प्रार्थना
ओम स्थापकााय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं। कल हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज मातृत्व के चरण स्टेजेस ऑफ मदरहुड यह डिस्क्राइब कर रहे हैं। चार स्टेजेस कल गंभीरानंद जी महाराज ने हमको बताए और आज फिफ्थ स्टेज बताएंगे। हाईएस्ट हाईएस्ट स्टेज मातृत्व का क्या है? तो पहले तो कल वाले चार जो स्टेजेस थे वह एक देख लेते
मातृत्व के प्रथम तीन सोपान
हैं। गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि सर्वप्रथम स्टेज तो मातृत्व का यह है कि मां का अपने संतान के प्रति ही प्रेम है। और इससे होता क्या है? अपने संतान के प्रति प्रेम होने से दूसरे के संतानों को उस प्रति उसके मन में कभी-कभी द्वेष की भावना भी प्रकट हो जाती है और अपने संतान के लिए एक तरह की स्वार्थ परता भी प्रकट होती है। तो यह एक अत्यंत सामान्य स्टेज मातृत्व का है। इसके बाद में महाराज जी कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा होता है कि मां का अपने संतान पर जो प्रेम है वह अपने संतान तक ही सीमित नहीं होकर के अन्य के जो संतान है उनको भी अपने प्रेम की परिधि में अपने प्रेम के आंचल में वह आवृत्त कर लेता है। उनके प्रति भी इस जननी का जो प्रेम है वह धीरे-धीरे करके जन हित के रूप में परिणत होता है। यूजुअली आप देखेंगे मैंने भी तो देखा है कि रामकृष्ण मिशन में जो वॉलंटियर्स आते हैं खास करके लेडी वॉलंटियर्स तो क्या है कि हमारी तो इतनी सारी एक्टिविटीज चल रही है। अभी जैसे यहां पर सीपी क्लीनिक है तो यहां पे अ पिछले महीने एक लड़की आई थी अमेरिका से। वो स्टडी कर रही है वहां पर अमेरिका में किंतु उसको छुट्टी थी तो अभी वह इंडिया आई है अपने पेरेंट्स के साथ में रहने के लिए। तो अभी आप मान लीजिए कि अमेरिका से आप 1 महीने के लिए 2 महीने के लिए छुट्टी ले इंडिया अपने फैमिली के पास आते हैं तो आप क्या करेंगे? आप तो वही करेंगे जो कि सभी लोग करते हैं। एक तीर्थ स्थान से दूसरे तीर्थ स्थान या तो फिर एक टूरिस्ट स्पॉट से दूसरे टूरिस्ट स्पॉट वहां पर जाकर के आनंद करेंगे और फिर इस मित्र के साथ में मुलाकात करेंगे। दूसरे मित्र के साथ में मिलेंगे। ये इस रिलेटिव के घर जाएंगे। उस प्रसंग में जाएंगे। घर वालों के साथ में बैठेंगे। तो यही तो सब होता है जनरली। किंतु इस लड़की ने ठीक किया कि मैं एक महीना हूं यहां पर तो कहीं पर मुझे वंटियरी सर्विस देना है। तो यहां पर आई थी सीपी क्लीनिक में काम कर रही थी। तो देखिए कि यह कितना एक अच्छा आदर्श है आज की युवा पीढ़ी के लिए। अपना एक स्वार्थ पर जीवन अभी इसको स्वार्थ भी नहीं कहेंगे ना। इसको तो आप नॉर्मल लाइफ ही कहेंगे जो कि हम बाकी सभी लोग जी रहे हैं। इवन मैं भी आज छुट्टी ले कहां पर जाऊंगा तो मैं ऐसा सेवा करने के बारे में कभी नहीं सोचूंगा। मैं यही सोचूंगा कि अपने आश्रम में तो बहुत सेवा कर ली। अभी छुट्टी पर आए हैं तो किसी सुनसान वीरान जगह पर जाकर के जप करते हैं, ध्यान करते हैं। ऐसा ही मैं सोचूंगा। किंतु मैंने देखा हम लोग गए थे कनखल गए थे तो वहां पर साधना सदन बोलकर के आश्रम है तो उस आश्रम में हम लोग वहां पर शास्त्र के बड़े अच्छे क्लासेस चलते हैं तो शास्त्र के क्लासेस अटेंड कर रहे हैं। हम चारप साधु थे तो अभी क्या है कि अपने आश्रम से आए हैं तो छुट्टी लेकर के आश्रम में तो दिन रात यही सब करते रहना है। कार्य ही करते रहना है। कर्म योग ही करते रहना है। अभी छुट्टी लेकर के 1 महीने का वहां पे शास्त्र चर्चा करने को गए हैं। तो अभी मेरा माइंडसेट क्या है कि जो 5 घंटे ना कि इतना क्लासेस चलते हैं। क्लासेस अटेंड करेंगे। उसके बाद में कनखल में ही पास में गंगा का किनारा है। बड़ा सुनसान और वीरान है और बड़ी सुंदर जगह है। वहां पर यह कुंभ मेला आयोजित होता है। जब भी वहां पर होता है तो उसका गंगा का जो पट है जो उसका किनारा है बड़ा ही विस्तृत है। तो बड़ी सुंदर जगह है। तो वहां पर जाकर के मैं बैठा रहता था और वहां पर पास में एक चाय वाला है। तो चाय वाले के पास में से वह मैं दो-तीन कप चाय लेकर के वह वहां पर चला जाता था। गंगा के किनारे वो चाय पीते-पीते अपना चिंतन मनन करता रहता था। तो वो मैं ऐसा करता था। किंतु मेरा जो एक मित्र था साधु वो मेरे साथ में आया है तो वह क्या करता था पता है? जहां पर साधना सदन में हमारा यह क्लासेस चल रहा है, वहां पर बीच-बीच में क्या साधु भंडारा रखते हैं। तो फिर वहां से माइक से अनाउंस होगा कि आज साधु भंडारा है। सभी लोग आइए। तो मेरी ऐसी कोई साधु भंडारा में जाने की इच्छा नहीं। मैंने सोचा कि जितना एकांत में समय बिताए इतना बिताएंगे। किंतु यह जो मेरा मित्र था दूसरा साधु वह वहां पर जाता था और खाने के लिए नहीं सेवा करने के लिए। वहां पर सर्विंग के लिए बहुत सारे साधु है तो कनखल में, हरिद्वार में वगैरह तो फिर वो परोसने के लिए आदमी कम पड़ जाते हैं। तो वहां पर जाकर के वो ऐसा लंबी लाइन में वो हैवी जो बर्तन होते हैं सब उठा के वो झुक करके क्योंकि तो सब तो जमीन पर बैठे हैं। तो आप सोचिए कितना कष्ट होगा। इतना हैवी भात का जो बर्तन है उसको उठाया झुक करके सभी के पात्र में सर्व करना लंबी लंबी लाइन है तो सब 2 घंटे तक ऐसा सब करता रहता था मैंने उसको बोला भी सही कि भाई तुम्हारी जो सेवा भाव है उसको तो मैं सलाम करता हूं मेरे से तो इतना होने वाला नहीं है अपने अपने सेंटर में जो सेवा करते हैं वह इनफ है मेरे लिए अभी एक्स्ट्रा कुछ करने की मेरी कोई इच्छा नहीं तो देखिए कि जिन लोगों के भीतर में अभी यह तो मैंने ऐसे लोगों की बात कही जिनके कोई संतान नहीं थे। किंतु जो जननी का भी ऐसा होता है जब भी अपने संतान के ऊपर में से उसका प्रेम जैसे दूसरों के संतानों की ओर धावित होना शुरू होता है। साथ-साथ में ही इस तरह का सेवा कार्य जागृत होता है। सेवा कार्य करने की इच्छा जागृत होती है और जनहित कर वह सब कार्य में यह आत्म प्रकाश करता है। तो वह एक सेकंड स्टेज हो गया। इसके बाद में महाराज जी कहते हैं कि इससे भी एक ऊपर का स्टेज है कि देह संबंध शून्य असीम स्नेह रूप जीव मात्रे परिव्याप्त होता है और मां को अनुपम अध्यात्म भूमि पर उन्नत कर सकता है। अर्थात कि मेरा संतान नहीं भी है। या तो फिर मैं अपने संतान के अलावा यह जो यह संसार है यह जितने भी लोग हैं इनके साथ में मेरा कोई आत्मीयता का रिश्ता तो नहीं है। ऐसा कोई फैमिली रिलेशनशिप तो नहीं है। इसके बावजूद इनके प्रति जो मेरा स्नेह है वह धावित होता है। देह संबंध शून्य असीम स्नेह पूरे विश्व की ओर व्यापृत होता है और मां को जननी को उच्च आध्यात्मिक भूमि पर उन्नत कर सकता है। यह जितने भी वॉलंटियर्स कोई अच्छे-अच्छे वॉलंटियर है। अभी जैसे मैं राजकोट में था तो वहां पे एक पब्लिकेशन डिपार्टमेंट में एक वॉलंटियर आते थे। तो देखा कि उनका तो उन्होंने पहले से ही ठीक करके रखा था कि शादी नहीं करनी है, मैरिज नहीं करना है और बस ऐसे ही क्योंकि क्या है एक्चुअली साधु होने की इच्छा तो थी किंतु क्या है घर का भी तो जवाबदारी होता है तो फिर नौकरी तो करना स्टार्ट स्टार्ट किया ही किंतु मैरिज नहीं किया अनमैरिड ही रहे और जब भी नौकरी में से अवकाश मिलता है तो उस समय क्या था
पेटलाद वाले जे-भगवान माताजी की कहानी
कि गुजरात में से यह बहुत बहुत सालों पुरानी घटना है। 1930 के आसपास की यह घटना है। राजकोट का यह जो रॉयल फैमिली था उसमें से एक लेडी एक स्त्री उसने कहीं से ठाकुर के बारे में सुना। यह रामकृष्ण कथामृत उसके हाथ में आया। तो यह कथामृत पढ़ते-पढ़ते उसको पता चला कि यह कथामृत के लेखक जो है श्री म वह वो जीवित है अभी भी और वहां पर रहते हैं कोलकाता में रहते हैं। तो इन्होंने ठीक किया कि जाकर के उनका दर्शन करें। तो यह अभी देखिए स्त्रियों के लिए 1930 की यह घटना है। वह जर्नी करके कोलकाता जाना ऐसे किसी पुरुष का के साथ में वार्तालाप करना यह तो सब कैसा रिस्ट्रिक्टेड था। हम सबको तो पता ही है। तो जो भी है यह लेडी वहां पर गई और वहां पर जाकर के मास्टर महाशय का दर्शन किया। तो फिर मास्टर महाशय के साथ काफी वार्तालाप हुआ। इसके बाद में मास्टर महाशय कहते हैं कि देखिए आप एक काम कीजिए आप बेलूर मठ जाइए वहां पर महापुरुष महाराज है वह आपको दीक्षा देंगे तो यह लेडी वहां पर गई बेलूर मठ में महापुरुष महाराज का दर्शन भी किया वहां पर कुछ दिन रही और फिर महाराज से दीक्षा भी ग्रहण की। इसके बाद में यह गुजरात वापस आए। अभी आने के बाद में इमीडिएटली या तो फिर कुछ समय के बाद में जो भी है वह टीचर की जॉब कर रही थी जाने से पहले तो उसने टीचर की जॉब में से रेिग्नेशन देकर के प्राइमरी स्कूल की वह टीचर थी उस समय उसको रिजाइन करके वह कहीं एक तपस्या स्थल है गुजरात में वहां पर अकेली रहकर के तपस्या कर रही है क्योंकि यह रामकृष्ण कथामृत का पाठ करना यह मास्टर महाशय शिवनंद जी महाराज जैसे महापुरुष का सत्संग प्राप्त होना, रामकृष्ण संघ में दीक्षा प्राप्त होना कितनी बड़ी बात है। तो यह उसके मन में भी वैराग्य का प्रारंभ हुआ। ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति प्रचंड भक्ति जागृत हुई और फिर वो वहां पर किसी तीर्थ क्षेत्र में रहकर के तपस्या कर रही थी। तो वह कर रही है। कर रही है तपस्या और अकेली रह भी रही है वहां पे। उस समय ऐसा हुआ कि गुजरात में एक गांव है। उसका नाम है पेडलाद। तो इस गांव के एक वहां पर एक सेठ रहते हैं। एक धनी व्यक्ति तो वह गए हैं यहां पे इस तीर्थ क्षेत्र में दर्शन करने के लिए। उन्होंने इस माता जी को देखा तो काफी प्रभावित हो गए। सोचा कि यह माता जी अकेली यहां पर रहती है और इतनी तपस्या करती है। इतना शुद्ध निर्मल चरित्र है उनका। तो क्यों नहीं उनको हमारे गांव उनको आने का आमंत्रण दिया जाए। उसका तो बड़ा बगीचा था इस सेठ का। तो इस बगीचे में कुटिया बना देंगे माता जी के लिए। इस कुटिया में रह के वो भले अकेली जब ध्यान करें उनके खाने पीने की जो व्यवस्था होगी वो सब व्यवस्था हम लोग कर देंगे। ऐसा माता जी को कहीं भिक्षा करने के लिए या इस तरह से जाना ना पड़े और फिर यदि बीमार हो जाते हैं तो ट्रीटमेंट के लिए जो भी व्यवस्था करनी है वगैरह-वगैरह हम लोग सब कर देंगे। तो उन्होंने माता जी को कहा कि आप हमारे वहां पर पधारिए। हम अपने ही बगीचा बड़ा है। एक कुटिया बना देंगे। आपको जो भी आवश्यकता होगी हम लोग तो है ही है। वहीं पर बगीचे में ही इनका बड़ा बंगला है। तो हम लोग आपकी सहाय करेंगे। आपकी सेवा करेंगे। आपका आपके साथ में थोड़ा वार्तालाप करेंगे सत्संग प्राप्त होगा। तो ये माता जी ने हां बोल दिया कि ठीक है चलो मैं आपके साथ में आती हूं। तो यह वहां पे पेटलाद गांव में गई और वहां पर उस बगीचे में रह रही। अभी हुआ ऐसा कि वहां पास में ही एक बहुत बड़ा बिल्डिंग था। तो इस बिल्डिंग में और एक दूसरा फैमिली रहता था। तो क्या यह फैमिली भी काफी बड़ा था और उनकी दवाई की दुकान वगैरह थी वहां पर ही और इस तरह से प्रतिष्ठित लोग भी थे वे लोग तो वहां पे एक दूसरी एक लेडी थी तो उनको भी इस माता जी का अभी क्या है कि बगीचे के सामने में ही यह दूसरा बिल्डिंग था तो इन माता वहां पे जो दूसरी लेडी रह रही थी उनको माताजी पे एक बार दो बार मुलाकात हुई होगी और उनको उनके के ऊपर में बड़ी श्रद्धा हो गई। तो उन्होंने कहा कि आपके लिए जो भोजन वगैरह है मैं अपने से अपने घर में तैयार करके आपको देने के लिए आऊंगी। तो माता जी ने कहा ठीक है चलो सेठ जी के ऊपर में इतना कम बोझा पड़ा है। तो यहां पर सेठ जी ने बगीचे में कुटिया भी बना दी और पास वाला यह जो बिल्डिंग था वहां पर जो दूसरी लेडी रहती थी वह प्रतिदिन भोजन बना करके खुद माता जी की कुटिया में जाती थी। उनके पास में बैठकर के और उनको आहार करवाती थी। अभी देखिए माता जी की कुटिया कितनी सुंदर जगह पर है। वहां पर गार्डन है। बड़ा सुंदर गार्डन है। और यह क्या है कि गांव के बाहर का जगह है। यानी गांव तो छूट गया पीछे में। बीच में आता है रेलवे स्टेशन और रेलवे स्टेशन के बाद में यह गार्डन और यह ब सेठ जी का बंगला और यह जो बिल्डिंग था वह सब वहां गांव के बाहर में है। तो पीछे में तो फिर पूरे खेत ही खेत है। बड़ा सुंदर सूर्योदय सूर्यास्त वह सब देखने को मिलता है। बड़ी सुंदर जगह थी। तो इस तरह के सुंदर वातावरण में यह रह रहे हैं। अभी हुआ ऐसा कि यह जो वॉलंटियर की जो मैं बात कर रहा हूं यह वॉलंटियर राजकोट में आते हैं। अभी भी आते हैं पब्लिकेशन डिपार्टमेंट में और उन्होंने मैरिज नहीं करना ऐसा ठीक कर दिया। तो मैरिज नहीं करके नौकरी तो कर रहे हैं किंतु समय के कैसे बिताएंगे? अपना एक्स्ट्रा जितना भी टाइम है वह सब इस माता जी के पास में आकर के उनकी सेवा करेंगे। तो देखिए कि वििन अ वेरी शॉर्ट पीरियड ऑफ टाइम जैसे ही माताजी इस गांव में आई यह सेठ जी की ओर से कुटिया भी बन गई जमीन भी मिल गया यह जो लेडी जो एक आती थी उनके लिए खाना बना देती थी और यह वालंटियर है ऐसे कुछ-कुछ लोग आकर के उनकी सेवा भी करते थे तो एक बड़ा ही सुंदर एक माहौल खड़ा हो गया। अभी देखिए एक्चुअली मैं कहानी कहना चाहता था यह वालंटियर की और माता जी की कि क्या है कि देह संबंध शून्य असीम स्नेह पूरे जीव के प्रति व्यापृत हो जाता है। अपने खुद के संतान हो ना हो कि ना हो सबके प्रति यह संतान भाव प्रकट होता है। तो यह कहानी का आशय था। किंतु इसमें एक आखिरी एक पॉइंट मैं ऐड कर देता हूं कि यह जो बिल्डिंग था जहां से यह लेडी आती थी माताजी के लिए आहार लेकर के प्रतिदिन जब तक जितने दिन तक यह माताजी जीवित थी तब तक उस बिल्डिंग में एक लड़का रहता था और लड़का क्या है शहर में रहता था छुट्टी में वहां पर आता था तो समर वेकेशन में और बड़ा छोटा था उसकी उम्र तो जन्म ही वहां पर हुआ था। छोटी उम्र का था। जन्म से लेकर के ही वह प्रति जितनी बार समर वेकेशन में छुट्टी में आएगा गांव में तो माता जी के दर्शन होते थे। और माता जी की कुटिया में खेलना माता जी के पास में से प्रसाद लेना वह सब यह करता था। माता जी को वहां पे माता जी को मिलने के लिए जाएंगे ना तो सबसे पहले कहेगी जय भगवान यानी जय भगवान। तो हम लोग इनको यह जो लड़के हैं वह सभी उनको जय भगवान माता जी के रूप में पहचानते थे। तो यह जय भगवान माता जी के कुटिया में जाना प्रसाद लेना फिर माता जी कहेगी कि ये सब ये फोटोग्राफ है सब उनको प्रणाम करो। अब ये फोटो किसका है यह तो पता नहीं इस लड़के को प्रणाम करता था। सब होता था। फिर बड़ा हुआ यह लड़का। फिर उसने रामकृष्ण संघ जॉइ किया। रामकृष्ण संघ ज्वाइन करने के बाद में वह जो लेडी थी जो उनके लिए प्रतिदिन आहार लेकर के जाती थी माता जी के लिए उसके साथ में एक बार बात हुआ तो यह लेडी ने इस लड़के को पूछा कि क्या तुमको पता है कि तुम जिनको प्रतिदिन प्रणाम करने के लिए जाते थे जिनकी कुटिया में खेलते थे जिनके पास में से प्रसाद लेते थे वह कौन थे तो लड़के ने कहा पता नहीं अभी होगा तो सब तो बचपन की बातें हैं इतना कौन याद रखेगा उस समय किसका फोटो है? किसको प्रणाम किया? किसको पता? तो जाते हैं प्रसाद के लोभ से। नहीं कि वह कौन है फोटो में बैठा हुआ? उनके प्रति कोई श्रद्धा भक्ति ले। तो लेडी ने कहा कि वह तो वही ठाकुर मां स्वामी जी है थे जिनके कि संघ में तुमने जॉइ किए हो। तो यह लड़का इतना आश्चर्यचकित हो गया कि अच्छा बचपन से ही जैसे कि उसके ऊपर में ठाकुर मां स्वामी जी का स्नेह हस्त था। इसको पता ही नहीं। तो वह लड़का था मैं बचपन में प्रतिदिन समर वेकेशन में प्रत्येक दिन उनके घर में जाना उनके कुटिया में जाना उनके साथ में वार्तालाप करना प्रसाद लेना वहां पर वो फोटोग्राफ को प्रणाम करना सब कुछ कर लिया बड़े हो गए फिर सब ये एजुकेशन का ये जो प्रेशर ऐसा होता है कि गांव में जाना धीरे-धीरे करके कम होता गया वो माताजी का भी देहांत हो गया तो फिर वो समाचार आया था एक दिन हमारे घर में कि जय भगवान माता जी का डेथ हो गया है तो ठीक है अभी वो तो बचपन की बातें हैं तो थोड़ा तो दुख तो होगा ही किंतु अभी डेथ जन्म मृत्यु जरा व्याधि वो तो सबके जीवन में लगा रहता है और मैं उस समय स्टूडेंट था स्टूडेंट का यह जो एक प्रेशर रहता है लाइफ का स्टडी का यह सब उसमें कहां यह सब चीजों को कोई स्थान रहता है बचपन के इस सब दिनों का तो जो भी है ये घटना तो पूरी दिमाग में से निकल गई थी। फिर मैं रामकृष्ण संघ ज्वाइन करके ट्रेनिंग सेंटर भी हो गया था। ट्रेनिंग सेंटर के बाद में मेरा पोस्टिंग हुआ था लिमड़ी में। तो उस समय मेरा वो जो मेरी यह जो ये जो लेडी थी जो कि प्रतिदिन उनके लिए खाना ले जाती थी वो मेरी चाची थी। तो उनके साथ में एक बार मेरा फोन उन्होंने फोन किया मुझे एक बार। तो अभी जनरली मैं अपने किसी भी रिलेटिव्स के साथ में रिलेशन नहीं रखता था। किंतु इन्होंने जब फोन किया अभी इतना पुराना है रिलेशन तो चलो मैंने सोचा कि बात कर लेते हैं तो बात कर लिया मैंने तो पहला ही शब्द पहला ही वाक्य उन्होंने प्रश्न उन्होंने यही किया तुमको याद है जय भगवान माता जी जिसके घर जाते थे तुम वो कौन है कौन थी मैंने कहा नहीं पता और जय भगवान माता जी थी भी वो बाय द टाइम मैं आधा भूल गया था तो जो भी है तो उन्होंने याद करवाया कि वो वही रामकृष्ण संघ की वो को उसी में उन्होंने दीक्षा ली। तो मुझे इतना आश्चर्य हुआ क्योंकि बाय दैट टाइम मैंने हिस्ट्री पढ़ना शुरू कर दिया था। रामकृष्ण संघ की अच्छे से पढ़ना शुरू किया था। यानी कि कौन ओरिजिनल डिवोटी थे वगैरह-वगैरह वो तो मुझे एक अच्छे से पता था। तो अभी यह माताजी यदि उनकी उम्र के अनुसार कैलकुलेट करें तो निश्चय वह किसी डायरेक्ट डिसाइपल की डिसाइपल होनी चाहिए। वह तो मैं एक क्षण में ही समझ गया। फिर उसके बाद में मैंने खोज करना शुरू किया कि कौन थी वह माताजी तो वहां पर पापा थे तो पापा को मैंने पूछा तो बाबा ने इमीडिएटली मुझे सब कुछ बताया कि यह पूरा हिस्ट्री उन माताजी का कि राजकोट के रॉयल फैमिली की वो लेडी थी वो नौकरी कर रही थी एज ए टीचर वो छोड़कर के वहां पर गई थी महापुरुष महाराज की वह शिष्या थी और इतना ही नहीं महापुरुष महाराज की जन्मतिथि का एक स्पेशल उत्सव उत्सव राजकोट आश्रम में हो। इसके लिए माता जी के पास में जो कुछ भी छोटी थोड़ी बहुत संपत्ति थी उन्होंने आश्रम को दान कर दी थी। तो इसकी वजह से राजकोट आश्रम में प्रत्येक महापुरुष महाराज की तिथि पूजा को स्पेशल होम होता है। वैसे डायरेक्ट डिसाइपल की तिथि पूजा में होम नहीं होता। होम होता है सिर्फ ठाकुर मां स्वामी जी की तिथि पूजा में। किंतु यहां पे महापुरुष महाराज की शिष्या और वह भी उतनी पुरानी डायरेक्ट उनकी महापुरुष महाराज की डिसाइपल और वह भी राजकोट की तो यह सब फैक्टर है बोलकर के महापुरुष महाराज की तिथि पूजा को स्पेशल पूजा हो उसके लिए जो डोनेशन आया था माता जी की ओर से तो प्रत्येक महापुरुष महाराज की तिथि पूजा को वहां पर होम होता है और सिर्फ इतना ही नहीं उस समय जब तक यह माताजी जीवित थी तब तक राजकोट से स्पेशल गाड़ी इस गांव में जाती थी। माताजी को लेकर के यह गाड़ी आती थी राजकोट आश्रम में वापस और महापुरुष महाराज की तिथि पूजा के तीन-चार दिन माताजी वहां पर रुकती थी। फिर यही गाड़ी आश्रम की ही गाड़ी उनको उनके गांव में वापस पहुंचा देती थी। तो यह देखिए कि जिनके भीतर में एक देह संबंध शून्य प्रेम रहता है। जैसे कि यह माताजी है या तो फिर यह जैसे यह वॉलंटियर थे उनको क्या पड़ी है कि किसी के दूसरों के लड़के को स्नेह करने की यह माताजी हमको इतना स्नेह करती थी मुझे अभी तक याद है और कुछ याद नहीं है। अब आई विश कि मुझे याद होता। आई विश कि मुझे माता जी के बारे में इतना तो जय भगवान माता जी के बारे में इतना तो याद होता कि उनके ऊपर में मैं एक रेमिनेसेंस या एक आर्टिकल लिख पाऊं। मैंने राजकोट में रहते-रहते यह प्रयास दो-तीन बार किया था। यह वॉलंटियर्स जो थे जो कि उनके पास में जाते थे। राजकोट आश्रम के दूसरे सदस्य जो कि इनको पहचानते थे। सबके पास में से मटेरियल कलेक्ट करके इस माताजी की एक बायोग्राफी जैसा एक एटलीस्ट रामकृष्ण ज्योत मैगजीन में एक आर्टिकल पब्लिश हो। ऐसा तो यदि हो ऐसा मैंने सोचा था किंतु पता नहीं अभी हर बार जितनी भी बार मैंने ऐसा कुछ सोचा उस समय ऐसा कोई बड़ा प्रोग्राम आ गया प्रोजेक्ट आ गया कि फिर उसको मुझे पोस्टपोन करना पड़ा और मेरे खुद के रेमिनेशनंस इतने नहीं है। मेरा रेमिनेशंस उनके बारे में इतना ही है कि उनकी कुटिया में जाता था। को बड़े स्नेह से बुलाती थी और बड़े प्रेम से प्रसाद देती थी और वहां पर फोटो को प्रणाम करने को बोलती थी जो कि मैं प्रसाद के लोभ से वहां पर जाता था फोटो को प्रणाम करता था। अभी ये स्नेह वगैरह क्या है? छोटे बच्चे को वैसे ही तो मैं गांव में जाता हूं अपने घर में तो इतने सारे हमारा जॉइंट फैमिली था गांव में। तो सभी लोग मुझे इतना प्रेम करते थे कि माताजी के पास में स्पेशल जाना ऐसा कुछ नहीं था। प्रेम मिलता था। बहुत प्रेम मिलता था। किंतु प्रसाद का भी लोभ था। तो और वहां पर खेलने के लिए बड़ी सुंदर जगह थी। और फिर मेरी चाची जो कि एक टिफिन ले उनके पास में जाती थी तो उनके बारे में कुछ बातें किया करती थी। तो वह एक थोड़ा सा आकर्षण रहता था। तो वहीं तक किंतु आज मुझे समझ में आता मुझे कभी-कभी दुख होता है कि यदि मैं उनके बारे में उस समय जबकि वह जीवित थी और थोड़ा सा सत्संग किया होता तो कितना अच्छा होता। तो जो भी है अभी माता जी का मेरे साथ में क्या रिलेशन था? कोई दैहिक संबंध नहीं था। कोई भी यह पारिवारिक संबंध नहीं था। कोई भी यह फैमिली रिलेशनशिप नहीं था। और सिर्फ मैं ही कहां वहां पे यह जो सेठ जी का जो बागान था, इस बागान के चारों ओर अलग-अलग बिल्डिंग्स थे, घर थे। तो इस घर में जितने भी बच्चे रहते थे हम सभी लोग वो बगीचे में खेलने के लिए जाते थे और सभी को बुला करके इक्वल प्रेम से यह माता जी जो है सबको प्रसाद भी देती थी सबके साथ में बात भी करती थी उनको क्या पड़ी है कहां वह राजकोट की रॉयल फैमिली की वह लेडी है कहां वो उन्होंने महापुरुष महाराज से दीक्षा ली है वह बैठकर के जप करती ही रहेगी करती ही रहेगी उनको क्या पड़ी है दूसरे के लड़के को अपने घर में बुलाकर के प्रेम प्रेम प्रेम से बात करने की या प्रसाद देने की या कहने की कि फोटोग्राफ को प्रणाम करो। अभी अभी मुझे समझ में आया कि वह फोटोग्राफ में कौन थे? तो तीन फोटो थे। ठाकुर मां स्वामी जी का फोटो था। तो ये ठाकुर मां स्वामी जी को प्रणाम करो। यह सब कहने की उनको क्या मतलब कोई क्या आवश्यकता क्या थी? इसके बावजूद उनके भीतर में यह जो स्नेह था जननी का स्नेह ये देह संबंध शून्य असीम स्नेह वो जीव मात्र में परिव्याप्त होकर के जननी को अनुपम अध्यात्म भूमि पर उन्नत करता है। तो यह अनुपम अध्यात्म हमको स्नेह करके मुझे ऐसा लग रहा है कि यह जप करके उनकी जितनी भी आध्यात्मिक उन्नति हुई होगी उससे कहीं ज्यादा आध्यात्मिक उन्नति यह परायों के जो लड़के हैं दूसरों के जो लड़के हैं जो वहां पर खेलने के लिए आते थे उनको स्नेह पूर्वक वार्तालाप करके उनके जीवन में और ज्यादा कहीं ज्यादा आध्यात्मिक उन्नति हुई होगी।
मातृत्व का चतुर्थ सोपान
तो यह थर्ड स्टेज बता दिया गंभीरानंद जी महाराज ने और फिर कहते हैं इससे भी विरल कुछ कुछ केसेस में ऐसा होता है कि सर्वम सहा सब तरह के कष्ट सहन करके सुपवित्र स्वार्थ लेश शून्य संसार संपर्क विरहित जगत जननी कल्प देवी विशेष ऐसी देवी जो कि जगत की जननी है उसमें से जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति प्रवाहित होकर के संतान को विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादन से परितृप्त करती है। यह हमारी मां शारदा जय राम बाटी में थी। उसका परफेक्ट इसका डिस्क्रिप्शन है। जय राम भाटी में या तो फिर बाद में उद्बोधन में भी मां की अपने संतानों के साथ में जो एक जननी रूपी जो लीला थी उसका एक एक ही वाक्य में यदि आपको डिस्क्रिप्शन देना है तो एक ही वाक्य में आप यह बता सकते हैं कि सर्वम सहा सुपवित्र स्वार्थ लेश शून्य संसार संसार संपर्क विरहित जननी कल्प देवी से यह जीवंत अनुप प्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति प्रवाहित हो के संतान को विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादन से परितृप्त करती है। सेंटेंस कॉम्प्लिकेटेड है किंतु एक सेंटेंस के भीतर में मां का जय राम भाटी का जीवन मां का क्वालपाड़ा के क्वालपाड़ा के दिनों की घटनावली और उद्बोधन के दिनों की घटनावली एक ही सेंटेंस में आ जाती है। किंतु इसके साथ
मातृत्व का सर्वोच्च सोपान
में ही यहां पे गंभीरानंद जी कहते हैं कि इससे भी एक उच्च अवस्था है। मां के जीवन में जैसे कि ये संतानों के प्रति एक जो स्नेह की यह जो अवस्था थी तो मां के जीवन में साथ-साथ में ही इससे भी एक उच्च अवस्था आती है। क्या है? आमरा श्री माय जीवन जे मातृत्व परिचय ग्रहण अग्रसर होते छ हम मां के जीवन के मातृत्व के परिचय प्राप्त करने में जो आगे बढ़ रहे हैं ताहा एतद अपेक्षा ओ उच्च स्तरे जो यह परिचय इससे भी ज्यादा उच्च स्तर का है। क्या है इससे भी ज्यादा चिंता राज्य अतीत भगवत सत्ता रही अननुभूत पूर्व विकास चिंता राज्य की अतीत चिंता राज्य से भी अतीत यह भगवत सत्ता का ही अन अनुभूत पूर्व विकास है। थोड़ा सा इसकी व्याख्या करनी होगी। क्या कहना चाहते हैं? चिंता राज्य से अतीत अर्थात कि मन बुद्धि चित्त अहंकार से परे जो विश्व है तुरीय अवस्था है स्वप्न जागत सुशुक्ति यह यदि तीन को जागतिक अवस्थाएं कहते हैं तो तुरीय अवस्था है सुपरकॉन्शियस स्टेट यह हमारे मन के ये पंचमहाभूत का हमारा देह पंचप्राण पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय इससे बना हुआ देह मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार यह जितना भी हमारा यह दैहिक शक्ति जो है या तो फिर यह दैहिक हमारा अस्तित्व है इसके भीतर में यह जो चिंता राज्य है यानी यह कॉन्शियसनेस है। इससे भी परे का जो जगत है वह जगत है वह है ब्रह्म ज्ञान या तो फिर आत्म साक्षात्कार या तो फिर कहेंगे निर्वाण या तो फिर कहेंगे कि आत्मज्ञान जो भी कहे आध्यात्मिक लैंग्वेज में जिस आध्यात्मिक स्ट्रीम को हम फॉलो कर रहे हैं उस स्ट्रीम के अनुसार इसको जो भी नाम देना हो आप दे सकते हैं हम यूज करेंगे यहां पर ब्रह्म ज्ञान तो यह ब्रह्म ज्ञान के राज्य में भगवत सत्ता का ही अनभूत पूर्व विकास है। अन अनुभूत अनुभूति अर्थात कि एक्सपीरियंस अन अनुभूत अर्थात कि जो कि एक्सपीरियंस नहीं कर सकते हैं जिसको जो कि हमारे सेंसरी परसेप्शन के परे हैं। इस तरह का एक पूर्व विकास इस तरह की एक भाव का पूर्व विकास यानी कि ये ठाकुर को मां ने कहा था ना मां काली ने निर्विकल्प समाधि में वो रहे थे 21 दिन के आसपास वैसे तो मृत्यु हो सकता था किंतु मां काली ने उस मां ठाकुर को कहा तो ये भाव मुख्य था भावमुख्य थाक का अर्थ क्या है यह कॉन्शियस और यह सुपरकॉन्शियस ये सेंसरी परसेप्शन एंड एंड अ वर्ल्ड बिय्ड सेंसरी परसेप्शन। इन दोनों के बीच की यह बॉर्डर लाइन है। इस बॉर्डर लाइन पे तुम रहो। जब इच्छा होगी तब तुम आंख बंद करके जैसा ही क्षण भर के लिए भी ईश्वर चिंतन या आत्मचिंतन करोगे इंस्टेंटली निर्विकल्प समाधि में मग्न होना शुरू हो जाओगे। और यदि ठाकुर जो बार-बार यह विनती करते हैं चीनी होते चाहिए ना मां चीनी खेते चाहिए। और हमको यह भी पता है अभी कि यह जो कड़ी है गान की कड़ी वो राम प्रसाद के गानों में से यह ली गई है। ठाकुर का ओरिजिनल नहीं है। यह राम प्रसाद का है। तो क्या है कि एक तो अवस्था हो गई कि चीनी हो जाना। शुगर हो जाना। शुगर के साथ में एकाकार हो जाना। नमक की ये जो एक ये है पुतली यह नमक की पुतली को सॉल्ट डोल इसको आपने समुंदर के पानी में डाला। तो यह साल्ट की यह जो गुड़िया है वह तो पिघल जाएगी। तो वह हो गया कि आप एक आत्म ज्ञान है, आत्म अवस्था है। उसमें एकाकार हो जाते हैं। चीनी हो जाते हैं। शुगर हो जाते हैं। और एक अवस्था है कि आप चीनी खाते हैं। शुगर खाते हैं। उसका रसास्वादन करते हैं। ईश्वर और यह संतान भक्त और भगवान ऐसा एक सेपरेशन बना रहता है। तो ये सेपरेशन की वजह से भक्त क्या है? भगवान के प्रेम का ईश्वरीय प्रेम का रसास्वादन कर सकता है। तो यह जो ठाकुर की अवस्था थी वह बिल्कुल बॉर्डर लाइन पे थी। यदि चाहे तो वह चीनी हो जाएंगे। शुगर हो जाएंगे। नमक की गुड़िया बनकर के यह समुंदर में महासमुंदर में ईश्वरीय प्रेम के क्षिर सागर में जंप लगाएंगे। क्षीर सागर के साथ एकीकृत हो जाएंगे। और जब भी चाहे एक स्टेप नीचे आकर के फिर यह जो ईश्वर और भक्त और भगवान इसको लेकर के आनंद करना। यह ठाकुर कहते हैं ना कि चैतन्य देव की तीन अवस्थाएं होती थी। अंतर्दशा उस दशा में वह भगवत आनंद में तृप्त होकर के निर्विकल्प समाधि में या समाधि में रहते थे। भाव भाव समाधि में रहते थे। अर्धबाह्य अवस्था जबकि वह ईश्वर के नाम से मत्त होकर के सिंह विक्रम के साथ में नृत्य करते रहते थे और फिर है बाह्य अवस्था जिसमें कि भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे तो यह बाह्य अवस्था अर्धबाह्य अवस्था और अंतर बाह्य दशा अर्धबाह्य दशा और अंतरर्दशा तो इस तरह से यह ग्रेडेशन चलता है। यहां पे देखिए कि मां गंभीरानंद जी क्या कहते हैं। चिंता राज्य से अतीत अर्थात कि ऑलरेडी यह जो सेंसरी परसेप्शन का जगत है उससे अतीत भगवत सत्ता जो है उसका एक अन अनुभूत पूर्व विकास है। ईश्वरीय सत्ता या तो फिर यह निर्विकल्प समाधि में जाकर के जो अनुभूति होती है उसको हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते हैं। ठाकुर ने विद्यासागर को कहा था कि सब कुछ झूठा हो गया है। ब्रह्म ज्ञान झूठा नहीं हुआ है। क्यों? जितने भी यह आध्यात्मिक उपदेश है मुंह से बोले गए हैं। अर्थात कि झूठे हो गए हैं। किंतु ब्रह्म ज्ञान की अवस्था क्या है? उसको मुंह से बोला नहीं गया। क्यों? क्योंकि जो चीज जो अवस्था मन और वाणी से अतीत है उसको आप मन और वाणी से कैसे व्यक्त कर सकते हैं? तो क्या है कि इसीलिए इसको अन अनुभूत कहते हैं। अनुभूति क्या है? सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट यह दोनों का जब इंटरेक्शन होता है तो यह अनुभूति प्रकट होती है। एक्सपीरियंस क्या है? मैं आंखों से देखता हूं। कानों से सुनता हूं। नाक से उसका जो सुगंध है वह ग्रहण करता हूं। हाथों से स्पर्श करता हूं। इसी को तो हम अनुभूति कहते हैं। इसी को तो हम एक्सपीरियंस कहते हैं। मैं सब्जेक्ट हूं और यह जगत है वो ऑब्जेक्ट है। अभी इस माइक को मैंने स्पर्श किया। तो माइक है मेरे लिए ऑब्जेक्ट और यह मेरा हाथ है। वो है मैं स्वयं सब्जेक्ट। तो इसको स्पर्श करना इसको अनुभूति कहते हैं। किंतु मैं अपने को ही स्पर्श कर पाऊंगा। हाथ हाथ को स्पर्श कर पाएगा। दो उंगुलियां एक दूसरे को स्पर्श कर पाएंगी। ठीक है? किंतु यह एक उंगली है। क्या यह एक उंगली अपने को स्पर्श कर पाएगी? नहीं। स्वामी जी ने एक बड़ा ही सुंदर उदाहरण दिया था। अमेरिका में एक लड़का था। ये मोस्ट प्रोबेबबली यह रिजली मैनर के दिनों की ही बात है। स्वामी जी की सेकंड विजिट की। वो लड़के का नाम मोस्ट प्रोबेबबली था होलिस्टर। तो जो भी है उसको स्वामी जी एक बार समझा रहे हैं कि अभी अद्वैत तत्व अमेरिका के एक लड़के को समझाना कितना कठिन है। जनरली ईश्वर को हम एज ए ऑब्जेक्ट के रूप में ही देखते हैं। द्वैत वेदांत जो है या तो द्वैत भाव है। यह द्वैत भाव जगत के सभी धर्मों में व्यापृत है। एक है भगवान, एक हूं मैं। भगवान की आराधना करना मेरा धर्म है। भगवान की आराधना करने से भगवान मुझे आशीर्वाद देंगे। तो यह एक यूनिवर्सल कांसेप्ट है। इस तरह के यूनिवर्सल कांसेप्ट में बड़े हुए लड़के को यह कहना कि मैं ही भगवान हूं। तो वह तो इसको ब्लासफेमी के रूप में ले लेगा। तो इसको बड़े ही सूक्ष्म रूप से समझाना होगा। अद्वैत तत्व। तो स्वामी जी क्या कहते हैं इस लड़के को कि पता है तुमको कि भगवान हमारे कितने करीब है। इतने करीब है जैसे कि मेरी आंख मेरे करीब है। ये इतनी पास में है मेरी आंख कि यह मेरा ही एक अंग है। इससे मैं थोड़ा सा भी रत्ती भर सेपरेशन नहीं है। किंतु मुझे यदि मेरी अपनी खुद की आंख देखनी होगी तो क्या मैं देख पाऊंगा? नहीं देख पाऊंगा। आंख आंख को कैसे देखेगी? आंखों की बद मदद से आंख से तो हम पूरे विश्व को देखते हैं। आंख ही क्या आंख को देख पाएगी? ऐसा भी क्या संभव है? तो यह तो संभव नहीं। किंतु आईने में यदि देखोगे तो तुमको अपना अपनी आंख का एक रिफ्लेक्शन दिखाई देगा। अर्थात कि यह जो ईश्वर कल्प महापुरुष जो होते हैं अवतार पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करते हैं वह चाहे जीसस हो ना कि श्री रामकृष्ण इनके भीतर में हमको हमारी खुद की जो हमारा जो स्वयं का एक स्वरूप क्या है उसकी एक प्रतिछी उसका एक प्रतिबिंब उनके भीतर में दिखाई देता है। श्री रामकृष्ण को इस तरह से नहीं देख करके कि एक बहुत बड़े अवतार है जो कि शुद्धि और प्रेम पवित्रता से भरपूर है। इस तरह से देखिए कि वह मेरा ही स्वरूप है। मेरा ही शुद्ध विकसित स्वरूप है। आज यदि मैं साधना करके ईश्वरीय तत्व को प्राप्त करूंगा तो मैं रामकृष्णमय ही हो जाऊंगा। उसके बाद में उनमें और मेरी अनुभूति में कोई डिफरेंस नहीं रहेगा। यानी कि श्री रामकृष्ण या तो जीसस या अवतार एक आईना मात्र है। वह हमसे अलग नहीं है। हमारा ही एक रिफ्लेक्शन है। उपनिषद की वो प्रसिद्ध कहानी कि एक पक्षी जमीन पर खड़ा है। बैठा है और यह वृक्ष की उच्च डालियों पे देखता है कि और यह वृद्ध पक्षी नीचे में बैठा है और ऊपर में एक युवा उसके पंख जो है सुवर्णमय पंख रूपी एक सुंदर पक्षी को देखता है तो यह वृद्ध पक्षी सोचता है कि क्यों नहीं जाकर के उसके साथ में बात की जाए तो जंप लगा के ऊपर की डाली तक जाता है तो जैसे ही ऊपर की डाली तक जाता है देखता है उसके यह जो मलिन पंख थे उनमें जैसे कि जीवन का संचार हो रहा है। उसकी वृद्धावस्था धीरे-धीरे करके युवानी की ओर आ रही है। जैसे कि वह टाइम मशीन में बैठकर के रिवर्स जा रहा हो ऐसा लग रहा है। तो जितनी भी डाल पर जंप लगाता है उतनी ही डाल वो टाइम मशीन में बैठकर के और ज्यादा से ज्यादा युवान हो रहा है। ऐसा उसको लग रहा है। जब सर्वोच्च डाली तक पहुंच गया। दूसरे पक्षी की ओर देखा तो पता चला दूसरा पक्षी अदृश्य हो गया है। वही वहां पर बैठा है। उसी के यह सुनहरे पंख है। वही इतना खूबसूरत दिख रहा है। वही यंग है। तो क्या है कि देखिए यह जो हम ईश्वर को या और किसी भी चीज को ईश्वरीय सत्ता को देखते हैं। एक्चुअली हमारा ही प्रतिबिंब है। ऐसा कोई हमसे अलग नहीं है। बस वही बात है कि हमारे भीतर में हमारे ऊपर में अज्ञान का आवरण है। इस अज्ञान के आवरण को जैसे ही हम हटा देंगे श्री रामकृष्ण के साथ में, ब्रह्मन के साथ में, आत्मन के साथ में इनके साथ में हम एकाकार हो जाएंगे, एकीकृत हो जाएंगे। तो फिर जैसे कि यह नमक की गुड़िया जैसे ही क्षीर समुंदर में डाली तो कैसे उसके साथ में वह एकीकृत हो जाती है तो वैसा ही हमारा होगा। तो यहां पर जो कहते हैं कि उस भगवत सत्ता का ही चिंता राज्य से अतीत भगवत सत्ता का ही अन अनुभूत इन जिसको कि हम एक्सपीरियंस नहीं कर सकते हैं। इसका ही एक पूर्व आभास है। पूर्व आभास क्यों कहा है? पूर्व विकास क्यों कहा है? क्योंकि यदि इसका संपूर्ण विकास हो जाता ईश्वरीय ज्ञान में संपूर्ण रूप से विलीन हो जाते तो फिर क्या है कि यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट ऐसा कुछ रहेगा ही नहीं। ये अष्टावक्र जब राजा जनक के पास में जाते हैं ना शुखदेव शुखदेव जब राजा जनक के पास जाते हैं मन में संदेह है कि पिताजी ने उनको सब कुछ सिखाया है कि नहीं? यह ब्रह्म ज्ञान सिखाया है कि नहीं? ये भगवान व्यास ने तो राजा जनक के पास जाते हैं। तो जनक क्या कहता है? सर्वप्रथम आपको गुरु दक्षिणा देनी होगी। तो ये सुखदेव कहते हैं कि गुरु दक्षिणा मैं क्यों दूंगा? जनरली तो कन्वेंशन ऐसा है कि पहले आप मुझे ज्ञान दीजिए बाद में मैं आपको दक्षिणा दूंगा। तो जनक कहते हैं कि यदि तुमको ब्रह्म ज्ञान मिल गया तो फिर गुरु कौन और शिष्य कौन? सब तो एकीकृत हो जाएंगे। तो यहां पे भी भगवत सत्ता का ही एक अन अनुभूत पूर्व विकास है। संपूर्ण विकास हो गया। और यदि मां ब्रह्म ज्ञान में मर्ज हो गई तो फिर संतान कौन और जननी कौन? इसलिए एक स्टेज नीचे रहकर के भगवत सत्ता का एक पूर्व विकास के रूप में मां का यह प्रेम पूरे विश्व में सचराचर में व्याप्त हो रहा है। यह जैसे कि देखिए अर्धबाह्य दशा ठाकुर जिसका वर्णन करते हैं। अर्धबाह्य दशा में आकर के ठाकुर जो उदाम नृत्य करते थे। उससे कितने लोग प्रभावित हो जाते थे। लोग कहते थे कि देखिए ठाकुर के भीतर में यह आध्यात्मिकता जैसे कि बिजली की तरह चमकती है। ये मास्टर महाशय जब ठाकुर के नृत्य का उद्दाम नृत्य का वर्णन करते हैं तब कहते हैं कि सिंह विक्रम के साथ में जैसे कि उनका देह पूरा एक हड्डी पसली का नहीं दे ये मांस का नहीं पंचमहाभूत का नहीं जैसे कि तरल भाव का देह बना हो यह शरद महाराज इस तरह से वर्णन करते हैं लीला प्रसंग में जब ठाकुर का नृत्य उन्होंने देखा था तब जैसे तरल भाव से ठाकुर का देह बना हो। इस तरह से ठाकुर नृत्य कर रहे थे। तो वो ठाकुर की अर्धबाह्य दशा का एक्स एक्सप्रेशन था कि किस तरह से यह अर्धबाह्य दशा एक्सप्रेस होती है। मैनिफेस्ट होती है। मां के जीवन में इस तरह से अपने संतानों के प्रति जो जननी भाव है इस इस रूप में इस भाव में यह अर्धबाह्य दशा मैनिफेस्ट होती है। यदि यह भ यह जो अह चिंता यह जो सेंसरी परसेप्शन है, सेंसरी परसेप्शन के परे जाकर के यदि यह भगवत भाव है, उसका जो पूर्व विकास है, पूर्ण विकास है। उसमें यदि मां उस स्टेज में चली जाएगी तो जैसे कि अंतर्दशा में चली जाएगी तो अंतरर्दशा एक ही तरह की होती है कि वह सभी के साथ में जैसे कि ईश्वर के साथ में या तो ब्रह्मन के साथ में एकीकृत हो जाएंगी। किंतु यह जो अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा यह जो दो दशाएं हैं वह ठाकुर से डिफर होती है। ठाकुर अर्धबाह्य दशा में उद्दाम नृत्य कीर्तन करते हैं। जबकि मां मां की अर्धबाह्य दशा जब होती है तो वो अर्धबाह्य दशा संतानों के प्रति प्रेम के रूप में वो फैलती है। और ठाकुर की जो बाह्य दशा है जिसमें कि वह ठाकुर सबके साथ में वार्तालाप करते हैं। मां की जो बाह्य दशा है संतानों के साथ में वार्तालाप करती है। संतानों के साथ में संतानों के प्रति उनका यह स्नेह प्रकट होता है। उनके लिए खाना बना देती है। उनकी इतनी केयर करती है। यह सब कुछ मां जैसे कि बाह्य दशा में करती है। तो यहां पर भी यह महाराज जी कहते हैं कि मां का जो मातृत्व का परिचय है वो ये जो चार स्टेज ऑलरेडी बता दिए गए हैं। ये चार में से यह तृतीय स्टेज था। उसको यदि मां की बाह्य दशा कहे तो यह जो अर्ध बाह्य दशा जो थी यह पंचम स्टेज में फिफ्थ स्टेज में आती है। यह है चिंता राज्य के भी अतीत जाकर के भगवत सत्ता की ही अन अनुभूति का पूर्व विकास। यानी कि अर्धबाह्य दशा में संतानों के साथ में मां का स्नेह, संतानों के प्रति मां का प्रेम। बहुत बार देखिए यह बात किसने कही थी मैं भूल गया। मैं तुरियनंद जी ने कि त्रिगुणातीनंद जी ने कि किसी ने कहा कि मां को तो हम समाधि वगैरह में तो जाते देखते ही नहीं है। तो इन्होंने क्या रिप्लाई दिया कि मां का जो मन है ये कंठ जो देश है यानी कि अनाहत विशुद्ध आज्ञा यह जो तीन चक्र है तो विशुद्ध चक्र के नीचे मां का मन आता ही नहीं है। ऑलरेडी वह आधार वो अर्धबाह्य दशा में ही रहती है। किंतु मां की ये जो भाव छुपाने की क्षमता इतनी प्रचंड थी कि बाहर से पता ही नहीं चलेगा कि मां ये अर्धबाह्य दशा में है। जैसे कि ठाकुर ने खुद ने उदाहरण दिया कि एक छोटा सा तालाब है। उसमें यदि हाथी प्रवेश करता है तो तालाब में कितना ही तरंग उठेगा, कितना पानी चारों ओर यह बिखर जाएगा, वह फैल जाएगा, वह छलक जाएगा। किंतु एक महासमुंदर है। उसमें एक हाथी प्रवेश करता है तो पता ही नहीं चलेगा। महासमुंदर की सतह पर मुश्किल से एक दो रिपल मात्र दिखाई देगी। तो मां का मन भी इस तरह से महासागर रूपी है। अर्धबाह्य दशा रूपी हस्ती भी यदि उसमें प्रवेश कर जाए तो बाहर से एक दो रिपल के अलावा और कुछ दिखने वाला नहीं है।
माँ के मातृत्व के क्रमशः विकसित सोपान
आगे क्या कहते हैं महाराज? किंतु जागतिक दृष्टि ते से विकाश मध्य एकटा स्तर विभाग आ किंतु जागतिक दृष्टि से यानी कि हमारी दृष्टि से मां का यह मातृत्व का जो विकास हुआ उसमें कुछ-कुछ स्टेजेस है स्तर विकास है स्टेप्स है प्रति स्तरे विशेष अभिव्यक्ति मर्म बुझते होले आमादग के सर्वदा ओ उच्च तत्व कथा हृदय जागरूक राइबे एवं उहार आलोक संपाते ए क्रम बिका सोपान श्रेणी आरोहण करते होबे प्रत्येक स्तर का यह जितने भी स्टेजेस का यहां पर विवरण दिया गया है इस विवरण में प्रत्येक स्टेजेस जो है उसकी एक विशेष अभिव्यक्ति है और इस विशेष अभिव्यक्ति का जो गहन अर्थ है उसको समझने के लिए हमको हमेशा वह जो सर्वोच्च सत्ता जो है फिफ्थ स्टेज जो है उसके बारे में हमको जागरूक रहना होगा। उसके बारे में हमको अलर्ट रहना होगा और उसी के आलोक में उसी के प्रकाश में हम यह जितने भी स्टेजेस है ये स्टेजेस के माध्यम से क्रम विकाशेर सोपान श्रेणी आरोहण करते होबे क्रम विकास की जो सोपान श्रेणी है ये इवोल्यूशन के स्टेजेस है उसको हमको क्लाइंब करना होगा आरोहण करना होगा अर्थात कि उसमें उठना होगा क्लाइम करना होगा अब जितने भी स्टेजेस का वर्णन हुआ। एक स्टेज में से दूसरा स्टेज, दूसरे में से तीसरा, तीसरे में से चौथा, चौथे में से पांचवा। ये जितने भी स्टेजेस हम क्लाइम करते हैं, क्रम विकास की सोपान श्रेणी हम आरोहण करते हैं। इस सबको हमको यह जो फिफ्थ हाईएस्ट स्टेज है, उसी के प्रकाश में करने होंगे। अभी इसका क्या अर्थ है और इसके बाद में गंभीरानंद जी इसकी किस तरह से व्याख्या करते हैं यह अभी हम देखेंगे अपने नेक्स्ट क्लास में आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु