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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 28 Sept 2023

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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी जीवन चरित्र कल हमने देखा कि किस तरह से पूर्व और पश्चिम दोनों की सभ्यता के अच्छे अंश जो है इन दोनों को एकत्र करके एक नई सभ्यता का निर्माण हो सकता है। और गंभीरानंद जी महाराज ने हमको बताया कि पूर्वीय सभ्यता अर्थात कि भारतीय सभ्यता में स्त्रियों को पूज्य माना जाता है। सीता, सावित्री, दमयंती यह हमारे आदर्श है। जबकि पश्चिमी सभ्यता में उन लोगों के पास में सोशल फ्रीडम तो है किंतु एक दुर्गुण शायद ऐसा कह सकते हैं कि उनको एक ऑब्जेक्टिफाई करके देखा जाता है। उनको एक भोग्य रूप में भोग की वस्तु के रूप में कभी-कभी उनको देखा जाता है। तो यहां पर भारत में एक ऐसा है कि एक सोशल कंजर्वेटिविज्म है जो कि स्त्रियों को उनके जो राइट्स जो है कभी-कभी उससे वो वंचित करता है। तो पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों जगह पे है। दोनों सभ्यता में है। दोनों में से दोनों का सार अंश ग्रहण करना है। हालांकि महाराज ने यह नेगेटिव यह है और इसका यह पॉजिटिव है। इस तरह से नहीं कहा। मैं स्वामी जी को पढ़कर के यह कह रहा हूं। स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि किस तरह से भारत में 10 साल की बच्चियों की शादी होती थी उस समय तो यह सब कुप्रथाएं बंद करने की अवश्य जरूर है और विदेश में किस तरह से स्त्रियों का चरित्र वो जो शुभ्र धवल बर्फ गिरता है वहां पे इस तरह का होता था तो यह उनको हमको जो सोशल फ्रीडम है वो हमको चाहिए और हमारा सीता सावित्री दमयंती का आदर्श मां शारदा देवी का आदर्श उनको ग्रहण करना है। और आखिर में यहां पर महाराज ने एक लंबा सेंटेंस एक हमको दिया है जिसका कि अर्थ बड़ा ही सुंदर है। वो कहना चाहते हैं। मैं पढ़ता हूं इसको। तब भारत भाग्य विधात्री बुझते पारिया छिलेन भारत की भाग्य विधात्री हमारे भाग्य का घड़ करने वाली आध्या शक्ति जगदंबा समझ पाई थी कि ए जुगेर वैदेशिक भाबेर महाप्लावन होते इस युग के विदेशी भाव की इस महा चक्रवात से महा आक्रमण से महा हिलोल से यदि भारतीय संस्कृति के रोखा ना करा होए यदि भारतीय संस्कृति की रक्षा न कर पाए तबे ऐन कोनो अटूट भित्ति थाकीबे ना यदि भारतीय संस्कृति की रक्षा नहीं होगी तब कोई ऐसी मजबूत नीव भित्ति यानी कि फाउंडेशन नीव ऐसा कोई फाउंडेशन ही नहीं रहेगा ज ऊपर प्राच्यो और प्रतिच्य सभ्यता शोध पुनः स्थापित होते पारे जिसके ऊपर पर में प्राच्य और प्रतिच्य दोनों सभ्यता की मिलन संगम भूमि संगम स्थापित हो पाए। अभी यहां पर महाराज जो कहना चाहते हैं इसका मैं जो अर्थ समझा हूं कि यह फाउंडेशन का क्या अर्थ करते हैं? कल्चर तो दोनों का कल्चर का एक पॉजिटिव एस्पेक्ट हमने मान लो कि एक जगह पर ले लिया। किंतु फिर यह पॉजिटिव एस्पेक्ट जो है उसको हम स्थापित कहां पर करेंगे? जैसे कि ये वो पौधा होता है ना पौधे को आप कलम करते हैं। मैंने एक बार देखा था मैं रांची में था तो रांची में तो अपना केवी के है कृषि विज्ञान केंद्र अपने आश्रम में दिव्यायन उसका नाम है। तो वहां पर किसानों को यह सब उन्नत खेती के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। तो एक किसान ने मुझे दिखाया कि एक आम का पौधा है। एक आम का पेड़ है। उसके ऊपर में उसने चार से पांच तरह विभिन्न आम की जातियों का उसने कलम किया है। माने वो लंगड़ा फिर वो कौन-कौन सी सब आम के नाम है मैं तो वो भी भूल गया। किंतु छह से सात इस तरह की आम की अलग-अलग वैरायटी उसने एक ही पौधे के ऊपर में कलम की है। और फिर इसमें से छोटा सा पेड़ हुआ है। ज्यादा नहीं 12 फुट का ना 10 फुट का इतना ही होगा। किंतु यह पूरा पेड़ जैसे कि आम के वो फल से पूरा भरपूर हो गया है। यदि आप दूर से पेड़ को देखेंगे आपको आम ही दिखाई देंगे। पत्ते भी नहीं दिखाई देगा और वो पेड़ भी नहीं दिखाई देगा। ऐसा लगेगा आम सब टांग करके रखे हैं। इतने 100 200 500 इतने सारे आम इतने छोटे से पेड़ पे लग गए हैं। तो देखिए अभी यहां पे वो मुझे समझा रहा है कि कलम तो उसने कर दिया किंतु फिर इतने छोटे से पौधे में इतने सारे आम खिलाने के लिए आपको क्या करना पड़ेगा? तो बहुत ही अच्छी तरह का ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर यहां पर यूज करना है। फिर उसने जमीन का किस तरह से खुदाई करना है जिससे कि नीचे की मिट्टी सॉफ्ट हो जाए। जिससे कि क्या होगा? वैसे ही आपको मिट्टी में बो नहीं देना है। वो कलम आपको एकद फीट तक वो मिट्टी को गड्ढा करके फिर सॉफ्ट मिट्टी डाल देना है। इससे फायदा क्या होगा कि वैसे तो जनरली मिट्टी थोड़ी हार्ड होती है जमीन की। किंतु आप एक बार गड्ढा करेंगे। गड्ढा करके ऊपर में फिर से मिट्टी भर देंगे तो क्या होगा? वो भरी हुई मिट्टी वो सॉफ्ट होगी। तो सॉफ्ट मिट्टी में जड़ जो है वो फटाफट करके प्रसरेगी। तो ऐसा करना है। फिर उसमें बहुत विभिन्न तरह के ये फास्फेट है ना कि क्या-क्या है सब ऑर्गेनिक इनऑर्गेनिक वो सब मुझे बता रखा था। इतने सारी तरह के वह फर्टिलाइजर उसमें डालने हैं। तब कहीं जाकर के यह इतना अच्छे से पांच से छह विभिन्न कलम किया हुआ पौधा इतना फटाफट करके वो बड़ा होगा और उसमें वो फूल भी फल भी देगा इतना। तो यहां पर भी यदि आप आपने ये पूर्व और पश्चिमी दोनों सभ्यता के सद्गुणों का एक कलम एक पौधे पर किया किंतु इस पौधे को यदि रोपना है पौधे को यदि कहीं लगाना है तो वो मिट्टी है वो मिट्टी फलद्रूप होनी चाहिए जिससे कि यह पौधा खिल के सुंदर रूप से बड़ा हो पाए और बहुत सारे फल दे पाए तो वो मिट्टी भारत देश की मिट्टी है इस देश की मिट्टी में इस तरह से मल्टीकल्चरल कोई भी पौधा डालने से कोई भी पेड़ लगाने से वह बहुत ही बढ़िया सुंदर रूप से बड़ा होगा खिलेगा बहुत सारे फल फूल देगा। यह इस तरह का संगम आप विदेश में शायद नहीं कर पाएंगे। ऐसा कोई देश नहीं होगा जहां पे इस तरह का संगम किया हुआ मल्टी कल्चरल ये एनवायरमेंट डेवलप हो पाए। इस तरह का डेवलपमेंट इस तरह का मल्टी रिलीजियस मल्टीकल्चरल मल्टी एथेनिक मल्टीेशियल मल्टीलिंगुअल मल्टी थिंकिंग इस तरह का एनवायरमेंट भारत देश में ही है। क्यों? क्योंकि भारत पहले से ही सभ्यता के चौराहे के ऊपर में खड़ा है। यहां पे वो स्पाइस रूट जा रहा है समुंदर के थ्रू और यह सेंट्रल एशिया में से सिल्क रूट जा रहा है। तो पूर्व और पश्चिम का ये जो कमर्शियल ये रूट है कमर्शियल पाथवे जो है इसके ऊपर में भारतीय संस्कृति खड़ी है। भारतीय सभ्यता खड़ी है। और इसीलिए देखिए कि मैं एक बार रांची में से मुझे दिल्ली भेजा था। दिल्ली आईआईटी में उस समय एक सेमिनार था। तो सेमिनार में अटेंड करने के लिए तो वहां पर क्या था कि एक यूरोपियन आया था। तो सेमिनार खत्म होने के बाद में वहां पर कैंटीन में हम लोग चाय कॉफी पी रहे थे। तो वो सब आईआईटी में तो बड़े-बड़े हाईफाई लोग आते हैं ना तो कोई यूरोपियन प्रोफेसर वहां पर बैठा हुआ था और मुझे देखकर के बोल रहा है मैं तो साधु के कपड़ों में था तो वो ऐसा उसको थोड़ा आश्चर्य भी हुआ और थोड़ा सा ऐसा भी हुआ कि ये इंडिया में क्या होता है ये सब साधु बाधुओं को क्यों आईआईटी में लेकर के आते हैं तो ऐसा वो तो विजिटिंग प्रोफेसर होगा तो इंडिया के प्रति तो ऐसा तुच्छ जैसा ही भाव है उसने यह सोचना शुरू कर दिया। यह कोई मूर्ख आदमी है। इसको वैसे ही पॉलिटिकली मोटिवेट कोई कॉन्फ्रेंस में यहां पे ले आए होंगे। तो वह अपना कोई कलीग बैठा है साथ में। उसके साथ में वो अंग्रेजी में बात करना शुरू कर दिया कि किस तरह से इंडियन लोग ये मूर्ख है। उन लोगों मतलब जाहिल है। मैंने वो जो भी यूरोपियन लोगों को यह सब बोलना होता है। तो मेरे साथ में जो बाकी कॉन्फ्रेंस वाले थे वो थोड़े नाराज हो गए। बोला कि महाराज आपको ऐसा बोल रहा है। आपको तो कुछ बोलना पड़ेगा सामने। और मेरी इच्छा नहीं होती है ये सब डिबेट में कभी भी जाने की किंतु बाकी लोग बोल रहे हैं कि इसका तो उत्तर देना चाहिए। अब विदेश में जाकर के इंडिया में गाली दे वो ठीक है। इंडिया के ही आईआईटी में आकर के ऐसा बोलना शुरू कर दे कि इन लोगों को अकल नहीं है तो फिर कैसे चलेगा? इसलिए फिर मैंने उसको बोला कि अच्छा तुम जो कुछ बताते हो तो मुझे थोड़ा सा एक्सप्लेन तो करो कि ये हवा में ओपिनियन क्यों दे रहे हो भाई कि इंडिया में कल्चर नहीं है। इंडिया में सिविलाइजेशन नहीं है। इंडिया में लर्निंग नहीं है। अभी मैंने उस वो जिस तरह का अंग्रेजी बोलता था उसी तरह के अंग्रेजी में मैंने उसको उत्तर प्रश्न किया। तो वो थोड़ा सा चौंक गया कि अरे इसको अंग्रेजी भी आता है। माने इतना तो मूर्ख नहीं है। वैसे ही आईआईटी में ऐसे लोगों को पकड़ के नहीं लाते जो कि इतने मूर्ख है। फिर उसने एक के बाद एक फिर उसको लगा कि हां ये आर्गुमेंट करना चाहता है। मैं भी करता हूं। उसको दिखा देता हूं। तो उसने एक के बाद एक पॉइंट रखना शुरू किया कि किस तरह से यूरोप में देखिए कि इतनी सारी विभिन्न प्रजाओं का संगम हुआ है। इतनी सारी लैंग्वेज का संगम हुआ है। इसलिए यूरोपियन यूनियन कल्चरली साइंटिफिकली इंटेलेक्चुअली इतना रिच है। फिलॉसोफिकली इतना सारा हमारा आउटपुट है। हमारा इतना कंट्रीब्यूशन है। इंडिया का क्या कंट्रीब्यूशन है? तो मैंने पॉइंट के बाद पॉइंट उसको गिनाना शुरू किया। मैंने कहा देखो तुमको लगता है यूरोपियन यूनियन में तुम्हारे कितने 25 30 इतने कंट्रीज शामिल है। उन लोगों की सभी की लैंग्वेज देखो। इतनी टोटल लैंग्वेज होती है आपकी जर्मन, फ्रेंच, लैटिन, फिर ये रशियन, फिर ये जितनी भी आप लैंग्वेज इकट्ठा करो वो इतनी लैंग्वेज होती है। इंडिया में देयर आर मोर लैंग्वेज देन देयर आर लैंग्वेज इन यूरोप। यूरोप में जितनी लैंग्वेज है आपकी 2025 इससे ज्यादा लैंग्वेज तो भारत के किसी एक ही राज्य में होगी। एक गुजरात में ही एक काठियावाड़ी है। एक तड़पति गुजराती है। फिर एक यहां पे नॉर्थ गुजरात की थोड़ी लैंग्वेज अलग कही जाती है। तो माने एक-एक स्टेट में ही हमारा इतनी वैरायटी है। टोटल नंबर ऑफ ऑफिशियल लैंग्वेज इन गुजराती एक्सीड्स समथिंग 20 और समथिंग लाइक दैट। तो नंबर ऑफ लैंग्वेज हमारी तुम लोगों से ज्यादा है। फिर नंबर ऑफ कल्चरर्स हमारे ज्यादा है। नंबर ऑफ रेशियल डायवर्सिटी ज्यादा है। नॉर्थ इंडिया में जाएंगे तो आपको यूरोपियन जैसे वाइट कलर के वो सीधे नाक वाले वो आपको वो ब्राह्मण दिख जाएंगे। या ईस्ट में जाएंगे तो चाइनीस कैरेक्टरिस्टिक वाले लोग दिख जाएंगे। साउथ में जाएंगे तो इस कैरेक्टरिस्टिक माने ये जो रेशियल डायवर्सिटी होता है वो पूरा डायवर्सिटी स्किन टोन वाइट से लेकर के ब्लैक तक का बाल का वो जो शेप है सीधे से लेकर के वो वो कर्ली जो शेप होता है सब तरह के बाल के यहां पे शेप माने जितना डायवर्सिटी यूरोप में है रिगार्डिंग फूड रिगार्डिंग कल्चर रिगार्डिंग रिलीजन रिगार्डिंग रेस रिगार्डिंग लैंग्वेज रिगार्डिंग फेशियल टाइप्स रिगार्डिंग रेस और इससे भी ज्यादा डायवर्सिटी इंडिया में है। और फिलॉसोफी की क्या बात करते हो? हमारे फिलॉसोफर को क्या कभी पढ़ा है? ये शंकराचार्य से लेकर के वल्लभाचार्य से लेकर के यह व्यास वो मतलब यू जस्ट नेम इट। एक के बाद एक आपको यहां पर फिलॉसफर मिलेंगे। और फिलॉसोफी की जो डेप्थ है चारवाक से लेकर के जो कि नास्तिक दर्शन है वहां से लेकर के ये अद्वैत वेदांत तक का पूरा हमारे पास में स्पेक्ट्रम है। डायवर्सिटी कहां नहीं है भारत में? बताओ यूरोपियन यूनियन से तो कई गुना ज्यादा डायवर्सिटी यहां पे है। यूरोप में तो सिर्फ एक ही रिलीजन चलता है क्रिश्चियनिटी। आप बोलेंगे हमारे रिलीजियस डायवर्सिटी है। विद इन क्रिश्चियनिटी डायवर्सिटी है कि हां प्रोटेस्टेंटिज्म है, कैथोलिसिज्म है, ऑर्थोडॉक्स है। फिर ये केल्विनियन होगा और जो भी आपका मेथोडिस्ट वगैरह जो आप बोलते होंगे जो भी आप उसको डायवर्सिटी बोलते होंगे वो उसका कोई अर्थ नहीं है। जो लोगों को तो मार करके भगा दिया। इस्लाम को आप पसंद नहीं करते हैं। हिंदू लोग कुछ मुट्ठी भर इधर-उधर फैले होंगे। बोल रहे हैं हमारे यहां पे रिलीजियस डायवर्सिटी अपने इंडिया में देखिए कि 15% कि 20% तो मुस्लिम है। क्रिश्चियन लोगों की पपुलेशन टू टू 3%ेज है। माने कि टोटल पपुलेशन 114 में से 2% भी तो कितनी बड़ी हो गई वो। 4 करोड़ से भी ज्यादा हो गया। 4 करोड़ की संख्या वाले आपके यूरोप में देश भी नहीं होंगे। छोटे-छोटे देश हैं सब। तो हमको कहां ये सब डायवर्सिटी सिखाने को जाते हो? तो यह देखिए कि जितना डायवर्सिटी हमको विश्व में देखने को मिलता है सब तरह का रिलीजियस फिर ये रेशियल फिर ये लिंग्विस्टिक कल्चरल सब डायवर्सिटी भारत में उपलब्ध है अवस्थित है और इसीलिए बहुत सारे तीर्थों का संगम जिसको कहते हैं वो तीर्थों का संगम भी भारत में है तो ये डायवर्सिटी रूपी पौधा यदि कहीं पर आपको प्लांट करना है तो वह भारत में ही हो सकता है और कोई भी देश इस तरह का वो कंजर्वेटिज्म उन लोगों के भीतर में रहता है कि मुंह से चाहे बोलेंगे कि हां हम सबको इनवाइट करते हैं। हम हमारे यहां पे इतने लिबरल है। थोड़ा सा भी उनके एस्टैब्लिश नॉर्म के बाहर में चले जाए तो वे लोग हमको मारकाट करना शुरू कर देंगे। स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो वहां पर एक पंडित ने उनको कहा था एक किसी एक जेंटलमैन ने कि अच्छा हुआ स्वामी जी आप इस समय यहां पर अमेरिका में आए हैं। आज से 2530 साल पहले आते तो आपका लिंचिंग हो जाता। पत्थर मार के ये लोग आपको शरी स्ट्रीट्स में ही बाहर रास्ते पे ही मार देते। इतना यहां पे रिलीजियस कंजर्वेटिविज्म था। तो भारत में तो हजारों साल से हम लोगों ने विभिन्न देशों के विभिन्न धर्मों को इनवाइट किया है। जीसस के मृत्यु के फौरन बाद यह जो थॉमस सेंट टॉमस थे उन्होंने भारत में आकर के प्रीचिंग किया है। यह एक क्रिश्चियन पादरी वहां जगन्नाथ मंदिर के सामने खड़ा रह के हमारे हिंदुओं को क्रिटिसाइज कर रहा था। उस समय बाबूराम महाराज वहां पे जाकर के देखा कि अरे तो हमारे ही मंदिर के सामने हमारे ही हिंदुओं के सामने हमको क्रिटिसाइज कर रहा है। इतने सारे हिंदू खड़े कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं। तो उन्होंने हरि बोल हरि बोल करके चिल्लाना शुरू कर दिया। पुकार करना शुरू कर दिया। दोनों हाथ उठा करके। तो बाबूराम महाराज तो ऐसा शुभ्र वर्ण गौर कांत उनका देह देखकर के ही लगता है गौरांग महाप्रभु फिर से जगन्नाथ पुरी में आकर के अवतीर्ण हुए हैं। तो उनको देखकर के बाकी सब हिंदू भी जोर से चिल्लाना शुरू कर दिए। हरि बोल हरि बोल वो पूरा एक पूरा एक माहौल चेंज हो गया और वो क्रिश्चियन प्रीचर को लगा अरे अभी तो कोई मेरी बात सुनेगा नहीं और मैं ज्यादा खड़ा रहूंगा तो पिटाई कहीं ना हो जाए। बोल करके वो वहां से भाग गया। उस दिन रात को बाबूराम महाराज को रात में सपना आया था। ठाकुर ने आकर के कहा था कि अरे तुमने उसके साथ में ऐसा क्यों किया? वह भी तो मेरी ही तो बात कर रहा था। तो यह हमारा भारत देश है। स्वामी जी ने एक बार एक विदेशी शिष्या ने स्वामी जी को पूछा कि अरे स्वामी जी आपके वहां पर धर्म जो है उसको कहां लोग सीरियसली लेते हैं? यहां पे तो हम इतना सीरियसली लेते हैं कि हमने जीसस को क्रुसिफाई कर दिया। माने आप यदि किसी को सीरियसली नहीं लेंगे तो क्रुसिफाई करने का बोदर भी क्यों करेंगे? टाइम भी क्यों वेस्ट करेंगे? हम सब कुछ सीरियसली लेते हैं। जबकि आपके बुद्ध है वो 80 साल के बुढ़ापे तक जिए। तो स्वामी जी ने कहा कि देखो यही भगवान बुद्ध ब्राह्मण लोगों के सामने खड़े रहकर के भगवान बुद्ध और उनके शिष्य ब्राह्मण धर्म को क्रिटिसाइज करते थे। किंतु फिर भी किसी ब्राह्मण ने उनके ऊपर में हाथ नहीं उठाया। जबकि यही आपके ही जुडाइज्म आपके ही क्रिश्चियन जो कोई भी थोड़ा बहुत भी आपके धर्म के विरोध में कुछ बोल दे तो सीधा आप उसको लिंच करने के उसको विच बोलकर के जिंदा जला देने तक आप आ जाते हैं। यह इंक्विजिशन का जो इतिहास है विदेशी संस्कृति का यूरोप का और अमेरिका का बहुत ही डेंजरस रहा है। यूरोप में इंक्विजिशन था और अमेरिका में यह विच ट्रायल होते थे। स्लेम विच ट्रायल्स स्वामी जी ने इसका उल्लेख किया है। जब यह लोग बोलना शुरू करते थे विदेश में कि स्वामी जी आपके यहां पे तो सती सतीदा दाह होता है। यानी कि जो महिला उसका पति मृत्यु हो जाता है तो उसको जिंदा जला देते हैं चिता के ऊपर में। तो स्वामी जी ने कहा हां हमारे सती प्रथा है और आपके वहां पे ये विच बर्निंग प्रथा है। ये सलेम बोलकर के एक छोटा सा एक टाउन था शहर था। वहां पे किसी को लगा कि यह कुछ स्त्रियां है। वे लोग विच क्राफ्ट कर रही है। जादू टोना कर रही है लोगों के ऊपर में। तो उन्होंने गुस्सा हो के उनको फिर ट्रायल करके वैसा कोई कोर्ट में बुला करके थोड़ा बहुत ये शेम नाटक जैसा करके फिर उनको जिंदा जला दिया। तो इस तरह से तो जैसे हमारे यहां पर कुर कुप्रथाएं हैं आपके वहां पर भी है तो क्या आप अपने को बड़ा समझते हैं और भारत में तो ऐसा कहीं-कहीं होता है। अपने धर्म का जो एसेंशियल कोर है वो तो इतना ही पावरफुल इतना ही अमृतसम इतना ही शुभ्र स्वस्थ है जितना कि हमेशा था। इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि हिंदू धर्म श्रुति और स्मृति ये दो दृष्टि से देखना चाहिए। श्रुति यानी कि ईश्वरीय आदेश जो ऋषि मुनियों को प्राप्त हुए जो कि महावाक्य है प्रज्ञानम ब्रह्म तत्व मसी मैं ही ब्राह्मण हूं यानी कि मेरा सही स्वरूप ब्राह्मण है और यह जो दो हाथ दो पैर वाला एक लिमिटेड बुद्धि और इमोशनल रिस्पांस वाला यह जो व्यक्ति आप जिसको देखते हैं वो तो इस ब्रह्मन के ऊपर में शुभ्र तेजोमय ओजोमय आत्मन के ऊपर में एक माया का पर्दा मात्र है। तो यह जब हम सभी सभ्यता के अच्छे गुणों को एक साथ करेंगे, एक कलम करेंगे। जैसे कि एक पौधे के ऊपर में तो इस पौधे को हम कहां पर रोपेंगे? कौन सी भूमि कौन सी मिट्टी है जहां पे यह पौधा बड़ा होकर के पोषण पाकर के पूरा वटवृक्ष में उर्ध्वमूलम अधशाख जैसे वो वर्णन किया गया है अपने गीता में ऐसा पूरे विश्व को व्यापृत करेगा पूरे विश्व को अपनी डाल तले अपने छांव तले उनको आशीष देगा उनको शांति प्रदान करेगा वो कौन सी भूमि है तो वो भारत भूमि ही है इसीलिए महाराज जो ये सेंटेंस कहते हैं। तीन लाइन का सेंटेंस है। किंतु इसके पीछे बहुत कुछ है। मैं फिर से उसको पढ़ता हूं। तब भारत भाग्य विधात्री बुझते पारिया छिले जे भारत की भाग्य विधात्री उन्होंने यह समझा था। उन्होंने रियलाइज किया था। ए जुगेर वैदेशिक भावे महाप्लावन होते जो भारतीय संस्कृति के रखा ना कोरा होए। यदि इस युग के वैदेशिक भाव के महा आक्रमण के सामने भारतीय संस्कृति की रक्षा ना हो तो एमोन एकटा कोनो अटूट भित्ति थाकीब बेना ऐसी कोई मजबूत नीव या फाउंडेशन ही नहीं रहेगा जहार ऊपर प्राच्यो और प्रतिच्छ सभ्यता शोध पुनः स्थापितो होते पारे जिसके ऊपर में प्राच्य और प्रतिज की सभ्यता की ये शोध फाउंडेशन पुनः स्थापित ना हो पाए। पाएगा। इसीलिए वह भारत को बचाने के लिए विदेशी आक्रमण से भारत की संस्कृति को बचाने के लिए भारत की संस्कृति का पुनः उत्थान करने के लिए मां का आध्या शक्ति जगदंबा का इस देश की मिट्टी पर पुनः आगमन हुआ। अच्छा अभी नेक्स्ट सेंटेंस देखते हैं। महाराज जी क्या लिखते हैं? ताई देवी गुरु मातृशक्ति समन्विता एक अत्युच्च आश्रय स्थल देखा या दीवार प्रयोजन छिलो इसीलिए देवी गुरु और मातृ शक्ति समन्विता एक ऐसी शक्ति जिसमें कि देवी गुरु और मातृत्व तीनों के भाव एक साथ में उपस्थित हो। इस तरह का आदर्श अतुच्च आश्रय स्थल अति उच्च आश्रय या तो फिर आदर्श वो दिखा देने का प्रयोजन यानी कि आवश्यकता उत्पन्न हुई थी जहार शोहाए आधुनिक भारत समाज आपना के ओ महा विपरजय उर्ध्व तुल्या राखते पारे जिसके सहाय से आधुनिक भारत समाज अपने को इस महा विपर्यय के ऊपर में यह महा आक्रमण है। उसके ऊपर में अपने को उठा के रख पाए एवं पाश्चात्य समाज के से रक्षा स्थले आकर्षण करते पारे सिर्फ अपने को बचा पाए उतना ही नहीं पाश्चात्य समाज को भी इस रक्षास्थल इस सेंचुअरी में उनको इनवाइट कर पाए। ठाकुर ने कहा था ना कि वो बहादुरी काठ एक जिस एक रोटन एक वुड होता है एक सड़ सड़ा हुआ लकड़ी जिसका कि आप नौका बनाएंगे जिसकी आप नौका बनाएंगे होता होगा क्या यह नौका यदि अपने से तैर जाए तो बहुत है उसमें एक पंखी भी यदि बैठ जाएगा तो सड़े हुए लकड़ी की नौका डूब जाएगी पानी में महासमुंदर में किंतु बहादुरी काठ यानी कि साग है शीशम है टिकवुड जिसको बोलते हैं इंग्लिश इंग्लिश में इसकी यदि नौका बनाई जाए तो यह नौका क्या होगी? वो अपने को तो अपने से तो तैर जाएगी। फिर हजारों हजारों लोगों को इस भवसागर में पार करके अगले छोर तक की ओर ले जाएगी। तो भारत को वो आदर्श स्थान स्थापित करना है जिससे कि भारत अपने समाज की तो रक्षा कर ही पाए किंतु साथ-साथ में विदेशी समाज के लिए भी एक सेंचुअरी के रूप में एक रक्षा स्थल के रूप में अपने को डेवलप कर पाए। अभी यह किस तरह से संभव है? यह संभव है गुरु, मातृ और देवी, गुरु और मातृशक्ति तीनों के संगम स्थल यदि एक नारी देह में प्रकट होते हैं तब यह कहीं संभव होगा। देवी, गुरु और मां ये तीनों का संगम यह किस तरह से संभव है? हम तो यदि अपनी मां को देखते हैं तो मां के साथ में हम खेलते भी हैं। मां को नाराज भी करते हैं। मां के साथ में झगड़ा भी करते हैं और मां को फिर तुम करके बुलाते हैं। अरूपानंद जी का था। अरूपानंद जी जयराम बाटी गए। मां के साथ में बात कर रहे हैं। वो बोले कि मां आ तो तोमा के तुम ही बोलते आप नहीं बोलते पारलाम ना आ तो तोमा के तुम ही बोलची वो अरूपानंद जी मां के सेवक जय राम बाटी में जाकर के मां को कहते हैं मां मैं तुमको तुम करके ही बुलाऊंगा। मैं तो तुमको आप करके नहीं बुला पा रहा हूं। तो मां ने क्या कहा शेटा अपना अपनी भाव यह बहुत अच्छा है। तुम मुझे तुम करके बुलाते हो। ये अपना भाव है। ये अपनेपन का भाव है। तो अभी प्रश्न होगा कि गुरु और देवी जिनको कि हम अतुच्च सम्मान करते हैं और साथ में यह मां मां को हमको तुम करके बुलाते हैं। मैं मैं भी अपनी मां को तुम करके ही बुलाता हूं। मैं आप करके कभी नहीं बुलाया। पिताजी को आप करके बुलाते हैं। मां को तो तुम करके ही मैंने बुलाया है। यह इस मां को भी देखिए ट्रांसलेशन में कैसा होता है। ये ट्रांसलेशन में अभी ये आशुतोष मित्र की श्री मां बोलकर के सुंदर छोटी सी एक रेमिनेशंस है। वो मायर पदप्रांत के सेकंड वॉल्यूम में वो पब्लिश हुआ है। अभी उसका ट्रांसलेशन बंगाली में से हिंदी में हुआ। हिंदी में से गुजराती में हुआ। तो अभी ये जैसे ट्रांसलेशन करते-करते क्या है कि लेखक या तो ट्रांसलेटर अपने भाव ये सब डाल देता है। तो उसमें ये आशुतोष मित्र तो एकदम छोटे हैं उम्र में तो वो मां को मिलने को जाते हैं। तो मां उनको तू करके बुलाती है। तो वो अभी ये तो तू करके ही बुलाना चाहिए। आशुतोष मित्र तो ये त्रिगुणातीतानंद जी के भतीजे थे। उम्र में बड़े छोटे थे। तो ये ट्रांसलेशन में गुजराती ट्रांसलेशन में मां उनको आप करके बुलाती है। मैंने कहा हाय रे ये किस तरह का उल्टा ट्रांसलेशन कर दिया है। आप करके मां उसको क्यों बुलाएगी भाई? वो तो तुम करके ही बुलाना है। वो तो अपने पुत्र की तरह है। तो यह ट्रांसलेशन में मैंने बहुत बार देखा है कि यह साधु है या तो भक्त है। मां को आप करके पुकारते हैं। तो यह बंगाली क्योंकि मैंने पढ़ा है। मैंने देखा है बहुत सारे रेमिनेशंस में भक्त या तो साधु मां को तुम करके ही बुलाते हैं। और उसका ट्रांसलेशन जब करते हैं तो उन लोगों को बड़ा डर लगता है ट्रांसलेटर को। अरे ये तो आध्या शक्ति मां उसको कि तुम करके थोड़ी ना बुलाया जाएगा। श्री श्री मां बंगाली रेमिनेशंस में लिखा है मां एटा की होलो मां ए माने मां मां लिखेंगे और तुम बुलाएंगे और ट्रांसलेशन जब होगा तो श्री श्री मां उसका मां का कर देंगे श्री श्री मां और तुम का कर देंगे आप क्योंकि क्या मां तो गुरु भी है देवी भी है गुरु और देवी को क्या तुम करके बुलाया जाता है कभी सिर्फ मां करके बुलाया जाता है ठाकुर को हम ठाकुर कहते थे हम तो बाबा या पिताजी ऐसा कभी नहीं कहे ठाकुर को हमेशा ठाकुर ठाकुर ही कहा है। आप ही कहा है। तुम कभी नहीं कहा तुम मां को भी इस तरह से तुम करने से कैसे चलेगा? श्री श्री मां कहना है और आप करना है। ऐसा करके गुजराती और हिंदी में ट्रांसलेशन हुआ है। ये सब ट्रांसलेशन जहांजहां मेरी नजर के सामने आते हैं सब जगह पे मैं श्री श्री हटा करके आपका तुम करवा देता हूं। क्योंकि मुझे पता है कि ओरिजिनल बेंगली में ऐसा ही है। जब किसी बेंगली रेमिनेशंस में आपनी कि श्री मां ऐसा करके लिखा है तो नो डाउट उसका ट्रांसलेशन ऐसा ही होना चाहिए। किंतु जहां पे तुम लिखा है वहां पे आप करने की क्या जरूरत है? तो यहां पे प्रश्न होता है एक और देवी और गुरु दूसरी और मां ये तीनों का संगम क्या एक दिव्य देह में हो सकता है? क्या यदि होगा तो हमारा उनके साथ में रिलेशन किस तरह से होगा? हम उनको सम्मान दें ना कि मां बोल के उसको तू करके बुलाए और झगड़ा करे उसके साथ में ये दोनों भाव एक साथ में तीनों भाव एक साथ में होने से कैसा होगा? ये राममई महाराज है। राममई महाराज जय राम बाटी में जाते हैं। मां के साथ में रहते हैं। वो मां जो भी काम देती है सब काम करते हैं। वो वहां पे मां के लिए वो ये मिट्टी भी काट देंगे। मां के लिए बागान में भी काम करेंगे। सब कुछ करेंगे। तो अभी वो मां उनकी गुरु भी है। तो अभी गुरु बोलकर के मां का सब समय सम्मान करना है ना कि वो मां है तो बहुत बार हम लोग मां की बात नहीं सुनते। अरे वो तो बोलती रहती है। क्या है वो? माने ये अपना अपनीपनी भाव क्या रखना है? ये राम महाराज है। ये अरूपानंद जी है। ये वर्दा महाराज है। ये आशुतोष मित्र है। जो लोग छोटी उम्र में मां के पास आए थे। मां के साथ में लंबा समय रहे हैं। उन लोगों के रेमिनेशंस में देखेंगे कि इस तरह का एक भाव दिखता है। एक बार क्या हुआ। जय राम बाटी में वो ज्ञान महाराज और राममई महाराज वहां पर बागान बना रहे हैं। तो बागान में कुछ पौधा नए डालने होंगे पुण्य पुकुर के किनारे पे अभी खाने का समय हो रहा है। मां बड़ी व्यग्र हो गई। बाहर आकर के बोलती है अरे राममय ज्ञान खाने को आ जाओ। पहले खा लो। खाना ठंडा हो जा रहा है। बाद में कहीं जाकर के यह पौधे पौधे लगाते रहना। दिन तो पूरा पड़ा है। तो अभी यह तो गुरु और देवी का आह्वान है ना कि मां का आह्वान है। ज्ञान महाराज बोलते हैं राममई महाराज को अरे मां तो बुलाती रहेगी। उसको और कोई कामधाम नहीं है। हमारे को ऐसा ऐसे शब्द यूज़ नहीं किए वो तो मैं बता रहा हूं कि मां तो बुलाती रहेगी। हम लोग पहले मां का कार्य समाप्त करते हैं। फिर जब भोजन के लिए जाएंगे तो अभी राममई महाराज तो बेचारे परेशानी में पड़ गए। अभी मां बुला रही है। बार-बार बुला रही है और फिर उन्होंने देखा मां ने देख लिया कि ये ज्ञान महाराज जो है राममामई महाराज को नहीं आने देते। अभी वो पकड़ लिया कि दो वीक लिंक कौन सा है तो उन्होंने मां ने बोला कि अरे राममामई तुम खाने को आ जाओ। ये ज्ञान ज्ञान तो बड़ा जिद्दी है। उसको मिट्टी काटने दो। उसको काम करने दो। तुम खाने के लिए आ जाओ। अभी जैसे ही मां ने ऐसा कहा फिर राम महाराज ज्ञान महाराज की बातों को छोड़ कर के सीधे दौड़े हुए मां के पास में चले आए। किंतु देखिए कि आप मां को किस तरह से ट्रीट करेंगे। देवी के रूप में, गुरु के रूप में जो कि हमेशा अत्युच्च सम्मान के पात्र है ना कि फिर मां के रूप में जिनकी बात को आप इग्नोर भी कर सकते हैं, नजरअंदाज भी कर सकते हैं। मां के साथ में झगड़ा भी कर सकते हैं। आर्गुममेंट भी कर सकते हैं। आप किस तरह से मां के साथ में वो बिहेव करेंगे। किस तरह से मां के साथ में काम करेंगे? तो यह रेमिनेशंस जब मां के पढ़ेंगे हम पढ़ेंगे तब हमको पता चलता है कि किस तरह से यह तीनों भाव का संगम मां के भीतर में दिख रहा है। इसी में आता है। मानवी देवी गुरु ज्ञानदायिनी ये सब चैप्टर्स इसी किताब में है और जैसे-जैसे उन चैप्टरों का पाठ करेंगे वैसे-वैसे ही मां का वो मानवीय स्वरूप जो राममई महाराज के साथ में वो रोटी बेल रहे हैं। अभी देखा कि राममई महाराज वह बढ़िया सा रोटी बेल रहे हैं और मां का रोटी मां का रोटी तो अच्छा ही होने वाला है। कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु फिर भी नलिनी दीदी वो रोटी सेक रही थी। उसने गलती से बोल दिया कि मां देखो तुम्हारे से अच्छी रोटी राममई की हो रही है। मां वैसे ही जैसे ही सुना छोटी बच्ची की तरह रोटी बेलना छोड़ के वो छोड़ दिया। अरे मैं तो अभी इतने सालों से रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई। राममई दो दिन का छोकरा है। गला दबाने से मुंह में से दूध निकलेगा। माने छोटा बच्चा तो दूध पीता है। तो यह एक वे ऑफ माने गला दबाने से मुंह निकलेगा मुंह से। यह एक का बात का अंदाज है। दिस इज़ अ वे ऑफ सेइंग जिसका अर्थ है कि उसकी उम्र बड़ी-छोटी है। तो राममई तो इतना छोटा है। दो दिन का लड़का वो मेरे से अच्छी रोटी बना रहा है। मैं रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई। जाओ मैं रोटी नहीं बेलूंगी। तो अभी देखिए बिल्कुल छोटी बच्ची की तरह माने राम में तो उनका बच्चा है वह तो थोड़ी अच्छी रोटी बेलता है तो मां को तो बड़ा खुश होना चाहिए तो वैसा खुश तो भी है हृदय के भीतर में आशीर्वाद भी है मुंह के ऊपर में बालक भाव भी है तब ब्राह्मण महाराज नाराज होकर के नलिनी दीदी को बोलते हैं अरे नलिनी तुम्हारे पास में तो ये हम दोनों की रोटी एक साथ में आती है तुमको कैसे पता चलेगा कि ये मां की रोटी है ना कि मेरी रोटी है क्या सब फालतू की बातें कर रहे हो तब कहीं जाकर के नलिनी ने वो ऐसा जब राम महाराज ने ऐसा कहा तब मां फिर से रोटी बेलना शुरू किया। तो यह मानवीय स्वरूप भी है। मां के भीतर में गुरु का स्वरूप भी है। जब वो उपदेश देगी तब अच्छे-अच्छे लोग चुपचाप मां के सामने आंख बंद करके सुनेंगे। ये राममई महाराज ना कि वर्दा महाराज दो में से एक लिखते हैं कि हम लोग तो जब लोग ये भक्त सब बड़े-बड़े पढ़े लिखे भक्त कोलकाता के मां के पास आकर के इतने सब कठिन कठिन दर्शन शास्त्र के साधना के ये तत्व के सब प्रश्न करते थे तो हम लोग तो बड़े भय से वहां पर सुनते थे कि अरे मां को यह सब प्रश्न करते हैं। मां तो कोई पढ़ाई लिखाई भी नहीं किया। ठाकुर की तरह उनको मुरमु समाधि भी नहीं होती। ये स्वामी जी की तरह फिलॉसोफी भी मां को नहीं आती। इन लोगों को ये सब बड़े-बड़े प्रश्न करने हैं। पढ़े लिखे लोगों को तो कोलकाता जाकर के शरद महाराज को करें ना। मां के पास जयराम माटी में आकर के मां को क्या प्रश्न करते हैं। किंतु ये महाराज लिखते हैं सामने मां इतना सरल रूप से इस प्रश्नों का समाधान करती थी कि ये बड़े विद्वान लोग प्रश्न का उत्तर सुनकर के परितृप्त होकर के वहां से जाते थे। तो ये गुरु का भाव भी है। देवी का भाव तो है ही है। कोई प्रश्न ही नहीं है। तो गुरु देवी मानवी मां ये सभी भावों का संगम मां के भीतर में है। और इसी मां को हमको आदर्श रखकर के नारियों का उत्थान भारत देश में करना है। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु