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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम मां शारदा देवी का जीवन हम लोग इसके ऊपर में बात कर रहे थे पिछली बार हमने देखा कि किस तरह से मां जब दक्षिणेश्वर आती है ठाकुर के साथ में रहने के लिए तो वहां की आबोहवा ऐसी है गंगा के पानी का वह जो एक एटमॉस्फियर ह्यूमिड एटमॉस्फियर की डा जेंट्री हो जाती है और वहां से बचने के लिए जद जयराम बाटी जाती है तो वहां पर श्यामा सुंदरी देवी का है कि शिव का संसार पिताजी का तो त हो चुका है और मां बेचारी श्यामा सुंदरी देवी किसी के घर से कुछ काम लाकर के काक परिश्रम करके अपना जीवन गुजरान करती है व खुद के लिए खाने को है नहीं ज्यादा कुछ बिटिया को क्या खाने को देगी और अपने बच्चे जितने भी हैं मां के भाई सबको अपने रिलेटिव्स के वहां पर भेज दिया है कि हो सके कि जदी उनको कुछ अच्छे से खाने को मिले या तो फिर उनकी पढ़ाई लिखाई हो तो यह है यह था मां का जीवन उसमें भी एक बार इतनी बीमार हो गई बार-बार सोच जाना पड़ रहा है कि फिर आखिर में मां सिंहवाहिनी देवी के सामने धरना दिया और फिर मां ने जाग्रता होकर के उनको औषध दिया उनको मेडिसिन दी दवाई दी कि इस दवाई का प्रयोग करने से ठीक हो जाओगी तो देखिए कि जगदंबा स्वयं जगदंबा के सामने धरना दे रही है मां का तो पृथ्वी पे आगमन ही हुआ है जगत कल्याण के लिए उनको तो ऐसा कोई था नहीं कि प्रारब्ध कर्म कहो ना कि आरद कर्म की ऐसा कुछ कि उन्होंने ऐसा कुछ किया था कि जिसकी सजा इस जन्म में भुगतनी पड़े वो तो शुद्ध निर्मल पवित्र उनका चरित्र था और अवतार के साथ में जब जब भी भगवान शरीर धारण करके देव धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते तो अवतार के साथ में शक्ति के रूप में उनका आगमन होता है तो उ उनको तो ऐसे कौन से पाप का प्राया चित करना था कि इतनी सब उनके शरीर के ऊपर से कष्ट हुआ उनको इतना दुख दर्द बीमारी यह सब उनके जीवन में हुआ तो एक्चुअली उसका उत्तर गंभीरानंद जी महाराज वही हमको देते हैं किंतु वह उत्तर तक जाने से पहले और कुछ ऐसी ही कुछ दुख और बीमारी की बातें मां की यही स्टोरी थोड़ी सी आगे चलती है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं उस उत्तर से जाने से पहले और एक दो बातें ऐसी ही है जो कि महाराज जी हमको बताते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं जीवने आशा जोखन नाई तखन देवीर शरण लया श्री मा आरोग्य लाभ करी लेन जब जीवन की आशा समाप्त हो गई है मां शारदा ने सिंहवाहिनी की शरण लेकर के आरोग्य प्राप्ति की जगत वासी इ हाते प्रत्यक्ष प्रमाण पाइलो जे देवी शक्ति अमोग इस बात से जगत के लोग प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त किए कि दैवी शक्ति अमोघ है तब से शक्ति आश्रय ग्रहण सकले साधाय तोन देवी शक्ति है किंतु इस शक्ति का आश्रय ग्रहण करना वह सभी के लिए भी संभव नहीं है श्री मायर न्याय जहां देर चित्तो भक्ति ते परिपूर्ण केवल तहरा ते सफल काम होन मां की तरह जिनका चित्त भक्ति से परिपूर्ण हो वही देवी शक्ति के सहारे अपने दुख कष्ट काट सकते हैं वही लोग इस शक्ति का आश्रय लेकर के सफल हो सकते हैं किंतु ई शकल दैव शक्ति संपन्न महामानव बेर एकांत को भक्ति ते देवता एक बार जागरण ईले अपर से महा सौभाग्य अधिकारी ईते पारे यह बात है कि हम लोग के भीतर में मां की तरह वह कहां श्रद्धा भक्ति शरणागति है कि हम जाकर के आज सिंहवाहिनी के पास में जाकर के कहेंगे कि हमको यह बीमार ठीक कर दो या तो फिर यह सिंहवाहिनी की मिट्टी जैसे मां करती थी एक छोटी सी डिब्बे के भीतर में कुछ मिट्टी रख देती थी और जो भी आता था उसको मां वो मिट्टी खिलाती थी तो इतनी शरणागति वगैरह हम में कहां है कि हम जाकर के मां सिंहवाहिनी के पास में जाकर के दुख कष्ट से मुक्ति पाए यह तो शक्य नहीं है किंतु साथ-साथ में ही महाराज जी एक दूसरी बात करते हैं कहते हैं जब देवी शक्ति पृथ्वी पर अवतरण करके ऐसी देवी का जागरण करती है देवी का आवाहन करती है तो वही देवी का आश्रय वही देवी जाग्रता होकर के सभी लोगों के लिए आश्रय समान आश्रय दता हो जाती है अपरे व से महा सौभाग्य अधिकारी होते पारे एक बार माने देवता का जागरण किया देवता का आवाहन किया सभी लोग इस जगत के सभी लोग उस देवता के आश्रय के अधिकारी हो सकते हैं महा सौभाग्य के अधिकारी हो सकते हैं देख यहां पर एक प्रश्न है यह जो देवी शक्ति का आश्रय ग्रहण करके जीवन के दुख कष्ट से मुक्ति पाना इसमें पता है आजकल के जगत में कैसा है वह एक समय था जबकि जीवन की कोई सोरि नहीं थी की कोई गारंटी नहीं थी आज आप बढ़िया हंसी खुशी से घूम फिर रहे हैं और कल पता नहीं क्या हो गया ऐसी भयानक बीमारी ऐसी लग गई जिसका ना ही तो कोई डायग्नोसिस हुआ ना ही कुछ उसका कोई ट्रीटमेंट हुआ और चंद दिनों में चल बसे अभी जैसे कि मां के ही साथ में यह वहां पर क्वाल पाड़ा में मां रह रही थी बहुत बाद के दिनों की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद में ब की स्थापना हो चुकी है बेलूर मठ में राजा महाराज यानी कि स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज प्रेसिडेंट है उस समय की बात है मां का भी प्राय आखिरी समय चल रहा है 187 1970 ना कि 1918 के आसपास का यह समय होगा मां राधु को लेकर के क्वाल पाड़ा में रह रही है उस समय देखा कि नलिनी और माकू कि यह देखिए कि मां अपना पूरा समय जैसे कि राधु के पीछे में ही बिताती है राधु को राधु वैसे प्रेग्नेंट है तो फिर अभी यह माकू भी प्रेग्नेंट है तो नलिनी दी ने देखा नलिनी दीदी ने कि मां अपना समय अपना धन राधू के पीछे तो व्यतीत करती है किंतु माकू को नजरअंदाज करती है या तो इग्नोर करती है तो इस वजह से नलिनी को आ गया गुस्सा और माकू को लेकर के वह चली गई जयराम बाटी अभी यह बात दे कर के मां को बड़ा कष्ट हुआ मां ने कहा कि अपने एक स वरदा महाराज को कहा कि मोस्ट प्रोबेबली वरदा महाराज को ही कि देखो वो जा चली तो गई ही यहां से और फिर ये जो बच्चा था नेड़ा उसको मुझे प्रणाम भी नहीं करवाया य माकू का एक दूसरा भी लड़का था और फिर वह जो चली तो गई दो नलिनी दीदी माकू को लेकर के जयराम बाटी तो चली गई क्वाल पाड़ा से वो बच्चा छोटा बच्चा था उसको लेकर के मां के पास में प्रणाम करवाने के लिए मां का आशीर्वाद लेने के लिए भी नहीं आई तो यह बात से मां को बड़ा कष्ट हुआ और मां ने कहा भी सही पता नहीं अब देखो कि इसके साथ में कुछ अशुभ ना हो जाए और हुआ भी सही मां ने कहा वरदा महाराज को कि तुम जाना प्रतिदिन जयराम बाटी जाना और उनकी खबर लेकर आना देखना उनके साथ में अदर वाइज वो फिर नाराज हो जाएगी यहां से तो वैसे चली ही गई है यह आक्षेप करके कि मां राधु के पीछे ही पूरा समय व्यतीत करती है राधु को ही अटेंशन देती है उसकी पर ध्यान देती है और नलिनी के माखू के ऊपर में नहीं तो माने वर्धा महाराज को कहा जाओ उसके प्रतिदिन जयराम बाटी जाना और उनकी खबर लेकर आना तो ठीक है वरदा महाराज प्रतिदिन जाते थे एक दिन आकर के खबर दिया कि वो जो बच्चा है माको का दूसरा लड़का वो थोड़ा सा बीमार है उसको पता नहीं किस तरह की बीमारी है तो माने इमीडिएट कहा कि ये कुछ डॉक्टर को लेकर के जयराम बाटी जाओ और उनकी ट्रीटमेंट कराओ उसकी तो इमीडिएट सब डॉक्टर की व्यवस्था हुई वह जो वहां पास में ही जो एक डॉक्टर महाराज थे वह खुद वहां पे गए और जाकर के उनकी और जाकर के ही देखा कि अरे यह बच्चे को तो माराम रोग है बड़ा ही भयानक रोग है डिप्लिया ना कि ऐसा कुछ नाम दिया यह रोग तो बड़ा ही जानलेवा है इसकी ट्रीटमेंट भी बड़ी आसान नहीं है इसके लिए जो एक इंजेक्शन देना होगा वह कलकत्ता से मंगवाना होगा तो वरदा महाराज ने आके मां को समाचार दिया कि मां व तो लड़का तो बड़ा ही बीमार है और पता नहीं इसके साथ में क्या होगा तो मां ने कहा इमीडिएट कोलकात्ता में शरद महाराज को तार करो टेलीग्राम करो कि वो इंजेक्शन भेज दे उसके अलावा उसके बचने की कोई आशा नहीं है तो टेलीग्राम किया गया टेलीग्राम तो जैसे ही शरद महाराज को टेलीग्राम मिला शरद महाराज ने इमीडिएट वो इंजेक्शन वहां से रवाना कर दिया और इंजेक्शन आ रहा है आ रहा है किंतु आते-आते ही वो बच्चे की मृत्यु हो गई तो जैसे ही बच्चे की मृत्यु का संवाद मां के पास में आया मां बेचारी बड़ी ही दुखित होक के रोने लगी और अभी देखिए कि ये कैसा हो गया मां ने वरदा को पूछा जब वर्धा महाराज ये समाचार लेकर आए कि ये तो बड़ा ही डेंजरस इसको बीमारी लग गई है तो मां ने पूछा कि अरे तुमने इसके बारे में पहले क्यों नहीं बताया तो वरदा महाराज कहते हैं अरे मैं कल गया था तो बढ़िया मजे से खेल रहा था और आज गया तो ऐसी बीमारी हो गई है तो अब मैं मुझे क्या पता कि ये इतनी डेंजरस एक दो दिन में ही बीमारी ऐसी जानलेवा हो गई कि बच्चे का वहीं पर मृत्यु हो गया यह तो उस समय का संसार था कब क्या हो जाए गांव में तो कोई डॉक्टर भी नहीं है तो यह तो ठीक है कि मां है तो मां कीय सन्यासी शिष्य सन्यासी संतान डॉक्टर है तो वो खुद आकर के ट्रीटमेंट करने लगे गांव वालों के पास में कहां डॉक्टर मिलने वाला है वोह तो कोई यह जो मां की ये जो सब कहानियां हमने उस दिन सुनी थी ना किसी तांत्रिक को बुलाएंगे किसी ये कोई ऐसा भूत उतार ने वाले को बुलाएंगे ना कि किसी वह जो मां काली का मंत्री वो चूड़ी पहनेंगे ना कि यह मंत्र तंत्र के अलावा कोई मेडिकल ट्रीटमेंट ही गांव में कहां अवेलेबल था उस समय यह तो मां के साथ में यह लोग रहते थे बोलकर के थोड़ी बहुत ट्रीटमेंट मां के परिवार जनों को मिलती थी तो ऐसी परिस्थिति में देखिए कि ईश्वर के ऊपर में अवलंबन रखने के अलावा कोई उपाय ही तो कहां है अपने पास यदि आपके भीतर में यह शरणागति आ जाती है ईश्वर के ऊपर में अवलंबन करने की शक्ति आ जाती है तब कहीं जाकर के यह जो देवी जाग्रता हुई है वो आपकी रक्षा करेगी यह तो एक बात होगी किंतु आज के जमाने में कैसा है पता है आज के जमाने में इतनी सारी गारंटीस है अपने पास में इतने सारे इंश्योरेंस है इतनी सारी क्विकली अवेलेबल मेडिकल ट्रीटमेंट है और हम लोग भी इतने जागृत हो गए कि बीच-बीच में हम लोग अपना ये जो एग्जामिनेशन करवाते हैं वह ब्लड शुगर टेस्ट करवाते हैं कोलेस्ट्रॉल टेस्ट करवाते हैं यह फिर यह ब्लड प्रेशर टेस्ट करवाते हैं और इसी में यदि कुछ पकड़ में आ गया तो पहले से ही ट्रीटमेंट चालू करवा देते हैं जिससे कि लास्ट मिनट पे हार्ट अटैक ना आए लास्ट मिनट पे यह कुछ ना हो जाए और शहर में रहते हैं तो सांप ने काट लिया ना कि यह हो गया वो भी तो अभी कुछ नहीं है पानी से होने वाली बीमारियों के बारे में हम इतने अवेयर है कि ज्यादातर लोग पानी को या तो फिल्टर करके पिएंगे या तो फिर उबाल करके पिएंगे और फाइनेंशियल गारंटी भी इतनी सारी है यदि आप गरीबी में भी जीते हैं तो गवर्नमेंट की इतनी सारी स्कीम है कि कहीं ना कहीं से कुछ ना कुछ सहाय तो आपको मिल ही जाती है और जो लोग संगति संपन्न है थोड़े से भी जिनके पास में फाइनेंशियल सिक्योरिटी है उन लोगों ने ये इंश्योरेंस है वगैरह इस तरह से करवा के रखा है कि कोई बहुत बड़ी क्राइसिस के भीतर में हम न फस जाए तो यह जो हम गारंटी से एक तरह की सिक्योरिटी से घिरे हुए हैं यह बहुत अच्छा है वेरी गुड अदर वाइज जीवन का क्या कुछ है कुछ ठिकाना नहीं आज है कल नहीं है आज हमारे प्रियजनों के साथ में रह रहे हैं कल किसी प्रियजन का मृत्यु हुआ और हम भग्न हृदय हो गए इस तरह का शौक लगा कि उसमें से हम निकल ही ना पाए जैसे कि चंद्रा मणि देवी जिस घर में वो उनके भतीजे अक्षय का मृत्यु हुआ उस कमरे में रहना उनको अभी नहीं पसंद था व रह नहीं पाती थी और इसीलिए मथुर बाबू की कुठी में जो रहती थी वहां से निकल कर के गंगा के किनारे नबत में रहने के लिए चली आई यह असर है यह भयावह असर है अपने प्रियजन की मृत्यु को देख कर के बड़े ही ज्यादातर लोगों के ऊपर में बड़ा ही भयानक इसका असर होता है तो आजकल हम इतनी सिक्योरिटी से घिरे हुए हैं मेडिकल टमेंट है फाइनेंशियल सिक्योरिटी से वगैरह से कि जिससे कि हम लोग यह सब शोक जो है जीवन के उससे बच जाए किंतु इसका एक साइड इफेक्ट क्या है कि ईश्वर के ऊपर में जो शरणागति थी कि मैं बीमार होऊंगा तो ईश्वर ही एक सहाय है जैसे कि मां अपने पास में एक डिब्बी के भीतर में एक छोटे सी व इसके भीतर में वो सिंहवाहिनी की मिट्टी भर कर के रखती थी किसी को को वहां पर जाएगी उद्बोधन में किसी को कुछ भी बीमारी है तो मां कहेगी अच्छा चलो ठीक है बेटा यह थोड़ी सी सिंहवाहिनी की मिट्टी खा लो अभी कोलकात्ता के लोग थोड़े से सोफिस्टिकेटेड थे मन में शायद हंसते भी होंगे कि मां ये सब क्या मिट्टी खिलाती है मिट्टी के भीतर में पता नहीं कितने बैक्टीरिया कितने वायरस होंगे वो कि भीतर में जाएंगे तो और बड़ा कुछ नया तूफान खड़ा करेंगे किसको पता किंतु देखिए कि उस समय का समय ही ऐसा था कि ईश्वर के ऊपर में शरणागति रखे बिना आपके पास में ऐसा कोई चारा ही नहीं था आज जिस तरह की सिक्योरिटी में रह रहे हैं उस सिक्योरिटी में रह कर के ईश्वर के ऊपर में शरणागत होना यह थोड़ा सा दुष्कर है यानी कि सिक्योरिटी के बेनिफिट्स भी है और एक तरह से देखा जाए तो शरणागति थोड़ी सी कठिन भी हो जाती है यदि कोई हमारे पास में आकर के ऐसी बेतू की बात करेंगे उस समय हम लोग बड़े ही सिंसियर ले लेते थे क्योंकि ऐसी बातें सुनने के अलावा और कोई चारा ही तो नहीं था जैसे ज्ञान महाराज की बात मैंने पहले भी एक बार कही थी कि एक बेलूर मठ में एक सन्यासी बीमार हो गए तो स्वामी जी ने कहा जाओ जाकर के ठाकुर का चरणामृत उसको खिलाओ ज्ञान महाराज बोल करर के एकते इनको बोला तो स्वामी जी की जगत विख्यात स्वामी जी जो कि साइंस टेक्नोलॉजी के साथ में वो वेदांत का वो मिश्रण करते हैं इस तरह के स्वामी जी कहां कॉस्मोलॉजी और बायोलॉजी उससे बातें करेंगे और यहां कहेंगे कि बीमार हो गया है तो इसको चरणामृत खिलाओ ये कैसी बेत की बात तो स्वामी जी की बात सुनकर करके उन्होंने हंस दिया ज्ञान महाराज ने कटाक्ष पूर्वक स्वामी जी एकदम समझ गए कि इसके मन में क्या है स्वामी जी ने कहा कि देखो यदि तुम्हारे मन में श्रद्धा नहीं है तो तुम चरणामृत खिलाने से कोई लाभ नहीं होगा जाओ तुम जाओ मैं ही अपने हाथों से चरणामृत लेकर आता हूं और इसको खिलाता हूं तो यह श्रद्धा होनी ये मॉडर्निटी के साथ में इस तरह की श्रद्धा यह किस तरह से हम लोग कंबाइन करेंगे यह श्रद्धा है चलो मॉडर्निटी के साथ में ईश्वर है यह श्रद्धा हमको है और हमारा जो इस जगत के परे का जो जगत है आध्यात्मिक जगत उसमें यदि हमको कुछ प्राप्त होना होगा तो ईश्वर के प्रति शरणागति रखनी होगी या तो फिर जिस तरह की फिलोसोफी को हम फॉलो करते हैं यदि अदित फिलोसोफी फॉलो करते हैं तो हमारे भीतर में जो आत्मन है उसके प्रति निष्ठा रखनी होगी यह जो इंद्रिय जन्य इंद्रिय गम्य जो जगत है उसका त्याग करना होगा मन को एकाग्र करना होगा हृदय के भीतर में जो आत्मन विराजित है उसके ऊपर में ध्यान करना होगा तो जो भी हमारी श्रद्धा हो यदि द्वैत में विश्वास करते हैं तो ईश्वर पर श्रद्धा और यदि अद्वैत पर विश्वास करते हैं तो जगत के इंद्रिय जन्य सुख का त्याग और आत्मन चिंता आत्म चिंता आत्म निष्ठा तो यह दो रास्ते यह तो हम समझ पाएंगे कि यह तो है किंतु यह जो है कि मेडिकल जद ट्रीटमेंट के लिए जगत सिंह वाहिनी की मिट्टी खाना यह सब यह सब आज के जगत में स्वीकार करना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है आजकल ऐसा करेंगे हम सभी लोग कि मान लीजिए यदि मां के ऊपर में विश्वास है भी सही तो हम क्या करेंगे बुखार हो गया कुछ भी हो गया एक बार तो मेडिकल ट्रीटमेंट प्रोफेशनल को देक के प्रॉपर डॉक्टर को क्वालिफाइड डॉक्टर को दिखा करके मेडिकल ट्रीटमेंट तो लेंगे ही साथ में हो सकता है कि सिंहवाहिनी की मिट्टी खाए किंतु सिर्फ सिंहवाहिनी की मिट्टी के ऊपर में आज रख कर के ट्रीटमेंट ना करें ऐसा आज के समय में शायद नहीं होगा और यहीं पर अपनी श्रद्धा का टेस्ट है एक तरह से ये जो सब मां के जीवन की घटनाए है ना ये हमको लगता है कभी-कभी मैं खुद इस तरह से सोचता था कि अच्छा ठीक है वो तो एक उस समय की बात थी कि जबकि मेडिकल ट्रीटमेंट इजली अवेलेबल नहीं थी मैं खुद मैं रांची में हमारा ट्राइबल डेवलपमेंट का प्रकल्प है वहां पर मैं काम करता था तो वहां पर हमको एक बार अभी गवर्नमेंट क्या गवर्नमेंट को भी पता है है कि उनका खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर और इंस्टीट्यूशनल डेवलप वो फाउंडेशन तो है नहीं जमीन के ऊपर में ग्रास रूट लेवल पे तो कुछ भी करना है तो रामकृष्ण मिशन का सहारा लो तो उस समय गवर्नमेंट का एक प्रोजेक्ट था कि कोल्ड चेन बनाना कोल्ड चेन क्या है कि बच्चा जब जन्म लेता है तो उसको कुछ ना कुछ वैक्सीन देनी पड़ती है अभी यह वैक्सीन होती है उसको फ्रीजर में रखनी पड़ती है अभी गांव के लेवल पर ना ही बिजली है ना ही आपके पास में फ्रीजर है तो फिर आप वैक्सीन को ठंडी कैसे रखेंगे तो कोल्ड चेन डेवलप किया है यानी कि यह गवर्नमेंट की ये जो डिस्ट्रिक्ट लेवल फैसिलिटी है वहां से गाड़ी निकलेगी उनके पास में वो जो पोर्टेबल फ्रीजर होते हैं उसमें वैक्सीन रहेगी फिर यह गाड़ी गांव-गांव जाएगी और यह जो पोर्टेबल फ्रीजर उसमें कुछ तीन-चार घंटा कुछ ठंडा रहता है तो विदन थ्री फोर आवर्स आपको वो वैक्सीन दे देनी होती है तो ये गाड़ियों का मैनेजमेंट करने को हमको बोला था और मैं यह सब कर रहा था कि यह कौन सी गाड़ी का रूट कहां से कहां रखना है चार-पांच गांव तो एक गाड़ी को कवर करना होगा तो विद इन थ्री फोर आवर्स जो कोल्ड स्टोरेज का जो टाइम पीरियड है विदन दिस थ्री फोर आवर्स वो वैक्सीन वहां पे पहुंच जाए और बच्चों को पहले से ही लाइन लगा कर के खड़ा करना है उनकी मां को क्योंकि बच्चे तो छोटे होते हैं तो वहीं पे पहले से ही लाइन में खड़े करने हैं और यह वैक्सीन उनको टाइम टू टाइम मिल जाए तो इसको गवर्नमेंट ने कोल्ड चेन प्रोजेक्ट कहा था और मैं यह सब मैनेज करता था हम लोगों ने अपनी पूरी शक्ति डाल दी थी कि बिल्कुल इंटीरियर विलेज में जाए यह गाड़ी और ये फ्रीजर में से वैक्सीन लेकर बच्चे को रक्षा करें क्योंकि ये जो चाइल्ड मोर्टालिटी या तो इंफें मोर्टालिटी रेट वहां ट्राइबल में बहुत ज्यादा था और इसको कैसे भी करके मैनेज करना था तो मैंने दो-तीन साल तक यह सब प्रोजेक्ट मैनेज किए थे मुझे पता है कि गांव में जब बच्चा बीमार होता है उसके पास में कोई आशा नहीं है वो प्राइमरी हेल्थ सेंटर जो सबके पास का वो प्राइमरी हेल्थ सेंटर है वहां पर कुछ हेल्थ नाम का कुछ नहीं है ना ही वह हेल्थ प्रोफेशनल होते हैं ना ही मेडिसिन होती है झूठ मूठ का एक बिल्डिंग बना के रखा है खैर अभी तो बहुत कुछ डेवलपमेंट हो गया है मैं यह सब बता रहा हूं 2008 2009 सबकी यह सबकी बातें हैं तो अभी देखिए कि यह सब मैंने नजरों से देखा हुआ है कि गांव में बीमार होने से आपकी क्या परिस्थिति होती है तो यह है उस समय यह जो मैं पहली पहली बार मां को पड़ता था ना तो मैंने सोचा कि यह जो अपना इतिहास है ना भारत का उसको दो हिस्से में बांट दो एक है कि एक यह जगत यह भारत है पुराना भारत जबकि मेडिकल ट्रीटमेंट अवेलेबल नहीं थी और सिंहवाहिनी की मिट्टी के अलावा कोई आसरा नहीं था और यह नया भारत है जबकि मेडिकल ट्रीटमेंट यहां तक कि इवन रूरल लेवल प ये कोल्ड चेन वगैरह जो गवर्नमेंट के प्रोजेक्ट रामकृष्ण मिशन जैसे एनजीओ के साथ में करके कोलबो करके इजली अवेलेबल कराए जाते हैं तो आज का यह मॉडर्न नया भारत है नए भारत में यह सिंहवाहिनी की मिट्टी का ऐसा कोई खास प्रयोजन नहीं है आप वैक्सीन भी लीजिए और साथ में यदि मिट्टी खाते हैं दैट इज वन थिंग किंतु सिर्फ यह मिट्टी के भरोसे आपको जीना जरूरी नहीं है ऐसा मेरा बहुत समय तक मानना था अभी भी है अप टू एन एक्सटेंट किंतु पता है ठाकुर ने एक दूसरी भी बात हमको कही है कि यदि ठीक ठीक आपको साधक होना है तो खजूर के पेड़ से वो जो बंगाल में तो खजूर के पेड़ होते हैं बड़े लंबे होते हैं वो और तो ठाकुर कहते हैं कि खजूर के पेड़ से जो दोनों हाथ पैर छोड़ कर के जंप लगा सके वही ठीक-ठीक साधु हो सकता है ठीक-ठीक साधक हो सकता है यह कहने का तात्पर्य क्या है जद एक बहुत बड़े पेड़ के ऊपर में से आप जंप लगाएंगे तो होना क्या है जमीन पर गिरेंगे हाथ पैर टूटेंगे तो इस तरह से तो कोई जंप नहीं लगाएगा ये जो लोग खजूर के खजूर के पेड़ के ऊपर में यह खजूर तोड़ने के लिए यह ताड़ी का रस वगैरह जो निकालने के लिए जो चढ़ते हैं वे लोग क्या करते हैं पता है अपनी कमर के ऊपर में रस्सी बांध देते हैं फिर यह रस्सी के सहारे इससे फायदा क्या होता है आप आप ऊपर जब चढ़ आपके हाथ या पैर फिसल गए तो रस्सी के सहारे से आप जमीन पे गिरने से बच जाएंगे आप कमर में लगेगा बड़ा जोर से लगेगा किंतु एटलीस्ट प्राण की रक्षा हो जाएगी तो किंतु यदि आप रस्सी का सहारा छोड़ कर के ऊपर में से जंप लगाए यह आशा रख कर के कि रास्ते में आकर के आध रास्ते में भगवान आपको बचा लेंगे यह श्रद्धा के साथ में तो आप सही सही साधक है यह घर त्याग करना साधु को क्यों कहा जाता है कि घर छोड़ दो आज तो ऐसा उल्टा हो गया है कि अपने घर में जितना सेफ्टी सिक्योरिटी है उससे 10 गुना ज्यादा सिक्योरिटी अपने रामकृष्ण मिशन में है किंतु तो फिर भी पहले के जमाने में ऐसा था आपने घर छोड़ दिया अर्थात कि सब तरह की सेफ्टी सिक्योरिटी छोड़ दी कहां वन में जंगल में जा रहे हैं कहीं शेर आ कर के काट दिया कहीं साप आ कर के काट दिया पता नहीं आपके साथ में क्या होगा अर्थात कि एक संपूर्ण रूप से अनसर्टेन जीवन में आप कदम रखते हैं सिर्फ एक ईश्वर के भरोसे पे यह जो स्वामी जी की ये जो प्रव्रज्या है परिव्राजक जीवन उनका कब एक स्वामी जी बता रहे थे कि कभी वो जो राजा के महल में सोते हैं तो कभी गरीब की कुटिया में तो कभी वन में वन में खाना भी नहीं मिलता कभी शेर सामने आ जाता है हो सकता है कि खुद शेर का खोराक हो जाए तो यह जो संपूर्ण रूप से ईश्वर के ऊपर में निर्भर करके रहना यह निर्भरता शरणागति यह हमको यह सब सिखाता है कि औषध जानवी तोयं वैद्यो नारायणोपनिषद यह एक जीवन संपूर्ण रूप से निर्भर होकर के रहना संपूर्ण रूप से शरणागत होकर के रहना यदि बीमार भी हो जाते हैं तो ईश्वर ही हमारे सहाय करता है किसी और जागतिक जगत में किसी तरह की सहाय ना लेना यह साधना का एडवांस स्टेप है और यह स्टेप आज भी इतना वैलिड है जितना वैलिड वो उस समय में था ऐसा नहीं सोचना है कि मां ने जो सिंहवाहिनी के सामने धरना दिया वो उस समय के लिए था जबकि ना ही प्राइमरी हेल्थ सेंटर थे ना ही यह वैक्सीन रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज थे ना ही यह मेडिकल ट्रीटमेंट इजली अवेलेबल थी तो उस समय के लिए ठीक है चलो सिंहवाहिनी की मिट्टी खा कर के हमने अपने को बचा लिया यह बात आज के युग में भी इतनी ही आवश्यक है इतनी ही सही है यदि हम साधना के उस स्टेच पर पहुंच जाए कि हम संपूर्ण रूप से ठाकुर के ऊपर निर्भर है संपूर्ण रूप से से ईश्वर के ऊपर में निर्भर है आप जद कहेंगे कि अच्छा यह तो थिरी हो गई प्रैक्टिस में किसको देखा है ऐसा करते हुए तो प्रैक्टिस में मैं तो नहीं करूंगा भाई इस तरह से बीमार हो जाऊंगा और सिंह भाई की मिट्टी खा कर के मैं जिऊंगा बाकी सब ठाकुर के भरोसे कि भगवान अभी तुम ही रक्षा करता हो तुम ही हो वैद्य तुम ही हो नारायण हरि तो तुम ही बचाओगे ऐसा मेरे से तो होने वाला नहीं क्योंकि वो शरणागति की निर्भरता की उस कक्षा प मैं नहीं पहुंचा किंतु वो भी उस लेवल पर हमको पहुंचना होगा देखिए ईश्वर प्राप्ति का रास्ता कितना कठिन है आज जब हम ठाकुर की साधना हों के बारे में सुनते हैं तो हमको लगता है कि अच्छा ठीक है ठाकुर ने वो सब साधनाएं कर ली और हम हमारे लिए कर ली हमको यह सब करने की जरूरत नहीं है यहां पे कहा ना कि गंभीरानंद जी महाराज ने मां ने देवी को जाग्रता किया अभी ये जाग्रता देवी के आशीर्वाद सभी लोग प्राप्त करें ठाकुर ने कहा ना कि एक आदमी जद यह धुनि जलाता है तो इस धुनि के ताप से सभी को शेक मिलता है सभी को यह गर्मी मिलती है तो हमको भी ठाकुर ने अपने बालों से यह रसिक जो स्वीपर था टॉयलेट क्लीन करता था उसका खुद का टॉयलेट ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन कर लिया तो हमको वो करने की जरूरत नहीं है हमको यह सब हम लोग बड़े डिग्निफाइड जीवन जी सकते हैं हमको यह सब अपने को अपने भीतर का जो ग है संपूर्ण रूप से खत्म करने के लिए इस तरह का कुछ जरूरत नहीं है किंतु मुझे लगता है कि ऐसा कहने से या ऐसा बोलकर के ऐसा सोचने से ना हम लोग एक स्टेप हमेशा पीछे रह जाएंगे आदर्श यह होगा कि ठाकुर और माने जो साधनाएं कर ली उस साधना उस पदे उस फुट स्टेप प हम चले उन्हीं के पद चिन्हों पर हम चले जिससे कि हमको नया कुछ नहीं करना पड़ेगा किंतु मुझे ऐसा लगता है कि यह इस तरह का जो थिंकिंग है क्योंकि मैं अपने को तो एनालाइज कर रहा हूं मैं बाकी सबको भी तो देख रहा हूं साधकों को देख रहा हूं मुझे लगता है कि इस तरह का सोच लेना कि ठाकुरों माने सब कुछ कर दिया है हमको वह सब करने की जरूरत नहीं इसमें कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ गलती रह जाती है इस थिंकिंग में यदि हम वो ना करें मान लीजिए तो फिर हमको ठाकुर और मां के ऊपर में भरोसा रखना पड़ेगा उनके ऊपर में निर्भर रहना पड़ेगा उनके ऊपर में शरणागति हमारी आनी पड़ेगी तो वो शरणागति का स्वरूप क्या होगा उस निर्भरता का स्वरूप क्या होगा क्या वो हमको पता है हां हालांकि हमने ठाकुर और मां के बाद में जो नेक्स्ट जनरेशन है उनको देखा है हरि महाराज को देखा है सुबोध महाराज को देखा है राम कृष्णानंद जी महाराज को देखा है शरद महाराज को देखा है और उनके बाद में भी ये भूतेशानंद जी महाराज को देखा है फिर यह रंगनाथ आनंद जी महाराज को देखा है यती स्वरानंद जी को देखा है तपस्यानंद जी को देखा है कि उन्होंने ठाकुर और मां की तरह इतनी भयावह साधना तो नहीं की बीमार हो गए तो फिर ईश्वर के ही ऊपर में वह भरोसा रख कर के जिए ऐसा तो उन्होंने नहीं किया किंतु जीवन के प्रति पद शेप उन्होंने ठाकुर और मां के ऊपर में भरोसा करके शरणागत हो करर के उन्होंने अपना जीवन बिताया है तो ये जो सेकेंडरी लेवल की जो साधना है वो हम को करनी पड़ेगी किंतु साथ-साथ में ही कि ये जो फर्स्ट साधना ठाकुर और मां जो करके गए उसको भी हमको भूलना नहीं है मुझे नहीं लगता ऐसा कि हम लोग उस साधना से बच पाएंगे प्राइमरी लेवल की साधना जो कि ठाकुर और मां करके गए हैं हमको मुझे ऐसा लग रहा है कि साधना का एक स्टेज ऐसा आएगा अभी हम जिस स्टेज में है उस स्टेज में तपस्यानंद जी जो करके गए यती स्वरानंद जी जो करके गए आजकल में में बेलूरमठ में जो महत्व सन्यासी है हमारे उनको जो देख रहा हूं वह जिस तरह से जी रहे हैं आज के लिए एज ऑफ टुडे मेरे लिए वह सब साधनाएं ठीक है उसी तरह की साधना मुझे करनी चाहिए किंतु यदि मैं अपने आध्यात्मिक विकास में एक ऐश मुकाम पे पहुंच जाऊं एक ऐसी मंजिल प पहुंच जाऊं कि इसके बाद की मंजिल जो है वह आंख बंद करके कुएं के भीतर में आंख बंद करके किसी पहाड़ में से पहाड़ की टोच के ऊपर में से किसी खाई में जंप लगाने के बराबर होगी उस मंजिल पर शायद मैं पहुंच और उस समय भगवान श्री रामकृष्ण मां शारदा मां काली मां सिंहवाहिनी के ऊपर में संपूर्ण रूप से निर्भर होकर के मुझे वह जंप लगाना पड़ेगा मुझे वह फाइनल लिप अल्टीमेट लिप मुझे वह लेना पड़ेगा जब उस लिप में उस आखिरी जंप में मैं सक्सेस हो जाऊंगा तब मुझे कहीं लगता है कि मेरा जीवन सार्थक होगा जब तक मैं वो ना कर पाऊं तब तक मुझे नहीं लगता कि मेरा साधक जीवन सफल होगा मुझे ऐसा लगता है कि ये जितने भी महत सन्यासियों को हम देखते हैं उनकी आंतर यात्रा के बारे में हम इतना ठीक-ठीक नहीं जानते आज यदि हम पूछेंगे कि यतीश वरान जी का कैसा रहा जीवन तो हां वो इस सेंटर के हेड थे उस सेंटर के हेड थे फिर उन्होंने यह किताब लिखी और यह किताब लिखी और यह प्रवचन दिए यह भक्तों को ऐसा का ये ये एक्टिविटीज की ये तो बाक्य रूप से तो हमको पता चल जाता है भीतर में उन्होंने किस तरह की साधना की होगी भीतर में किस तरह के ये जो भरोसे के लिप भरोसे के ये जो उन्होंने दोनों हाथ छोड़ कर के खजूर के पेड़ से जंप लगाया होगा वो तो हमको नहीं पता है वह पता करना और यदि वह पता ना भी कर पाए तो यह भरोसा रखना कि य जद साधना के उच्च सोपान है वहां पर जाने के पहले या तो वहां पर जाने के समय ऐसा आंख बंद करके ठाकुर के ऊपर में भरोसा करके हमको जंप लगाना होगा आजकल मैं जो कुछ देखता हूं कभी-कभी अपनी नजरों के सामने हम लोग सब तरह से अपने को सेफ रखना चाहते हैं यदि आप किसी आश्रम की मुलाकात के लिए भी जाएंगे ना तो पहले यह सोचेंगे कि मैं वहां पर साधु जो लोग रहते हैं उनको मैं क्या गिफ्ट ले देने दूंगा जब भी जर्नी करेंगे बेलूर मट जाएंगे कहां पर भी जाएंगे तो सब बड़े-बड़े बॉक्स ले जाएंगे उनको गिफ्ट देने के लिए वह नाश्ते के वो आम के कुछ ना कुछ वो बॉक्स लेकर जाएंगे वो गिफ्ट देने के लिए जाएंगे और फिर वहां जाकर के ठाकुर को प्रणाम हुआ तो हुआ वहां पर वोह गंगा का किनारा है वहां पर जितने समाधि मंदिर है मां का समाधि मंदिर है राजा महाराज का समाधि मंदिर है वहां पर बैठ के गंगा के सामने देख कर के मां गंगा को प्रार्थना की वो सब हुआ तो हुआ नहीं हुआ तो नहीं हुआ किंतु मेरी वो पहचान वाले जितने साधु सन्यासी वहां पर रहते हैं सबको मिलकर प्रणाम किया और उनको कुछ ना कुछ गिफ्ट दी कि महाराज मैं आपके लिए यह लाया हूं यह भरोसे से कि हम जब नेक्स्ट टाइम आए तो हमको प्रॉपर वेलकम यहां पे मिले तो ये मैंने ये किस तरह का थिंकिंग है मैंने कुछ कुछ लोगों को देखा है कि किसी आश्रम में जाएंगे वो रहने के लिए मुलाकात करने के लिए किसी भी काम के लिए सबसे पहले यह देखेंगे कि वहां पर मेरी किसके साथ में पहचान है और उनको मैं किस तरह से क्या गिफ्ट दे सकता हूं जिससे कि मुझ मुझे एक प्रॉपर वेलकम नेक्स्ट टाइम मिला रहा है अब ऐसा चलिए हम लोग जगत में रहते हैं तो इस तरह का एक तरह का थिंकिंग एक तरह से कोई गलत नहीं है ये अखंडानंद जी का भी एक बड़ा सुंदर एग्जांपल है कि ठाकुर की तिथि पूजा थी और वहां से वो जो अखंडानंद जी आए वो और किसी ने कहा कि स्वामी जी अपने कमरे में बैठे थे किसी ने कहा कि अखंडानंद जी कितना एक किलो ना कि कितना बहुत बड़ा एक पांतरा लेकर के आए पांतो या यानी किय गुलाब जामुन जैसा एक मिठाई बहुत बड़ा एक मिठाई लेकर के आए बड़ी बहुत बड़ी साइज का तो स्वामी जी खुद अपने कमरे में से बाहर आ गए देखा कि अखंडानंद जी सही में वो इतना बड़ा एक पांतरा अर्थात ये गुलाब जाबू इतना बड़ा एक लेकर के आए हैं उन्होंने पूरी रात एक किसी वो ये जो मिठाई वाले की दुकान में बिताई थी और अपने स्पेशली इतना बड़ा मिठाई उन्होंने वो बनवाया था उसके पास में और उसको लेकर के आए थे तो सब लोग इकट्ठा हो गए उसको देखने के लिए फिर ठाकुर को उसको ऑफर किया गया फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके सभी ने खाए तो जब आप किसी आश्रम में जाते हैं साधुओं को मिलने के लिए जाते हैं ठाकुर को प्रणाम करने के लिए जाते हैं तो मिठाई लेकर के जाएंगे वगैरह जो ऑफर करने के लिए जाएंगे दैट इज वेरी नॉर्मल किंतु उसके पीछे का कैलकुलेशन यही है कि मैं ठाकुर को ऑफर कर रहा हूं यदि ये कैलकुलेशन रहेगा कि मैं वहां पे जो लोग रह रहे हैं उनको मैं खुश रखूंगा जिससे कि उससे मेरा एक सोशल नेटवर्क बना रहे है तो यह किस टाइप का ये थिंकिंग है जगत में भी यदि हम रहे किसी के साथ में रिलेशन रखेंगे यह सोच कर के कि मैं यदि उसको हेल्प कर रहा हूं तो सामने वह मुझे हेल्प करेगा मेरी जब एक जरूरत आन पड़ेगी तब तो यदि आप उनको इस यह सोच कर के हेल्प करते हैं कि नहीं वह मेरा मित्र है मेरी उसके ऊपर में सहानुभूति है उसको आवश्यक है इसलिए मैं हेल्प करता हूं यह सोच मैं यह कभी नहीं सोचता कि रिटर्न में मुझे कभी भी कुछ भी मिले तो वोह सही सही हेल्प हुई यदि आपने यह कैलकुलेशन करके उसको हेल्प करना शुरू किया कि इससे मुझे भविष्य में बेनिफिट मिलने वाला है इससे मुझे भविष्य में कुछ ना कुछ मिलने वाला है ऐसा सोच कर कर आपने किसी को हेल्प किया तो किस तरह से आप सोचना शुरू कर देंगे पता है कि इससे मुझे कुछ लाभ होने वाला है इसको मैं हेल्प करूं इससे मुझे कुछ नहीं मिलने वाला है उसको हेल्प करने की जरूरत नहीं ऐसा करके जगत को आप बांटना शुरू कर देंगे आप कहते हैं ना कि मां का प्रेम मां शारदा का प्रेम हमारे पर जिस तरह से है व तो मेरी मां का भी प्रेम मेरे पर उसी तरह का है तो इन दोनों प्रेम में डिफरेंस क्या है डिफरेंस यही है कि मेरी मां सिर्फ मुझे ही प्रेम करती है और किसी के बच्चों को इतना प्रेम करने को नहीं जाएगी सहानुभूति होगी किंतु सही सही प्रेम तो सिर्फ मेरे पर होगा क्योंकि वह मेरी मां है जबकि मां शारदा का है कि जगत में जितने भी संतान है सबके ऊपर में इक्वल प्रेम है बिना किसी यह आशा रखे कि यह मेरा डॉक्टर संतान है यह वकील संतान है भविष्य में मैं बीमार होंगी तो यह मुझे हेल्प करेगा ऐसा नहीं जो गरीब संतान है जो पद दलित संतान है जो मूर्ख संतान है जो चंडाल संतान है सभी इक्वल संतान है यह है मां का प्रेम तो जद सही सही श्रद्धा भक्ति भी हो ना तो ऐसी हो कि मैं ठाकुर को गिफ्ट ऑफर करने के लिए गिफ्ट तो नहीं कहेंगे ठाकुर को ऑफर करना गिफ्ट नहीं कहेंगे ऑफि कहेंगे प्रणाली कहेंगे मैं ठाकुर को यह ऑफर कर रहा हूं इसमें से फिर ठाकुर के जितने भी संतान है वो सब उसमें से ग्रहण करें ये हो गई सही सही आपकी एक ऑफि यदि आप यह सोच कर के जाते हैं कि ना इससे मुझे बेनिफिट मिलने वाला है इससे नहीं मिलने वाला तो मैं इसको पर्सनली कुछ दूंगा उसको नहीं दूंगा तो ये किस तरह का आपका ये ऑफि हो गया तो ये जो ईश्वर के ऊपर में शरणागत होना ईश्वर के ऊपर में निर्भर होना यह जिस तरह से यह सिंहवाहिनी के उद्देश्य से सिंहवाहिनी के प्रसंग से हमको जानने को मिलता है वो उस युग के लिए भी था और इस युग के लिए भी है आज का युग में इस तरह का हमको यह शरणागति या इस तरह की निर्भरता हमको हमारे जो साधु है सेकंड जनरेशन थर्ड जनरेशन रंगनाथ आनंद जी महाराज आत्मस्थानंद जी महाराज भूतेशानंद जी महाराज इनके जीवन में शायद हमको इस तरह के प्रसंग बाहर से ना दिखते हो भीतर भीतर में किस तरह की निर्भरता उनके भीतर में होंगी उनके मन में होंगी ट वी डू नॉट नो और उस तरह की निर्भरता जब तक हम कल्ट वेट नहीं करेंगे तब तक हम साधना के उच्च आयाम को सर नहीं कर पाएंगे हम लोग एक नोविस के लेवल पे एक प्रारंभ के लेवल पर ही रहेंगे तो आज इत कल फिर से मिता ओम शांति शांति शांति हरि ओ तसत श्री राम कृष्णा अर्पण
Questions & Answers
मस्तु देखिए सबसे बड़े एग्जांपल हमारे सामने ठाकुर और मां स्वयं है निर्भरता की य जो यात्रा है वह यात्रा कैसी चित्र विचित्र रास्तों से गुजरती है यही मां जो सिंहवाहिनी के ऊपर में पूरा भरोसा करके हत्या देकर के धरना देकर के बैठी है और यही मां राधु जब बीमार है तो जो आता है जो उपाय बताता है उसी उपाय के ऊपर में पूरा भरोसा करके रहती है जैसे कि उस उपाय सेही उनका सब हो जाएगा कोई कहता है कि वो प्रेग्नेंट है फिर भी उसके सर पर बर्फ लगाओ तो बर्फ लगाना शुरू कर देती है कोई कहती है आर के कि वो जो मां काली का वो जो मंत्री वो चूड़ी पहनाओ तो वो पहना देती है कोई कहता है कि आकर के वो भूत उतारना है वो तांत्रिक को बुलाओ तो तांत्रिक के सामने ऐसी दो हाथ जोड़ कर के खड़ी हो जाती है रोते-रोते अपनी कहानी वो वर्णन करती है जैसे कि वो तांत्रिक के अलावा और कोई उनका भरोसा ही ना हो तब यही मां सिंहवाहिनी के सामने धरना देती है और यही मां उस पागल तांत्रिक धूर्त महामूर्ख उस उसके सामने हाथ जोड़ कर के रोती है कि आपके अलावा मेरी बच्ची का कोई रक्षा करता नहीं है तो यह क्या है पता है निर्भरता की यात्रा कैसी है ठाकुर का खुद का देखिए अब वो ठाकुर को गले में कैंसर हो गया है अब जो कोई भी आएगा ठाकुर उसको पूछते हैं अरे बाबा देखो तो इसके मेरे गले में ऐसा हो गया क्या करूं तो सुबोधन सुबोध महाराज वो आ कर के कहते हैं कि महाशय हम लोगों के गले में व्यथा होती है हम लोग चाय पीते हैं इससे ठीक हो जाता है तो ठाकुर बुलाते हैं राखल महाराज को अरे राखल देखो देखो ये कहता है चाय पीना तो राजा महाराज तो बड़े नाराज हो जाते हैं उसको क्या सब मूर्ख जैसी बातें सजेस्ट करा तो राजा महाराज कहते हैं कि अरे चाय तो गर्म होती है वैसे ही तो आपको गले में दर्द हो रहा है ऊपर से गर्म चाय पिएंगे तो और ज्यादा बढ़ जाएगा तो ठाकुर कहते हैं अच्छा अच्छा बिल्कुल बच्चे की तरह अच्छा ठीक है तो तुम कहते हो तो चाय नहीं पीता हूं फिर किंतु देखिए सुबोध को सुबोध महाराज को बुरा ना लगे यह जो सब स्कूल के बच्चे थे ना तो उनको बुरा ना लगे ठाकुर बड़े ही मना करके उसको कहते हैं देखो बेटा तो मैं तो चाय पिऊंगा तो वैसे ही तो गले में दर्द हो रहा है गर्म चाय पीने से शायद दर्द और बढ़ जाएगा इसलिए चाय नहीं पीना होगा तो देखिए कि दोनों है इनके भीतर में एक तो एक निर्भरता की उनकी जो यात्रा है वह तो एक इंडिपेंडेंट चलती ही है साथ में जो कुछ भी ट्रीटमेंट इनके सामने आ जाता है यह यह लोग ले लेते हैं ऐसा नहीं है कि यह लोग मॉडर्न ट्रीटमेंट नहीं लेते ठाकुर की कैंसर की ट्रीटमेंट और यह राधू के लिए माने जो कुछ भी किया यह इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण है और कुछ-कुछ मैंने ऐसे व फनी इंसिडेंट भी रास्ते में हमको देखने को मिलते हैं तो मां की आखिरी बीमारी थी और वो डॉक्टर ने कहा था मां को स्ट्रिक्ट डाइट फॉलो करना पड़ेगा और स्ट्रिक्ट डाइट फॉलो नहीं करेगी तो पता नहीं कब क्या हो जाएगा तो ठीक है मां मां को बोला गया अभी डाइट फॉलो करना है तो अभी एक दिन क्या हुआ मां को कुछ चीड़ भाजा ना कि ऐसा कुछ खाने की इच्छा हुई छोला भाजा पता नहीं मैं एजेक्ट भूल गया तो वो खाने की इच्छा हुई अभी वो तो उनके डायट में नहीं आता है तो माने छुपके छुपके अभी तो ये सब तो उन्हीं के संतान है ना उनके ऊपर में भरोसा करके रहते हैं सभी लोग किसी सन्यासी संतान को बोला कि जाओ तो ये मेरे लिए ले आओ और ये क टोरी में छुपके चुपके खा रही है अभी दूसरे किसी ने देख लिया तो जाकर के शरत महाराज को जाकर के बताया कि मां वो चुपके चुपके खा रही है तो शरद महाराज से इतना मोटा हाथी जैसा शरीर धीरे-धीरे करके वो स्टेप्स चढ़ते चढ़ते वो उद्बोधन में तो मां फर्स्ट फ्लोर पे रहती थी राजा शरत महाराज वगैरह ग्राउंड फ्लोर पे उनके सेवक तो ग्राउंड फ्लोर में से फर्स्ट फ्लोर पे आए सीढ़ी चढ़ के बड़ी मेहनत करके और मां के पास में आकर के हाथ जोड़ बैठ बैठे मां के सामने और हाथ जोड़े मां आप आपके पास में कुछ मैं मांगने के लिए आया हूं तो जैसे ही मां ने देखा कि शरत आ रहा है तो कटोरी अपने पीछे में छुपा दी शरत महाराज आए वो जैसे ही शरद महाराज ने कहा मां तुमसे कुछ मांगना है तो मां ने कहा मांगो बेटा मांगो तुमको क्या चाहिए तो शरद महाराज ने कहा वो जो कटोरी आपने पीछे में छुपाई है वो दे दीजिए और मां एकदम बच्चे बच्ची की तरह छोटी बच्ची की तरह नाराज हो कर के अभी बोल दिया है मु से कि जो मांगोगे दे दूंगी वो कटोरी लेके उनको दे दी शरत महाराज ने कटोरी लेकर के चले तो गए किंतु हृदय में जो दुख हुआ कि मां के हाथ से वो छीन लिया है तो अभी वो दुख हमेशा के लिए रह गया है तो मां का देह त्याग हुआ मां की महासमाधि हुई मां की चीता जलाई गई उसके बाद में शरत महाराज ने एक बार राजा महाराज को बुलाया उद्बोधन में और वही चीड़ बाजा ना कि छोले बाजा जो भी वो बना कर के राजा महाराज के हाथ में दिया बोला कि देखो राजा मां के हाथ में से छीन लिया था मैंने अब तुम इसको खाओ तुम खाओगे तो मां खाना होगा ऐसा बोलकर के दो हाथ जोड़ कर के बैठे हैं वो राजा महाराज खा रहे हैं और आंखों में से आंसू निकल रहे हैं कि मां को मैंने फिर से वो खिलाया तो ये जर्नी है निर्भरता की जर्नी कैसी है कि इसमें कोई नियम कानून नहीं है यही मां और यही ठाकुर वो अभी जैसे कि वो महिम चक्रवर्ती जब वो डॉक्टर सरकार ठाकुर के पास में आए हैं तो ये महिम क्या बोल रहा है कि डॉक्टर लोगों का अहंकार बढ़ाने के लिए आपने रोग किया है तो यह बात सुनकर के वो डॉक्टर सरकार नाराज हो गए कि क्या बात कर रहे हैं डॉक्टर लोगों का अहंकार बढ़ाने के लिए क्या बात है वो ज का भयानक रोग है कैंसर है कैंसर ग्रहणी रोग जिसको कि आयुर्वेद में कहते हैं इसकी कोई ट्रीटमेंट नहीं है इजली अवेलेबल मेरा अहंकार बढ़ाना है तो क्या पड़ी है मेरे जैसे लोगों का अहंकार बढ़ाने की ना ये तो विश्व के आप जद इनको अवतार मानते हैं तो मैं तो एक छोटा सा डॉक्टर हूं मेरे लिए उनको क्या कैंसर करने की जरूरत है तो ये है कि कैंसर भी हुआ है लोग मानते हैं कि ना ये तो सब अब गिरीश घोष गिरीश घोष ठाकुर के सामने दो हाथ जोड़ कर के क्या बोलता है अभी मैं आपके भुलाने से भूलूंगा नहीं मुझे पता है कि यह सब आपका नाटक है यह सब आप हमको भुलाने के लिए यह सब कर रहा है कोई कोई लोग यह मानता है कि ठाकुर कैंसर क्यों किए जिससे कि वो कोलकात्ता करके रहे जिससे कि ये ऐसे भक्त जो कि ठाकुर की ट्रीटमेंट ठाकुर की सेवा नहीं कर पाते दक्षिणेश्वर जाकर के उनका सत्संग नहीं कर पाते हैं उन लोगों के लिए एक आसान हो जाएगा कि ये काशीपुर जाकर के ठाकुर का सत्संग करना या उनकी सेवा करना कुछ दिन लोगों की सेवा ग्रहण करेंगे फिर कैंसर ठीक हो जाएगा फिर वह चले जाएंगे तब स्वामी जी क्या कहते हैं नहीं नहीं यह जितने भी त्यागी संतान है सबको इकट्ठा करके कि मुझे नहीं लगता कि ठाकुर की अभी इच्छा है शरीर रखने की तो हम लोगों का यह कर्तव्य है कि घरबार छोड़ कर के यहां पर आकर रहे संपूर्ण रूप से ठाकुर की सेवा में आत्म नियोग करें तो इन लोगों का य त्यागी लड़कों का एक तरह का थिंकिंग था कि पु का देह धारण किया है तो देह की बीमारी भी है देह के धर्म भी है तो देह धर्म अनुसार यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि होने वाली है हमारा कर्तव्य है उनकी सेवा करना और यह जो रामचंद्र दत्त है गिरीश घोष है ये लोग क्या सोचते हैं कि ठाकुर ने बीमारी की है व एक तरह का एक नाटक कर रहा है वो एक लीला कर रहा है हम हमारी सेवा ग्रहण करने के लिए तो कल्पतरु दीन का एक बहुत बड़ा सुंदर एग्जांपल है कि ठाकुर जब सबको स्पर्श करके वो चैतन्य देना शुरू आध्यात्मिक अनुभूति देना शुरू किए यह शरत महाराज वगैरा वहां पर छत के ऊपर में ठाकुर के बिस्तर वगैरह धूप में दे रहे है जिससे कि ठाकुर वापस आएंगे तो आराम से सो पाए उन्होंने यह नहीं सोचा कि यह बिस्तर वगैरह बाद में रखेंगे अभी सबसे पहले जाकर के ठाकुर के पास से आध्यात्मिक अनुभूति ग्रहण करें नहीं ठाकुर बीमार है बीमारी सही है और उसके अनुसार उनकी ट्रीटमेंट होनी चाहिए तो यह दोनों है कि निर्भरता की यात्रा एक है जिसको कि हमको बड़ा ही सीरियस लेना है हम ऐसा यदि मान लेंगे कि नहीं ये ठाकुर मां यह सब कर रहे हैं लीला करने के लिए हमारे जीवन में यह सब आया है जिससे कि हम लोगों को कुछ ना कुछ इस तरह से एक मौका मिले व हैव टू टेक दिस वेरी सीरियसली कि यात्रा है वो है अपनी जगह पे है और यदि बाह्य ट्रीटमेंट आप कराना चाहे करा सकते हैं वो अपनी जगह पे है ये मेरा सोचना है कि ठाकुर और मां को देख कर के आधुनिक युग के ऐसे कोई एग्जांपल शायद मैं नहीं दे पाऊंगा मैं रंगनाथ आनंद जी की बात करूं तो मैं दीक्षा लेने के लिए बेंगलोर गया था अभी बेंगलोर गया था व उस समय का कि उस समय रंगनाथ आनंद जी वहां पर जाने वाले थे बेलगांव मंदिर के उद्घाटन के लिए कंसेक्रेट के लिए किंतु नहीं जा पाया उनकी तबीयत बहुत ही खराब हो गई फिर वो बेंगलोर में उन्होंने बेलूरमठ के बाहर में जो आखिरी दीक्षा दी थी वो बेंगलोर में थी फिर वहां से वह सीधे बेलूरमठ चले गए और फिर शायद बेलूरमठ से ज्यादा कभी निकले नहीं है और कुछ समय के बाद में उनका समाधि हो गई थी महासमाधि हो गई थी तो वो समय जो कि उनका आखिरी आखिरी समय था मैं दीक्षा लेने के लिए गया था और बिकॉज के एक्चुअली क्या था मैं ब्रह्मचारी ऑलरेडी हो चुका था मुझे यह सब नहीं पता मैं ऐसा कोई वॉलंटरी डिवटी कभी नहीं रहा मैं सीधा आ कर के ब्रह्मचारी हो गया हूं बाद में मैंने यह सब राम कृष्ण मिशन क्या है वो सीखा था मैं जब ब्रह्मचारी वो साधु होने के लिए गया टी नगर में महाराज ने पूछा तुम्हारी दीक्षा हुई है मैंने बोला दीक्षा क्या है तो बोला अच्छा ठीक है महाराज जी आए हैं बेंगलर में तुम जाओ दीक्षा लेके आओ तो बिकॉज के मैं ऑलरेडी ब्रह्मचारी के कपड़े में था तो मुझे थोड़ा सा एक एक अपॉर्चुनिटी मिला महाराज का संग करने का वो सेवक महाराज जो थे वो सेक्रेटरी महाराज वो सब समय मुझे साथ-साथ में रखते थे चलो चलो तुम भी साथ में चलो महाराज वकिंग के लिए जा रहे हैं महाराज खाने के लिए बैठे तुम रहो साथ में तो दैट वाज वन ग्रेट अपॉर्चुनिटी इन माय लाइफ दीक्षा लेने भी गया हूं और गुरु के साथ में रहने का मौका भी मिला है तो उस समय मैंने देखा रंग नाथा आनंद जी मुंह से कुछ बोलते नहीं थे उनका वाणी बिल्कुल यह हो गया था उनका बंद हो गई थी उनकी वाणी सेवक लोग ही जो सेवक महाराज वॉकिंग करेंगे ना तो दोनों हाथ उनके वो सेवक लोग उनके पकड़ के रहेंगे और तब वो वकिंग कर पाएंगे मुंह से कुछ बोलेंगे नहीं खाना ये लोग जितना खिलाएंगे उतना ही खा पाएंगे ऐसी परिस्थिति हो गई थी किंतु जब मंत्र दीक्षा देने की शुरुआत की तो महाराज जी वैसे तो एकदम चुपचाप शांत रहते हैं जैसे कि पता नहीं कौन से राज्य में रहते हैं किंतु जैसे ही मंत्र दीक्षा देने की बात हुई दरवाजे सब बंद हो गए आप मंत्र दीक्षा में तो पता है कि जो दीक्षार्थी होते हैं उनके अलावा और कोई नहीं रहा गुरु के अलावा और कोई नहीं होता तो जैसे ही दरवाजे सब बंद हुए बाकी सब साधु सन्यासी चले गए महाराज ऐसा करके तो पट करके ऐसा हो गए सीधे हो गए और पता नहीं किस तरह का एक आध्यात्मिक उनके ऊपर में मने एक आ गया एक प्रभाव बोलना बोना शुरू कर दिए और बोल रहे बोल रहे बोल रहे मैं ऐसी ओजस्वी वाणी मैं इमेजिन नहीं कर पाता हूं कि अभी 10 15 मिनट पहले यही महाराज थे जो कि कुछ बोल नहीं पा रहे थे कुछ कर नहीं पा रहे थे और अभी ऐसी तेजस्वी वाणी से बोल रहे हैं तो देखिए कि बाहर का जीवन उनका कैसा था ऐसे बीमार हो गए हैं चलना फिरना खाना पीना बोलना सब जैसे कि एक तरह से दूसरों के ऊपर में निर्भर हो गए और यहां पर जैसे वो गुरु के सन पर विराजित हुए वो गुरु शक्ति का जसे उनके ऊपर में भर हुआ वैसे ही जैसे दूसरे जगत में चले गए तो ये बाह्य उनका जो व्यवहार और भीतर का व्यवहार ये मैंने लिटरली अपनी आंखों से देखा और अभी भी यह जो महाराज ऐसा करके बैठे थे और सीधे हो गए और जो बोलना शुरू किया आई विल नेवर फॉरगेट ट इ वन ऑफ द ग्रेटेस्ट मोमेंट ऑफ माय लाइफ सो दैट इज वन एग्जांपल दो तरह से यदि हम साधक है तो हम यह सब करेंगे ही करेंगे मैंने संकट से बचने के लिए जो संकट मोचन स्तव है वगैरह यह सब तो हम करेंगे ही करेंगे और यदि साधक नहीं है तो फिर भी तो हम करेंगे क्योंकि जद मेडिकल साइंस यदि जवाब दे देगा तो हम आखिर में भगवान के अलावा और किसके पास जाएंगे किंतु वो क्या हुआ पता है मजबूरी में फंस कर के ईश्वर के पास जाना वो एक हो गया और यहां पर ईश्वर को शरणागत होकर के ईश्वर पर भरोसा ईश्वर के प्रेम से ईश्वर के पास जाना ये दोनों में फर्क है है अब जब ठाकुर को कैंसर हुआ तब ठाकुर ने मां को कहा कि मां यहां पर थोड़ा सा ठीक कर दो जिससे कि मैं सब लोगों के साथ में बात कर पाऊं तो ठाकुर ने जो मां को कहा तो पूरा जीवन भर का मां के प्रति प्रेम वह ठाकुर के सामने खड़ा था वो एसे उनके पीछे खड़ा था शक्ति हो कर के और आज मैं यदि कहूं मुझे कुछ हो जाए तो ठीक है चलो मैं साधु हूं किंतु ठाकुर के लेवल का तो कोई मेरा ये नहीं है शरणागति तो मैं कहूंगा तो कातर होक जैसे कि उपाय नहीं है मैं उपाय नहीं है तो मैं जाकर के कहूंगा राइट इन दोनों में य डिफरेंस है कि जीवन भर अर्पण कर दिया है और फिर आखिर में उनसे कुछ मांग रहे हैं और वैसे अपने स्वार्थ के लिए कुछ मांग रहे हैं स टू डिफरेंट उसमें वो डिफरेंस है देखिए एक तो है कि हमारी निर्भरता की यात्रा यदि आप साधक है तो साधक के सामने साधक के जीवन का साध्य क्या है व है निर्भरता शरणागत हम लोग जितनी भी साधना करते हैं साधना का उद्देश्य क्या है कि हम ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाए मेरा जो अहम है मेरा जो मैं है मेरा जो बाह्य व्यक्तित्व है संपूर्ण रूप से ईश्वर के श्री चरणों में विलीन हो जाए यदि मैं द्वैत में विश्वास करता हूं यदि मैं अद्वैत में विश्वास करता हूं तो इंद्रिय जन्य जो कोई भी अट्रैक्शन है उससे मैं संपूर्ण रूप से मुक्त हो जाऊं बाह्य जगत के जितने भी आकर्षण है उस उसको मैं संपूर्ण रूप से त्याग कर दूं और संपूर्ण रूप से आत्म निष्ठ हो जाऊं यह मेरे जीवन का उद्देश्य है अभी इस उद्देश्य में जो कुछ भी हमारे सामने आता है वो अपॉर्चुनिटी है क्राइसिस आर अपॉर्चुनिटी जब जब भी क्राइसिस आती है हमारी या तो ईश्वर निष्ठा या तो आत्म निष्ठा यह दोनों का टेस्ट होता है और टेस्ट में यदि पार हो गए जैसे वो वीडियो गेम में ऐसा होता है हम नेक्स्ट लेवल पर चले गए और यदि फेल हो गए तो हम उसी लेवल पर रहेंगे और लंबा जर्नी काटना होगा फिर से यह टेस्ट आएगा चैलेंज आएगा फिर से चैलेंज को हमको देखना होगा आत्म निष्ठ होकर के ईश्वर निष्ठ होकर के चैलेंज को पार किया तो नेक्स्ट लेवल पर जाएंगे उस चैलेंज में फेल हुए तो उसी चैलेंज उसी लेवल पर पड़े रहेंगे यह आत्मनिर्भरता की हमारी यात्रा है अभी हम आध्यात्मिक दृष्टि से देखें जागतिक जगत की दृष्टि से देखें तो हमको एक एक हेल्दी हैपी लाइफ लीड करना है उसमें जब भी बीमारी आ जाए या तो फिर बुढ वृद्धावस्था आ जाए तो उसके अनुसार ट्रीटमेंट लेकर के अपना जो हैप्पीनेस है उसको मेंटेन करना है किंतु यह हैप्पीनेस बाह्य जगत का आप कितने दिन तक कितने जन्म जन्मांतर तक मेंटेन करेंगे एक समय तो आएगा कि इतने धक्के खाएंगे कि आखिर में भीतर से चैतन्य होगा कि ये बाहर की जितनी ट्रीटमेंट है बाहर की जितना काउंसलिंग है बाहर की जितनी फाइनेंशियल सेफ्टी है वो हमको आखिर में वही जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्कर में से चक्की में पिसा रहती है उसी चक्की में बार-बार पड़ेंगे बार-बार पिसंग और जब तक य आंतर यात्रा शुरू नहीं होती आंतर यात्रा किक स्टार्ट नहीं होती और आंतर यात्रा के एक के बाद एक मुकाम हम सर नहीं करते जाते हैं हम उसके ऊपर में विजय नहीं प्राप्त करते जाते हैं तब तक यह बाह्य जगत की चक्की में पिसते ही रहेंगे इसका कोई अंत नहीं है इसके लिए दोनों को सेपरेटली देखना है कि एक तो अंतर यात्रा में ईश्वर निष्ठ या तो आत्म निष्ठ रहकर के निर्भरता बढ़ाती रहनी है शरणागति बढ़ाते रहनी है और बाह्य जगत में जो बाह्य जगत के अनुसार जो करना है वह करना है ऐसा नहीं है ठाकुर ने भी ऐसा नहीं कहा माने भी ऐसा नहीं कहा कि जो बाह्य ट्रीटमेंट है उसको मत करवाओ किंतु नजर के सामने रखना है कि जो दूसरे लोगों का होता है ना अभी ये ठाकुर एक बार दक्षिणेश्वर में अपने कमरे के बाहर में खड़े देखा कि एक व्यक्ति एक आदमी घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के व दक्षिणेश्वर का गेट था उसके भीतर में प्रवेश किया देख कर के ही ठाकुर डर गए उसके ऊपर में तमस का एक ऐसा आवरण था एक ऐसा बादल घना बादल छाया हुआ था ठाकुर समझ गए कि मेरे पास में कुछ मांगने के लिए आ रहा है उसके जीवन में कुछ प्रॉब्लम है और कुछ कामना वासना लेकर के कुछ मांगने के लिए मेरे पास में आए इमीडिएट ठाकुर अपने कमरे में चले गए दरवाजा बंद कर दिया और हृदयना जो कोई भी सामने खड़ा था उसको जा कर के बोल दिया कि उस आदमी को कहो कि मैं नहीं हूं और चला जाए यहां से और मेरे साथ में बात नहीं हो पाएगी तो देखिए कि आप अभी मेरा बाह्य जगत में जो सुख भोग की जो यात्रा है उसमें यदि कोई क्राइसिस आया है उसको निवार निवारण करने के लिए मैं भगवान के पास में जाता हूं और मेरी बीमारी अच्छी हो जाए जिससे कि मैं संसार में और ज्यादा डूब जाऊं संसार में मेरा बिजनेस है मेरे बीवी बच्चे हैं ना कि मेरा यह जो यह जो सब आनंद उपभोग के जो उपकरण है उसमें प्रॉब्लम हो रहा है उसको उपभोग करने में मुझे व्याघात हो रही है इसके लिए मैं भगवान के पास में जाकर के कहूंगा कि भगवान मेरे तो इतना बड़ा बिजनेस है इतना बड़ा सब मेरा साम्राज्य है और मेरे जाने के बाद में इसको कौन देखेगा मेरे बच्चे तो अभी छोटे हैं उनमें इतनी अकल नहीं है कि ये बिजनेस संभाल पाए और थोड़ा जीवन मुझे दे दो बिजनेस का मैं सब ठीक करके जाऊंगा बीवी बच्चों को सब ठीक करके जाऊंगा बाद में तुम मुझे लेना ये एक हो गया कि आपके सुख उपभोग की वृद्धि के लिए या भगवान के पास जाते हैं और यहां पर हो गया कि आप आत्मनिर्भरता की यात्रा उसमें आगे बढ़ने के लिए ईश्वर के पास जाते हैं दिस इज द ग्रेट डिफरेंस आखिरी आखिरी समय में देखिए स्वामी जी जो कहते हैं एक स्टेटमेंट ऐसा उन्होंने दिया है कि वो मैं पढ़ कर के मैं आश्चर्य चकित हो गया अब तक मैंने ठाकुर के लिए काम किया अभी मैं अपनी मां के लिए काम करूंगा अरे भाई ये कैसा स्टेटमेंट स्वामी जी ने दे दिया तो फिर भी स्वामी जी ने ऐसा कहा है तो है ना तो यह सब है किंतु हमको यह बात हमेशा ध्यान में रखनी है कि हम ईश्वर के निर्भर क्यों होते हैं मेरा सुख उपभोग बढ़ाने के लिए ना कि मेरी ये आंतर यात्रा में विजय प्राप्त करने के लिए अभी स्वामी जी ने मां की चिंता जो की है वो तो उनके धर्म है अपनी गर जिन्होंने मुझे जन्म दिया है उस मां की संभाल रखना उनका धर्म है बोल कर के वो यह सब कर रहे हैं ऐसा तो नहीं कहा कि भाई अभी ठाकुर का काम बहुत हो गया अभी मैं थोड़ा सा एंजॉय कर लेता हूं लाइफ को ऐसा तो उन्होंने कभी नहीं कहा मां के जीवन में जो कष्ट है तो मां को आखिरी आखिर में तीर्थ यात्रा करवाऊंगी वगैरह लेकर के गए तो मां के आनंद के लिए उन्होंने यह कहा है मैं मुझे एंजॉयमेंट करना है मैं मेरा पूरा जीवन ठाकुर को दे दिया मुझे कुछ नहीं मिला अभी मैं बैठ कर के थोड़ा एंजॉय कर लू ऐसा तो उन्होंने कभी नहीं कहा आदर्श जो होता है आदर्श सही सही क्या है ना वो उसको डिटरमाइंड करना कितना मुश्किल होता है आज मैं बीमार हो गया बहुत अच्छी बात है यहां पर बहुत सुंदर हॉस्पिटल है डिस्पेंसरी है मैं वहां पर जाऊंगा डॉक्टर के पास में ट्रीटमेंट ले लूंगा अभी मैं क्या सोच के जाता हूं कि मेरा पब्लिकेशन का काम अच्छे से चले क्योंकि मैं रिस्पांसिबल हूं यहां के लिए यह सोच के जाता हूं ना कि मुझे मृत्यु भय हो गया है कि अरे भाई जद अभी समय सर में ट्रीटमेंट नहीं लूंगा पता नहीं भविष्य में और कितना भुगतना होगा बेटर की प्रॉपर ट्रीटमेंट ले लो अभी मैं क्या लेके जाता हूं अभी ट्रीटमेंट तो ले ही रहा हूं किंतु किस उद्देश्य से ले रहा हूं है ना दिस इज द थिंग कि हमको उद्देश्य क्या है वो ठीक रखना है ये ये बड़ा सुंदर उदाहरण कि खीर भवानी के मंदिर में स्वामी जी गए हैं मंदिर भगना अवस्था में स्वामी जी ने देख कर के मां को कहा कि मैं यदि यहां पर होता तो ये आक्रमणकारी है सबका मैं डट के मुकाबला करता सबको दिखा देता कि मां का मंदिर के रक्षा कैसे करते हैं तो मां ने दर्शन देकर के कहा कि बेटा तुम मेरी रक्षा करोगे कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी यह जो मंदिर बना मंदिर टूटा फिर से मंदिर बनेगा यह सब तो मेरी इच्छा से हो रहा है जगत चल रहा है पूरा त्रिभुवन ये विश्व ब्रह्मांड मेरी इच्छा से चल रहा है तुम कौन होते हो मेरी रक्षा करने वाले मेरे पर निर्भर होना यही तो तुम्हारा धर्म है तो यह आत्म ईश्वर निर्भरता यह स्वामी जी को कैसे प्रती अमेरिका में स्वामी जी थे तो जब वो क्रिश्चियन आक्रमण उनके ऊपर में बहुत बढ गया तब वोह स्वामी जी बार-बार भरत में लेटर लिखते थे कि तुम लोग एक मीटिंग करो वहां पर जो प्रतिष्ठित लोग हैं कलकाता में चेन्नई में उनको मीटिंग में बुलाओ और रेजोल्यूशन पास करो कि हां भाई यह स्वामी विवेकानंद एक्रेडिटेड डेलीगेट है हम लोगों ने भेजा है विश्व धर्म परिषद में वो ही इज अ जेन्युइन साधु ऐसा रेजोल्यूशन पास करके कुछ रेजोल्यूशन वो जो डॉक्टर बेरोज वगैरह है उनके पास में भेजो ऐसा बोलक स्वामी जी बार-बार लेटर लिख रहे हैं और वो जो भारत की जो एक आबोहवा है कि आपको वह जागृत होने में थोड़ा सा चार पांच महीना लग जाता है तो यहां पर कुछ हो नहीं रहा है और वहां पर स्वामी जी के ऊपर में आक्रमण बढ़ता ही जाता है तो स्वामी जी ने नाराज होकर के लेटर में ऐसा गाली गलोज किया वो जो आला सिंगा पेरूमल को अपने गुरु भाइयों को बाद में किंतु यह जो सब रेजोल्यूशन आकर के वो आना शुरू हुआ तब स्वामी जी ने ही कन्फेस इन अ लेटर टू आला सिंगा पेरूमल कि देखो उस समय जो मेरी परिस्थिति थी मैं थोड़ा सा नर्वस हो गया था इसलिए मैंने तुम लोगों को गाली दे दिया अभी तुम ऐसा बहुत ज्यादा माइंड मत करना कि मैं तुम लोगों पर क्रोधित हो गया हूं तो स्वामी जी जैसे स्वामी जी पता है कि ठाकुर ने ऑलरेडी दर्शन दे कर के कहा है कन्याकुमारी में कि तुमको वहां पर जाना है जगत में वह वेदांत का प्रचार करने के लिए सब कुछ पता है खुद का जीवन का क्या उद्देश्य है सब कुछ पता है किंतु फिर भी वह ऐसे ऐसा समय आता है कि वो नर्वस हो गए तो ये समय एक ऐसी चीज है कि हमको टेस्ट करती है कि हम भीतर में वो जो सोना है ना कि पीतल है वो जो वो ऊपर में वो जो यह होता है ना उसका सोने का वो जो वर्ख लगाया हुआ दागना है ना कि गहना है ना कि प्योर गोल्ड का वो जो हीरा जवाहरात का वो जो गहना है वो व परिस्थिति की व परख उस परिस्थिति में होती है यह देखिए कि हम अंतर यात्रा में आगे बढ़ रहे हैं उसका एक बाहर जगत में क्या है पता है अपने हृदय का खुल जाना मैं अभी मेरे जीवन में जो कुछ भी करता हूं ना मैं हमेशा दूसरों के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचना शुरू करता हूं अभी जैसे मान लीजिए कहां पर भी मुझे मौका मिला गृहस्थ में हूं जहां पर भी मुझे मौका मिला अच्छा कार्य करने का मैं वहां पर जा करर के करना शुरू कर दिया तो यह हृदय का खुल जाना दूसरों के प्रति सहानुभूति एक प्रकट होना दूसरों की आंसू दूसरों के आंसू देख कर के अपनी आंखों में आंसू आना दूसरों की हंसी देख कर के खुशी देख कर के अपनी अपने हृदय में खुशी हंसी खुशी का संचार होना नहीं की ईर्षा का उसका प्रोग्रेस हो रहा है मेरा नहीं हो रहा व तो मैं ईर्षा हो गई ऐसा नहीं उसका प्रोग्रेस हो रहा है तो मुझे खुशी हो रही है वो रो रहा है तो मुझे बहुत ऐसे लोग होते हैं वो दूसरे लोगों को कष्ट होता है तो भीतर भीतर में आनंद आता है अच्छा इसके साथ में तो यही होना चाहिए था किंतु यदि वो रो रहा है तो मेरी भी आंखों में आंसू आ रहा है ये जो दूसरों के प्रति सहानुभूति है ना हृदय का खुलना दैट इज वन साइन के हमारी भीतर में जो निर्भर ईश्वर के ऊपर में श्रद्धा भक्ति यह यात्रा ठीक-ठीक डायरेक्शन में चल रही है