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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

देवीत्‍व का जागरण : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 8 May 2024

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ॐ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः सड़सी पूजा का विवरण हमने पढ़ा कि किस तरह से पूजा समा संपन्न हुई और किस तरह से ठाकुर ने मां के भीतर में मां और देवी दोनों का आवाहन किया गंभीरा गंभीरानंद जी महाराज जिस तरह से लिखते हैं कल श्री श्री माता ठाकुरानी रो देवी मानवत्वम विकास द्वार अर्गल मुक्त कोलो यह देवी त्व और मानवत्वम हम यह भी कह सकते हैं कि मातृत्व देवत्व और मातृत्व का पूर्ण विकास मां के भीतर में हो इसका ध् इस का गेटवे खुल गया ओपन हो गया ठाकुर की इस पूजा की वजह से और देखिए कि किस तरह से यह मां के जीवन में बाद में जो चैप्टर्स आएंगे भक्त जननी है संघ जननी है देवी है जिस तरह से एक के बाद एक उनके चरित्र की हम जितना चिंतन मनन करते जाएंगे अध्ययन करते जाएंगे इतना ही हमको समझ में आता जाएगा कि मां के जीवन का महात्म जो है वह यहां से प्रारंभ होता है यदि हम यह कहे कि ठाकुर के जीवन की सबसे इंपोर्टेंट घटना कौन सी है कि जिस घटना के माध्यम से ठाकुर ने जीव के उद्धार के लिए प्रथम कदम बढ़ाए तो हम कह सकते हैं कि जब ठाकुर निर्विकल्प समाधि में थे उस समय ठाकुर को आदेश मिला था ई भाव मुखे था अर्थात कि तुम भाव मुख में रहो इस बॉर्डर लाइन बिटवीन कॉन्शसनेस एंड सुपरकॉन्शसनेस सब समय कॉन्शसनेस सुपरकॉन्शसनेस में डूबे हुए रहोगे सब समय समाधि में रहोगे तो फिर इन लोगों को पापी तापी जितने भी है इस जगत में पद दलित जिनका कि हृदय इस संसार की ज्वाला से सूख गया है इनको रास्ता कौन दिखाएगा तो इसलिए बीच रास्ते पर रहो पू पूर्ण रूप से मानवी भी नहीं पूर्ण रूप से अवतार वरिष्ठा भी नहीं यह बॉर्डरलाइन के रीजन पर रह कर के सब लोगों को रास्ता दिखाओ यह ठाकुर के जीवन की सबसे इंपॉर्टेंट घटना थी हम शायद ऐसा कह सकते हैं लोक कल्याण के दृष्टि से अ किसी का भी जीवन यदि हमको एनालाइज करना है तो हम बहुत तरह के विभिन्न तरीकों से हम जीवन को किसी के भी चरित्र को एनालाइज कर सकते हैं साधना की दृष्टि से देख सकते हैं सिद्धि की दृष्टि से देख सकते हैं उनके जीवन के कार्यकलाप है उनके जीवन का जो लार्जर मिशन है उस दृष्टि से देख सकते हैं तो ठाकुर के जीवन को यदि हम उनके कार्यकलाप या तो उनके जीवन का जो मिशन था उस दृष्टि से देखें तो उस दृष्टि से यह इंपोर्टेंट घटना थी स्वामी जी के जीवन की कौन सी होगी घटना कि जिस घटना से उन्होंने लोक कल्याण के रास्ते पर कदम मांडा कदम बढ़ाए तो तीन-चार कैंडिडेट हमारे सामने आते हैं सबसे पहले तो काशीपुर में जब उनको निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई इसके बाद में ठाकुर ने क्या कहा देखो तुम्हारी इच्छा थी जो सर्वोच्च समाधि सुख प्राप्त करने की वह तुम्हारी इच्छा पूरी हुई किंतु अभी इसके ऊपर में मैंने ताला मार के चाबी मेरे पास में रख दी है अभी जीव कल्याण के लिए कार्य करना होगा वह कार्य जब समाप्त हो जाएगा फिर से यह सर्वोच्च स प्राप्ति की यह चाबी ये ताला तुम्हारा फिर से खुलेगा यह एक घटना हो सकती है फिर दूसरी घटना एक कैंडिडेट माने कौन-कौन से ऑप्शन है तो दूसरी है कि स्वामी जी ने ठाकुर की महासमाधि के बाद में भारत में भ्रमण करते-करते निश्चय किया कि बस हिमालय में जाएंगे वहां पर निर्विकल्प समाधि में मग्न हो जाएंगे और बीच-बीच में बस पृथ्वी पर आएंगे थोड़ा बहुत अन्न ग्रहण करेंगे देह को टिकाने के लिए और फिर से समाधि में चले जाएंगे तो वो अल्मोड़ा में गुफा में इस तरह से तपस्या कर भी रहे थे एक एकाएक क्या हुआ कि उनके पास में समाचार आया कि उनकी बहन की उनकी बहन ने अपघात कर लिया है आत्महत्या कर ली है तो यह सुनकर के स्वामी जी सोच में पड़ गए अरे मेरी ही बहन की यह हालत है तो भारत में यह जो करोड़ों बहना हैं मेरी उनकी क्या हालत होगी तो उनके बारे में सोच कर के स्वामी जी लिटरली एंड मेटाफोरिकली डिसेंडेड फ्रॉम द हिमालय हिमालय से नीचे आकर के इस धरातल पर आकर के उन्होंने भारत का भ्रमण इस दृष्टि से करना शुरू किया कि अभी भ की परिस्थिति को मुझे समझना है यह दूसरी एक घटना हो सकती है तीसरी एक है कि जब वह कन्याकुमारी में वह जो विवेकानंद रोक विवेकानंद शिला के अभी तो बाद में उसका नाम विवेकानंद शिला हुआ उस समय तो एक पत्थर ही था चट्टान ही थी समुंदर के बीच में वहां पर स्वामी जी तैर के गए और फिर जैसे बाहर में जैसे तुमुल एक युद्ध चल जैसे कि एक तूफान चल रहा है बाहर में वैसे उनके हृदय में भी एक तुमुल युद्ध चल रहा है कि उनके जीवन का उद्देश्य क्या है उस समय ठाकुर ने आकर के उनको चिन्हित किया कि या वेस्ट की ओर जाना है अमेरिका में जाना है पश्चिम की ओर इशारा करके कहा कि वहां पर जाना है तो ये एक घटना हो सकती है तो कौन सी सबसे इंपोर्टेंट घटना को कहेंगे मेरी दृष्टि से मुझे लगता है कि यही घटना कि ठाकुर ने जब वो समाधि की चाबी बंद करके ताला बंद करके चाबी अपने पास में रख ली कि हां बस अभी इस समय के बाद में तुमको इस तरह की समाधि या तो तुम्हारा स्वरूप दर्शन नहीं होगा जिस स्वरूप दर्शन से फिर तुम अपने स्वधा में चले जाओ इस तरह से नहीं होगा चाबी मेरे पास में रही तो यह ठाकुर मां और स्वामी जी तीनों के जीवन में देखिए कि एक-एक घटनाएं ऐसी है जो कि लोक कल्याण के लिए उनको जो कार्य करना है व कार्य उनकी नजर के सामने एकदम स्पष्ट रूप से उनके सामने वो दिख रहा है हालांकि अवतार का जीवन धारण करना हमको पता है कि लोक कल्याण के लिए है उनके कॉन्शसनेस सबकॉन्शसनेस में यह बात हमेशा जागृत ही रहेगी कि हां हम लोग आए हैं लोगों का दुख दूर करने के लिए कष्ट दूर करने के लिए किंतु क्या होता है कि यह जब वो जो ठाकुर कहते हैं ना कि पंच महाभूत फाद ब्रह्मो पड़े कादे अर्थात कि ये पंच महाभूत का जो पाश है पंच महाभूत का शरीर धारण करके यह जो माया पाश है उसमें बंधन उसके बंधन में पड़कर के इवन ब्रह्म भी पूर्ण ब्रह्म भगवान राम वोह भी तो मां सीता के लिए रोए थे तो इसलिए क्या है कि वो पृथ्वी पर आए हैं जन्म ग्रहण किया है माया स्वीकार की है जिससे कि लोग यह भूल कर के रहे कि हां यह तो हम जैसे नहीं है ये हमारे जैसे ही है जिससे कि उनसे कुछ सीख है तो ये जब माया स्वीकार की है उन्होंने तो ये उनका जो मिशन है शायद थोड़ा सा कॉन्शियस सबकॉन्शियस लेवल प चला गया होगा किंतु एक-एक घटना इन तीनों के जीवन में है जिससे कि यह सबकॉन्शियस लेवल पे उनका जो लार्जर मिशन है इस पृथ्वी पे इस धरातल पे वो एकदम सबके सामने बाहर में आ जाएगा उनकी दृष्टि में भी और हमेशा हम जैसे वाच कों की दृष्टि के लिए भी जैसे जो लोग विश्लेषण करते हैं जो लोग इस तरह से पैराडॉक्स खोजने का प्रयास करते हैं जिन लोगों का ऐसा हैबिट है कि कुछ ना कुछ इसमें से खोज निकाले तो हम सभी के लिए इन लोगों का यह एक-एक घटना एक जैसे कि एक ज्योति स्तंभ स्वरूप होकर के जैसे रास्ते में जाते हैं ना वो जो पुराने जमाने में क्या होता था आजकल तो ये जीपीएस वगैरह आ गया है पहले के जमाने में जब जहाज चलाते थे तो यह जो उनके कैप्टन होते थे वे लोगों को जबी अंधेरे में कहीं चट्टान पे वह टकरा ना जाए जहाज इसके लिए वह दरिया किनारा रहता था चट्टानों के ऊप में एक दीवा दांडी रखते थे एक बिकन रखते थे तो यह दीवा दांडी जैसे दूर से देखेंगे तो पता चलेगा कि हां वहां पर चट्टान है या तो फिर वहां पर समुंदर का किनारा है यदि वहां पर जाना है तो जाए और यदि नहीं टकराना है अंधेरे में तो वहां से दूर रहे तो हम लोग भी यह जो काल समुद्र रूपी यह जो भवसागर में तेर रहे हैं हमारे सामने भी इस तरह की घटनाएं दे शाइन दे फ्ले श लाइक बिकन लाइट दिवा दांडी की तरह हमारी इस भवसागर की यात्रा में हमारा मार्गदर्शन करती है तो यह घटना शोशी पूजा का हमने थोड़ा सा वर्णन और विश्लेषण कल किया आज देखते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या कहते हैं श्री मां भाव राज्य आरूढ़ होया ठाकुरे पूजा और तत सह ता साधन लब्ध समस्त फल ग्रहण करीले माने भाव राज्य में आरूढ़ होकर के ठाकुर की पूजा और साथ-साथ में ही उनकी साधन लब्ध पूरा फल उन्होंने ग्रहण किया ठाकुर ने जो जो कोई भी साधना की थी जो भी सिद्धियां प्राप्त की थी सब उन्होंने श्री मां के श्री चरणों में निवेदन कर दी कल हमने देखा कि कब जैसे कि उन्होंने अपनी की जपमाला भी मां को निवेदन कर दी थी और मां ने भी भाव राज्य में आरूढ़ होकर के वैसे जद एक नॉर्मल कॉन्शियस लेवल पर रहकर के मां जदी ये सब देखती कि ठाकुर उनकी पूजा कर रहे हैं वगैरह तो शायद हो सकता है कि मां उनकी पूजा स्वीकृत ना कर पाती किंतु मां तो उच्च भाव राज्य में समाधि राज्य में आरूढ़ है और वहां पर उनका यह जो देवी का जो उनका सही स्वरूप है उसके साथ में एकदम पूर्ण पूर्ण कनेक्शन बिठा हुआ है तो मां को पता है कि मैं आद्याशक्ति जगदंबा स्वयं हूं और यह ईश्वर ही मेरी आराधना कर रहे हैं ईश्वर ही श्री राम कृष्ण देव का देह धारण करके मेरी आराधना कर रहा है मां के मन में यह सब उस समय बिल्कुल स्पष्ट था इसके रिलेटेड एक सुंदर घटना है जैसे देखिए मां को तो पता है कि वह आध्या शक्ति जगदंबा स्वयं है किंतु कभी-कभी कभी-कभी तो क्या ज्यादातर समय ऐसा ही हो कि यह संसार में पढ़कर के यह राधू माकू नलिनी वो पागली मामी मां के सब भाई और यह कितने ही ये ये गुलाप मां भी कम नहीं थी सब लोगों के साथ में रहकर के एक ऐसा एक मां एक ऐसे जगत में रहती थी कि कभी-कभी सब विस्मृत हो जाता था कि उनका सही स्वरूप क्या है उनके बच्चे आए हैं जयराम बाटी में तो भी उनको क्या खाना खिलाएगी उनको क्या अभी जैसे कि कलकाता से जितने भक्त आते हैं ज राम बाटी में तो कलकाता के भक्तों को एक ऐसा एक हैबिट होता है कि अर्ली मॉर्निंग सुबह को उठकर के चाय पिए अभी गांव में तो ये चाय बाय पीने की प्रथा नहीं है तो अभी सुबह-सुबह दूध कहां पर मिलेगा तो मां क्या करती थी एक पात्र लेकर के जयराम बाटी में गांव घर-घर भिक्षा माग के घूमती थी कि मेरे बच्चे आए हैं कोलकात्ता से उनको चाय पिना पिलाने के लिए मेरे पास दूध नहीं है यदि आपके पास थोड़ा सा दूध है तो मुझे दीजिए ऐसा करके घर-घर भिक्षा मांग कर के दूध इकट्ठा करती थी फिर अपने घर वापस आएगी और बच्चों के लिए चाय बनाएगी अब यह कोलकात्ता के भक्त जब तक नींद से उठेंगे उनको उनके लिए सब कुछ रेडी सुबह का नाश्ता रेडी चाय रेडी सब रेडी और उनको यह पता ही नहीं है कि मां उनके लिए कितना कष्ट कर रही है एक सुंदर एक रेमनी सेंस है कि इस तरह से कलकाता से कुछ लोग गए हैं ज जाते एक दिन सुबह को क्या हुआ कि उन्होंने सोचा कि चलो यहां पर एक तालाब है बांगला में उसको पुकुर कहते हैं तो एक पुकुर है पास में तालाब है वहां पर सुंदर पद्म फूल खिले हुए हैं तो चलो एक काम करते हैं सुबह-सुबह कुछ पद्म फूल तोड़ के ले आते हैं चुन के ले आते हैं मां को जब हम मिलने को प्रणाम करने को जाएंगे उनके श्री चरण में पद्म फूल रख कर के उनकी पूजा करेंगे ऐसा सोच कर के ये दो-तीन भक्त निकले वो पद्म फूल कलेक्ट करने के लिए कमल के फूल रास्ते में देखा अभी तो सुबह-सुबह एकदम अंधेरा है रास्ते में देखा दो स्त्रियां वो कहीं से दूसरे गांव से आने का जो रास्ता है वहां से आ रही थी तो अब ये भक्तों को देख कर के एक जो स्त्री थी वो दूसरी स्त्री के पीछे में छुप गई तो ये देख कर के उन भक्तों को थोड़ा आश्चर्य तो हुआ कि हमसे इतना तो क्या डर है कि छुप जाना एक के पीछे में तो अभी दोनों स्त्रियां जब चली गई और ये दो भक्त जब जा रहे थे तो एक भक्त ने दूसरे भक्त को कहा कि जो स्त्री जो दूसरी स्त्री के पीछे में छुक गई तुमने देखा वो कौन था कौन थी तो पहले वाले दूसरे वाले भक्त ने कहा कि नहीं मुझे तो नहीं समझ में आया अभी भी अंधेरा था अर्ली मॉर्निंग थी तो दूसरे ने पहले वाले भक्त ने कहा कि अरे वो तो हमारी मां स्वयं थी हम लोगों के लिए खाना बनाने के लिए तो जयराम बाटी तो छोटा गांव है वहां पे कोई दुकान में थोड़ी-थोड़ी चीज वस्तुएं मिलेगी तो हमारे लिए खाना बनाएगी अच्छा-अच्छा तो चीजें वहां से जो उपलब्ध जो सामग्री है कहां से मिलेगी मां अर्ली मॉर्निंग एकदम सुबह को दूसरी एक स्त्री भक्त के साथ में दूसरे गांव में जाती है वहां से यह सब सामग्री इकट्ठा करके जयराम बाटी वापस आती है फिर अपने बच्चों के लिए अच्छी-अच्छी खाने की सामग्री बनाएगी तो यह बात सुनकर के ये दूसरा भक्त आश्चर्य चकित हो गया कि अरे मां हमारे लिए इतना कष्ट करती है तो खैर यह तो मां थी मां तो कष्ट करेगी ही अपने बच्चों के लिए तो किंतु इस तरह से रहते-रहते कभी-कभी मां को अपना जो असली उनका जो स्वरूप है वह कभी-कभी विस्मृत हो जाता था एक भक्त ने मां को पूछा भी सही कि मां तुमको क्या अपना सही स्वरूप सब समय याद रहता है क्या तो मां ने कहा नहीं बेटा कैसे याद रहेगा यह तो दिन भर तो काम चलता रहता है इसी में मैं इतना व्यस्त रहती हूं तो मैं देवी हूं जगदंबा हूं सब समय थोड़ी ना वो याद रहेगा किंतु मां कहती है किंतु जिस क्षण में इस कार्य में से अपने मन को बटोर करके मेरे स्वरूप के ऊपर में केंद्रित करती हूं अपने मन को इमीडिएट मुझे अपने सही स्वरूप की जानकारी याददास्त वापस आ जाती है किंतु यह तो दिन भर में इतना किसको समय मिलेगा तो एक सुंदर घटना है कि एक समय माने एक स्वप्न देखा था तो मां कहती है कि मैंने स्वप्न में क्या देखा कि मां कहती है कि मेरा इतना सुंदर रूप हुआ है मां उस समय तो बूढ़ी हो गई थी और बार-बार काला झवर होता है उनकी त्वचा भी बिल्कुल मलिन हो गई थी चेहरा भी झुलस गया था बिल्कुल व कभी-कभी मां जब जयराम बाटी से कलकत्ता आती तो यह गुलाप मां वगैरह जो मां के साथ में जो यह सन्यासी शिष्य रहते जयराम बाटी में उनको डांट द कि कैसी मां को लेके आए हो जब यहां से गई थी तो स्वस्थ थी अभी जब जयराम बाटी से कलकाता वापस आई दो हाड़ है बस हड्डी पसली है उनके शरीर में ऐसी मां को तुम वापस लेकर आए हो तो क्या करेंगे जयराम बाटी की अवस्था ही उस समय ऐसी थी कि बार-बार मां को काला ज्वर होता था यह जो पानी को शुद्ध करके पीना यह पानी को फिल्टर करके पीना यह सब उतना उस गांव में तो संभव नहीं था तो यह आजकल तो हमको पता है कि वटर बोन डिसीज पानी से जन्म लेने वाले जो रोग है वही सबसे ज्यादा उस समय के भारत को खाके बैठ गए थे मतलब खा जाते थे तो वैसे ही गांव में ऐसा ही होता था तो खैर तो मां उस समय कहती थी कि मुझे एक ऐसा स्व आया कि मेरा इतना सुंदर रूप हुआ है और सब लोग आकर के मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं क्यों ऐसा सपना आया मां को हमको पढ़ कर के मैंने जब पहली बार ऐसा सपना के बारे में पढ़ा तो मुझे थोड़ा हंसी भी आया कि देखिए कि मां के मन में किस तरह की सपना भी तो आते हैं तो कभी-कभी क्या होता है कि अपने सबकॉन्शियस लेवल की जो सब डिजायर होते हैं जैसे वो तो ये फ्रोइडीटीईआरटी कि सपन कब आते हैं किस तरह के सपना आते हैं हमारे मन की जो इच्छा होती है वह स्वप्न के माध्यम से वह सब व मेनिफेस्ट होती है तो क्या मां के मन में भी ऐसी इच्छा है कि वह एकदम सुंदर रूप उनका है फिर वह एकदम राज राजेश्वरी होकर के वह विराजमान है और सब भक्त लोग आकर के उनको इतना सम्मान देते हैं मां के मन में क्या ऐसा था देखिए कि वेस्टर्न साइकोलॉजी की दृष्टि से तो हम इसको एनालाइज नहीं कर पाएंगे हमको तो यह अपनी ईस्टन साइकोलॉजी कहो ना कि ये ईस्टन फिलोसोफी कहो गंभीरानंद जी महाराज की इसी के थ्रू इस सपना को एनालाइज करना पड़ेगा क्या है कि मां का जो असली स्वरूप है वह तो भीतर में विराजमान है ही है और भविष्य में यह ऐसा होने ही वाला है राम कृष्ण संघ के जितने भी सेंटर देखिए मां की प्रतिमा है या मां का फोटोग्राफ है कितना सुंदर रूप से सजा करके हम लोग रखते हैं और सब साधु भक्त ब्रह्मचारी वॉलंटिली सब लोग सामने बैठ कर के मां की यह जो संध्या आरती होती है उसमें पार्टिसिपेट करते हैं मां की प्रार्थना मां के मां के सामने प्रार्थना करते हैं सर्व मंगल मांगल्य तो यह भविष्य का जो दृश्य था वह मां को स्वप्न के रूप में दिखाई दे रहा है कि मां का भविष्य में इतना सम्मान होने वाला है जैसे ठाकुर ने भी कहा था ना कि ठाकुर को कैंसर हो गया था और वहां पर थे काशीपुर में तो एक दिन वो मां के लिए खाना बना कर के लेकर आती थी और जब मां खाना बना कर के ठाकुर को खिलाने को बैठेगी तो बाकी सब भक्तों को कह दिया जाता था आप सब अभी इस कमरे में से चले जाइए व भक्त लोग अपने से ही कमरे में से चले जाते थे मां और ठाकुर को अकेले छोड़ कर के तो ऐसा एक दिन मां ठाकुर को खिला रही थी ठाकुर ने क्या कहा पता है देखो कि मुझे एक ऐसा दर्शन हुआ है मैं एक ऐसे देश में गया हूं वहां प जब सब सफेद ये जो त्वचा है जिनकी इस तरह के लोग हैं सब लोग एक एकदम सफेद सफेद लोग हैं वहां पर और वह मेरी कितनी पूजा करते हैं कितनी श्रद्धा आराधना करते हैं भक्ति करते हैं तो भी सोचती है कि मैं भी सोचती हूं कि यह ठाकुर क्या कह रहे हैं सफेद चमड़ी वाले लोग सब सफेद सफेद लोग ऐसा कौन सा देश हो सकता है हालांकि इनको तो पता ही है ब्रिटेन ब्रिटेन ब्रिटिश ब्रिटेन का राज था भारत में तो ये ब्रिटिश लोग तो सफेद चमड़ी वाले थे ही थे तो जो भी है मां तो बेचारी थोड़ी गांव की थी ना वो वो कंफ्यूज हो गई कि क्या ठाकुर के कहते हैं किंतु बाद बाद में ये जो सब ये ओली बुल है मिसेस ओली बुल फिर ये निवेदिता जोसेफाइन मे क्लाउड ये लोग जब आकर के मां की पूजा कर रहे हैं मां के सामने हाथ जोड़ कर के बैठे हैं मां का आशीर्वाद मांग रहे हैं तब कहीं जाकर मां कहती है कि अब मुझे समझ में आए कि ठाकुर क्या कहना चाहते थे इन गोरे लोगों के देश में उनका प्रभाव विस्तृत होगा और वहां पे भी उनको इतना सम्मान उनको इतनी पूजा दी जाएगी तो देखिए कि ये उनका जो देवी त्व है वो कभी-कभी उनको यह दूर सुदूर का जो भविष्य है उनकी नजर के सामने लाकर के खड़ा कर देता है तो यहां पे भी जब हम गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं मां भावा वेश में आकर के समाधि में स्थित होकर के समाधि में आरूढ़ होकर के ठाकुर ने जब उनकी पूजा उनकी साधना उनकी आराधना का पूरा फल मां के श्री चरणों में अर्पण किया तो मां ने भी बिना किसी दुविधा बिना किसी संकोच के ठाकुर की जो साधना का फल ग्रहण कर लिया और कोई इस तरह से ठाकुर की साधना का फल ग्रहण नहीं कर सकता ठाकुर ने जब स्वामी जी को कहा था कि मैंने साधना करके बहुत सारी सिद्धियां प्राप्त की है तो क्या तुम उस सिद्धि को लोगे तुमको तो जगत कल्याण का बहुत सारा कार्य करना है तो मुसे तो स्वामी जी ने कह दिया कि महाशय क्या इस सिद्धि को प्राप्त करने से मुझे क्या ईश्वर प्राप्त होगी तो ठाकुर ने कहा नहीं ईश्वर प्राप्ति के लिए तो यह सब सिद्धियां नहीं है यह तो तुमको जगत कल्याण के लिए जो करना है उसके लिए है तो अभी इस इसमें भी देखिए कि ऐसा नहीं है कि स्वामी जी के पास में यह सब सिद्धियां नहीं थी एक बार स्वामी जी वहां पर अमेरिका में जब वह प्रवचन वगैरह कर रहे थे अपने मित्रों के साथ में जो रहते थे उनके जो वेस्टर्न एडमाइन डिसाइल है उनके साथ में तो एक वेस्टर्न डिसाइल उस ने सुना कि स्वामी जी अपने कमरे में जोर-जोर से किसी के साथ बात कर रहे हैं तो दूसरे दिन रात को रात की ये घटना ऐसी हुई तो दूसरे दिन सुबह को इस डिसाइल ने स्वामी जी को पूछा कि स्वामी जी आप रात को किसके साथ में जोर-जोर से बात कर रहे थे तो स्वामी जी ने कहा मैं तो किसी के साथ बात नहीं कर रहा था क्यों तो उसने कहा कि हमने आपके कमरे में से इस तरह की आवाज आती हुई सुनी तो स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया पता है यह जब मैं प्रतिदिन इतने सारे लेक्चर देने होते हैं इतने सारे क्लासेस देने होते हैं तो कभी-कभी मुझे जो कहना है वह जो सामग्री है जो मटेरियल है जो नॉलेज है वह कभी-कभी खुट जाता है वो कभी-कभी वो मैं क्या कहूं रोज-रोज नई नई चीज मैं कैसे कहां से लेके आऊं तब इस तरह से एक देवी शक्ति एक देवी आवाज मेरे सामने आकर के सब मटेरियल मुझे दे देती है या कि कल ऐसा ऐसा कहना है तो तुमने शायद उस देवी शक्ति की आवाज सुनी होगी यह जो ठाकुर की ऐसी देवी शक्ति थी ना ठाकुर क्या कहते हैं मां राश ठेले दे अर्थात कि उनकी जिवा के ऊपर में सरस्वती के रूप में बैठ कर के राश ठेले देना अर्थात कि यह जो मेटाफोर ठाकुर बार-बार यूज करते हैं कि गांव में जब स्त्रियां वो जो गेहूं या धान होता है उसको वो जो उसको जो यह करना होता है सेपरेट करना होता है उसके ये जो उसका जो बाहर वाला जो लेयर होता है उससे तो ढेंकी के भीतर में डालते हैं ढेंकी अर्थात कि क्या गोली शब्द है एक बड़ा लकड़ी का टुकड़ा जो कि गेहूं जो पड़ा हुआ है उसके ऊपर में जोर-जोर से आघात करेगा और गेहूं में से ऊपर का वो जो लेयर है वो सेपरेट हो जाएगा फत जिसको कहते हैं गुजराती में तो हिंदी शब्द याद नहीं आ रहा है तो जो भी है तो इस तरह से जब एक स्त्री वहां पर सामने बैठती है और वो जो ढ ढेंकी के भीतर में गेहूं पूरा खत्म हो जाता है तो वो बड़ा सा एक यह रहता है गेहूं का ढग उसमें से उसको वो व वो बार-बार डालती जाती है तो इसको वो राश ठेले देना कहते हैं तो वैसे ही जब ठाकुर की वाणी जब समाप्त हो जाएगी यह केशव सेन है यह विद्यासागर है ना कि यह सब बड़े-बड़े विद्वान लोग हैं इनके सामने बात करते-करते तो मां सरस्वती के रूप में जिवा पे विराजमान होकर के व दूसरा नॉलेज का भंडार ज्ञान का भंडार उनके मन के भीतर में ढाल देती है तो ऐसा ठाकुर की जो सिद्धियां थी वो स्वामी जी के पास में भी वोह सिद्धियां आई थी सही किंतु जब ठाकुर ने पूर्ण सिद्धि स्वामी जी को देने का प्रपोज किया उन्होंने जब कहा तो स्वामी जी भी डर गए मुसे तो कहा कि नहीं ईश्वर प्राप्ति के लिए जो सिद्धि चाहिए वही मैं ग्रहण करूंगा इससे ज्यादा कुछ नहीं किंतु मन में ही मन में स्वामी जी को यह भी पता था कि ठाकुर की जो सिद्धियां है वो उस लेवल की है कि उसको यदि मैं ग्रहण करूंगा तो यह शरीर भी टिकेगा कि नहीं पता नहीं यह मन उसको लेने के लिए सक्षम भी है कि नहीं जिस सिद्धि के हम अधिकारी नहीं है उस तरह की सिद्धि यदि हमारे मन में एकाएक जद जाती है तो आदमी पागल हो जाएगा तो इवन स्वामी जी जैसे स्वामी जी भी जिन्होंने मना कर दिया ठाकुर की सिद्धियां ठाकुर की साधना का फल स्वीकृत करने से मां ने एकदम शांत चित्त से बिना किसी द्विधा के ठाकुर की साधना का फल स्वीकृत कर लिया क्योंकि जगदंबा वह एक इस तरह का विशाल महासागर है जिसमें कि आप जितनी ही आध्यात्मिक सिद्धियां डालते जाए उसके भीतर में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जैसे ठाकुर ने कहा ना कि मां का स्वभाव किस तरह का शांत है बाहर से कोई भाव नहीं दिखाई देता क्यों छोटे से तालाब में जद एक हाथी प्रवेश करेगा तो तालाब का पानी चारों ओर उछले किंतु एक विराट महासमुद्राम से एक दो लहरें कुछ प्रकट होगी और इसके बाद में सब कुछ शांत हो जाएगा तो वैसे ही मां का जो मन था भाव का महासागर था ऐसी कितनी ही हजार ठाकुर आकर के हजार सिद्धियां हजार जन्मों की सिद्धियां भी मां को जद अर्पण कर देते मां आराम से ग्रहण कर लेती और कोई फर्क नहीं पड़ता वस्तुत तिनी बिना साधना समस्त सिद्धि अधिकार होई लेन इस तरह से मां बिना कि किसी साधना के समस्त सिद्धि की अधिकार हुई किंतु यहां पर जब इस तरह से जब गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि माने खुद ने तो कोई साधना की नहीं और बिना किसी साधना के ही ठाकुर की सिद्धि की अधिकार हो गई तो सामने यह बात भी हमको याद रखनी है गंभीरानंद जी ने ही अवतरण का में जैसे कहा है मां आध्या शक्ति जगदंबा स्वयं है ठाकुर को सिद्धि ही उन्होंने अर्पण की थी अर्थात कि उन्होंने ठाकुर को जो सिद्धियां काली रूप में अर्पण की थी वही सिद्धियां उन्होंने मां शारदा के रूप में फिर से ग्रहण की अधिक अतु थिता बस्था ओ तिनी सर्व जीवे ब्रह्म ब्रह्म बुद्धि राखि शिक लेन साथ-साथ में ही व्यथित अवस्था अर्थात की बाह्य दशा में भी जब मन जब आत्म आत्म स्थित हो जाता है मन जब अपने सही देवी त्व में स्थित हो जाता है तब तो मा देखती है कि यह जो कुछ विश्व बना है ब्रह्मण का बना हुआ है ब्रह्मण ही विभिन्न स्वरूप धारण करके इस विश्व को चालित करते हैं तो था तो वो आत्म साक्षात्कार होने से अनुभव करती है किंतु बाह्य दशा जब होती है जगत में जो भी कुछ कार्य करती है उसमें भी मां यह देख सकती है अभी कि हां इस ब्रह्मण का ही सब कुछ पूरा जगत बना हुआ है सर्व जीवे ब्रह्म बुद्धि अर्थात कि जो कोई भी पशु पक्षी मनुष्य जो कुछ भी है वह सबके भीतर में वही एक सनातन ब्रह्मण है यह बात सीखी माने इस सिद्धि को स्वीकार करके ए दि के श्री श्री ठाकुर सहधर्मिणी प्रति सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य पालन करया दाई मुक्त होलेन यहां पर भी ठाकर अपनी सहधर्मिणी के प्रति जो सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है उसको साधित करके अपनी रिस्पांसिबिलिटी उन्होंने निभाई देखिए यह पति और पत्नी जो दो सह जिनको कि सहधर्मिणी कहते हैं पत्नी को उसके पति प्रति पति का क्या कर्तव्य है अपने पास में जो कुछ भी है सब कुछ उसके साथ में शेयर करना अपनी ये जो भारतीय परंपरा के अनुसार पत्नी जब विवाह करके पति के घर आती है तो पति के घर की जितनी भी जो कुछ भी है उसके घर में सभी चीजों के ऊपर में उसका समान हक होता है समान अधिकार होता है ऐसा नहीं कि दूसरों के घर से आई है तो सभी चीजें नहीं इतनी इतनी चीजें मिलेगी इतना खाने को मिलेगा उतना पीने को मिलेगा इससे ज्यादा और कुछ नहीं मिलेगा ऐसा नहीं हमारी भारतीय परंपरा बड़ी स्पष्ट है पति के घर में जो कुछ भी है पति का जो कुछ भी है वो सभी के ऊपर में पत्नी का समान अधिकार है तो यहां पे ठाकुर के पास में वैसे बैंक बैलेंस तो नहीं था फिक्स डिपॉजिट भी नहीं थी ना ही कोई गाड़ी बंगला मकान था ना ही यह गाय भैंस वगैरह थी पशु धन था ठाकुर के पास में क्या था यह आध्यात्मिक धन था आध्यात्मिक सिद्धि थी साधन भजन रूपी उनके पास में यह संपद थी तो वह ठाकुर की जो आध्यात्मिक संपद है उसका समान अधिकार मां को मिलना चाहिए और इसीलिए ठाकुर ने अपना आध्यात्मिक धन श्री मां के श्री चरणों में अर्पण किया सड़सी पुजार परेयो श्रीमा पांच छय मास रात्रि काले ठाकुरे सज्जा पार्श्व शयन कोरिया चलन शशी पूजा समाप्त होने के पाच छ महीने तक मा ठाकुर के ही कमरे में ठाकुर के ही साथ में शयन करती रही अद्भुत ठाकुरर भाव और समाधि सही तखन पूर्ण परिचर ना परिचय ना गोटाई तीनी एक एक दिके जेमन पति सानिध आनंद पाई तेन अनन दिके तमनी भए विनित्र रजनी जापन कोरीते अद्भुत ठाकुर की अद्भुत ठाकुर के अद्भुत भाव और अद्भुत समाधि इसके साथ में मां का तभी तक पूर्ण परिचय नहीं हुआ था इसलिए एक तरह जब ठाकुर का ठाकुर के साथ में रहने का जो एक पूर्ण आध्यात्मिक आनंद है वह तो मां के हृदय में प्रगट हो ही रहा था किंतु साथ-साथ में भय भी था ठाकुर जब भाव में आकर के मां के मां काली के साथ बात करेंगे ठाकुर भाव में आकर के पता नहीं क्या-क्या कुछ बोलते रहेंगे इधर-उधर घूमते रहेंगे फिर दिगंबर हो जाएंगे झगड़ा करेंगे मां के साथ में मां काली के साथ में तो यह सब देखकर के मां बड़ी भयभीत हो जाती थी और रात ठाकुर तो रात को सोते नहीं थे उनको तो पूरी रात ऐसे ही भाव और समाधि में बीती रहती थी तो मां भी बेचारी भय की मारे भई की वजह से यह पूरी रात सो नहीं पाती थी ठाकुर समाधि में चले गए तो ऐसा उनका देह पूरा लकड़ी की तरह जड़ हो गया मां बेचारी चिल्लाएगी व हृदय को बुलाएगी किसी को बुलाएगी अरे अरे ठाकुर का देह त्याग हो गया क्या मर गए क्या ठाकुर और सब लोग आकर के फिर वोह भगवान का नाम सुनाएंगे तब कहीं जाकर के ठाकुर भाव में से और समाधि में से वापस आएंगे तो ऐसा दिन प्रतिदिन होता है देख कर के फिर मां का जो निंद्रा नहीं होना नींद नहीं आ यह ठाकुर ने देखा तीनी निजे बोली लेन माने खुद ने कहा है सेजे की अपूर्व दिव भावे थाक ता बोले बोझा वार नहे मां कहती थी ठाकुर किस अपूर्व दिव्य भाव में रहते थे वह हम शब्दों से व्यक्त नहीं कर सकते कखन भाबे घोरे कतो की कोथा कोखन हाश कनो काना कखन एक बारे समाधि ते स्थिर होए जावा कभी-कभी भाव के घोर में आकर के कितनी बातें करेंगे महाकाली से कभी हसेंगे कभी रोएंगे कभी-कभी एक बार पूर्ण रूप से समाधि में मग्न हो जाएंगे रकम समस्त रात ऐसे ही पूरी रात बीती थी शकी एक आविर्भाव आवेश वो एक किस तरह का आविर्भाव किस तरह का आवेश ठाकुर के सर पर होता था देखे भोए हमार सर्व शरीर काप तो आर भाप तुम कखन रात टा पहावे ये देख कर के भय के मारे मेरा पूरा शरीर धुज रहता और सोचती रहती कि कब यह रात समाप्त हो कब दिन आए कब बाकी लोग उपस्थित हो ठाकुर थोड़े से स्वस्थ हो कुछ नॉर्मल हो देखिए यह देवी और मानवत्वम आन अपने देवी तोव में स्थित होकर के ठाकुर की समत समस्त सिद्धियां ग्रहण कर दी और वही मानवत्वम पर आकर के मनुष्य के ये स्तर पर आकर के ठाकुर जब उसी भाव में जब जा रहे हैं मां का पूरा शरीर धुज रहा है मां सोच रही है कब यह रात्रि समाप्त हो कब दिन उगे तो कब कहीं ठाकुर थोड़े से स्वस्थ हो कितना मधुर यह लीला है और प पढ़ने से हमको कितना आनंद आता है भीतर से हंसी भी आती है एक एक एक तरह का एक दिव्य आनंद भी आता है भाप समाधि र कोथा तखन तो किछु बुझी ना उस समय भाव क्या है समाधि क्या है यह सब इतना तो कुछ समझ में नहीं आता था एक दिन तार समाधि आर भांगे ना एक दिन क्या हुआ ठाकुर जो समाधि में गए सो गए और फिर समाधि में से वापस ही नहीं आ रहे देखे भए भए कदे केटे झी काली रं के दिए हदय के डेके पाठा लूम ठाकुर भाव समाधि में जो गए हैं वापस ही नहीं आ रहे देख कर के मां रोते रोते उनकी वहां पर एक दासी थी एक दासी तो नहीं कहेंगे एक काम करने के लिए एक महिला को जो रखा था वो उसकी मां को बुला उसकी मां को द्वारा मैसेज देकर के हृदय को बुलाया कि हृदय आओ देखो कि क्या ठाकुर के साथ में हो गया है हृदय तो ठाकुर की सेवा करता था तो समाधि में जाएंगे भाव में जाएंगे तो क्या करना है वह सब हृदय को पता रहता था श ऐसे काने नाम सनाते सुनाते तबे कतो खण परे तार चैतन्य होय हृदय आया ठाकुर को भगवान का नाम सुनाया कितनी देर तक सुनाता रहा तब कहीं जाकर के ठाकुर को होश वापस आए पौर दिन ओई रूपे भए कष्ट पाई देखे तिनी निजे शिखे दिलन दूसरे दिन ठाकुर ने देखा कि मां बेचारी इस तरह से डर की मारी रहती है जब भी भाव होता है समाधि होती है तब ठाकुर ने खुद ने मां को सिखा दिया य रकम भाव देख ले ही नाम सोना बे य रकम भाव देख ले ही बीच सोना बे इस तरह का भाव देख कर के इस तरह का नाम सुनाना और इस तरह का भाव देख कर के इस तरह का बीज मंत्र सुनाना जैसे कि ठाकुर भाव में से समाधि में से वापस आए तो खन आर्थ तो भय होतो ना तब माहा कहती है इतना भय नहीं होता था सीख लिया पता चल गया चाबी मिल गई ठाकुर की समाधि की भाव की ई सब सोनाली तार आबार होश होतो वह सब मंत्र जप नाम सुना करके बीज मंत्र सुना करके ठाकुर फिर से होश में आ जाते तार पर नेक दिन रकम गेले ओ उसके बाद में बहुत सारे दिन इस तरह से कट जाने पर भी कोखन तार की भाव समाधि होब बोले सारा राति जगे थाकी और घूमते पारी ना बहुत दिन बीत गए अभी ठाकुर ने बीज मंत्र वगैरह तो मां को बता दिया है कि इस तरह का भाव इस तरह की समाधि होने से इस तरह का मंत्र सुनाना किंतु फिर भी मां को ये भय रहता था सब समय कि ठाकुर कब भाव में जाएंगे कब समाधि में जाएंगे और इस भई के मारे रात को मां को नींद नहीं आती थी एक कोथा एक दिन जानते पेरे नहते आला द सूते बोलले और जब ठाकुर को यह पता चला कि मां को बेचारी को डर के मारे नींद नहीं आती सारी रात तो ठाकुर ने कहा कि अच्छा ठीक है तुम जाकर के नबत में रहो तो देखिए एक ही चैप्टर में एक ही पैराग्राफ पैसेज में मां के दो दिव्य स्वरूपों की झांकी दे दी एक एक और है कि सड़सी पूजा में देवी त्व में स्था स्थित होकर के वो उन्होंने ठाकुर की पूजा ग्रह की और यही मां मानवी के रूप में जब ठाकुर भाव समाधि में जाते हैं तो देख कर के बेचारी पूरा शरीर द्रुता रहता है भय के मारे रात को नींद नहीं आती तो यह देवत्व और मानवत्वम संगम मां के जीवन में हमको देखने को मिलता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओ शांति शांति शांति हरि ओ प्रसत श्री राम कृष्णा अर्पण

Questions & Answers

मस्तु यह पॉइंट मेरे माइंड में था मैं जब बोल रहा था किंतु अभी क्या है कि सब कुछ व बोल कर के वो याद नहीं रहता एक के बाद एक तो अच्छा किंतु बहुत अच्छा आपका ऑब्जर्वेशन है और समझ में भी आता है कि आपका कितना सुंदर स्टडी है अपने लिटरेचर का बहुत सुंदर पॉइंट है कि ठाकुर ने मां को अपनी सिद्धि का फल अर्पित किया किंतु उससे तो कोई ठाकुर का ऐसा नहीं है कि ठाकुर के भीतर में सिद्धियां कम हो गई क्योंकि हमको तो जब ठाकुर के पास में बाद में जब भक्त लोग आना शुरू हुए तो ठाकुर तो उनको स्पर्श करके ही सिद्धियां वगैरह दे देते थे राइट तो किंतु जब स्वामी जी को ठाकुर ने जब यह ट्रांसफर ऑफ पावर य जब वो किया स्वामी जी को जब सिद्धि आ दी तो ठाकुर यह कह के रोने लगे कि तोके सब पछु दिए आज के आमी फकीर लोम तुमको मैंने मेरा सब कुछ देख कर के मैं आज फकीर हो गया हूं तो प्रश्न होता है कि मां को जो ट्रांसफर ऑफ पावर या तो मां को जो सिद्धियां अर्पण की और स्वामी जी को इस तरह से सिद्धि अर्पण की इसमें समान क्या है और कंट्रा क्शन क्या है सिमिलरिटी क्या है कंट्रक्शन क्या है तो देखिए कि मैंने अपने लिटरेचर में किसी के पास में यह बोलते हुए नहीं सुना या किसी कहीं पर मैंने इसका वर्णन नहीं पढ़ा किसी सीनियर साधु का कि जिन्होंने इस प्रश्न का विश्लेषण किया हो और यह ऐसे सब एजोटेमिया बिट जो हमको दी हुई है ठाकुर ने तो इसका यूज करके जो कुछ भी रहेगा कि मां को जो दिया था वो आध्यात्मिक उन्होंने साधना थी वो आध्यात्मिक साधना मां को अर्पण की थी जबकि स्वामी जी को द जो दिया था वह साधना से प्रदत सिद्धि होती है वह अर्पण की थी अभी देखिए कि साधना से प्रदत्त सिद्धि किस तरह की होती है हम लोगों को अणिमा गिरि मा वगैरे सिद्धियां तो पता है कि हम लोग या तो बहुत बड़े हो जाएंगे या तो बहुत छोटे हो जाएंगे या तो कुछ चमत्कार करेंगे किंतु इसके अलावा भी कुछ-कुछ सिद्धियां होती है जैसे कि किसी के किसी को देख कर के या किसी को स्पर्श करके उसका पूरा चरित्र समझ लेना उसकी क्या आध्यात्मिक गति है उसको समझ लेना और उसके अनुसार उसको मार्गदर्शन देना तो वो सब सिद्धियां है जिसका कि प्रयोग ठाकुर ने अपने शिष्यों पर किया भी था कि शिष्य को देख कर के समझ जाते थे कि इस शिष्य को इस तरह का मंत्र चाहिए उनके यह देवता है इस इस देवता की पूजा करने से या मंत्र देने से इस शिष्य का फटाफट करके उद्धार होगा आज तो अपने ऑर्डर में क्या है कि सभी को भगवान राम कृष्ण का ही मंत्र देते हैं जिसका जो टेंडेंसी हो मंत्र तो सबको एक ही मिलता है किंतु शुरू शुरू में देखेंगे कि इवन राजा महाराजे मां भी है ये देखती थी कि किसका किस तरह का यह चारित्र्य है किसका किस तरह का इंक्लिनेशन है उसको इस तरह का मंत्र देते थे तो ये सब बहुत सारी विभिन्न तरह की आध्यात्मिक सिद्धियां है जो कि ठाकुर के भीतर में थी और ठाकुर ने स्वामी जी के माध्यम से इस संगम में प्रसारित की और कि तो मां को जो दिया है वो ये सिद्धि नहीं दी ये जो आराधना का यह जो आराधना होती है वही आराधना ही उन्होंने मां को समर्पित की क्यों क्योंकि व मां को ही तो काली के रूप में भजते थे और मां को ही काली के अभी इस मां शारदा के रूप में वो जो आराधना करते थे वो इस मां शारदा के रूप में आराधना करते थे तो स्वामी जी को आराधना से अ उत्पन्न होने वाली सिद्धि थी वह स्वामी जी को दी किंतु मां काली की जो आराधना करते थे वह आराधना ही उन्होंने मां शारदा के रुकने की ये ऐसा एक मेरा होगा एक उत्तर थोड़ा सा कन्फ्यूजिंग लगेगा शायद किंतु आप खुद सोच करके देख सकते हैं कि मैं रोज सुबह को ठाकुर को प्रार्थना करता हूं तो ठाकुर को प्रार्थना करता हूं इसका अर्थ यह नहीं है कि ठाकुर ने मुझे बहुत सारी सिद्धियां दे दी है कुछ नहीं दिया अभी तक सही में कहा जाए तो किंतु कल कहीं जाकर के मुझे कुछ दे देते तो मैं वह सिद्धि किसी को दे सकता हूं किंतु आराधना तो मैं ठाकुर की ही करूंगा जिनको मैं सिद्धि देता हूं उसकी पूजा तो मैं नहीं करने वाला हूं तो यह एक यहां पर डिफरेंस है पावर ऑफ एटर्नी का क्या अर्थ है पता है यह जो पावर ऑफ एटर्नी दूसरा अर्थ है पावर ऑफ एटर्नी अर्थात कि मैंने मेरा जो जो डिसीजन मेकिंग कैपेसिटी है ना मैंने ईश्वर को दे दी गत में हो गया ईश्वर को अर्थात कि ठाकुर ने स्वामी जी को पावर ऑफ एटर्नी दिया ऐसा नहीं कह सकते ठाकुर ने स्वामी जी को पावर दिया पावर ऑफ एटर्नी तो ठाकुर ने गिरीश घोष से लिया था तो एक बहुत बड़ा डिफरेंस है पावर और पावर ऑफ एटर्नी दोनों बड़े ही डिफरेंट कांसेप्ट है मैं अनुमान करके बता सकता हूं कि आप ऐसा कहना चाहते हैं कि स्वामी जी के जीवन में बाद में सब सिद्धियों का प्रदर्शन हुआ था किंतु मां के जीवन में ऐसा कोई सिद्धि हम नहीं देखते यही यही ना हालांकि देखिए कि मां के जीवन में सिद्धि का प्रदर्शन नहीं हो रहा था उसका रीजन यह भी एक है कि जैसे रयान जी ना कि ना त्रिगुणा तिता नंद जी किसने कहा था कि मां का जो मन है सब समय यह कंठ प जो चक्र है उसके नीचे जाता ही नहीं यानी मां और य जैसे ठाकुर ने कहा कि महा समुद्र में जद हाथी भी चला जाए तो भी पता नहीं चलता तो ऐसे ही मां का ये जो सिद्धि या भाव संव वरण करने की जो ताकत थी शक्ति थी व इतनी भयानक थी इतनी प्रचंड थी कि बाहर से पता नहीं चलेगा कि मां के साथ में रहकर के हमारा जीवन परिवर्तित हो रहा है या तो फिर मां सब समय भाव में रहती है तो वह भी एक उसका एक उत्तर हो सकता है और इस तरह से भी देख सकते हैं कि हां कि मां के जीवन में ऐसा बार-बार तो देखने को नहीं मिलता क् कि उन्होंने कोई सिद्धि का प्रदर्शन किया हो जो कि स्वामी जी के जीवन में बहुत बार देखने को मिलता है ये दोनों तरीके से देख सकते हैं किंतु यह जो प्रश्न है इसके बारे में और थोड़ा सा मैं चिंतन करूंगा देखता हूं कि और कुछ निकलता है कि नहीं और दूसरा क्या है पता है जिन लोगों ने अपना साहित्य का इस तरह से जो स्टडी किया है जो लोग यह सब कंट्रक्शन खोज सकते हैं उनके साथ में बात करने का भी एक आनंद है कि कैसे फटाफट करके आपने यह सब पकड़ लिया कि स्वामी जी को तो ये ये सब सिद्धियां थी तो उन्होंने प्रदर्शन किया था वेरी गुड आपका स्टडी अच्छा है व वो जो पहले वो जो कैपिटल बना के गए उसी में से ठाकुर ने कहा ना पेंशन खा खुन ठाकुर भी तो श्रवण मनन कर यह सब पूरा जीवन बिता ठाकुर ने कहा कोई ग्रंथ पढ़े हैं ठाकुर भी जो सब एक के बाद एक गुरु आते थे उनके पास में श्रवण करके सब सीख लिया वो गुरुकुल में जाकर के वह अध्यास अ अध्ययन अभ्यास वगैरह कुछ नहीं किया