ये जो मनोवांछा पूर्ण करती है। तो मां के ही ये चाचा ना कि कोई रिलेटिव उनको भी इस तरह से बीमारी हुई थी। वहां पर वो सिंह वाहिनी में हत्या देकर पड़े हैं। तो रात में सिंह वाहिनी ने आकर के श्यामा सुंदरी देवी नो कि किसी को जाकर के स्वप्न में कहा कि वो बूढ़ा हुआ है। उसको समझ में नहीं आता क्या कि मैं वहां पर शयन कर रही हूं। झूठ-मूठ का हत्या देकर पड़ा है। मेरी निद्रा में विक्षेप कर रहा है। जाओ उसको बोलो कि यहां से भागे मंदिर में सर। तो श्यामा सुंदरी देवी कहती है कि देवी ने आकर के इतनी सारी बातें की कि मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। मेरे विश्राम में वह खलेल पहुंचा रहा है। तो इतनी सारी बातें करने की बजाय यदि मेडिसिन दे दी तो भी तो काम चल जाता। बिना मतलब वो आकर के दर्शन दिया। दर्शन का कोई लाभ नहीं हुआ। किंतु देखिए कि देवी को भी पता है कि किसको किसके ऊपर में अनुग्रह करना है। किसके ऊपर में कृपा करनी है और किसको फिर लात मार के कहना है कि पहले तो थोड़ा परिश्रम करो। अपनी इंद्रियों के ऊपर में जय करने का विजय प्राप्त करने का प्रयास करो। प्रयास तो करो। प्रयास नहीं करेंगे और फिर कहेंगे कि मैं तो बस पूरा संपूर्ण शरणागत हूं तो ऐसे कैसे चलेगा? एटलीस्ट प्रयास तो करना चाहिए। फिर यदि देखिए कल ही हमने देखा था कि वो ब्रह्मवादीन महाशय की कहानी कि वो शांतानंद जी कोलकाता जा रहे हैं तो काशी में उन्होंने पूछा कि मां कहा कि मां को पूछना कि मैं इतनी तपस्या करता हूं तो ईश्वर का दर्शन कब होगा? तो शांतानंद जी आए कोलकाता मां का दर्शन किया। फिर जब मौका मिला मां को प्रश्न किया कि वह ब्रह्मवादीन महाशय पूछ रहे हैं इतनी तपस्या करने के बाद में और अभी कितना दिन बचा है कृपा प्राप्त करने का साथ में ही मां ने सीरियस होकर के कह दिया बड़े ही गंभीर स्वर से कि ऐसा मत समझो कि वह तपस्या कर रहा है बोल के ईश्वर के पास में और कोई कामधाम नहीं है आकर के उसको उसको दर्शन दे उसके ऊपर कृपा करें यह कोई आपकी मेहनत का परिणाम नहीं है कृपा कृपा तो परिणाम है ईश्वर की दया का जब ईश्वर को दया होगी जब ईश्वर की इच्छा होगी तब वो दर्शन देंगे। वो इच्छामई है। इच्छामय है। उसे कोई आलू ये जो वगैरह जो है आपने बाजार में जाके ₹50 दिया एक किलो खरीद लिया ऐसा थोड़ी ना है। हमारा धर्म है तपस्या करते जाना और फिर ये कर्मण्यवाही अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन। धर्म है कि तपस्या रूपी कर्म करना और साथ में ही ईश्वर कब दर्शन देंगे यह फल की आशा नहीं रखना। यह हमारा काम है। वह हमको करते जाना है। जब ईश्वर की इच्छा होगी तब वह कृपा करेंगे तब दर्शन देंगे।
तपस्या का पथ कठिन है — तपस्या का घमंड भी साधक को गिरा देता है
देखिए यह जो कांसेप्ट इतना म सूक्ष्म है। एक और लोग कहते हैं कि यदि ईश्वर की कृपा पे ही सब कुछ निर्भर है तो मुझे तपस्या करने की क्या जरूरत है? मेहनत करके अपने विल पावर को अपनी संकल्प शक्ति को बढ़ाने की क्या आवश्यकता है? बस मैं आराम से आनंद में तमस में डूबा हूं। डूबा रहूंगा। ईश्वर को तो जब कृपा करनी है तब करेंगे ना तो वह बैठकर के मैं राह देखता हूं बोल के इस तरह का आदमी और तपस में डूबता जाएगा। दूसरी ओर एक आदमी है माने उसको तो कुछ होने ही नहीं वाला है। फिर एक दूसरी और एक आदमी है। तपस्या पर तपस्या किया ही जा रहा है। किंतु मन के भीतर में ना एक तरह का अहंकार प्रकट होता है कि मैं तपस्वी हूं और दूसरे लोग निकम्मे हैं। यह ब्रह्मवादी महाशय के बारे में इस तरह से तो कोई बात किताब में तो नहीं लिखी किंतु मैंने अपनी नजरों से ऐसे साधकों को देखा है। रूटीन बहुत अच्छा है। लाइफ में डिसिप्लिन बहुत है। खाने-पीने पर संयम भी काफी है। पढ़ाई लिखाई में भी अच्छे हैं। मैं अपने खुद की बात करता हूं। दूसरों की क्या बात करता है? अपने खुद की मैं बात करता हूं कि मैं जब पहली-पहली बार यहां पे आया था और एक डिसिप्लिन वे में रहने का प्रयास कर रहा था। तो उस समय अपने ऑर्डर के एक सीनियर साधु के साथ में बात हुआ तो उन्होंने पूछा कि तुम क्या कर रहे हो आजकल? तो मैंने कहा कि इस तरह से मैं अपने को एक डिसिप्लिन वे में रहने का तपस्या करने का प्रयास कर रहा हूं। तो जैसे ही मैंने कहा उन्होंने महाराज ने कहा कि देखो तुम यदि इतना तपस्या करते हो ना तुम्हारे मन में कहीं दूसरों के प्रति तुच्छ भाव ना आ जाए यह बात तुम बहुत याद रखना बहुत माने उसके बारे में कोशियस रहना सावधान रहना तो मैंने सोचा तपस्या करके घमंड आ जाए दूसरे लोग तुच्छ है ऐसा कैसे हो सकता है एक्चुअली घमंड के विरोध में तो हमको तपस्या करनी है ना ये एोगेंस आ ना जाए मन के भीतर में इसलिए तो तपस्या करनी है तपस्या करके घमंड कैसे प्रकट हो सकता है तो मुझे उस समय वह बात बहुत कंट्राडिक्टरी लगी थी। यह मेरे आ संघ में जॉइन करने के बहुत ही प्रारंभिक दिनों की ही बात थी। तो उस समय तो मुझे समझ में नहीं आया। बाद में मैंने देखा कि नहीं यह बात बिल्कुल सही है। थोड़ा बहुत तपस्या करने से भी ना भीतर में से एक तरह का घमंड प्रकट होता है कि मैं तपस्वी हूं और दूसरे लोग निकम्मे हैं। मैं इतना प्रतिदिन सुबह मंगल आरती में आ जाता हूं। टाइम पे वह सोता रहता है। मैं इतना स्टडी करता हूं। उसमें एक पैसे का भी अकल नहीं है। एक भी छोटी-छोटी पॉकेट बुक पढ़ के वह यहां पर बैठा है। तो वो प्रत्येक स्टेप पर ना तपस्या एक माया जाल की तरह है। माया जाल हमको इतना इजीली नहीं छोड़ने वाली। संसार में तो है हमको दिख रहा है कि मैं माया में फंसा हूं। किंतु एक बार साधना करेंगे ना तो माया हजार गुना सूक्ष्म रूप धारण करके हमारे सर पर आकर बैठ जाएगी। ऐसे में कितने साधकों को देखा है? तपस्या कर रहे हैं और भीतर भीतर में से अहंकार भी है कि मैं तपस्वी हूं और बाकी लोग किसी काम के नहीं। यह बहुत इजी है इस तरह के स्टेप में फंसना। यानी कि ये देखिए कि माने वो क्षुरस्य धारा कवयो वदंती माने ये वो तलवार की धार पे चलने के बराबर है तपस्या करना। थोड़ा सा इधर हुए तो यहां पे तमस में गिरे। थोड़ा सा इधर हुए तो यहां पे अहंकार में गिरे। परिश्रम भी करना है। मेहनत करके इंद्रियों के विषयों से अपने को मुक्त करने का प्रयास करना है। और उसके लिए जो भी तपस्या प्रिस्राइब की गई है। आप दीक्षा लेते हैं तो दीक्षा गुरु आपके जो है परम पूजनीय दीक्षा गुरु आपको बताएंगे इस इस तरह से मंत्र जप करना है। तो वह भी करना है। फिर आप ऐसे जनरल कुछ साधुओं के साथ वार्तालाप करेंगे। पूछेंगे महाराज हमको क्या करना चाहिए? तो बोलेंगे यह किताब पढ़ो, वह किताब पढ़ो। थोड़ा सा मंगल आरती में आने का प्रयास करो। मंगल आरती नहीं तो संध्या आरती में आने का प्रयास करो। वह भी यदि ना हो पाए तो आजकल यह ऑनलाइन सत्संग चलता है। सो पार्टिसिपेट इन दैट तो आपको 10 सलाह 10 जगह से मिल जाएगी। अच्छी सलाह मिलेगी। फिर किंतु जैसे ही आपने वो करने का प्रारंभ किया वो दूसरा एक खतरा आकर के खड़ा हुआ। वहां कहां वो हम तमस से छूटने के लिए यहां पे आए थे तो रजस की माया जाल में फंस गए। तो ये माया जो है इतना इजीली हमको नहीं छोड़ने वाली। वहां तमस में पड़े थे। यहां पे रजस में पड़े। दोनों से बचकर के सत्व की ओर जाना है। सो दिस इज द मोस्ट कॉम्प्लिकेटेड थिंग हियर। अनाथनाथ जो है वह अनाथनाथ इस संकट काले क्या मुंह ऊंचा करके हमारे सामने नहीं देखेंगे क्या? हमारी ऊपर क्या करुणा दृष्टि नहीं बहाएंगे क्या? तो यह बात मां के मन में आई। श्री
ईश्वर के संकल्प और आर्त के क्रंदन से विधि-परिचालित नियति चक्र की गति परिवर्तित होगी की नहीं?
राम कृष्ण गत प्राणा शतीर चोखेर जोले तहां हृदय गलीबे ना। श्री रामकृष्ण गत प्राणा मां कैसी है? राम कृष्ण गत प्राणा श्री रामकृष्ण के श्री चरणों में ही उन्होंने अपना पूरा जीवन उन्होंने समर्पित कर दिया है। उनका जो प्राण है वह पूरा उनके हृदय के भीतर में समाहित हो चुका है। तो इस तरह की राम कृष्णगत गत प्राणा सती की आंखों में आंसू आने से क्या अनाथनाथ का हृदय द्रवित नहीं होगा क्या? अनेक भाबिया श्रीमा स्थिर कोलेन जे सर्व जी सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी तारकेश्वर महादेव मंदिरे हत्या देवेन सब और देखकर के मां ने ठीक किया कि सर्व जीव के सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी कैसे यह तारकेश्वर के महादेव है सर्व जीव के सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी तारकेश्वर महादेव के मंदिर में हत्या देनी है यह बात माने ठीक की एक बार अंत चेष्टा कोरिया देखी एक बार तो एटलीस्ट मेहनत करके प्रयास करके देखेंगे विधि परिचालितो नियति चक्र गति परिवर्तन परिवर्त तो हो कि ना एक बार प्रयास करके देखेंगे कि ये विधि चालित विधि परिचालित नियति चक्र ये नियति चक्र अर्थात कि यह जो कॉज एंड इफेक्ट का कर्म के प्रवाह का यह जो काल चक्र है वो चलता ही रहता है। चलता ही रहता है। जन्म मृत्यु जरा व्याधि अपने जीवन में आते ही रहते हैं। एक जन्म के बाद में दूसरे जन्म की अपनी जो यात्रा है वह चलती ही रहेगी। यह विधि परिचालित विधि अर्थात कि ये जो भाग्य विधाता जो है जिन्होंने इस नियति चक्र की रचना की है परिचालित अर्थात कि विधि के द्वारा जो परिचालित होता है विधि के द्वारा जिसको स्टीयर होता है स्टीयरिंग माने जो स्टीयर होता है विधि के द्वारा तो यह विधि परिचालित नियति चक्र की गति परिवर्तन परिवर्तित हो गई होगी कि नहीं ईश्वर संकल्पो आरते क्रंद ने विचलित हो कि ना ईश्वर के संकल्प से और आर आर अर्थात कि जो आरती लेकर के जो प्रार्थना लेकर के भगवान के पास आया है वह उसके क्रंदन से उसके रोने से विचलित होगा कि नहीं यह इस तरह का नियति चक्र जो कि विधि परिचालित है वह चक्र क्या ईश्वर के संकल्प और जो आरती ले आया है आर उसके क्रंदन से उसकी उसकी रुलाई से यह चक्र क्या थमेगा कि भी नहीं तो इतना लिटरेरी जो ये इसका है पैसेज फिर से एक बार पढ़ता हूं। बहुत सोच के श्री मां ने स्थिर किया कि सर्व जीव के सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी तारकेश्वर महादेव के मंदिर में हत्या देनी है। एक बार तो एटलीस्ट चेष्टा करके प्रयास करके देखेंगे कि यह जो विधि परिचालित नियति चक्र है उसकी गति ईश्वर के संकल्प और आर के क्रंदन से विचलित होती है कि नहीं? यदि जो जो प्रार्थना लेकर के भक्त जब आया है भगवान के दरबार में तो जब यह भक्त की आरती सुनकर के प्रार्थना सुनकर के यह जो विधि का चक्र है उसकी गति में परिवर्तित परिवर्तन होगा कि नहीं ठाकुर का जो जन्म और अभी जो फिर यह जो वृद्धावस्था और व्याधि ठाकुर को वृद्ध नहीं होना था। दैट इज इंटरेस्टिंग स्टोरी है। ठाकुर एक बार कहते हैं मां को आ मुझे वृद्ध होना नहीं है। उससे पहले ही मैं चला जाऊंगा। ऐसा ही नहीं कि कुछ बोले ठाकुर तो मां तो नेचुरली कि ये तो दक्षिणेश्वर के दिनों की बात है। जबकि ठाकुर पूरा अपने हेल्थ में फिट थे और ये सब भक्त लोग उनके पास में आ रहे उन दिनों की घटना है तो मां मां समझ गई कि ये ठाकुर अभी ये सब प्लान कर रहे हैं पहले से ही जाने का तो मां मां का तो कार्य है ना ठाकुर को रोकने का बेचारी वो तो ठाकुर को वैसे ही थोड़ी ना जाने देगी तो मां ठाकुर को समझा के कहते हैं ठाकुर कहते हैं कि मुझे बूढ़ा नहीं होना लोग बोलेंगे कि वहां पर दक्षिणेश्वर मंदिर में एक बूढ़ो एक वृद्ध साधु रहता है तो यह सब मुझे नहीं सुनना मुझे वृद्ध नहीं होना तो मां फिर उनको समझा करके कहती लोग ऐसा क्यों कहेंगे कि वृद्ध साधु रहता है। लोग तो ऐसा कहेंगे कि वहां पे एक प्रवीण साधु रहता है। अभी प्रवीण शब्द वृद्धों के लिए व्यवहार तो होता है किंतु थोड़ा सा एक डिग्निफाइड शब्द है। प्रवीण कौन है? माने जिसका उम्र बढ़ गया है और साथ में ही ये जीवन के जो एक्सपीरियंस है, जीवन की जो तपस्या है, उसने इस व्यक्ति को एक विज़डम प्रदान किया है। एक प्रज्ञा चक्षु इसके ओपन हो गए हैं जो कि लोगों को सहाय करता है। लोगों का मार्गदर्शक है। उसको लोग जनरली प्रवीण कहते हैं। तो अभी मां की तो वो गांव की लैंग्वेज है। तो मां कहती है कि पीरबिन प्रवीण का करती है पीरबिन। तो मां ठाकुर को समझा के कहती है कि लोग लोग ऐसा क्यों कहेंगे कि वहां पर वृद्ध साधु रहता है काली मंदिर में लोग तो कहेंगे कि वहां पर एक पीरबिन साधु वो खाने रहता है वहां पर रहता है तो ठाकुर यह सुनकर के वो बच्चे की तरह बिल्कुल हम तुम्हारा पिरबिन टिरबिन होते जाओ ना मैं तुम्हारा पिरबिन टिरबिन होने वाला नहीं हूं तो [हंसी] ठाकुर को पहले से ही ठीक करके रखे थे कि वृद्ध नहीं होना है तो किंतु एटलीस्ट चलो कि जन्म है वो जरा तो है व्याधि तो है जरा से यदि यदि मुक्त हुए तो एटलीस्ट व्याधि तो आकर के ठाकुर को पकड़ा है। जन्म, व्याधि और मृत्यु जरा से ठाकुर यदि बच जाते हैं किंतु व्याधि से नहीं बचने वाले हैं। मृत्यु से नहीं बचने वाले हैं। तो यह जो नियति चक्र है जो कि कंटिन्यूस वो हमेशा जो यह मृत्यु की ओर धावित होता रहता है। यह नियति चक्र क्या ये भक्त की पुकार से मां की आरती सुनकर के क्या वह रुकेगा कि नहीं रुकेगा? रामकृष्ण गत प्राणा सती की आंखों में आंसू आने से क्या इनका हृदय गलित होगा कि नहीं? तो यह टेस्ट करने के लिए फिर मां जाती है वहां पे तारकेश्वर। तो यह कहानी तारकेश्वर वाली अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: ठाकुर अपनी तस्वीर में वृद्ध दिखते हैं — हम लोग तो उन्हें वृद्ध ही मानते है. तो “बूढ़े न कहलाने” का उनका संकल्प असफल हो गया!
म 50 पे ही बूढ़े बोलते थे तो 60 पे क्या बोलते हैं? [हंसी] ठाकुर को वो टेंशन था। सरप्राइजिंग कि आज की दृष्टि से देखेंगे तो 40 और 50 के बीच का फासला कोई इतना बड़ा फासला नहीं है। स्वामी जी को जैसे चीर युवा माने इटरनल माने यूथ हम जैसे समझते हैं ठाकुर को हम हमेशा इस तरह से वृद्ध ही समझते हैं। व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि और इसके पीछे रीजन क्या है बताऊं? तो ये जो ठाकुर की जो कामरार पुकुर लीला है ना उसको ना हमने बहुत हद तक एक तरह से प्रोजेक्ट नहीं किया है। अभी आप देखिए ठाकुर का यूथ कैसे गया है। मैं बेलून मठ में था ना तो उस समय मैं एक साधु से बात कर रहा था तो मैंने कहा कि ठाकुर जब टीनएजर थे ना तो ऐसा करते थे तो वो थोड़ा सा नाराज होकर बोला ठाकुर को टीनएजर कैसे बोल दिया? मैंने कहा वह तो अब देखिए वह टीनज शब्द जो है उसके साथ में बहुत सारा कुछ कल्चरल जुड़ा हुआ है। किंतु एक्चुअल शब्द जो है दैट इज नॉट रिलेटेड टू दैट। म वह वो तो एक आपकी व्यव अवस्था है। पौगंड जैसे हम संस्कृत में कहते हैं कि वह बच्चा जो है अभी बड़ा हुआ है और युवा तो युवा एज अ टीनएजर। तो टीनएजर तो सिर्फ एक अवस्था को सूचित करता है और कुछ नहीं। किंतु हम लोग क्या है ना कि ठाकुर को मेंटली इस तरह के देखना चाहते हैं कि हां वो सिद्ध हो चुके हैं। दक्षिणेश्वर में गुरु के रूप में बैठे हुए हैं। उस ना ही साधक ठाकुर को देखना चाहते हैं ना ही वो प्री साधक ठाकुर जबकि काार कुकुर में इतनी मधुर लीलाएं किया करते थे। ना ही उनको देखना चाहते हैं। सो दैट इज अ प्रोजेक्शन प्रॉब्लम।
प्रश्न: भगवान कृष्ण के बारे में भी इसी तरह प्रोजेक्शन का प्रॉब्लम है
नहीं ठाकुर ने खुद ने कहा ना कि पूरा दल है कहता है कि मथुरा वाले कृष्ण ही सही वृंदावन वाले गलत अभी दूसरा भी दल है कि बोलेंगे वृंदावन वाले ही सही वो वाले गलत किंतु ना है किंतु एक्सेसिबल इजीली नहीं है बहुत कुछ माने पुष्टि मार्ग है चैतन्य महाप्रभु का संप्रदाय है बहुत कुछ मटेरियल है माने वैष्णव जो भाव साधना है उसमें इतना मटेरियल है कि आप लाइब्रेरी के बाद लाइब्रेरी भर सकते हैं। किंतु वही ना अनफॉर्चूनेटली हम लोग उसको एक्सेसिबल नहीं बनाते। अब जैनिज्म की मैं बात करता हूं। एक समय था मैं सोचता था जैन फिलॉसोफी को पढूंगा। किंतु ना मुझे एक मॉडर्न लैंग्वेज में प्रॉपर्ली मॉडर्न माइंड के अनुसार जैन फिलॉसोफी समझा सके। ऐसा कोई मिला ही नहीं। मतलब इस तरह की कोई किताब ही मुझे नहीं मिली। ऑन दी अदर हैंड बुद्धिज्म के बारे में देखिए। आज अमेरिकन लोगों को बुद्धिज्म सिखाने वाली बहुत सारी किताबें हैं जो कि हम पढ़ के हमको समझ में आ जाता है। जैन के बारे में मुझे मुझे तो एटलीस्ट नहीं मिली थी। सो प्रॉब्लम क्या है ना अभी ऐसा नहीं कि जैनिज्म में लिटरेचर नहीं है। लाइब्रेरी की लाइब्रेरी आप भर सकते हैं। इतना लिटरेचर है। द प्रॉब्लम इज कि लैंग्वेज और एक्सप्रेशन वो हमको एक्सेसिबल नहीं है। आज वेदांत का प्रचार स्वामी जी की वजह से ही तो है। हां किसको शंकराचार्य की टीका समझ में आने वाली है। रामकृष्ण संघ के साधु उसमें भी मुट्ठी भर होंगे जो कि प्योर संस्कृत या संस्कृत रूपी ट्रांसलेशन समझ पाएंगे। हम लोगों के लिए तो फिर स्वामी जी तो ठाकुर मा स्वामी जी ही तो उपाय है माने उपनिषद को एक्सेस करने का वो जो कहते हैं ना कि ज्योत से ज्योत जले तो आप किताब में कितना ही लिखा हो इससे इस तरह से अग्नि प्रज्वलित करना है इससे यह करना है वो किताब पढ़कर के तो अग्नि प्रज्वलित होगा नहीं ना किसी को तो अग्नि प्रज्वलित करना पड़ेगा फिर वो उसको पास ऑन करें तो चलेगा [हंसी] ठाकुर ने कहा ना मैंने खाना बना दिया अभी तुम लोग सब बने बनाए खाने पे खाना खा लो तुमको अभी खाने बनाने की मेहनत नहीं करनी है। हां खाना इट इज़ इज़ियर ना। म खाना बनाने से तो बहुत इजी है। [हंसी]
प्रश्न: आपने जो प्रलोभन वाले एक्सपेरिमेंट के बारे में बताया — मैंने पढ़ा है कि जिन बच्चों ने मिठाई की ओर देखना छोड़ दिया, वे सफल रहे; और जो मिठाई को देखते ही रहे, वे स्वयं को सँभाल नहीं पाए।
राजा महाराज के पास में एक लड़का आया था। राजा महाराज उस समय प्रेसिडेंट थे। बेलून मठ में थे। तो लड़का ना मस्कुलर था। मोस्ट प्रोबेबबली शायद ज्ञान महाराज ही थे। काफी मस्कुलर थे। तो जॉइ करना है तो जॉइ करना कि एज अ डिवोटी व्हाटएवर तो राजा महाराज उसका जो बाईसेप्स वगैरह है ना तो ऐसा-सा करके पकड़ करके कहते हैं वेरी गुड वेरी गुड वेरी गुड माने भरत की तो जो परिस्थिति थी उसमें इस तरह का एक मस्कुलर लड़का देखने को मिले तो मन थोड़ा चंगा हो जाता है ना फिर राजा महाराज कहते हैं कि देखो ये जो लोग जिम में जाते हैं ना कि पहलवानी सीखते हैं ना वो लोग बहुत हद तक काम के ये जो जोर है उससे बच जाते हैं तो उसमें लॉजिक क्या काम करता है बात ऐसा नहीं है कि एक्सरसाइज करने से आपका काम भाव कम हो जाता है। बात है कि आपका माइंड डायवर्ट हो जाता है। मैं बेलूर मठ में ज्वाइन करने को गया था पहली बार बिल्कुल तो वहां पे हमारा जो बेड है उसके ऊपर में वो रूटीन टंगा हुआ था। सुबह को 3:30 को उठना है। 4:00 बजे मंगल आरती है। फिर वो 4 से 5:30 जप करना है। वहां पे बैठ के मंदिर में फिर आपको 6:30 का उसके पहले फिर यहां पे हमारे ट्रेनिंग सेंटर में आकर के चेंटिंग और उसके बाद में योगासन। उसके बाद में 6:30 को ब्रेकफास्ट। फिर यह 7:00 से 8:00 बजे 1 घंटा तक वेजिटेबल कटिंग। फिर यह फिर से ट्रेनिंग सेंटर में आकर के वह थोड़ा सा वर्क करना है। कर्म योग गार्डन में काम करना है वगैरह। उसके बाद में स्नान, कपड़े धोना, उसके बाद में क्लासेस स्टार्ट होंगे। उसके बाद में भोजन तीन 3:30 को जो उठे हैं सीधा बाद में विश्राम मिलता है। भोजन के बाद आकर के कथामृत पाठ करना है। फिर एक घंटे का विश्राम सीधा 1:00 बजे एक से दो ढाई विश्राम और फिर 3:00 बजे से क्लास 2:30 बजे से क्लास स्टार्ट हो जाता है। एक से दो का विश्राम 2:00 बजे उठ जाना है। क्लास के लिए प्रिपेयर करना है। और वो जो उठे हैं सीधा अभी विश्राम होगा रात को 10:30 को। 10:30 को सोना है। 3:30 को उठना है। तो एक बार बेड में गिरते थे ना फट करके आंख लग जाती थी। फिर कोई यह इंसोमिया फिसोमिया की कोई बात ही नहीं है वहां पे कि बैठ के गप लगाओ ना कि यह करो कुछ नहीं। जैसे ही आपने लेटा फटाक करके आंख बंद हो गई। सीधा करके वो सुबह को मॉनिटर उठाने को आया। अरे उठो उठो मंगल आरती का टाइम हो गया। तो इसके पीछे बात यह नहीं है कि चटिंग करने से या उत्सव से आपका मन जो है वो उस उसकी ओर जाएगा नहीं। वह बात है कि आपने मन को एक पॉजिटिव डायरेक्शन में डाल दिया है। अभी आपके पास में अवकाश ही नहीं है वो सब कचरा सोचने का। ना इसीलिए तो कहते हैं ना कि एम्प्टी माइंड इज अ डेविल्स फैक्ट्री। [हंसी] खाली दिमाग शैतान का घर।
प्रश्न: आपने जो कहा इन्द्रिय संयम जब तक नहीं होता तब तक पुरुषार्थ, और वो हो जाने के बाद शरणागति -- इसे और थोड़ा समझाइये
यह जो हमने वो जो बात किया ना इंद्रिय संयम के साथ में अ बात ऐसी है कि तमस से रजस की ओर जाना है और रजस से सत्व की ओर जाना है। वह हमारा ट्रेजजेक्टरी है। तो यदि मैं तमस में पड़ा हूं और मैं शरणागति की बात करूंगा वो तो किसी काम का नहीं है। बोल के मुझे पुरुषार्थ तो करना ही होगा। और मैं पुरुषार्थ नहीं करूंगा तो मैं रजस में नहीं जाऊंगा। रजस में नहीं जाऊंगा तो सत्व में नहीं जाऊंगा। तमस्य सत्व की जर्नी इंपॉसिबल है। यानी कि पुरुषार्थ करके मुझे रजस में जाना है। तो वह तो हो गया फर्स्ट स्टेज। यह बात सिर्फ यह नहीं है कि मुझे इंद्रिय संयम करना है। क्योंकि ईश्वर की इच्छा के बिना ना ही ईश्वर के दर्शन होते हैं ना ही इंद्रिय संयम होता है। दोनों चीजें हैं। माने वैसा स्पिरिचुअल लाइफ इज कंप्लीटली इंपॉसिबल विदाउट ग्रेस। किंतु तमस में जब है तो हमारा उद्देश्य है रजस में जाना। तो उसके लिए पुरुषार्थ करना है। इंद्रिय संयम मेहनत करके करना है। परिश्रम करना है। साधना करनी है। जप ध्यान करना है। यह ये जो हमारा पीपीटीसी का रूटीन बेलूर मठ का कि वह 3:30 को उठकर के 4:00 मंगल आरती को जाना है। वगैरह करना क्यों है? रजस में जाने के लिए। इससे इंद्रिय संयम होता है। बट दैट इज अ बाय प्रोडक्ट। ये अल्टीमेट इंद्रिय संयम बिना कृपा के नहीं होने वाला। वो पूरा जो हमारा ट्रेनिंग सेंटर का बेलुरुर मठ का रूटीन था वो एक ही उसका लक्ष्य था कि जो हम लोग घर में जो तमस में डूबे हुए थे वहां से खींच करके हमको रजस में ले आए। एक बार रजस में आ गए। फिर हमको सत्व में जाना है। तो सत्व में जाने का रास्ता है शरणागति का। तो वो शरणागति का रास्ता सेकंड स्टेप में अपनाया। तो उसके बाद में जो है कि वह ईश्वर की कृपा होने वाली है। तो देखिए कि ना ही पुरुषार्थ करके कोई ईश्वर की कृपा होने वाली है। मतलब पुरुषार्थ करके ना ही इंद्रिय संयम होने वाला है। ईश्वर दर्शन होने वाला है। आत्म साक्षात्कार ना ही कोई शरणागति से कुछ होने वाला है। किंतु यह दोनों है एक स्टेप ऊपर जाने के लिए। पुरुषार्थ करके रजस में तमस में से रजस में आए। शरणागति से रजस में से सत्व में आए। तो वहां तक तो हमको आना है। ईश्वर की कृपा कब होगी, किसके ऊपर होगी, क्या होगी? वह तो फिर ईश्वर ही जाना है। वि इज अ कंप्लीटली पैरेलल ट्रिक।
प्रश्न: अर्थात, क्या हम कह सकते है की तमस से रजस की यात्रा में इन्द्रिय संयम आने लगता है?
इंद्रिय संयम एक इंडिकेटर है। आप यहां से दिल्ली जाएंगे तो माइलस्टोन आना शुरू हो जाएंगे। दिल्ली अभी 1000 कि.मी. दूर है। फिर दिल्ली अभी 500 कि.मी. दूर है। तो माइलस्टोन का अपना क्या उद्देश्य है? सिर्फ इतना ही बताना कि इतना जर्नी बाकी है। सो इंद्रिय संयम जो है वह दे आर लाइक माइलस्टोन। जब मैं 1000 कि.मी. दूर हूं दिल्ली से दैट मींस कि मैं अभी तमस में डूबा हुआ हूं। मुझे एटलीस्ट 500 कि.मी. दूर तक जाना है। वहां तक आ गया तो पता चला अभी मैं रजस में आ गया हूं। अभी मुझे ट्रैक चेंज करके दूसरा वो मेथड यूज़ करना है। सो इट इज़ लाइक अ इंडिकेटर।
प्रश्न: अत्यंत राजसिक स्वभाव वाले लोग — जैसे बड़े CEO या ओलंपिक एथलीट — इतने व्यस्त रहते हैं कि इंद्रिय-सुखों के लिए उनके पास अधिक समय ही नहीं होता।
और एट द एंड ऑफ द डे फिर से वह इंद्रियों का भोग करना शुरू भी करेगा। अब यह ईलॉन मस्क वगैरह देखिए ना वो एक्सआई भी बनाया है, टेस्ला भी बनाया है, वो रॉकेट भी आकाश में छोड़ता है और उसकी एक डजन पत्नियां भी है। सो इट इज़ नॉट लाइक ए हायर गोल आप उसको फॉलो करते हैं। बोल के आप काम या कांचन से मुक्त हो जाएंगे। किंतु एटलीस्ट वो जब तक हायर गोल अपने माइंड में पड़ा है ना वह डिस्ट्रैक्शन इतना पावरफुल है कि वो वो सब छोटी चीजों में मन जाएगा ही नहीं। सो जो आदमी ठाकुर कहते हैं ना कि वो शेर का एक सिंह का एक उदाहरण देते हैं। फिर और किसका एक उदाहरण देते हैं। वो सिंह जो है इतना बलवान इतना राजसी किंतु साल में सिर्फ एक बार वो रमण करता है। और वो जो दूसरा है छोटा सा कमजोर किंतु दिन रात रमण में पड़ा रहता है। सो क्या है कि है सिंह महाराजसी किंतु फिर उसका जो रजस जो है वो इतना डिस्ट्रैक्ट करके रखता है कि रमण सिर्फ साल में एक ही बार करेगा
प्रश्न: इसी लिए स्वामीजी manliness मर्दानगी की सराहना करते है
ये जो स्वामी जी के अमेरिकन डिवोटी है ना फ्रांसिस लेगेड सी ही इज़ सॉर्ट ऑफ एन आर्किटाइप कि स्वामी जी सोचते थे कि भारतवासियों को ऐसा एटलीस्ट ऐसा तो होना चाहिए कहीं आप रामकृष्ण होने को जाए भगवान राम या भगवान कृष्ण के साथ में अपनी कंपेयर करें। इससे पहले तो एक फ्रांसिस लेगेट जैसा तो बनो भाई इतना वो मल्टीमिलियर वो सक्सेसफुल बिजनेसमैन है। बेटी लेगेट के साथ में उसका एंगेजमेंट भी हुआ है उस समय किंतु माइंड जो है एकदम स्ट्रेट फॉरवर्ड एंड डिसिप्लिंड है कि यह बिजनेस है। उसको बिजनेस को सक्सेसफुल होना है। फिर पार्ट टाइम बाद में जो टाइम मिलता है बीवी के साथ में बिताना है। सो स्वामी जी कहते हैं यहां पे तुम लोग एक झोपड़ी में रहते हो। हर साल बच्चे पर प्रकट होते हैं। यह तुम लोगों का क्या संयम है? वो अपने को सात्विक कहलाते हो। सात्विक नहीं महातम तमस में डूबे हो। उससे तो वो रजस बहुत अच्छा कि वो मल्टीमिलियर है और नई दुल्हन के साथ में शादी भी किया है। किंतु उसका जो लाइफ है ना वो उस सॉर्ट ऑफ मने वो कंपार्टमेंट है कि जब तक रजस चलता है तब तक रजस ही चलेगा। फिर वहां पर वो काम कांचन को नहीं घुसाना है। माने दहिक सुख को वहां पर नहीं घुसाना है।
प्रश्न: ठाकुर जो कर्मनाशा नदी में डूब लगाने की बात करते है वो किनके लिए है?
हां वो वो आप रजस में जा चुके हैं। वह जो ठाकुर बार-बार कहते हैं ना कर्मनाशा नदी या झापला ही बाछला माने कर्मनाशा एक नदी है। एक बार डुबकी मारने से ही बचा। मेरे सब कर्म चले जाएंगे। अब ऑलरेडी तमस में पड़ा है। वो कर्मनाशा नदी में डूबेगा। वो क्या होगा? [हंसी] सत्यानाश हो जाएगा। देखिए मैं तो कहता हूं कि ठाकुर के पास में जो लोग एक बार आ गए हैं और एक सक्सेसफुल एक लाइफ लीड कर रहे हैं। सक्सेसफुल नॉट मल्टीमिलियनियर बट एक स्टेडी एक मिडिल क्लास लाइफ है। सो दैट मींस वी आर ऑलरेडी रजस में आ चुके हैं। इतना तो हम प्लेटफार्म बन चुका है अपना कि हम लोग तमस में नहीं है। जो तामसिक लोग हैं ना वो लोग ठाकुर के पास आकर के ज्यादा रह भी नहीं पाएंगे। वो एक म एक वो म ऑोजिट एक एक होगा कि यहां से चले जाते हैं। यहां से चले जाते हैं। ऐसा वो ठाकुर कहते हैं ना वो उनका एक डिवोटी आया साथ में कोई लड़के को लेके आया है। तो वो वहां पे बैठे-बैठे बोल रहा है अभी कहा कब चलेंगे? कब चलेंगे? तो ठाकुर बोलते हैं तुम एक काम करो बिल्डिंग बिल्डिंग देख के आओ जाओ। तो वो लड़का बोलता है मैं जाकर के नौका में बैठता हूं। तुम आओ जल्दी-जल्दी। [हंसी]
प्रश्न: दुर्योधन कहता मुझे पता है की अधर्म क्या है, पर में उससे मुक्त नहीं हो पा रहा हु
अपने पुराणों के जितने भी विलेन है, अब रावण रावण तो इतना बड़ा वेदज्ञ वे था। ऋषि का पुत्र था। फिर भी वह सीता का हरण करके बैठा है। यानी कि यह लोग एक तरह से रजस में तो आ गए हैं। किंतु फिर रजस में से भी सत की ओर नहीं जा पा रहे हैं। माने एक स्टेप तो उन्होंने ले लिया। तमस में से रजस में आ गए। तो इससे आगे वाला स्टेप बेचारा नहीं ले पा रहा है। लॉजिक वो उस लड़के की तरह वो सेकंड वाले लड़के की तरह लॉजिक तो बैठ गया है कि हां दो आइसक्रीम मिलने वाले हैं। किंतु बेचारा वो रेजिस्ट नहीं कर पा रहा है।
प्रश्न: लोकप्रिय कल्पना में रावण और दुर्योधन विलन माने जाते हैं। पर वे राजसिक थे। स्वामीजी कहते हैं— वास्तविक विलन राजसिक नहीं, तामसिक होते हैं। तमस, रजस से कहीं अधिक भयावह है।
स्वामी जी कहते हैं कि रामायण का वो कौन है? हीरो कौन है? तो वो लक्ष्मण नहीं है। इंद्रजीत है। मैं जब पहली हां स्वामी जी को ऐसा बोलते सुना मैं तो एकदम आश्चर्यचकित हो गया। लक्ष्मण से भी ज्यादा म उनकी रिस्पेक्ट इंद्रजीत के प्रति है। इंद्रजीत तो वो विलन था। अभी विभीषण के प्रति हो तो फिर भी समझते हैं। तो राम का भक्त था। इंद्रजीत तो वो तो मतलब पूरा विलेन था। तो नहीं वो इंद्रजीत इज अ ग्रेटर हीरो देन लक्ष्मण। इवन लक्ष्मण। [हंसी] क्लासिक विवेकानंद। वह जो माइकल मधुसूदन का जो एक महाकाव्य है ना मैं नाम भूल गया उसका वह स्वामी जी का बड़ा प्रिय था इंद्रजीत वध हां इंद्रजीत वध वो तो वो स्वामी जी का बड़ा प्रिय था तो उसमें से स्वामी जी मेमोराइज करके पूरा पूरा स्टांजा पूरा आवरत कर सकते थे मैंने पढ़ा नहीं है किंतु मैं अनुमान करके कह रहा हूं क्योंकि टाइटल यदि इंद्रजीत वध है तो फिर उसी के आसपास होगा और एक्चुअली इंटरेस्टिंगली पैराडॉक्सिकली यही माइकल मधुसूदन वो ठाकुर के पास पास आया था। तो एक्चुअली वो मथुर बाबू वगैरह का कोर्ट केस चल रहा है। यह गोरे लोगों के सामने है। तो एडवाइस देने के लिए माइकल मधुसूदन को बुलाया है। तो वो वहां पे आया काली मंदिर में तो किसी ने बोला ठाकुर के साथ में वार्तालाप कीजिए। तो ठाकुर को बुलाया गया। तो ठाकुर उसके सामने आकर बोलते हैं कि तुमने धर्म परिवर्तन क्यों किया? तो वो अपना पेट दिखा करके कहता है पेट के लिए यानी एंप्लॉयमेंट वगैरह। तो ठाकुर बोलते हैं कि मेरे मन में ना कोई बात ही नहीं आ रही है कि मैं उसको क्या बोलूं। वैसे जनरली ठाकुर के सामने ये केशव सेन वगैरह आ जाते हैं तो ठाकुर की बातों का फवारा खुल जाता है। यहां पे ठाकुर बोलते मेरे मन में बात ही नहीं आ रही कि मैं उसको क्या बोलूं? फिर वो साथ में कृष्ण किशोर ना कि कोई था। तो ठाकुर ने बोला कि तुम बोलो कुछ। तो बोला कि जो पेट के लिए खाने के लिए धर्म परिवर्तन करे उसके लिए साथ में क्या बात करना? तो म दोनों उन्होंने उसके साथ में बात नहीं की। और दैट इज ठाकुर यहां पे स्वामी जी है कि वो उसको एक महाकवि के रूप में पहचानते हैं और उसका जो इंद्र इंद्रजीत वध स्वामी जी पूरा मेमोराइज करके रखे हैं।
प्रश्न: ठाकुर का स्टैण्डर्ड बड़ा हाई था
उनका स्टैंडर्ड बड़ा हाई था। आईआईटी लेवल का था। वो आपको 99 ये सब उसमें से एडमिशन ही नहीं मिलना। स्वामी जी जैसे सर्व शिक्षा अभियान है।