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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 12 Nov 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम मां शारदा देवी का जीवन चरित्र उसका पाठ कर रहे हैं चैप्टर का नाम है बिंदु वासिनी और कल हम ने देखा कि मां के जीवन का अभ्यास करने का पाठ करने का श्रवण करने का चिंतन करने का तात्पर्य क्या है प्रयोजन क्या है महात्म क्या है तो आज अभी हम इस चैप्टर के साथ में आगे बढ़ते हैं यह यह समय है कि ठाकुर ने अपनी साधना संपूर्ण कर दी है और साधना संपूर्ण करने के बाद में मां शारदा देवी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ था और आगमन होने के बाद में हमको पता है कि ठाकुर ने मां की पूजा की थी और यह पूजा करने का क्या तात्पर्य है उसको भी हमने बड़े ही विषद रूप से इसकी आलोचना की थी यदि ठाकुर की साधना और साधना से उपलब्ध सिद्धियां या तो फिर कहेंगे उनकी उपलब्धियां इसका यदि कोई तात्पर्य है इस जगत के साथ में जगत में यदि ठाकुर की सिद्धियों का कोई प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है तो वह कैसे होने वाला है वह मां जो शक्ति रूपिणी मां है उसी के आधार पर ही जगत में ठाकुर का धर्म चक्र प्रवर्तन होने वाला था तो जब तक मां नहीं आई ठाकुर ने हम देखेंगे कि लीला प्रसंग में शारदानंद जी महाराज ठाकुर के गुरु भाव की जो आलोचना करते हैं उसमें गुरु भाव पूर्वार्ध और गुरु भाव उत्तरार्ध इस तरह से उन्होंने बांट दिया जब ठाकुर बालक थे तब कामर पुकुर में भी उन्होंने अपने मित्रों के ऊपर में कृपा की थी उसके बाद में जब उन्होंने साधना करने की प्रारंभ की साधना करने का प्रारंभ किया तब भी अपने गुरुओं पर भी उन्होंने कृपा की थी देखिए कि ठाकुर ने जिन जिन गुरुओं से शिक्षा ली उन गुरुओं को भी ठाकुर को अपने शिष्य बनाने का फल यह मिला कि उनको अपनी साधना में संपूर्णता प्राप्त हुई जैसे भैरवी ब्राह्मणी थी तो भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर को शक्ति साधना की उन्होंने दीक्षा दी और उनको सिखाया किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि भैरवी ब्राह्मण का ठाकुर के प्रति एक माइक भाव एक अट्रैक्शन बढ़ता ही जा रहा था ठाकुर के ऊपर में एक अधिकार स्थापित करना चाहती थी बार-बार कहती थी कि ठाकुर आज जो कुछ भी है वह मेरी ही वजह से है मैंने ही उनको सर्वांग संपूर्ण बनाया है यह तंत्र साधना सिखा करके तो यह जो ठाकुर के साथ में एक माइक संबंध बनने लगा था वह एक भैरवी ब्राह्मणी का एक वीकनेस रह गया था देखिए स्त्री स्वभाव का ऐसे ही मातृभाषा करु का तो हमेशा से बालक भाव था तो बालक रूपी ठाकुर के साथ में भैरवी का यह भैरवी ब्राह्मणी का मातृभबन बने इस बात में कुछ आश्चर्य नहीं है और जो भी मां है वह अपने बच्चे को हमेशा एक तरह के प्रोटेक्शन में रखना चाहती है कोई भी मां होगी वह अपने बच्चे को जैसे कि एक तरह से सिक्योर एंड प्रोटेक्ट करना चाहती है सिक्योर रखना चाहती है प्रोटेक्ट करना चाहती है तो ये एक ओवर प्रोटेक्टिव भाव भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के ऊपर में हो गया था किंतु आखिर में भैरवी ब्राह्मणी को भी ठाकुर का संग त्याग करना पड़ा वह सब घटना वली हमने देखी है कि किस तरह से हृदय का हृदय के साथ में भैरवी ब्राह्मणी का झगड़ा हुआ और भैरवी ब्राह्मणी कामर पुकुर छोड़ कर के फिर यह काशी जाकर के वह रहने लगी तो यह भैरवी ब्राह्मणी में भी एक अपूर्णता थी वह ठाकुर के साथ में रहने से संपूर्ण हुई तोतापुरी के साथ में देखिए शक्ति को स्वीकार नहीं करते थे ठाकुर के साथ में रहकर के शक्ति को स्वीकार करना पड़ा तो यह हो गया ठाकुर का गुरु भाव पूर्वार्ध मां शारदा देवी की उ उन्होने शशी रूप से पूजा की उससे पहले का भाव उस भाव में उन्होंने इंडिविजुअल व्यक्तियों के ऊपर में कृपा की थी किंतु मां की शक्ति रूप से साधना करने के बाद में उनको उनका जो आशीर्वाद है उनकी जो कृपा है जैसे पूरे संसार के ऊपर में बिखर पड़ी वह गुरु भाव उत्तरार्ध वह गुरु भाव पूर्वार्ध यह गुरु भाव उत्तरार्ध ये तो गुरु भाव उत्तरार्ध में देखेंगे कि ठाकुर की कृपा इस तरह से पूरे कलकाता में और फिर कलकता के माध्यम से कलकाता के ये जो वीर सपूत स्वामी विवेकानंद उनके माध्यम से किस तरह से पूरे संसार में ठाकुर की कृपा छा गई तो यह ठाकुर की कृपा संसार के ऊपर में हो अवतार का नाम गुणगान कीर्तन समाज में फैले उसके लिए आवश्यक था कि मां शारदा का वहां पर आगमन तो यह मां शारदा का वहां पर आगमन हो गया है दक्षिणेश्वर में ठाकुर ने मां की पूजा भी कर ली है शक्ति रूप से और अभी धीरे-धीरे करके ठाकुर के पास में दक्षिणेश्वर में एक के बाद एक सभी भक्तों का आगमन होना प्रारंभ हो गया है यह देखिए कि अपना जो पूरा रामकृष्ण संघ है रामकृष्ण संघ की हिस्ट्री या तो इतिहास आप देखेंगे 1836 में ठाकुर का जन्म हुआ ठाकुर ने भूमि पर पदार्पण किया या तो फिर अवतरण किया तो 18 36 से लेकर के 1938 यानी कि आखिरी डायरेक्ट डिसाइल थे ठाकुर के स्वामी अभेदानंद जी महाराज काली महाराज उनका देहांत हुआ तो यह 102 साल का जो हिस्ट्री देखेंगे जबकि सबसे ज्यादा आध्यात्मिक प्रवाह अपने संघ का उस समय बहा है रामकृष्ण संघ जद जैसे स्वामी जी कहते हैं कि 1500 सालों तक इसको कार्य करना है तो 1500 सालों के लिए ये एक एक फाउंडेशन रख देना है स्पिरिचुअल इंटेलेक्चुअल फिलोसॉफिकल और एक्टिविटी वाइज जो एक फाउंडेशन रख देना है यह फाउंडेशन की ये जो नीव डाली गई रामकृष्ण मिशन की वो वो 102 साल के भीतर में डाली गई और जैसे मैंने एक बार पहले भी डिस्कस किया था यह 102 सालों का पूरा हिस्ट्री मैंने एज ए होल समझने का प्रयास किया है और उसको मैंने पीरियड में बांट दिया था वो सब पीरियड भी हमने एक बार डिस्कस किए थे तो मुझे लगता है कि यह जो पूरा 102 साल का हिस्ट्री है ठाकुर का कामर पुकुर में जन्म हुआ 1836 में उसके बाद में उनका 18 18544 के आसपास में उनका कलकाता में आगमन हुआ फिर वह 18581 साल के बाद में 2 साल के बाद में ठाकुर वापस आए फिर वह फिर से साधना में डूब गए और फिर मां का आगमन हुआ 18735 ना 73 तो वहां से लेकर के देखेंगे कि मां के आगमन से लेकर के ठाकुर को जब कैंसर हुआ 1885 का आखिरी समय तो यह जो समय है पूरा ऑलमोस्ट कहेंगे कि यह 10 11 12 साल का यह समय जो है वह अपना जो रामकृष्ण संघ का जो पूरा इतिहास है उसका ये गोल्डन एज है यह सुवर्ण युग है क्यों क्योंकि इस सुवर्ण युग में देखिए कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर भी थे श्री राम कृष्ण देव मां शारदा भी थी और एक के बाद एक सभी डायरेक्ट डिसाइल गृहस्थ और सन्यासी या तो फिर त्यागी इन सभी का आगमन होना शुरू हो गया था तो दक्षिणेश्वर में जो आनंद की हाट यह जो आनंद का बाजार जो बैठा था बार-बार भजन नृत्य कीर्तन हो रहा है ठाकुर बार-बार मुहूर मुहूर समाधि में जा रहे हैं यहां पर जैसे ही ठाकुर के साथ में भजन कीर्तन करके सब लड़कों को भूख लगती थी नरेन वगैरह तो यहां पे मां है ही है वह गाढ़े दाल और मोटी रोटी का वो खाना बना करके वो वहां पर भेज देती यह लोग आनंद से खाते और फिर वहां पर रहते तो और मां भी दूर से देखती थी आनंद करती थी मां के पास में यह जो स्त्री भक्त थी वो सब मां के पास में आती थी वही छोटा सा नबत उसके भीतर में रहना और कितना कष्ट था बाह्य दृष्टि से देखें तो जैसे कि हमने देखा कि ऐसा एक स्मृति कथा है कि कलकाता से सब स्त्रियां आकर के और मोटी सोटी स्त्रिया ऐसा शब्द व्यवहार किया है गंभीरानंद जी महाराज ने यानी कि अच्छे घर में जद आप पड़े बले है तो फिर क्या होगा अच्छे घर में जन्म लिया है अच्छे घर में आपका यदि यह हुआ है बचपन बीता है तो अच्छा खाना तो मिला ही होगा तो एक तो बॉडी हेल्दी होगा मा तो फिर वोह वे लोग यह सब स्त्रियां कलकाता की वो वहां से दक्षिणेश्वर में आती यहां पर नबत में जाती और वहां पर नबत में ऐसा दो हाथ करके दरवाजा को दिखा करके कहती कि अरे अर सती लक्ष्मी ज कतो कटैया छ जेनो बनवास गो अर्थात कि हमारी सती लक्ष्मी मां शारदा जैसे कि वनवास में रह रही है इस तरह के कष्ट में यहां पर नबत रूपी छोटी सी जगह में रह रही है तो किंतु मां खुद कहती थी कि इतनी छोटी जगह में रह कर के शौच जाने का कष्ट खाना पना तो खैर उसमें तो कोई दिक्कत नहीं थी किंतु इतनी छोटी सी जगह पर रहना उसमें भी ठाकुर का जो सब डिमांड होता है कि अभी आज हम देखेंगे कि ठाकुर वो सुबह को एकदम अर्ली मॉर्निंग अर्ली मॉर्निंग भी नहीं अभी रात संपूर्ण भी नहीं हुई है आधी रात है ठाकुर दोती बजे वह शौच के लिए जाएंगे उठ जाएंगे और जाते-जाते नबत रास्ते में आता है यदि आप दक्षिणेश्वर गए होंगे तो आपने देखा होगा कि ठाकुर के कमरे से फिर वह जो सीधा गंगा के किनारे का रास्ता है तो वहां पर ठाकुर के कमरे से आप चलना शुरू करेंगे गंगा के किनारे के रास्ते से एक और है काली मंदिर यदि एक डायरेक्शन में जाएंगे तो एक डायरेक्शन में है काली मंदिर द्वादश शिव मंदिर फिर यह जो राधाकांत का मंदिर फिर यह खजांची वगैरह की ऑफिस वगैरह एक डायरेक्शन में है और दूसरी डायरेक्शन में जद चलना शुरू करेंगे तो फिर पहले तो आता है मां का नबत उसके बाद में आता है पंचवटी उसके बाद में आता है झाऊ तला बकुलतला फिर झाऊ तला और पीछे में थोड़ा सा जाएंगे तो हंसपुकुर और वह बेलतला बेलतला अर्थात कि बिल्व वृक्ष का नीचे जमीन बिलवा वृक्ष का जहां पे छाया पड़ती है वहां पे जहां ठाकुर ने यह तंत्र साधनाएं की थी तो यह है पूरा वहां का एक मेंटल मैप तो ठाकुर जा रहे हैं झावतला शौच के लिए रास्ते में आता है यह नबत तो ठाकुर चिल्ला करके जाएंगे अरे लक्ष्मी अभी मां को डायरेक्ट तो बोल नहीं सकते मा ठाकुर तो मां की कितनी ये ये करते थे इज्जत करते थे उनकी रिस्पेक्ट करते थे तो लक्ष्मी को चिल्ला कर के बोलेंगे अरे लक्ष्मी सुबह हो गई है चलो उठो कितना सोगी उठ कर के जब ध्यान करना शुरू कर दो अभी बजे होंगे दो-तीन बजे होंगे मुश्किल से तो फिर मां और लक्ष्मी दीदी वहां पर छोटे सी नबत में सोए हुए हैं कमरे का दरवाजा बंद है और फिर जैसे ही लक्ष्मी दीदी खड़ी हो जाती क्योंकि ठाकुर ने चिल्ला करके कहा है तो क्या करेंगे तो मां इमीडिएट कहेंगी अरे थोड़ा सा विश्राम और कर लो अभी तो देखो कि पंखियो की डाक भी नहीं हुई है सुबह होती है तो पंखियो का कलरव कैसे शुरू हो जाता है हम लोग तो शहर में रहते हैं तो बहुत बार पता भी नहीं चलता कि ये सुबह हो गई ये पंखियो का कलरव हो रहा है किंतु वो तो एक ग्राम्य विस्तार जैसा था दक्षिणेश्वर तो पंखी चारों ओर पेड़ के ऊपर में रहा करते थे और पंखियो का जैसा स्वभाव है जैसे ही सूर्योदय या तो फिर यह सूर्य की लाली मां जैसे ही आकाश में फैलना शुरू हो जाएगा वो अपना कलरव शुरू कर देंगे तो मां मां कहती थी लक्ष्मी दीदी को कि अरे अभी तो सुबह हुई नहीं है पंखियो का कलरव प्रारंभ नहीं हुआ है ठाकुर की आंखों में तो निंदर है ही नहीं वह तो सोते ही नहीं है वह तो चिल्लाए चिल्लाने दो तुम थोड़ा सा और ज्यादा विश्राम कर लो अभी ठाकुर अभी यह दोनों लक्ष्मी दीदी लेटी हुई है अभी ठाकुर शौच करके वापस आ रहे हैं झावतला से देखा होगा कि वहां पर दिया नहीं जल रहा है या तो फिर दरवाजा नहीं खुला है नबत का तो ठाकुर भी क्या करेंगे वह बाल्टी में पानी लेकर के वह दरवाजे के नीचे से भीतर में डाल देंगे तो जैसे अभी ये लोग तो फर्श प ही सोते थे छोटी सी नौबत में वो हाट वगैरह रखने का तो कोई प्रश्न ही नहीं आता तो यह बिछाना वगैरह जो है बिस्तर वगैरह वह तो जमीन पर ही बिछाया हुआ है तो जैसे ही ठाकुर ने पानी फेंका वो फटफट करके खड़े हो जाना है वरना तो ये जो बिछाना यदि भीग गया तो तो फिर उसको सुखाना मुश्किल है तो ऐसा देखिए कि ठाकुर के साथ में रहने का अपना एक हजार्ड है अपना एक रिस्क है अपना एक डेंजर है किंतु यह सब चीजों को और अभी क्या है कि यह सब प्रॉब्लम तो लक्ष्मी दीदी को फेस कर ने है ना मां का तो क्या था आज जन्म ही बहुत पहले से ही मां बहुत जल्दी उठ जाना शुरू करती थी तो यह देखिए कि मां का जीवन बाह्य दृष्टि से शायद ऐसा लगे कि ठाकुर के पास में इतने लोग आ रहे हैं इतना आनंद हो रहा है ठाकुर के साथ में उनकी जो भी फरमाइश है सब पूरी करने के लिए यह सब भक्त लोग खड़े होकर के बैठे हैं मां बेचारी को छोटी सी नौबत में रहना है स्त्री भक्त आएगी मां के पास में और जो भी है दिन-रात वहां पर खाना चलता ही रहेगा कष्ट में रहना है वगैरह किंतु मां ने खुद कहा है उस समय ऐसा लगता था जैसे कि मेरे हृदय में आनंद का पूर्ण घट स्थापित किया हो और यह आनंद का पूर्ण घट हृदय में इस तरह से एक उल्लास एक इस तरह का एक सात्विक एक ओजस उनके पूरे हृदय में मन में भर देता था कि जो कोई भी मां के पास में आता था वो परि तृप्त होक के जाता था जो कोई आता था यानी स्त्रियां ही आती थी और सब स्त्रियां स्त्री भक्त मां के पास में बैठ कर के मां की वाणी सुन कर के मां के साथ में कर्म कर कर के अभी ठाकुर जैसा तो नहीं है मां के पास में कि बैठ कर के भजन कीर्तन करें आनंद करें हंसी मजाक करें नबत में यदि मां के पास आए हैं तो थोड़ा बहुत तो कार्य करना ही होगा थोड़ा बहुत तो आपको मां के साथ में काम करना ही पड़ेगा यदि खाना पक रहा है तो चलो सब्जी काट दिया यह चूल्हा जद जलाना है तो चूल्हे को जद उसको हला है उसके ऊपर में जो सब हांडी वगैरह रखा है तो वह यह सब तो करना ही पड़ेगा तो ठाकुर के पास में आते हुए पुरुष भक्त और मां के पास में आती हुई स्त्री भक्त यह दोनों एक जैसे कि अलग-अलग संसार है ठाकुर किसी को भी एक दूसरे को मिलने नहीं देते थे ठाकुर का बड़ा क्लियर था जितने पुरुष भक्त आते थे एकदम उन्होंने स्ट्रिक्ट वार्निंग देकर के रखा था स्त्री भक्त जब इतनी भक्ति मती भी है जद भक्ति से जमीन पर व जमी माटी प जद गड़ा गड़ी हो दे ठाकुर बोल से भंग लाते वो जमीन में जद वो लेट भी जाती है भक्ति से तो भी किंतु देखिए कि स्त्री भक्त के साथ में आपको कभी भी बात नहीं करनी है उनके साथ में कोसी तरह का संपर्क नहीं रखना है तो यह था दक्षिणेश्वर का जीवन हालांकि देखिए कि ऐसी स्मृति कथाएं भी है स्त्री भक्तों ने लिखी है ठाकुर के बारे में कि बहुत सारे भक्त आजकल ऐसा कहना शुरू करते हैं कि ठाकुर स्त्रियों को धिक्कार थे या तो फिर उनको घृणा की दृष्टि से देखते थे तो हम जब यह स्त्री भक्त की स्मृति कथा है और शारदानंद जी स्वयं इसको लिपिबद्ध करते हैं तो उसकी ऑथेंटिसिटी का कोई प्रश्न ही नहीं है तो यह स्त्री भक्त कहती है कि हम लोग जब इस तरह की कहानियां सुनते हैं तब हमको हंसी आती है क्यों हमने जभी भी ठाकुर के पास में गए हैं ठाकुर ने इतना प्रेम पूर्वक हमको आवकारो मिलकर के चार-पांच अच्छे घर की बहू अभी उस समय तो क्या था आज तो फिर भी फ्रीडम है आप जहां जाना चाहते हैं जा सकते हैं स्त्रियों को पढ़ाई लिखाई जॉब करना आश्रम में आकर के इतना कार्य करती है स्त्री स्त्री भक्त तो एक समाज में एक बहुत ज्यादा फ्रीडम है तो उस समय किंतु क्या था कि पर्दा प्रथा थी वो पुरुष लोगों के सामने नहीं आना है वगैरह वगैरह इतने सारे रिस्ट्रिक्शन थे किंतु फिर भी ठाकुर का आकर्षण ऐसा था कि कुछ अच्छे घर की बहू और यह कुछ स्त्रियां उन्होंने मिलकर के पैदल दक्षिणेश्वर आई जो लोग कभी भी पालखी के बिना या तो किसी वाहन के बिना घर के बाहर नहीं निकलते यह लोग ने ठीक किया कि नहीं ठाकुर का दर्शन करने के लिए तो जाना ही पड़ेगा तो ठाकुर का दर्शन करने के लिए पैदल वहां से आई आकर के दक्षिणे में देखा तो ठाकुर फिर गए हैं कोलकात्ता किसी एक भक्त के घर पर तो अभी यह लोग बड़ी ही विमर्श हो गई क्या करेंगे ठाकुर का दर्शन करने के लिए इतना कष्ट करके आए पैदल चल के आए ठाकुर खुद नहीं है फिर उन्होंने सोचा कि नहीं ठीक है चलो ठाकुर का दर्शन तो कैसे भी करके करना ही है ठाकुर यदि कलकाता गए हैं तो हम भी जाएंगे तो थोड़ा सा पैदल चल कर के थोड़ा सा यह शेर की ये जो गाड़ी होती है ना ये जो घोड़ा गाड़ी चलती रहती थी आप पूरी घोड़ा गाड़ी अपने के लिए बुकिंग कर देंगे तो थोड़ा महंगा पड़ेगा किंतु शेर की घोड़ा मतलब और किसी पैसेंजर के साथ में शेयर करेंगे तो थोड़ा सस्ता पड़ेगा यह नौका भी आप शेयर कर सकते हैं अपने खुद के लिए नौका लेकर के गंगा के उस ओर जाएंगे तो महंगा पड़ेगा किंतु बाकी सब पैसेंजर को लेकर के नौका जा रही है तो उसमें यदि बैठ गए तो सस्ता पड़ेगा यह प्राइवेट ट्रांसपोर्ट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तरह उस समय का तो इस तरह से शेर की नौका करके ना गाड़ी करके कैसे भी करके यह कलकाता आई अभी पता चला कि जिस भक्त के घर गए हैं उस भक्त का घर उनको मिल नहीं रहा है अच्छे घर की बहू है कभी घर से बाहर निकली नहीं है किसी पुरुष की कंपनी के बिना किसी नौकर के बिना अभी अपने अकेले से घर खोजना कितना तकलीफ देह है फिर वहां पे उनको जिस लोकेशन पता था कि ठाकुर यहां पे आए हैं वहां पास में ही एक स्त्री भक्त का अपने पिताजी का घर था तो उस अपने पिताजी के घर गए फिर वहां पर एक नौकर था उन लोगों का उसको बुलाया कहा कि अरे ठाकुर इस भक्त के घर आए हैं हमको ले चलो तो वो नौकर इन स्त्रियों को लेकर के उनके घर गया देखा आश्चर्य की बात है कि ठाकुर अपने कमरे में अकेले बैठे हैं एक वो भक्त के घर में एक कमरे में अकेले बैठे हैं और जैसे ही ठाकुर ने इनको देखा स्त्रियों को तो बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए अरे तुम लोग कहां से आए तो फिर तो अब जैसे कि एक हंसी मजाक होता है ना उस शत्री भक्त ने भी हंसते हंसते अपनी पूरी क नी सुनाई कि आपका दर्शन करने के लिए गए थे दक्षिणेश्वर वहां पर आपका दर्शन नहीं हुआ फिर कितना कष्ट करके यहां पर आए अभी घर नहीं मिल रहा है तो फिर इसके घर गए फिर यह नौकर लेकर आया तो ठाकुर भी बड़े खुश होकर के हंस रहे हैं यह लोग भी हंस र हैं और ठाकुर का दर्शन होने से हृदय तो कैसा परितृप्ति हो जाता है उस समय एकाएक क्या हुआ कि एक भक्त ठाकुर को मिलने के लिए आ गया अभी ठाकुर की बड़ी स्ट्रिक्ट इंस्ट्रक्शन है कि स्त्री भक्तों को पुरुष भक्तों के साथ में बैठना नहीं है वार्तालाप नहीं करना है तो अभी क्या करेंगे तो यह लोग एकदम ठाकुर भी थोड़ा सा यह हो गया अभी तो यह तो किसी गेस्ट के घर पर बैठे हैं तो ये चार पांच स्त्रियां एकाएक आ गई और ठाकुर कहेंगे इनको आप छुपा दीजिए कहीं पे तो यह कैसा लगेगा तो ये सभी स्त्री भक्त ने क्या किया ठाकुर जिस खाट के ऊपर में बैठे थे उसके नीचे में जाकर के छुप गई और अभी ये जो भक्त पुरुष भक्त ठाकुर को मिलने के लिए आया था उसको ये लोग मोटा बामुन करके पुकारते थे मोटा अर्थात कि एक मोटा ब्राह्मण तो फेट मोटा यानी कि फेट हिंदी में तो यह मोटा बामुन वहां पर ठाकुर के साथ में बैठा है गप लगाई जा रहा है लगाई जा रहा है और यह स्त्री भक्त वहां पे खाट के नीचे में छिपी हुई है वो वहां पर छिप कर के वो लेटी हुई है और अभी और हंसी संवरण नहीं कर पा रही है मतलब इतना हंसी आता है देखिए एक तो एक हास्य जनक परिस्थिति है ना ठाकुर बैठे हैं खाट के ऊपर में और ये लोग छुप कर के बैठी है नीचे में किसी को पता चल गया तो क्या होगा पता नहीं वो किस तरह की बातें फैलना शुरू होगी तो ये लोग इस तरह से बैठे हैं यहां पर ठाकुर बात कर रहे हैं और फिर वहां प मच्छर भी इतने थे वो खाट के नीचे में वो मच्छर भी काट रहे हैं और अभी कुछ बोल भी नहीं पा रही हस हस हंसी रुक नहीं रही है और वो कुछ बोल भी नहीं पा रही है फिर आखिर में कितनी देर के बाद में ये मोटा बामुन गया फिर ये स्त्री भक्त फिर से खाट के नीचे से बाहर निकली फिर ठाकुर के साथ में वार्तालाप किया बात किया उनका आशीर्वाद ग्रहण किया फिर वहां से गई तो देखिए कि यह एक पूरा गोल्डन एज है रामकृष्ण संघ का यह 102 साल की हिस्ट्री 1836 में ठाकुर का जन्म हुआ 1938 में अभेदानंद जी महाराज की महासमाधि हुई तो यह जो पूरा 102 साल का ओवरऑल बर्ड आई व्यू है उसमें यह मां का दक्षिणेश्वर में आगमन 1817 ने ये सड़सी पूजा से लेकर के ठाकुर को जब कैंसर हुआ था ये 1885 का आखिरी समय कैंसर होने के बाद में एक सेकंड फेज स्टार्ट हो जाता है उसके बाद में इंटेंसिटी बढ़ जाती है पहले तो आनंद का बाजार था आनंदे हाट थी किंतु बाद में क्या है कि ठाकुर को जब से कैंसर हुआ उसका एक प्रयोजन था उसका एक युग प्रयोजन था कि सभी भक्तों को इकट्ठा करके ठाकुर ने कहा ना कि जो अंतरंग है और जो बहिरंग है ये फिल्टर हो जाएंगे आते हैं बहुत लोग ठाकुर के पास में जैसे भवनाथ था नरेण और भवनाथ नरेण अर्थात भविष्य के स्वामी विवेकानंद तो ये नरेण और भवनाथ दोनों ठाकुर के पास में आते थे ठाकुर बड़े प्रसन्न भी रहते थे दोनों से किंतु जिस दिन ठाकुर को कैंसर हुआ उस दिन से नरेंद्र ने सोचा कि अभी जीवन सर्वस्व त्याग करके ठाकुर की सेवा करनी है और यह भवनाथ ने क्या किया उसने शादी कर ली फिर ठाकुर के पास आना ही जैसे कि बंद कर दिया एक बार आया था काशीपुर में ठाकुर कहते हैं जैसे वर वर राजा की तरह सज धज करके आया था तो देखिए है कि कैंसर का प्रयोजन था कि अंतरंग और बहिरंग दोनों को फिल्टर करना तो वो एक दूसरा फेज स्टार्ट हो जाता है जो अंतरंग थे उनके भीतर में एक दिव्य प्रेम के एक सेतु से इन सबको ठाकुर ने बांध लिया था ठाकुर और मां ने और फिर यह जो दिव्य प्रेम का जो फाउंडेशन इस अंतरंग भक्तों के हृदय में ठाकुर ने जो स्थापित किया वही है राम कृष्ण संघ की नीव वही है रामकृष्ण संघ का सही सही फाउंडेशन फिर यही अंतरंग भक्त वह चाहे बलराम बसु हो मास्टर महाशय हो रामचंद्र दत्त हो गिरीश घोष हो न कि नाग महाशय हो या तो फिर गोलाप मा फिर ये गोपालेर मा फिर ये योगन मां गौरी मां यह सब हो एक साइड और यहां पर नरेद लाटू राजा महाराज यह बाबूराम महाराज ये निरंजन महाराज इन लोगों का एक पूरा एक संघ तो ये दोनों त्यागी सं संतान और गृहस्थ संतान सबने मिलकर के ठाकुर के संग को प्रारंभ किया तो और बाद में फिर और भी बहुत सारी कहानियां है जैसे कि इन लोगों में थोड़ा सा एक डिफरेंस ऑफ ओपिनियन आ गया था रामचंद्र दत्त का एक दल बन गया था त्यागी संतानों का एक बन गया था वगैरह वगैरह किंतु यदि गोल्डन एज देखा जाए सुवर्ण युग देखा जाए तो यह सुवर्ण युग था कि दक्षिणेश्वर में मां शारदा भी है श्री रामकृष्ण देव भी है और सभी त्यागी और गृहस्थ संतानों का उनके पास में आगमन प्रारंभ हो गया है तो यह जो गोल्डन एज है रामकृष्ण संघ का इसके ऊपर में यह चैप्टर बेस है बिंदु वासिनी और इसी चैप्टर में उस अपने सुवर्ण युग की कुछ-कुछ सुंदर घटनाएं लिपिबद्ध है ज्यादातर घटनाओं को हमने पहले भी एक बार कहीं पर डिस्कस किया ही है कहीं-कहीं पर बहुत सारी कहानियां यह सब कहानियां मैं बताता ही रहता हूं किसी ना किसी संदर्भ में किंतु यह रिपीटेशन क्यों करना चाहिए क्यों करना आवश्यक है क्योंकि गंभीरानंद जी महाराज ने इसको लिपिबद्ध किया है तो याद रखना है कि जब गंभीरानंद जी महाराज की किताब पढ़ते हैं तो हम सिर्फ प्रसंग को ही नहीं पढ़ते हैं प्रसंग तो अभी जैसे यह मोटा बामुन का यह जो स्त्रियों का प्रसंग मैंने कहा यह प्रसंग लीला प्रसंग में शारदानंद जी ने वर्णन किया है अभी हम इसके बारे में वैसे ही बात करेंगे और लीला प्रसंग में शारदानंद जी की जो कलम है उसके द्वारा किस तरह से लिपिबद्ध हुआ है उसको पढ़ेंगे उसमें बड़ा पार्थ क्य है यहां पे हम एक आध्यात्मिक प्रेरणा के लिए इसका श्रवण करते हैं इसके बारे में बात करते हैं वहां पे उसका साहित्यिक आनंद लेने के लिए उसका पाठ करते हैं तो यहां पे भी यह सब प्रसंग मैंने कई बार पहले भी कहे हैं यहां पे किंतु गंभीरानंद जी महाराज की कलम के द्वारा लिपिबद्ध इसका एक जो साहित्यिक आनंद है उसका भी हम आस्वाद ग्रहण करेंगे ऑफकोर्स लिखा गया है बंगाली में और मैं कभी भी किसी भी तरह के ट्रांसलेशन पर विश्वास नहीं करता वह चाहे इंग्लिश हो ना कि चाहे वह हिंदी ना गुजराती इसलिए मैं हमेशा प्रयास करता हूं कि ओरिजिनल में ही इसका पाठ हो और फिर मैं अपने से ही इसका ट्रांसलेशन करूं तो यह देखिए कि यह प्रसंग अभी प्रारंभ करते हैं गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है बिंदु वासिनी और यह सुवर्ण युग की घटनाएं है देखिए महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मायर सहित ठाकुरे संबंधों कतो घनिष्ट तहा लौकिक आचार्य प्रकाश जन्नई जेनो ठाकुर कखन कखन रहस्य अभिनय करतन मां के साथ में ठाकुर का संबंध कितना घनिष्ठ था उसका एक बाह्य प्रकाश दिखाने के लिए ही ठाकुर जैसे कि कभी-कभी आनंद मजाक एक रहस अभिनय करते थे देखिए रहस्य अभिनय शब्द का प्रयोग किया है एक रहस्य अर्थात कि एक इस तरह का आनंद की सृष्टि करना और अभिनय यानी कि यह सब अभिनय के रूप में हो रहा है ऐसा नहीं है अभी यह जो घटना पढ़ेंगे हमको लगेगा अरे ठाकुर क्या इतने इगो इस्टिक थे कि ये इस तरह की बातें कर रहे हैं किंतु नहीं ये तो सब अभिनय है ये लीला मंच के ऊपर में हमको सिखाने के लिए हमको आनंद देने के लिए यह सब अभिनय रहस्य अभिनय ठाकुर कर रहे हैं यह हंसी मजाक एक तरह का आनंद का वातावरण सृष्टि करना तो अभी देखिए कि महाराज किस तरह से इसको वर्णित करते हैं महाराज जी कहते हैं कि वैसे तो ठाकुर और मां का जो संबंध है इतना गहन है जैसे यह योगिन माही अभी कहती है कि इन दोनों के बीच में होगा 50 हाथ का अंतर यहां पर कमरे में ठाकुर रहते हैं अपने कमरे में यहां पर नबत में मां रहती है 50 हाथ का अंतर है उन दोनों के बीच में किंतु ऐसा कभी-कभी ऐसा भी होता था महीनों महीनों तक ठाकुर का मां के साथ में मुलाकात नहीं होती थी मां ठाकुर का दर्शन नहीं कर पाती थी उनके साथ में वार्तालाप नहीं कर पाती थी क्योंकि दोनों इस तरह से एक कंजरवेटिव हिंदू समाज के थे तो ब्राह्मण दंपति थे कंजरवेटिव अपने ऑर्थोडॉक्स हिंदू समाज से दोनों आते थे तो इन दोनों ने यह नहीं सोचा कि इस समाज को तोड़ दे जैसे कि उस समय की रिफॉर्म मूवमेंट सब चलती रहती थी यह जो बहु यह जो सती प्रथा है बाल्य विवाह प्रथा है इन सबको तोड़ दो इन सबने हिंदू समाज का बड़ा ही अपकार किया है बड़ा ही नुकसान पहुंचाया है इस तरह से ये लोग बात नहीं करते जो भी सती प्रता थी उसके पीछे में पर्दा प्रथा थी यह जो बाल्य विवाह प्रथा थी इन सबके पीछे में स्वामी जी ने हमको कहा है कि विदेशी आक्रमण होने की वजह से अपने परिवार को अपने समाज को सेफ रखने के लिए उनको प्रोटेक्ट करने के लिए यह सब दुष्कल अपने समाज में प्रवेश की है तो अभी यह बहुत लंबा फिलोसोफी झाड़ना कहना कि यह सब बंद कर तो ऐसा नहीं यह समाज के भीतर में इसकी नीव के भीतर में इस मिट्टी के भीतर में अपने देश की आध्यात्मिकता ऐसे सिंचित करो कि आध्यात्मिकता के प्रभाव से ही यह ओजस के प्रभाव से ही यह स यह जो सब यह जो इस तरह की यह जो प्रथाएं हैं कुप्रथा एं अपने ने से चली जाए तो यह इन दोनों के भीतर में प्रेम तो बड़ा गहन था किंतु संसार को भी तो दिखाना है अपने शिष्यों को भी तो दिखाना है कि देखिए सही सही दांपत्य जीवन किसको कहते हैं सिर्फ इंद्रियों के विलास के ऊपर में रचित यदि दांपत्य जीवन होता है तो उसमें आगे चलकर के आपको दुख ही मिलेगा किंतु दिव्य उल्लास के ऊपर में आधारित दांपत्य जीवन है तो आपका और आपके परिवार का मन किस तरह के ओजस रूपी सत्व से भर जाएगा यह सबको दिखाना है तो दिखाने के लिए ठाकुर इस तरह का अभिनय करते थे किस तरह का करते थे देखिए एक बार श्री रामकृष्ण और जनक भक्ते मध्य कहार वर्ण उज्जल तोर ए विषय वितर्क उठी लो एक बार श्री रामकृष्ण और एक भक्त इन दोनों के बीच में किसका वर्ण ज्यादा गोरा है कौन दोनों में से ज्यादा गोरा है यह एक आर्गुमेंट निकल गया तो अभी देखिए कि हमको लगेगा अरे ठाकुर ये सब च चीजों की क्यों चिंता करते हैं एक समय था कि ठाकुर अपने देह को इस तरह से मार-मार करके कहते थे जो सौंदर्य है यह सब भीतर में छुप जाए वरना तो क्या होगा कामर पुकुर ठाकुर गए हैं वो गमछा बांध कर के अपनी कमर पे और ऊपर में कोई वस्त्र नहीं है बस कमर पे एक गमछा बांधा है और स्नान करने के लिए जा रहे हैं रास्ते में देखा सभी स्त्री पुरुष खड़े हैं और उनकी ओर एक नजर से देख रहे हैं तो ठाकुर कहते हैं हृदय को अरे हृदय यह लोग खड़े-खड़े मेरे सामने इस तरह से क्यों देखते हैं तो हृदय ये लोग खड़े-खड़े देखते क्या है खड़े क्यों है रास्ते पे तो हृदय कहता है वो तो आपका दर्शन करने के लिए तो उस समय ठाकुर को लगा अरे नहीं लोग मेरे रूप से मोहित होकर के मेरा मेरा दर्शन करें मेरे सामने देखे ये तो ठीक नहीं है भीतर में जो मां विराजमान है ठाकुर के हृदय में मां का जो आस सिंहासन स्थापित हुआ है इसकी वजह से लोगों का अट्रैक्शन हो तो वो एक है बाह्य रूप से अट्रैक्ट होकर के जो लोग आएंगे वे लोग तो ठाकुर को समझ नहीं पाने वाले हैं और फिर यह फिर एक दूसरी ही तरह का कुछ बात चालू हो जाएगा तो ठाकुर मां को बार-बार प्रार्थना करते हैं कि यह जो दैहिक सौंदर्य है उससे मुझे मुक्ति दो तो फिर बाद में ऐसा था कि एक भक्त ने मां को कहा था कि मां हमने तो देखा है कि ठाकुर इतने कोई देखने में खूबसूरत सुंदर नहीं थे और उनका जो वर्ण था वह भी थोड़ा सा काला पड़ गया था तो मां कहती है कि अरे तुम लोगों ने तो ठाकुर को बाद बाद में देखा है मां ने तो 18 18581 दम एक अनुष्ठान प्रारंभ करने से पहले ही मने अनुष्ठा निक प्रारंभ करने से पहले पहले तो साधना की है किंतु अनुष्ठा निक प्रारंभ तो ये अनुष्ठा निक प्रारंभ करने से पहले ही मां ने ठाकुर को देखा था तो मां इस भक्त को कहती है कि अरे तुम लोगों ने तो ठाकुर को बहुत बाद में देखा है जब उनका वर्ण मलीन हो गया था उनके देह उनका जो सौंदर्य है वो भीतर में छुप गया था मैंने तो ठाकुर को उस समय देखा है उनका जो वर्ण था जैसे कि गौर वर्ण और इतने सुंदर दिखते थे ठाकुर उनका रूप लावण्य इस तरह का था तो मां कहती है कि मैंने तो इस तरह के ठाकुर को देखा है तो देखिए अभी यहां पर इन दोनों के बीच में एक भक्त के साथ में ठाकुर का विवाद प्रारंभ हो गया विवाद छिड़ गया कौन ज्यादा गोरा है तो अभी ठाकुर भी तो बच्चे की तरह है ना वो बच्चे की वो एक कहानी है ना ठाकुर जलेबी लेकर के अपने कमरे में बैठे हैं एक एक छोटा सा बच्चा 5 साल का कमरे में आया ठाकुर के उसको देख कर के ठाकुर के ऊपर में बालक भाव का आवेश हो गया और वो जो जलेबी का वो जो पात्र था अपने पीछे में छुपा दिया जैसे कि एक बच्चा दूसरे बच्चों से अपनी मिठाई छुपा देता है जिससे कि उसको शेयर ना करना पड़े उसको बांटना ना पड़े और फिर जैसे ही अपने पीछे छुपाया वैसे ही ठाकुर समाधि में मग्न हो गए तो ये तो थे ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह तो बच्चे की तरह ही एक भक्त के साथ में उन्होंने विवाद छेड़ दिया तुम गोरे हो ना कि मैं गोरा हूं अभी देखिए कि इसके बाद क्या होता है एक विषय भीतर को उठीले श्री माकी मध्यस्थ साव्य स्थ कोरा होइलो ये जैसे ही आर्गुमेंट छिड़ गया तो अभी इसको एक तो अंपायर चाहिए यदि कंपटीशन होता है तो अंपायर कौन है मध्यस्थ कौन है तो वह मां शारदा देवी को ही मध्यस्थ के रूप में उन दोनों ने अपॉइंट्स तरह की बात हो गई मां तो बेचारी पड़ गई धर्म संकट में अभी एक जदी ऑब्जेक्टिव डिसीजन देना है उसमें जद य सामने वाला भक्त जदी गोरा होगा और वह तो ठाकुर की धर्मपत्नी है ठाकुर को तो जीवन पूरा समर्पित किया है उन्होंने आध्या जगदंबा भगवान विष्णु के अवतार के साथ में पृथ्वी पर आकर के लीला कर रही है अपने मुंह से क्या कहेगी कि ठाकुर गोरे नहीं है कम गोरे हैं और सामने वाला ज्यादा गोरा है अभी और साथ-साथ में ही जगदंबा को तो म एकदम तटस्थ रहना है मां के सामने तो सभी अपने बच्चे समान है तो मां तो पड़ गई धर्म संकट में किंतु अभी क्या करें ठाकुर ने जो कहा है तो आदेश का तो पालन करना ही पड़ेगा तो फिर क्या ठीक किया गया ठाकुर श्री मां के बोलिया राखी लेन ठाकुर ने मां को बता करके रखा प्रतिद्वंदी दुई जन ठाकुरे घोर होते पंच बटर दिके टिया जाई बार समय तहा देर बण देखिया तहा के सिद्धांत करते होई बे यह दोनों प्रतिद्वंदी है वो ठाकुर के घर से पंचवटी की ओर पैदल जाएंगे रास्ते में नबत आता है नबत में मां छुप कर के खड़ी रहेगी और उन दोनों को एक साथ में दर्शन करेगी और फिर उन दोनों के वर्ण शरीर का रंग देख कर के उनको ठीक करना होगा कि कौन ज्यादा गोरा है श्री राम कृष्णेर अंगर बण तखन तप्त कांचन सदृश हो बाहु स्वर्ण कवच सहित मिशिया जाए श्री रामकृष्ण के अंग का वर्ण उस समय तप्त कांचन की तरह था एकदम एक प्रकाशित एक चकमक करता हुआ यह जो सोना है उस तरह का उनका रंग था तप्त कांचन सदृश उनके जो अपने हाथ प उन्होंने स्वर्ण कवच पहना हुआ था ठाकुर ने तो उस स्वर्ण कवच के साथ में उनके उनका वर्ण था ठाकुर के शरीर का अंग का वर्ण वो जैसे कि मिल जाता था जैसे कि उन दोनों का एक समान दिखता था तो सोने का कवच पहना है और ठाकुर का वर्ण भी तप्त कांचन सोने की तरह था श्री मां तथापि निरपेक्ष विचार के न्याय राय दिलन अपर व्यक्ति किछु अधिक फरसा किंतु इतने सुंदर उनका वर्ण होने के बावजूद मां ने निरपेक्ष विचारक निरपेक्ष अंपायर की तरह उन्होंने अपना मत प्रदर्शित किया कि यह जो सामने वाला जो भक्त था जो दूसरा व्यक्ति था वही ठाकुर से ज्यादा गोरा था देखिए यह जो बात याद आ जाती है कि वह शंकराचार्य और मंडन मिश्र की शंकराचार्य पूरे भारत में घूम रहे थे यह व्याख्यान करते अपना अद्वैत वेदांत की प्रतिस्थापना करते ते हुए और जो भी कहेगा कि नहीं यह अद्वैत वेदांत ठीक नहीं है हमारी यह जो यह जो संहिता है ना कि यह जो योग शास्त्र है न कि ये कापालिक थे उस समय न कि ये फिर ये जो मीमांसा है यह सब ज्यादा सही है उन सबके साथ में शंकराचार्य विचार करते उनके साथ में ये डिबेट करते और डिबेट में हराते और सबको उनको सन्यास दिलवा क्योंकि यह नियम था जो शंकराचार्य के सामने डिबेट में हार जाएगा उनको संन्यास ग्रहण करना पड़ेगा शंकराचार्य की तरह तो यह मंडन मिश्र के घर पे शंकराचार्य आए उस समय के मीमांसा जो वो जो अपनी वैदिक प्रथाएं है कर्मकांड प्रथाएं तो ये कर्मकांड के बड़े पंडित थे यह मंडन मिश्र और शंकराचार्य थे कि कर्मकांड को त्याग करके यह जो त्यागे नहीं के अमृत मानस हो त्याग के रास्ते पे ही मनुष्य अमृत को प्राप्त होता है इस बात के प्रचारक अद्वैत वेदांत के अब इन दोनों में तर्क चालू हुआ नियम यह हुआ कि यदि मंडन मिश्र जीत जाते हैं तो शंकराचार्य गृहस्थ बनेंगे यदि शंकराचार्य जीत जाते हैं तो मंडन मिश्र सन्यास ग्रहण करेंगे और एंपायर बनाया गया उन दोनों के बीच में यह निर्णायक बनाया गया मंडन मिश्र की धर्मपत्नी उभय भारती को अभी उभय भारती देखिए किस तरह के धर्म संकट में यदि शंकराचार्य जीत जाते हैं और अपने पति हार जाते हैं उसके तो कहना पड़ेगा कि वह मेरे पति हार गए शंकराचार्य जीत गए इस ची अभी ऐसा होता है तो श मंडन मिश्र यदि सन्यास ग्रहण करते हैं तो संन्यास ग्रहण में स सर्वप्रथम विधि है अपना श्राद्ध करना श्राद्ध करना यानी कि आप वैदिक रूप से आपका देहांत हुआ है इसका अर्थ है पति का देहांत होने से उभय भारती हुई विधवा और फिर विधवाओं के लिए समाज में जिस तरह के कठिन विधान होते थे उस समय व सभी का उभय भारती को पालन करना पड़ेगा किंतु देखिए कि इतनी तटस्थ थी फिर भी उसने जो निर्णय दिया शंकराचार्य के ही मत के अनुसार शंकराचार्य के ही फेवर में कि वही जीत गए हैं और मंडन मिश्र की हार हुई यह जो अपनी ये जो सनातन हिंदू प्रथा है कि आपका किसी भी जद आपके भीतर में तटस्थता न्याय परायणता इतनी होनी चाहिए कि किसी जो आपके सामने प्रतिद्वंदी आते हैं उसमें किसी का किसी के साथ में आपका कितना ही गहन रिश्ता क्यों ना हो आपको तटस्थ होकर के नियम के अनुसार उसका निर्णय लेना है ऑफकोर्स माने यह जो कहा यदि वह कह देती कि ठाकुर ज्यादा गोरे हैं या फिर सामने वाला व्यक्ति ज्यादा गोरा है इसका कंसीक्वेंस जो है उभय भारती के लिए जो था उसको विधवा होना पड़ा इतना सीरियस कंसीक्वेंस मां के जीवन में नहीं होता किंतु फिर भी देखिए कि हम लोग आज 200 साल के बाद में 150 साल के बाद में यह सब पढ़ रहे हैं तो इससे हमको जो सीख मिलती है देखिए उस समय जो उभय भारती ने जो विधान दिया कि शंकराचार्य की जीत हुई है वह सिर्फ वही विधवा हुई यहीं तक उसका कंसीक्वेंसेस था यहीं तक उसका परिणाम था आज माने यह जो परिणाम दिया यह जो उत्तर दिया हो सकता है कि उस समय इसका कोई यह ना हो उसका कोई इफेक्ट ना हो किंतु यह 1500 साल तक तो अपना यह मिशन चलेगा 1500 साल तक हम भक्त लोग इस घटना को पढ़ेंगे और भीतर में अपना यह जो कर्म है कर्म की होगी हमको यह सीखने को मिलेगा कि किस तरह से संसार में रहना है और हमको एक आनंद मिलेगा दिव्य आनंद मिलेगा और यह दिव्य आनंद अपने यह जो जन्म जन्मांतर के जो फल है कर्मा के फल इसका बोझा अपने सर पर बटोर से हम जा रहे हैं सर पर अपने रख कर के वो बोझा थोड़ा सा कम होगा तो उभय भारती के समय में इमीडिएट उसका सीरियस कंसीक्वेंस था इस घटना के साथ में इमीडिएट सीरियस कंसीक्वेंस नहीं है किंतु ओवर लंग पीरियड ऑफ टाइम सभी भक्त के हृदय में यह घटना रहेगी इस घटना का चिंतन करते-करते हम ध्यान करेंगे देखिए अभी जब ध्यान भी करते हैं तो कैसे करना है वहां मां के साथ में हम भी खड़े हैं और ठाकुर है और उनका जो प्रतिद्वंदी है वो दोनों जा रहे हैं अपने कमरे से पंचवटी की ओर और हम मां को देखते हैं मां देखती है दोनों को दोनों को और फिर अपना परिणाम बताती है अपना उत्तर बताती है कि नहीं वो सामने वाला व्यक्ति ही ज्यादा गोरा है तो यह जो घटनाएं हैं एक के बाद एक हम पढ़ेंगे पढ़ते रहे हैं पढ़ते रहेंगे हमारे हृदय को कैसा परितृप्ति करती है यानी इसका कंकू ओवर ए लंग पीरियड ऑफ टाइम इन द हार्ट ऑफ सो मेनी डेवो तो यह तो एक घटना हुई अभी देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या कहते हैं स्वभाव गुण एवं श्री रामकृष्ण शिखा प्रभाव श्रीमा सत्त सतो जोखन जेमन तो खन ते मन जेखाने जेमन सेखाने ते मन जहा के जेमन तहा के ते मन ई उ उटी जीवने प्रति काजे ही प्रति फलित कररिया लेन ज श्री श्री ठाकुरो एक दिन स बिस्मय भागने हृदय के बोलिया लेन देखिए मां के अपना स्वभाव के गुण के अनुसार और श्री राम कृष्ण देव की शिक्षा के प्रभाव में आकर के श्री मां सत्य सत्य सच सच में जखन जेमन तखन तमन जिस परिस्थिति में है उस समय उसके अनुसार कार्य करना है जेखाने जेमोन शेखाने ते मोन जहां पर जिस तरह का जिस जगह पर रह रहे हैं उस जगह पर उस तरह का कार्य करना है जहा के जेमोन तहा के तमोन जिस व्यक्ति के साथ में हम यह कार्य कर रहे हैं उस व्यक्ति के साथ में जिस तरह का व्यवहार उचित है वो करना है देखिए जिस पर पर स्थिति में है उस परिस्थिति में परिस्थिति के अनुसार वर्तन करना है जिस जगह पर रह रहे हैं तो जगह के प्रभाव के अनुसार वर्तन करना है जिस व्यक्ति के साथ में कार्य कर रहे हैं व्यक्ति के अनुसार अपना कार्य करना है यह जो ठाकुर की शिक्षा थी जिसकी मदद से हम इस समाज में ठीक-ठीक रह पाएंगे बिना किसी को उद्वेग दिए बिना किसी के साथ में झगड़ा किए और यह जो ठाकुर की शिक्षा यह मां के जीवन में संपूर्ण रूप से प्रतिफल हुई थी एक छोटी सी कहानी अपने भारत देश के इतिहास में से वो पारसी लोग जब वो भारत में आए वहां पर व गुजरात के एक किनारे पे सूरत के आसपास कहीं पे तो उन्होंने राजा को मैसेज भेजा कि राजा हम लोग यहां पर रहना चाहते हैं वो पारसी लोगों का जो सरदार था उसने तो राजा ने क्या किया एक पूरा एक गिलास दूध भर कर के इनको भेजा अभी ये बाकी लोग सब पारसी लोग थे वह बड़े आश्चर्य चकित हो गए कि राजा ने उत्तर तो दिया नहीं कहा कि ये पूरा उसकी उसकी वजह वो दूध का पूरा भरा हुआ छलो छल भरा हुआ गिलास बेच दिया तो अ यह पारसी का किंतु नेता था वह समझ गया ये राजा क्या कहना चाहता है कि यहां पे हम लोग इतने ज्यादा लोग हैं और यहां पे सब कुछ अभी तो और नए किसी को रखने के लिए जगह नहीं है तो फिर यह पारसी के नेता ने क्या किया उसमें शक्कर डाल दी और शक्कर डाल कर के दूध वापस भेज दिया अभी राजा ने जैसे ही दूध का टेस्ट किया वैसे ही उसको समझ में आ गया कि दूध अभी मीठा हो गया है पहले सामान्य दूध था था अभी यह मीठा दूध हो गया है तो इमीडिएट राजा ने इनको रहने के लिए जगह दे दी तो देखिए इसका अर्थ क्या पारसी के नेता ने क्या कहा हम आपकी जगह में जो छोटी जगह में ज्यादा लोग हैं तो उसको हम डिस्टर्ब नहीं करेंगे हम इस तरह से घुलमिल जाएंगे समाज में कि आपके पूरे समाज को हम उन्नत करेंगे तो आज इतने सालों के बाद में देखिए रतन टाटा वगैरह ये जितने इंडस्ट्रियलिस्ट है इन लोगों ने कितना अपने भारत देश को समृद्ध किया है पारसी प्रजा ने तो यहां पर भी यह जोखन जेमन तखन ते मन जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति के अनुसार अपने को ढाल देना है जेखाने जेमन शेखाने ते मन जिस जगह पर रहते हैं उस जगह के होकर के रहना है जहा के जेमन तहा के ते मन जिसके साथ में जिस तरह का व्यवहार करना उचित है वह करना है वो बिल्ली की एक कहानी हमने देखी थी कि हमने देखा कि एक राधु की परिचालित कि एक स्त्री जयराम बाटी में बिल्ली के सर पर पैर रख कर के उसको ये आदर कर रही है इमीडिएट मां ने कहा कि अरे बिल्ली के सर पे पैर क्यों रखा वह तो गुरु स्थान है बिल्ली को प्रणाम करो तो वो स्त्री तो बड़ी ही आश्चर्य चकित हो गई बिल्ली को प्रणाम करना यह कौन सी बात हुई किंतु देखिए सर तो गुरु स्थान है वो फिर बिल्ली का सर हो ना कि मनुष्य का सर हो उसके सर पे पैर रखा तो उसको प्रणाम करना है एक बिल्ली को जो आदर देना है बिल्ली के साथ में जिस तरह का व्यवहार करना है वो भी उसके साथ में वो करना है एक स्त्री भक्त ने जयराम बाटी में झाड़ू लगाते लगाते झाड़ू को एकदम जोर से फेंक दिया एक साइड पे उसका कार्य समाप्त हो गया इसके लिए तो मां ने इमीडिएट कहा देखो इस तरह के फेंक कर के वोह झाड़ू को मत रखो उसको एकदम शांति से उसको एक अच्छे से उसको अपनी जगह पर रखो इतना जो छोटा सा भी कार्य है उसको भी ठीक-ठाक करना चाहिए मां कहती है कि झाड़ू को भी उसका जो सम्मान प्राप्त है वो उसको देना है तो वोह स्त्री भक्त बड़ी आश्चर्य चकित हो गई भक्तों को सम्मान देते हैं ठीक है साधुओ को सन्मान देते हैं ठीक है मां को देते हैं वह ठीक है झाड़ू को भी अपना उसका एक प्राप्त सम्मान है और उसको भी वह देना है किंतु वह भी देना है तो यह जो ठाकुर की जो शिक्षा थी कि जिस तरह के भी परिस्थिति में हम रहते हैं उस परिस्थिति में अपने को इस तरह से ढाल देना है कि जैसे कि हम और किसी के सर के ऊपर में बोझ स्वरूप ना बन जाए हम लोग किसी के लिए कहीं एक एक झगड़े का कहीं एक विमर्श का कारण ना हो जाए तो यह बात मां के जीवन में इतना सुंदर रूप से प्रतिफल हो रही थी दक्षिणेश्वर में कि एक दिन ठाकुर ने स विस्मय विस्मय में आकर के हृदय को कहा था रे रिदु आर बड़ो भावना छीलो जे पाड़ा गए में अरे हृदय मेरी तो ब मुझे तो बड़ी चिंता थी कि एक पछत गांव से यह आती है पछत गांव की ये लड़की है मां शारदा के जाने किसको पता खाने कोथा सचे जा यहां पर कहां पर शौच करने के लिए जाएगी आर लोके निंद करबे तखन लज्जा पते होवे यहां कहां पर शौच के लिए जाएगी इधर उधर सबके सामने पता नहीं क्या करेगी किस तरह का उसका वर्तन रहेगा छोटे से गांव से आती है और उसका इस तरह का वर्तन जद होगा तो सब लोग बातें करेंगे सब लोग निंदा करेंगे और मुझे लज्जित होना पड़ेगा किंतु ता ओ किंतु ए मोन ज कखन की कोरे के टेर पाई ना किंतु वो इस तरह से रहती है इस तरह से कार्य करती है कि कब क्या करती है किसी को कुछ पता नहीं चलता बायरे जैते आमी कोखन देख लूम ना नबत के बाहर में जाते हुए इधर-उधर घूमते हुए बाहर कहीं पर जाते हुए मैंने खुद ने उसको कभी देखा नहीं इस तरह से मां वहां पर नबत में रहती थी तो ठाकुर ता ई को था प्रशंसा छोले बोली ले ठाकुर ने तो यह प्रशंसा के रूप में ही यह बात कही थी किंतु सोना अधि श्री मां ई भावनाए पड़ी लेन ओ मां तिनी तो जा चान ताई मां ओके देखिए देन अभी ठाकुर ने तो यह बड़ा प्रशंसा के रूप में कहा था किंतु मां ने यह बात सुन ली और जैसे ही मां ने यह बात सुनी तभी से वह टेंशन में आ गई बड़े ही चिंतित हो गई क्यों क्योंकि ठाकुर को जब जो चीज देखनी है तो वह मां जगदंबा उनको दिखा देती है अभी ठाकुर ने अपने मन में यह संकल्प किया है कि ये देखो मैंने तो मां को अपने कमरे से अपने नबत से बाहर जाते हुए मैंने खुद ने कभी नहीं देखा अभ ये उनके मन में संकल्प यदि जागृत हुआ है तो पता नहीं मां जगदंबा उनको यह भी दिखा देगी तो अभी मां को तो बड़ा लज्जित होना पड़ेगा कि वो नबत से बाहर जा रही है वो चाहे स्नान करने के लिए जा रही हो सुबह को गंगा के किनारे न कि शौच करने के लिए जा रही हो तो भीन ठाकुर की नजर में आएगी तो फिर मा मां कहती क्या है पता है मां कहती है कि ही बार बायरे गलेई और चोखे पड़ते हुवे देख छी अभी मुझे लगता है कि जैसे ही मैं नौबत के बाहर में आ उनकी नजरों में पड़ूंगी ताई तीनी व्याकुल होईया जगदंबा के डाकी ते लागी लेन इसीलिए मां व्याकुल होकर के जगदंबा को पुकारने लगी मां हमार लज्जा रखा करो मां मेरी लज्जा की रक्षा कीजिए मुझे आप रक्षा कीजिए इस तरह से कि मैं उनकी नजर में ना आऊं जगदंबा शही प्रार्थना सुनिया ताके एमन संतर पने राखी तेन मां जगदंबा मां की इस प्रार्थना सुनक के उनको इस तरह से वह प्रोटेक्ट करके संत पण से एक इस तरह से आवृत करके रखती थी कि दीर्घ काल दक्षिणेश्वर बास करि आओ तिनी कहारो दृष्टि पथे पति तो होई नाई लंबा समय दक्षिणेश्वर में निवास करने के बावजूद और किसी ने उनका दर्शन नहीं किया था देखिए गिरीश घोष की एक कहानी है ठाकुर की महासमाधि के बाद में गिरीश घोष एक बार अपनी छत के ऊपर में अपने खुद के घर की छत के ऊपर में टहलने के लिए गया अभी यह बलराम बाबू का घर पास में ही है तो बलराम बाबू के घर की छत के ऊपर में मां वहां पे बैठी हुई थी तो जैसे ही गिरीश को पता चला कि मां वहां पे है इमीडिएट अपने खुद के घर की छत में से वह कमरे में आ गया नीचे में आ गया कहा कि मेरी पाप दृष्टि है इस पाप दृष्टि से मैं मां क्या दर्शन करूंगा तो पता नहीं मुझे कितना भयानक पाप लगेगा यह बोलकर के गिरीश अपने कमरे में से अपने कमरे में आ गया देखिए कि इस तरह से भक्त मां की रक्षा करते थे एक बार वह मां को मां काली का बड़ा ही सुंदर श्रृंगार किया गया फूलों की माला पहनाई गई जिसको कि मां शारदा ने स्वयं बनाया था तो उसका दर्शन करवाने के लिए ठाकुर ने मां को आने हुए आने को कहा तो मां वहां पे आ रही है देखा बलराम बाबू वगैरह खड़े हैं तो मां पीछे से मंदिर के सीढ़ी चढ़ रही है तो ठाकुर ने चिल्ला कर के कहा अरे पीछे की सीढ़ी से मत चढ़ना वहां पे वो एक और एक औरत थी वहां पे सीढ़ी चढ़ते चढ़ते पैर फिसल गया पैर टूट गया अभी जैसे ही बाकी भक्तो को पता चला कि ठाकुर मां को इस तरह से पुकार के कह रहे हैं तभी इमीडिएट वह सब लोग वहां से चले गए जैसे कि मां सामने आकर के मां काली का दर्शन कर पाए तो यह था कि पूरा मां को सुरक्षित रखना वहां पर और यह सभी लोगों को पता था कि मां की पवित्रता की रक्षा हमको करनी है तो देखिए ताई मंदिर खजांची एक दिन तहा और संबंध जिज्ञास तो हुया बोलिया छिले इसीलिए कालीवाड़ा निची जो कि वहां का चीफ एडमिनिस्टर टर है उसने उसको किसी ने पूछा मां शारदा के बारे में तो उसने उत्तर दिया था तीनी आन सुने छी किंतु कखन देखते पाई नहीं मां है ऐसा सुना है किंतु कभी उनका दर्शन नहीं हुआ तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत श्री राम कृष्णा पर मस्तु शंकराचार्य सिखाते थे अद्वैत वेदांत और मंडन मिश्र का था कि ये मीमांसा अर्थात कि भारत में यह जो कर्मकांड जो वैदिक प्रथा पहले से चली आ रही है वह तो शंकराचार्य का कहना था कि सन्यास ही एकमात्र रास्ता है जितनी भी यह क्या कहेंगे विधि विधान है उससे परे जाकर के आपने सन्यास लिया अर्थात कि आपने समाज का त्याग किया जितने भी कर्म है कर्म का त्याग किया तो यह कर्म त्याग और कर्म का माध्यम अब मुक्ति किससे मिलेगी ईश्वर दर्शन किससे होगा कर्म का त्याग करने से होगा कि कर्मकांड के माध्यम से होगा यह दोनों के बीच में डिबेट का टॉपिक था