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ओम स्थापतये धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप ने अवतार वंश आया रामकृष्ण यतीम अच्छा है हम लोग जी तरह से करते हैं एक सप्ताह कथमरोध एक सप्ताह मां की बात यह माताजी ने तो जिससे क्या होता है की हमको वह विद्या भी मिल जाता है विषय में और दूसरी बात होती है की ठाकुर और मां और स्वामी जी ये सब तो तीनों मिलकर के एक ही बात का रहे हैं किंतु विभिन्न त्रिकोण से तो कौन-कौन से विभिन्न रूप है जिससे की एक ही बात ये तीनों दोहराते हैं वो प्रसाद में पढ़ने का हमको एक आनंद भी मिलता है और एक इंटेलेक्चुअल अंडरस्टैंडिंग भी हमारा डिपर होता है जैसे की एक एक छोटा सा एग्जांपल की ठाकुर ने क्या किया पैसे पत्थर है पैसे पत्थर है ऐसा बोलकर के कुछ पैसों को गंगा नदी में भा दिए और मां उसकी मां क्या करती थी मां को चली कोई दक्षिण देता था मां को कोई प्रणामी देता था है तो मां अपने सर पर लगाकर के वह जो बॉक्स था जिम वो पैसा रखते थे उसमें रखती थी तो मां की दृष्टि से मां को पता है की मुझे तो संसार चलाना है ये सब वो राधु मां को नलिनी वो एक छोटी मानी वगैरा को भरण पोषण तो मां को ही करना है उनको तो देखने वाला और कोई था मां के संसार में इतने भक्ति आते हैं सब साधु ब्रह्मचारी लोग मां के साथ में रहते हैं सबके खाने-पीने की व्यवस्था मां को करनी है तो पैसों को पैसा मिट्टी है पैसा पत्थर है ऐसा बोल के फेक देने से कैसे चलेगा तो ये दोनों का जो अभीगम है ये अभी आप ऐसा नहीं का सकते की ठाकुर के ठाकुर को पैसे की प्रति लाभ नहीं था मुख नहीं था किंतु मां को था ऐसा हम कभी भी नहीं का सकते किंतु यह जो उनके भीतर का जो भाव है ईश्वर समर्पण या तो ईश्वर की और दृष्टि घमंड करता हुआ उनका मां एक ही चीज को विभिन्न परीक्षण में किस तरह से देखा है वह हमको यह जो छोटी घटनाओं से पता चला है क्योंकि आपको तो पैसे अपने लिए नहीं चाहिए संसार विद्या का संसार उसको चलने के लिए चाहिए ठाकुर ने कहा है दो तरह के संसार है एक तो विद्या का अनुसार एक अविद्या का संसार अविद्या का संसार अर्थात की वो फैमिली या तो वो कम्युनिटी जिसका उद्देश्य पैसे प्राप्त करना है जिसका उद्देश्य धन संग्रह करना है और विद्या का संसार अर्थ उसे तरह का संसार जिसका उद्देश्य है ईश्वर प्रताप ईश्वर समर्पण साधन भजन में नियमित लगे रहना और किसी भी तरह का सत्संग यात्रा वगैरा इस चीजों में जीवन को यापन करना तो विद्या के संसार के निभाओ के लिए थोड़ा बहुत पैसा चाहिए मास्टर महाशय ने ठाकुर को पूछ रहा था की क्या मैं इस तरह से चेष्टा कर सकता हूं की अच्छा तो सबसे पहले तो मैं जो वो पैसा कामता हूं उसमें क्या बड़ा कुछ नहीं किया तो ठाकुर कहते हैं नहीं विद्या के संसार के लिए पैसा कामना अदर वाइस तुम संसार कैसे चलाओगे उसमें कोई गलत नहीं है उसे कर सकता हूं ऐसा कोई तरीका जिससे की मैं पैसा और काम सुकून उन्हें मैं प्रमोशन हो या पैसे ज्यादा मिले ऐसा कुछ कर सकता हूं तो ठाकुर ने कहा नैतिक तरीके से हो सकता है तो अवश्य कर सकते हैं तो ठाकुर की दृष्टि से सन्यासी की दृष्टि से जब आप के जगत का त्याग करके एक मंत्र ईश्वर को सहायक रूप समझ कर के अपने जीवन को संपूर्ण रूप से साधन भजन में डूबो देना चाहते हैं तब पैसों का कोई महत्व नहीं होता तब पैसा पास में रखना की भी जरूर नहीं होती वो स्वामी जी का है की एक बार वो जा रहे थे जंगल में देखा की खाने पीने की कुछ है नहीं तो स्वामी जी ने सोचा मैं ये सब चिंता क्यों करूं अपेक्षा कहां से मिलेगी वगैरा मैं तो सन्यासी हूं मैं यहां पे बैठ जाता हूं एक जगह पे फिर जो की मुझे मिलेगा तो खाऊंगा जल्दी कुछ खाने को नहीं मिलेगा तो बस और भूख से ही शरीर त्याग हो जाएगा ईश्वर का नाम लेते लेते बोल करके एक पेड़ के नीचे बैठ गए थोड़ी क्लियर हुआ की वह राजस्थान में के कहानी पे थे एक सेठ आया बहुत साड़ी मिठाई मेवा वगैरा लेकर गया अच्छे से खाने की चीज लाकर के स्वामी जी के सामने रख दी तो जो संज्ञा सी है जिसने की अपना संपूर्ण भर ईश्वर को दे दिया है या तो आत्मा साक्षात्कार के लिए अपने जीवन का संपूर्ण रूप से उत्सर्ग किया है उनके लिए पैसा मिट्टी के बराबर है किंतु मां जी तरह से संसार का मोहन करना है संसार की जवाबदारी है विद्यार्थी के संसार की उनके लिए पैसा वो एक इंपॉर्टेंट चीज इंपॉर्टेंट चीज नहीं है वो एक साधन मंत्र है संसार के निभाओ के लिए और ये सच में ये भी एक बात है की जब ठाकुर ने और पैसा पत्थर है ऐसा बोलकर के जब गंगा नदी में भा दिए फिर उनको थोड़ा सा डर लगा की क्या मां लक्ष्मी उनके ऊपर नाराज हो जाएगी ठाकुर को जो वो सैलरी मिलता था जिसमें से उनको उनका जीवन निर्वाह चला था वह जल्दी लक्ष्मी बैंड कर देगी तो क्या होगा फिर कहानी जाकर के उन्होंने मां को प्रार्थना की थी की हां मां मैं आपको नाराज नहीं करना चाहता तो यह ठाकुर भी एक तरह से प्रैक्टिकल थे हम लोग पुरी कहानी शायद पुरी सब समय बोलते नहीं है यार बताते नहीं है किंतु पुरी कहानी पढ़ने से पता चला है की ठाकुर भी वैसे प्रैक्टिकल कितने थे तो यहां पर ऐसे ही है पहले हम आप उसकी बातें करते हैं साथ में माटी तो गंभीर आनंद जी द्वारा लिखित इस पुस्तक में हमने ऑलरेडी थोड़ा सा पाठ किया है मैं थोड़ा सा दोरा देता हूं महाराज जी जी तरह से लिखने हैं की पुरातन कल में पुराण युग में मां जगदंबा का अवतरण होता था शक्ति के रूप में अवतार के साथ में नई बेहद धरण करके मां का अवतरण होता था शत्रु विनाश के लिए अरिशुंद्रक के लिए क्यों क्योंकि जब ये असुर है वो पृथ्वी पे भारत स्वरूप बन जाते थे साधुओं संतो की साधना में वाइन प्रकट करते थे और पूरे धर्म का फैलाव करते थे धर्म का प्रचार करते थे तब उनका सहर तो मां को ही करना पड़ेगा बोलकर के मां पृथ्वी पर आई थी किंतु अभी महाराज हमको पूछते हैं की मां शारदा जी स्वरूप में आई सौम्या स्वरूप में आशीर्वाद लेकर के नहीं की अस्त्र लेकर के तो यह रूप जो है इसमें क्या कुछ गलत है की यह भी शास्त्र सहमत ही है तो महाराज कहते हैं की असुर या तो रक्षा दो तरह के होते हैं एक तो बाहर के जगत में जो की पृथ्वी पे विनाश फ्लेट हैं अंतर जगत के जो की हमारा मैच जाता है हमारे मां में कम क्रोध मैड लोग मो जी तरह की और आशापुरी प्रवृत्तियां है उनका उद्धव जो होता है उसका सुधार करने के लिए मां इस बार मां शारदा के रूप में सौम्या स्वरूप धरण करके आशीर्वाद लेकर के पृथ्वी पर आई है और उनकी बटन को पढ़ते हमारे मां को सुकून मिलता है जैसे मैं रेगुलरली मां की किताबें ट्रांसलेट करता राहत हूं तो इसमें निशानानंद जी का मातृसली दिए है मेयर बाढ़ प्रत बोल करके एक किताब है आप सब ने शायद बड़ी ही होगी फिर श्री मां और जय राम बाटी है फिर आशुतोष मित्र द्वारा लिखित श्री मां बोल करके एक किताब है फिर श्री श्री मेयर कथा गुजराती में वैसे ट्रांसलेट हो गई है किंतु वह उसका एडिशन जो है वह आउट ऑफ प्रिंट है और उसको हम पूरा रिवाइज कर रहे हैं तो ऐसा करके हमें चार-पां की किताबें के ऊपर में एक साथ में कम करता हूं तो मां की बातें जो पढ़ना हूं तो मां में इतना मतलब एक आनंद आता है एक ऐसा शांति जैसा एक भाव आता है हम लोग जैसे साथ-साथ में ही हमारे यहां पे शास्त्रों का ट्रांसलेशन भी होता है शंकर भविष्य आपको यदि पता हो तो उपनिषद के ऊपर में शंकराचार्य ने अपना बादशाह लिखा था तो भाष्यम में सब समय एक बहुत ही डिफिकल्ट फिलोसॉफिकल शब्दों का उसमें आता है और उसके ऊपर में हमको सोचना पड़ता है की अच्छा यह अक्षर ब्रह्म क्या है फिर ये करण ब्रह्म क्या है ये करण आत्मक ब्रह्म क्या है करण ब्रह्म और करण आत्मक ब्रह्म में क्या डिफरेंस है तो करण ब्रह्मा है की जो जगत का करण है करण एट ब्रह्मा है जो जगत को उत्पन्न करने वाला करण है उसको वो उसका वो करण है इस तरह से वो डिफिकल्ट शब्द आते हैं उसको मतलब समझना के लिए की हमारा मां इस तरह से चक्र जाता है तो मैं सोचता हूं की देखिए यह शास्त्रों को बताया गया है की प्रस्थानता एक भाग है प्रस्थानत रहे अर्थात हमारे हिंदू धर्म का फाउंडेशन ये उपनिषद गीता और ब्रह्म सूत्र ये तीनों को पढ़ने से हमको हिंदू धर्म का फाउंडेशन क्या फाउंडेशन क्या है हिंदू धर्म क्या है समझ में आता है किंतु जी तरह से इन शास्त्रों की हम लोग चर्चा करते हैं वो इतना रुख सुख है इतना ड्राई है इतना ही ज्यादा इंटेलेक्चुअल ट्विस्टेड है की उससे हमारे मां को संतोष नहीं मिलता हमारे मां में ये जो साधन भजन की और साधन राज्य में हमको अग्रसर होना है उससे उसका कोई यह नहीं है वास्ता नहीं है ज्ञान योग में आप इस तरह की मेथड है की हम ब्राह्मणी तत्वमसि या तो फिर प्रज्ञानंम ब्रह्म इस तरह से हम लोग महावतया दोरा करके उसका स्मरण मनन विधि से आसन करके चिंतन मनन करके हमको यह सोचते रहना है की मैं शरीर नहीं हूं मां नहीं हूं बुद्धि नहीं चित नहीं अहंकार नहीं कुछ नहीं मैं तो हूं इन सबके पैर अनंत शाश्वत अमर ऐसा सोचते रहना है क्योंकि सोने से तो कुछ अपने ही होने वाला है जब ये पुरूतियां हमारे पे हमला करेगी तब वैसे में जब तक मैं शांत बैठा हूं तब तक इस तरह का चिंतन बढ़िया सा चला है किंतु जब पूर्तियों का हमला होगा तब इसके सामने ये महाभारत के चिंतन किसी कम का नहीं वो कम का होता यदि हम 25 साल पहले ब्रह्मचर्य कम से गुजरते हैं उसके बाद में बच्चे उसके बाद में याद गृहस्ती आश्रम मिल जाएंगे ना की सन्यास विद्यालय किंतु पहले 25 साल हमको ब्रह्मचर्य श्रम की जो विधियां है जो नियम है तो इस तरह से ब्रह्मचारी आश्रम हमारे शास्त्रों में बताया गया है हम यदि इस तरह से पूरा अध्ययन करते हैं तो हमारा बिल पावर इतना स्ट्रांग होता है की महावाक्य हमको पूर्तियों से बच्चा लेते हैं किंतु आजकल का जो स्टूडेंट लाइफ है वो इतना लेट से वो इतना इनविजिबल है वो इतना बड़ा नहीं है ये सब एटलिस्ट मेरे जमाने में तो बहुत ही संयम में हम लोग रहते थे आजकल की जब से ये मोबाइल इंटरनेट आया है तब की तो बात ही अलग है मैं जब छोटा था तब तो फिर भी स्कूल में विद्यार्थियों में काफी सही हम था काफी डिसिप्लिन था किंतु वो बेसिकली इनफ नहीं है की महावतया के सहारे हम हमारी पूर्तियों का सामना कर पे वो वृत्तियों का सामना करना है तो मां की बातें ठाकुर की बातें स्वामी जी की बातें उनके प्रसंग उनके मधुर ये सब संस्मरण उनका चिंतन करना होगा और वो चिंतन जो है हमको खूबसूरतीयों से बचाएगा आज के जमाने में क्योंकि क्यों क्योंकि ठाकुर कहते हैं की अंदर हमारा जो बिल पावर है वो इतना वीक है मैंने स्वामी जी कहते हैं ना की कल ठाकुर कहते हैं कोलकाता से जा रहा हूं देखा की सभी निम्न दृष्टि सभी की दृष्टि पेट की और है क्या खाऊंगा क्या पियूंगा मैंने ऐसा नहीं है की वो लोग पेट की और देखते हुए चलते हैं किंतु उनका जो मनोभाव है वह वही है की मैं किस तरह मटेरियल प्रताप कुछ करो मेरा मटेरियल प्रोग्रेस किस तरह से हो वही लोग देखते रहते हैं सोचते रहते हैं स्पिरिचुअल प्रोग्रेस के बड़े में एक बड़े कलकत्ता शहर में सोने वाले सुनने वाले कुछ करने वाले मुट्ठी भर होंगे तो ये उन लोगों का एक्सपीरियंस था वो आज भी सही है इसलिए हमने ये ब्रह्मचर्य श्रम की पुरी पद्धति उसको हमने पूरा किया है उसको छोड़ दिया है तो इस उम्र में 25 साल के बाद में यदि हम ज्यादातर लोगों का ऐसा ही होता है बंगाल की बात अलग है की वहां पे तो ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में बचपन से लोग पढ़ने हैं किंतु गुजरात वगैरा हम लोग इतना बचपन से फरमाइश के बड़े में बड़ा भी होगा तो इतनी श्रद्धा भक्ति नहीं आई होगी तो हमारे लिए 25 साल के बाद में ही 20 साल के बाद में ही ये धार्मिक जीवन शुरू होता है जब हम लोग थोड़े से मैच्योर होते हैं तो फोन मेच्योरिटी के बाद में वो हरि संघार करना है भीतर के शत्रुओं का अविनाश तो उसको करने के लिए स्मृति कथाएं ही हमारा एक मात्रव्यापन है हम जब चाहे जैसे चाहे अपने मां को चारों और जो बिखरा हुआ है फैट करके पकड़ करके संयम में नहीं ला पाएंगे जब भी चाहे मां को एकाग्र करके बाकी सब विषयों का चिंतन बैंड नहीं कर पाएंगे हमारे लिए एक ही चीज सर्वश्रेष्ठ है की स्मृति कथाओ का पाठ करते जाना और सही में मैंने खुद के जीवन में पाया है देखा है की जितना मैं स्मृति कथा पढ़ना हूं उतना ही मुझे इस तरह से आनंद मिलता है की जैसे लगता है की इसी के बेस पर मैं अपना जीवन बना दूंगा मुझे और कुछ एक्स्ट्रा करने की जरूर नहीं पड़ेगी ये कहता है की काली में सिर्फ नाम जब चपात सिद्धि ही जपत सिद्धि ही जाप तो सिद्धि ही मां कहती है तो साथ-साथ में हम लोग ये भी एक बात जोड़ सकते हैं स्मृति कथा उसे वो जब जितना कम करता है उससे भी महान है उससे भी ज्यादा इफेक्टिव है यह सब स्मृति कथाएं जितना मैं मां लीजिए एक घंटा जाप करता हूं एक एक मां को एकाग्र करके उससे जो मुझे स्पिरिचुअल बेनिफिट होना है उससे कहानी ज्यादा बेनिफिट है उससे कहानी ज्यादा पावर ये जड़ में एक घंटा स्मृति कथाएं पढ़ना हूं तो उसमें मुझे मिलेगा तो ये मां की बातें मां की स्मृति कथा यही है आज का हमारा वेपन आज का हमारा अस्त्र ये भीतर के सत्र का विनाश करने के लिए तो यहां तक हमने देखा था अभी आगे पढ़ने हैं महाराज जी लिखने हैं विजय दी प्रकार है मैन विजय जो है ये भीतर के सत्र के ऊपर में या तो किसी भी तरह के शत्रुओं के ऊपर में विजय दो तरह से हो सकता है प्रथम कमतर प्रयोग के पपौिर्धन सबसे पहले है शक्ति का उपयोग करके जो शत्रु है उसका विनाश जो की पौराणिक युग में होता था द्वितीय दूसरा है सदगुण राशि चमत्कारी ट्वीट द्वारा शत्रु चित्तो आकर्षण पूर्वक अष्ट के शातिर परिवर्तित्व दूसरा है सदगुण राशि इनके जो उनका भालोबासा इन लोगों का स्नेहा था हमारे ऊपर में ठाकुरमार स्वामी जी का उनकी जो करुणा थी इसकी वजह से सदगुण राशि उसका जो चमत्कार होता है चमत्कार वो सुदर्शन चक्र कहते हैं वो भी एक चमत्कार है ब्रह्मास्त्र जो फेंका जाता है वो भी एक चमत्कार है और जगत के प्रति सत्र के प्रति करुणा उसको प्रसारित करना वो भी एक चमत्कार है तो वो जी तरह से सुदर्शन चक्र का चमत्कार था तो वैसे ही ये सदगुण राशि के चमत्कार से शत्रु का चित आकर्षण करके असत को सातवें परिवर्तित करना यदि स्वामी जी की ही बात आप देखिए भारत में भारत में हम को ठाकुर्मा स्वामी जी अपने स्नेहा बंधन में बैंड है वो तो चलो समझ सकते हैं की हम लोग वैसे ही कुछ कुछ भारतीय संत भारतीय धर्म साहित्य के ऊपर में अपना श्रद्धा भक्ति पहले से ही है किंतु उसे समय तो भारत गुलाम था और यह अमेरिकन और ब्रिटिश ये पूरा यूरोप जो है यह गुलाम देश को किस तरह से वो निम्न दृष्टि से टच दृष्टि से देखते हैं किस तरह से इनके ऊपर में उनका एक धिक्कार होता है तो वही ये भारत के ऊपर में राज्य करने वाले अमेरिका और ब्रिटेन में स्वामी जी गए और स्वामी जी के जो सद्गुरु थे उससे आकर्षित हो करके ब्रिटेन में निवेदिता है मिस्टर और मिसेज सेवियर है अमेरिका में मिसेज हॉलीवुड है जो सिर्फ मैं क्लाउड है मिड सिस्टर ही लोग स्वामी जी के अनुयाई हुए और स्वामी जी के वेदांत प्रचार प्रसार में उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन में उनकी सहायता की हम जब अमेरिका की स्मृति कथाएं पढ़ने हैं तब हमको सही में आश्चर्य होता है की ये लोग जब स्वामी जी का प्रवचन सुनते होंगे तब स्वामी जी को भगवान की तरह देखते थे उनकी स्मृति कथाएं पढ़ने से समझ में आता है किंतु जैसे ही वो प्रवचन सुनकर के बाहर निकलेंगे वैसे ही वो एक किस तरह का एक भयानक आक्रमण इनके ऊपर में शुरू हो जाएगा ये भक्तों के ऊपर में स्वामी जी के अनुयायियों के ऊपर में जहां पे भी देखेंगे भारत के प्रति कटुवाद कटु कोई कटाक्ष पूर्ण वाक्य या भारत की निंदा वहां के न्यूज़पेपर में वहां के मिशनर्ययों द्वारा वहां के पॉलीटिशियन द्वारा और एक पूरा माहौल जो बना हुआ है की भारत गुलाम देश है भारत की संस्कृति किसी कम की नहीं है भारतीय धर्म जो है वो पूरा करप्ट है वहां सती जो पत्नी जो है उसका पति का देहांत हो जाएगा तो पति की चिता में पत्नी को भी जोर जबरदस्ती दाल दिया जाता है ये इस बहुत सारे उदाहरण वहां के न्यूज़पेपर कटिंग्स में मैंने देखें हैं एक महिला है वो एक मां है अपने बच्चे को फेक देती है कार्टून है इस तरह का वो मगरमच्छ मुख खोल करके बैठा है और छोटा बच्चा मगरमच्छ के मुंह में चला जाता है क्यों क्योंकि जितनी भी लड़कियां हैं उनका जन्म होते ही उनको मार दिया जाता है इस तरह से कितने ही ब्रह्मात्मक गलत गलत विवरण भारत के बड़े में अमेरिका के पेपर में ब्रिटेन के पेपर में प्रकाशित होते थे वह सब पढ़ कर के वह सब सुनकर के बाद में स्वामी जी को मिलने के लिए आना वही भारत देश का प्रतिनिधि और इनके प्रति ईश्वर की तरह उनको सम्मान देना ये दोनों जो विरोधाभास है वो अमेरिका के अनुयायियों के मां में किस तरह से होता है हमारे मां में तो ऐसा नहीं है हम तो आज यह सत्संग समाप्त करेंगे या तो फिर आप यदि मंदिर में आते हैं आश्रम में आते हैं ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में अच्छी बात सुनते हैं और फिर जब आश्रम से घर जाएंगे तो ऐसा नहीं है की ठाकुरमार स्वामी जी या तो फिर हिंदू धर्म या तो फिर भारत के संतो के विरोध में कोई बहुत गलत गलत बातें फैलती हो हां आजकल के न्यूज़पेपर में आ पैसा कमाने के लिए किसी भी साधु का कोई भी छोटा सा घोटाला है बड़ा करके दिखाए जाता है वो है किंतु अपने मां अमेरिका में उसे समय 18th 19th सेंचुरी में जी तरह का भारत के प्रति घृणा का भाव प्रगति होता था यहां आज इस तरह से प्रकाश मतलब बाहर में कोई जाहिर नहीं करेगा किसी के मां में होगा किंतु पता है की यहां जब भारत में यह हिंदू सरकार है हिंदू लोगों की सरकार है गवर्नमेंट है तो इस तरह से खुलेआम हिंदू धर्म को हिंदू संस्कृति को गली आप नहीं दे सकते हैं हिंदू संस्कृति को आप क्रिटिसाइज नहीं कर सकते तो हमारे लिए कोई बहुत बात नहीं है की बाहर में जो रहते हैं वह वहां पर भी हिंदू धर्म के प्रति सम्मान है आश्रम में आकर के ठाकुरमुस स्वामी जी की बातें सुनते हैं तो वो भी वहां पर भी हम उनको सम्मान देते हैं तो हमारे लिए दो चीज बहुत अलग नहीं है किंतु 19th सेंचुरी अमेरिका में भारत के प्रति जो भयानक घृणा मैंने बहुत सारे कार्टून देखें मेरी लुइस ने वो जो विवेकानंद इन डी वेस्ट किताब लिखी है न्यू डिस्कवरी उसमें उसने इस तरह के कार्टूनों का कलेक्शन किया है और इस तरह के कार्टून है जो आज हमको देखकर के हंसी भी आई है दुख भी होता है की हां ठीक है चलो वो लड़की जो है उसको गुजराती में भी कहावत है की छोकरी अर्थात की लड़की जो होती है वो एक साथ होते हैं सांप उसकी तरह है सबका जो बर्डन है उसकी तरह लड़की का बर्डन लड़की का भर है क्योंकि वो दहेज देना पड़ेगा वगैरा तो ये सब चीज क्लासिकल भी चलती है आप जल्दी देखेंगे की जिसको बोलते हैं जेंडर रेश्यो की पर 100 पुरुष पे आ 160 हनी चाहिए मैंने 50-50% यदि हम बर्थ और डेथ कप ये करें तो भारत में ये जेंडर रेशों जो है वो 100 100 पुरुष के ऊपर में 90 एन 90 या उससे भी कम स्त्रियां हैं यानी की लड़कियों को बचपन में ही उनका मृत्यु सबसे ज्यादा होता है लड़कों के लड़कों से और ये जेंडर रेश्यो जिसको कहते हैं सबसे अनबैलेंस जो इसका है वो भारत में है एवं सऊदी अरब वगैरा कंट्री में भी जेंडर रेशों जो है वो भारत से बटर है की 100 पुरुषों पे 95 या तो 99 स्त्रियां होगी अब ये स्तन यूरोप वगैरा या तो वेस्ट वेस्टर्न कंट्रीज है वहां पे तो उल्टा है 100 पुरुष के ऊपर में 102 10 105 इतनी स्त्रियां होगी पुरुषों से स्त्रियों की संख्या उनके सोसाइटी में ज्यादा है भारत में उल्टा है की पुरुषों से स्त्रियों की संख्या कम है बहुत कम है जनरल रेश्यो भारत में बहुत क्योंकि यहां पे स्त्रियों को इतना उनकी जो मेडिकल केयर करनी चाहिए उनको वो जो एजुकेशन वगैरा देना चाहिए उनके हेल्थ प्रॉब्लम जो है उसके ऊपर में इतना ध्यान नहीं दिया जाता तो पुरुषों से अपेक्षा स्त्रियों का मृत्यु ज्यादा होता है उनको बर्थ में ही वो फिटनेस इस साइड जिसको बोलते हैं और इस समय उनका उनकी हत्या भी की जाति है बहुत सारे केसेस पहले भी होते थे आज भी होते हैं हम लोग इसको इतना ज्यादा इंर्पोटेंस नहीं देते तो अभी ये बातें भारत में है कोई इससे डीएनए नहीं करेगा हमारी 1000 साल की गुलामी की वजह से ये सब कुछ प्रॉब्लम होती है पुरी बात भारत में ए गए और ये होने के बाद में ही स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद में ही हमने ये पूर्वजों को हमने ही सबसे पहले हटाने की शुरुआत की है आज इसरो का वो फोटोग्राफ्स देखिए की वो चंद्रयान गया है तो सभी इसरो के साइंटिस्ट का फोटोग्राफर हम देखते हैं तो इतने सारे साड़ी पहन के खड़ी है वह सेलिब्रेट कर रही है वह देखकर के मोहन को कितना खुशी होती है की हां बाकी आप जितने भी स्पेस एजेंसीज के फोटोस देखेंगे इस तरह से सेलिब्रेट करते हुए कहानी पे भी इतनी ज्यादा स्त्रियां आपको वहां पे नहीं मिलेगी वो चाहे चाइनीस हो ना की यूरोपियन रूस हो ना की अमेरिकन हो हमारे ही स्पेस प्रोग्राम में इतनी साड़ी स्त्रियों का वो कंट्रीब्यूशन है सो डेट इस समथिंग तू बी इन मेंसली प्राउड ऑफ तो ये भारत अपने को आ रिफॉर्म भी कर रहा है साथ में हमको यह भी पता है की अभी रिफॉर्मेशन के पाठ पे चलने का बहुत बहुत लंबा रास्ता हमको ते करना है बिहार फिर अप ये सब्सटेंड में जो परिस्थितियों हैं उनको बहुत सर इंप्रूव करने की जरूर है तो हमको यह सब पता है वे आर पेनफुली आवे ऑफ डी कंडीशन इन इंडिया किंतु जब अमेरिका के न्यूज़ पेपर में हम लोग इस तरह के कार्टून देखते हैं तो हमको बड़ा ही काश होता है एक रिसेंट कार्टून आया था जब चंद्रयान तू सक्सेस हुआ था उसे समय न्यू यॉर्क ने एक न्यूयॉर्क टाइम्स में कार्टून था की एक बड़ा सा ही आलीशान मकान है उसमें कर पांच लोग बड़े ही अच्छे कपड़े पहन के बेटे चाय पी रहे हैं और अर्थात की ये स्पेस क्लब है धनी लोगों की ये स्पेस एजेंसी है जिन्होंने बड़े-बड़े स्पेस मिशन सक्सेस करके दिखाएं और बाहर में किसान खड़ा है वो सिर्फ धोती पहने हुआ साथ में एक बेल राखी हुई है गे है या उसके पास में खड़ी है और उसने पगड़ी पहनी हुई है धोती पहनी है पगड़ी पहनी है और कुछ नहीं पहने दुबला पतला किसान है गे को लेकर खड़ा है और वह मार रहा है इस तरह से नाक कर रहा है वो दरवाजे के ऊपर में ये गरीब भारत देश की स्पेस एजेंसी भी ये धनी लोगों की स्पेस एजेंसी के साथ में कंपटीशन करने के लिए तैयार है तो वो देख करके बहुत सारे लोगों ने बहुत सारे कमेंट की थी की देखो की इन लोगों का जो माइंडसेट है कितना गलत है कितना ही रेसियल प्रेज्यूडिश हमारे ऊपर रखते हैं तो यदि इतना है तो स्वामीजी के समय में तो कितना होगा किस हद तक होगा हमारे ऊपर में घृणा और रेसियल पे जुड़े उसे समय स्वामी जी के अनुयाई स्वामीजी को ईश्वर की तरह प्रॉफिट की तरह पैगंबर की तरह क्षमता देते थे तो उसका क्या अथॆघाटन हुआ की जो ये महाराज कहते हैं की विजय दो तरह से हो सकता है सबसे पहले तो शक्ति का प्रयोग करके पाप के साथ में पपिया का विनाश दूसरा है सदगुण राशि के चमत्कार से शत्रु का चित्र आकर्षण करके असत को सत्य में परिवर्तित करना इतनी पावरफुल मेरे सदगुण है मेरे चरित्र का प्रभाव इतना जबरदस्त है की मेरे शत्रु भी जो है मुझे गिना करने वाले लोग हैं मुझे सतत गली देने वाले सतत क्रिटिसाइज करने वाले लोग हैं वह भी यदि मेरी प्रेजेंस में आकर के खड़े होंगे तो मेरी सदगुण से मेरी यह आध्यात्मिक प्रभास है उन लोगों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा वो दूसरे प्रकार का विजय है जो की उन्होंने किया है यहां तक रखते हैं