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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

स्वामी का पैतृक निवास || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 28 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ॐ स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपि अवतार [संगीत] वरिष्ठाय रामकृष्णाय नमः श्री श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित स्वामीर भेटा पति का घर यह चैप्टर हमारा प्रार प्रारंभ हुआ है। वृंदावन वगैरह से वापस लौटने के बाद में गोलाप मां और योगिन महाराज मां को लेकर के कामारपुक जाते हैं। जैसे कि मां का वनवास प्रारंभ हो रहा है। ऑलमोस्ट 25 26 कि.मी. रास्ता मां को पैदल चलना पड़ा था। इतनी थक गई थी कि जब गोलाप मां ने थोड़ी सी खिचड़ी रंधी तो वह खाकर के मां ने कहा कि गुलाब तुम क्या अमृत ही तुमने रंधा है तो यह जो दुख और कष्ट के दिन मां के प्रारंभ हुए हैं। ऑलमोस्ट मां अकेली थी। मां की खबर लेने वाला सहानुभूति के दो शब्द कहने वाला। ज्यादा तो कोई था नहीं। एक दो थे जिनका उल्लेख बाद में आएगा। किंतु उनको छोड़कर के वहां पर और कोई नहीं था। तो वह एक हमने ऑलरेडी देखा है। अभी गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं? थोड़ा सा पाठ करते हैं। यह जो पूरा टॉपिक

श्री रामकृष्ण की महासमाधि के बाद रिश्तेदारों की उपेक्षा के बीच माँ सारदा की कामारपुकुर में तपस्या

हम देखेंगे उसमें महाराज जी कहेंगे हमको कि किस तरह से ठाकुर को पता चल गया था कि रामलाल दादा जो है मां की संभाल नहीं लेने वाले हैं। तो ऑलरेडी यह सब कहानियां हो चुकी है। ठाकुर जब काशीपुर में थे उस समय तो एक रिकैप जैसा गंभीरानंद जी यहां पर कर रहे हैं क्या कहते हैं श्री रामकृष्ण जोखन काशीपुर छिलेन तो दक्षिणेश्वरे काजेर अबोशरे भ्रातुष पुत्रो रामलाल एक दिन शेखाने आशीले तनी तहां के बोलीलेन श्री रामकृष्ण जब काशीपुर में थे तब दक्षिणेश्वर में कार्य में जब थोड़ा सा समय था उस समय अवसर मिलने मिलने से उनके जो भाई के पुत्र है भ्रातुष पुत्र रामलाल एक दिन काशीपुर आए तो ठाकुर ने उनको कहा तू भवतारिणी सेवा करी ता हले तोर अभाव थाकब बेना ठाकुर ने कहा तुम भवतारिणी की सेवा करना मां काली की पूजा करना जिससे कि तुमको किसी भी तरह का अभाव रहेगा नहीं आ श्री मायदी के मुख फेरैया बोली लेन और ठाकुर ने मां की ओर देखकर के कहा तुम ही कामार पुकुरे थेको तुम कामार पुकुर में रहना आर लखीर दिख के एक नजर रखो और लक्ष्मी की ओर थोड़ी सी नजर रखना ओके खेते देते हो बेना उसको खाना देने की आवश्यकता नहीं है हो सकता है कि लक्ष्मी दीदी का अपने से एक चूल्हा बना करके वहां पर अलग से खाना बना सकती थी हो सकता है ऐसा कुछ ठाकुर सोचते होंगे जो भी है तब से जेनो बाड़ी थे के कोथाव ना जाए उसको लक्ष्मी की ओर थोड़ा सा नजर रखना उसको खाना देने की जरूरत नहीं है किंतु यह देखना कि घर छोड़कर के और कहीं ना जाए आमा के भक्तरा जेमन भक्ति को छछे तो मा क्यों तेमनी भक्ति करबे भक्त लोग जिस तरह मुझे भक्ति करते हैं वैसे ही तुम्हारी भी भक्ति करेंगे। यहां पर देखिए लक्ष्मी दीदी के बारे में ऐसा क्यों कहा है कि यह नजर रखना कि घर छोड़कर कहीं ना जाए। क्योंकि उनका वैष्णव भाव था और इसकी वजह से पुरुष भक्तों के सामने यह जो पैरों में यह यह होता है ना पायल जिसको बोलते हैं उसको पहन के यह वैष्णव नाटक वैष्णव पदावली वो गा करके अभिनय करना यह सब उनको बहुत अच्छा लगता था बोल के और फिर क्या है कि भक्तों के साथ में तीर्थ यात्रा करने के लिए वह चली जाएगी अभी भक्त भरोसे वाले हैं तो कोई दिक्कत नहीं। वरना तो पता ही है कि अकेली स्त्रियों के साथ में क्या हो सकता है, क्या खतरा है। लक्ष्मी दीदी थोड़ी सी भाव प्रवण थी। थोड़ी सी सेंटीमेंटल ज्यादा थी। इसीलिए ठाकुर ने मां को कहा भी था। भले ही चाहे ठाकुर लक्ष्मी दीदी ठाकुर के सामने इस तरह से कीर्तन करतेकरते पदावली गान का गातेगाते यह सब ठाकुर के सामने अभिनय करके दिखाती थी। ठाकुर को आनंद भी आता था। किंतु ठाकुर ने मां को कहा था कि उसके ताल में ताल मिलाकर के तुम अपनी लज्जा को भांगना मत। स्त्रियों के लिए लज्जा ही आभूषण है। तो यह सब ऑलरेडी हमने देख लिया है। इसी कॉन्टेक्स्ट में शायद ठाकुर ने मां को कहा होगा कि यह देखना कि लक्ष्मी कहीं घर छोड़कर के ना जाए। और फिर क्या कहा? भक्तगण जिस तरह से मुझे भक्ति करते हैं, करते थे, इसी तरह से तुमको भी करेंगे। परे पुनर्बार रामलाल दादा के बोली लेन। उसके बाद में फिर से रामलाल दादा को कहा ठाकुर ने देखो तोर खुड़ी जेनु कामार पुकुरे थाके देखना कि तुम्हारी चाची कामार पुकुर में रहे रामलाल दादा उत्तर दिलन और जेने इच्छा होवे शेखाने थकबेन रामलाल दादा ने उत्तर दिया उनकी जहां पे इच्छा हो वहां पे रहे इहार तात्पर्य जो बुझते ठाकुर विलंब होो ना इसका का तात्पर्य समझने में ठाकुर को विलंब हुआ नहीं। ठाकुर ने इमीडिएटली समझ लिया कि रामलाल दादा क्या कहना चाहते हैं। ताई तनी भरसना कोहले इसलिए उन्होंने डांट करके कहा शे की रे यह क्या रे तू पुरुष मानुष होए छिस की जो तुम पुरुष तुम पुरुष हुए हो किस लिए वो जो पुरुष प्रधान समाज था स्त्रियों को इंडिपेंडेंस इतना नहीं था जितना कि आज हम टेकन फॉर ग्रांटेड कर लेते हैं। घर में कोई भी काम करना है तो पुरुष लोग ही करेंगे। स्त्रियों के म बाहर जाकर के जो कुछ काम करना है व्यवस्था करनी है पैसों के बारे में जो कुछ भी करना है वह सब पुरुष लोग ही करेंगे स्त्रियों का था बच्चों की परवरिश करना ये वृद्ध जो मां-पिताजी पति हैं उनकी सेवा करना घर की संभाल रखना बच्चों को परवरिश करना ये जो सब जेंडर रोल्स जो थे बड़े ही वो कहेंगे कि स्ट्रिक्ट थे बड़े ही ऑर्थोडॉक्स थे बोलकर के मां को किसी ना किसी की तो सहाय चाहिए ही जबकि बाहर का कोई काम करना है। घर के रिलेटेड यह कर वगैरह जो है टैक्स वगैरह माने बहुत सारा काम होता है घर में जो कि पुरुष ही को ही करना पड़ेगा उस तरह के जेंडर स्ट्रेटिफाइड सोसाइटी में जो कि स्त्रियां नहीं कर पाएगी। तो जब ठाकुर ने कहा कि देखना कि तुम्हारी चाची कामार पुकुर में ही रहे। कामरार पुकुर का घर जो है वह तो ठाकुर का घर है और उसका अर्थ तो यही हुआ कि ठाकुर का घर मां को वारसा में मिलने वाला है। तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा रामलाल दादा कहते हैं उनकी जहां इच्छा हो रहे। यानी कि उन्होंने ऑलरेडी हाथ धो दिया है कि मां की जवाबदारी मैं क्यों लूं। जिस तरह से काशीपुर में ठाकुर थे तो वैसे तो ठाकुर रामलाल दादा के चाचा थे। तो पिताजी के भाई तो इस हिसाब से ठाकुर को कैंसर वगैरह जो हुआ तो ट्रीटमेंट करवाने में उनको तो थोड़ा काम करना ही पड़ेगा सहाय करनी ही पड़ेगी किंतु क्या है कि ठाकुर के जो भक्तगण है गही और यह सन्यासी त्यागी इन दोनों ने मिलकर के ठाकुर की सेवा का पूरा भार ग्रहण कर दिया है। तो रामलाल दादा के मन में यह जवाबदारी में से निकल बचने की एक भावना ऑलरेडी शायद बन चुकी थी कि हां ठाकुर को इतना कैंसर हुआ। अभी उनका भतीजा होने के नाते मुझे जो करना पड़ा उचित था वो मुझे नहीं करना पड़ा है। तो यह लोग तो है तो सब तो फिर मैं चाची के लिए भी क्यों कुछ करूं? यह भक्तगण है। वे लोग सब सोचे वे लोग समझे। तो ऐसा जो रिस्पांसिबिलिटी में से भाग खड़े होने की एक उनके मन में शायद इच्छा होगी और जैसे ही उन्होंने कहा कि वह जहां पर रहना वह रहे श्री ठाकुर समझ गए कि वह अपनी रिस्पांसिबिलिटी से भागना चाहता है हाथ धो देना चाहता है जवाबदारी से तो ठाकुर ने उसको डांट करके कहा कि तुम पुरुष हुए किस लिए हो? पुरुषों का पुरुष प्रधान समाज है तो पुरुषों का तो कर्तव्य है। अपने लिए सब सुविधाएं जुटा करके बैठ गए हैं। किंतु फिर अब स्त्रियों का सभी अधिकार जो है वो उन्होंने यह कर दिया है। उन्होंने नलीफाई कर दिया है। अभी यदि उनकी जवाबदारी तुम नहीं लोगे तो फिर तो कौन लेगा? तो देखिए ठाकुर ने उसको डांट करके कहना पड़ा था। लक्ष्मी देवी वृंदावन माय शंगे छिलेन लक्ष्मी दीदी वृंदावन में मां के साथ में थी किंतु कामार पुकुरे जलेन ना किंतु वह मां के साथ में कामार पुकुर गई नहीं माने वो लक्ष्मी दीदी को ऑलरेडी समझ में आ गया था कि जिस तरह से ठाकुर की सेवा यह त्यागी और गृहस्थ भक्त कोलकाता में कर पाए थे उतनी उनकी अब खास करके ज्यादातर जो गृहस्थ भक्त भक्त होंगे वह तो मां को गुरु पत्नी है बोलकर के एक जो सुपरफिशियल रिस्पेक्ट देना है वह देते होंगे। दूसरा है कि यदि वह कामार पुकुर चली गई तो कामार पुकुर जाकर के कौन देखने वाला है? माने इतना तो त्यागी संतानों से भी संभव नहीं। दूसरा कि ये तपस्या की ये जो झड़ उनके जीवन में बह रही है। सबको तो दिखाई दे रही है कि कोई घर नहीं घर में नहीं रह रहा। ये हरि महाराज है, लाटू महाराज है, शरद महाराज है, शशि महाराज है, सुबोध महाराज है, गंगाधर महाराज है। सब तो अपना घर छोड़-छोड़ के अभी या तो प्रवरज्या में निकल रहे हैं या तो फिर वो भांग माने वो जो भूतिया मकान है वहां पे जाकर के रह रहे हैं। तो कामारबुर जाकर के मां की संभाल कौन लेने वाला है? तो लक्ष्मी दीदी को यह सब अंदाज आ ही गया होगा। मां के साथ में एक साल तीर्थ यात्रा की तो सब तो समझ ही पा रही होगी कि अंडर करंट्स क्या-क्या है यहां पे। तो उन्होंने यह ठीक ही निश्चय किया कि कामरार पुकुर जाएंगे तो कष्ट का अंत नहीं है। बेटर है कि दक्षिणेश्वर में बड़े भाई के साथ में रहे। वह तो मां काली के पुजारी है तो उनको तो धन का कोई अभाव नहीं रहेगा और उनको भी माने लक्ष्मी दीदी को भी माने भक्तगण आते रहेंगे। कोलकाता के सभी भक्तगण क्योंकि ठाकुर ठाकुर की जो निवास स्थान है ठाकुर का कमरा मां काली का मंदिर भवतारिणी का मंदिर यह जो कुलकुल करते बहती हुई गंगा यह उद्यान पथ पंचवटी यह बेलतला भक्तों का इतना स्ट्रांग एसोसिएशन यह सब स्थानों के साथ बन गया है कि लक्ष्मी दीदी वहां पर रहेगी तो सतत भक्त आते रहेंगे उनके मन की जो इच्छा है कि भक्तों का मैं संग करूं। भक्तों के सामने पदावली कीर्तन करूं। भक्तों के साथ में यह जो अभिनय वगैरह करना माने जो भी उनके मन की इच्छा है वैष्णव प्रबल वैष्णव प्रधान जो उनका भाव था वह सब दक्षिणेश्वर में हो सकता है। कामार पुकुर में जाएंगे। खाने-पीने का कष्ट देखने वाला संभाल रखने वाला कोई नहीं। तो मैं वहां पर जाऊं ही क्यों? तो लक्ष्मी दीदी ने कामार मां के साथ में वृंदावन तो एक साल रही किंतु फिर मां के साथ में कामार पुकुर गई नहीं तिनी संभवतो दक्षिणेश्वरे भ्राता दे शही थाकाई श्रेय मोने कोरिले उन्होंने संभवतः दक्षिणेश्वर में भाइयों के साथ में रहना ही श्रेय समझा अभी देखिए हमको भी एक प्रश्न होता है कि ठाकुर ने फिर मां को कमर पुकुर क्यों क्यों भेजा? क्योंकि दक्ष लक्ष्मी देवी का लक्ष्मी दीदी का जो लॉजिक है एकदम स्पष्ट समझ में आता है। अ ठाकुर की पत्नी होने के नाते मां शारदा देवी को वहां पर रहने की जगह तो मिल ही जाती। रामलाल दादा मां काली के पुजारी है तो फिर क्या है कि एक तरह का प्रोटेक्शन भी रहता और फिर यह भक्तगण तो कोलकाता से बार-बार आ सकते हैं। दक्षिणेश्वर आना सहज है। बहुत सारे मसल मेमोरी होती है ना वो भी डेवलप हो जाता है। मुझे याद है मैं मेरा क्लास था मेरा जो घर है उससे काफी दूर था और रास्ता जो है बड़ा ही सुंदर रास्ते से जाता था। एक ओर पैलेस है वहां के राजा का और दोनों ओर माने पैलेस का बहुत बड़ा ग्राउंड है। ब्यूटीफुल ग्राउंड है और दोनों ओर पेड़ जैसे हैं। तो क्या है कि मैं जब साइकिल ले जाता था बहुत सारा मेरा मसल मेमोरी पे ही साइकिल चलता था। क्योंकि प्रतिदिन तो उस रास्ते से जा रहा हूं तो मेरा माइंड जो है वो जो प्राकृतिक सौंदर्य है उसी में वो डूबा रहता था। मुझे अभी भी याद है कि उस रास्ते से मैं साइकिल चला के जा रहा हूं। मेरा माइंड कहां पे घूम रहा है। किंतु मेरे हाथ पैर जो है ठीक मुझे मेरे क्लास तक लेके जाएंगे। सो दैट मसल मेमोरी इज़ देयर। तो ये कोलकाता के भक्तों का दक्षिणेश्वर में आना वो सब मसल मेमोरी के लेवल पर गया है। पहली बार आप यदि जाते हैं कोई जगह पे तो आपको कॉन्शियसली डिसीजन लेना पड़ता है कि अच्छा पहले यहां से वहां जाएंगे फिर वहां से वहां जाएंगे। इस ट्रांसपोर्ट का यूज करेंगे। साइकिल, मोटर, घोड़ा गाड़ी जो भी है नौका तो पहली पहली बार आपको थोड़ा सा सोचना पड़ता है। किंतु 101 बार आपका आना जाना हो जाए तो वह ऑटोमेटिक हो जाता है। मसल मेमोरी हो जाता है। फिर आपके पैर आप जैसे घर से निकले आपके पैर ऑटोमेटिक उसी डायरेक्शन में जाना शुरू कर देते हैं। तो मां यदि खुद दक्षिणेश्वर में रहती तो फिर क्या है? भक्तों का आना जाना तो लगा ही रहता और त्यागी संतान भी आ सकते थे। नियमित रूप से मां का दर्शन करने के लिए तो वह वगैरह माने लक्ष्मी दीदी का जो लॉजिक है एकदम परफेक्ट लगता है। मां को ठाकुर ने कामार कुकुर क्यों भेजा इस बात का मैंने एक बार सोचा था मुझे पता नहीं। देखिए उत्तर हम अपनी इमेजिनेशन में से निकाल के 10 दे सकते हैं। राइट? ठाकुर ने खुद ने ऐसा कोई ठाकुर का लॉजिक है वैसे बताएंगे ठाकुर कि पर भाता हुआ भो भालो पर घरो हो हुआ भो नहीं माने दूसरों का अन्न खाना वो फिर भी ठीक है किंतु दूसरों के घर में रहना ठीक नहीं है हमको बिल्कुल वो क्या है उनके ऑब्लिगेशन में आकर के रहना पड़ता है ठाकुर ऐसा कहते हैं किंतु अगेन दक्षिणेश्वर भवतारिणी के मंदिर में मां के लिए जगह होना वह कोई असंभव सा मुझे नहीं लगता। यदि लक्ष्मी दीदी के लिए हो जाए तो फिर मां के लिए क्यों नहीं हो सकती? ठाकुर ने जाने के पहले ही यदि यह वहां उस समय कौन था? वो त्रैलोक्य बाबू थे तो उन लोगों को एक इशारा दे दिया होता कि मां यहां पर रहेगी तो हो सकता है वे लोग उसको मतलब रिस्पेक्ट पूर्वक मां को रखे भी सही। आई डू नॉट नो कि क्या सब अंडर करंट था। ठाकुर ने खुद ने मथुर बाबू को कहा है कि देखो तुम्हारी भक्ति इतनी है कि तुम्हारे जाने के बाद में फिर मैं यहां पर नहीं रुक पाऊंगा। तो मथुर बाबू बेचारे बड़े ही त्रस्त हो गए। बोले कहा कि आप चले जाएंगे तो फिर मेरे परिवारजनों का क्या होगा? तो फिर ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है तुम्हारी पत्नी है। तुम्हारा बड़ा लड़का है वो तब तक रहेंगे। तो अल्टीमेटली वही हुआ। मथुर बाबू की पत्नी और बड़े लड़के का देहांत हुआ तब तक ठाकुर थे और फिर जब छोटे लड़के के हाथ में जब गया पूरा मैनेजमेंट तो फिर ठाकुर को उसके बाद में तो कैंसर हो गया। उनको वहां से जाना पड़ा। तो ऐसा हो सकता है कि यह जो मथुरू बाबू के जो लड़के थे खास करके छोटा लड़का उसके मन में ठाकुर के प्रति द्वेष हो कि यह जो उनको बहुत ज्यादा प्रोमिनेंस मिल रहा है। बहुत सारे लोग उनको देखने के लिए उनका दर्शन करने के लिए आ रहे हैं। और फिर जो चीजों को मथुर माइंड नहीं करता था कि वह भट्टाचार्य जी वह वहां वहां का वह जो कोठारी था ना उसने वह लेटर लिखा था कि भट्टाचार्य जी महाशय भोग की पूरी बिल्लियों को खिला रहा है। तो वो सब मथुर को कोई फर्क नहीं पड़ता था। पता था कि बाबा मथुर तो ठाकुर को बाबा कहता था तो बाबा की स्पिरिचुअलिटी कितनी हाई है। वो सब उसको समझ में आता था। किंतु हो सकता है कि यह जो त्रैलोक्यनाथ है छोटा लड़का उसके मन में अभी यह सब द्वेष पनपने लगा हो ठाकुर के विरुद्ध में और इसीलिए ठाकुर को पहले ही समझ में आ गया हो कि सस्मान यहां पर रहना अभी मुश्किल है। तो यह सब सोचकर के शायद ठाकुर ने मां के बारे में कमर पुकुर रहने की व्यवस्था की हो। तो जो भी है यह तो सरफेस रीजन है। देखिए मुझे

माँ सारदा का कामारपुकुर - जयरामबाटी वास: ग्राम्य भारत में धर्म, त्याग और सेवा का पुनर्जागरण

दो-तीन डीपर रीजन क्या लगते हैं पता है? एक तो है कि रूरल रिजुनेशन। भारत का यदि उत्थान होना है तो गांव से होना है। शहरों में तो आप जितना स्पिरिचुअलिटी फैलाइए फैलता रहेगा। किंतु भारत की जो आत्मा है उस समय भी गांव में थी। आज भी देखिए कि अपना यह जो एथिकल स्पिरिचुअल रूट्स जो है ना वह हमारे गांव में वो किसान की झोपड़ी में ये खेत में या यहां पे सब हमारे कल्चरल और स्पिरिचुअल रूट्स है। यदि पूरे भारत देश का उत्थान करना होगा तो उसका जो एक जो अंश जो है कोलकाता में तो ठाकुर ने इतना कार्य किया किंतु गांव में भी यह कार्य करने की जरूरत है। ऐसा माने ठाकुर तो यह सब सोचते नहीं थे ना। मां भवतारिणी उनके मन के भीतर में यह सब दर्शन दे देती थी। माने इंस्टिंक्टिवली यह सब नॉलेज उनके भीतर में वह प्रकट करवा देती थी। तो हो सकता है कि इस तरह से कोई हायर सुपर कॉन्शियस इंस्टिंक्ट की वजह से हो ना कि मां ने मां काली ने दिए हुए कोई डायरेक्ट दर्शन की वजह से हो। ठाकुर के मन में शायद यह बात आई होगी कि गांव का भी आध्यात्मिक उत्थान करना आवश्यक है। तो मां जिस तरह से पहले तो कामार पुकुर रही और फिर बहुत लंबा समय मां ने जयराम भाटी में बिताया क्वालपाड़ा में बिताया। तो हो सकता है कि यह एक माने पर्पस हो सकता है। दूसरा कि हमने पहले भी डिस्कस किया था कि ठाकुर का जो विज़न था कि लंबे बालों वाली एक बाल विधवा एक छोटे से गांव में रहती है। म ठाकुर कहते हैं कि मैं ऐसा चाहता हूं कि इस तरह से रहना। फिर उनके पास में एक गाय है। गाय के दूध में से वो पायस बनाएगी और फिर भगवान कृष्ण को ऑफर करेगी। अपने मंदिर का दरवाजा बंद करके रो-रो करके भगवान कृष्ण के लिए वो प्रार्थना करेगी। ठाकुर का यह एक इच्छा था कि मैं इस तरह का लाइफ लीड करूं। तो हो सकता है कि ठाकुर की यह सत इच्छा को पूर्ण करने के लिए मां एग्जजेक्टली इसी तरह का लंबे बालों वाली विधवा बनकर के कामार पुकुर में रहे। तो दिस आर ऑल आवर इमेजिनेशन राइट सही में क्या है? लक्ष्मी दीदी का लॉजिक तो ठीक ही लगता है कि दक्षिणेश्वर में रहेंगे तो सब तरह से सुविधा है। कामरार पुकुर जाएंगे तो सब तरह से असुविधा है। श्रीजुक्त तो रामलाल श्री माय प्रासादनेर कोनो दायित्व तो ग्रहण करे नहीं। श्रीजुक्त तो रामलाल ने श्री मां के लिए खाने का व्यवस्था करने का कोई दायित्व तो ग्रहण किया ही नहीं। बरम एक विषम बाधा सृष्टि कोरिया राखिया छिले ऊपर से एक विषम बाधा सृष्टि करके रखी थी एक बहुत ही बड़ा अंतराय खड़ा करके रखा था रानी रास मणिर दौहित्र श्रीजुक्तो त्रैलोक्यनाथ विश्वास श्री मां के मासिक पांच साटकरिया टाका रानी रासमणि का पौत्र श्रीजुक्त त्रैलोक्यनाथ विश्वास श्री मां को महीने पांच से सात करके रुपया देते श्री माय वृंदावन अवस्थान काले रामलाल दादा काड़ी कालीबाड़ी खाजानची प्रवृत्ति के बुझाई लेन जे मां भक्तों दे निकट जथेष्ट अर्थ पान श्री मां जब वृंदावन में अवस्थान कर रही थी श्री मां के वृंदावन अवस्थान काल में रामलाल दादा ने कालीवाड़ी के खजांची वगैरह को यह उल्टा समझा दिया उल्टा मेरा शब्द है। यहां पे लिखा है समझा दिया कि मां भक्तों के पास में से यथेष्ठ अर्थ प्राप्त करती है। भक्तों के पास में से इनफ उनको दान दक्षिणा मिलती है। निह संतान विधवार पखे उहााई जथेष्ो निह संतान विधवा के लिए यह जष्ट है। यह पर्याप्त है। यही पर्याप्त है। सुतरान कालीबाड़ी टाका बंदो होइया गो इसकी वजह से कालीवाड़ी के रुपए बंद हो गए श्रीजुक्त तो नरेंद्रों स्वामी विवेकानंदो ओई टाका बंधो ना कोार्जुन नो अनुरोध कर लेन श्रीक्त नरेंद्र स्वामी विवेकानंद ने यह रुपया बंद न करने के लिए अनुरोध किया किंतु कोनो फल होइलो ना किंतु कोई फल मिला नहीं फल हुआ नहीं श्री मां शबा संवाद पया अवशेष वैराग भरे बोली कोहिले श्री मां ने संवाद मिल प्राप्त करके अशेष वैराग्य से भरपूर होके कहा बंधो कोरे छ को बंधो किया है करो करो एम ठाकुर ही चले गले ऐसे ठाकुर ही चले गए टाकमी और की करबो पैसा लेके मैं और क्या करूंगी देखिए यह यही रामलाल दादा कि ये यह सब उन्होंने कब किया होगा? 16th अगस्त को ठाकुर की महासमाधि हुई। सितंबर में मां वृंदावन यात्रा की है। यानी कि सितंबर यानी नाइंथ महीना हुआ। जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर नाइंथ महीना हुआ। सितंबर या अक्टूबर या नवंबर ऐसे 9 10 11 पहली जनवरी को यही रामलाल दादा को ठाकुर ने स्पर्श करके इष्ट दर्शन करवाया है। यही रामलाल दादा ने पहली जनवरी से लेकर के यह 9 10 11 महीने के भीतर में ही यह कांड कर दिया। देखिए इसीलिए जो हम लोग स्वामी जी का लाइफ में पढ़ते थे ना कि मास्टर महाशय स्वामी नरेंद्र को कहते हैं कि यह जो नित्य गोपाल है वो कितना उसका भाव होता है तो स्वामी जी ने सामने एकदम फटाक करके बोल दिया भाव होने से ही क्या आदमी बड़ा हो जाता है तुम ये आप यह देखिए यह काली है हरी है यह लाटू है उन सबको देखिए शरद है शशि है कितना त्याग है उनके भीतर में बिना त्याग के जीवन माने भाव वगैरह किसी काम के नहीं। तो फिर मास्टर महाशय कहते हैं कि हां हां हां उन्होंने ठाकुर ने कहा था कि वो एकानंकार नहीं वो यहां का नहीं है वो अपना नहीं है वो बहिरंग है तो देखिए कि यह भाव हो जाने से ईश्वर के दर्शन हो जाने से कोई आध्यात्मिक जीवन में हमने बड़ी तोप मार दी हो ऐसा कोई गारंटी नहीं है। 10 महीने 11 महीने के भीतर में ही यही रामलाल दादा ठाकुर से दर्शन प्राप्त करके मां के पैसे रुकवा देते हैं। तो और फिर मां कहती है देखिए किंतु मां ने जो कहा इससे भी महत्वपूर्ण है बंद किया तो किया ऐसे ठाकुर ही चले गए। अभी मैं रुपए ले क्या करूंगी? यह जो मां के हृदय में जो वैराग्य की अग्नि वैराग्य रूपी यह जो दावानल प्रज्वलित हो रहा था उसके भीतर में यह सांसारिक कंसीडरेशन कहां चले गए, कहां अदृश्य हो गए समझ में ही नहीं आता। और दूसरी बात है देखिए कि मां तो अन्नपूर्णा लक्ष्मी साक्षात है। मां के लिए ₹7 क्या? यह तो वो वाली बात हो गई यह कि वो मथुर बाबू वो जो राधाकांत के मंदिर में से गहने चोरी हो गए। तो मथुर बाबू जाकर के राधाकांत के मंदिर में जाकर के भगवान के सामने कहते हैं कि अरे आप कैसे भगवान है क्या आप अपने खुद के गहनों की रक्षा ना कर पाए तो ठाकुर ने आकर के उसको डांट के कहा क्या बेतुकी बातें कर रहे हो ये गहनों का मूल्य ये सोना हीरा जवाहरा तुम्हारे ही लिए है जो कि तीनों लोक के स्वामी है भगवान विष्णु स्वयं मां लक्ष्मी जिनकी वो सेवा करती है उनके लिए ग्रह नक्षत्र जिनकी सेवा में हमेशा खड़े रहते हैं पूरे विश्व ब्रह्मांड जिन्होंने अपने मुंह में मां यशोदा को दिखा दिया है उनके लिए यह तुम्हारे यह सोना चांदी हीरा जवेरा तो पत्थर के टुकड़ों के अलावा कुछ नहीं है। तो यह सब चीजें हमको लगता है कि अरे ₹5 बंद कर दिया ₹7 बंद कर दिया। रामलाल भी मन में मन में बड़ा खुश होता होगा कि मैंने एक तोप मार दी है। किंतु यही रामलाल फिर और यही लक्ष्मी यही लक्ष्मी दीदी और फिर मां बहुत सालों के बाद में मां जब उद्बोधन में है माने पूरा रामकृष्ण संघ हाथ जोड़कर के मां की सेवा में खड़ा है। उस समय फिर अभी तो इन लोगों को ईर्ष्या हो रही है कि ठाकुर के असली वारसदार तो हम है। पुरुष होने का यह जो अभिमान है स्वामी जी के साथ में ऐसा ही हुआ ना कितना माने यह जो पुरुष लोग थे उस समय के कुछ-कुछ कितना घटिया मनोभाव था उन लोगों का यह जो स्वामी जी के पिताजी के भाई जो कि नौकरी-फोकरी नहीं करते थे बिना किसी काम के तामसी एक नंबर के वो थे कामचोर जिसको कहते हैं तो स्वामी जी के स्वामी विवेकानंद के पिताजी ने विश्वनाथ दत्त ने अपने भाई को अपने घर में पनाह दी। अभी जब उनका मृत्यु हुआ तो एक्चुअली क्या है कि लीगली तो विश्वनाथ दत्त के पत्नी और पुत्रों को वो घर वगैरह मिलना चाहिए। प्रॉब्लम यही है कि वो इन्होंने क्या किया? जो कामचोर भाई था वो घर तो उन्होंने ये ले लिया। माने उस पर कब्जा कर लिया और इन लोगों को घर से निकाल दिया। ये किस तरह की ये पुरुष मेंटालिटी थी उस समय की। भयानक विषाक्त मेंटालिटी थी। माने स्त्री और बच्चे इन लोगों का कोई उनको सम्मान ही नहीं था। एक राक्षसी मेंटालिटी होने से ही तो भारत का ये अवनति हुई है। हम क्यों ये अफगान से आए हुए घोड़ेसवारों को हम बदनाम करें कि उनकी वजह से हम गुलाम हुए। ये वो स्टीम बोट में आए हुए यूरोपियन को हम गाली दें कि उन्हीं की वजह से हमारा अधपतन हुआ। ये हमको तो अपने खुद के समाज के भीतर में देखना है। ये जो सब विषाक्त प्रथाएं ये सब टॉक्सिक ये जो सब ट्रेट हमारे भीतर में प्रवेश कर गई थी कि पुरुष के पास में सभी तरह की सत्ता है। स्त्रियों का बच्चों का जिस तरह से चाहे शोषण कर सकता है। ये और ये लोगों के लिए नेचुरल था। माने उनका रैशन भी ठीक था कि वह तो मनुष्य के भीतर में है ही नहीं। जब स्त्री विधवा होती है तो दुनिया भर के उसको नियम का पालन करना है। पुरुष यदि विधुर होता है उसकी पत्नी का मृत्यु होता है तो बढ़िया बिंदास मजे से दूसरी तीसरी चौथी शादी करके वो रहेगा। तो जितने भी धर्म का पालन करना है स्त्रियों को करना है। जितनी भी तपस्या करनी है स्त्रियों को करनी है। जिनका अधिकार शोषण करना है वो स्त्रियों का करना है। ये जो पुरुष प्रधान देश बोलकर के हमारे भीतर में यह सब हुआ था। बोल के तो भारत का ये अधः पतन हुआ। तो यहां पे भी वो भले ही चाहे वो सोचते होंगे कि मैंने अपना पुरुषत्व दिखा दिया। रामलाल दादा सोचते होंगे किंतु जो मैं कहने वाला था कि जब उद्बोधन की रचना हुई। पूरा रामकृष्ण संघ मां के सामने हस्त जोड़ करके उनकी सेवा के लिए खड़ा है। तब ये उनके मन में फिर ईर्ष्या प्रकट हुई कि अच्छा ठाकुर के असली वारसदार तो मैं हूं। यह वो उनकी स्त्री के पीछे क्यों इतने लोग घूमते हैं? तब फिर वो कंप्लेन करना शुरू कर दिया कि मां शारदा जो है हमको देखते ही नहीं है। हमारी केयर नहीं रखती। तो मां ने स्वयं यह बात कही है कि देखो आजकल ये लोग कह रहे हैं लक्ष्मी और ये रामलाल दोनों कि मैं उनकी केयर नहीं करती। मैं उनकी संभाल नहीं रखती। किंतु ठाकुर के जाने के बाद के दिनों की बात है। मुझे कंप्लीटली संपूर्ण रूप से अकेली वहां पे छोड़ के ये लोग चले गए थे। एक दिन मां ने आकर देखा कि ये रामलाल दादा आए हैं वहां पे कामार पुकुर और फिर क्या किया कि उनका जो हिस्से का घर था वो बेच दिया और फिर वो भाड़े पे दे दिया ना कि बेच दिया ऐसा ही कुछ हुआ बस मां के हाथ में वो जो एक छोटा सा झोपड़ी जैसा था बस वही मां के लिए छोड़ दिया बाकी सबकी कुछ उल्टीपुल्टी व्यवस्था करके वहां से चले गए मां को कंसल्ट तक नहीं किया था तो मां स्वयं यह बात कहती है आज ये लोग बड़ी कंप्लेंट करके घूमते हैं कि मैं उनकी संभाल नहीं रखती किंतु एक समय था कि उस उन्होंने मुझे संपूर्ण रूप से तर छोड़ दिया था। मां खुद यह बात कहती है। तो यहां पर देखिए मां कहती है बंद किया है तो भले करे। ऐसे ठाकुर ही चले गए। पैसा लेके मैं और क्या करूंगी? मां ने यही बात वो अस्थि के बारे में भी कही थी ना। अस्थि को लेकर झगड़ा हुआ। तो फिर किसी ने कहा कि मां ये अस्थियों को लेकर के रामबाबू ऐसा कह रहे हैं जो फिर त्यागी संतान ऐसा कर रहे हैं तो मां ने कहा कि ऐमन सोनार ठाकुर ही चले गले छाई नहीं है किनो झगड़ा कर छ म इस तरह के सुवर्णमय सोने के ठाकुर ही चले गए राख को लेकर के झगड़ा क्यों कर रहे हैं तो मां के हृदय में ये जो वैराग्य की जो दावानल है जिस तरह से प्रज्वलित हो रही थी ए के

कामारपुकुर में माँ सारदा ने अपने हाथों मिट्टी खोदी और सब्ज़ियाँ उगाकर जीवन चलाया

भक्तरा स्थिर कोरिया छिल गुरु पत्नी के मासिक दोष टाका कोरिया दीन यहां वहां पर भक्तों ने स्थिर किया था ठीक किया था कि गुरु पत्नी को महीने ₹1 करके दे देंगे किंतु कार्ज तो किु ही हो ना किंतु कार्य में परिणत करने के समय कुछ हुआ नहीं वही बात है कि यदि नजर के सामने होती मां कोलकाता में तो फिर भी एक थोड़ा सा रहता किंतु जब वो कामारपुर चली गई तो फिर आउट ऑफ साइट आउट ऑफ माइंड जैसा हो जाता है ना प्लस दूसरा यह भी है भक्तों को पूरी गाली देने की जरूर जरूरत भी नहीं इतनी क्योंकि ठाकुर के जाने के बाद में सभी के भीतर में एक वैराग्य का दावाग्नि प्रज्वलित हो गया था। यह सिर्फ त्यागी संतान ही नहीं गृहस्थ संतानों के भीतर में भी यह रामबाबू वही जो स्वामी जी की लाइफ के समय हमने डिस्कस किया था। नरेंद्र मास्टर महाशय को कहता है कि रामबाबू ने मुझे सीक्रेटली कहा है कि दो ही साल में वह घर छोड़ देंगे। तो मास्टर महाशय थोड़े से क्यूरियस होकर पूछते हैं। अच्छा वो म किस तरह से बीवी बहने उनकी जो बच्ची है उसका विवाह हो जाने के बाद में करेंगे कि क्या करेंगे क्योंकि हो सकता है मास्टर महाशय के मन में भी यही सब अभी चल रहा है कि कैसे घर छोड़कर के ये सब झमेले में से निकले तो वो सामने पूछ रहे हैं कि किस तरह की व्यवस्था कर करके निकलने वाले हैं। तो माने त्यागी संतान ने तो घर छोड़ा ही छोड़ा है। जो गृहस्थ संतान भी थे ठाकुर के उन्होंने उनके मन में भी अभी यह त्याग का यह जो भाव जो है इतना स्ट्रांग हो गया था कि फिर उस समय यह सब मैनेज करके कि हां मां को ₹10 देना है तो इससे उघराओ रुपया इससे ₹2 इकट्ठा करो इससे ₹2 इकट्ठा करो सब जाके फिर कामार पुकुर पहुंचाओ यह सब किसी के मन में रहेगा ही नहीं बात की बात है जब यही बाद में ही यहां पे ही आता है कि जब लोगों को पता चला कि मां को वहां पर इतना कष्ट हो रहा है। तब लोग कहते हैं कि हमको तो पता भी नहीं था कि मां को कामार पुकुर में भात में देने के लिए नमक भी नहीं मिलता। तो दोनों ओर से है ठाकुर ने क्यों मां को कामार पुकुर भेजा वही एक सबसे बड़ा आश्चर्य सो एनीवे इहा अत श्री माय कामार पुकुर जीवन शुंग न है अति निहंबल छिलो इसी वजह से श्री मां का कामार पुकुर का जीवन सिर्फ निहिसंग नहीं था अत्यंत निहसंबल था निहिसंग अर्थात कि अकेलापन से भरपूर सा संग नहीं है जिसमें इसको कहते हैं निसंग और निसंबल अर्थात कि माने जो माने यह नहीं है सल अर्थात कि पैसा या वही जो चीजें सब जीवन धारण करने योग्य चीज है तो सिर्फ निहिसंग नहीं था किंतु साथ में ही निहंबल था अकेले ही मां नहीं रहती थी किंतु उपाय हीन होकर के रहती थी। दरिद्र अवस्था में मां रहती थी। श्री रामकृष्ण एकदा ताहा के बोलिया छिलेन श्री रामकृष्ण ने एक बार मां को कहा था तुम ही कामार कुकुरे थाकबे तुम कामार कुकुर में रहना शाक बुनबे सब्जी उगाना शाक भात खाबे और हरि नाम करबे शाक भात खाना और हरि नाम करना ठाकुर को खुद को करने का होता तो पता चलता [हंसी] इहा आदेश ना होले हो जुगावतारे इच्छा बा श्री माय जीवन धारण एकटा उपाय निर्देश यह आदेश न होने पर भी थी तो क्या युगावतार की इच्छा या तो फिर जीव श्री मां के जीवन धारण करने का एक उपाय निर्देश माने ठाकुर ने आदेश करके तो नहीं कहा था कि तुम ऐसा ही करना किंतु क्या है कि ठाकुर इस तरह के जो भी उनको मां को सजेशन देते थे मां उसको आदेश के रूप में ही स्वीकार कर लेती थी तो तो फिर जब ठाकुर ने कहा तो फिर युगावतार की इच्छा है बोल के मां वहां पर गई और फिर मां के जीवन धारण करने का यह एक उपाय है। यह देखिए जो सब्जी बुनने की बात है ना सब्जी उगाने की बात है कि लक्ष्मी दीदी तो मां के साथ में तो कामार पुकुर गई ही नहीं। रामलाल दादा के साथ में मिलकर के मां की तो एक तरह से अवज्ञा ही की है बाद में और सिर्फ इतना नहीं जब वो कामारपुर जाती थी लक्ष्मी दीदी माने वो एक फ्लाइंग विजिट करने के लिए तो क्या है मां जिस बागान में ये सब्जियां वगैरह वो उगाने को रखती थी वहां पे पैर से जाकर के सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देती थी जैसे कि सब्जियां उग ना पाए तो इस तरह का उनका मां के साथ में माने दुर्व्यवहार था ये पढ़ मैंने मैंने जब पहली बार पढ़ा मुझे इतना आश्चर्य हुआ था कि अरे म यही लक्ष्मी दीदी मां के साथ में नहबत में रही है। मां का इतना स्नेह प्राप्त किया है। फिर ये लोग ऐसा सब क्यों करते हैं? किंतु जो भी है अभी म आखिर में अल्टीमेटली सब ठाकुर की इच्छा बोल के ही तो हमको उड़ा देना है और क्या है श्री मां के जिनो से बा को सफल करी बार जन एक काले ठीक ओई भाबे दिन काटते होया छिलो श्री मां को जैसे कि इस वाक्य को सफल करने के लिए ही एक समय ठीक इसी तरह से दिन बिताने पड़े थे। अह वही जो मैंने वह कहानी अह लीला प्रसंग में है। लंबे बालों वाली विधवा वाली कहानी वह भी माने जैसे कि ठाकुर जैसे कि मां के माध्यम से यह सब कहानियों को प्रैक्टिकल म अप्लाई कर रहे हैं। ऐन दिनों छे जो शुद्ध दुटी भात सिद्ध होया छे किंतु लबण जोटे ना ऐसे भी दिन गए हैं कि सिर्फ थोड़ा सा भात तो बना है किंतु मने नमक मिला नहीं है भात पर डालने के लिए।

“पराए घर में मत रहना” — श्रीरामकृष्ण की इस आज्ञा को माँ सारदा ने जीवनभर निभाया

दीर्घ काल पर विभिन्न सूत्र ए संवाद प्रचारित होलेले भक्तगण श्री मां के कोलकाताई लो आशीले बहुत समय के बाद में विभिन्न सूत्रों से यानी कि जो लोग कामरार पुकुर विजिट के लिए गए होंगे उनके मुंह से यह सब संवाद प्राप्त करके यह संवाद प्रचारित होने से भक्तगण श्री मां कोलकाता ले आए किंतु शेपरेर को था किंतु वह सब बाद की बातें हैं। आपातो श्री मां अवशेष कोष्ट सहज करियाओ ठाकुर भिटाई पिया रही म फॉर द मोमेंट आपातत म उस समय के लिए तो श्री मां अशेष कष्ट सहन करके ठाकुर के घर में पड़ी रही निज दुखेर कथा कहा ये तो टुकु जाना लेना अपने दुख की बात किसी को इतनी सी भी बताई नहीं कारण तखनो तहार काने ठाकुर शेष आदेश बाजीते छिलो कारण उस समय भी उनके कानों में ठाकुर का वह जो आखिरी आदेश है वह बज रहा था वो सुनाई दे रहा था देखो देखना कारो काछ एक्ट पैस जन्यो चित हाथ करो ना किसी के सामने एक पैसों के लिए भी हाथ फैलाना मत तुम्हार मोटा भात कापड़े भाव होवे ना तुमको सामान्य भात और कपड़ों का अभाव होगा नहीं। एकटी पैसा जन्यो जदी कारो काचे हाथ पातो तबे तार काछे माथा टिके ना होए थकबे एक पैसों के लिए भी यदि किसी के सामने हाथ फैलाओगी तो उसके सामने माथा सब समय नत होकर के रहेगा। सब समय उनके सामने नतमस्तक होकर रहना पड़ेगा। और फिर एक बात करते हैं परम परो भाता भो माने दूसरों का भात खाना फिर भी ठीक है पर घरो भो नहीं दूसरों के घर में रहना तो बिल्कुल ठीक नहीं तो मा के भक्तराज जेखाने ही निजे बाड़ी ते आदर कोरे राुक ना केनो तुमको भक्तगण भले ही चाहे किसी के भी अपने किसी के घर में आदर करके रखे ना क्यों कामार पुकुरे निजेर घरोखानी कनो नष्ट कोरोना कामार पुकुर में अपना घर कभी भी नष्ट मत करना। देखिए यह जो ठाकुर का आदेश है मां ने संपूर्ण रूप से पालन किया था। या तो फिर कहेंगे कि पालन करने का प्रयास किया था। किंतु फिर कामार पुकुर में जिस तरह से मां को कष्ट मिलना प्रारंभ हो गया है। यह सब कहानियां आएगी बाद में। और फिर जब यह श्यामा सुंदरी देवी और फिर क्या है? भक्तगण मां को बीच-बीच में कोलकाता ले तो जाते हैं। किंतु यहां पर तो स्पष्ट लिखा है ना कि भले ही चाहे भक्तगण तुमको अपने घर में ले जाकर के आदर सम्मान पूर्वक रखें। कामरार कुकुर में जो अपना घर है उसको कभी छोड़ना मत। उसको कभी नष्ट ना करना। इसको एक थोड़ा सा अलग तरीके से फिर इसका हुआ एप्लीकेशन कि जब श्यामा सुंदरी जब आई मां की मां कामार पुकुर में देखा कि मां ने फटी हुई साड़ी पहन के एक मजदूरन की तरह कार्य करके माने उनको रहना पड़ता है तो फिर उनसे देखा नहीं गया और फिर मां शारदा को अपने घर जयराम बाटी ले आई तो क्या है कि रही तो मां पूरा जीवन भर आप कह सकते हैं कि वही जयराम बाटी में किंतु फिर बीच-बीच में कोलकाता आती थी। देखिए मां के मन में यह बात कितनी स्पष्ट थी। काशी गई है और काशी से [गला साफ़ करने की आवाज़] वहां के जो पंडा है वो मां ने सबको दक्षिणा वक्षिणा देकर खाना बाना खिला के सबको संतुष्ट किया था। भंडारा भंडारा देकर के। तो पंडा लोग पूछ रहे हैं कि अच्छा मैया आप कहां से आई है? तो किसी ने कहा अरे कोई एक साधु था तो उन्होंने थोड़ा सा नाराज होकर पूछा वो कहां से आई है यह सब आपको जानने की क्या जरूरत है ऐसा थोड़ा नाराज हो के बोल दिया तो फिर मां का जैसा था वो मृदु स्वर से वो गुलाब मां को बोलेगी फिर गुलाब मां वो चिल्ला करके और किसी को बोलेगी तो फिर मां ने मृदु स्वर से कहा अरे नहीं नहीं कहो मैं कामरारु से आई हूं कामारपुक या जय राम भाटी मां क्या बोली अभी मुझे एग्जैक्ट याद नहीं आ रहा है किंतु स्पष्ट रूप से का मुझे इतना पक्का याद है कि कलकत्ता उन्होंने माने नहीं कहा तो क्या है कि मां के मन में यह बात स्पष्ट थी। एक गांव के साथ में जो आइडेंटिटी रखना है, गांव में जो अपना घर है, उसको हमेशा के लिए मेंटेन करके रखना है। मां के मन में यह कांसेप्ट एकदम स्पष्ट था। इसीलिए भले ही चाहे मां के खुद के लिए बाद में उद्बोधन का निर्माण किया गया हो। उसमें भी मां परमानेंट नहीं रहती थी। कितनी बार हुआ है कि मां बीमार है जय राम भाटी में ऐसा संवाद शरद महाराज के पास में आया है। शरद महाराज स्वयं मां को लेने के लिए कि मां आप कोलकाता आइए आपकी संभाल रखेंगे। आपकी सेवा करेंगे। आपकी ट्रीटमेंट करेंगे। किंतु मां जैसे ही शरद महाराज आए हैं तो मां का बुखार बुखार जैसे कहां अदृश्य हो जाता है और फिर मां सबकी सबके लिए खाना बनाने की सबकी सेवा करने की मां टेंशन में आ जाती है। मां एकदम बुखार छोड़कर के खड़ी हो जाती है और सबका माने सबके लिए खाना बनाना शुरू कर देती है। और फिर आखिर में शरद महाराज को कहती है अभी तो मैं नहीं जाऊंगी। अभी इस बार तुम जाओ वापस फिर कभी आऊंगी। तो [हंसी] मां के मन में एकदम स्पष्ट था कि ये जो गांव के साथ में आइडेंटिफिकेशन और सिर्फ इतना नहीं बिल्कुल आखिरी बार मां जब कोलकाता जाती है माने मां की बीमारी इस हद तक बढ़ गई थी कि अभी सबको लग रहा था कि यह बीमारी शायद मां की आखिरी बीमारी है और इस बार जब मां कोलकाता यात्रा करेगी तो वह आखिरी यात्रा होगी। उस समय माने प्रस्थान करने के समय यह जो सभी लोग तैयार है अभी वह बैलगाड़ी में बैठकर के निकलना ही है वहां से यह जो यात्रा सिद्धि राय का जो मंदिर है वहां पे जय राम भाटी में तो वहां पर जाकर के वो जो बैलगाड़ी में चढ़ना ही है। उस समय मां ने झुक करके गांव की धुली को अपने हस्त में ग्रहण करके फिर कहा था कि जननी जन्मभूमिश स्वर्गात अपि गरियस जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महत है गरियमान है गरिमामय है मां के मुंह से यह बात देखिए कितनी माने महत्वपूर्ण है यानी कि ये गांव की धरती गांव की मिट्टी ठाकुर ने जैसे कि मां को कहा कि कामार कुकुर का घर तुम कभी मत छोड़ना। तो अभी जिस तरह से चला घटना प्रवाह मां को बेचारी को कामार पुकुर में तो नहीं रहना हुआ माने नहीं रह पाई। भले ही चाहे कितना ही प्रयास किया हो विधि के विधि का वैचित्र जो भी है मां को नहीं रहने दिया गया वहां पे किंतु जयराम भाटी में तो मां रही है और जयराम भाटी को मां अपनी जन्मभूमि के रूप में गिनती है जन्मभूमि कर्मभूमि तो यह देखिए कि ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि लोग भले ही चाहे तुमको अपने घर में लाकर के आदर पूर्वक कुछ कुछ दिनों के लिए रखें तुम अपना घर जो है कभी छोड़ना मत तो यह टॉपिक यहां पर समाप्त होता है। उसके बाद में नेक्स्ट टॉपिक प्रारंभ होता है उस समय का कामार पुकुर। उस समय का कामार पुकुर कैसा था? किस तरह से लोग रहते थे वहां पे? यह सब कहानियां प्रारंभ होती है। और उसके बाद का जो टॉपिक है कि कामार पुकुर में मां का जीवन। तो अभी यह टॉपिक अभी हम नेक्स्ट क्लास से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

एक भक्त: यदि लक्ष्मीदीदी कामारपुकुर में माँ सारदा के साथ रहतीं, तो वे कितनी ऊँची आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर सकती थीं! उनकी इस missed opportunity से हम क्या सीखें?

देखिए जहां तक लक्ष्मी दीदी का प्रश्न है वो ठाकुर ने कहा ना कि वह चीनी का पहाड़ है जिसका जितना कैपेसिटी वह लेगा वो अमृत का समुंदर है जिसका जितना कैपेसिटी वह पान करेगा तो वो माने एक घूंट पान करके ही किसी का हो जाता है। कोई कोई है बहुत ज्यादा से ज्यादा तीन-चार घूंट पान करता है। तो क्या है कि लक्ष्मी दीदी की जो स्पिरिचुअल धारण करने की कैपेसिटी थी वो ठाकुर का संग करके वो सेचुरेट हो गई थी। तो अभी उनको लगता होगा कि और कहां भी और एक्स्ट्रा स्पिरिचुअलिटी में जाए। अभी जो ऑलरेडी जो कैपिटल बना लिया है उसको खर्च करके आनंद से रहते हैं। [हंसी] सो म दैट कुड हैव बीन वन लॉजिक हमारे लिए किंतु आपने ठीक ही कहा कि देयर आर मेनी मिस ओपोरर्चुनिटीज हमारे खुद के जीवन में कि माने इस समय इस व्यक्ति के साथ में मैं एसोसिएट होता तो फिर बाद में उन्होंने जो आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त की वो उस समय मुझे नहीं दिखता था। बाद में पता चला तो मैं मुझे उनका और ज्यादा संग करना चाहिए था। यह एक माने [गला साफ़ करने की आवाज़] ऑल दिस द थिंग्स आर देयर। किंतु क्या है ना यह सब अपना हृदय ही बताता है। अल्टीमेटली अब देखिए ना ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे। आप लक्ष्मी दीदी की मिस ओपोरर्चुनिटी की बात करते हैं। वहां के वो जो कितने सारे लोग थे जो कि ठाकुर को एक्टिवली डिस्पाइस करते थे। राइट? तो वो मिस ओपोरर्चुनिटी का क्या? उनको तो कुछ नहीं करना है। लक्ष्मी देवी तो एटलीस्ट कामरपुर जाकर तपस्या करनी थी। वे लोगों को तो वहीं पर रहकर के सब कुछ अपने रूटीन में से एक पैर बाहर नहीं निकालना है ठाकुर के ऊपर श्रद्धा लाने के लिए वो भी उन्होंने नहीं किया तो क्या है कि वो अपना दो चीज है एक तो जिनके भीतर में स्पिरिचुअलिटी है क्या हम रिकॉग्नाइज कर पाते हैं कि नहीं एक चीज है और फिर रिकॉग्नाइज कर पाएंगे तो फिर वो स्पिरिचुअलिटी ग्रहण करने के लिए अपना कैपेसिटी भी है कि नहीं दैट इज अनदर थिंग राइट कोई बहुत ही ज्यादा स्पिरिचुअल अब जैसे देखिए ना स्वामी जी अमेरिका गए थे तो एक लेडी डिवोटी एक डिवोटी कहां म एक लेडी थी जिसने स्वामी जी को सुना एक बार फिर वह इतनी प्रभावित हो गई एट द सेम टाइम वो क्या कहती है पता है कि मुझे स्वामी जी का फिर से मुझे उनको नहीं सुनना फिर से मुलाकात नहीं करनी क्योंकि क्या है कि माने मुझे पहली मुलाकात में इतना सारा जो मिला है सेकंड मुलाकात में यदि मोह भंग हो गया तो मैंने जो पहली मुलाकात से जो मिला वो भी चला जाएगा। यह उसका लॉजिक था। सो मेरी लुईस जो कि न्यू डिस्कवरी लिखती है वो कहती है कि सच अ स्ट्रेंज लॉजिक किंतु बहुत सारे लोगों का ऐसा लॉजिक था क्योंकि क्या है कि उन लोगों को एक मन में बैठ गया था कि ये जो जितने भी धर्म गुरु है आधे तो पीछे से वो सब फ्रॉड निकलते हैं। अभी उनका एक मुलाकात हुआ। एक मुलाकात हमको अच्छा लगा। फिर बार-बार मुलाकात करने को जाएंगे और फिर उनमें कुछ फ्रॉड दिखाई देगा। तो हमने जो पाया है वो भी गवा बैठेंगे। तो बेटर है कि जो पाया है वो लेके निकल जाए। सो अपने ऊपर में है कि दो तरह से हम क्या रिकॉग्नाइज कर सकते हैं किसी में स्पिरिचुअलिटी दूसरा की स्पिरिचुअलिटी रिकॉग्नाइज की तो संग करके फिर उसको अपने ग्रहण करना वो कैपेसिटी भी है कि नहीं माने देखिए कि बहिरंग अंतरंग का डिवीजन क्यों हुआ जो ठाकुर से स्पिरिचुअल बेनिफिट निकालना चाहते थे वे लोग बहिरंग हो गए ठाकुर की जो सेवा करना चाहते थे अंतरंग हो गए तो ठाकुर की सबसे ज्यादा सेवा सेवा किसने की है? जबकि ठाकुर को सबसे ज्यादा आवश्यकता थी उस समय वन पर्सन माने अबव ऑल अदर नेम माने लाटू महाराज कहिए, शशि महाराज कहिए, नेम एनीवन हृदय विल हृदय ने ठाकुर की सबसे 10 गुना ज्यादा सेवा की है। यदि हृदय नहीं होता ठाकुर कहते हैं जीवन धारण संभव नहीं होता। ये जो तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की वो संभव ही नहीं होती। इतना करने के बावजूद माने [हंसी] हमारे जितने भी लॉजिक है सब में फिट बैठता है हृदय। माने ठाकुर का वंश माने वही तो खून है ना वही वो माने इनहेरिटेंस है उनका परिवार है तो माने वो ठाकुर का रक्त भी वही है माने इन्हहेरिटेंस भी वही है सेवा भी इतनी की है संपूर्ण रूप से डेडिकेटेड था फिर भी वो आउट हो गया सो अभी आप क्या कहेंगे [हंसी] देखिए मैं वड़ोदरा का एग्जांपल बताऊं वहां वहां पे वो जो प्राइवेट सेंटर एक छोटे से अपार्टमेंट में चल रहा था तो 121 लोग वहां पे एट द मोस्ट वहां पे इकट्ठा होते होंगे एट द मोस्ट तो उस समय में मेरा नया-नया एसोसिएशन लोगों के साथ स्टार्ट हुआ था इसलिए नहीं कि वो धार्मिक जगह है बोल के या ठाकुर मां स्वामी जी कुछ पता नहीं था वहां पे एक छोटा सा लाइब्रेरी था वहां पे मैं मुझे किताबों पढ़ने का शौक था तो जितनी भी लाइब्रेरी सामने आती थी मैं वो मेंबर हो जाता था तो मैं हमारे मेरे फादर के एक फ्रेंड है। वहां पर जाते थे तो वहां पर लाइब्रेरी है बोल के मैं जाता था। अभी देखिए मुझे ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में कुछ पता नहीं। एट द सेम टाइम मैं वो लाइब्रेरी में जाता था ना तो मुझे इतना अच्छा लगता था। सुकून मिलता था। तो मैं सोचता था कभी-कभी कि यहां पे बैठे-बैठे मैं पढूं क्या? तो वहां पे बैठ जाता था। पढ़ता था और मैं देखता था कि आसपास में कितने लोग रहते हैं। कितने लोग रहते हैं। कोई यहां पे नहीं आता। व्हिच इज सो स्ट्रेच। आप देखिए आपका कोई पर्पस तो होना चाहिए ना भीतर में जाने का। आप तो रास्ते से जाते ऐसे कितने घर मकान दुकान वगैरह है। आप भीतर में क्यों जाएंगे? मेरा पर्पस था पढ़ने का बोल करके मैं प्रवेश किया। किंतु प्रवेश करने के बाद में ना मुझे एक दूसरा रियलिटी दिखा जो कि मेरा इनिशियल हेतु भी नहीं था। मुझे पता भी नहीं था कि वो है। किंतु एक बार मैंने स्टेप इन किया तो लगा कि अरे यह तो बहुत ही शांत जगह है। बाहर में वह बिजी रोड है। भले ही चाहे भीतर में पता नहीं किस तरह का एक शांति है। तो मैं उस समय सोचता था आसपास में इतने लोग रहते हैं। उन लोगों के लिए घर के बाहर निकल कर के कोई भी काम के लिए जाते हैं। एक बार भीतर में आकर के थोड़ा बैठे हैं। उनको कितना आनंद आएगा। किंतु कोई आता नहीं था। मैं देखता था मुश्किल से बार चार पांच लोग वहां पर आते थे। एट द मोस्ट। सो देखिए कि आपके भीतर में वो कैपेसिटी भी तो होनी चाहिए ना कि वो रिकॉग्नाइज करने की कि यहां पर समथिंग एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी इज देयर। मैं कहूंगा कि अपने अपने हाथ की बात है। अपने को बनाना पड़ेगा ना ऐसा यू हैव टू मेक योरसेल्फ रेडी ना। चांस फेवर्स द प्रिपयर्ड माइंड। ऐसा वो एक कोई एक फेमस कोई एक है साइंटिस्ट वो कहता है तो चांस किसको फेवर करता है जो प्रिपयर्ड माइंड है उसको फेवर करता है

एक भक्त: नित्यगोपाल, रामलाल दादा और हृदय की कहानियाँ सुनकर हमें अब दर्शन का कोई charm नहीं रहा!

दर्शन को आप कह सकते हैं ऐसे चेरी ऑन द टॉप माने त्यागमय जीवन है और फिर अब जैसे देखिए ना गोपाल की मां राइट प्रचंड त्यागमय जीवन है फिर एकाएक उनको को दर्शन परंपरा प्रारंभ हो गई। किंतु ये जो दर्शन है त्याग के फाउंडेशन के ऊपर में खड़े हैं। उनके चरित्र को हानि नहीं पहुंचाने वाले। सो थैट कि म गोपाल की मां इज बेस्ट एग्जांपल राइट? ठाकुर का लाइफ इतना एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी है कि वो दर्शनवर्शन कुछ भी हो जाए हमको लगेगा अरे वो हमारे साथ में कहीं रिलेशन ही नहीं है। किंतु गोपाल की मां का लाइफ देखिए कि वी कैन एक्चुअली रिलेट समझ पाते हैं। स्टेप बाय स्टेप समझ पाते हैं कि बाल विधवा है। विधवा की तरह कठोरता करके रहती है। सतत जप करती रहती है। संसार के साथ में कोई लेना देना नहीं है। दरिद्र है। किंतु फिर भी मन से संतुष्ट है और फिर उसको दर्शन होता है। सो दैट इज आप देखिए कि आइडियल वर्थ एमुलेटिंग माने एक और आप यह सब ठाकुर के जितने भी रिलेटिव है पगले उनको खड़ा रख दीजिए और यहां पर गोपाल की मां को रखिए ठाकुर ने क्या कहा जारा छिलो आपनार तारा होलो पर और जारा छिलो पर तारा होलो अपनार जो थे अपने वो हुए पराए जो थे पराए वो हुए अपने

एक भक्त: सच्चा भक्त त्याग ही मागेगा। दर्शन होते रहेंगे अपने से

किंतु ये दोनों साथ में नहीं आएंगे ना त्याग वैराग्य का आपको म स्वासो म वो रेस्पिरेशन जिस तरह से अपना नेचुरल है उतना नेचुरल आपका त्याग हो जाना चाहिए बाद में ही यह सब स्टार्ट होता है

एक भक्त: रामलाल दादा का स्वामी ब्रह्मानन्द के साथ बहोत अच्छा सम्बन्ध थे. तो ऐसा क्यों?

मैं समझ गया समझ गया आप जो आप जिस समय की बात करते हैं उन्होंने बहुत बाद के बात की है माने स्वामी जी अमेरिका से वापस आ गए बेलूर मठ की स्थापना हो गई है रामलाल दादा वहां पे जाते हैं वो राजा महाराज के साथ में वो बहुत ही आनंद से वार्तालाप करते हैं वो उस दिनों की बात है ना तब तक तो मां का भी वो सेटलमेंट काफी अच्छे से हो गया था ये जिस दिनों की बात चल चल रही है। उस समय राजा महाराज है वगैरह तो सब तो तपस्या में डूबे हुए हैं। तो फिर क्या है कि रामलाल दादा वो नरेंद्र ने तो कहा ना नरेंद्र ने कहा भी सही कि ऐसा मत कीजिए पैसा मत बंद करवाइए। किंतु नरेंद्र की बात किसी ने सुनी नहीं। सो उस समय कोई ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि बोलने से कोई सुने।

एक भक्त: रामलाल दादा का स्वामी ब्रह्मानन्द के साथ बहोत अच्छा सम्बन्ध थे. तो ऐसा क्यों?

यही तो सब रीजन है ना। भारत की अवनति क्यों हुई? अल्टीमेटली तो यही सब रीजन है कि इस तरह से एक टॉक्सिक माइंडसेट हमारे भीतर में प्रवेश कर दिया था कि स्त्रियों के अधिकार है। यही हम लोगों को समझ में नहीं आता था। पुरुष लोगों को वो जो वहां पे वह जो मां का जो पालकी उठाने वाला जो था जो पालकी वन करके मां की ले जाता था वो अपनी बीवी को आए दिन मारता था। क्यों? क्योंकि वो पुत्र का जन्म नहीं दे रही। पुत्री को जन्म देता है। तो एक दिन तो इतना मारा, इतना मारा। वह बेचारी उसकी वाइफ रोती-रोती जय राम भाटी गई जाकर के मां के पैर में पड़ी कि देखो मुझे इतना मारता है तो फिर मां ने उसको बुलाया मां ने कहा क्यों तुम अपनी बीवी को इतना मारते हो वो कहता है कि मां मेरा पुत्र को जन्म नहीं दे रही पुत्रियों को जन्म दे रही अभी तो आजकल मेडिकल साइंस स्पष्ट कहता है कि वो जो स्त्रियों के तो एक्स एक्स क्रोमोजोम होते हैं एक्स व तो पुरुष के होते हैं यानी कि इफ एट ऑल पुत्र का जन्म होना है दैट डिपेंड्स ऑन द मेल क्रोमोजोम नॉट ऑन फीमेल क्रोमोजोम तो पूरा दोष का टोपला स्त्री पर डालना और फिर उसको मारना और फिर मां ने कहा तो सही कि मत मारो किंतु साथ में मुझे यह सुनकर के इतना ज्यादा दुख हुआ कि मां ने कहा अच्छा ठीक है तुमको एक पुत्र का जन्म हो जाएगा माने वही जो एक मेल टॉक्सिक जो माइंडसेट है मां जिसको जैसे कि उसको रेनफोर्स करती है कि अच्छा तुमको लड़का चाहिए लड़का मिल जाएगा ऐसा नहीं कि स्त्री भी तो बच्ची भी तो है लक्ष्मी का अवतार है भवतारिणी का अवतार है मां खुद तो स्त्री शरीर में आई है शक्ति तो फिर ऐसा क्यों नहीं कहा कि तुमको जो तुम्हारी पुत्रियां है उनको शक्ति के रूप में देखो मां भी जैसे कि रिइनफोर्स करती है उस पूरी माइंडसेट को कि अच्छा चलो तुमको बच्चे का जन्म होगा यानी अभी मां को भी दोष देने से कोई लाभ नहीं हुआ पूरा माइंडसेट ही उसी तरह का था सीरियसली मां के जीवन में मैंने कभी भी मुझे एक भी प्रश्न नहीं हुआ म स्वामी जी के जीवन में हो जाते हैं ठाकुर के जीवन में हो जाते हैं मां के जीवन में यह पहला प्रश्न मुझे हुआ था कि मां क्यों और इनफोर्स कर रहे हैं इस तरह के माइंडसेट को। देखिए यह तो एक बात है कि अपनी बुद्धि तो है इतनी सी। राइट? अभी इतनी बुद्धि लेके अवतार का वो जो कॉस्मिक थिंकिंग है उसमें विचार करने वाले हम कौन होते हैं? एट द सेम टाइम बुद्धि तो उन्होंने ही दी है। अभी दूर उसका वो जो ये उन्हें मिसयज करना है वो भी तो हमको करना है। [हंसी] वो मिसयूज़ नहीं करवाना था तो दी क्यों बुद्धि? वो काली या नाग कहता है ना जहर आप ही ने दिया है तो आपको मैं जहर ही तो ऑफर करूंगा। और क्या करूंगा? गिरीश घोष का भी वही ना गाली दी है आपने मुझे तो मैं आपको गाली से तो आपकी प्रार्थना करूंगा उपासना करूंगा और क्या करूंगा मैं