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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णा यते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज जैसे हमने देखा कि ठाकुर के साथ में मां का जो सर्वप्रथम प्रथम मिलन हुआ था उस दिनों की घटनाए कि किस तरह से विवाह के बाद में ठाकुर दक्षिणेश्वर तो चले गए किंतु वहां से जयराम कामर पुकुर आए थे और फिर मां भी जयराम बाटी से कमर पुकुर ठाकुर के साथ में गई थी किंतु ठाकुर तो कमर पुकुर उस समय साथ महीना रुके थे और उसके बाद में फिर से दक्षिणेश्वर कोलकाता वापस आ गए और फिर मां भी जयराम बाटी चली आई तो वहां से अपनी कहानी फिर से प्रारंभ होती है एक चैप्टर एक प्रकरण समाप्त हुआ उस प्रकरण का नाम था वधु अर्थात कि ठाकुर के साथ में शुरू के दिनों में मां के प्रसंग अभी नया प्रकरण शुरू हो रहा है इसका नाम है देवीर बोधक अर्थात कि देवी का बोधन बोधन अर्थात कि उनको प्रार्थना करके उनको जागृत करना और उनसे वर मांगना तो यह बोधन चैप्टर जो है इसमें है कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर जाती है और दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में रहती है तो यह बड़ा ही इंपोर्टेंट चैप्टर है इसमें सबसे बड़ी घटना कि जिस तरह से शोड़ी पूजा शोड़ी पूजा के माध्यम से ठाकुर देवी को आमंत्रित करते हैं देवी को जागृत करते हैं मां के शरीर में श्री अंग में और फिर वही शक्ति का जागरण होने के बाद में इसी शक्ति की सहाय से ठाकुर जगत में धर्म चक्र प्रवर्तन यह बौद्ध शब्द है या तो फिर कहेंगे कि हिंदू धर्म का पुनः जागरण मां की सहायता से करेंगे हमको पता है कि यह 72 में 18725 में शशी पूजा हुई और यही उसी समय के बाद में बिल्कुल 18753 5 में पहली बार केशव के साथ में ठाकुर की मुलाकात हुई एक्चुअली ठाकुर ने केशव के बारे में सुना था तो ठाकुर ने कहा कि हां यह किस तरह का मैंने सुना ठाकुर के मन की एक इच्छा थी कि जो जो मां के मने ईश्वर के भक्त हैं उनके साथ में जाकर के वार्तालाप करें ईश्वर की बातें करें यह ठाकुर के मन में था तो ठाकुर ने फिर इसी तरह से केशव सेन के साम साथ में जाकर के सामने से मुलाकात की किंतु केशव सेन ठाकुर से इतना प्रभावित हो गया कि उसने अपने न्यूज़पेपर में यह जो ब्रह्मो समाज के जो न्यूज़पेपर वगैरह है उसमें उ उसने ठाकुर के बारे में सब एक के बाद एक समाचार छापना शुरू कर दिया और वही ठाकुर के बारे में पढ़ कर के धीरे-धीरे करके कलकत्ता का यह जो मिडिल क्लास साधक वर्ग है वह ठाकुर से अवगत हुआ और ठाकुर का दर्शन करने के लिए ठाकुर के दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर आना शुरू किया तो देखिए कि केशव सेन के साथ मुलाकात हुई वह ठाकुर का जो वर्ल्ड मिशन था उसमें बड़ा ही क्रिटिकल था हालांकि पहले बहुत सारे लोग को आकर के मिले हैं यह गौरी पंडित है न कि ये वैष्णव चरण है न कि ऐसे कितने ही लोग थे किंतु सही सही में देखा जाए तो देखिए कि और सिर्फ बात यह नहीं है कि ठाकुर का गुरु भाव उनके ये अंग्रेजी सीखे हुए शिष्य न किय कॉलेज में पढ़ते हुए शिष्यों को देख कर के उनका गुरु भाव जागृत हुआ है ठाकुर का गुरु भाव देखिए कि उनके खुद के गुरुओं की साधना की जो अपूर्णता जो एक आखिरी स्टेप बच गया था व उन्होंने समाप्त करवाई थी यह तोतापुरी थे कि अद्वैत ज्ञान में पूरे निपुण थे निष्णात थे अद्वैत भाव में ही रहते थे शक्ति का स्वीकार नहीं करते थे अभी ठाकुर तो कहते हैं मलब ये तो नियम है ना शक्ति के इलाके में रहते हैं पंचमहाभूत का देह है और आप कहेंगे कि शक्ति है ही नहीं या तो फिर शक्ति की अवगणना करेंगे तो कैसे चलेगा तो यही तोतापुरी को शक्ति ही स्वीकार करवाई ठाकुर ने भैरवी ब्राह्मणी थी उनके मन में एक थोड़ा सा घमंड रह गया था कि हां यह चंद्र है या गिरिजा है या ठाकुर उनके जो तीन शिष्य उनको सिद्धि मैंने प्राप्त करवाई है तो वह घमंड तोड़वा करके जो आखिरी अपूर्णता एक अंश बच गया था व समाप्त करवाई भैरवी की साधना अर्थात कि ठाकुर का गुरु भाव देखे और मां के साथ में ही मां जब से मां के साथ विवाह हुआ है उसके बाद से लेकर के जब जब भी मां के साथ में ठाकुर का मिलन हुआ है तब बत तब ठाकुर ने मां को संसार की संसार में किस तरह से रहना है किस तरह से कार्य करना है घर कैसे संभालना है और साथ-साथ में ही साधना कैसे करना है साधक का जीवन कैसा होना चाहिए साधक का एटीट्यूड क्या होना चाहिए वह सब कुछ ठाकुर मां को सिखाते थे अर्थात कि गुरु भाव तो ठाकुर में पहले से ही था किंतु इस गुरु भाव में हम दो एक दो डिवीजन देखते हैं एक तो है कि ट्रेडिशनल रूप में ठाकुर गुरु थे या तो फिर कहेंगे कि ऐसे लोगों के प्रति ठाकुर का गुरु भाव था जो कि भारतीय परंपरा भारतीय ट्रेडीशन के साथ में बहुत ही अवगत थे जैसे कि ठाकुर के जितने भी गुरु थे या तो फिर जितने पंडित मिलने को आए या तो फिर मां या तो फिर कामर पुकुर के जो ठाकुर के जो मित्र थे वगैरह कामर पुकुर की ये जो ब्राह्मण कन्याए ब्राह्मण जितने भी थे हमने तो यहां पर कल ही देखा कि श्रीनिवास सांखारी है ना कि एक जैसे ही ठाकुर गांव में जाते थे सभी लोग ठाकुर को मिलने के लिए उनकी बात सुनने के लिए सभी लोग इकट्ठा हो जाते थे किंतु इन सबका एक लाक्षणिक क्या है कि सभी लोग भारतीय परंपरा से भारतीय विद्या से अवगत है किंतु अभी तो देखिए कि ये कलयुग है ये विदेशी संस्कृति का आक्रमण भारत पे हुआ है विदेशी संस्कृति का जो ये पावर है उसकी ये जो मेनिफेस्टेशन ऑफ एनर्जी है इससे प्रभावित होकर के यह जो बड़े-बड़े शहर है जैसे कि कोलकात्ता वहां के ये जो लड़के लोग हैं जो कि विदेशी शिक्षा प्राप्त करते हैं उनके मन में यह बैठ गया है कि हां भारतीय विद्या का हमने यह इतने दिनों तक फॉलो करते-करते हमने क्या प्राप्त किया तो भारत 1000 साल से गुलाम रहा जो लोग भी विदेश से आएंगे हमारा शोषण करेंगे हम हमको लूट के ले जाएंगे यही तो मिला हमको हिंदू धर्म का स्वीकार करके हिंदू धर्म का पालन करके बेटर है कि यह क्रिश्चियनिटी को देखो किस तरह से इन्होंने यह गन बोट है ना कि ये इंटरनल कंस्ट यह स्टीम इंजन है इंटरनल कंब इंजन तो बाद में आया उस समय तो स्टीम इंजन था ये स्टीम इंजन है फिर ये जो सब गन पाउडर है यह जो मॉडर्न मेथड्स ऑफ ऑर्गेनाइजेशन आर्मी ऑर्गेनाइजेशन यह सब इन्होंने कैसे डेवलप किया है कि इसकी मदद से यह लोग इतने बड़े पूरे विश्व पर राज कर रहे हैं तो चलो इनको अपना ले इनकी संस्कृति को अपना ले तो यह सुन करके देख कर के यह जो पूरा नास्तिक होने वाला यह पूरा क्लास था मने महा मेट्रो सिटीज का उसको ठाकुर को कन्वर्ट करना था जदिया पुरातन संस्कृति की ओर नहीं ले आएंगे तो भारत के दो टुकड़े हो जाते एक टुकड़ा हो जाता कि सनातन धर्म को फॉलो करने वाला सनातन धर्म में आस्था रखने वाला और दूसरा टुकड़ा हो जाता कि विदेशी चीजों पर विदेशी सभ्यता पर आस्था रखने वाला ये दो भारत सनातन भारत और भविष्य का भारत इन दोनों का मिलन करवाना था संगम करवाना था और यह संगम कौन करवा पाता आज देखिए कि इसी भारत में यहां पर यह भगवान श्री राम का मंदिर है भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है तो यहां पर इसरो भी है यहां पर टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च भी है यहां पर आईआईटी भी है और इसी आईआईटी में से कल ही मैं देख रहा था एक न्यूज़ आइटम में पढ़ रहा था कि माइक्रोसॉफ्ट और ओपन एआई इन दोनों ने मिलकर के ठीक किया है कि 100 बिलियन डॉलर 100 बिलियन डॉलर का एक सुपर कंप्यूटर बनाएंगे जिसमें कि यह लेटेस्ट वर्जन लेटेस्ट आइट एशन ऑफ एआई उसमें रहेगा और दिस विल बी द मोस्ट पावरफुल कंप्यूटर माने 100 बिलियन डॉलर का प्रोजेक्ट सोच लीजिए ये कितना बड़ा प्रोजेक्ट है और यह दोनों के सीईओ को साथ-साथ में खड़े रह कर के फोटो लिया है व ओपन एआई का सीईओ है वोह सेम ऑल्टमैन और माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ है अपना सत्य नडेला तो मैंने सोचा देखिए कि यही भारतीय पुरातन संस्कृति 75 साल पहले हम इसी गोरे लोगों के गुलाम थे और आज अपनी ही इंस्टिट्यूशन में अपने ही यूनिवर्सिटीज में पढ़ कर के एक ऐसा लड़का तैयार हुआ है जो कि देश की सर्वश्रेष्ठ टेक्नोलॉजी है उसमें कटिंग एज के ऊपर में काम कर रहा है तो यह पुराना भारत और यह नया भारत यह एक और है यह गौरी पंडित यह वैष्णव चरण यह कामर पुकुर की यह ब्राह्मण कन्याएं एक और और दूसरी र आज का यह सत्य नडेला नकी फिर यह सुंदर पिचय नकी ये जितने भी सिलिकॉन वैली के कटिंग एज सीईओ है इन दोनों के बीच में सेतु क्या है इन दोनों के बीच बीच में ब्रिज क्या है तो वह है श्री राम कृष्ण इतना बड़ा युग प्रयोजन का कार्य उनको करना था हमको लगता है कि यह कार्य तो स्वामी जी ने किया है हमको तो लगता है कि वही तो स्वामी जी है जो कि सिलिकॉन वैली वहां पर बना नहीं था तभी से लेकिन किंतु कैलिफोर्निया में जाकर के सैन फ्रांसिस्को फिर ये हॉलीवुड फिर ये लॉस एंजेलिस पसडी अलामे यहां पर जाकर के स्वामी जी ने ही तो वेदांत फैलाया था किंतु स्वामी जी का कान पकड़ कर के ये सनातन संस्कृति की ओर लाने वाले कौन थे वह थे श्री राम कृष्ण तो इतना बड़ा युग प्रयोजन का कार्य श्री राम कृष्ण को करना था किंतु कैसे करेंगे अवतार को कार्य करने के लिए शक्ति चाहिए और यह शक्ति थी हमारी श्री मां शारदा देवी मां शारदा देवी जयराम बाटी में से दक्षिणेश्वर आगमन करेगी ठाकुर उनकी पूजा करेंगे उनके भीतर में शक्ति को जागृत करेंगे शक्ति का बोधन करेंगे जगदंबा को आमंत्रित करेंगे कहेंगे जगन माता पृथ्वी पर अवतरण कीजिए इस भारतीय सनातन संस्कृति की यह जो दुर्दशा है उसको दूर कीजिए हमको फिर से मनुष्यवकाशा है तो वही कार्य सर्वप्रथम ठाकुर ने किया फिर मां के भीतर में से यह जो प्रचंड शक्ति का प्रवाह जागृत हुआ और यह वह शक्ति नहीं है स्वामी जी क्या कहते हैं देखिए कि विदेशी संस्कृति ने अपनी संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में किया तो कैसे किया पहले तो सर्वप्रथम तो सैन्य आगे जाता है उ जितने भी देशवासी है हमारे सबको मार देता है वहां पे ज्यादातर लोगों को फिर जो बचे कुचे रहे उनके ऊपर में जोर जबरदस्ती करके अपनी संस्कृति स्थापित करते हैं किंतु भारतीय संस्कृति हमेशा आशीर्वाद लेकर के फैली है स्वामी जी शिकागो गए कभी कहा कि तुम लोगों का धर्म गलत है तुम लोगों के धर्म गुरु निकम में है तुम लोग यह छोड़ कर के हमारे धर्म में आ जाओ ऐसा कहा स्वामी जी ने तो कहा अ क्रिश्चियन हैज टू बिकम बेटर क्रिश्चियन नॉट अ क्रिश्चियन हैज टू बिकम हिंदू ऐसा तो कहा नहीं बुद्धिस्ट हैज टू बिकम ए बेटर बुद्धिस्ट अ मुस्लिम हैज टू बिकम अ बेटर मुस्लिम कभी ऐसा नहीं कहा कि धर्म परिवर्तन करो या तो फिर दूसरे देश की प्रथाएं अपने देश में इंपोर्ट करो ऐसा तो स्वामी जी ने कहा नहीं हमेशा आशीर्वाद के साथ में भारतीय संस्कृति का यह प्रभाव फैला है आज भी देखिए कि ये जैसे पारसी लोग भारत में आए वैसे ही हमारे इंजीनियर अमेरिका में काम कर रहे हैं बाकी किसी भी देश से अमेरिका या यूरोप में माइग्रेशन होगा तो यह लोग कितना हल्लागुल्ला करते हैं अरे विदेशी लोग हमारे यहां पे आ जा रहे हैं यह जो पारसी लोग थे ना पारसी लोगों ने भारत में आगमन किया वो यहां के राजा को समाचार भेजा गुजरात के ही किसी किनारे पर कि हां हम लोग यहां पर रहना चाहते हैं तो राजा ने क्या किया एक दूध का गिलास पूरा भर कर के भेजा तो यह पारसी लोगों का जो लीडर था वह समझ गया कि राजा का राजा क्या कहना चाहता है बिल्कुल भरा हुआ दूध का गिलास है उससे वो क्या कहना चाहते हैं तो उन्होंने क्या मतलब अर्थ यह है कि हमारे यहां पर इतना अभी जितने भी रिसोर्सेस है सब एंगेज है हमारी जनसंख्या इतनी है कि हम आपको समाहित नहीं कर पाएंगे अपने रिसोर्स शेयर नहीं कर पाए पाएंगे तो इस पर्सी लीडर ने क्या किया उसके भीतर में चीनी डाल दी चीनी डाल कर के वह दूध का गिलास वापस भेजा तो अभी राजा ने जैसे ही दूध टेस्ट किया समझ गया कि यह लोग हमारे रिसोर्सेस का बंटवारा करने के लिए नहीं आए उसको स्वीटन करने के लिए उसको और भी ज्यादा एहस करने के लिए आए हैं तो उन्होंने पारसी लोगों को रहने की अनुमति दे दी तो जिस तरह से पारसी लोग भारत में आए वैसे ही हमारे इंजीनियर्स आज विदेश में जाकर के कार्य कर रहे हैं कोई कंप्लेन नहीं करता सब जगह पर जाकर सभी दरवाजे उनके लिए खुले हैं ग्रेटेस्ट टेक्नोलॉजी कंपनीज उनको लेकर लेने के लिए बड़ी ही उत्सुक होक के बैठी है तो यह युगपत परिवर्तन भारत में आया इसके पीछे में जो सबसे इंपोर्टेंट घटना थी डे जीरो उसको टेक्नोलॉजी की लैंग्वेज में यदि कहा जाए कि सर्वप्रथम दिन कि वो कौन सा दिन था जबकि भारत का यह जो कलयुग का अस्त हुआ और सतयुग का प्रारंभ हुआ हुआ वो घटना थी शोशी पूजा आप कहेंगे कि क्यों शोड़ी पूजा क्यों ठाकुर की निर्विकल्प समाधि नहीं क्यों ठाकुर का जन्म नहीं अच्छा ठाकुर का जन्म होना तो स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि ठाकुर जिस दिन जन्म लिए उसी दिन से भारत में सतयुग का प्रारंभ हो गया है यह तो एक बात है कोई प्रश्न ही नहीं है इसमें किंतु ठाकुर जब तक मां का मां के भीतर में देवी का बोधन नहीं करते मां के भीतर में देवी को जाग्रता नहीं कर तब तक ठाकुर के पास में वह शक्ति नहीं आती कि जिस शक्ति से शक्तिमान होकर के वह जगत परिवर्तन का सनातन संस्कृति को पुनः जीवित करने का कार्य आरंभ कर पाते तो इसीलिए यह शोड़ी पूजा सिर्फ अपने संघ के इतिहास में ही नहीं पूरे भारत के ही इतिहास में नहीं पूरे विश्व के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है और सभी का अपना-अपना व्यू पॉइंट है और कोई कहेगा कि अपने इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण घटना कौन सी है कोई कहेगा भगवान श्री राम कृष्ण देव का जन्म कोई कहेगा कि श्री राम कृष्ण देव की निर्विकल्प समाधि कोई कहेगा कि हां स्वामी जी जब शिकागो पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में संबोधन किए अमेरिकंस को कि अमेरिकन सिस्टर्स एंड ब्रदर सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका वो ऐसा डिस्प्यूट मने डिस्प्यूट क्या इस तरह की आर्गुमेंट हो सकती है जब मित्र तीन चार साथ में बैठ कर के व अपना नॉलेज का दिखावा करने का प्रयास करेंगे कि हां इस घटना से यह हुआ इस घटना का यह असर हुआ तो मेरा खुद का सबमिशन यह रहेगा कि अपने संग में सबसे इंपॉर्टेंट घटना है यह देवी का बोधन शोड़ी पूजा तो यही इस चैप्टर में इसका वर्णन है हम इसका पाठ करते हैं चैप्टर का नाम है देवीर बोधन गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं जयराम बाटी ते पुनरागमन अभी ठाकुर के गमन के बाद में दक्षिणेश्वर कलकाता वापस चले जाने के बाद में जब मां अपने घर अपने माई के जयराम बाटी वापस आई तो माने क्या देखा पल्ली श्री पुर्बे रई न्याय आछे पल्ली श्री अर्थात की गांव गांव पहले की ही तरह है जनक जननी भ्राता भगिनी आत्मीय सजन स्नेह प्रीति सम भावे रहिया जनक जननी अर्थात की पिता और माता भ्राता और भगिनी भाई और बहन आत्मीय और स्वजन इन सबकी मां के प्रति स्नेह और प्रीति समभाव छ पहले की तरह ही है दैनंदिन कर्म प्रवाह आलाप आलोचना आगेर तो चलते छ दिन प्रतिदिन का कर्म प्रवाह आलाप आलोचना अर्थात की गप लगाना बातें करना वार्तालाप करना पहले की ही तरह चल रहा है किंतु तबू प्राण नि ब्रतो कोने कोण अस् फूटो ब्यथा जेनो माझ माजे गुमरा या उठते छ परंतु प्राण नि ब्रतो अर्थात की हृदय के एक कोने में कोने कोनो स्फुट व्यथा कोई एक ऐसा एक लोंगिंग जिसको कहते हैं इंग्लिश में यर निंग शब्द है एक आकांक्षा या एक आशा या तो एक व्यथा जैसे कि बीच-बीच में जागृत हो जाती है मां तो वापस तो आई यह वही घर है वही माता-पिता है वही बंधु भगिनी है वही सब गांव के वासी है वही कर्म प्रवाह है किंतु बीच-बीच में हृदय के एक अनजान कोने में से एक ऐसी आवाज उनको पुकारती है कि वह आवाज उस नाद को दिव्य ध्वनि को सुनकर के मां का मन स्थिर हो जाता है श्री राम कृष्ण देव के साथ में जब बालिका थी तब तो ठीक है कि श्री राम कृष्ण देव के साथ में विवाह हुआ था किंतु बालिका को क्या पता कि विवाह क्या क्या अर्थ है पति का क्या अर्थ है किंतु इस बार जब कामर पुकुर में ठाकुर के साथ में मां का निवास हुआ तब कहीं जाकर के जो दिव्य बंधन का एक सेतु स्थापित हुआ वह सेतु अभी विस्मृत होने वाला नहीं है कामर पुकुरे जे दैब आनंदे अधिकार तीनी होया लेन कामर पुकुर में जिस देवी आनंद की अधिकार मां हुई थी ताहर स्मृति अभिराम अं तोरे जाग्रत था किया अथ च माहिरे उहर कोनो प्रति छबी देखीते ना पाइया उस दिव्य आनंद की एक प्रतिध्वनि मां के अंतर मन में जागृत है किंतु बाहर में तो इसका कोई उसका कोई प्रतिध्वनि नहीं दिख रहा है ताहर स्मृति तो बाहर उर कोनो प्रति छवि देखीते ना पाइया पदे पदे ब्याह तो ईते लागलो एवं से प्रतिक्रिया तहा हृदय के मथ तो करते रही लो जब उसी दिव्य आनंद की याद उनके हृदय में बीच-बीच में जागृत तो हो रही है किंतु बाहर में देखे तो श्री राम कृष्ण नहीं है बाहर में तो फिर से अपने पिता के घर वही पल्ली बाला के रूप में वही गांव की कन्या के रूप में मां रह रही है तो यह जो जो विरह है वह अभी मां के हृदय को धीरे-धीरे करके व्यतीत करने लगा शरते पर हेमंत हेमंत पर शीत आशीन शरत अर्थात की सर्दी की ऋतु उसके बाद में यह अच्छा यह हेमंत अर्थात य शीत अर्थात की शरद की रुतु शरद और हेमंत अभी देखना पड़ेगा मेरा यह ट्रेडिशनल वोकेबल थोड़ा सा कच्चा है इसन सब मामलों में तो जो भी है धीरे-धीरे करके मौसम परिवर्तित होने लगे श्री मा सुधु उत्क होया रही लेन मां जैसे की मने मने आस मने जैसे कि व कोई आने वाला है तो कैसे हम बाहर में बार-बार देखते रहते हैं उत्कंठा आदान प्रदान सुस्तो बाधा अतिक करिया उदासीन प्राय एक खुद में शी नरो देवेर कोई संवाद आशिया पड़े माने माने मां मीट लगा कर के बैठी है आशा जगा कर के बैठी है कि यह जिस तरह का भी यह सांसारिक बंधन है मने है ना कि आप पति के बारे में ज्यादा बात नहीं कर सकती या पति के बारे में सोच नहीं सकती ऑर्थोडॉक्स सोसाइटी है अपना तो यह सब ऑर्थोडॉक्सी यह सब समाज के नियम बंधन इसकी बाधा अतिक्रम्य यह उदासीन ग्राम है मां कीय जो भीतर की व्यथा है उसके प्रति यह ग्राम उदासीन है इस उदासीनता का पर्दा चीर करके जदी शायद ठाकुर का कोई संवाद मां के पास में आए नरदेव का कोई संवाद शायद मां के पास में आए यह आशा लगा कर के मां बैठी है देखि देखते देखीते सुदीर घो चारी बरे अधिक काल काटिया गलो देखते देखते चार साल भी कट गए ए समय मध दक्षिणेश्वर दुई एकटी कोथा हटात आश पड़िया ग्राम जलपरनी बात करने का एक बढ़िया सा मसाला मिल गया ऐसे छोटे-छोटे गांव होते हैं ऑर्थोडॉक्स गांव होते हैं वहां पर क्या है कि लोगों को बात करने के लिए कुछ ना कुछ सामान चाहिए कुछ ना कुछ मसाला चाहिए तो यह मसाला एकाएक उनको मिल गए ग्रामवासी जहा सुनीलो तहा ईते सिद्धांत कोरिया बसी लो कि श्री राम कृष्ण उन्माद गांव वालों ने जो कुछ भी सुना दक्षिणेश्वर से सो ठीक करके बैठ गए कि ठाकुर पा है उन्माद है श्री श्री श्री मायर मने बा कार्य तखन पूर्वे न्याय स्फूर्ति छिलना मां के मन में और कार्य में पहले की तरह दक्षता या कार्य कुशलता नहीं रही थी जैसे कि मन पड़ा रहा है ठाकुर के पास में शरीर यंत्र वत कार्य कर रहा है तो वैसे ही मां कार्य कर रही थी उनके शरीर और मन में किसी तरह की कोई भी चेतना नहीं बची थी जंत्र बत तीनी शोप कोरिया जाते छन यंत्र वत मां सब कुछ कर रही है किंतु ओहो रोहो श्री राम कृष्ण बिर जनि तो मर्म यथार काली मा तहर बदन मंडले लिप्त था किया किंतु अहो सतत मने कंटीन्यूअस श्री राम कृष्ण की विरह जनीत मर्म व्यथा महाराज कीय जो लगता नहीं है कि बंगोली पढ़ रहा हूं लगता है कि यह जैसे कि यह वो मने व संस्कृत जो नाटक होते हैं ना अपने इस तरह का यह संस्कृत नाटक पढ़ रहा हूं इसी तरह की यह पूरी यह वाक्य रचना है विरह जनित मर्म व्यथा विरह से उत्पन्न यह हृदय के भीतर में प्रकट होने वाली यह व्यथा या तो फिर यह दुख या दर्द काली मा मर्म यथार काली मा अर्थात कि मर्म व्यथा का ये एक घना बादल तहर बदन मंडल लिप्त था क्या मां के चेहरे पे यह विरह जनित मर्म व्यथा इसका जो काला बादल है मां के चेहरे को जैसे कि ढक दिया है जदव सहानुभूति संपन्ना पल्ली बाला देव दृष्टि आकर्षण रीते छलो मने मां के चेहरे पे यह व्यथा देख कर के यह काली मा ये काला बादल देख कर के गांव की कन्याओं की यह जो सहानुभूति है वह भले ही चाहे अर्जन करती हो सहानुभूति प्रकट होती हो उनके प्रति तथापि अज्ञ और संकीर्णता मिश्र तो शेष अनुभूति जखन आत्म प्रकाश अग्रसर होतो तखन श्री मायर नि बड़ ब्यथा के नि बड़ तोरो कोरिया तार पली जीवनो ो हो नियो कोरिया तुली तो यह पूरा एक पैराग्राफ है जब भी मां के चेहरे पर यह एक काला बादल उनके विरह की व्यथा से प्रकट होता देखते या तो फिर यह ठाकुर के बारे में यह जो भी उटपटांग बातें सुनते यह सुनकर के मां को जो दर्द हो रहा है उसके प्रति जदव की यह लड़कियां गांव की स्त्रियां उनकी सहानुभूति जदी प्रकट भी होती किंतु यह सहानुभूति जब यह प्रकाशित करने जा जाते तब वह सहानुभूति प्रकाश करने से मां का जो दुख है मां की जो व्यथा है उसको और भी बढ़ा देती क्यों क्योंकि लोगों के मन के भीतर में यह एक है कि हां निंदा करना कुत सा करना या तो फिर दूसरों का दुख देख कर के यह आनंद प्राप्त करना यह एक ह्यूमन नेचर रहता है तो यह बात करने में कितना बढ़िया सा मसाला मिल जाता है कि अरे उसका देखा उसका विवाह पागल के साथ में हुआ है या तो फिर ये पागल की स्त्री है ऐसा लोगों के मन में लोग बातें भी तो ऐसी ही करेंगे तो देखिए कि महाराज भी कहते हैं सहानुभूति दिखाई ते गिया तरा श्री मां के जाना तो माने सहानुभूति प्रकट करने को जाएंगे तो क्या करेंगे मां को क्या कहेंगे जेता हार पति बगर पात्र उनका जो पति है वो उसकी उसको अवज्ञा करना ही ठीक है वो ज के पात्र है अर्थात की उनकी उपेक्षा करना ही श्रेष्ठ है उपेक्षा ही करो उसके बारे में ज्यादा मत सोचो आर पर दुखे जहारा आनंद पाय दूसरों के दुख से जो लोग आनंद पाते हैं तहरा अंगुली निर्देश माके दिखाया बलि तो वे लोग अंगुली से अपनी उंगली देकर के बोलेंगे कि हां यह है पागल स्त्री माने पागल की प पनी है अथवा सहानुभूति छोले निष्ठुर मनो वेदना दिया बोली तो या तो फिर सहानुभूति दिखाने के लिए बड़े ही जो भीतर की मनो वेदना है निष्ठुर रूप की वह प्रकट करके कहेंगे ओ मा श्यामर मेर खेपा जमाई संगे बे होए छ अरे मां श्यामा की लड़की का श्यामा सुंदरी देवी श्यामा की लड़की का खेपा जमाई अर्थात पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है सब ओ बांछित कोथा सुनि बार भए श्री श्री माता ठाकुरानी कहारो बाड़ी ते जाते ना यह सब अवांछित कथा जिसको सुनने का कोई प्रयोजन नहीं है यह सब बातें सुनने की भय से मां किसी के घर नहीं जाते थे दिवा रात्र आपना के काजर मध्य डुबाया राखी ते दिन रात अपने को काम में डुबा करके रखती थी सतीर निकट पति निंदा अजज सती के सामने पति निंदा असह्य है ताई तहा के एक स्थाने पिंजरा बद्ध होया था कीते होतो इसी वजह से मां को एक जगह पर पिंजरे में आबद्ध होकर के रहना पड़ता था एकांत मन हा पाइया उठीले तीनी ग्रामर भक्ति मती सम स हृदय रमणी भानु पीछ शर गुरु देर बारां दई जाया शयो अनचोल बिछाया सुया काटते मन जब बिल्कुल व्याकुल हो जाता था सांस रूंध जाता था सांस मने सफोकेशन हो जाता था तब क्या करेंगे बानो पीसी के घर के वरांडा में जाकर के अपनी साड़ी का आंचल थोड़ा सा लगा कर के वह सो पड़ती थी देखिए यह मां की परिस्थिति थी और जैसे ये लोग सब माने गांव वासियों में ये जो जटिला कुटिला जैसे कि ठाकुर ने कहा कि लीला में य इन लोगों का भी एक स्थान होना चाहिए तो यह सभी रस यह जो नाटक होता है ना नाट्य शास्त्र है उसमें सभी रस का वर्णन है वीर रस है फिर वो सभी रस करुण रस होता है हास्य रस होता है तो सभी रस होते हैं तो ऐसा एक रस ऐसा भी होना चाहिए कि जब वीर रस जद नहीं होता ये देखिए कि मने भगवान राम जद वीर अपना रुद्र स्वरूप प्रकट नहीं करते जब तक सामने रावण नहीं था वध करने के लिए यदि यह कंस नहीं होता तो भगवान श्री कृष्ण को अपना यह उनका वध करने के लिए वहां पर मथुरा में नहीं जाना पड़ता तो वैसे ही इस तरह के कुछ पात्र रहते हैं फिर इनका मुंह बंद करवाने के लिए जब घटना वली प्रारंभ होती है तब हमारे मन को बड़ी ही शांति मिलती है देखिए कि एक ही छोटी सी घटना कि बहुत दिनों के बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जयराम बाटी में रह रही थी तो अभी क्या है कि जयराम बाटी के गांव वालों को वैसे ही पहले से ही है कि अरे यह तो पागल की स्त्री है पागल पति उसका जरा वहां दक्षिणेश्वर में है कोलकाता में पता नहीं मां का नाम लेते लेते जगन माता जगदंबा मां काली का नाम लेते लेते दिगंबर होकर के घूमता रहता है इस तरह का यह पागल उसकी ये स्त्री है इस तरह की बात इन लोगों के मन में हस गई थी तो हुआ क्या कि बहुत सालों के बाद ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जब फिर से उसी जयराम बाटी में रह रही है तो एक बार किसी प्रसंग के रूप में ब्राह्मण भोजन का आयोजन किया गया तो अभी तो वो एक दिन थे कि जब मां मां के पास में बेचारी के पास में कुछ नहीं था व पति उनके शिव स्वरूप थे शिव का संसार था और यह एक दिन है कि कोलकात्ता के कितने ही भक्त मां को कितना ही सब कुछ प्रणामी दक्षिणा वगैरह दिया करते थे तो मां ने अच्छे से भोजन करवाया सबको बिठाया बड़े ही आदर पूर्वक और अभी तो मां के पास में यह क्वाल पाड़ा के त्यागी संतान भी है जो कि सेवा करने के लिए तत्पर है तो वैसे ही एक त्यागी संतान वहां पर सभी ब्राह्मणों को वह भोजन परोस रहा था उसी समय पता चला कि यह तो ब्राह्मण नहीं है तो जैसे ही यह पता चला एकदम हल्लागुल्ला मच गया कि अरे यह ब्राह्मण लोग खाने को बैठे हैं इसको यह अब ब्राह्मण होक के कैसे परोस सकता है सब लोग ब्राह्मण लोग खाना खाते खाते खड़े हो गए और कहा कि हम खाना नहीं खाएंगे छोड़ के चले जाएंगे तो मां तो अभी देखिए कि हे मां जगदंबा पूरे विश्व की ये हैने जितना यह ब्रह्मज्ञान स्वयं मां के सरस्वती रूप में मां के मुंह से प्रकट हुआ है मां के सरस्वती रूप से तो इसी ब्रह्मज्ञान को लेकर के विद्या का अभ्यास करके ये लोग ब्राह्मण बने किंतु फिर भी यह तो मां तो इस जगत में लीला करने के लिए आई है तो बड़ी ही दयनीय होकर के दयनीय स्वर से मां हाथ जोड़ कर के सबको कहने लगी कि अरे अरे बैठ जाइए इस तरह से आप खाना अधूरा छोड़ केर जाएंगे तो बड़ा ही पाप लगेगा बड़ा ही अनिष्ट होगा कैसे मां बड़े ही विनम्रता पूर्वक सबको विनती कर रही है और यह देख कर के बाकी जो त्यागी संतान है वो बड़े नाराज हो रहे हैं अरे ये अनपढ़ ब्राह्मण लोग है गांव के दो बड़ी के इनके सामने मां को इतनी विनम्र होने की क्या जरूरत है मां जद कोलकात्ता जाएगी मां जद साउथ इंडिया जाएगी तो वहां का यह जो रामेश्वरम का राजा यह लोग सब दो हाथ जोड़ कर के मां की सेवा के लिए खड़े हो जाते हैं वहां पर शशि महाराज है यहां पर राजा महाराज है यहां पर स्वामी जी है कितने लोग मां की सेवा के लिए खड़े हैं और यही मां किस तरह से गांव की बिल्कुल अनपढ स्त्री की तरह इन इससे अंध श्रद्धालु मने ऑर्थोडॉक्स लोग के सामने अपना मने अपने विनय प्रदर्शित कर रही है ये ताग संतान तो बेचारे बड़े नाराज हो गए किंतु मां देखिए कि मां और ठाकुर यह अपनी परंपरा को तोड़ने के लिए नहीं आए थे यह ब्रिज बना रहा है यह वही सनातन परंपरा और नए भारत के बीच में जद यह लोग कहते कि परंपरा के कुछ कुछ पहलू गलत है उसको छोड़ दो बाकी को ले लो हमेशा एक डाउट रह जाएगा कि यह गलत था तो यह सही है उसका क्या गारंटी है सब कुछ कुछ लेना है किंतु सभी पहलुओं को सुसंस्कृत करना है तो इन लोगों ने क्या ठीक किया पता है ₹ दंड देना पड़ेगा तब कहीं जाकर के हम लोग ठीक मने हम हम लोगों की नाराजगी दूर होगी तो उस समय ₹ तो बहुत बड़ी रकम थी तो ₹ दंड देना पड़ा ठीक है यह मामला तो समाप्त हो गया अभी वहां पर ही ललित चट्टोपाध्याय बोलकर के मां के एक वीर सेवक थे वो गांव में आए एक दिन तो आकर के पता चला कि यहां पर इस तरह से मां को ₹ का दंड किया है इन लोगों ने तो जैसे ही सुना उनके भीतर में जो भैरव स्वभाव था रुद्र स्वभाव जागृत हो गया बोला इन लोगों का साहस कैसे हुआ कि मां को इस तरह से दंड करें अभी मां कहती है अरे भाई तुम गुस्सा मत हो यह तो यहां की परिस्थिति ऐसी ही है तो यह ललित क्या कहता है पता है कि मां मैं तुम्हारा ये जो मैंने ये जो दुष्ट संतान होते हैं इस तरह से हूं मैं इस मामले में तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा आध्यात्मिकता ईश्वर प्राप्ति के बारे में सब कुछ सुनूंगा किंतु जब तुम्हारा अपमान होता है वहां पर तुम कहोगी इनको क्षमा कर दो तो वह बात मैं नहीं सुनूंगा ललित ने छट उपाध्याय ने क्या किया एक ग्रामोफोन लेकर आया था और ग्रामोफोन उस समय तो एक बड़ा नोवेल्टी होता था ना तो ग्रामोफोन गांव में बीच में जाकर के बजाना शुरू कर दिया तो यह देख कर के सभी गांव वालो इकट्ठा हो गए अरे यह ग्रामोफोन क्या है एक नई चीज है शहर से आई है चलो जाकर के देखते हैं तो सभी लोग इकट्ठा हो गए और उसमें वे लोग भी थे जिन्होंने मां को दंड दिया था तो वे लोग भी आकर के खड़े हो गए तो अभी यह जैसे ही सब लोग आ कर के खड़े हो गए तो ये ललित चट्टोपाध्याय ने क्या किया ग्रामोफोन बंद किया और अपने पॉकेट में से एक रिवॉल्वर निकाला बंदूक निकाला बोला कि जिन लोगों ने मां को दंड दिया था ₹ वो ₹ वापस करो वरना अभी गोली मार दूंगा तो ये लोगों ने ना ही ग्रामोफोन देखा था ना ही बंदूक देखी थी बंदूक देखी थी बंदूक का भय था तो जैसे ही इसने बंदूक निकाल कर के डराना शुरू किया वैसे ही इन लोगों ने ₹ वापस कर दिए और फिर इसने धमक दी कि देखो कि फिर से ऐसा कभी नहीं होना चाहिए तो यही गांव वालों को यही मां के संतानों ने किस तरह से धमक देकर के ठिकाने लगाया था तो वो एक दिन था और यह एक दिन था यह इस दिन में बार-बार दक्षिणेश्वर से खबर आती है कि इसका पति पागल हो गया है और लोगों को तो मजा आता है इस तरह से दिखाने में अरे यह पागल की स्त्री है देखा वो आपस आपस में बात करेंगे उसके पीछे पीछे लगेंगे अरे यह तो कुछ भी होगा तो मने सहानुभूति इस तरह से प्रकट करेंगे अरे तुम्हारा पति तो पागल है अरे बाप रे कितना बुरा हुआ किंतु डरो मत उसकी अवज्ञा ही करो उसकी उपेक्षा ही करो और भीतर में सब समझते हैं कि इस तरह से बातें करेंगे तो मां को और दुख होने वाला है किंतु दुख पहुंचाने के लिए लोग सामने से इस तरह की बातें करेंगे अरे तुम्हारा पति पागल है चिंता ही उसकी उपेक्षा करो यह जो मैंने सिर्फ गांव की बात नहीं है शहर में भी ऐसे उने सिर्फ भारत की बात नहीं है ये ह्यूमन नेचर है माने ये दूसरों का दुख देख कर के मैंने ऐसा होता है ना ये देखिए ये साइकोलॉजिकल डिफेंस है अपने जीवन में खुद के जीवन में इतने दुख कष्ट है कि कभी-कभी दूसरों का दुख देखते हैं ना तो हमको लगता है चलो भाई हम अकेले नहीं है मने ये एक साइकोलॉजिकल डिफरेंस है ये किसी को दोष देना ठीक नहीं है ऐसा कहना कि अरे गांव का कल्चर गलत था या तो फिर ऐसा कहना कि हिंदू धर्म में इस तरह के लोग थे या तो फिर ऐसा कहना भारत में ऐसे लोग थे ऐसा उचित नहीं है इवन इन जनरल किसी को भी दोष देना उचित नहीं है क्योंकि यह सब अपने साइकोलॉजिकल रिफ्लेक्सेस है जो आदमी संतुष्ट है जिसका पारिवारिक जीवन जिसका आर्थिक जीवन बड़ा ही सुखरूप चल रहा है उसके मन में इजली ईर्षा का उदय नहीं होगा ईर्षा किसके मन में प्रकट होगी जिसका बचपन दुख में बीता है जिसकी आर्थिक परिस्थिति बड़ी ही दयनीय है जिसको दिन-रात कष्ट करके अपने रोटी कपड़े मकान का जुगाड़ करना पड़ रहा है ऐसे लोगों के भीतर में एक तो क्रोध उत्पन्न होता है कि भगवान ने मुझे ये कैसी परिस्थिति में डाला है क्या मेरी कोई एक कीट जैसी एक कीड़े जैसी मेरी कीमत है इस जगत में ये डिस एंपावरमेंट का फीलिंग जो होता है ना उसमें से एक क्रोध प्रकट होता है फिर इसी क्रोध की किस तरह से वो मने एक्सप्रेस किस तरह से होगा तो घर में जाकर के जो कमजोर लोग हैं उसको धमका एगा घर के बाहर जाकर के जमीनदार उसको जदी मारपीट भी करेगा धमक भी देगा तो वह कुछ नहीं कर पाएगा किंतु वह क्रोध है जो फ्रस्ट्रेशन है घर में जाकर के अपने बीवी बच्चों के ऊपर में निकालेगा क्योंकि उसको पता है कि जमींदार के साथ में झगड़ा हुआ तो जमींदार को तो वह कुछ नहीं कह पाएगा बीवी बच्चों के साथ में वह गुस्सा निकालेगा तो वे लोग उसको कुछ नहीं कह पाएंगे ये मने यह विष चक्र है दिस इ पोइजन साइकल कि जब समाज पूरा गिर रहा है उस समय सब लोगों के मन में क्रोध होता है निराशा होती है हताशा होती है फिर इसी वातावरण में से इस तरह की ईर्षा और दूसरों को कष्ट पहुंचाने की भावना खड़ी होती है जब देश की आर्थिक सामाजिक मानसिक और आध्यात्मिक प्रगति होना शुरू हो जाता है तो वैसे धीरे-धीरे करके यह ईर्षा धीरे-धीरे कम हो जाती है आज आप देखें सिटी में लोगों के मन में ईर्ष तो होती है महानगरों में किंतु इतना क्रूडली प्रकाशित नहीं होती बड़ा ही सोफिस्टिकेटेड रूप से बड़ा ही मने सोफिस्टिकेटेड हाइपोक्रेटिन का कर लेते तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शाति शा श
Question Answer
ह किंतु देखिए जनरली गोस कहां से उत्पन्न होती है फ्रस्ट्रेशन में से तो अभी क्या है ना कि अभी ऑलरेडी इतना दुख है तो और थोड़ा सा माने ऐसा जो जिसका साइकोलॉजी हेल्दी होता है ना वह हमेशा इससे परहेज ही करेगा मने इससे दूर ही रहेगा म इंस्टिंक्टिवली वो उसमें जाएगा ही नहीं उसका प्रवृत्ति ही नहीं होगा ये मने डिस्टोर्टेड साइकोलॉजी में से यह सब प्रकट होता है तो अभी ऑलरेडी कैंसर हो चुका है बुखार हो गया तो कौन सी बड़ी बात है चलो एक नया डायवर्जन माने नई तरह की दवाई लेंगे इसकी मने ये सुसाइडल मेंटालिटी डेवलप हो जाती है एक कंटीन्यूअस कष्ट करने के बाद में ना फिर ये जो सेल्फ इंप्रूवमेंट है या व चला जाता है दिमाग से भारत की उस समय की परिस्थिति दयनीय थी और आज भी देखिए किय समाज में सोशल लेवल पर फ्रस्ट्रेशन मैंने कहा था ना वोह हैप्पीनेस सर्वे अभी मुझे थोड़ा टाइम नहीं मिल रहा है उसका स्टडी करने का स्टडी करूंगा बहुत हमने हमने ऊपर ऊपर से जो मैंने पढ़ा बहुत देखने वाली मैंने स्टडी करने वाली बातें हैं उसमें सोचने वाली बातें है उसमें व जो एक एलियन और रुजवेल्ट है ना वो अमेरिकन प्रेसिडेंट रूजवेल्ट उसकी वाइफ उसका एक बड़ा फेमस सेइंग है माने ग्रेट मेन डिस्कस आइडियाज मीडियो करर पर्सन डिस्कस इवेंट्स एंड कंप्लीट अदर पर्सन डिस्कस पीपल आदर यू डिस्कस आइडियाज और यू डिस्कस इवेंट्स और यू डिस्कस पीपल