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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 5 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार [गाना गाने की आवाज़] वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः मां शारदा देवी का जीवन का पाठ कर रहे हैं। चीर सधवा यह चैप्टर हमारा चल रहा है। स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित मां के जीवन में से चिरमंतिनी इस चैप्टर में हमने देखा कि श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि हुई है और इस महासमाधि के बारे में और भी जो कुछ विवरण अवेलेबल है उसका एक कंपाइलेशन मैंने किया है जिसमें से हम शशि महाराज का जो कंपाइलेशन है शशि महाराज ने ठाकुर की महा महासमाधि के दिन का जो विवरण दिया है, रात का जो विवरण उसका हम पाठ कर रहे थे। ऑलरेडी हमने देखा कि ठाकुर ने कहा कि समुंदर में जो जहाज तैर रहा था उसका दो तिहाई 2 थर्ड ऑलरेडी डूब चुका है पानी में और 1/3 ही पानी के ऊपर में अभी तैर रहा है और जैसे अभी यह भी डूब जाएगा। तो जहाज जब टूटता है समुंदर में तो कैसे धीरे-धीरे करके पानी के भीतर में समाहित होता जाता है। इसी तरह से ठाकुर की यह जो जीवन तरणी है जीवन नैया है वह इस भव समुंदर तो नहीं कहेंगे। एक सांसारिक समुंदर में ठाकुर का यह जो विद्या का संसार था भक्त और भगवान को लेकर के उन्होंने जो यह विद्या का संसार बनाया था इस विद्या के संसार में उनकी लीला समाप्त हो चुकी है। इस विद्या के संसार में से अभी उनको चिर विदाई ग्रहण करनी है। तो यह जो उनका भविष्य था वह इस दर्शन के माध्यम से उनको दिखाई देता था। तो यह एक हमने देखा और शशि महाराज साथ में यह भी कहते हैं कि ठाकुर कहते थे कि इसके भीतर में दो लोग हैं। एक है जगन माता और एक है उनका भक्त। भक्त को ही असुख हुआ है। भक्त को ही रोग हुआ है। जगन माता को कुछ नहीं हुआ। तो इसकी चर्चा करने के समय में हमने देखा था कि किस तरह से यदि अद्वैत वेदांत की उपमा लाई जाए यहां पे इस बात को समझने के लिए तो एक तो है सूरज। एक तो है सूरज का प्रतिबिंब एक घड़े के भीतर में। एक घड़े मिट्टी का घड़ा है। पानी रखा है। सूरज का प्रतिबिंब पड़ रहा है। अभी आप सूरज का प्रतिबिंब जो है घड़े के भीतर में आप घड़े के पानी में आप पत्थर डालेंगे तो देखेंगे कि प्रतिबिंब है वह विकृत होता जाता है। डिस्टोर्ट होता जाता है। उसके ऊपर में रिपल्स दिखाई देती है। और सब कुछ किंतु यह प्रतिबिंब के साथ में ही होता है। वह असली सूर्य है। उसको तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप घड़े के भीतर में पानी है उसमें हजार पत्थर डाल दीजिए। ओरिजिनल जो सूर्य है उसको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। और जैसे ही यह घड़ा टूट गया साथ में ही यह जो प्रतिबिंब है वह भी बिखर जाएगा। असली सूर्य अपनी जो प्रभा है, स्वप्रभा है, स्वहिमा है, उसी से वह उद्भाषित होता रहेगा। तो यह एक हमने देखा साथ में ही उपनिषद का वह जो एक इमेजरी है दो पंखी का कि एक पंखी है सुस्थ है वह अपने पेड़ की सर्वोच्च डाल पर बैठा है और दूसरा पंखी है बीमार है और वह सांसारिक फल खा रहा है सुखदख रूपी और वह जब ऊपर वाले पंखी की ओर देखता है तो फिर उसको लगता है कि क्यों नहीं उसके साथ में मुलाकात कात की जाए तो धीरे-धीरे करके जब वह ऊपर जाकर के ओरिज ये जो रेस्प्लेंडेंट बर्ड जो था यह जो इस तरह का पंखी जिसकी पंख जो है स्वर्ण के बने हुए थे जिसमें से प्रकाश प्रकटित हो रहा था उस पंखी के साथ में जब जाकर के यह बीमार रुग्ण पंखी बैठा तो उसको पता चला कि वह वही है। एक ही पंखी है। बस उसका जो ओरिजिनल फॉर्म था वह सर्वोच्च डाल पर बैठा हुआ था। किंतु देखिए कि यहां पर ठाकुर के साथ में कैसा है। ठाकुर ने यह जो सर्वोच्च डाल है यह साधना की सा अध्यात्म जगत की जो सर्वोच्च साधना है सर्वोच्च शिखर है निर्विकल्प समाधि वह तो प्राप्त किया है। किंतु फिर वहां से वह संसार में वापस आए हैं। सर्वोच्च डाल पर बैठकर के यह जो सुस्त पंखी था, सबल पंखी था, युवा पंखी था, सुवर्ण के पंखों से मढ़ा हुआ जो पंखी था, सुशोभित पं उसको वो स्थान को छोड़कर के फिर से वही रुग्ण फिर से वही जीर्ण क्षण पंखी जो कि पेड़ के तले में बैठा हुआ था वहां पर ठाकुर आए। वही पंचमहाभूत के देह में वापस आए निर्विकल्प समाधि के बाद में और वापस आने का अर्थ वही है कि सबको बताएं कि देखो वो जो सर्वोच्च डाल पर जो पंखी बैठा है वही हमारा सही स्वरूप है। हमको वहां पर जाकर के हमारी यात्रा है। वही वह सर्वोच्च डाल तक पहुंचने की। नहीं किए जमीन पर खड़े बैठे-बैठे ये सांसारिक सुखदख रूपी फलों का उपभोग करने की तो इसीलिए ठाकुर वो रुग्ण देह में वापस आए और कैंसर को जैसे कि न्योता दिया सामने से मां ने जैसे कहा था कि गिरीश के पाप लेकर के ही ठाकुर को कैंसर हुआ था। तो यह सब बातें हमने देखी। इसके बाद में देखिए और साथ में शशि महाराज ने यह भी कहा था कि ठाकुर ने जब अपना देह त्याग किया था तो मुझे ऐसा लगा कि यह देह त्याग का क्षण उनके जीवन का सर्वोच्च आनंदमय मुहूर्त था। उनके भीतर में एक आनंद का प्रवाह बहकर के चला गया। मैंने अपनी नजरों से उसको देखा है। तो शशि महाराज इस तरह से विवरण देते हैं। इसके बाद में क्या कहते हैं? से शेष

मृत्यु के दिन भी लोक-कल्याणरत श्री रामकृष्ण 1

दिन प्रति घुटना अमर मोने आ वही आखिरी दिन की प्रत्येक घटना मुझे याद है। ठाकुर के बेश सुस्थो और प्रफुल्ल मोने हो छिलो ठाकुर को देखकर के ऐसा लग रहा था कि वह बहुत ही सुस्थ और प्रफुल्ल है। बिक बेलाई तनी पुर दुई घंटा धोरे कोथा बोले छिले शाम के समय में दो घंटे तक उन्होंने वार्तालाप किया था एक भद्रो के शंगे एक जेंटलमैन के साथ में एक कोई भद्रलोक वहां पर आया था उसके साथ में ठाकुर ने सज्जन भद्रलोक का यदि हिंदी करेंगे तो होगा सज्जन तो एक सज्जन के साथ में ठाकुर ने दो घंटा वार्तालाप दिया था जीनी ता के जोग संबंधे कोटा प्रश्न को जन जो ऐसे छिले योग साधना के बारे में प्रश्न करने के लिए यह सज्जन ठाकुर के पास में आन उपस्थित हुए थे ठाकुर ने दो घंटा उनके साथ में बात किया था। देखिए कथामृत का जो मास्टर महाशय का आखिरी आखिरी दिनों का वर्णन यदि आप पढ़ेंगे अप्रैल 1886 का क्योंकि मास्टर महाशय अप्रैल तक ही वर्णन लिखते हैं उसके बाद में ठाकुर का कष्ट जैसे कि देख नहीं पाते हैं बोलकर के मई से लेकर के अगस्त तो मई, जून, जुलाई, अगस्त यह आखिरी चार महीने का वर्णन कथामृत में नहीं है। लीला प्रसंग में भी नहीं है। तो ऑलरेडी जो अप्रैल तक का जो वर्णन है ठाकुर की महासमाधि के 4 महीने पहले का कथामृत में आप देख ही सकते हैं कि ठाकुर को बहुत सारी बातें इशारे करके बतानी पड़ती है। तो देखिए कि ऑलरेडी महासमाधि के 4 महीने पहले से ही बात करना कितना कष्टदायक हो गया था कि ठाकुर को बहुत कुछ तो इशारे करके ही बताना पड़ता है। तो फिर इमेजिन कीजिए कि महासमाधि के दिन उनको कितना कष्ट हो होता होगा गले में। खास करके इसके बाद का जो रेमिनेशंस है रामचंद्र काली महाराज का काली महाराज के रेमिनेशंस में हम पढ़ेंगे कि महासमाधि के कुछ दिनों पहले ठाकुर के गले में से बहुत सारा रक्तपात हुआ था, रक्त स्त्राव हुआ था और इतना भयानक कि ठाकुर उसके बाद में बहुत ही दुर्बल हो गए थे और लग रहा है कि उसी की वजह से आखिर में ठाकुर की महासमाधि हुई होगी। तो सोच लीजिए ऑलरेडी 4 महीने पहले से ही ठाकुर को बात करना मुश्किल था। उसके बाद में महासमाधि के कुछ ही दिन पहले गले में से रक्त स्त्राव हुआ है। बहुत ही दुर्बल हो गए हैं। इसके बावजूद महासमाधि के दिन उन्होंने 2 घंटा एक बिल्कुल अनजाने आदमी के साथ में वार्तालाप किया था। देखिए ऐसा लग रहा है

ठाकुर और स्वामीजी के द्वारपाल: स्वामी निरंजनानन्द

कि यह निरंजनंद जी का वह जो पहरेदार का वह जो रोल था वह बिल्कुल फेल हो गया है यहां पे और निरंजनंद जी पगड़ी पहन कर के लाठी एक हाथ में लेकर के ठाकुर के दरवाजे के सामने खड़े रहते और किसी को भीतर में नहीं जाने देते तो फिर क्या हुआ एक अभिनेत्री थी उसकी इच्छा थी ठाकुर का आशीर्वाद ग्रहण करें तो उसने दाना काली को कहा तो दाना काली उसको एक विदेशी एक गोरे साहब का ड्रेस पहना करके कोट पेंट वगैरह पहना करके हेट पहना करके उसको वो काशीपुर गार्डन हाउस में लेके आया दाना काली ठाकुर खा वही जो गिरीश घोष का ही दूसरा भाई एक है तो एक गोरे साहिब को देखकर के निरंजन महाराज ने सोचा अच्छा ठीक है चलो इसको जाने देते हैं बोल के उसको जाने दिया अभी वहां पर वह अभिनेत्री ने वह टोपी वगैरह निकाल करके ठाकुर को अपना परिचय दिया होगा तो ठाकुर ठाकुर बड़े आनंदित हो गए कि किस तरह से निरंजन महाराज की आंखों में धूल झोंक करके यह लोग आए हैं। तो देखिए कि मने वो अभिनेत्री वाला एपिसोड तो फिर भी थोड़ा सा आगे हुआ होगा। यह तो बिल्कुल आखिरी दिन की घटना है कि किस तरह से एक बिल्कुल अनजाने एक सज्जन को ठाकुर के पास में आने दिया गया और 2 घंटे तक ठाकुर के पास में बैठे रहने दिया गया। अर्थात कि बेचारे निरंजन महाराज का पहरेदार का रोल बिल्कुल विफल हो गया। देखिए एक्चुअली स्वामी जी जब बेलूर मठ में थे आखिरी आखिरी दिनों की घटना है स्वामी जी की तो महासमाधि हुई जुलाई फोर्थ जुलाई 192 तो इससे उस समय जो 192 में जो ठाकुर का उत्सव था उस समय बेलूर मठ में बहुत ही विशाल पैमाने पे उसका सेलिब्रेशन हुआ था। तो ठाकुर उत्सव कब आता है? ऑलमोस्ट फरवरी एंड या मार्च के स्टार्टिंग में आता है ठाकुर का जन्मतिथि पूजा। तो उस समय स्वामी जी बहुत बीमार थे और यदि बेलून मठ गए होंगे तो स्वामी जी का कमरा आपने देखा होगा। उनका शयन कक्ष उनका बेडरूम देखा होगा। तो वहां पर स्वामी जी विश्राम ले रहे थे। स्वामी जी ने यह शरद चंद्र चक्रवर्ती को कहा तुम अकेले रहो मेरे सेवा करने के लिए और बाकी सबको यहां से निकालो और फिर निरंजन को बुलाओ यहां पर पहरेदारी करें। तो निरंजन महाराज को बुलाया गया और निरंजन महाराज वही वो काशीपुर की तरह ही सर के ऊपर में पगड़ी बांध के हाथ में लाठी लेकर के स्वामी जी के कमरे के सामने बैठ गए। वो किसी को जाने नहीं देंगे। स्वामी जी विश्राम कर रहा है। यहां पर कमरे के भीतर में यह शरद चंद्र चक्रवर्ती स्वामी जी के साथ थोड़ा बहुत वार्तालाप कर रहा है। उस समय एकाएक हुआ कि निवेदिता आ गई। निवेदिता और साथ में और भी कोई फॉरेन लेडी डिसाइपल थी। तो फिर निरंजन महाराज को लगा कि इनको मना करना उचित नहीं होगा। तो फिर उन्होंने दरवाजा खटखटाया। तो यह शरद चंद्र ने खोला दरवाजा। तो निरंजन महाराज ने कहा देखिए यह निवेदिता आई है। तो फिर स्वामी जी ने शरद ने शरद चंद्र ने स्वामी जी को कहा कि निवेदिता आई है मिलने के लिए। तो स्वामी जी ने कहा अच्छा ठीक है उसको आने दो भीतर में। तो देखिए निवेदिता आई थोड़ी देर बैठी दोप मिनट मुश्किल से स्वामी जी का खबर लिया। बड़ी ही जतन पूर्वक स्वामी जी के चरण स्पर्श करके उनका प्रणाम किया और फिर वहां से निकल गई। तो देखिए वहां पे भी वह गोरे साहिब को जाने दिया था। यहां पे भी निवेदिता को आने दिया स्वामी जी का दर्शन करने के लिए। किंतु देखिए इसके बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं। जैसे निवेदिता गई और शरद चंद्र ने स्वामी जी का कमरे का दरवाजा बंद किया। स्वामी जी कहते हैं देखो यह गोरे लोगों की शिष्टता देखो। उनकी एटीकेटी देखो। शिष्टाचार कितना है और कोई इंडियन होता ना तो दो घंटा बैठकर के मेरे पास में बकबक करवाता बिना मतलब का किंतु निवेदिता ने देखा कि मैं बीमार हूं तो दो ही मिनट बैठकर के थोड़ा सा वार्तालाप करके अपने से ही चली गई। इसको कहते हैं शिष्टाचार। तो यह बात स्वामी जी शरद चंद्र को कहते हैं। तो देखिए एग्जजेक्टली ऐसा यहां पर लग रहा है कि ठाकुर ने तो उसको आने दिया यह सज्जन को और दो घंटा उसके साथ में योग के बारे में वार्तालाप भी किया। किंतु ये सज्जन को अकल नहीं है क्या? ठाकुर की अवस्था नहीं देख रहा है। इस तरह की अवस्था में ठाकुर के पास में दो घंटा बैठकर के उनके पास में सब वार्तालाप करवाता है। तो यह सब क्या है ना स्वामी जी का कितना एक्यूरेट ऑब्जरवेशन था। लग रहा है कि स्वामी जी वही ठाकुर के आखिरी दिन की घटना को याद करके ही यह बात शायद कहते होंगे। क्योंकि स्वामी जी एकजेक्टली वही कहते हैं कि और कोई इंडियन होता तो मेरे पास में बैठकर के दो घंटा मुझसे बकवाता। मेरे पास में बकबक करवाता। तो एग्जजेक्टली वही चीज यहां पे भी मुझे लग रहा है कि स्वामी जी इसी को याद करके शायद कहते होंगे। सो एनीवे

दो तरह के भक्त: सर्वस्व न्योछावर कर सेवा व्रत धारण करने वाले और स्वार्थपरायण निज-मुक्ति के साधक

दोनों तरह से है। एक तो अपना एटीिकेट ही हमको ख्याल में रखना है कि जब सामने वाला बीमार है तो झूठमठ का उनके पास में श्रम ना करवाए। यह तो एक है। दूसरा है जैसे मां ने कहा था कि ठाकुर की रसगुल्ला खेते ऐसे छिले ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने को आए थे। वही मां जब बीमार थी आखिरी समय में एक भक्त आया तो मां के सेवक संतानों ने मां के पास जाने से मना कर दिया उसको मां के पास में ले जाने से तो वह चिल्लाने लगा क्या मां आपकी अकेले की है क्या ऐसा करके झगड़ा करने लगा तो फिर मां लेटी हुई थी बिस्तर पे तो बैठी बैठ गई बिस्तर पे और फिर कहा कि अरे उसको ले आओ भीतर में क्यों झूठमठ का उसको बाहर में अटका करके रखा है फिर किसी ने विरोध किया होगा कि मां आप तो बीमार है तो माने वही वर्ल्ड फेमस सेंटेंस कि ठाकुर की रसगुल्ला कितने ऐसे चिलन ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने को आए थे तो देखिए दोनों ओर से है ठाकुर मां स्वामी जी तीनों का देह तो है जगत कल्याण के लिए ही किंतु भक्त जो है वह दो कैटेगरी के एक कैटेगरी है कि इनके पास में अपना बेनिफिट निकाल लेते हैं। कैसे भी करके इनके पास में कुछ काम करवा लेते हैं। अपना कुछ कल्याण हो जाए। इस आशा से यह लोग आते हैं। और दूसरी कैटेगरी है यह सेवक भक्तों की सेवक संतानों की। उनका है कि भले ही चाहे यह लोग नर नारायण ना कि नारायणी ना कि जगत धात्री ना कि यह आद्या शक्ति वगैरह हो। उन्होंने किया तो है मनुष्य देह धारण। मनुष्य के जो गुणधर्म है, रोग है, शोक है वगैरह तो उनको भी लागू होते हैं। तो उनकी रोग की अवस्था में उनका जो सुविधा है, वह हमको प्रथम देखना है। नहीं कि उनके पास में से काम करवा लेना है अपने लिए। तो यह जो कैटेगरी है वह पूरी सेवक संतानों की कैटेगरी है कि जो लोग चाहते हैं कि ठाकुर के भले ही चाहे ठाकुर के पास में आशीर्वाद देने की क्षमता हो रोग के समय में उनको बिना मतलब परेशान नहीं करना। इसी यह जो डिवीजन है क्लियर डिवीजन वो हमको वो कल्पतरु के दिन स्पष्ट रूप से दिखते हैं कि यह गृहस्थ भक्त थे। जैसे ही ठाकुर ने गिरीश को यह कहा आर देर की बोल वो तुम चैतन्य हो और तुम्हारा तुम लोगों को चैतन्य प्राप्त हो और तो मैं क्या कहूंगा ऐसा जैसे ही ठाकुर ने यह वाणी उच्चारित करके सबको स्पर्श करना शुरू किया यह रामचंद्र है चिल्ला चिल्ला करके सबको इकट्ठा करने लगा वह कुक था रसोइया वगैरह सबको इकट्ठा करके ठाकुर के चरणों में फेंकता है तभी उसको लगेगा कि मैंने इतना महान काम किया है हमको भी पढ़ के लगेगा। देखिए ठाकुर कल्पतरु है। यह तो बीमारी सब एक बहाना है। एक दिन की घटना है। ठाकुर वही काशी पूर्ण की वही श्याम पुकुर में ही बैठे होंगे। एकाएक और कैंसर तो हो ही गया था। ट्रीटमेंट चल रही थी। सामने भक्त बैठे हैं। ठाकुर अपनी खाट पर बैठे हैं। एकाएक ठाकुर ने कहा हमारे खाने केन कोर्च है। मुझे यहां पे कैसा कर रहा है? यानी कि सडनली वो जो पेन है वह बढ़ गया होगा। तो सामने जो भक्त बैठे हैं उसमें से एक भक्त क्या कहता है? एक कथा यार भूली ना। इस बात से अभी मैं भूलने वाला नहीं। उसके मन का यह भाव है। मास्टर महाशय कथामृत में लिखते हैं। इसके मन का यह भाव है कि ठाकुर यह सब एक तरह का यही कर रहे हैं। नाटक ही कर रहे हैं। एक तरह का दिखावा ही कर रहे हैं। उनका आशय है कोलकाता आकर के रहना जिससे कि भक्त मंडली उनके चारों ओर झूठे और भक्तों को उनकी सेवा करने का मौका मिले। जैसे ही यह कार्य समाधित हो जाएगा, समाधान हो जाएगा, वैसे ही ठाकुर ठीक होकर के दक्षिणेश्वर चले जाएंगे। तो वो एक था कैटेगरी पूरा कि ठाकुर तो नारायण है। देह तो एक रिफ्लेक्शन मात्र है। इस रिफ्लेक्शन में हजार पत्थर फेंके हजार रिफ वो रिल आए, विकृति आए ठाकुर नारायण को तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। कैसे भी करके उनका बेनिफिट उठा ले। जबकि यह सेवक संतान थे। उन्होंने कहा कि दो चीज एक तो है कि ठाकुर की सेवा करना ही अभी हमारा सर्वोच्च धर्म है। और दूसरा कहा कि ठाकुर की जब यह अंतिम घड़ी आन पहुंची है तो कैसे भी करके तपस्या करके जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य प्राप्त कर दे। देखिए गृहस्थ भक्त और सेवक भक्त अ त्यागी सेवक भक्त दोनों के मन में यही बात थी कि चलो ठाकुर का आखिरी समय है हमको अपना प्राप्त कर लेना है। हां नरेंद्र ने भी कहा सबको कि अभी तो ठाकुर देह रक्षा करने को तत्पर हो गए हैं। ऐसा लग रहा है कि ठाकुर देह त्याग कर देंगे। तो अभी हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है तपस्या की मात्रा बढ़ा देना। तो आध्यात्मिक क्षेत्र में सर्वोच्च उद्देश्य प्राप्त करने के लिए ईश्वर दर्शन कोई ना कोई आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने के लिए दोनों दल तत्पर हो गए थे। किंतु दोनों ग्रुप का जो रास्ता था कितना रेडिकली डिफरेंट था। एक दल है ठाकुर के पास में से बेनिफिट निकलवा देना है। ठाकुर कैसे भी स्पर्श कर दे, कैसे भी करके उपदेश दे दे, कैसे भी करके हमारा कल्याण कर दे। और यह त्यागी संतान वृंद है। उनका था कि तपस्या करके प्राप्त करना है। ठाकुर को कष्ट नहीं देना है। तो यह दो जो रास्ते हैं माने तीन ग्रुप हो गए थे ठाकुर की बीमारी के समय। एक तो बहिरंग हो गया था। वो लोगों का ऐसा मानना था कि अपने को ही नहीं बचा सकते तो हमारा क्या करेंगे बोलकर के वे लोग तो आगे ही निकल पड़े। और फिर दूसरा जो अंतरंग था अंतरंग में भी ये सेवक संतान और वह जो अपना खुद का बेनिफिट प्राप्त करने वाले इस तरह से दो ग्रुप अगेन हो गए थे। यानी कि देखिए कि यह जो दो घंटा ठाकुर के साथ में उसने वार्तालाप किया। वह वही कैटेगरी का है। कैसे भी करके अपना बेनिफिट निकाल दो। यह सब घटनाएं जब हम पढ़ते हैं कभी-कभी हमको लगता है ठाकुर कितने महान थे। किंतु साथ-साथ में हमको यह भी देखना है कि हम किस कैटेगरी में आते हैं। हम लोगों को क्या ठाकुर से कोई बेनिफिट ही निकाल लेना है ना कि हमको अपने से कुछ करना है। सो वी हैव टू सी दैट। और यहां पे सन्यासी संसारी ऐसा कुछ नहीं है। सन्यासी होकर के भी कोई बड़े स्वार्थी होते हैं और संसारी होकर के भी कोई बड़े जापक होते हैं। जप करने वाले होते हैं। सो हम किस कैटेगरी में आते हैं?

श्री रामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: स्वामी रामकृष्णानन्द कथित

एक पर्यायामी सात माइल दौड़ालाम डाकार जो शशि महाराज कहते हैं पहले तो पहले तो क्या कहा उस आखिरी दिन की प्रत्येक घटना जैसे कि मेरे हृदय पर अंकित हो गई है। ठाकुर बड़े ही सुस्त और प्रफुल्ल दिख रहे थे। शाम के समय में दो घंटा उन्होंने एक सज्जन के साथ में वार्तालाप किया था। जिसको उन्होंने योग के बारे में उपदेश दिया था। किंतु कुछ समय के बाद में ही मैं 7 माइल दौड़ करके डॉक्टर को पुकारने के लिए गया था। जोख डॉक्टर बाड़ी पहुंचलाम तनी बाड़ी छिले ना जब मैं डॉक्टर के घर पहुंचा तब वह घर में नहीं थे। किंतु बाड़ी लोकेरा बल्लो तीनी गोथाई छ किंतु घर के लोगों ने बता दिया कि डॉक्टर कहां गए हैं ताईमी आर एक माइल दौड़ालाम तो फिर मैंने फिर से एक माइल दौड़ा एवं पथे तार शंगे देखा होलो और रास्ते में उनके साथ में मुलाकात हुई तार अन्न काज छिलो बोलले आस्ते पारबेना उनको दूसरा काम था कहां नहीं आ पाएंगे किंतु ता सत्यवामी ता के टेनेनिम किंतु फिर भी मैं उनको खींच करके ले आया। देखिए यह हनुमान जी की बात याद आ जाती है लक्ष्मण को जब वो लक्ष्मण को ट्रीट करने के लिए एक औषध की जरूरत थी मेडिसिन की और महावीर को जब भेजा गया तो देखा कि उस पर्वत के ऊपर में कौन सा यह मेडिसिनल प्लांट है वह समझ में नहीं आया तो पूरा का पूरा पर्वत उठाकर के ले आए। वही थी उनकी राम भक्ति। वही था उनका सेवक भाव। तो यहां पर भी शशि महाराज दौड़ करके डॉक्टर के घर जाते हैं। पता चला कि डॉक्टर घर नहीं है। तो फिर से दौड़ करके जहां पर घर वालों ने बताया वहां पर जा रहे थे। रास्ते में डॉक्टर के साथ मुलाकात हुआ। डॉक्टर कहता है कि नहीं मैं बिजी हूं। फिर भी कैसे भी करके हाथ पकड़ करके खींच करके ले आए। से अंतिम रात ठाकुर आदर शंगे शेष परंत कथा बोले छिले उस आखरी रात को ठाकुर हमारे साथ में आखिरी घड़ी तक वार्तालाप किया था रात्रे तनी आध ग्लास पायस खेले रात को उन्होंने आधा गिलास भर करके पायस खाया खीर खाई एवं मने होलो तार स्वाद तनी पछंदो कोे छे और मुझे लगा कि खीर का स्वाद उनको पसंद आया है। तार शरीर अवश्य खानिक उत्तप छिलो उनका शरीर अवश्य थोड़ा सा गर्म था। शायद थोड़ा सा टेंपरेचर उनको हुआ होगा। ताई तनी आमा के हवा करते बोलले इसीलिए उन्होंने मुझे हवा डालने को कहा पंखा डालने को कहा एवं आमरा प्राय दो चो एक शंगे हवा करते लाम और हम प्राय 10 लोग एक साथ में हवा करने लगे त पांच छोटी बाली से ठेस दिए बोसे छले ठाकुर पांच छ तकिए पे भार देकर के बैठे हुए थे आर ओ बालिश गोलो आ निजे धरे रखे छिलाम एवं एक शंगे हवाओ कर छिला और वह जितने भी तकिए है जितने भी पिलो है मैंने अपने हाथों से पकड़ के रखे थे और साथ में ही मैं हवा भी कर रहा था वो वो जो हाथ पंखा आता है ना वह इलेक्ट्रिसिटी तो था नहीं तो हाथ पंखे से हवा डाल रहा था एयर फले एक नोड़ा चौड़ा हो छिलो इसके परिणाम से थोड़ा थोड़ा सा हलन चलन हो रही थी एवं दुई बार तियामा के जिज्ञेश को लेन और दो बार ठाकुर ने मुझे पूछा तू काछिस केनो तुम कंप्यों रहे हो जेनो तार मन ए तो स्थिर होए छिलो जे अत्यंतो ओप्पो नोड चोनो त टेर पा जैसे कि उनका मन इतना स्थिर हो गया था कि एकदम अल्प मात्रा में जो नडन चडन अर्थात कि हलचाल हो रही थी मूवमेंट हो रही थी वह भी वह समझ पाते थे वह भी वह सेंस कर पाते थे नरेंद्र तार पाटी हाथ लिए मालिश करते लाो नरेंद्र उनके दो पैर हाथ में लेकर के मालिश करने लगा एवं ठाकुर तार शंगे कथा बोल छिले ता के की करते हो ताई बोल छिले और ठाकुर उसके साथ में बात कर रहे थे। उसको क्या करना है वही बता रहे थे। बार-बार तनी बोल छिले बार-बार ठाकुर कह रहे थे तू छले दे ना को तुम यह लड़कों की देखभाल रखना जेनो तादेर भार नरेंद्र के दीन जैसे कि सबका भार सबका जिम्मा नरेंद्र को दे रहे हैं। देखिए ये आश्चर्य की बात है कि मृत्यु शैया पे ठाकुर उनका एक जो बड़ा कंसर्न था ये नरेंद्र को बार-बार कह रहे हैं कि ये जितने भी लड़के हैं सबका जिम्मा तुझको लेना है और यह लड़के देखिए कि देख रहे हैं सब कुछ शशि महाराज है राजा महाराज है निरंजन महाराज है जो कोई भी वहां पर उपस्थित होगा सब लोग यह बात देख रहे हैं कि ठाकुर बार-बार उन सबका जिम्मा नरेंद्र को दे रहे हैं मृत्यु शैया पे जब कोई कंसर्न होता है किसी व्यक्ति का तो वह कंसर्न उसके हृदय का सबसे डिपेस्ट कंसर्न होता है। उसके जीवन का सबसे जो इंपॉर्टेंट जो पहलू है जो उसके समस्याएं है या उसके जो ये है उसका हार्ट वही उसके जीवन के आखिरी समय में उसको याद आता है कोई भी व्यक्ति में तो देखिए कि मृत्यु शैया पे ठाकुर बार-बार कह रहे हैं नरेंद्र को कि सभी लड़कों की संभाल तुमको रखनी है। तो नरेंद्र ने भी यह जिम्मा लिया था और सभी गुरु भाइयों को भी पता था कि नरेंद्र है उनका लीडर तार पर तनी सूते चले उसके बाद में ठाकुर ने सोना चाहा हठात रात एकार समय तनी एक पासे पड़े गले एकाएक रात को 1:00 बजे के समय वो एक साइड में जैसे कि झुक गए तार गलाए मृदु शब्द हो छिलो एवं आमी देखलाम तार शरीर समस्त लोम खड़ा होए उठे छ उनके गला में उनके गले में मृदु शब्द हो रहा था। मृदु आवाज निकल रही थी। एवं और मैंने देखा कि उनके समस्त उनके शरीर के समस्त लोम कुप जो है वह खड़े हो गए हैं। रोम हर्षण जिसको कहते हैं नरेंद्र ताड़ाता ताड़ी तार पाद उठी ले पैर ऊपर रेखे दौड़े नीचे ने गो शब कोते पारछिलो ना नरेंद्र ने इमीडिएटली ठाकुर के जो दो पैर अपने हाथ में लेकर के मालिश कर रहा था तो ठाकुर ने नरेंद्र ने साथ-साथ में ही ठाकुर के दोनों पैर बिस्तर पर लख रख के दौड़ के नीचे चला गया। जैसे कि ठाकुर की यह अवस्था वो सहन नहीं कर पा रहा था। देखिए यह कितना इंपॉर्टेंट पॉइंट है कि नरेंद्र को इमीडिएटली पता चल गया कि क्या हो रहा है और साथ-साथ में ही जैसे कि वो शोक जो है वो ग्रीफ जो है ठाकुर की जो विदाई की क्षण है वो सहन नहीं कर पा रहा है बोलकर के ठाकुर के जो दो पैर अपनी गोद में लिए थे वह दोनों पैरों को बिस्तर पर रखकर के दौड़कर के नीचे चला गया। काशीपुर में पता होगा कि ठाकुर का कमरा फर्स्ट फ्लोर पे है और बाकी के रहने की जगह ग्राउंड फ्लोर पे है। तो नरेंद्र इमीडिएटली सीढ़ी से उतर करके ग्राउंड फ्लोर पे चला गया। तार एक जन भक्त डॉक्टर तार नाड़ी स्पंदन अनुभव करते गए देख ले कोनो स्पंदन नहीं उनका एक भक्त डॉक्टर उनकी नाड़ी का स्पंदन अनुभव करने को गया और देखा कि कोई भी स्पंदन नहीं है। भक्त डॉक्टर मुझे लग रहा है यह रामचंद्र ही होंगे किंतु जो भी है वो एक डिवोटी उनकी नाड़ी देखकर के पल्स है कि नहीं वह मेजर करने को गए देखा कि पल्स नहीं है। एवं चेचिए के दे उठ लेन चिल्ला के रो उठे जब देखा इस डॉक्टर भक्त ने कि पल्स नहीं मिल रहा है तो चिल्ला करके रो उठा आमी तार व्यवहारे अध होए उठला मैंने उनके इस तरह बिहेवियर देखकर के मैं थोड़ा सा अधैर्य हो गया थोड़ा सा नाराज जैसा हो गया जेनो ठाकुर शक्ति शक्ति यादिर छेड़े चले गए छ जैसे कि क्या ठाकुर सही सही में हमको छोड़ के चले गए हैं ठाकुर तो बार-बार समाधि में जाते थे पल्स नहीं मिलना हार्ट बीट रुक जाना आंखों में उंगली देख के देना पलक भी नहीं झपक रही है यह सब तो वेल डॉक्यूमेंटेड है उनके जीवन में तो अभी एक बार पल्स नहीं मिला तो क्यों ऐसा चिल्ला करके रो रहे हो बोल के शशि महाराज अधैर्य हो उठे थोड़े से इंपेशेंट हो उठे ता के बोललाम मैंने उनको कहा अपनी की क्या कर रहे हैं आपरा सबाई भावलाम त समाधिस्त होए छ हम सब ने सोचा कि ठाकुर सिर्फ समाधिस्त ही हुए ताई नरन फिरे एलो एवं आमरा प्राय कुड़ी जन एक शंगे बोसे हरी हरि ओम हरि ओम बोले मंत्र उच्चारण करते लाला और हमने सोचा कि शायद ठाकुर समाधिस्थ ही हुए हैं और इसीलिए नरेंद्र वापस आया और दौड़ के नीचे चला गया था तो तो वापस आया और लगभग 20 लोग एक साथ में बैठकर के 20 भक्त उपस्थित थे उस समय ठाकुर के आखिरी क्षण के समय और मां और मां की जो स्त्री संगिनियां होगी वह तो अलग वो तो उस कमरे में थी ही नहीं तो ऑलमोस्ट 20 लोग एक साथ में बैठकर के हरि ओम हरि ओम बोल के मंत्र उच्चारण करने लगे ए भा हमरा पोरे दिन एकटा दुटो परजन तो अपेक्षा करलाम इस तरह से हमने दूसरे दिन 1:00 बजे 2 बजे तक अपेक्षा की तखनो तार शरीररे किछू उत्ताप छिलो तब तक उनके देह में थोड़ा सा गर्मी था उनका का देह थोड़ा सा गर्म था। विशेष कोरे पीठे चारपाशे खास करके पीठ में यह स्पाइनल कॉर्ड जो है उसके आसपास में थोड़ा सा टेंपरेचर था। डॉक्टर जोर दिए बोलते लाले जे त देह रखा करे छ डॉक्टर जोर देकर के एफेसाइज देकर के बोलने लगे कि ठाकुर ने देह त्याग किया है प्राय पांच स्टार समय तार देहो ठंडा होए गैो ऑलमोस्ट शाम को 5:00 बजे के समय ठाकुर का देह ठंडा हो गया देखिए महासमाधि की वह क्षण है 1 बज के आस 1 बज दो3 मिनट के बाद की और ऑलमोस्ट दूसरे दिन 5:00 बजे तक शाम के उनके देह में थोड़ा सा टेंपरेचर था और किंतु इसके बाद में ठाकुर का देह ठंडा हो गया ताई आमरा ता के खाटे सुइए माला दिए शाय शशाने लिए गला इसीलिए हमने ठाकुर को खाट पे सुला करके माला से सजा करके श्मशान ले गए

संन्यास जीवन के बारे में स्वामी रामकृष्णानन्द

बराह नगर मठे आमरा तखनो आमा दे उद्देश्य कोथा भाभीिनी ये लोग जब वराह नगर मठ में थे और ठाकुर की महास अब ये ठाकुर की महासमाधि तो हो गई श्मशान में तो ठाकुर को ले गया ले जाया गया चिता पे उनको अग्नि देह भी हो गया देह को अग्नि में भी भस्मीभूत कर दिया गया इसके बाद की बात यह शशि महाराज कहते हैं कि वराह नगर मठ में थे उस समय हमने हमारे उद्देश्य की बात कभी सोची नहीं विश्वास छो जे आद दे एकमात्र कर्तव्य ठाकुर आदे सामने जे आदर्श रखे छिले से आदर्शों वास्तव में परिणत करा सोचा था कि हम लोगों का एकमात्र कर्तव्य है कि ठाकुर ने हमारे सामने जो आदर्श रखा था उस आदर्श को वास्तव में परिणत करना अर्थात अभिमानहीन जीवन यात्रा ओ सेवा अर्थात कि अभिमानहीन जीवन जीना और सेवा करना ठाकुर की तीन कनो आदर काछे कोनो विशेष उद्देश्य बा काजर कथा बोले नहीं ठाकुर ने कभी भी हमारे सामने कोई विशेष उद्देश्य या तो फिर कार्य की बात कही नहीं थी यदि आ दे धारणा हो जे आमा देर कोनो विशेष काज करते होवेबे ता हले बोध होए हमरा अनुभावे जीवन जापन करता यदि मुझे हमको ऐसा लगता कि हमको और कोई विशेष कार्य करना है तो फिर हमको लगता है कि हमने और अन्य तरीके से जीवन पसार किया होता। नाना प्रकार कठोरता यामादे शक्ति खोए को तामना विभिन्न तरह की कठोरता करके हमारी शक्ति क्षय नहीं करते। देखिए यह भी शशि महाराज कहते हैं कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ में रहकर के जो प्रचंड तपस्या की स्वामी जी कहते हैं ना भूत भी भाग जाते हमारी तपस्या देख के तो यह तपस्या जिस तरह से उन्होंने की है देह तो सभी का क्षय हो ही चुका था योगेन महाराज ने तो इतनी तपस्या की देहपात हो गया तो शशि महाराज कहते हैं कि यदि हमको पता होता कि नरेंद्र इस तरह से स्वामी जी अमेरिका जाने वाले हैं। फिर वहां से शिव ज्ञान जीवन सेवा का अमर मंत्र जो है उसका प्रचार करने वाले हैं। रामकृष्ण संघ की स्थापना होने वाली है और हम सबको संघ होकर के सिस्टमेटिक रूप में ऑर्गेनाइजेशनल वर्क करना है। तो हमने वो जो वराह नगर मठ में जिस तरह से तपस्या की उस तरह से तपस्या करके हम लोगों ने अपनी जो शक्ति है अपना जो स्वास्थ्य है उसका क्षय नहीं किया होता। तो यह शशि महाराज का विवरण। इसके बाद में देखिए कि काली महाराज का विवरण प्रारंभ होता है और यह भी काफी लंबा है। एक काम करेंगे इसको अभी कल ही देखते हैं। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: श्री रामकृष्ण के अंतिम दिनों में स्वामी विवेकानंद भी तपस्या करना चाहते थे, पर शशि महाराज का ध्यान केवल ठाकुर की सेवा पर था। इस दृष्टि से शशि महाराज को और भी महान कहा जा सकता है।

ना यह बात आपकी सही है। शशि महाराज की दृष्टि से देखें। अब जैसे देखिए मैं आपको म एक बहुत ही स्थूल ग्रॉस उदाहरण देता हूं। रिवेट प्रेसिडेंट महाराज यहां पर आए थे लास्ट वीक राइट? तो अभी देखा मैंने कि महाराज के जो सेवक महाराज के साथ में आए हैं। यहां पर कुछ साधु जो कि महाराज की सेवा में अपॉइंट हुए हैं। तो दे आर सो डडीिकेटेड टू महाराज जी सेवा कि एंटीिसिपेट कर सकते हैं महाराज। 97 एज है उनका तो किस तरह से म एंटीिसिपेट नहीं किए बिना यदि आप यह अपेक्षा रखेंगे महाराज खुद बोलेंगे तब करेंगे तो होने वाला नहीं है। आपको वो सिक्स्थ सेंस चाहिए और जो ग्रेट सेवक होते हैं अपने ऑर्डर के वो सब में एक सिक्स्थ सेंस होता है। वो एंटीिसिपेट कर लेते हैं कि महाराज को किस तरह से मतलब कंफर्ट में रखना है। किस तरह से सेवा करनी है। तो मैं सब कुछ देख रहा था और मैं बार-बार यही सोच रहा था कि मेरे से उसमें से कुछ भी नहीं होने वाला। एक बार ऐसा हुआ था सुितानंद जी आए थे राजकोट तो सुबह को मॉर्निंग वॉक करने के लिए निकलेंगे मंगल आरती के बाद में तो मुझे बोला गया कि तुम साथ में रहना दो-तीन साधु को बोला गया था तो पहले दिन ऐसा हुआ कि हम दो-तीन साधु मंदिर में से बाहर निकले मंगल आरती के इमीडिएटली बाद और एक साधु वो एकदम दौड़ के नीचे गया और महाराज के जो जूते रखे थे वो लेकर के वो सीढ़ी के सामने लेकर के रख दिए। अब जनरली तो हम साइड पर निकालते हैं जूते तो उसने सीढ़ी के सामने लाकर के रख दिए। म लास्ट स्टेप के सामने तो जैसे ही सुानंद जी नीचे उतरे सीधा वो जूते पहन पाए। उनको वो साइड पे इवन दो स्टेप चलने की आवश्यकता ना पड़े। सो मैंने ऑब्जर्व किया। मैंने कहा वेरी गुड। देखिए ये सिक्स्थ सेवक का। दूसरे दिन ऐसा हुआ कि वो महाराज नहीं थे किंतु मैं था। तो सुहितानंद जी नीचे उतर रहे हैं। मुझे पता है कि इस तरह से सेवा करनी चाहिए। मेरे मुझे तो यह अकल आती ही नहीं। किंतु एटलीस्ट मैंने तो ऑब्जर्व किया है। किंतु फिर भी आई वाज इन अ कन्फ्लिक्ट कि अच्छा दौड़ के जाकर के जूते सामने रखे कि ना रखे रखे कि ना रखें। अल्टीमेटली मैंने नहीं रखे। [हंसी] बिकॉज़ आई डोंट हैव दैट मेंटालिटी कि उन्हें। राइट? तो इवन कल भी मैं यह जो लास्ट वीक भी मैं वही सोच रहा था कि देखिए कि यह जो सेवक है उन सब का एक सिक्स्थ सेंस होता है कि महाराज को किस तरह से एंटीिसिपेट करके सेवा करें जबकि मैं उसमें से कुछ नहीं कर पाऊंगा। एट द सेम टाइम यू कैन नॉट से आई एम सेल्फिश। राइट? म रांची जाकर के मैंने जो किया कंपेयर टू दैट यह कुछ नहीं है। ऐसा मैं ऐसा मान सकता हूं अपने सत्यारे के लिए। एट द सेम टाइम देखिए कि यह आपने ठीक ही कहा जो एक सेवक का माइंडसेट होता है वि इज यूनिक जो कि मुझे तो कभी समझ में नहीं आया मैं सब कुछ कर सकता हूं किंतु ये नहीं कर सकता [हंसी] यू आर राइट वेरी डिफिकल्ट टू अनपैक

प्रश्न: यहाँ तक कि स्वामी ब्रह्मानंद में भी ऐसा सेवा-भाव नहीं था।

नहीं था नहीं था मां ने खुद कहा है जब मां उस समय जय राम भाटी से कोलकाता आने की बात चल रही थी देखिए इंटरेस्टिंगली एक एक बार जब मां आई थी कोलकाता तो वो तो उद्बोधन तो था नहीं तो एक एक जगह पर घर भाड़े लिया गया और गोदामवाड़ी उसको कहते थे उसके थर्ड फ्लोर पे सेकंड फ्लोर पे मां रहती थी ग्राउंड फ्लोर पे ये गोडाउन जैसा था और फर्स्ट फ्लोर पे मां की सेवा के लिए राजा महाराज स्वयं रहते थे वो सब सेवकों को लेकर के तो मां ने राजा महाराज की सेवा को ऑब्जर्व किया था उस समय अभी उसके काफी साल के बाद में उद्बोधन तो बन गया मां जय जय राम बाटी में है। जयराम भाटी से उद्बोधन आने की बात हो रही है। तो किसी ने कहा मां चलो उद्बोधन जलते हैं। तो मां ने कहा नहीं शरत नहीं है। मेरी सेवा करने वाला और कोई नहीं वहां पे। तो किसी ने कहा अरे राजा महाराज है तो तो मां ने कहा नहीं राजा नहीं कर पाएगा। किसी को देकर के करवा पाएगा किंतु अपने से नहीं करवा कर पाएगा। ये मां ने स्पष्ट कहा है। वो जो अभी अभी कुछ दिनों पहले हमने वो स्वामी जी का वो लेटर देखा था ना स्वामी जी के पास में न्यूज़ आया। अमेरिका थे स्वामी जी कि किसी ने राजा महाराज के पास में बहुत सारा काम करवा दिया तो स्वामी जी ने लेटर में लिखा है तुम लोग याद रखना कि राजा ठाकुर भलो भाषा जिनिश छिलो राजा था ठाकुर के प्रेम का पात्र उसके पास में इस तरह से काम मत करवाओ फिर आखिर में किंतु एक पंच लाइन लिखते हैं ज हो चर्बी पु म जो भी है फेट बंद हो गया ओम राम राम