Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Agamani Songs ·

आगमनी गीतों का अर्थ || माँ पार्वती और माँ सारदा || दो युग - एक लीला || 23 Sep 2025

देवी स्तुति

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः देवी की स्तुति से प्रारंभ करेंगे। मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करता हूं देवी की स्तुति से नित्यानंद करी भय करी सुन्दर रत्ना करी निर्ता को पावन कर प्रत्यक्ष माहेश्वरी प्राले आचल वंश पावन हरी काशी पुराेश्वरी दीक्षा देता कलंबन करी माता अन पूर्णेश्वरी नाना रत्न विचित्र भूषण हरी हेमा बराबरी मुक्ताहार विलंब मान विलस कुमारी कश्मीरा गुरु वासिता रुच कर काशीपुराेश्वरी दीक्षा देवी कृपाम करी माता अन्न पूर्णेश्वरी सर्ंद करी दशा सुख करी काशी पुराेश्वरी दीक्षा तेरी कृपा अवलंबन करी माता अन्न पूर्णेश्वरी माला पुस्तक पाका अंकुशरी काशी पुराेश्वरी दीक्षा दे कृपा अवलंबन करी माता अन्न पूर्णेश्वरी शन करी महा भय करी माता कृपा साक्षात मोक्ष करी सदा शिव करी विश्वेश्वर श्री हरि रक्षा कंद कर निरामय करी काशीपुराेश्वरी दीक्षा दे कृपा अवलंबन करी माता अन्न पूर्णेश्वरी अन्न पूर्णे सदा पूर्ण शंकर प्राण वल्लभ ज्ञान वैराग्य सिद्धम देवी पार्वती माता में पार्वती देवी पिता देवो महेश्वर बंधवा शिव भक्तस्व भवनम बंधवा शिव भक्त श प्रयम प्रणाम महाराज जय मां खूब भो वेरी गुड

माँ सारदा का रूपांतरण — नववधू से नारायणी तक

कल हमने देखा दुर्गा सप्तशती किस तरह से देवी महात्म में मां पार्वती का परिवर्तन हमको मां दुर्गा और मां काली में होता हुआ सा दिखता है। अभी देखिए कि हमारे मन में यह प्रश्न तो हो ही सकता है कि वहां पे जिस तरह से वर्णना की गई है कि ऋषि मुनि स्तव कर रहे थे उस समय मां पार्वती वहां पे गंगा के किनारे पर आई उस समय ऋषियों के स्तव सुनकर के जैसे कि उनके देह में से यह दुर्गा और यह मां काली यह दो देवियां उनके देह में से प्रकट हुई। अभी हमको पता है कि है तो शक्ति का स्वरूप एक ही किंतु उसका मैनिफेस्टेशन डिफरेंट डिफरेंट है। तो पुराणों में इस तरह से जो वर्णना की गई है कि सौम्या जिसका स्वभाव सौम्य है। जिनका मातृ स्वरूप स्वभाव है। भक्तों पर कल्याणकारी है। वह रण मैदान में जाकर के आयुध उठाकर के असुरों के संहार करने वाली रुद्र मूर्ति उन्होंने कैसे धारण कर ली? किस तरह से उन्होंने देवी मूर्ति धारण की कि जो कि पूरे संसार पर अपने कल्याणमय आशीर्वाद बरसा रही है। कहां वो मैना की वो लाडली बिटिया जिसको कि मां मैना ने बड़े प्रेम से और जतन से उसको बड़ा किया था और कहां यह जो कि जगत भुवन मोहिनी यह जगत पर कृपा करने वाली महाशक्ति के रूप में परिणत हुई है। अभी पुराण में हमको तो सिर्फ इतना ही दिखता है कि हां देवी के अंग से दो और देवियां प्रकट हुई। किंतु जब मां शारदा देवी के जीवन का हम अभ्यास करते हैं तो हमको और स्पष्ट रूप से ऑन अ ह्यूमन लेवल वो था एक डिवाइन लेवल पे यहां पे एक ह्यूमन लेवल पर हमको एक दूसरा एक्सप्लेनेशन देखने को मिलता है। और यह एक्सप्लेनेशन क्या है? वही मां शारदा छोटी सी बच्ची थी जयराम बाटी में सभी लोग उनके पति की मजाक उड़ाया करते थे। सभी लोग यह करके कटाक्ष किया करते थे कि कहां एक पागल की वह स्त्री है। वहां से प्रारंभ होकर के पूरे जगत में यह पूजिता हुई है। यह सारा ओलीबुल जोसेफाइन में क्लाउड निवेदिता जो कि आधुनिक जगत की नारियां है जिनको कि आपको यह समझाना नहीं पड़ता कि अभी क्या है भारत में फिर भी यह एक कल्चर है। कोई बड़ा आदमी होता है। कोई बड़ी शक्ति होती है तो उसके सामने इमीडिएटली हम अपने घुटने टेक दें। किंतु विदेश में क्या है कि आत्मसम्मान कहो कि यह सेल्फ रिस्पेक्ट कहो बहुत ज्यादा है। वे लोग किसी की इस तरह से आराधना देवी ज्ञान से करना शुरू करें। उसका अर्थ वही है कि जिसके प्रति उनकी आराधना जिनकी वह आराधना करते हैं जिसके प्रति उनकी श्रद्धा है उन्होंने सही में कोई बहुत बड़ा प्रभाव इनके मन के ऊपर में इनके जीवन के ऊपर में विस्तरित किया होगा। तो देखिए कि यह जो ट्रांसफॉर्मेशन है वह कैसे हुआ? तो ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है तपस्या के बल पे। सिर्फ तपस्या ही एक ऐसी चीज है जो कि मनुष्य को देवता बना दे सकती है। और हां मां पार्वती के जीवन में भी हमने देखा कि किस तरह से भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने तपस्या की थी। तो यह तपस्या ही आखिर में उनको देवी के रूप में परिणत करती है। देखिए कि अब जैसे वो कहानी हमने पढ़ी थी ना वो कि कोकीबो की भसो करा था कि यह जो एक चिड़िया है या एक बतख ऐसा कुछ है उसको भस्म करना। वह ब्रह्मचारी था। उसकी तपस्या की शक्ति थी। वह पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था। पेड़ के ऊपर में कुछ पंखियां अपने कलरव कर रहे थे। तो इसको यह नाराज होकर के उसने उनके सामने जैसे ही देखा आंख में से यह लेजर निकला। आज की लैंग्वेज में लेजर। उसकी लैंग्वेज में उस समय की लैंग्वेज में यह वो अग्नि शिख वो निकली और पंखियों को भस्म कर दिया। तो यह साधु बड़े खुश हो गए। यह जो योगी थे फिर वह गांव में गए हैं भिक्षा मांगने के लिए। एक सती के घर गए हैं। कहते हैं कि भिक्षा न देही। तो वह कहती है कि मैं अपने पति की सेवा कर रही हूं। थोड़ा सा रुक जाइए। तो फिर यह क्रोधित हो जाते हैं कि तुमको पता नहीं तुम्हारे द्वार पर कौन आया है। पता नहीं तुम्हारे मेरे पास में किस तरह की महाशक्ति है। मुझे इमीडिएटली भिक्षा दो। वरना तो फिर म इस तरह से कुछ वह सोच रहे थे। तो भीतर में से वह सती ने क्या कहा कि यह पंखियों को भस्म करना पर भस्म करने वाली बात नहीं है। ऐसा मत सोचिए कि आपके क्रोध से मैं भस्मीभूत हो जाऊंगी। क्यों? क्योंकि यह पति के प्रति जो श्रद्धा है वह कवच के रूप में इस सती की वह रक्षा कर रही है। तो चाहे आप पति की सेवा करें कि देवता की सेवा करें। यदि सेवा में एक शुद्ध भाव होता है तो वह सेवा और उनको प्राप्त करने की जो तपस्या है वह इजीली ईश्वर प्राप्ति की तपस्या में परिणत हो सकती है। ठाकुर के पास में ही एक स्त्री भक्त ने आकर के कहा कि किस तरह से आराधना करनी चाहिए। मेरा एक एक भतीजा है जिसको कि मैं अपने ही पुत्र के रूप में बड़ा कर रही हूं। तो मेरी उसके प्रति बड़ी आसक्ति है। तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया कि उसी के भीतर में बाल गोपाल का दर्शन करो। जब उसकी सेवा कर रही हो, उसको खिला रही हो, उसको नहला रही हो, वस्त्र पहना रही हो तो यही सोचो कि तुम इनके वो बाल गोपाल को ही खिला रही हो, नहला रही हो, उसी को लाड, प्रेम, आदर कर रही हो। तो जैसे ही यह दृष्टिकोण चेंज हो गया व्यक्ति के ऊपर में आसक्ति हो सकती है। किंतु जब व्यक्ति के भीतर में ईश्वर का दर्शन करें तो वह आसक्ति तपस्या में परिणत हो जाएगी। तो यहां पर भी मां पार्वती ने जो भगवान शिव के लिए आराधना की वही आराधना इतने शुद्ध सात्विक हृदय से की थी कि वही आराधना आखिर में वही मां पार्वती को देवत्व के रूप में उसने परिणत किया है। अभी ऑफकोर्स इवन मां के जीवन में भी मां शारदा के जीवन में भी हमने प्रारंभ से ही देखा कि भगवती के अंश से ही इनका जन्म हुआ है। तपस जो दैवी अंश जो है जन्म से ही इनके भीतर में था तो फिर तपस्या करने की क्या आवश्यकता है? तो फिर इसमें दो-तीन तरह के उत्तर है। पहला तो उत्तर यह है कि अपने खुद के लिए उन्होंने तपस्या नहीं की है। तपस्या की है जगत के कल्याण के लिए। दूसरा एक उत्तर हमको लीला प्रसंग में मिलता है। शरद महाराज लीला प्रसंग के लेखक स्वामी शारदानंद जी कहते हैं कि यदि वह अपने स्वरूप का ज्ञान लेकर के ही पृथ्वी पर अवतरण करेंगे तो फिर होगा क्या कि मनुष्य और अवतार के बीच में इतना बड़ा एक खाई प्रकट हो जाएगा। इतना बड़ा एक डिस्टेंस प्रकट हो जाएगा कि मनुष्य फिर अवतार की साधना से प्रेरित होकर के स्वयं साधना नहीं कर पाएगा। वह यही सोचेगा अरे ईश्वर ही तो देह पंचमहाभूत का देह धारण करके आए हैं। वह साधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं। वह यदि अखंड ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह जैसे षड रिपुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश जैसे पंच कक्लेश को वह जय कर सकते हैं। काम कांचन के प्रति उनका मन संपूर्ण रूप से शून्य हो गया है तो वह उनके लिए संभव है। मेरे लिए कहां से संभव है? ऐसा प्रश्न हमारे मन में होगा। तो वो प्रश्न ना हो हम लोग भी तपस्या करें। इसके लिए अवतार जब देह धारण करते हैं तो तमस और रजस का एक अंश साथ में लाते हैं और इस अंश को पार करने के लिए अपना जो सही स्वरूप है उसको साक्षात्कार करने के लिए वह तपस्या करते हैं। तो यह सब विविध कौन सा सही कौन सा गलत कौन कॉम्बिनेशन सही कौन कॉम्बिनेशन गलत वह सब तो भक्त की अपनी श्रद्धा के ऊपर में डिपेंड है। किंतु यह सब एक्सप्लेनेशन है। तो हमने देखा कि किस तरह से देवी पार्वती भी भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए आराधना करती है। तपस्या करती है। भगवान शिव उनसे प्रसन्न होकर के उनके साथ में विवाह करते हैं और बाद में यही देवी पार्वती किस तरह से मां दुर्गा और मां काली में परिणत होती है। यह पौराणिक कहानी जिस तरह से हजारों हजारों सालों से चली आ रही है, एग्जैक्ट उसी का कंडेंस स्वरूप हमको एसेंशियल स्वरूप हमको मां शारदा के जीवन में देखने को मिलता है। स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर भारत की 10,000 साल की यह जो आध्यात्मिक यात्रा है, उसका एक एसेंशियल मैनिफेस्टेशन हमको ठाकुर के जीवन में देखता है। उसका कंडेंस स्वरूप ठाकुर के जीवन में मिलता है हमको। तो हम मां शारदा के बारे में भी यही बात कह सकते हैं कि पिछले 10,000 साल, 20,000 साल, 3000 साल जितनी भी पुरानी अपनी आर्य सभ्यता है, जितनी भी पुरानी अपनी वैदिक सभ्यता है, ये पूरे हजारों सालों की यात्रा में देवी के जो विविध रूप जो है, देवी के जो विभिन्न स्वरूप है, जो विभिन्न विभिन्न भावों से देवी ने पृथ्वी पर अपना स्वरूप मैनिफेस्ट किया है। वह सब भाव हमको कंडेंस रूप में एसेंशियल रूप में मां शारदा के जीवन में देखने को मिलते हैं। यह बात सुनकर के थोड़ा सा आश्चर्य अवश्य होगा क्योंकि हमने तो देखा है कि देवी कैसे असुरों का संहार करती है। शुमंभ निशुंभ महिषासुर रक्त बीज वगैरह असुरों का जो संहार करती है पौराणिक युग में यहां पे तो मां वही ठाकुर के रहते-रहते छोटी सी नौबत में रहती थी और फिर ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह छोटे से गांव में जयराम बाटी में या तो फिर कोलकाता आती थी तो उद्बोधन मायरबाड़ी में रहती थी। मां के जीवन में ऐसा तो कोई बहुत बड़ा चमत्कार कि यह ब्रिटिश साम्राज्य को हरा करके भगा दिया। ऐसा तो कुछ है नहीं। असुरों की कमी नहीं थी मां के जीवन के दरमियान। यह ब्रिटिश राज्य तो था ही इतना बड़ा भारत का खून चूस रहा था उस समय ड्रैकुला की तरह। तो क्यों क्यों नहीं मां ने ब्रिटिश राज्य को भारत में से भगाया? यह प्रश्न हो सकता है यदि सही में उसी देवी का पुनः आविर्भाव यदि हुआ है तो किंतु अगेन गंभीरानंद जी की मां की जो जीवनी है उसकी अवतरणिका में हमने देखा कि किस तरह से महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। इस इशू जो है उसकी विवेचना करते हैं। क्या कहते हैं? आज के युग में संदेह राक्षस जो है जो कि प्रत्येक मनुष्य के हृदय में बैठा हुआ है उसका संहार करना ही सबसे बड़ा कार्य है। भारत की अवनति इसीलिए हुई कि एट वन पॉइंट इन टाइम हमने अपने आप के ऊपर में से श्रद्धा गवा दी। हमको ऐसा लगा कि मैं कुछ नहीं हूं। मैं हीन हूं। मैं दरिद्र हूं। मैं निम्न कक्षा का हूं। इस तरह से हमारे मन में एक बैठ गया और विदेशी लोगों ने हम पर आक्रमण करके करके हमारा शोषण किया। यह जो हमारे मन के भीतर में हीन भावना जो प्रकट हुई इसके पीछे का कारण क्या है? इसके पीछे का कारण है कि ना ही हमको ईश्वर तत्व पे विश्वास है ना ही हमको आत्म तत्व पे विश्वास है। यह माने इट इज़ सच अ कंट्राडिक्टरी किस तरह का यह एक दिखाई देता है कि यही भारतवर्ष यही भारत देश हजारों हजारों सालों से ऋषि मुनियों ने ईश्वर के विभिन्न रूपों का एक के बाद एक उनको लिपिबद्ध किया है। उसका गान किया गाया है। उसकी महिमा का वर्णन किया है। इसी भारतवर्ष में और इसी भारतवर्ष में आत्म तत्व जो है उसकी सबसे पहली बार खोज हुई है और इसी भारतवर्ष में एक समय ऐसा आया यही ऋषि मुनियों के संतान ने एक और तो ईश्वर पर विश्वास गवा दिया दूसरा कि आत्म तत्व पर विश्वास गवा दिया। यही जो अश्रद्धा यही अश्रद्धा हमको अपने धीरे-धीरे करके ईर्ष्या और गुलामी की ओर ले गई। ईर्ष्या और शोषण। स्वामी जी कहते हैं ना कि यह जेलसी एंड स्लेव क्रूल्टी एंड स्लेवरी यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। यदि मैं अपने भाई के भीतर में दिव्यता का दर्शन नहीं करता हूं। मैं यदि ऐसा ही सोचता हूं कि मैं इसका शोषण ही करूंगा तो यह उसके प्रति जो क्रूरता है वह मेरे जो भीतर का जो यह सत्व है मेरे भीतर की जो शक्ति है, मेरे भीतर में जो आत्मसम्मान है, युद्ध करने की जो क्षमता है, उसका संपूर्ण रूप से नाश कर देगी और फिर मैं जब विदेशी आक्रमणकारी आएंगे अपनी रक्षा नहीं कर पाऊंगा। स्वामी जी ने कहा पहले ही दिन हमने जब यह इसका पाठ प्रारंभ किया था आगमनी गीत का स्वामी जी के उस लेटर का हमने पाठ किया था। स्वामी जी कहते हैं कि भारत की और यह विदेशों के देशों की खास करके यूरोप अमेरिका की इन दोनों की अवस्थाओं में इतना बड़ा डिफरेंस हमको क्यों दिखाई देता है? डिफरेंस है क्योंकि भारत में शक्ति की अवमानना हो रही है। शक्ति अर्थात क्या? आप मंदिर में पत्थर की प्रतिमा बिठा के उसकी आराधना करें या तो फिर यह नवरात्रि दुर्गा पूजा के दिनों के दरमियान एक मृणमयी प्रतिमा की स्थापना करके उनकी पूजा करें। यह तो सिर्फ शक्ति साधना नहीं है। शक्ति की आराधना तो प्रत्येक स्त्री के भीतर में उसी शक्ति का दर्शन करना, उनको सम्मान देना, उनकी रक्षा करना यही तो असली शक्ति साधना है। यूरोप में स्त्रियों को सम्मान मिलता है बोलकर के स्त्री की शक्ति से शक्तिमान होकर के यूरोप के देश इतना आगे बढ़ पाए हैं। मटेरियल प्रोस्पेरिटी हो, साइंटिफिक इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट हो या तो फिर इवन स्पिरिचुअलिटी हो। स्वामी जी जैसे स्वामी जी पूरे भारत में घूमे कहां? उनको ज्यादा तो कुछ मिला नहीं। रिस्पांस। स्वामी जी कहते हैं कि भारत में लोग बातें करने के लिए तो बड़े उत्सुक हुए हैं। बड़े तैयार हैं। किंतु जब महत कार्य करने के लिए पैसों का जुगाड़ करने का समय आएगा तो कोई हेल्प नहीं करता है। तो वह भारत का एक्सपीरियंस था स्वामी जी का और यही स्वामी जी बिना पैसे के एकदम सामान्य वस्त्र पहने हुए ठंडी के लिए तो उनके पास में अच्छे कपड़े भी नहीं थे। तो जब अमेरिका गए तो वही अमेरिका वासियों ने स्वामी जी को जैसे कि आदर पूर्वक अपने ही संतान के रूप में अपना लिया। अमेरिकन जो स्त्रियां थी वो जैसे मिज ओलीबुल है ये मिसेज हेल है वो कितनी ही सब स्त्रियां थी। स्त्री भक्त थी जिन्होंने कि स्वामी जी को अपने संतान के रूप में अपने भाई के रूप में अपनाया है। तो देखिए कि स्त्रियों की जब जहां पे यह होता है, रिस्पेक्ट होता है, उनकी श्रद्धा होती है, उस देश की उन्नति भी इतनी ही होती है। तो यहां पे देखिए कि यह मां पार्वती का यह देवी के रूप में परिवर्तन। इसके पीछे दो रीजन है। एक तो है कि मां पार्वती की खुद की तपस्या दूसरा कि मां पार्वती को जो सम्मान मिला है उनके माता-पिता के द्वारा उनके पारी पार्श्विक ऋषि मुनियों के द्वारा बोलकर के ही उनका यह देवत्व में परिणति हुई और फिर वही देवी सबकी रक्षा करती है दुश्मनों से। यहां पे भी देखिए मां शारदा को उनके जीवन के दरमियान ठाकुर ने कितनी उनकी श्रद्धा की थी। कितनी रिस्पेक्ट की थी। उनके बाद में यह डायरेक्ट डिसाइपल जो है त्यागी संतान है, गृहस्थ संतान है। उन्होंने मां की कितनी रक्षा की है। मां का कितना सम्मान किया है। मां के प्रति कितनी श्रद्धा जागृत की है। तो उसी का परिणाम है कि मां फिर हमारे हृदय के भीतर में संशय राक्षस जो है उसका नाश करने के लिए प्रस्तुत होकर के खड़ी है। तो देखिए कि यह जो भाव है मां मेना का कि अह यह जो आगमनी गीत जो आज हम देखेंगे कोरी ओरी पोरे आनी ले हे कारे कोई गिरी मम नंदिनी यह जो मैंने अपनी लाडली बिटिया को भगवान शिव के वहां पर भेजा था उनकी वधू होकर के तो अभी आप जो इसको अभी मां मैना यह बात अपने पति गिरिराज हिमालय को कह रही है कहती है आमारो अंबिका िका द्विभुजा बालिका एजे दशभुजा भुवन मोहिनी यह दो हाथों वाली मेरी लाडली बिटिया जो है अंबिका उसको मैंने भेजा था भगवान शिव के वहां और आप यह वहां से किसको ले आए वापस यह दशभुजा भुवन मोहिनी दो हाथों वाली मेरी लाडली बिटियां गई है वहां पे और वापस आई है दश भुजा वाली 10 हस्त वाली यह भुवन मोहिनी होकर के तो यह सुंदर गीत है पहले उसको सुनते उसके बाद में इसका अर्थ विस्तार करेंगे। तो कौन गा रहा है आज? अच्छा अच्छा महा श्वेता दी प्लीज गोरी उरी पानी ले है का कोई गिरी मा ने कोई पानी दे हमारो अंबिका जवानी का हमो पूजा वाली का दश बोलो मोरे ओ पर ले कोई गिरी प बासी दक्षिण गजेंद्र बदो प्रकाशित जनो प्रभा प्रकाशित जनो प्रभा सरा सते सुशोभो सरा सते सुम भारती सहकारी ओ मारे हानी ले तारे कोई गिरी दुखी ना को राखी मग पे आरो राखी निगेंद्र पार पद आरोपी ओ सुरे दारी आवा त्रिभंग ते दारी आवा त्रिभंग ज्ञान हो पूर्ण ब्रह्म सदा दारी आवा विभि ज्ञान हो उरी आ सुनी छानी गिरीवर रूप आरा सुनी जी पुराने ओ गिरवर ए रूप रूप बदा बश उधारी छ जन सुने छ पुराने ओहे गिरी रूप आराध रूप बदा बंगेश्वर उधारी छले चलो को तारा चांद कहे सुनो गिरी रानी से तुम्हारी पानो शानी सुनो गिरी रानी से तुम्हारा निशानी नाश ते बस पूजा तार नाशते भुजा तार नाशते भस भुजा तार बोल ते सुर मो ते भूभा दशो भुजा तार मोहिनी पर कोई मारो पूजा द कोई वाह खूब भो महा श्वेता दी वेरी गुड देखिए इस गान के भीतर जो भाव है कितना सुंदर रूप से देवी का यह जो ट्रांसफॉर्मेशन है उसको व्यक्त किया गया है। मां मां पार्वती की मां मैना इस गान को गाती है। अपने पतिदेव को कहती है कि मैंने तो दो भुजाएं वाली दो हस्त वाली मेरी अपनी लाडली बिटिया अंबिका को भेजा था भगवान शिव के घर और आप वहां से वापस किसको ले आए हैं ए जे दशभुजा भुवन मोहिनी यह तो है द हस्तों वाली 10 हाथों वाली भुवन मोहिनी किबाश दक्षिणे गजेंद्रो बदनो प्रकाशितो जेनो प्रभाती तपनो इनकी दाई और देखो गज के मुख वाले गणेश है जो कि प्रभात के सूर्य की भांति प्रकाशित हो रहे हैं। मां के दो पुत्र संतान थे। एक गणेश और कार्तिकेय तो यह तो किंतु कोई सामान्य संतान नहीं है। ईश्वर के अंश स्वयं ही गणेश और कार्तिकेय के रूप में जन्म ग्रहण किए हैं। ईश्वर ने स्वयं इनके रूप में जन्म ग्रहण किया है। तो इनके संतानों को भी देख लो। उनकी एक ओर है दाई ओर है गजेंद्र बदनो प्रकाशितो जेनो प्रभाति तपोनो गजेंद्र के मुंह वाले यह बाल गणेश है जिनका कि चेहरा है प्रभात के सूर्य की तरह चमकित हो रहा है प्रकाशित हो रहा है शडाननो शोभा मेते सुशोभनो कमला भारती शहोकारणी बाई और शडानन अर्थात कि कार्तिकेय सुशोभित है और साथ में लक्ष्मी और सरस्वती भी है। देखिए यह दोनों जो कड़ियां है गान की मां के जीवन के साथ में कितना सुंदर रूप से वो मैच हो जाती है। थोड़ा सा हम अपनी इमेजिनेशन को चलाएं तो वही वो श्यामा सुंदरी देवी कहती है कि मेरी शारदा को बेचारी को मां सुन मां शब्द सुनने का सद्भाग्य भी नहीं मिला। तब ठाकुर क्या कहते हैं कि शासुडी ठाकुर अर्थात कि सासु जी आपको यह सब चिंता करने की जरूरत नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा कि मां शब्द की पुकार सुनकर के आपकी बिटियां त्रस्त हो जाएगी। इतने सारे पुत्र संतान पुत्री संतान उनके होंगे और ऐसेवैसे नहीं यहां पे स्वामी जी स्वयं राजा महाराज शशि महाराज शरद महाराज योगेन महाराज हरि महाराज एक के बाद एक सोने जैसे पुत्र संतान इनके मां के थे कौन मां माने किस मां ने कितनी तपस्या की होगी तो कहीं जाकर के एक स्वामी जी का भुवनेश्वरी के कोख में जन्म हुआ किस मां ने इतनी तपस्या की होगी कि एक राजा राजा महाराज का उनकी कोख में जन्म हुआ। यहां पर मां की तपस्या देखिए कि 16 त्यागी संतान और वह तो उस समय जितना जितना समय बीतता जाता है उतना ही देखिए कि मां के पुत्र पुत्रियां कन्या और संतान गण की संख्या बढ़ती ही जाती है। तो यह जिस तरह से मां पार्वती के यह गणेश जी थे और कार्तिकेय थे तो वैसे ही यहां पे मां शारदा के इतने सारे त्यागी तपस्वी सोने जैसे हीरे जैसे सब पुत्र पुत्री संतान थे और उसके बाद में देखिए कि लक्ष्मी और सरस्वती मां की वो कहानी है ना कि कामरार पुकुर गई अभी तो छोटी बालिका वधू ही है तो वहां पे वो तालाब के किनारे सुबह को कपड़े धोने के लिए स्नान करने के लिए वगैरह जाना पड़ता है तो अकेली कैसे जाएगी तो डर भी लगता था थोड़ा सा पुत्रवधू भी थी तो घर से बाहर में अकेला चलना यह भी तो थोड़ा संकोच होता था किंतु जैसे ही थोड़ा सा चलना शुरू किया देखा कि अष्ट सखियां आकर के प्रकट होती है चार उनके आगे चल रही है चार पीछे चल रही है मां कहती कहती है कि मैंने कभी इनको पूछा नहीं कि आप कहां से आई है? क्यों आई है? एक तो नववधु है बोलकर के एक संकोच है। दूसरा कि हृदय के भीतर में तो पता ही है कि वही मां पार्वती वही राधा वही जननी के रूप में इस बार मां शारदा के रूप में हमारे सामने फिर से प्रकट हुई है। तो दक्षिणांगो राखी मृगेंद्रो परेते अपना दक्षिण अंग है। मृगेंद्र अर्थात कि सिंह के ऊपर में स्थापित किया है। आर पदो आरोपीय असुरते और एक पैर रखा है असुर के ऊपर में दाणि आन की बात त्रिभंगो भंगीते ज्ञान होए पूर्ण ब्रह्म सनातनी यह कैसी त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है देखकर के लगता है कि जैसे पूर्ण ब्रह्म सनातनी है मां मां दुर्गा की प्रतिमा का मृणमय प्रतिमा का यदि बेलूर मठ में या और कहीं पर भी दर्शन किया होगा तो कितना सुंदर रूप से यह जो चित्र है वो उसमें वो प्रकित होता है। मुझे याद है मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था ट्रेनिंग सेंटर से पहले भी मैं जब बेलूर मठ में ज्वाइन करने के लिए गया था तो होता क्या था कि वहां पे आप यदि बेलूर मठ गए होंगे तो आपने देखा होगा कि मेन टेंपल जो है और उसके बाद में आता है वह डाइनिंग हॉल और किचन। किंतु इसके बीच में एक बड़ा सा एक चौगान जैसा है। एक बड़ा सा खुली जगह है। तो यदि गंगा की ओर से आप मंदिर के पीछे में जाएंगे तो वहां पर मठ ऑफिस वगैरह आता है। और गंगा के इस साइड में अर्थात कि मंदिर की यह जो म्यूजियम है और आज का यह जो अभेदानंद यह जो लेक्चर हॉल है कन्वेंशन सेंटर उस ओर से आप मंदिर के पीछे में जाएंगे तो वहां पर वो जो ट्रस्टी बिल्डिंग आता है पहले प्रभानंद जी महाराज रहा करते थे। अभी सुना है। आई थिंक भजनानंद जी महाराज वहां पर रहते हैं। तो उस यह जो पूरा जो ओपन स्पेस है उसके एक साइड में जहां पे वर्कशॉप है वर्कशॉप के सामने में मां दुर्गा की प्रतिमा की यह जो बनाना शुरू हो जाता है। तो हम लोग क्या करते थे कि खाने के लिए जब जाते थे दोपहर को तो वापस आने के समय अभी दोपहर तो थोड़ा सा टाइम है। ट्रेनिंग सेंटर का शेड्यूल इतना टाइट होता है कि वैसे तो दिन के दौरान आपको इधर-उधर जाने की समय भी नहीं होता, परमिशन भी नहीं होती। किंतु खाने के बाद थोड़ा सा विश्राम के लिए एक घंटा जितना अपने हाथ में होता है तो बहुत सारे ब्रह्मचारी वहां पर वह जो मां की प्रतिमा का गठन हो रहा है निर्माण हो रहा है। वहां पर जाकर खड़े रह जाएंगे और देखेंगे कि कैसे स्टेप बाय स्टेप आज देखा कि वो जो ये होता है सपुवाल उसको इकट्ठा करके हाथ पैर वगैरह बनाया है। फिर दूसरे दिन देखा उसके ऊपर में मिट्टी का लेपन हो रहा है। तीसरे दिन देखा कि धीरे-धीरे वह जो मां पार्वती जो यह लक्ष्मी है, सरस्वती है, गणेश है, कार्तिकेय है, उनको आकार शेप दिया जा रहा है। और फिर आखिर में देखेंगे कि संपूर्ण प्रतिमा तैयार हो गई है, किंतु फिर उसको ढक करके रख देते हैं। संपूर्ण प्रतिमा जब तैयार हो जाती है, किसी को देखने नहीं देते, ढक करके रख देते हैं। और उसके बाद में जब वस्त्र वगैरह पहनाते हैं और जब वहां पर वह मंडप में दुर्गा मंडप में ले जाते हैं तब उसका अनावरण होता है। तब फिर सबको देखने में आता है। सबको यह दर्शन होता है। किंतु वो जो हम लोग तो पहले से ही पहले ही दिन से देखते हैं कि वो किस तरह से स्टेप बाय स्टेप बाय स्टेप मूर्ति का गठन हो रहा है। तो बड़ा देखने में बड़ा सुंदर लगता है। देखिए यह भी तो एक यह मृणमय प्रतिमा की रचना हो रही है। यहां पे हम भी अपने खुद के जीवन में देखेंगे तो अपना यह जो तपस्या रूपी देह जो है एक तो है पंचमहाभूत का बना हुआ देह दूसरा है तपस्या से बना हुआ देह हमारे सबके भीतर में यह ईश्वर प्रेम या तो फिर आत्मश्रद्धा या तो फिर ईश्वर के प्रति आराधना आध्यात्मिक जीवन रूपी जो कोष है उसका भी धीरे-धीरे करके गठन हो रहा है। जिस दिन हमने ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति हमारी भक्ति जागृत हुई। जिस दिन हमारा हमारी दीक्षा हुई। देखिए बेंगल में ना यह बात इतना स्पष्ट रूप से शायद आपको नहीं दिखेगी। क्यों? क्योंकि बंगाल के बहुत सारे घर में पहले से ही ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति श्रद्धा भक्ति होती है। तो बचपन से ही तो ये हम लोग देखते आते हैं। घर में मां की ठाकुर का फोटो है, मां का फोटो है, बेलूर मठ या आसपास के जो सेंटर है, बचपन से ही आते जाते हैं। किंतु हम लोग जो कि बाहर में रहते हैं। हमारे घर में जो कि ठाकुर मां स्वामी जी की ट्रेडिशन नहीं है। हमारे लिए यह ट्रांजिशन एकदम स्पष्ट है। मुझे अभी भी याद है कि हमारे शहर में प्राइवेट सेंटर था तो पहली बार मैं वहां पर गया था। तो ऐसा नहीं कि ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति कोई क्यूरियोसिटी ऐसा था। मुझे किताबें पढ़ना अच्छा लगता था और वहां पे प्राइवेट सेंटर में एक अच्छा लाइब्रेरी था। तो लाइब्रेरी में सबसे पहली बार गया था और वहां पर जाकर ऐसा नहीं कि कोई धार्मिक किताबें पढ़ना उस समय तो मैं स्कूल में ही पढ़ता था। तो कहानियों की किताब मैं लेकर के आता था। तो वह था मेरा प्रथम प्रवेश और इससे भी पहले मुझे उस समय पता नहीं था। मैं जब रामकृष्ण संघ में ज्वाइन करने के लिए आया ट्रेनिंग सेंटर क्रॉस कर दिया। उसके बाद में गुजरात में लिमड़ी में मेरा पोस्टिंग हुआ था। उस समय मुझे पता चला कि मेरा जन्म जहां पर हुआ था। उसी घर के पीछे में महापुरुष महाराज की दीक्षिता एक साध्वी वहां पर रहा करती थी। जिनका नाम था जय भगवान माता जी। हम लोग उनको जय भगवान माता जी करके पुकारते थे। तो उनके घर जाना उनके घर के आसपास में बड़ा खुला सा जगह है। वहां पर खेलना आनंद करना और फिर माता जी जब बुलाएंगी प्रसाद के लिए तो लोभ वही रहता था कि प्रसाद चाहिए। तो वो प्रसाद के लिए उनके घर में जाना कुटिया थी एक छोटी सी। तो फिर वो माताजी प्रसाद देने से पहले कहेंगी कि इनको प्रणाम करो। तो यह फोटोग्राफ कौन बैठा है फोटो में पता नहीं। किंतु प्रसाद के लोभ से प्रणाम कर लिया। प्रसाद ले लिया। फिर बाहर खेलने के लिए आ गए। तो दैट वास माय बिगिनिंग। पता भी नहीं है कि मैं किसको प्रणाम कर रहा हूं वहां माता जी के कमरे में या तो कुटिया में और या तो फिर यह प्राइवेट सेंटर है तो किनका फोटो है यहां पे वह भी पता नहीं। वहां पर प्रसाद का लोभ से जाता था। यहां पे मैं किताब के लोभ से जाता था। किंतु धीरे-धीरे करके देखिए कि यह ट्रांसफॉर्मेशन शायद उन्होंने ही पहले से ठीक किया हो ना कि जो भी हो। यह ट्रांसफॉर्मेशन जो मेरे जीवन में आया। आई कैन एक्चुअली इक्वेट कि यह मां दुर्गा की प्रतिमा की जो गठन हो रहा है मृणमय प्रतिमा का और मेरा जो एक आध्यात्मिक गठन हो रहा था आई कैन इक्वेट दिस बोथ प्रोसेससेस स्पष्ट दिख रहा है कि कैसे धीरे-धीरे करके वह जो यात्रा है वह जो जर्नी है आज मुझे यहां तक ले आई है। तो यहां पे भी देखिए कि कितना सुंदर यह शब्दों में चित्र अंकित किया गया है। दक्षिणांगो राखी मृगेंद्रो परते दक्षिण अंग स्थापित किया है मृगेंद्र अर्थात कि सिंहराज के ऊपर में आर पदो आरोप पीिय असुरते और एक पद स्थापित किया है असुर के ऊपर में दांडीय आन की बात त्रिभंगो ते खड़ी है जैसे कि किस त्रिभंग से ज्ञान होए पूर्ण ब्रह्मो सनातनी देख के ही दर्शन करके ही लगता है कि जैसे जैसे वह है पूर्ण ब्रह्म सनातनी सुने छ पुराण पुराण ओहे गिरिबर सुना है पुराणों में हे गिरिवर ए रूपो आराधिय रघुवर इसी रूप की आराधना करके रघुवीर ने बोदार बोरे जोई लंकेश्वरो मां का ही आशीर्वाद प्राप्त करके वर प्राप्त करके लंकेश्वर के ऊपर में विजय प्राप्त किया था उद्धारय छिलेन जनको नंदिनी लंकेश्वर के ऊपर में विजय प्राप्त करके जनक नंदिनी का उद्धार किया था। मां सीता का उद्धार किया था। स्वामी जी एक बार कहते हैं उसी पत्र में ही हमने पढ़ा था। स्वामी जी कहते हैं कि पुराणों के युग में जब महावीर को उड़कर के जंप लगा के जिस तरह से वो लंका में जाकर के प्रस्तुत हुए थे। रावण का रावण के चंगुल में से जो मां सीता है उनको भगवान राम का उप संदेश देने के लिए तो स्वामी जी कहते हैं कि इस युग में मां के आशीर्वाद से मैं भी एक ही उप में यानी कि एक ही हुंकार करके किंतु उड़कर के या जंप लगाकर के नहीं इसी ब्रिटिश लोगों ने जो जहाज की रचना की है उसी जहाज में बैठकर के उस विदेश में जाकर के मां का संदेश सबको सुनाया है और और भी साथ में उस समय भी हमारी चर्चा हुई थी और बाद में भी न्यू डिस्कवरी में भी मैंने पढ़ा कि देखिए कि वैसे तो स्वामी जी को ठाकुर का दर्शन हो ही गया था। जब कन्याकुमारी रोक पे वो विवेकानंद रोक के रूप में आजकल जो ख्यात है उसके ऊपर में बैठकर के स्वामी जी जब ध्यान कर रहे थे तो ठाकुर ने आकर के उनको दिशा निर्देश करके कहा था कि पश्चिम में जाकर के वेदांत का और यह सनातन धर्म का संदेश फैलाना है। यह स्पष्ट आदेश होने के बावजूद स्वामी जी ने मां शारदा को पत्र लिखा था और जब पत्र का उत्तर मिला तभी स्वामी जी विदेश में जाने के लिए तैयार हुए थे। तो जिस तरह से पुराण युग में कि सुने छ पुराण ओहे गिरिवर पौराणिक युग में हे गिरिवर मैंने सुना है कि ए रूप आराधि रघुवर इसी रूप की आराधना करके रघुवर ने बोरोदार बोरे जोई लंकेश्वरो उद्धार चिले जनको नंदिनी आप ही की आराधना करके आप ही के वर से जई होकर के वर से शक्तिमान होकर के लंकेश्वर के ऊपर में विजय विजय प्राप्त की थी और जनक नंदिनी का उद्धार किया था। इस युग में दोनों भगवान रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद भगवान रामकृष्ण ने शोडशीय रूप में मां शारदा की आराधना की और मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के कोलकाता में उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया और किस तरह से स्वामी विवेकानंद मां की ही शक्ति से शक्तिमान होकर के विदेश में गए। किस तरह से अमेरिका और यूरोप में वेदांत का प्रचार किया। तारा चांद कहे सुनो गिरी रानी। अभी यह पद जो है वो तारा चांद गा रहा है और गिरी रानी अर्थात कि मां पार्वती की मां जननी मैना को कह रहा है ए तुम्हार पराणो ईशानी यही तुम्हारी जो लाडली बिटिया है वही तो आदि शक्ति है नाशीते भूभ दशोभुजाकार इस पृथ्वी के ऊपर में भूभ अर्थात कि पापों का भार असुरों का भार बढ़ गया है उसका नाश करने के लिए दशोभुजाकार मोहिते महिषासुर मर्दिनी दश भुजाओं का स्वरूप धारण किया है और महिषासुर मर्दिनी के नाम से विख्यात है। देखिए यहां पे भी जिस तरह से गंभीरानंद जी कहते हैं कि हम सबके हृदय में जिस तरह से संशय असुर बैठा हुआ है उसका नाश करने के लिए मां का आगमन हुआ है। और मैं सही में बताता हूं मेरा खुद का उदाहरण कि मेरे हृदय में भी इस तरह का संशय बड़ा ही स्ट्रांग था। मेरे घर में कभी भी किसी भी तरह के जो धार्मिक फंक्शन वगैरह होते थे। अभी देखिए उत्सव है तो उत्सव का आनंद हम लेते हैं। किंतु उत्सव के दरमियान जो भारत के तो जितने भी उत्सव है कोई ना कोई देवी देवता को ही समर्पित है। किंतु मेरा जो फोकस रहता है या तो फिर मन की इच्छा रहती है उत्सव का आनंद उठाना। नहीं कि यह उत्सव जिनको समर्पित है उन देवी देवताओं के प्रति श्रद्धा भक्ति प्रकट करना या व्यक्त करना। तो उस तरह से एक तरह का नास्तिक भाव पहले से ही मेरे मन में था। किंतु धीरे-धीरे करके जितना मैं मां को पढ़ता गया और ठाकुर और स्वामी जी को भी उतना ही मेरे मन में से यह संशय राक्षस है। अभी मैं यह नहीं कहूंगा कि इसका नाश हुआ है किंतु एटलीस्ट मेरे सामने यह लॉजिकल रास्ता खुल गया है कि संशय रखना हमारे लाभ में नहीं है। संशय रखेंगे। तो जिस तरह से मास्टर महाशय कहते हैं उस जर्मन फिलॉसोफर के बारे में कि संदेह राक्षस इस तरह से उसके मन के ऊपर में सवार था कि आखिर में उसको आत्महत्या करनी पड़ी। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि मैं भी क्या इस तरह का संदेह रखकर के आखिर में नासी पास हो जाऊंगा। आखिर में मैं फ्रस्ट्रेट हो जाऊंगा। आप आखिर में मैं डिसपर्ड हो जाऊंगा। नहीं मुझे ऐसा नहीं करना। मुझे ठाकुर पर विश्वास रखना है। मुझे ठाकुर पर श्रद्धा रखनी है। तो वैसे ही एटलीस्ट मेरे लिए यह लॉजिकल रास्ता तो खुल गया है। एक्चुअल संदेह राक्षस का संहार कब होगा पता नहीं। किंतु मुझे पता है कि इसका संहार हो सकता है और यह संहार करत्री सिर्फ मां ही है और किसी की शक्ति यह नहीं है। तो देखिए कि हम सबका यह आध्यात्मिक जर्नी हमको दिखाई देता है। अभी देखिए कि मां शारदा के जीवन के कुछ प्रसंग अभी अह बहुत बार तो हमको ऐसा नहीं दिखता है कि मां शारदा स्वयं को देवी के रूप में घोषित करती हो या तो फिर देवी की तरह मां के जीवन में कोई परिवर्तन जैसे कि समाधि भाव यह सब दिखता हो किंतु देयर आर इनफ एग्जांपल्स। यदि मां के जीवन को हम अच्छे से अभ्यास करें तो इस तरह से यह एक एग्जांपल है शिबूदा के साथ में अर्थात कि ठाकुर के भतीजे के साथ में एक बार मां कामार पुुर से जयराम बाटी आ रही थी दोनों पैदल ही यात्रा कर रहे थे जैसे कि उस समय का था अवस्था और फिर जब जयराम बाटी के सामने में ही वह खेतों का बड़े खेत के मैदान प्रारंभ होते हैं वहां पे आकर के एकाएक शिवू दादा अटक गए वो चलना रुक छोड़ दिया उन्होंने। तो फिर मां ने कहा कि अरे शिवू देखो संध्या होने को आई है। अभी अंधेरा हो जाएगा। चलो अंधेरा होने से पहले अपने घर चले जाते हैं। तो शिवू दादा कहते हैं कि नहीं मैं यहां से तब तक नहीं जाऊंगा तब तक जब तक कि तुम यह स्वीकार ना करो कि तुम कौन हो? तुम्हारा असली स्वरूप क्या है? यह जब तक तुम नहीं बताओगी तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। तो मां ने उत्तर दिया कि अरे मैं कौन हूं? मैं तो तुम्हारी चाची हूं। और इससे ज्यादा और तुमको क्या चाहिए? तो फिर जैसा ही मां ने ऐसा कहा तो शिव दादा कहते हैं अच्छा ठीक है। तुम सिर्फ मेरी चाची ही हो तो ठीक है। तुम जाओ आगे मैं यहीं पर खड़ा रहता हूं। वैसे तो गांव आ गया है। अभी तो तुम आसानी से वो मैदान क्रॉस करके घर चली जाओगी। तो किंतु देखिए मां का हृदय है तो संतान को वहां पे वो खुले मैदान में छोड़कर के कैसे जा सकती है? एक तो है मां का खुद का एक रिलक्टेंस अपना स्वरूप स्वीकार करने के प्रति। किंतु दूसरा ही है संतान के प्रति स्नेह। संतान जब जििद करता है तब मां को फिर अपना सही स्वरूप स्वीकार करना ही पड़ता है। तो अब जब संध्या हो रही है शिबू दादा जिद करके बैठे हैं कि मैदान में से तो मैं नहीं ही जाऊंगा। तो फिर आखिर में मां ने कहा लोके बोले काली लोक कहते हैं काली। तो फिर शिव दादा ने कहा काली तो ठीक तो माने सही सही में काली तो ठीक बोल रही हो। तो मां कहती है हां। तब शिवू दादा खुश होकर के मां के साथ में फिर जय राम भाटी अपने घर वापस आए। तो यह थी मां और एक घटना है सुंदर घटना है। छोटी सी है कि जय राम भाटी में खाना बनाने के लिए एक समय था कि एक स्त्री को रखा था। तो अभी अब क्या है कि ब्राह्मण के घर में खाना बनाना है। वह भी मां के वहां पर तो ठाकुर की पूजा है। तो थोड़े से नीति नियम आचार विचार का तो पालन करना ही पड़ेगा। तो यह ब्राह्मणी महिला जो है जो ब्राह्मणी है खाना बनाने के लिए कुक के रूप में रखी है तो उसने एक दिन वह मां के घर आ रही थी तो रास्ते में एक कुत्ते का स्पर्श हो गया। अभी कुत्ता क्या है? तो एक अशुभ कहो ना कि अपवित्र कहो। तो अभी जब कुत्ते का स्पर्श हो ही गया है तो इस स्पर्श किए हुए देह से फिर से कैसे वहां पर जाकर मां के घर में खाना बनाएगी। इसलिए यह ब्राह्मणी मां के घर आकर के कहती है कि मैंने आते-आते रास्ते में कुत्ते का स्पर्श हो गया है मुझसे तो मैं स्नान करके आती हूं। तो उस समय अभी देखिए एक तो बात है कि हाइजीन और सैनिटेशन तो होना ही चाहिए। किंतु भारत में उस समय ऐसा हुआ था कि हाइजीन और सैनिटेशन के जो साइंटिफिक लॉजिकल यह जो सब नियम थे, उससे परे जाकर के ये छुआछूत का बहुत ही ज्यादा एक चल रहा था। स्वामी जी ने कहा ना कि भारत में धर्म यह किचन में घुस गया है। यह छुआछूत में ही हमारा सब चला गया है। तो इसको छू दिया तो स्नान करना होगा। यह अस्पृश्य है तो उससे दूर रहना है वगैरह-वगैरह बहुत था। तो यहां पर कुत्ते को स्पर्श किया है तो सिर्फ हाथ धोने से ही तो चल जाता। स्नान करने की वैसे कोई आवश्यकता नहीं है। तो मां ने कहा कि देखो तुमको इतनी रात को स्नान करोगी तो सर्दी बुखार हो जाएगा। उसकी वजह हाथ पैर धोकर के कपड़े बदल दो तो भी चलेगा। तो फिर अभी ब्राह्मणी जो थी खाना पकाने वाली उसके मन में यह छुआछूत यह वगैरह विधि विधान का बड़ा ही स्ट्रांग एक यह था। तो उसने कहा कि इस तरह से क्या हो सकता है? क्या कि शास्त्र में हमने तो सुना है यही कि जो अस्पृश्य चीज है उसको अशुचि जो है उसको स्पर्श करने से स्नान करना ही होगा। तो मां ने कहा कि अच्छा ठीक है तुम्हारी यदि इतनी ही इच्छा है तो फिर भी तुम स्नान तो मत ही करो। तुम गंगाजल को स्पर्श कर दो। गंगाजल तुम्हारे देह पर थोड़ा सा छिटक दो। फिर भी यह जो ब्राह्मणी है वह मान नहीं रही है। कहती है कि ऐसे कैसे होगा? स्नान तो करना ही पड़ेगा। तब आखिर में मां ने कहा कि देखो तुम्हारे मन में यह बात बड़ी स्ट्रांग रूप से बैठी है कि कुत्ते को स्पर्श किया है तो अशुद्ध हो गई हो। स्नान करना ही पड़ेगा। तो एक काम करो तुम मुझे स्पर्श कर दो। तो जैसे ही मां ने यह बात कही तो ब्राह्मणी की अकल आई कि वह किसके साथ में बात कर रही है और कोई सामान्य घर होता और कोई सामान्य गृहिणी होती और कोई सामान्य नियमों के अनुसार जहां पर चलता काम वहां पर ठीक है कि कुत्ते को स्पर्श किया स्नान करना है। यहां पर जगत जननी भगवती आध्या शक्ति स्वयं कह रही है कि यह सब नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं है। जो बेसिक हेल्थ एंड हाइजीन के जो सिद्धांत है उसको फॉलो करने से ही हो जाएगा और इसके बावजूद तुम्हारे मन में संदेह है तो मुझे स्पर्श कर दो। जब मां ने ऐसा कहा तो वह ब्राह्मणी को थोड़ी सी अकल आई और फिर उस समय के लिए क्षण भर के लिए तो एटलीस्ट यह छुआछूत का यह जो उसके सर पर भूत चढ़ा था उससे वह मुक्त होई। देखिए मां मां एक बार कहती है यह राधु बार-बार मां को गाली दे रही है। मां के ऊपर में यह सब अत्याचार कर रही है। तो मां ने कहा था अपना खुद का शरीर दिखा के कि एक देव शरीर जैनो इसको देव शरीर के रूप में जानना। इससे क्या इतना अत्याचार सहन होगा? क्या मैं इतना अत्याचार सहन कर पाऊंगी? किंतु फिर भी मां क्या कहती है? भगवान ना होले की मानुष ए तो शज करते पारे भगवान यदि नहीं होंगे तो वह मनुष्य क्या इतना सहन कर पाएगा देखो मां आमी थकते एरा क्यों आमा के जानते पारबेना परे बुझब बेश देखो मां मेरे रहते रहते इसमें से कोई भी मुझे पहचान नहीं पाएंगे मेरे जाने के बाद में इनको अकल आएगी तो सही में हमने तो कल भी देखा था कि राधु के मन में यह बात मां की महासमाधि के बाद में स्पष्ट हुई जब राधु का खुद का आखिरी समय चल रहा था और वहां पर मां के जो त्यागी संतान जो कि जयराम भाटी आश्रम के अध्यक्ष थे उन्होंने कहा राधु को कि आप एक काम कीजिए वहां पे वो कनखल में अपनी हॉस्पिटल है वहां पर जाकर ट्रीटमेंट लीजिए। ये राधु को यह अस्थमा वगैरह कुछ हो गया था। तो राधु ने कहा कि अरे दादा आप क्या कहते हैं कि मैं क्या मां का घर छोड़कर के अपने आखिरी समय में जाऊंगी क्या और कहीं पर यहीं पर तो मेरी मुक्ति का यह मेरे लिए काशी वृंदावन सब तो यहीं पर है। यहीं पर मरने से ही मेरी मुक्ति होगी। मुझे ट्रीटमेंट के लिए और कहीं नहीं जाना। मैं यहां पर ही अपना देह त्याग करूंगी। तो यह राधु कहती है और सही में वहीं पर उसका देह त्याग भी होता है। वही मां के घर में तो देखिए कि मां के रहते-रहते तो यह लोग नहीं समझ पाए किंतु बाद में इन लोगों को समझ में आया था। यही शशि महाराज की कहानी कि मां गई है बेंगलुरु में। और यदि आप लोग भी बेंगलुरु गए होंगे तो वहां पर देखा होगा एक छोटा सा हिल जैसा है। वहां पर मां उस हिल पर गई थी अपने कुछ साथियों के साथ में सूर्योदय ना कि सूर्यास्त सूर्यास्त का दर्शन करने के लिए। तो जैसे ही शशि महाराज को पता चला रामकृष्णानंद जी दौड़े-दौड़े आए। दौड़ेदौड़े आकर के मां के श्री चरणों में प्रणत हुए और क्या कह रहे हैं कि मां आज पर्वत वासिनी हुई है। वही मां पार्वती और यही मां शारदा वही पार्वती जैसे पर्वत वासिनी थी। हिमालय की कन्या थी। यहां पे आज के कलयुग में मां फिर से पर्वत वासिनी हुई है और फिर मां के श्री चरणों में प्रणत होकर के वो स्तोत्र पाठ स्तव पाठ शशि महाराज करते हैं। और आखिरी एक घटना राजा महाराज की काशी की घटना है। मां भी वहां पर थी। राजा महाराज भी वहां पे थे। एक दिन राजा महाराज वहां पे नीचे में वह जो खुली जगह है वहां पर टहल रहे थे और ऊपर वाले कमरे में फर्स्ट फ्लोर पे जहां पे मां रह रही थी वहां से गुलाब मां ने कहा राजा महाराज को कि मां पूछ रही है मां प्रश्न कर रही है कि जो कोई भी पूजा होती है तो पूजा के प्रारंभ में देवी की आराधना क्यों होती है? इस प्रश्न का आपको उत्तर देना है। गुलाब मां राजा महाराज को पूछती है कि मां का यह प्रश्न है। आप उत्तर दीजिए। प्रत्येक पूजा के प्रारंभ में पहले देवी की पूजा से देवी की आराधना से क्यों प्रारंभ होता है? साथ-साथ में ही राजा महाराज ने उत्तर दिया क्योंकि ब्रह्म ज्ञान की चाबी देवी के हाथ में है। शक्ति के हाथ में है। जब तक आप उनकी आराधना करके उनको प्रसन्न नहीं करेंगे तब तक आपको ब्रह्म ज्ञान मिलने वाला नहीं है। तो यह मां का देवी स्वरूप। इसके बाद जो है मां का भयंकरा स्वरूप काली स्वरूप तो उसके बारे में अभी हम कल चर्चा करेंगे। आ जाइए। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

देवी का भयंकरा स्वरूप

यस मैं काली द मदर कविता का उल्लेख करूंगा कल करूंगा एक्चुअली क्या है कि देखिए हिंदू धर्म में और यह जो अब्राहमिक रिलीजन है दैट इज क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और जुडाइज्म। वहां पर क्या है कि गुड एंड इविल को स्प्लिट कर दिया है कि गॉड इज गुड एंड इविल इज समथिंग सेपरेट। तो होता क्या है? अभी उनको दुनिया भर का यह एक मेंटल जिम्नास्टिक करना पड़ता है कि यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो यह अनिष्ट आया कहां से? ये अशुभ आया कहां से? तो अभी उन लोग वे लोग अपने हिसाब से उत्तर देते हैं। किंतु हिंदू धर्म में है कि जब तक आप माया के राज्य में है इष्ट और अनिष्ट दोनों एक दूसरे के साथ में ही चलते हैं। और जब तक अनिष्ट होता है आपके यह तो एक बात हो गया। फिलॉसोफिकल एक उत्तर हो गया कि इष्ट और अनिष्ट दोनों सिक्के की दो पहलुएं हैं। यानी कि यदि मैं अच्छा चाहता हूं तो बुरा भी होगा। माया के राज्य में दोनों आपके साथ में होगा। ऐसा कभी होने ही नहीं वाला है कि मेरे साथ में सिर्फ अच्छा हो। बुरा कभी हो ही नहीं। ऐसा होने ही नहीं वाला है। सो दैट इज वन थिंग कि दोनों से परे जाना है। शुभ और अशुभ से परे जाकर आत्मज्ञान प्राप्त करना है। दैट इज आवर फिलॉसोफिकल वेदांतिक अंडरस्टैंडिंग। किंतु और दूसरा एक व्यावहारिक अंडरस्टैंडिंग यह है कि जब कोई अपना अनिष्ट करने को आता है तो फिर हमको हाथ पर हाथ रख के बैठे नहीं रहना है। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य तप, शोच, संतोष यह सब अपने आध्यात्मिक जीवन में ठीक है। ईश्वर के प्रति ठीक है। सांसारिक जगत में तो आपको व्यवहारू होना ही होगा। तो फिर यही जो स्वामी जी का फेमस कि कृष्णा के फॉलोअर्स आर फॉलोविंग क्राइस्ट और क्राइस्ट के फॉलोअ है। वे लोग फॉलो कर रहे हैं कृष्णा को। सो दोनों ओर से यह उत्तर है फिलोसोफिकली कि इष्ट और अनिष्ट हमेशा जुड़े हुए एक साथ में ईश्वर और शैतान या तो फिर आसुरी शक्ति जगत में रहने से दोनों आपके पास में आएंगे। आपका सॉल्यूशन है टू गो बिय्ड बोथ टू गो बियों्ड दिस वर्ल्ड ऑफ इष्ट और अनिष्ट दैट इज वेदांतिक सॉल्यूशन और यहां पे है एक व्यावहारिक सॉल्यूशन

प्रश्न: बहोत बार हम यह ठीक नहीं कर पाते की आत्मरक्षा करे की न करे

ना इसका फ्रेमवर्क भी है अपने पास में अ तीन अपने पास में ये कहेंगे कि स्टेजेस है या तो फिर कहेंगे कि कैनवास है एक तो है कॉन्शियसनेस दूसरा है कम्यूनिटी तीसरा है सिविलाइजेशन तो कॉन्शियसनेस यानी कि अपना इनर वर्ल्ड वहां पे क्या करना है? दैट इज एग्ेंंपलीफाइड बाय ठाकुर कि जब वो था वो वहां पे हवलदार ना कि क्या नाम उसका ठाकुर को लात भी मारता है तो ठाकुर उसको सहन कर लेते हैं। कहते हैं कि मथुर बाबू को कंप्लेन करने की कोई जरूरत नहीं। तो वह हो गया कि कॉन्शियस लेवल पे ईश्वर आराधना ईश्वर प्राप्ति के लिए आपको अपना सर्वस्व त्याग करना है। अहंकार है इवन प्राण धारण करने की इच्छा को भी त्याग करना है। व्हिच इज वेरी मतलब एक आम आदमी को आप ऐसा कहेंगे आम आदमी के भीतर में जीजीविष्या होती है। अर्थात कि जीवन धारण करने की इच्छा यह आखिरी इच्छा भी उसको आपको त्याग करना है। ठाकुर ने जब खड़ग अपने गले पे डालना का चाहा कहा कि यदि दर्शन दो वरना तो मैं अपना गला काट दूंगा। दैट इज व्हाट कि मनुष्य के जीवन में जो आखिरी चीज है माने सब चला जाता है एक चीज नहीं जाती वो है जीजीवी विषाप जीवन धारण करने की इच्छा मृत्यु का डर किसको मृत्यु पसंद है? कौन मरना चाहता है? कौन अपने प्राणों की बाजी लगा देना चाहता है? सो दैट इटसेल्फ आपको सैक्रिफाइस करके ईश्वर के पास जाना है? सो दैट इज़ पाथ ऑफ कॉन्शियसनेस और रेदर द वर्ल्ड ऑफ़ कॉन्शियसनेस, स्टेज ऑफ़ कॉन्शियसनेस। यहां पे है द सेकंड कैनवास और सेकंड स्टेज इज कम्युनिटी लाइफ। कि आपको अकेले तो है नहीं आप कुछ समय के बाद में आपको तो दैट इज कम्युनिटी। कि वहां पर तो आपका एक इंडिविजुअल पाथ टुवर्ड्स स्पिरिचुअलिटी है। यहां पर है कि विदिन द कम्युनिटी आपको रहना है। और मां कहती है ना कि स शो शो जे सहन करता है जे शोए शेरो जे नाश ना रोए अर्थात कि जो सहन करता है वह रह पाएगा नहीं सहन कर पाएगा नहीं रह पाएगा। यही जो मां राधु को कहती है कि तुम लोग मेरे पर इतना अत्याचार करते हो जानना कि यह देवी शरीर है। तो क्या है कि एक कैपेसिटी टू सफर एक होना चाहिए। कैप सहन शक्ति जिसको हम कहते हैं। यह तो एक है। दूसरा कि मातृभाव स्नेह सबके प्रति स्नेह होना चाहिए। सबके प्रति एक समान रूप से व्यवहार करने की हमारे में क्षमता होनी चाहिए। जो कि व्हिच इज परफेक्टली एग्ेंंपलीफाइड बाय मदर। सहन शक्ति और मातृभाव यह दो जो है मां के जीवन में एग्लीफाई हुआ है। तो यह यदि हमारे भीतर में कम्युनिटी लाइफ में नहीं होगा तो कम्युनिटी लाइफ में रहना मुश्किल हो जाएगा। और तीसरा है सिविलाइजेशनल स्केल पे कि देश के ऊपर में जब आक्रमण होता है तो फिर तो हमको आक्रमण का उत्तर देना ही पड़ेगा। सो वो और दूसरा कि जो इंस्टिटशंस होते हैं इंस्टिट्यूशन शुड बी वर्किंग इंस्टिट्यूशन जो भारत में करप्शन और यह जो प्रवेश कर गया था उस समय भी और आज भी उसकी वजह से इंस्टीट्यूशन ठीक से काम नहीं करते इंस्टीट्यूशन हैज़ टू वर्क परफेक्टली। सो यह देखिए कि ऑन एव्री स्टेज आपका वैल्यू एडिशन होता जाता है। किस तरह से इंडिविजुअल कॉन्शियस लेवल पर ठाकुर की जो वैल्यू्यूज है उसको आप थोड़ा सा मॉडिफाई करेंगे कम्युनिटी लेवल पे और मॉडिफाई तो नहीं कहेंगे वैल्यू एडिशन करेंगे और फिर जब वह सिविलाइजेशनल स्केल पे आएगा तो अगेन देयर विल बी फर्दर वैल्यू एडिशन अ न्यू आइटरेशन। सो दैट इज़ व्हाट वी हैव टू अंडरस्टैंड कि ऑन विच लेवल आई एम वर्किंग। किस कैनवास पे मैं काम कर रहा हूं। ऑन दिस द इस इंडिविजुअल कैनवास है जो कि मेरे ईश्वर की ओर साधना है। सो दैट इज़ वन सेट ऑफ़ अह वैल्यूज़ आई हैव टू फॉलो इफ आई एम वर्किंग ऑन द कम्युनिटी कैनवास देन अनदर सेट ऑफ़ वैल्यू। सेम सेट ऑफ़ वैल्यू बट विथ अह यू कैन से प्लगिंस वगैरह ऐड करके वैल्यू एडिशन करके सेम वैल्यूज़ को आपको वैल्यू ऐड करके यूज़ करना है। एंड द सिविलाइज़ेशनल स्केल कैनवास देन अगेन यू हैव टू ऐड मोर वैल्यूज़ टू दैट। सो दैट इज़ आवर रिकंसिलिएशन। थोड़ा सा डिफिकल्ट है बट दैट इज व्हाई हम लोग ठाकुर मां स्वामी जी का एक साथ में स्टडी करते हैं। आप यदि अलग-अलग करके करेंगे तो आपके मन में यह कंफ्यूजन हमेशा होगा कि ये उस आदमी ने ठाकुर को लात मारी ठाकुर ने उसका उत्तर नहीं दिया तो यह ब्रिटिश लोग हैं या तो फिर यह आक्रमणकारी हमारे पर आक्रमण करेंगे। क्या उत्तर नहीं देना है? बट नहीं। देयर इज़ अ कॉन्शियसनेस कैनवास। दिस इज़ अ सिविलाइजेशनल कैनवास। दैट वी हैव टु मॉडिफाई आवर वैल्यूज़ अकॉर्डिंगली। माने जैसे ही घर से बाहर पैर रखा आप सिविलाइज़ेशनल डायमेंशन में आ गए। यह म्युनिसिपालिटी सर्विस है। उसके साथ में तो आपका डेली का है कामधाम। आप जॉब करने को जाएंगे, बिजनेस करने को जाएंगे। नेशनल लेवल इंस्टीटशंस तो सबको इंपेक्ट करते हैं। सो ऑल थ्री एस परफेक्टली कहा कि माने एक दिन में ऐसा रेयरली होगा कि आप तपस्या करने के लिए हिमालय में चले जाइए। गुफा में बैठे महीने भर तक तो एक बात है कि मैं सिर्फ इंडिविजुअल डायमेंशन के साथ इसलिए तो ठाकुर कहते हैं ना मने वने और कोणे ये कम्युनिटी और ये सिविलाइजेशन से दूर जाकर के आपको इंडिविजुअल लेवल पे कॉन्शियस लेवल पे आपको थोड़ा सा टाइम ज्यादा बिताना होगा। उससे शक्तिमान हो के देन यू रिटर्न टू कम्युनिटी एंड सिविलाइजेशन देन इट गिव्स यू दैट बूस्ट टू यू नो फाइट और टू सफर अब अब पहला वाला उत्तर तो मैं दे सकता हूं कि ठाकुर के साथ में मां का फोटो रखने का किसने सोचा होगा किसने सोचा होगा बताइए तो माने खुद ने माने खुद ने [हंसी] क्वालपाडा में क्वाल में जब वो मंदिर की प्रतिष्ठा तो फिर कहा कि हमने तो वहां पर ठाकुर का फोटो बिठा के जाऊंगी। मां ने ऐसा कहा था। तो किंतु वे लोग लिखते हैं वर्दा महाराज लिखते हैं कि हमको तो पता है कि सशक्ति प्रभु की आराधना करना ही भारत की रीति है। तो हमने तो दोनों फोटो प्रस्तुत रखे हैं ठाकुर के मां के दोनों। तो मां ने अपने हाथों से ठाकुर का फोटो तो रखा साथ में अपना फोटो भी रखा। और वर्धा महाराज कहते हैं कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि शक्ति ने अपने हाथों से शक्ति की स्थापना की है। और सिर्फ इतना ही नहीं

मास्टर महाशय और मिशन में सेवाकार्य

वहां का प्रॉब्लम क्या था? वो प्रॉब्लम का सॉल्यूशन मां ने लाया था। मास्टर महाशय स्वीकार नहीं कर रहे थे कि यह सेवा कार्य करने की आवश्यकता है। तो फिर जब मां ने ₹10 भेजा तो राजा महाराज ने कहा मास्टर महाशय को बुलाइए अभी। मास्टर महाशय को बुला करके ₹10 दिखाया। कहा कि मां ने कहा है तो देखिए कि मास्टर महाशय की शरणागति देखिए उनकी खुद की बुद्धि कह रहे हैं कि नरेंद्र जो कर रहा है वो ठीक नहीं किंतु मां के प्रति शरणागति ऐसी है कि जैसे ही मां का ₹10 देखा इमीडिएटली स्वीकार कर लिया एक खून ना माना और जो ना आई अभी स्वीकार नहीं करने का उपाय नहीं है

व्यक्तिगत, सामाजिक, और राष्ट्र -- तीन स्तर पे तीन तरह की आध्यात्मिक व्यवस्था

ना यही क्या है ना देखिए ये इंडिविजुअल लेवल पे हम जो वैल्यूस अर्न करते हैं तपस्या करके द सेम वैल्यूस आर यूज्ड इन कम्युनिटी एंड सिविल िलाइजेशन राइट किंतु फिर उसको वो मॉडिफाई हो जाता है। अभी आप भारत में देखिए कि ठाकुर मां स्वामी जी की तपस्या की वजह से जब अपना फ्रीडम मूवमेंट हुआ तो हमने अहिंसा का रास्ता लिया और सब देशों में देखिए क्या खुनामरकी हुआ है। चाइना का आप हिस्ट्री पढ़ेंगे ना बाप रे मतलब कितना भयानक हत्याकांड इतना भयानक लोगों के ऊपर में अत्याचार मतलब मनुष्य राक्षस बन जाता है। जिस तरह का व्यवहार उन्होंने अपने ही देश बंधुओं के साथ में किया है। वो चाहे वो चियांग काश का कोमिंटांग हो ना कि माओजेदों का कम्युनिस्ट पार्टी ये आप रशिया का देखिए जर्मनी देखिए ब्रिटिश का रूल देखिए पूरे विश्व में सब जगह पे मनुष्य हैवान हो जाता है। भारत में देखिए कि स्पिरिचुअल वैल्यूज किस तरह से ये अहिंसा और ये जो गांधी जी के आंदोलन के रूप में प्रकट हुई है। देयर इज अ क्लियर डिस्टिंशन। आपको सामना करना है अन्याय का किंतु असत का सहारा लेकर अन्याय का सामना नहीं करना। यह बहुत बड़ी शिक्षा है। नहीं डिवोटीज नहीं साधुओं में भी मैंने कहा था ना कल कल ही मैंने कहा था ना वह ब्रह्मचारी की बात वो एक क्लास अटेंड कर रहा है। साधु के ही द्वारा ब्रह्मचारियों का क्लास लिया जा रहा है। वही साधु कहते हैं कि प्रवृत्ति मार्ग है और निवृत्ति मार्ग है। निवृत्ति मार्ग ही अच्छा है। प्रवृत्ति मार्ग गलत है। यह स्कूल हॉस्पिटल जो हम सब कर रहे हैं उसकी कोई आवश्यकता नहीं। अभी एक साधु ब्रह्मचारियों के क्लास में यह बात कर रहा है। तो फिर ब्रह्मचारी मुझे फोन करके कहता है फिर यह जो स्वामी जी ने सब स्टार्ट किया वो क्या अभी इसका कोई आवश्यकता नहीं है। अभी हम इसको हमको इसको बंद कर देना चाहिए। मैंने कहा कि देखो अभी जिसने भी कहा है मैं तो उनके बारे में कुछ कह नहीं सकते। ठाकुर ने खुद ने कहा है कि निवृत्ति मार्ग अच्छा है। प्रवृत्ति मार्ग से ठाकुर ने खुद ने कहा है कि कर्मनाशा एक नदी है। उसमें जंप लगाने से ही बच गए हम। तो वह ठाकुर की बातों का तो हम लोग विरोध नहीं करेंगे। किंतु वी हैव टू अंडरस्टैंड दिस कि ऑन एव्री लेवल देयर इज सम चेंज इन द वैल्यूस। सो सिविलाइजेशनल लेवल वी हैव टू अंडरस्टैंड। बहुत बार ऐसा होता है जैसे कि मेरा खुद का एक जो अनुभव जाता है कि इंडिविजुअल लेवल पर आप आध्यात्मिकता को स्वीकार करते हैं। वैल्यूस को स्वीकार करते हैं। सिविलाइजेशनल लेवल पे आपके मन में बहुत ही ज्यादा द्वेष होता है। खास करके ये मुस्लिमों के प्रति द्वेष, इसके प्रति द्वेष तो फिर मैं सोचता हूं कि इनके जीवन में ना ये दोनों चीजों के बीच में स्प्लिट हो गया है। यह इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी यह सिविलाइज़ेशनल लेवल पे अपस्केल ही नहीं हो रहा है। अपग्रेड ही नहीं हो रहा है। वह वहीं पे रुक जाता है। सिविलाइजेशनल लेवल पे आप दूसरा ही वैल्यूज़ को आप जैसे कि फॉलो कर रहे हैं। सो व्हिच इज़ कंप्लीटली रोंग। यहां पे आप कहते हैं कि ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति यहां पे इसको मारो, उसको मारो, यह रायोट करो। अरे रिकंसिलिएशन कहां है? असत का मार्ग लेकर के आप सत्य को कभी प्राप्त नहीं कर पाएंगे।

विवेकानंद के जीवन में ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय

और यही स्वामी जी यही स्वामी जी कथामृत पढ़िए आखरी आखिरी दिनों की बात है ठाकुर के जीवन के ठाकुर कहते गीत गाओ तो नलिनी दलगत वो जो स्तोत्र है ना कि ये कमल के पत्र के ऊपर में पानी जैसे चिपकता नहीं है वैसे ही आप संसार उसको त्यागी को चिपकता नहीं है। तो जैसे यह स्तोत्र का पाठ करते हैं। ठाकुर कहते हैं यह तो बड़ा ही सामान्य भाव है। गोपी के भाव का गीत गाओ। तो स्वामी जी साथ-साथ में ही गोपी के भाव का गीत गाते हैं और स्वामी जी के मन में तो देखिए मन मुख एक करा तो सिर्फ गीत गाने के लिए गीत नहीं गाते वो तो हृदय से आता है तो हृदय से गोपी के भाव का गीत गाते हैं ठाकुर समाधि में चले जाते हैं। ठाकुर भी ऐसे वैसे मुंह से जो गीत आएगा सुन के समाधि में नहीं जाएंगे। हृदय की बात है यह तो वह भी जो सुमधुर जो गीत गोपी भाव का और ठाकुर समाधि में जाए तो यह थे हमारे स्वामी जी और इन लोगों के तो मन मुख एक है ना जो मुंह से गाते हैं वो हृदय का ही भाव गाते हैं। हृदय में यह भाव नहीं है तो सिर्फ वो पेशेवर ये जो प्रोफेशनल सिंगर की तरह वो स्टेज पर खड़ा है। सब लोग डिमांड कर रहे हैं। यह गीत गाओ तो यह गीत गा दिया। वह गाओ तो वह गा दिया। ऐसा तो नहीं ना स्वामी जी का। यहां पर मैं यह कहूंगा कि बात यह नहीं है कि प्रूफ चाहिए क्योंकि स्वामी जी को पहली ही मुलाकात में या तो फिर कहेंगे कि स्वामी जी की दक्षिणेश्वर की पहली मुलाकात में ठाकुर ने जब स्पर्श किया और जो उनको अनुभूति हुई स्वामी जी खुद कहते हैं अपने शब्दों से कहते हैं कि मेरे जैसे स्ट्रांग जिसका माइंड है उसके माइंड को भी मिट्टी के एक इसकी तरह जो कि तोड़ मरोड़ कर सकता है। उस व्यक्ति की शक्ति कितनी होगी? सो फ्रॉम दैट पॉइंट ऑनवर्ड स्वामी जी को पता तो चल गया था कि अनुभूति का एक राज्य है। स्वामी जी का प्रॉब्लम कहां पर आता था कि वो एक इंटेलेक्चुअली यह सब कुछ रिकंसाइल करना चाहते थे। क्योंकि देखिए कि यह सुपर नेचुरल शक्तियां है। यह तो अनुभव उनको इंस्टेंटली हो गया था। अभी वह प्रॉब्लम यह है कि यह शक्तियां आपके हित करती है कि अहित करती है। अब जैसे ठाकुर को यह दर्शन होते हैं तो स्वामी जी यह नहीं कहते कि आपको दर्शन नहीं होते हैं। स्वामी जी कहते आपको हेलुसिनेशन हो रहा है। हेलुसिनेशन इज़ सॉर्ट ऑफ अ मेंटल डिसऑर्डर जो कि अब स्क्रीजोफेनिया है। आजकल के तो बहुत सारे अब तो अच्छा सा रिसर्च पड़ा हुआ है कि आपको यह सब हो सकता है। मतलब सेंसरी परसेप्शन जो है वो भी आप गेम कर सकते हैं। आप तो ये जो हेलुसनरी जो ड्रग्स होती है वो सब तो आपको सब कुछ दिखा सकती है। राइट? सो दैट इट इज़ क्लियरली अंडरस्टुड कि आपकी सेंस सेंस का जो प्रूफ है दैट कैन इज़ली बी गेम्ड। सो स्वामी जी कहते हैं कि दिस इज नॉट समथिंग वर्थ वाइल। यह आपको हेलुसिनेशन विकृति की ओर ले जाएगा। आपको स्वस्थ होना है नहीं कि विकृत होना है। सो दैट इज़ व्हाट स्वामी जीसस जर्नी वाज़ टू अंडरस्टैंड इट इंटेलेक्चुअली। किंतु यह जर्नी तभी समाप्त हुई जबकि उन्होंने इस बात को इंटेलेक्चुअली समझने की चेष्टा छोड़ दी। वह जो नरेंद्र ने काली को स्वीकार किया। यह बात जो ठाकुर इतने खुश होकर के बोलते थे, व्हिच इज टू जंप फ्रॉम द वर्ल्ड ऑफ रेशनलिटी टू इर्रेशनलिटी। दैट इज व्हाट स्वामी जीसस लीप ऑफ फेथ वास कि ही इज़ सो रैशन एवरीथिंग हैज़ टू बी रिकंसाइल्ड इन अ लॉजिकल वे बट एट वन पॉइंट केम दैट इररेशनलिटी को ही एम्ब्रेस्ड इररेशनलिटी दैट इज स्वामी जीसस कलमिनेशन ऑफ साधना तो इसलिए ठाकुर बार-बार कहते हैं कि नरन काली मैनेज नरन काली मैनेज तो काली दैट इज वन थिंग स्वामी जी खुद कहते हैं कि जितना पढ़ाई लिखाई किया है ना सब मैं यदि भूल जाऊं तो अच्छा रहेगा [हंसी] हम लोग यह जो पढ़ रहे हैं ना तीनों को एक साथ में सो जितने भी टर्निंग पॉइंट है ना सब आएंगे। सो दैट टाइम क्योंकि क्या है ना जब हम उसको प्रॉपर कॉन्टेक्स्ट में डिस्कस करेंगे ना बाय दैट टाइम अपना एक फाउंडेशन बन गया होगा पीछे का। अभी हम जो मां के बारे में आगमनी गीतों में जो कुछ भी डिस्कस करते हैं वी कैन रिकॉल फ्रॉम गंभीरानंद जीसस बुक कि हां वहां पर महाराज जी ने ऐसा कहा है यहां पे ऐसा लीला प्रसंग में ऐसा कहा है सो हमारा वो बैकग्राउंड है रेडी सो थोड़ा बैकग्राउंड जैसे-जैसे होता जाएगा ना वी विल टेक अप ऑल दिस हायर आइडियाज वन बाय वन देखिए मैं हमेशा कहता हूं कि और कुछ हो ना हो ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियों के प्रति प्रेम भी जन्मे ना तो यह भी ये इस जन्म के लिए इनफ है। मैं यही प्रार्थना करता हूं कि ठाकुर मां स्वामी जी की का कथा और कहानी यानी कि उनके वचन और उनके जीवन इसके प्रति सबका प्रेम जन्मे बस दैट इज द ओनली थिंग वी वांट बाकी का वे लोग देख लेंगे [हंसी] फिर बीच में सिग्नल नहीं मिलता है गाड़ी रास्ते में रुक गई घंटे दो घंटे के लिए डज नॉट मैटर आपके पास में टिकट है आप जाएंगे गाड़ी में से कोई निकाल नहीं सकता आपको [हंसी] ओम